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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 11 October 2021

 

 

विषय सूची:

सामान्य अध्ययन-II

1. केन्या और सोमालिया के बीच हिंद महासागर सीमा विवाद

 

सामान्य अध्ययन-III

1. नदीय जीवपालन कार्यक्रम

2. नासा का लूसी मिशन

3. ‘स्थलीय जल भंडारण’ में कमी WMO की रिपोर्ट

4. ‘स्वच्छ, स्वस्थ और संधारणीय पर्यावरण’ को एक सार्वभौमिक अधिकार के रूप में मान्यता

5. प्रादेशिक सेना

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. साहित्य में 2021 का नोबेल पुरस्कार

2. अथिराप्पिल्ली जलविद्युत परियोजना

3. 2021 नोबेल शांति पुरस्कार

4. ईराक में चुनाव और इसका महत्व

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

केन्या और सोमालिया के मध्य हिंद महासागर सीमा विवाद


संदर्भ:

‘सोमालिया’ के साथ लंबे समय से जारी समुद्री सीमा विवाद पर अगले सप्ताह कोई फैसला सुनाए जाने से पहले ‘केन्या’ ने संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ (International Court of Justice- ICJ) के अधिकार क्षेत्र को मानने से इंकार कर दिया है।

‘केन्या’ का कहना है, एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते, केन्या को उसकी स्पष्ट सहमति के बिना किसी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या न्यायाधिकरण के अधीन नहीं किया जा सकता है।

संबंधित प्रकरण:

केन्या और सोमालिया, दोनों पड़ोसी देशों के मध्य असहमति का मुख्य बिंदु, हिंद महासागर में उनकी समुद्री सीमा के विस्तार की ‘दिशा’ से संबंधित है।

विवादित क्षेत्र की अवस्थिति:

  • सोमालिया के अनुसार, हिंद महासागर की ओर समुद्री सीमा का विस्तार उसी दिशा में, अर्थात दक्षिण-पूर्व की ओर होना चाहिए, जिस दिशा में उसकी स्थलीय सीमा का विस्तार है।
  • दूसरी ओर, केन्या का तर्क है कि, समुद्र की ओर पहुचने पर दक्षिण-पूर्व स्थलीय सीमा में 45 डिग्री का मोड़ आना चाहिए और इसके बाद यह अक्षांशीय दिशा में अर्थात भूमध्य रेखा के समानांतर होनी चाहिए।

इस व्यवस्था से केन्या के लिए लाभ होगा। केन्या की तटरेखा की लंबाई मात्र 536  किमी है और यह सोमालिया की तटरेखा (3,333 किमी) से लगभग 6  गुना कम है।

इस क्षेत्र का महत्व:

इस विवादित त्रिकोणीय क्षेत्र का क्षेत्रफल लगभग 1.6 लाख वर्ग किमी है, और समृद्ध समुद्री भंडार से भरपूर है। इस क्षेत्र में तेल और गैस भंडार होने का भी अनुमान है।

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‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ (ICJ) के बारे में:

  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ (International Court of JusticeICJ) की स्थापना वर्ष 1945  में संयुक्त राष्ट्र के एक चार्टर द्वारा की गई थी और इसके द्वारा अप्रैल 1946 में कार्य आरंभ किया गया था।
  • यह संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग है तथा हेग (नीदरलैंड) के पीस पैलेस में स्थित है।
  • यह, संयुक्त युक्त राष्ट्र के छह प्रमुख संस्थानों के विपरीत एकमात्र संस्थान है जो न्यूयॉर्क में स्थित नहीं है।
  • ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ विभिन्न राष्ट्रों के बीच कानूनी विवादों का निपटारा करता है, और अधिकृत संयुक्त राष्ट्र के अंगों तथा विशेष एजेंसियों द्वारा निर्दिष्ट कानूनी प्रश्नों पर अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार सलाह देता है।

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संरचना:

  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में 15 न्यायाधीश होते हैं जिन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद द्वारा नौ वर्ष के कार्यकाल हेतु चुना जाता है। ये दोनों संस्थाएं एक ही समय पर, लेकिन अलग-अलग मतदान करती हैं।
  • न्यायाधीश के रूप में निर्वाचित होने के लिये किसी उम्मीदवार को दोनों संस्थाओं में पूर्ण बहुमत प्राप्त होना चाहिये।
  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में निरंतरता सुनिश्चित करने हेतु न्यायालय की कुल संख्या के एक-तिहाई सदस्य, प्रति तीन साल में चुने जाते हैं और ये सदस्य न्यायाधीश के रूप में पुन: निर्वाचित होने के पात्र होते हैं।
  • ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ के लिए एक लेखागार (रजिस्ट्री), जोकि उसका स्थायी प्रशासनिक सचिवालय द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। अंग्रेज़ी और फ्रेंच इसकी आधिकारिक भाषाएँ हैं।

‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ के 15 न्यायाधीश निम्नलिखित क्षेत्रों से चुने जाते हैं:

  1. अफ्रीका से तीन
  2. लैटिन अमेरिका और कैरेबियन देशों से दो
  3. एशिया से तीन
  4. पश्चिमी यूरोप और अन्य राज्यों से पाँच
  5. पूर्वी यूरोप से दो

न्यायाधीशों की स्वतंत्रता:

अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के अन्य निकायों के विपरीत अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में सरकार के प्रतिनिधि नहीं होते है। न्यायालय के सदस्य स्वतंत्र न्यायाधीश होते हैं, अपने कर्तव्यों की शपथ लेने से पूर्व, जिनका पहला काम खुली अदालत में यह घोषणा करना होता है, कि वे अपनी शक्तियों का निष्पक्षता और शुद्ध अंतःकरण से उपयोग करेंगे।

अधिकार क्षेत्र और कार्य:

  • ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ दोहरे अधिकार क्षेत्र सहित एक ‘विश्व न्यायालय’ के रूप में कार्य करता है अर्थात् देशों के मध्य कानूनी विवादों का निपटारा करना (विवादास्पद मामले), जिनके लिए पक्षकार देशों द्वारा अदालत में लाया जाता है, तथा संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न अंगों और विशेष एजेंसियों द्वारा उसके लिए निर्दिष्ट किये गए कानूनी प्रश्नों पर सलाह प्रदान करना (सलाहकार कार्यवाही)।
  • केवल संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश तथा ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ अधिनियम के पक्षकार देश अथवा विशेष शर्तों के तहत ‘न्यायालय’ के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करने वाले देश ही ‘विवादास्पद मामलों’ (Contentious Cases) के निपटान हेतु ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ में पक्षकार हो सकते हैं।
  • ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ का निर्णय अंतिम और पक्षकार देशों के लिए बाध्यकारी होता है, तथा इसके फैसले के खिलाफ अपील नहीं की जा सकती है (ज्यादा से ज्यादा, इसके फैसले की, मामले से संबंधित किसी नए तथ्य की खोज पर फिर से व्याख्या की जा सकती है)।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ (ICJ) में सदस्य राष्ट्रों की सरकारों के प्रतिनिधि शामिल नहीं होते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UNCLOS क्या है?
  2. हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित देश
  3. हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका
  4. ICJ और ICC के बीच अंतर।
  5. इन संगठनों की भौगोलिक अवस्थिति स्थिति और आसपास के देशों का अवलोकन।
  6. रोम संविधि क्या है?

मेंस लिंक:

हिंद महासागर क्षेत्र के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।

नदीय जीवपालन कार्यक्रम


(River Ranching Programme)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय द्वारा उत्तर प्रदेश में एक राष्ट्रव्यापी ‘नदीय जीवपालन कार्यक्रम’ (River Ranching Programme) की शुरुआत की गयी।

  • इस कार्यकम के शुभारंभ में ‘उत्तर प्रदेश’ के साथ ही उत्तराखंड, उड़ीसा, त्रिपुरा और छत्तीसगढ़ जैसे अन्य 4 राज्यों ने भी भाग लिया।
  • कार्यकम के अंतर्गत, उत्तर प्रदेश में बृजघाट, गढ़मुक्तेश्वर, तिगरी, मेरठ और बिजनौर जैसे तीन स्थानों पर 3 लाख मछली के बच्चों का पालन किया जाएगा।

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‘नदीय जीवपालन’ या ‘रिवर रैंचिंग’ क्या होती है?

नदीय जीवपालन (River Ranching) जलीय कृषि / मत्स्यपालन (aquaculture)  का एक रूप होता है, जिसमें मछली प्रजातियों, जैसे ‘सामन’ (salmon), को उनके जीवन के पहले चरण में किसी कृत्रिम या प्राकृतिक जलीय स्थल पर सुरक्षित अर्थात, कैद में रखा जाता है।

इसके बाद, इन मछली के बच्चों को थोड़ा बड़ा हो जाने पर समुद्र या नदी के स्वतन्त्र जल में छोड़ दिया जाता है। जब ये मछलियाँ वयस्क होने पर, समुद्र से मीठे पानी के अपने मूल स्थान पर अंडे देने के लिए वापस आती है, तो इन्हें पकड़ लिया जाता है।

‘नदीय जीवपालन कार्यक्रम’ के बारे में:

इस कार्यक्रम को ‘प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना’ (PMMSY) योजना के तहत, स्थलीय एवं जलीय क्षेत्रों की उत्पादिता में विस्तार, गहन, विविधीकरण के माध्यम से मत्स्य-उत्पादन और उत्पादकता को बढाने के उद्देश्य से  एक विशेष गतिविधि के रूप में शुरू किया गया था।

कार्यान्वयन एजेंसी:

‘प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना’ के केंद्रीय घटक के रूप में ‘राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड’, हैदराबाद, इस कार्यक्रम के किए नोडल एजेंसी है।

कार्यक्रम की आवश्यकता:

मानवीय आबादी में वृद्धि होने के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन की आवश्यकता के कारण मछली की मांग में धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी हो रही है।

इस प्रकार, किफायती और पर्यावरण के दृष्टिकोण से उपयुक्तरूप से, मत्स्य संसाधनों का सतत उपयोग और संरक्षण को बढ़ावा देना समय की मांग बन चुकी है, और इसी को ध्यान में रखते हुए ‘नदीय जीवपालन कार्यक्रम’ की शुरुआत की गयी है।

  • यह कार्यक्रम, संवहनीय मत्स्य पालन, आवास क्षरण में कमी, जैव विविधता का संरक्षण, सामाजिक-आर्थिक लाभों को अधिकतम और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का आकलन करने में सहायक होगा।
  • इसके अलावा नदीय जीवपालन कार्यक्रम’ पारंपरिक मत्स्यपालन, पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता और अंतर्देशीय समुदायों का व्यापार और सामाजिक सुरक्षा के उन्नयन को भी सुनिश्चित करेगा।

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प्रधान मंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (PMMSY) के बारे में:

यह देश में मत्स्य पालन क्षेत्र पर केंद्रित और एक इसके सतत विकास के लिए एक योजना है।

  • इस योजना को आत्मनिर्भर भारत पैकेज के अंतर्गत वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक पांच साल की अवधि के दौरान सभी राज्यों/ संघ शासित प्रदेशों में कार्यान्वित किया जायेगा एवं इस पर अनुमानित रूप से 20,050 करोड़ रुपये का निवेश किया जायेगा।
  • यह योजना समुद्री, अंतर्देशीय मत्स्य पालन और जलीय कृषि में लाभार्थी उन्मुख गतिविधियों पर केंद्रित है।
  • इस योजना में ‘क्लस्टर अथवा क्षेत्र आधारित दृष्टिकोण’ अपनाते हुए मत्स्य समूहों और क्षेत्रों का निमार्ण किया जायेगा।

योजना के उद्देश्य और लक्ष्य:

  1. वर्ष 2024-25 तक अतिरिक्त 70 लाख टन मछली उत्पादन वृद्धि।
  2. वर्ष 2024-25 तक मत्स्य निर्यात आय को बढ़ाकर 1,00,000 करोड़ रुपये करना।
  3. मछुआरों और मछली किसानों की दोगुनी आय करना।
  4. पैदावार के बाद नुकसान 20-25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करना।
  5. मत्स्य पालन क्षेत्र और सहायक गतिविधियों में 55 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा करना ।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘इंद्रधनुष क्रांति’ (Rainbow Revolution) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘नदीय जीवपालन कार्यक्रम’ के बारे में।
  2. प्रधान मंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (PMMSY) के बारे में।
  3. योजना की अवधि।
  4. योजना के तहत लक्ष्य।
  5. नीली क्रांति योजना क्या है?
  6. जलीय रोग रेफरल प्रयोगशाला कहाँ स्थापित की गई है?

मेंस लिंक:

प्रधान मंत्री मत्स्य सम्पदा योजना के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नासा का लूसी मिशन


संदर्भ:

हाल ही में, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ ने अगले हफ्ते में मिशन ‘लूसी’ (Lucy Mission) शुरू करने की घोषणा की है।

इस मिशन में अंतरिक्ष यान, ‘क्षुद्र ग्रह’ पर जाने में सहायता के लिए पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का उपयोग करेगा, और इसके लिए यान पृथ्वी से दो बार उड़ान भरेगा।

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‘लूसी मिशन’ के बारे में:

यह, बृहस्पति ग्रह के ‘ट्रोजन क्षुद्रग्रहों’ (Trojan asteroids) का अन्वेषण करने हेतु नासा द्वारा भेजा जाने वाला पहला मिशन है।

  • यह मिशन, सौर ऊर्जा से संचालित है।
  • इस मिशन के पूरा होने में 12 साल से अधिक लंबा समय लगने का अनुमान है। इस दौरान, अंतरिक्ष यान “युवा सौर मंडल” के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए लगभग 3 बिलियन किमी की यात्रा करते हुए ‘आठ क्षुद्रग्रहों’ का दौरा करेगा।

मिशन का उद्देश्य:

‘लूसी मिशन’ को ‘ट्रोजन क्षुद्रग्रहों’ के समूह में शामिल विविध क्षुद्रग्रहों की संरचना को समझने, क्षुद्रग्रहों के द्रव्यमान और घनत्व को निर्धारित करने तथा ट्रोजन क्षुद्रग्रहों की परिक्रमा करने वाले उपग्रहों और रिंगों को देखने और उनका अध्ययन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

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‘ट्रोजन क्षुद्रग्रह’ क्या हैं?

‘ट्रोजन क्षुद्रग्रहों’ (Trojan asteroids) को प्रारंभिक सौर मंडल का अवशेष माना जाता है, और इनका अध्ययन करने से वैज्ञानिकों को इनकी उत्पत्ति, विकास और इनके वर्त्तमान स्वरूप को समझने में मदद मिलेगी।

माना जाता है, कि इन ‘क्षुद्रग्रहों’ की उत्पत्ति, लगभग 4 अरब साल पहले सौर मंडल का निर्माण होने के साथ ही हुई थी, और ट्रोजन क्षुद्रग्रहों का निर्माण, उन्ही पदार्थों से हुआ है, जिनसे सौर मंडल के अन्य ग्रह बने थे।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि नासा ने इस मिशन का नाम 3.2 मिलियन वर्ष पुरानी, ‘होमिनिन’ प्रजाति (जिसमें मानव और इसके पूर्वज) के पूर्वज ‘लूसी’ के नाम पर रखा है?

क्या आप जानते हैं कि क्षुद्रग्रहों को तीन श्रेणियों’ में बांटा गया है?

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

‘स्थलीय जल भंडारण’ में कमी WMO की रिपोर्ट


संदर्भ:

हाल ही में, ‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ (World Meteorological Organization – WMO) द्वारा ‘स्थलीय जल भंडारण’ (terrestrial water storage -TWS) में होने वाली कमी पर ‘स्टेट ऑफ क्लाइमेट सर्विसेज 2021’ (2021 State of Climate Services) शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की गयी है।

‘स्थलीय जल भंडारण’ क्या है?

‘स्थलीय जल भंडारण’ (terrestrial water storage -TWS), स्थलीय भूभाग की सतह और इसकी निचली सतह पर मौजूद पानी, अर्थात सतही जल, मृदा की नमी, बर्फ, हिम और भूजल की कुल मात्रा होती है

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  1. कुल मिलाकर, पिछले बीस वर्षों (2002-2021) के दौरान, स्थलीय जल संग्रहण (TWS) में 1 सेमी प्रति वर्ष की दर से गिरावट हुई है।
  2. ‘स्थलीय जल संग्रहण’ में सबसे ज्यादा कमी ‘अंटार्कटिका’ और ‘ग्रीनलैंड’ में हुई है।
  3. निम्न अक्षांशों में स्थिति बहुत अधिक आबादी वाले स्थानों पर भी ‘स्थलीय जल संग्रहण’ में कमी हुई है।
  4. भारत ‘स्थलीय जल भंडारण’ (TWS) में कमी का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट’ है। यदि अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में हुई ‘जल भंडारण’ कमी को छोड़ दिया जाए, तो ‘स्थलीय जल भंडारण’ में सबसे ज्यादा कमी भारत में हुई है।
  5. भारत में, TWS में प्रति वर्ष 3 सेमी की दर से कमी हुई है। कुछ क्षेत्रों में, इसकी दर 4 सेमी प्रति वर्ष से भी ज्यादा रही है।
  6. भारत के उत्तरी हिस्से में देश के भीतर TWS में सबसे ज्यादा कमी हुई है।

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आगे की चुनौतियां:

मानव और प्राकृतिक रूप से प्रेरित तनावों के कारण, संपूर्ण विश्व में ‘जल संसाधन’ अत्यधिक दबाव का सामना कर रहे हैं।

  • इन तनावों में जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और मीठे पानी की घटती उपलब्धता आदि शामिल है।
  • विकास के सभी क्षेत्रों और पृथ्वी के सभी भागों में ‘जल संसाधनों’ पर दबाव के लिए चरम मौसमी घटनाएं भी जिम्मेदार हैं।

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भारतीय परिदृश्य:

  • भारत में जनसंख्या में वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता घटती जा रही है।
  • देश में, औसत वार्षिक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में लगातार कमी होती जा रही है। वर्ष 2001 में, देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,816 क्यूबिक मीटर थी, जोकि वर्ष 2011 में घटकर 1,545 क्यूबिक मीटर रह गयी।
  • केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2031 में इसमें और गिरावट हो सकती है तथा यह घटकर प्रति व्यक्ति 1,367 घन मीटर तक पहुच सकती है।
  • भारत में 21 नदी घाटियों में से पांच नदी घाटियां ‘जल की विशुद्ध कमी’ (प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 500 क्यूबिक मीटर से कम) की स्थिति में पहुँच चुकी हैं।
  • वर्ष 2050 तक, छह नदी घाटियों में ‘पानी की विशुद्ध कमी’ हो जाएगी, छह अन्य नदी घाटियों में ‘पानी की कमी’ हो जाएगी और चार नदी घाटियों में ‘पानी की स्थिति तनावपूर्ण’ हो जाएगी।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम:

  1. जल संरक्षण हेतु मनरेगा
  2. जल क्रांति अभियान
  3. राष्ट्रीय जल मिशन
  4. राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम
  5. नीति आयोग समग्र जल प्रबंधन सूचकांक
  6. जल शक्ति मंत्रालय का गठन और जल जीवन मिशन की शुरुआत

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘ग्रेविटी रिकवरी और क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट फॉलो-ऑन’ (GRACE-FO) मिशन के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘स्थलीय जल भंडारण’ (TWS) के बारे में
  2. ‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ (WMO) के बारे में
  3. स्थलीय जल का वितरण

मेंस लिंक:

प्रादेशिक जल में कमी से संबंधित चिंताओं की चर्चा कीजिए और समस्या के समाधान हेतु उपाय सुझाएं।

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

‘स्वच्छ, स्वस्थ और संधारणीय पर्यावरण’ को एक सार्वभौमिक अधिकार के रूप में मान्यता


संदर्भ:

हाल ही में, ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद’ (UNHRC) द्वारा स्विट्जरलैंड के जिनेवा में एक ‘स्वच्छ, स्वस्थ और संधारणीय पर्यावरण’ (Clean, Healthy and Sustainable Environment) को एक सार्वभौमिक अधिकार के रूप में मान्यता देने के लिए सर्वसम्मति से मतदान किया गया है।

महत्व:

यदि इस अधिकार के लिए सभी सदस्य देशों के द्वारा मान्यता प्रदान कर दी जाती है, तो वर्ष 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा ‘मानवाधिकारों पर सार्वभौमिक घोषणा’ (Universal Declaration of Human Rights) को अपनाए जाने के बाद, 70 से अधिक वर्षों में यह अपनी तरह का पहला अधिकार होगा।

मान्यता की आवश्यकता:

‘स्वच्छ, स्वस्थ और संधारणीय पर्यावरण’ को एक सार्वभौमिक अधिकार घोषित किए जाने संबंधी ‘प्रस्ताव’ में “पर्यावरणीय मुद्दों पर कार्य रहे मानवाधिकार रक्षकों, जिन्हें ‘पर्यावरण मानवाधिकार रक्षक’ (Environmental Human Rights Defenders) कहा जाता है, के जीवन, स्वतंत्रता और सुरक्षा के अधिकारों पर जोर दिया गया है।”

  • दुनिया भर में पर्यावरण रक्षकों को लगातार शारीरिक हमलों, नजरबंदी, गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई और बदनामी अभियानों का सामना करना पड़ता है।
  • केवल वर्ष 2020 में ही करीब 200 पर्यावरण रक्षकों की हत्या कर दी गई थी।

पृष्ठभूमि:

13,000 से अधिक ‘नागरिक समाज संगठनों’ और स्थानीय लोगों के समूहों, दुनिया भर में 90,000 से अधिक बच्चों, ‘वैश्विक राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थान गठबंधन’ और निजी क्षेत्र के हितधारकों द्वारा ‘स्वच्छ, स्वस्थ और संधारणीय पर्यावरण’ को एक सार्वभौमिक अधिकार घोषित किए जाने हेतु अथक अभियान चलाया जा रहा है।

आगे की चुनौतियां:

अभी तक किसी भी मानवाधिकार संधि में, ‘स्वच्छ, स्वस्थ और संधारणीय पर्यावरण’ को एक सार्वभौमिक मानवाधिकार’ पर सहमति नहीं बनी है और न ही यह एक प्रथागत अधिकार के रूप में सामने आया है।

  • ‘अधिकारों’ को बिना उचित विचार किए और बगैर आम समझ विकसित किए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मान्यता’ देने से अस्पष्टता और भ्रम उत्पन्न होता है।
  • व्यक्तियों को यह पता नहीं चल पता है, कि वे राज्य से, कानूनी तौर पर क्या दावा कर सकते हैं, और राज्य को भी व्यक्तियों के लिए दी जाने वाली सुरक्षा की वाध्यता के प्रति कोई स्पष्ट समझ नहीं हो पाती है।
  • इसके अलावा, ‘मानवाधिकार संकल्प’ सभी देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी उपाय नहीं होते हैं, और इस तरह इस संकल्प में ‘अधिकार’ की मान्यता, राज्यों को इसकी शर्तों को मानने के लिए बाध्य नहीं करती है।

इस मान्यता के अपेक्षित परिणाम:

  1. सशक्त पर्यावरण कानून और नीतियां
  2. बेहतर कार्यान्वयन और प्रवर्तन
  3. पर्यावरणीय निर्णय लेने में अधिक से अधिक जन भागीदारी
  4. पर्यावरणीय अन्याय में कमी
  5. सामाजिक और आर्थिक अधिकारों सहित अवसरों की समानता
  6. बेहतर पर्यावर्णीय प्रदर्शन

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार’ वर्ष 1972 की स्टॉकहोम घोषणा में निहित था?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद’ (UNHRC) के बारे में
  2. सार्वभौमिक मानवाधिकारों के बारे में

मेंस लिंक:

‘स्वच्छ, स्वस्थ और संधारणीय पर्यावरण’ को एक सार्वभौमिक अधिकार’ को मान्यता दिए जाने की आवश्यकता पर विवेचना कीजिए।

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: विभिन्न सुरक्षा बल और संस्थाएँ तथा उनके अधिदेश।

प्रादेशिक सेना


संदर्भ:

9 अक्टूबर को भारतीय सेना द्वारा 72वां ‘प्रादेशिक सेना दिवस’ (Territorial Army Day) मनाया गया।

‘प्रादेशिक सेना’ के बारे में:

18 अगस्त, 1948 को ‘प्रादेशिक सेना अधिनियम’ लागू किए जाने के बाद ‘प्रादेशिक सेना’ (Territorial Army) अपने वर्तमान स्वरूप में आयी थी।

औपचारिक रूप से पहले गवर्नर जनरल श्री सी राजगोपालाचारी द्वारा 9 अक्टूबर 1949 को प्रादेशिक सेना (Territorial Army) का उद्घाटन किया गया था।

  • शुरुआत में प्रादेशिक सेना में इन्फैंट्री, बख्तरबंद कोर, एयर डिफेंस तोपखाने, सिग्नल, आपूर्ति और अन्य विभागीय इकाइयाँ शामिल थीं।
  • इस संगठन में, किसी भी आपात स्थिति से निपटने या भारत की रक्षा के लिए सेवा करने के लिए तैयार रहने हेतु स्वयंसेवक हर साल एक छोटी अवधि के प्रशिक्षण लिए आवेदन करते हैं।
  • प्रादेशिक सेना, जिसे ‘टेरियर्स’ (Terriers) के नाम से भी जाना जाता है, को नियमित सेना के बाद राष्ट्रीय रक्षा की दूसरी पंक्ति माना जाता है।

पात्रता:

18 से 42 वर्ष की आयु के बीच का कोई भी पुरुष भारतीय नागरिक ‘प्रादेशिक सेना’ में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकता है, किंतु इसके लिए उन्हें लिखित परीक्षा, साक्षात्कार, चिकित्सा परीक्षा और आवश्यक प्रशिक्षण उत्तीर्ण करना आवश्यक होता है।

भूमिका और उत्तरदायित्व:

प्रादेशिक सेना, नियमित सेना का भाग है और इसकी वर्तमान भूमिका नियमित सेना को ‘स्थैतिक कर्तव्यों’ से मुक्त करना और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने और उन स्थितियों में आवश्यक सेवाओं के रखरखाव में नागरिक प्रशासन की सहायता करना तथा देश पर संकट आने की स्थिति में आवश्यकता पड़ने पर नियमित सेना के लिए सैन्य-टुकड़ियाँ प्रदान करना हैं।

प्रादेशिक सेना, रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. प्रादेशिक सेना के बारे में
  2. पात्रता
  3. भूमिकाएं और उत्तरदायित्व

मेंस लिंक:

प्रादेशिक सेना और उसके महत्व पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: पीआईबी।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


साहित्य में 2021 का नोबेल पुरस्कार

यूनाइटेड किंगडम के निवासी, ज़ांज़ीबार मूल के अरब लेखक ‘अब्दुलरज़ाक गुरनाह’ (Abdulrazak Gurnah) को उपनिवेशवाद और शरणार्थियों के जीवन पर उनकी रचनाओं के लिए साहित्य में इस वर्ष के नोबेल पुरस्कार का विजेता घोषित किया गया है।

उनकी ज़िंदगी:

‘अब्दुलरज़ाक गुरनाह’ का जन्म वर्ष 1948 में हुआ था और वह हिंद महासागर में अवस्थित ज़ांज़ीबार द्वीप पर पले-बढ़े। ज़ांज़ीबार में क्रांति होने के बाद, 1960 के दशक के अंत में उन्हें ब्रिटेन के लिए पलायन करने को मजबूर होना पड़ा।

गुरनाह की दस उपन्यास और कई लघु कथाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी सभी रचनाओं में शरणार्थीयों के जीवन में व्यवधान का विषय दिखाई देता है।

इनकी रचनाएँ:

मेमोरी ऑफ़ डिपार्चर, पिलिग्रिम्स वे फ्रॉम 1988, डॉटी (1990), पैराडाइज (1994) इत्यादि। 2020  में प्रकाशित ‘आफ्टरलाइव्स’ उनका नवीनतम उपन्यास है।

प्रमुख बिंदु:

  • ज़ांज़ीबार कहाँ है? यह स्वाहिली तट के रूप में जाना जाता है और वर्तमान सोमालिया से हिंद महासागर के पश्चिमी तट पर मोज़ाम्बिक तक विस्तारित पूर्वी अफ्रीका का एक भाग है।
  • ‘स्वाहिली’ क्या है? सदियों से, अरब, फारस और भारतीय उपमहाद्वीप के व्यापारियों ने स्थानीय ‘बांटू आबादी’ के साथ मिलकर एक नई संस्कृति और भाषा को जन्म दिया, जिसे ‘स्वाहिली’ (Swahili) कहा जाता है।
  • तंजानिया (तांगानिका और ज़ांज़ीबार), ‘अब्दुलरज़ाक गुरनाह’ का जन्मस्थान है। यह 19वीं शताब्दी में जर्मनी के अधीन पूर्वी अफ्रीका का हिस्सा था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद, इसे अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया।

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साहित्य का नोबेल पुरस्कार:

  • यह एक स्वीडिश साहित्य पुरस्कार है। यह पुरुस्कार, वर्ष 1901 से स्वीडिश उद्योगपति अल्फ्रेड नोबेल की इच्छा के अनुसार, “साहित्य के क्षेत्र में, आदर्शवादी दिशा में सबसे उत्कृष्ट रचना करने वाले किसी भी देश के लेखक को दिया जाता है”।
  • हालांकि, यह पुरुस्कार किसी लेखक की एक रचना को कभी-कभी विशेष रूप से उल्लेखनीय होने के रूप भी दिया जाता है, किंतु यह पुरस्कार एक लेखक के संपूर्ण कार्य पर आधारित होता है।

 

अथिराप्पिल्ली जलविद्युत परियोजना

हाल ही में, केरल सरकार ने त्रिशूर जिले में चलकुडी नदी बेसिन पर प्रस्तावित 163 मेगावाट ‘अथिरापल्ली जल विद्युत’ (Athirappally Hydel Power) को रद्द कर दिया है।

चलक्कुडी नदी (Chalakudy River), पेरियार नदी की एक सहायक नदी है और तमिलनाडु के अनामलाई क्षेत्र से निकलती है।

रद्द किए जाने का कारण:

जैव विविधता और राज्य के एकमात्र नदी-जंगल में निर्माण किए जाने के खिलाफ पर्यावरणविदों और आदिवासी संगठनों के बढ़ते विरोध के बीच केरल सरकार ने फैसला किया है।

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संबंधित प्रमुख बिंदु:

‘चलक्कुडी नदी बेसिन’ में विभिन्न जल विद्युत परियोजनाओं के चालू होने के कारण ‘कादर आदिवासी समुदाय’ को लगातार विस्थापन का सामना करना पड़ रहा है।

  • क्या आप जानते हैं? 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक की शुरुआत में ‘साइलेंट वैली’ बड़ी संख्या में भागीदारी के साथ भारत के पहले पारिस्थितिक आंदोलनों में से एक थी। इसकी वजह से केरल सरकार को केरल के पलक्कड़ जिले में साइलेंट वैली के सदाबहार उष्णकटिबंधीय जंगलों के अंदर, कुंठी नदी पर एक बांध परियोजना को छोड़ने के लिए मजबूर किया।
  • माधव गाडगिल रिपोर्ट ने अथिरापिल्ली जलविद्युत परियोजना को ‘अवांछनीय’ करार दिया था और इसे पर्यावरणीय तकनीकी और आर्थिक आधार पर व्यर्थ के रूप में वर्गीकृत किया था।
  • ‘कस्तूरीरंगन समिति’ ने पारिस्थितिक आधार पर परियोजना के प्रभाव के पुनर्मूल्यांकन की सिफारिश की।

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2021 नोबेल शांति पुरस्कार

फिलीपींस के पत्रकार ‘मारिया रेसा’ (Maria Ressa) और और रूस के ‘दिमित्री मुराटोव’ (Dmitry Muratov) को “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के उनके प्रयासों के लिए 2021 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है।

पृष्ठभूमि:

नोबेल शांति पुरस्कार प्रतिवर्ष (कुछ अपवादों के साथ) “राष्ट्रों के बीच भाईचारे के लिए, निरस्त्रीकरण एवं वर्तमान में एक बेहतर विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने तथा स्वतंत्र और तथ्य आधारित पत्रकारिता सत्ता के दुरुपयोग, झूठ एवं युद्ध के प्रचार से बचाव करने हेतु उत्कृष्ट कार्य करने पर दिया जाता है।

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ईराक में चुनाव और इसका महत्व:

वर्ष 2019 में शुरू हुए बड़े पैमाने पर विरोध की प्रतिक्रिया में ईराक में इस बार चुनाव जल्दी हो रहे हैं।

  • ईराक में यह पहली बार है, कि सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की मांगों के कारण मतदान हो रहा है।
  • यह मतदान एक नए चुनाव कानून के साथ हो रहा है, जिसके तहत ईराक को छोटे निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा गया है।
  • इस साल की शुरुआत में, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा अपनाए गए प्रस्ताव में ईराक में होने वाली चुनावों की निगरानी के लिए एक टीम को अधिकृत किया गया था। इस टीम में संयुक्त राष्ट्र के 150 प्रतिनिधियों सहित 600 अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक होंगे।
  • ईराक में पहली बार मतदाताओं के लिए बायोमेट्रिक कार्ड शुरू किए जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक वोटर कार्ड के दुरुपयोग को रोकने और दोहरे मतदान से बचने के लिए, प्रत्येक व्यक्ति के वोट देने के बाद बायोमेट्रिक कार्ड को 72 घंटे के लिए निष्क्रिय कर दिया जाएगा।

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