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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 6 October 2021

 

 

विषय सूची:

सामान्य अध्ययन-II

1. पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन

2. जापान में सेनकाकू द्वीपसमूह पर विवाद

 

सामान्य अध्ययन-III

1. वन संरक्षण अधिनियम में परिवर्तन

2. साबरमती नदी के संरक्षण पर गुजरात उच्च न्यायालय का आदेश

3. ग्लोबल कोरल रीफ मॉनिटरिंग नेटवर्क और इसकी रिपोर्ट

4. वैश्विक एयरलाइंसों द्वारा वर्ष 2050 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन की प्रतिबद्धता

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. वर्ष 2021 के लिए भौतिकी में नोबेल पुरुस्कार

2. डेनमार्क में किसान ‘ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती’ के लिए कानूनी रूप से बाध्य

3. ‘स्वच्छ’ कार्यक्रम

4. स्वास्थ्य सूचना प्रबंधन प्रणाली (HIMS) परियोजना

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन


संदर्भ:

पीएम केयर्स (PM CARES) फंड के तहत लाभ प्राप्त करने हेतु अब तक कोविड-19 के दौरान अनाथ हुए कुल 845 बच्चो को चिह्नित और अनुमोदित किया जा चुका है।

योजना के बारे में:

‘पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रेन’ (PM CARES for Children) योजना को मई 2021 में लॉन्च किया गया था।

यह योजना कोविड से प्रभावित बच्चों की सहायता और सशक्तिकरण के लिए शुरू की गई है।

पात्रता: कोविड 19 के कारण माता-पिता दोनों या माता-पिता में से किसी जीवित बचे अभिभावक या कानूनी अभिभावक/दत्तक माता-पिता को खोने वाले सभी बच्चों को ‘पीएम-केयर्स फॉर चिल्ड्रन’ योजना के तहत सहायता दी जाएगी।

इस योजना के प्रमुख बिंदु:

  1. बच्चे के नाम पर सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट): 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले प्रत्येक बच्चे के लिए 10 लाख रुपये का एक कोष गठित किया जाएगा।
  2. स्कूली शिक्षा: 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए नजदीकी केंद्रीय विद्यालय या निजी स्कूल में डे स्कॉलर के रूप में प्रवेश दिलाया जाएगा।
  3. स्कूली शिक्षा: 11 -18 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए केंद्र सरकार के किसी भी आवासीय विद्यालय जैसेकि सैनिक स्कूल, नवोदय विद्यालय आदि में प्रवेश दिलाया जाएगा।
  4. उच्च शिक्षा के लिए सहायता: मौजूदा शिक्षा ऋण के मानदंडों के अनुसार भारत में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों / उच्च शिक्षा के लिए शिक्षा ऋण दिलाने में बच्चे की सहायता की जाएगी।
  5. स्वास्थ्य बीमा: ऐसे सभी बच्चों को ‘आयुष्मान भारत योजना’ (PM-JAY) के तहत लाभार्थी के रूप में नामांकित किया जाएगा, जिसमें 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा कवर होगा।

(नोट: हमने यहां केवल योजना के प्रमुख बिंदु और मुख्य विशेषताएं शामिल की हैं। पूर्ण विवरण के लिए, कृपया देखें।)

इन उपायों की आवश्यकता:

  • भारत, वर्तमान में कोविड-19 महामारी की दूसरी प्रचंड लहर से जूझ रहा है और इस महामारी के कारण कई बच्चों के माता-पिता की मृत्यु होने के मामलों में वृद्धि हो रही है।
  • इसके साथ ही, इन बच्चों को गोद लेने की आड़ में बाल तस्करी की आशंका भी बढ़ गई है।
  • कोविड-19 के कारण लागू लॉकडाउन के दौरान ‘बाल विवाह’ संबंधी मामलों में भी वृद्धि हुई है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘समर्थ’ (SAMARTH) पहल के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘सार्वजनिक खाता’ क्या होता है?
  2. PM CARES फंड का संचालन कौन करता है?
  3. किन संगठनों को आरटीआई अधिनियम के दायरे से छूट दी गई है?
  4. भारत की समेकित निधि क्या है?
  5. चैरिटेबल ट्रस्ट क्या है?
  6. पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन- कोविड प्रभावित बच्चों का सशक्तिकरण- पात्रता और लाभ।

मेंस लिंक:

PM CARES फंड को आरटीआई अधिनियम के दायरे में क्यों लाया जाना चाहिए? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

जापान में ‘सेनकाकू द्वीप’ पर विवाद


संदर्भ:

हाल ही में जापान के नए प्रधान मंत्री ‘फुमियो किशिदा’ (Fumio Kishida) ने कहा है, अमेरिकी राष्ट्रपति ‘जो बिडेन’ ने विवादित पूर्वी चीन सागर में अवस्थित द्वीपों की रक्षा हेतु संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रतिबद्धता के संबंध में एक ‘कड़ा’ संदेश दिया है। इन द्वीपों को जापान में ‘सेनकाकू द्वीप समूह’ (Senkaku Islands) के रूप में जाना जाता है।

पृष्ठभूमि:

अमेरिका-जापान सुरक्षा संधि के अनुसार, जापान की रक्षा करना संयुक्त राज्य अमेरिका का दायित्व है, और इस संधि के अंतर्गत  ये निर्जन द्वीप भी आते हैं।

senkaku_island

सेनकाकू द्वीप समूह’ के बारे में:

सेनकाकू द्वीप (Senkaku Islands) जापान, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और ‘चीन गणराज्य’ (ताइवान) के मध्य पूर्वी चीन सागर में स्थित हैं। इस द्वीपसमूह में 800 वर्ग मीटर से लेकर 4.32 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले पांच निर्जन द्वीप तथा तीन बंजर चट्टानें हैं।

सेनकाकू द्वीपसमूह पर जापानी क्षेत्रीय संप्रभुता का आधार:

  • द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात वर्ष 1951 में हुई सैन फ्रांसिस्को शांति संधि के अंतर्गत वैधानिक रूप से जापान के अधिकार क्षेत्र को पारिभाषित किया गया था। इस संधि के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत जापान द्वारा छोड़े गए क्षेत्रों में सेनकाकू द्वीप समूह सम्मिलित नहीं था।
  • संधि के अनुच्छेद 3 के तहत, सेनकाकू द्वीप समूह को संयुक्त राज्य के प्रशासन के अधीन नानसेई शोटो द्वीप (Nansei Shoto Islands) के हिस्से के रूप में रखा गया था। रयूकू द्वीपसमूह (Ryukyu Islands) और दाइतो द्वीपसमूह (Daito Islands) से संबंधित वर्ष 1972 में जापान और अमेरिका के मध्य हुए समझौते के तहत सेनकाकू द्वीप समूह के प्रशासनिक नियंत्रण का अधिकार जापान को दे दिया गया था।

 

चीन द्वारा किया जाने वाला दावा:

चीन का कहना है कि यह द्वीप प्राचीन काल से ही, ताइवान प्रांत द्वारा प्रशासित मत्स्यन क्षेत्र के रूप में उसके देश का हिस्सा रहे हैं।

  • चीन-जापान युद्ध के पश्चात, वर्ष 1895 में हुई ‘शिमोनोसेकी की संधि’ (Treaty of Shimonoseki) के तहत ‘ताइवान’ को जापान के लिए सौंप दिया गया था।
  • ‘सैन फ्रांसिस्को की संधि’ द्वारा ताइवान को जापान के अधिकार से मुक्त करा दिया गया। चीन का कहना है, ताइवान के वापस किये जाने के साथ इन द्वीपों को भी वापस कर दिया जाना चाहिए था।

इसके बाद:

सेनकाकू / डियाओयू विवाद, पूर्वी चीन सागर, दक्षिण चीन सागर तथा भारतीय क्षेत्र में चीन के अपने क्षेत्रीय दावों को लेकर अड़ियल रवैये पर प्रकाश डालता है।

चीन के अन्य सीमा विवाद:

चीन के दक्षिण चीन सागर और इसके संलग्न क्षेत्रों में ताइवान, ब्रुनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के साथ द्वीप और समुद्री सीमा विवाद जारी हैं।

इन विवादों में दक्षिण चीन सागर में स्थित स्प्राटली द्वीप समूह (वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई, ताइवान), पेरासेल द्वीप समूह (वियतनाम), स्कारबोरो शोअल (फिलीपींस), और टोंकिन (वियतनाम) सम्मिलित हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. दक्षिण चीन सागर विवाद- इसमें शामिल क्षेत्र, देशों के दावे।
  2. सेनकाकू द्वीप कहाँ हैं?
  3. 1951 की सैन फ्रांसिस्को शांति संधि क्या है?
  4. चीन- ताइवान संबंध।

मेंस लिंक:

चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीति को विश्व के देशों द्वारा किस रूप में देखा जा रहा है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

वन संरक्षण अधिनियम में परिवर्तन


संदर्भ:

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा मौजूदा ‘वन संरक्षण अधिनियम’ (Forest Conservation Act – FCA) में कुछ संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है।

प्रस्तावित परिवर्तन:

  1. ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ परियोजनाओं और ‘सीमा अवसंरचना’ परियोजनाओं में शामिल एजेंसियों को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पूर्व-स्वीकृति हासिल करने से छूट दी गयी है। जबकि वन संरक्षण अधिनियम (FCA), 1980 के अंतर्गत इस प्रकार की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है।
  2. रेलवे जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के निकायों द्वारा – ‘वन संरक्षण अधिनियम’ 1980 के प्रभाव में आने से पहले- अधिग्रहित की गयी भूमि के लिए भी ‘मंत्रालय’ से पूर्व-स्वीकृति हासिल करने से छूट दी गयी है।
  3. वन क्षेत्रों के बाहर से ‘ड्रिलिंग’ के माध्यम से छेद करके गहन वन भूमि के नीचे तेल और प्राकृतिक गैस का दोहन और अन्वेषण या निष्कर्षण हेतु निजी वृक्षारोपण की सुविधा दी गई है।
  4. वनों में निर्माण: जिन व्यक्तियों की जमीन राज्य विशिष्ट के ‘निजी वन अधिनियम’ अथवा ‘वन’ की शब्द्कोशीय परिभाषा के दायरे में आती है, उनकी शिकायतों को कम करने के लिए ‘मंत्रालय’ ने एक बार की छूट के तौर पर वन संरक्षण उपायों सहित प्रमाणिक अवसंरचनाओं के निर्माण का अधिकार और 250 वर्ग मीटर क्षेत्रफल तक आवासीय इकाइयों के निर्माण की अनुमति प्रदान की है।
  5. सजा: संशोधित अधिनियम के अंतर्गत किए जाने वाले अपराध, एक वर्ष तक की अवधि का साधारण कारावास से दंडनीय होंगे और इन अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है।
  6. संशोधित अधिनियम में, पहले से हो चुके नुकसान की भरपाई के लिए दंडात्मक मुआवजे का भी प्रावधान किया गया है।

आगे की कार्रवाई:

कृपया ध्यान दें, कि वन संरक्षण अधिनियम में ये परिवर्तन अभी सिर्फ प्रस्ताव हैं। इस मसौदे को 15 दिनों के लिए सार्वजनिक चर्चा के लिए रखा गया है, इसके बाद इसे कैबिनेट और संसदीय अनुमोदन के लिए तैयार किया जा सकता है।

इन संशोधनों की आवश्यकता:

मौजूदा ‘वन संरक्षण अधिनियम’ के साथ एक प्रमुख समस्या यह है कि, कि राज्य अपनी सीमा में ‘वन आवरण’ बढ़ाने के सिद्धांत के प्रति प्रतिबद्ध होते है, और इससे राज्य और निजी संस्थाओं द्वारा प्रायोजित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भूमि-उपयोग करना कठिन हो जाता है।

  • कई मंत्रालयों द्वारा इस बात पर नाराजगी व्यक्त की गई है कि रेलवे और राजमार्गों के अधिकार को कम करते हुए अधिनियम की व्याख्या कैसे की जा रही है।
  • आज की स्थिति में, किसी भूमि धारक एजेंसी (रेलवे, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग अधिकरण, लोक निर्माण विभाग, आदि) को अधिनियम के तहत मूल रूप से गैर-वन उद्देश्यों के लिए अधिग्रहित की गई भूमि का उपयोग करने के लिए, केंद्रीय वन मंत्रालय से पूर्व-अनुमोदन लेने और शुद्ध वर्तमान मूल्य (Net Present Value – NPV), प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation – CA) जैसे निर्धारित प्रतिपूरक शुल्क आदि का भुगतान करना आवश्यक है।
  • “वन” की परिभाषा के तहत अधिक भूमि आने के साथ ही, राज्य सरकारों या निजी उद्योग को गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए “वन” की परिभाषा के अंतर्गत आने वाली भूमि का उपयोग करना कठिन होता जा रहा है।
  • वर्षों से, इस समस्या की वजह से कई कानूनी मामले अदालतों में दायर हैं और “वन” की कानूनी परिभाषा पर भी सवाल उठ रहा है।
  • राज्यों से ‘वन’ की परिभाषा को सपष्ट करने को कहा गया है, लेकिन इसके इसके राजनीतिक परिणामों को देखते हुए अधिकांश राज्यों ने कोई परिभाषा नहीं दी है। इन सब कारणों ने वर्षों से ‘वन संरक्षण अधिनियम’ (Forest Conservation Act – FCA) की परस्पर विरोधी व्याख्याओं को जन्म दिया है।

प्रस्तावित संशोधन, मौजूदा वन कानूनों के तर्कयुक्त बनाए जाने का हिस्सा है।

‘वन संरक्षण अधिनियम’ कब अधिनियमित किया गया था?

‘वन संरक्षण अधिनियम’ को  पहली बार वर्ष 1980 में लागू किया गया था और वर्ष 1988 में इसे संशोधित किया गया था।

यद्यपि, राज्यों के पास पहले से ही अधिसूचित वन भूमि होती हैं, इसके बाद भी ‘वन संरक्षण अधिनियम’ के अंतर्गत, “गैर वानिकी उद्देश्यों” के लिए इस प्रकार की वन भूमि का उपयोग करने और इस भूमि के पुन: वर्गीकरण करने संबंधी सिफारिश करने हेतु एक सलाहकार समिति का गठन करने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक बना दिया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले (टी एन गोडवर्मन थिरुमलापाद (1996) मामले) से निम्नलिखित की गणना का मार्ग प्रशस्त हुआ थे:

  1. शुद्ध वर्तमान मूल्य (Net Present Value), या परियोजना समर्थकों द्वारा विकास कार्य हेतु जंगल के बरबाद किए गए भाग का का आर्थिक मूल्य।
  2. प्रतिपूरक वनरोपण निधि (Compensatory Afforestation Fund) का सृजन।
  3. ‘व्यपवर्तित वन’ के स्थान पर ‘गैर-वानिकी भूमि’ उपलब्ध कराना।

“वन” की परिभाषा:

टी एन गोडवर्मन थिरुमलापाद (1996) मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा वन संरक्षण अधिनियम के तहत ‘वनों’ की एक व्यापक परिभाषा को स्वीकार की गई। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पहले, 1927 के वन अधिनियम द्वारा परिभाषित भूमि को ही केवल ‘वन भूमि’ माना जाता था।

अदालत ने कहा है, कि, ‘वन’ (Forest) शब्द को शब्दकोश में दिए गए अर्थ के अनुसार समझा जाना चाहिए।      इसके तहत, वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त, आरक्षित (Reserved), संरक्षित (Protected) अथवा वन संरक्षण अधिनियम की धारा 2 (1) के प्रयोजन हेतु निर्दिष्ट, सभी प्रकार के वन सम्मिलित होते है।

इसके अतिरिक्त, सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज सभी क्षेत्र ‘वन’ की परिभाषा के अंतर्गत आते है, चाहे इन पर स्वामित्व किसी का भी हो।

‘वन संरक्षण अधिनियम’ (Forest Conservation Act) के बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘शुद्ध वर्तमान मूल्य के बारे में सुना है? इसकी गणना कैसे की जाती है?

‘वन’ किसे कहते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. वन (संरक्षण) अधिनियम (FCA) के प्रमुख प्रावधान।
  2. गोदावरमन केस किससे संबंधित है?

मेंस लिंक:

वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

साबरमती नदी के संरक्षण पर गुजरात उच्च न्यायालय का आदेश


संदर्भ:

गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा अपशिष्ट निस्सरण किए जाने की वजह से ‘साबरमती नदी’ की धीरे-धीरे हो रही मौत पर स्वत: संज्ञान लिया गया था। हाल ही में, अदालत ने इस संबंध में अपना फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट का आदेश:

  1. गुजरात में साबरमती नदी में प्रदूषकों को छोड़ने वाली औद्योगिक इकाइयों के लिए पानी और बिजली उपलब्ध नहीं कराई जाएगी।
  2. इन इकाइयों के लिए दंडितऔर शर्मिंदा भी किया जाएगा।
  3. ऐसी सभी प्रदूषणकारी इकाइयों को किसी भी औद्योगिक मेले, सार्वजनिक-निजी भागीदारी कार्यक्रमों आदि में भाग लेने से भी प्रतिबंधित किया जाएगा।

पब्लिक ट्रस्ट’ के रूप में पानी:

हमारे संविधान में जल संसाधनों को ‘’पब्लिक ट्रस्ट’ में रखा गया है। अतः अदालत ने नगर निकायों या उद्योगों द्वारा नदियों को प्रदूषित करने पर इनके खिलाफ कड़े प्रावधान लागू करने के लिए ‘पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत’  (Public Trust Doctrine) का उपयोग करने का निर्णय लिया है।

चुनौतियां:

साबरमती नदी के 371 किमी लंबे मार्ग का 120 किमी भाग मृत होने की कगार पर है। अहमदाबाद में ‘साबरमती रिवरफ्रंट’ के साथ बहने वाली नदी के भाग के बारे में यह बात विशेष रूप से सच है।

  • नदी में प्रदूषकों की अत्यधिक उपस्थिति और प्राकृतिक प्रवाह की कमी की वजह से नदी के लिए अपूरणीय क्षति पहुची है।
  • औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट और सीवेज को साबरमती नदी में लगातार छोड़ा जा रहा है।
  • इस सबके बावजूद औद्योगिक इकाइयों को इन गतिविधियों को जारी रखने के लिए कानूनी अनुमति मिली हुई है।

समय की मांग:

नदियाँ हमारी जीवन रेखा हैं, क्योंकि हम अपने अस्तित्व के लिए पूरी तरह से उन पर निर्भर हैं। इस भयावह स्थिति के पीछे प्रमुख कारण, पर्यावरण तथा नदियों और नदी-तटों का अनुरक्षण करने के प्रति हमारी पूरी तरह से अज्ञानता और हमारा लापरवाह रवैया है और नदियों और नदियों के किनारों को बनाए रखना है।

  • इसलिए, यह उचित समय है कि हम इस संबंध में कुछ कड़े कदम उठाएं।
  • प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि नदियाँ हम सबकी हैं।
  • उन्हें साफ रखना प्रत्येक व्यक्ति की संयुक्त जिम्मेदारी है।

साबरमती नदी के बारे में:

  • साबरमती का उद्गम राजस्थान के उदयपुर जिले में अरावली पर्वतमाला के दक्षिणी भाग में स्थित ढेबर झील से होता है।
  • यह दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती है और राजस्थान में उदयपुर और गुजरात के साबरकांठा, मेहसाणा, गांधीनगर, अहमदाबाद और आणंद जिलों से होकर गुजरती है।
  • लगभग 371 किमी की यात्रा करने के बाद, साबरमती नदी, खंभात की खाड़ी में गिरती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

नगरपालिका बजट समस्याओं और पुराने जल प्रणालियों के समाधान के रूप में‘ जल निजीकरण’ का अक्सर सुझाव दिया जाता है। ‘पानी का निजीकरण’ (Water privatization) क्या है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. साबरमती नदी कितने राज्यों से होकर बहती है?
  2. इसकी सहायक नदियाँ।
  3. पेयजल में अमोनिया की स्वीकार्य अधिकतम सीमा?
  4. सल्फेट का अनुमेय स्तर।
  5. पानी की कठोरता की वांछनीय सीमा।

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

वैश्विक प्रवाल भित्ति निगरानी नेटवर्क और इसकी रिपोर्ट


(Global Coral Reef Monitoring Network and its report)

संदर्भ:

हाल ही में, ‘वैश्विक प्रवाल भित्ति निगरानी नेटवर्क’ / ग्लोबल कोरल रीफ मॉनिटरिंग नेटवर्क (Global Coral Reef Monitoring Network – GCRMN) द्वारा दुनिया भर में प्रवाल भित्तियों की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की गई है।

13 वर्षों में अपनी तरह की इस पहली रिपोर्ट में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के विनाशकारी परिणामों को रेखांकित किया गया है, और साथ ही कहा है कि ‘ग्रीनहाउस गैसों पर नियंत्रण करके कुछ प्रवाल भित्तियों को बचाया जा सकता है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  1. पिछले दशक में, संपूर्ण विश्व में कुल प्रवाल भित्तियों का लगभग 14 प्रतिशत नष्ट हो चुका है।
  2. प्रवाल भित्तियों के लिए खतरे: महासागरीय-अम्लीकरण, समुद्र के तापमान में वृद्धि और ‘अत्यधिक मत्स्यन, प्रदूषण, गैर-संवहनीय पर्यटन और खराब तटीय प्रबंधन जैसे स्थानीय दबाव।
  3. ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव: जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले उष्मन से दुनिया भर में प्रवाल भित्तियाँ लगातार संकट का सामना कर रही हैं। समुद्रीय सतह के उच्च तापमान (sea surface temperatures – SST) में वृद्धि के कारण होने वाली ‘प्रवाल विरंजन’ की घटनाएँ ‘प्रवालों’ की मौत के लिए जिम्मेदार हैं।
  4. कठोर प्रवाल आवरण का नष्ट होना: 1978 में विश्व के नौ प्रतिशत प्रवालों के नष्ट होने के बाद से पिछले चार दशकों के दौरान, प्रवालों के कठोर आवरण (Hard Coral Cover) में लगातार कमी हो रही है। इस आवरण में होने वाली यह कमी चिन्ताजनक है क्योंकि सजीव कठोर प्रवाल आवरण, प्रवाल भित्तियों के स्वास्थ्य का सूचक होते है।
  5. शैवालीय प्रस्फुटन: प्रवाल कटकों लकीरों पर ‘शैवालीय प्रस्फुटन’ (Algal bloom), प्रवाल भित्तियों पर दबाव का संकेत होता है। वर्ष 2010 के बाद से, विश्व की प्रवाल भित्तियों पर शैवाल की मात्रा में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

 

प्रवाल (मूंगों) के संरक्षण की आवश्यकता:

  • प्रवाल (Corals), समुद्र तल के एक प्रतिशत से भी कम क्षेत्र में पाए जाते हैं, किंतु इन प्रवाल भित्तियों से एक अरब से अधिक लोग सीधे लाभान्वित होते हैं।
  • प्रवाल भित्तियों से प्राप्त होने वाली वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य, प्रति वर्ष $2.7 ट्रिलियन होने का अनुमान है। केवल ‘कोरल रीफ पर्यटन’ से 36 अरब डॉलर कारोबार होता हैं।
  • विश्व की प्रवाल भित्तियों का ‘शुद्ध आर्थिक मूल्य’ लगभग दसियों अरब डॉलर प्रति वर्ष हो सकता है।

आगे की चुनौतियां:

  1. भूमि और समुद्र के तापमान में लगातार वृद्धि प्रवालों (मूंगों) के लिए खतरा है।
  2. यदि समुद्र की सतह के तापमान में एक डिग्री की वृद्धि होती है तो मूंगों का अस्तित्व 50 प्रतिशत से कम होने जाने की संभावना होती है।
  3. यदि संपूर्ण विश्व कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए एक साथ काम नहीं करता है, तो इस सदी के अंत तक विश्व की सभी प्रवाल भित्तियों का विरंजन हो जाने की संभावना है।

प्रवाल विरंजन’ क्या है?

जब तापमान, प्रकाश या पोषण में होने वाले किसी भी परिवर्तन के कारण प्रवालों पर तनाव बढ़ता है, तो वे अपने ऊतकों में निवास करने वाले ‘जूजैंथिली’ (Zooxanthellae) नामक सहजीवी शैवाल को निष्कासित कर देते हैं जिस कारण प्रवाल सफेद रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। इस घटना को ‘कोरल ब्लीचिंग’ या ‘प्रवाल विरंजन’ (Coral bleaching) कहते हैं।

  • प्रवालों को अपनी लगभग 90% ऊर्जा, क्लोरोफिल और अन्य वर्णकों से भरपूर ‘जूजैंथिली’ शैवाल से प्राप्त होती है।
  • ये शैवाल, अपने पोषक प्रवालों के पीले या लाल भूरे रंग के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। इसके अलावा, ‘जूजैंथिली’ जेलीफ़िश के साथ भी ‘अंतः सहजीवी’ / एंडोसिम्बियन्ट्स के रूप में भी रह सकते हैं।
  • किसी प्रवाल का विरंजन होने पर यह तत्काल नहीं मरता है, बल्कि मरने के काफी करीब आ जाता है। समुद्र की सतह का तापमान सामान्य स्तर पर लौटने के बाद कुछ प्रवाल इस अवस्था से बचे रह सकते हैं और पुनः स्वस्थ हो सकते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘कोरल ट्राएंगल’ (Coral Triangle) के बारे में सुना है?

क्या आप जानते हैं कि प्रवाल भित्तियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं? इनके बारे में जानकारी हेतु पढ़िए

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

वैश्विक एयरलाइंसों द्वारा वर्ष 2050 तक शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन की प्रतिबद्धता


संदर्भ:

इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) की 77वीं वार्षिक आम बैठक में ‘वैश्विक हवाई परिवहन उद्योग’ को वर्ष 2050 तक ‘शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन’ (net-zero carbon emissions) हासिल करने संबंधी एक प्रस्ताव पारित किया गया है।

यह प्रतिबद्धता, पेरिस समझौते के तहत ग्लोबल वार्मिंग 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखे जाने के लक्ष्य के अनुरूप है।

आगे की चुनौतियां:

‘नेट जीरो उत्सर्जन’ लक्ष्य हासिल करना एक बड़ी चुनौती होगी।

  • उड्डयन उद्योग को उड़ान भरने के लिए उत्सुक दुनिया की बढ़ती मांग को समायोजित करते हुए अपने उत्सर्जन को उत्तरोत्तर कम करना चाहिए।
  • वर्ष 2050 में, उड़ान भरने वाले दस अरब लोगों की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होने के लिए, उस वर्ष कम से कम 1.8 गीगाटन कार्बन को समाप्त करना होगा।
  • इसके अलावा, ‘नेट जीरो प्रतिबद्धता’ का तात्पर्य है कि वर्तमान और 2050 के बीच कुल 21.2 गीगाटन कार्बन को समाप्त करना होगा।

IATA द्वारा पारित प्रस्ताव में सभी उद्योग हितधारकों से अपनी नीतियों, उत्पादों और गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव का ठोस कार्रवाइयों और स्पष्ट समयसीमा के साथ समाधान करने के लिए प्रतिबद्धता की मांग की गयी है, इसके लिए:

  1. ईंधन उत्पादक कंपनियों द्वारा लागत-प्रतिस्पर्धी संवहनीय विमानन ईंधन (Sustainable Aviation Fuels) बाजार में बड़े पैमाने पर लाया जाएगा।
  2. सरकारों और हवाई नेविगेशन सेवा प्रदाताओं (ANSP) द्वारा हवाई यातायात प्रबंधन और हवाई क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में कमियों को दूर किया जाएगा।
  3. विमान और इंजन निर्माताओं द्वारा आवश्यक रूप से अधिक कुशल एयरफ्रेम और प्रणोदन प्रौद्योगिकियों का उत्पादन किया जाएगा।
  4. हवाईअड्डा संचालकों द्वारा ‘संवहनीय विमानन ईंधन’ (SAF) एसएएफ की आपूर्ति के लिए उचित लागत पर और लागत प्रभावी तरीके से आवश्यक बुनियादी ढांचा प्रदान किया जाएगा।

 

‘नेट-जीरो लक्ष्य घोषित करने वाले राष्ट्र:

  1. वर्ष 2019 में न्यूजीलैंड सरकार द्वारा ‘जीरो कार्बन अधिनियम’ पारित किया गया और इसके तहत देश को वर्ष 2050 तक ‘जीरो कार्बन उत्सर्जन’ का लक्ष्य हासिल करने करने हेतु प्रतिबद्ध किया गया।
  2. ब्रिटेन की संसद द्वारा एक कानून पारित किया गया है, जिसके तहत सरकार को यूनाइटेड किंगडम में ग्रीनहाउस गैसों के शुद्ध उत्सर्जन को 100 प्रतिशत तक कम करने का दायित्व सौंपा गया है।
  3. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन द्वारा वर्ष 2030 तक देश के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वर्ष 2005 के स्तर से न्यूनतम 50 प्रतिशत की कटौती करने की घोषणा की गयी है।
  4. जलवायु परिवर्तन पर अनिच्छुक सहयोगियों को एक साथ लाने और वर्ष 2050 तक देश में ‘नेट-जीरो’ कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य तक पहुंचने के साथ वर्ष 2019 में ‘वर्ल्ड वॉर जीरो की शुरुआत की गई।
  5. यूरोपीय संघ की ‘फिट फॉर 55’ योजना: इसके तहत, यूरोपीय आयोग ने अपने सभी 27 सदस्य देशों को अपने उत्सर्जन में 2030 तक 1990 के उत्सर्जन स्तर से 55 प्रतिशत तक कटौती करने के लिए कहा है।
  6. चीन ने वर्ष 2060 तक ‘नेट-जीरो’ का लक्ष्य हासिल करने की घोषणा की है और अपने उत्सर्जन को वर्ष 2030 के स्तर तक सीमित करने की बात कही है।

भारत और ‘नेट-ज़ीरो’ लक्ष्य:

  • अमेरिका और चीन के बाद, भारत, ग्रीनहाउस गैसों का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है, और ‘नेट-ज़ीरो’ लक्ष्य से बाहर रहने वाला एकमात्र प्रमुख देश है।
  • भारत का तर्क है, कि ‘पेरिस समझौते’ फ्रेमवर्क से अलग नेट-जीरो लक्ष्यों पर समानांतर चर्चा शुरू करने के बजाय, सभी देशो को उन लक्ष्यों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए, जिनके लिए वे पहले से वादा कर चुके है।

भारत की चिंताएं:

चूंकि, भारत अपने देश के लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने हेतु उच्च विकास दर हासिल करने के लिए प्रयास कर रहा है, जिसकी वजह से अगले दो से तीन दशकों में, भारत का उत्सर्जन विश्व में सर्वाधिक तेज गति से बढ़ने की संभावना है। कितना भी वनीकरण या पुनर्वनीकरण इस उत्सर्जन-वृद्धि की भरपाई करने में सक्षम नहीं होगा। इसके अलावा, कार्बन-मुक्त करने के लिए उपलब्ध अधिकांश प्रौद्योगिकियां अभी तक या तो अविश्वसनीय हैं या बहुत महंगी हैं।

‘नेट-ज़ीरो’ क्या है?

‘नेट-ज़ीरो’  (Net-Zero), जिसे ‘कार्बन-तटस्थता’ (carbon-neutrality) भी कहा जाता है, का मतलब यह नहीं है, कि कोई देश अपने सकल उत्सर्जन को शून्य तक ले जाएगा।

  • बल्कि, ‘नेट-ज़ीरो’ एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें किसी देश के उत्सर्जन को, ‘वायुमंडल से ग्रीनहाउस गैसों के अवशोषण तथा निराकरण’ के द्वारा क्षतिपूरित (compensated) किया जाता है।
  • उत्सर्जन का अवशोषण करने में वृद्धि करने हेतु अधिक संख्या में कार्बन सिंक, जैसे कि जंगल, तैयार किये जा सकते हैं, जबकि वायुमंडल से गैसों का निराकरण करने अथवा निष्कासित करने के लिए कार्बन कैप्चर और भंडारण जैसी अत्याधुनिक तकनीकों की आवश्यकता होती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘ब्लू कार्बन’, ‘ब्लैक कार्बन’ और ‘ब्राउन कार्बन’ के बारे में जानते हैं? इसके बारे जानने के लिए पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘जलवायु नेताओं’ के शिखर सम्मेलन के बारे में।
  2. नेट-ज़ीरो क्या है?
  3. नेट-ज़ीरो के लिए प्रतिबद्ध देश।
  4. पेरिस समझौते के बारे में।

मेंस लिंक:

‘कार्बन सिंक’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


वर्ष 2021 के लिए भौतिकी में नोबेल पुरुस्कार

90 वर्षीय सिउकुरो मानाबे (Syukuro Manabe), 89 वर्षीय क्लाउस हैसलमैन (Klaus Hasselmann), 73 वर्षीय जिओर्गिओ पारिसी (Giorgio Parisi) को भौतिकी के लिए 2021 का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। यह पहली बार है, जब जलवायु वैज्ञानिकों को भौतिकी के नोबेल से सम्मानित किया गया है।

  • मनाबे और हैसलमैन को “पृथ्वी की जलवायु की भौतिक मॉडलिंग, परिवर्तनशीलता की मात्रा निर्धारित करने और ग्लोबल वार्मिंग की मज़बूती से भविष्यवाणी करने” में उनके काम के लिए सम्मानित किया गया।
  • पारिसी को “परमाणु से लेकर ग्रहीय पैमाने तक भौतिक प्रणालियों में विशृंखलता और उतार-चढ़ाव की परस्पर क्रिया की खोज” के लिए सम्मानित किया गया है।

इनके कार्यों का संक्षिप्त विवरण:

  • 1960 के दशक में अपने काम की शुरूआत करने वाले ‘सिउकुरो मानाबे’ ने वर्तमान जलवायु मॉडल की नींव रखते हुए ‘वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से वैश्विक तापमान में किस प्रकार वृद्धि होती है, इसका प्रदर्शन किया है।
  • लगभग एक दशक बाद, ‘हैसलमैन’ (Hasselmann) ने मौसम और जलवायु को परस्पर सम्बद्ध करने वाले एक मॉडल का निर्माण किया,जो यह समझाने में मदद करता है कि मौसम की प्रतीत होने वाली अराजक प्रकृति के बावजूद ‘जलवायु मॉडल’ विश्वसनीय क्यों हो सकते हैं। उन्होंने जलवायु पर मानव प्रभाव के विशिष्ट संकेतों को देखने के तरीके भी विकसित किए हैं।
  • जिओर्गिओ पारिसी ने “एक गहन भौतिक और गणितीय मॉडल विकसित किया है” जिसने गणित, जीव विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान और मशीन सीखने जैसे क्षेत्रों में जटिल प्रणालियों को समझना संभव बना दिया।

पिछले साल, वैज्ञानिक रोजर पेनरोज़, रेनहार्ड जेनज़ेल और एंड्रिया गेज़ को ब्लैक होल से संबंधित अपनी खोजों के लिए नोबेल भौतिकी पुरस्कार प्रदान किया गया था।

 डेनमार्क में किसान ‘ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती’ के लिए कानूनी रूप से बाध्य

  • डेनमार्क की संसद ने 2030 तक कृषि और वानिकी क्षेत्रों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (GHG) को क्रमशः 55 और 65 प्रतिशत तक कम करने की योजना को मंजूरी दी है।
  • उत्सर्जन लक्ष्य में कटौती का यह लक्ष्य 1990 के GHG उत्सर्जन स्तर पर आधारित है।
  • यह लक्ष्य कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा।

पृष्ठभूमि:

  • यूरोपीय संघ द्वारा अपने सदस्य देशों, जिनमें डेनमार्क भी शामिल है, के लिए वर्ष 2030 तक के लिए बाध्यकारी जलवायु और ऊर्जा लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
  • इसके तहत प्रत्येक सदस्य को 2021-2030 तक लिए राष्ट्रीय ऊर्जा और जलवायु योजनाओं को लागू करना होगा।
  • डेनमार्क ने इस योजना को दिसंबर 2019 में लागू किया गया था। नवीनतम लक्ष्य इसी योजना का एक हिस्सा है।

 

स्वच्छकार्यक्रम

यह, हाल ही में ‘मासिक धर्म’ पर आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा शुरू किया गया एक जागरूकता अभियान है।

  • ‘स्वच्छ’ कार्यक्रम को सभी सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में लॉन्च किया गया है।
  • इस कार्यक्रम के तहत कक्षा 7 से 12 तक के 10 लाख से अधिक छात्रों को सैनिटरी नैपकिन प्रदान किए जाएंगे।

 

स्वास्थ्य सूचना प्रबंधन प्रणाली (HIMS) परियोजना

हाल ही में, दिल्ली मंत्रिमंडल ने अपनी महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य सूचना प्रबंधन प्रणाली (Health Information Management System – HIMS) परियोजना को वित्तीय मंजूरी दी है।

  • परियोजना के हिस्से के रूप में, प्रत्येक नागरिक के पास एक स्वास्थ्य कार्ड होगा, जिसमे उसकी चिकित्सा जानकारी संग्रहीत होगी।
  • सरकार के अनुसार, डॉक्टर इस कार्ड का इस्तेमाल कर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री देख सकेंगे और मरीज घर बैठे ही अपॉइंटमेंट ले सकेंगे।
  • स्वास्थ्य कार्ड, प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक विशिष्ट स्वास्थ्य पहचान-पत्र के रूप में कार्य करेगा जिसके माध्यम से उनके चिकित्सा इतिहास से लेकर अपॉइंटमेंट की तारीखों तक सब कुछ देखा जा सकता है।
  • 1 वर्ष से 18 वर्ष आयु वर्ग के सभी नागरिकों को, उनके माता-पिता के स्वास्थ्य कार्ड से सम्बद्ध एक स्वास्थ्य कार्ड जारी किया जाएगा। सभी नवजात शिशुओं (1 वर्ष की आयु तक) को उनकी मां के स्वास्थ्य कार्ड से जोड़ा जाएगा।

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