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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 30 September 2021

 

 

विषय सूची:

सामान्य अध्ययन-II

1. वस्‍त्र उद्योग के लिए ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई)’ योजना

2. आयुध निर्माणी बोर्ड

3. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A

4. मेकेदातु परियोजना से संबंधित विवाद

 

सामान्य अध्ययन-III

1. लैंडसैट 9

2. मलेरिया-रोधी दवा प्रतिरोध

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

वस्‍त्र उद्योग के लिए ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई)’ योजना


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार द्वारा वस्त्र उद्योग के लिए 10,683 करोड़ रुपये के बजटीय परिव्यय के साथ ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना (Production Linked Incentive Scheme – PLI Scheme) शुरू की गयी है।

यह PLI योजना केंद्रीय बजट 2021-22 में 13 क्षेत्रों के लिए पहले घोषित की गई 1.97 लाख करोड़ के कुल बजटीय परिव्यय वाली ‘पीएलआई योजनाओं’ का हिस्सा है।

फोकस क्षेत्र:

वस्‍त्र उद्योग के लिए ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन’ योजना (PLI scheme) का उद्देश्य उच्च मूल्य के मानव निर्मित रेशों (Man-Made FibreMMF) से बने कपड़े, परिधानों और तकनीकी वस्त्रों (Technical Textiles) के उत्पादन को बढ़ावा देना है।

अहर्ता:

  1. कोई भी व्यक्ति (जिसमें फर्म/कंपनी शामिल है), जो निर्धारित खंडों (एमएमएफ फैब्रिक्स, गारमेंट) के उत्‍पादों और तकनीकी वस्‍त्र के उत्पादों के उत्पादन के लिए संयंत्र, मशीनरी, उपकरण और निर्माण कार्यों (भूमि और प्रशासनिक भवन की लागत को छोड़कर) में न्यूनतम 300 करोड़ रुपये निवेश करने को तैयार है, वह इस योजना के पहले भाग में भागीदारी के लिए आवेदन करने का पात्र होगा।
  2. दूसरे भाग में, कोई भी व्यक्ति (जिसमें फर्म/कंपनी शामिल है), जो न्यूनतम 100 करोड़ रुपये निवेश करने का इच्छुक है, वह योजना के इस भाग में भागीदारी के लिए आवेदन करने का पात्र होगा।

प्रोत्साहन राशि:

  • PLI योजना के तहत, केंद्र सरकार द्वारा वृद्धिशील उत्पादन पर प्रोत्साहन देकर पात्र निर्माताओं को सब्सिडी प्रदान की जाएगी।
  • संयंत्र, मशीनरी, उपकरण और सिविल कार्यों में 300 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करने वाली कंपनियों को अपने टर्नओवर का 15 प्रतिशत प्रोत्साहन मिलेगा। इस टर्नओवर को निवेश करने तीसरे वर्ष में 600 करोड़ रुपये होना चाहिए।
  • 100 करोड़ रुपये से 300 करोड़ रुपये के बीच निवेश करने वाली कंपनियां भी शुल्क वापसी और प्रोत्साहन (उनके कारोबार के 15 प्रतिशत से कम) प्राप्त करने की पात्र होंगी।
  • इस योजना से सरकार को “19,000 करोड़ रुपए से अधिक का नया निवेश और 3 लाख करोड़ रुपए से अधिक का संचयी कारोबार” प्राप्त करने की उम्मीद है।

महत्व:

पीएलआई योजना, घरेलू विनिर्माण को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ावा देगी, और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की भावना के अनुरूप वैश्विक बाजारों में एक बड़ा प्रभाव डालने के लिए वस्त्र उद्योग को तैयार करेगी। यह योजना इस क्षेत्र में अधिक निवेश आकर्षित करने में भी मदद करेगी

आवश्यकता:

वस्त्रों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का दो-तिहाई, मानव निर्मित और तकनीकी वस्त्रों का है। भारत को मानव निर्मित फाइबर (MMF) से बने वस्त्रों और वस्त्र उद्योग के पारिस्थितिकी तंत्र में भी योगदान करने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से इस योजना को मंजूरी दी गई है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि वर्ष 2020 में, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा एक 1,480 करोड़ रुपए के कुल परिव्यय से ‘राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन’ की स्थापना को मंजूरी दी गई थी।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. तकनीकी वस्त्र क्या होते हैं?
  2. विशेषताएं
  3. प्रकार
  4. लाभ
  5. उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना- इसकी घोषणा कब की गई थी?
  6. योजना के तहत प्रोत्साहन
  7. किस तरह के निवेश पर विचार किया जाएगा?
  8. योजना की अवधि।
  9. इसे कौन लागू करेगा?

मेंस लिंक:

तकनीकी वस्त्रों के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

आयुध निर्माणी बोर्ड


संदर्भ:

1 अक्टूबर को, 220 साल पुराने ‘आयुध निर्माणी बोर्ड’ (Ordnance Factory Board – OFB) भंग कर दिया जाएगा और इसकी इकाइयों को सात सार्वजनिक उपक्रमों के तहत निगमित किया जाएगा।

आवश्यकता:

  • निगमीकरण करने के पश्चात् ये संस्थाएं ‘कंपनी अधिनियम’ के दायरे में आ जायेंगी, जिससे इनकी दक्षता में सुधार लाएगा, उत्पादों को लागत-प्रतिस्पर्धी बनाएगा, और उनकी गुणवत्ता में वृद्धि होगी।
  • यह तर्क दिया गया है, कि ‘आयुध निर्माणी बोर्ड’ (OFB) के एकाधिकार की वजह से उत्पादकता में कमी हुई है, उत्पादन की अधिक लागत और उच्च प्रबंधकीय स्तरों पर लचीलेपन की कमी के अलावा. नवाचार समाप्त हो चुका है।
  • सीधे रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करते हुए, ‘आयुध निर्माणी बोर्ड’ और उसके कारखाने मुनाफे को बरकरार नहीं रख सके, और इस प्रकार उन्हें आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य करने हेतु कोई प्रोत्साहन नहीं मिला।

इस संबंध में विभिन्न समितियों की सिफारिशें:

रक्षा सुधारों पर, पिछले दो दशकों में गठित कम से कम तीन विशेषज्ञ समितियों – टीकेएस नायर समिति (2000), विजय केलकर समिति (2005) और वाइस एडमिरल रमन पुरी समिति (2015) द्वारा कोलकाता में मुख्यालय वाले ‘आयुध निर्माणी बोर्ड’ को कॉर्पोरेट संस्थाओं में पुनर्गठित करने की सिफारिश की गई थी।

शेकटकर समिति ने ‘आयुध निर्माणी बोर्ड’ के निगमीकरण का सुझाव नहीं दिया, लेकिन समिति ने इसके पिछले प्रदर्शन को देखते हुए सभी आयुध इकाइयों के नियमित ऑडिट किए जाने की सिफारिश की थी।

सरकार द्वारा इस फैसले के खिलाफ मजदूरों की हड़ताल से किस प्रकार निपटा गया है?

सरकारी स्वामित्व वाले आयुध कारखानों (Ordnance Factories) के कर्मचारियों द्वारा हड़ताल करने पर रोक लगाने के लिए ‘अनिवार्य रक्षा सेवा विधेयक’, 2021 (Essential Defence Services Bill, 2021) पारित किया गया है।

विधेयक के प्रमुख बिंदु:

  1. यह विधेयक, “अनिवार्य रक्षा सेवाओं को जारी रखने हेतु, ताकि राष्ट्र की सुरक्षा और अधिकांश जन-जीवन और संपत्ति को सुरक्षित रखने और इससे संबद्ध या आनुषांगिक विषयों के सबंध में प्रावधान करता है।
  2. विधेयक में, सरकार को इसमें उल्लिखित सेवाओं को ‘अनिवार्य रक्षा सेवाओं’ के रूप में घोषित करने की शक्ति प्रदान की गई है।
  3. इसमें, “अनिवार्य रक्षा सेवाओं में संलग्न किसी भी औद्योगिक प्रतिष्ठान या इकाई” में हड़ताल और तालाबंदी पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।

नवीनतम परिवर्तन:

कुछ समय पूर्व तक, ‘आयुध निर्माणी बोर्ड’ (Ordnance Factory Board), सीधे रक्षा उत्पादन विभाग के अधीन आता था और सरकार के एक अंग के रूप में कार्य करता था। किंतु, जून, 2021 में केंद्र सरकार द्वारा इसका ‘निगमीकरण’ करने संबंधी घोषणा की जा चुकी है।

  • इस योजना के अनुसार, सशस्त्र बलों को गोला-बारूद और अन्य उपकरणों की आपूर्ति करने वाले 41 कारखाने, सरकारी स्वामित्व वाली सात कॉर्पोरेट संस्थाओं का हिस्सा बन जाएंगे।
  • सरकार के अनुसार, इस कदम का उद्देश्य इन कारखानों की दक्षता और जवाबदेही में सुधार करना है।
  • हालांकि, सरकार के इस फैसले के बाद, कई संघों द्वारा अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू करने की घोषणा की गई थी।
  • और, इस पर रोक लगाने के लिए सरकार द्वारा 30 जून को ‘अनिवार्य रक्षा सेवा अध्यादेश’ (Essential Defence Services Ordinance) लागू कर दिया गया।

इस विधेयक का प्रभाव:

यह विधेयक, देश भर के 41 आयुध कारखानों के लगभग 70,000 कर्मचारियों पर प्रत्यक्ष रूप से असर डालेगा। ये कार्मिक ‘आयुध निर्माणी बोर्ड’ (OFB) का ‘निगमीकरण’ किए जाने से असंतुष्ट है, और इनको आशंका है कि इससे उनकी सेवा और सेवानिवृत्ति की शर्तों पर प्रभाव पड़ेगा।

आवश्यकता:

आयुध कारखाने, रक्षा मशीनरी और उपकरणों के स्वदेशी उत्पादन हेतु एक समेकित आधार हैं, और इनका प्रधान उद्देश्य सशस्त्र बलों को अत्याधुनिक युद्धक्षेत्रक उपकरणों से लैस करना है।

अतः, अनिवार्य रक्षा सेवाओं को जारी रखने हेतु, ताकि राष्ट्र की सुरक्षा और अधिकांश जन-जीवन और संपत्ति को सुरक्षित रखने और इससे संबद्ध या आनुषांगिक विषयों के लिए एक क़ानून बनाना आवश्यक है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में ‘रक्षा अधिग्रहण परिषद’ (Defence Acquisition Council) के बारे में जानते हैं? इसके कार्य क्या हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘आयुध निर्माणी बोर्ड’ (OFB) क्या है?
  2. विधेयक के प्रमुख बिंदु

मेंस लिंक:

‘आयुध निर्माणी बोर्ड’ (OFB) के निगमीकरण से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

 सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A


(Section 66A of the IT Act)

संदर्भ:

दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र से ‘सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A’ (Section 66A of the IT Act), जिसे पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है, जैसे क़ानूनी प्रावधानों को हटाने की मांग वाली याचिका पर विचार करने के लिए कहा है।

संबंधित प्रकरण:

आपराधिक कानून की ऐसी कई धाराएं हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने के बाद भी, पुलिस अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल जारी रखा गया हैं। कुछ मामलों में, सुप्रीम कोर्ट के 2015 के फैसले का संज्ञान लेने के बाद भी, ट्रायल कोर्ट द्वारा आईटी अधिनियम के रद्द किए जा चुके प्रावधान के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है।

धारा 66A क्या है?

आईटी अधिनियम की धारा 66A (Section 66A), कंप्यूटर या किसी अन्य संचार उपकरण जैसे मोबाइल फोन या टैबलेट के माध्यम से “आपत्तिजनक” संदेश भेजने पर सजा को परिभाषित करती है।

  • इसके तहत दोषी को अधिकतम तीन साल की जेल और जुर्माना हो सकता है।
  • इस धारा के अंतर्गत पुलिस को इस संदर्भ में गिरफ्तारी करने का अधिकार दिया गया है, कि पुलिसकर्मी किसी ‘संदेश’ को अपने विवेक से ‘आक्रामक’ या ‘खतरनाक’ या बाधाकारक, असुविधाजनक बनाने वाला आदि को परिभाषित कर सकते हैं।

श्रेया सिंघाल मामला:

श्रेया सिंघाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में आईटी अधिनियम की धारा 66A को रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 66A को हटाए जाने के कारण:

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, धारा 66A संविधान के अनुच्छेद 19(1) (a) के तहत, मनमाने ढंग से, अतिशय पूर्वक और असमान रूप से ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार’ पर हमला करती है, और इन अधिकारों और इन पर लगाए जाने वाले उचित प्रतिबंधों के बीच संतुलन को बिगाड़ती है। इसके अलावा, प्रावधान के तहत अपराधों की परिभाषा, व्याख्या के लिए ‘खुली हुई’ (open-ended) और अपरिभाषित है।

न्यायालय द्वारा की गई हालिया टिप्पणियां:

  • 5 जुलाई को, सुप्रीम कोर्ट ने छह साल पहले रद्द की जा चुकी ‘आईटी आधिनियम की धारा 66A’ का पुलिस द्वारा इस्तेमाल करने और मामले दर्ज करना जारी रखने पर हैरानी और निराशा व्यक्त की थी।
  • ‘आईटी आधिनियम की धारा 66A’ को समाप्त किए जाने के 7 साल बाद भी, मार्च 2021 तक, 11 राज्यों की जिला अदालतों के समक्ष कुल 745 मामले अभी भी लंबित और सक्रिय हैं, जिनमें आरोपी व्यक्तियों पर आईटी अधिनियम की धारा 66A के तहत अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा रहा है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप पुन:प्रवर्तन के सिद्धांत’ (Doctrine of Revival) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आईटी एक्ट की धारा 66A के बारे में
  2. संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के बारे में
  3. श्रेया सिंघल मामला किससे संबंधित है?

मेंस लिंक:

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम की धारा 66ए को असंवैधानिक ठहराते हुए क्यों रद्द कर दिया।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

मेकेदातु परियोजना से संबंधित विवाद


संदर्भ:

तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी राज्यों द्वारा कड़ी आपत्ति किए जाने के पश्चात, ‘कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण’ (the Cauvery Water Management Authority – CWMA) ने कर्नाटक से तमिलनाडु के लिए बकाया जल की मात्रा को तत्काल देने का आग्रह किया है। इसके बाद, मेकेदातु परियोजना पर फिर से बहस छिड़ गयी है।

कावेरी नदी के अधिशेष जल को, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण द्वारा वर्ष 2007 ने दिए गए निर्णय के अनुसार वितरित किया जाना चाहिए था। इस फैसले को वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संशोधित किया गया था।

संबंधित प्रकरण:

तमिलनाडु का कहना है, कि कर्नाटक ने 26 सितंबर तक 119.5 टीएमसी पानी के बजाय उसके लिए मात्र 85.8 टीएमसी पानी उपलब्ध कराया था। तमिलनाडु का तर्क है, कि कर्नाटक के लिए, उसको वास्तव में अक्टूबर महीने के लिए जल की निर्धारित मात्रा के अलावा अधिशेष जल भी देने का निर्देश दिया जाना चाहिए, ताकि डेल्टा क्षेत्र धान की रोपाई को सुरक्षित किया जा सके।

कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण’ (CWMA) के बारे में:

‘कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण’ (Cauvery Water Management Authority – CWMA) का गठन, केंद्र द्वारा तैयार की गयी और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमोदित ‘कावेरी प्रबंधन योजना’ के तहत किया गया है।

CWMA की संरचना और शक्तियां:

  • ‘कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण’ में एक अध्यक्ष, एक सचिव और आठ सदस्य होते हैं।
  • आठ सदस्यों में, दो सदस्य पूर्णकालिक होते हैं, जबकि अंशकालिक सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं।
  • शेष सदस्य सभी संबंधित चार राज्यों द्वारा, प्रत्येक से एक, अंशकालिक सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाते हैं।

CWMA के कार्य:

  • ‘कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण’ का मुख्य कार्य “कावेरी नदी जल के भंडारण, बटवारा, विनियमन और नियंत्रण” के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी आदेश के कार्यान्वयन और अनुपालन को सुनिश्चित करना है।
  • ‘प्राधिकरण’, राज्यों को जल उपयोग दक्षता में सुधार के लिए उपयुक्त उपाय करने हेतु परामर्श भी प्रदान करता है।
  • यह राज्यों को, सूक्ष्म सिंचाई के उपयोग को बढ़ावा देने, फसल पैटर्न में बदलाव, उन्नत कृषि पद्धतियों और कमांड क्षेत्रों के विकास करने हेतु परामर्श देगा।
  • ‘कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण’ द्वारा पिछले वर्ष के दौरान अपनी गतिविधियों का विवरण देते हुए एक वार्षिक रिपोर्ट भी तैयार की जाती है।

‘मेकेदातु परियोजना’ के बारे में:

‘मेकेदातु’ एक बहुउद्देशीय (जल एवं विद्युत्) परियोजना है।

  • परियोजना के तहत, कर्नाटक के रामनगर जिले में कनकपुरा के पास एक ‘संतोलन जलाशय’ (Balancing Reservoir) का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है।
  • इस परियोजना का उद्देश्य, बेंगलुरू शहर और इसके निकटवर्ती क्षेत्रों के लिए पीने के प्रयोजन हेतु पानी (75 टीएमसी) का भंडारण और आपूर्ति करना है। इस परियोजना के माध्यम से लगभग 400 मेगावाट बिजली उत्पन्न करने का भी प्रस्ताव किया गया है।
  • परियोजना की अनुमानित लागत 9,000 करोड़ रुपये है।

Cauvery_Basin

तमिलनाडु द्वारा इस परियोजना का विरोध करने के कारण:

  1. तमिलनाडु का कहना है, कि ‘उच्चतम न्यायालय’ और ‘कावेरी जल विवाद अधिकरण’ (CWDT) के अनुसार ‘कावेरी बेसिन में उपलब्ध मौजूदा भंडारण सुविधाएं, जल भंडारण और वितरण के लिए पर्याप्त है, अतः कर्नाटक का यह प्रस्ताव पूर्व-दृष्टया असमर्थनीय है और इसे सीधे खारिज कर दिया जाना चाहिए।
  2. तमिलनाडु के अनुसार- प्रस्तावित जलाशय का निर्माण केवल पीने के पानी के लिए नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसके द्वारा सिंचाई की सीमा बढाया जाएगा, जोकि ‘कावेरी जल विवाद निर्णय’ का स्पष्ट उल्लंघन है।

अधिकरण तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय:

‘कावेरी जल विवाद अधिकरण’ (CWDT) का गठन वर्ष 1990 में की गयी थी और वर्ष 2007 में दिए गए अपने अंतिम फैसले में, तमिलनाडु को 419 टीएमसी फीट, कर्नाटक को 270 टीएमसी फीट, केरल को 30 टीएमसी फीट और पुडुचेरी को 7 टीएमसी फीट पानी का बटवारा किया था। अधिकरण ने, बारिश की कमी वाले वर्षों में, सभी राज्यों के लिए जल-आवंटन की मात्रा कम कर दी जाएगी।

  • हालांकि, तमिलनाडु और कर्नाटक दोनों द्वारा इस बटवारे पर अप्रसन्नता व्यक्त की और जल बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों में विरोध और हिंसा के प्रदर्शन हुए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले पर सुनवाई की गई और वर्ष 2018 के फैसले में, बंटवारा करते हुए तमिलनाडु के पूर्व निर्धारित हिस्से में से 14.75 टीएमसी फीट पानी कर्नाटक को दे दिया।
  • इस प्रकार, नया बटवारे के अनुसार, तमिलनाडु के लिए 404.25 टीएमसी फीट पानी मिला और कर्नाटक को 284.75 टीएमसी फीट पानी दिया गया। केरल और पुडुचेरी का हिस्सा अपरिवर्तित रहा।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘कावेरी प्रबंधन योजना’ (Cauvery Management Scheme) के बारे में जानते हैं? योजना के घटक क्या हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कावेरी की सहायक नदियाँ।
  2. बेसिन में अवस्थित राज्य।
  3. नदी पर स्थित महत्वपूर्ण जलप्रपात तथा बांध।
  4. मेकेदातु कहाँ है?
  5. प्रोजेक्ट किससे संबंधित है?
  6. इस परियोजना के लाभार्थी।

मेंस लिंक:

मेकेदातु परियोजना पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

लैंडसैट 9


संदर्भ:

हाल ही में नासा द्वारा ‘लैंडसैट 9’ (Landsat 9) सैटेलाइट को लॉन्च किया गया है।

‘लैंडसैट 9 के बारे में:

‘लैंडसैट 9’ (Landsat 9) एक ‘भू-निगरानी’ / ‘भू-प्रेक्षण’ उपग्रह (Earth Monitoring Satellite) है।

  • यह, नासा और अमेरिकन जियोलॉजिकल सर्वे (US Geological Survey – USGS) का एक संयुक्त मिशन है।
  • लैंडसैट 8 के साथ मिलकर, यह उपग्रह पृथ्वी की सतह की तस्वीरें एकत्र करेगा। इन उपग्रहों को संपूर्ण पृथ्वी का छायांकन करने में 8 दिन का समय लगेगा।
  • यह अपनी पीढ़ी का तकनीकी रूप से सबसे उन्नत उपग्रह है।
  • यह अपनी पीढ़ी का सबसे तकनीकी रूप से उन्नत उपग्रह है। यह, पिछले उपग्रहों की तुलना में अधिक गहराई के साथ अधिक रंगीन छायाओं को देख सकता है, जिससे वैज्ञानिकों को हमारे बदलते हुए ग्रह के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
  • लैंडसैट 9 पर ‘ऑपरेशनल लैंड इमेजर- 2’ (OLI-2) और ‘थर्मल इन्फ्रारेड सेंसर- 2’ (TIRS-2) जैसे उपकरण लगाए गए हैं। इनकी सहायता से पृथ्वी की सतह से परावर्तित होने वाले प्रकाश की विभिन्न तरंगदैर्ध्यों को मापा जाएगा।

लैंडसैट उपग्रह श्रृंखला के बारे में:

पहला लैंडसैट उपग्रह वर्ष 1972 में लॉन्च किया गया था और तब से, लैंडसैट उपग्रह हमारे ग्रह की छवियों एकत्र कर रहे हैं। ये छवियाँ, पृथ्वी पर भूमि-उपयोग प्रारूप में होने वाले परिवर्तन को समझने में मदद करती हैं।

लैंडसैट मिशनों का महत्व और अनुप्रयोग:

वर्ष 2008 में, यह निर्णय लिया गया था कि लैंडसैट उपग्रहों द्वारा प्राप्त होने वाले सभी चित्र, मुफ्त और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होंगे, और यह नीति, शोधकर्ताओं, किसानों, नीति विश्लेषकों, हिमनद- विज्ञानियों और भूकंप विज्ञानियों के लिए काफी मददगार साबित हुई है। लैंडसैट उपग्रहों से प्राप्त चित्रों का उपयोग जंगलों के स्वास्थ्य, प्रवाल भित्तियों, पानी की गुणवत्ता की निगरानी और ग्लेशियरों के पिघलने के अध्ययन के लिए किया जा रहा है।

लैंडसैट उपग्रह जलवायु परिवर्तन की निगरानी में किस प्रकार मदद करेगा?

  1. यदि कोई जंगल सूखे से प्रभावित है, तो उसे लैंडसैट उपग्रह द्वारा लिए जाने वाले चित्रों में देखा जा सकेगा और इसके आधार पर शोधकर्ता जोखिम वाले क्षेत्रों खोज सकेंगे।
  2. इसी तरह वनाग्नि घटनाओं के दौरान, उपग्रह द्वारा लिए जाने वाले चित्रों में ‘धुएं के गुबार’ को देखा जा सकेगा, और ये चित्र वनाग्नि की सीमा का अध्ययन करने में मदद करेंगे।
  3. उपग्रह से प्राप्त चित्र, जंगलो को दोबारा लगाने के लिए ‘जगह’ का चयन करने एवं योजना बनाने में विशेषज्ञों की मदद भी कर सकते हैं।
  4. लैंडसैट से प्राप्त चित्र, हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन की संभावना वाले जल निकायों की पहचान करने में भी सहायक हो सकते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘PRISMA’ अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट के बारे में सुना है? इसे किस देश ने लॉन्च किया है? इसके उद्देश्य क्या हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. रडार इमेजिंग क्या है?
  2. पृथ्वी-निगरानी उपग्रह क्या हैं?
  3. GSLV और PSLV के बीच अंतर
  4. EOS-03 के अनुप्रयोग
  5. पृथ्वी की निचली कक्षा और भूस्थिर कक्षाओं के मध्य अंतर

मेंस लिंक:

ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण वाहन (PSLV) दुनिया के सबसे विश्वसनीय अंतरिक्ष प्रक्षेपण वाहनों में से एक क्यों माना जाता है? यह भारत को व्यावसायिक और तकनीकी रूप से कैसे मदद कर रहा है?

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

मलेरिया-रोधी दवा प्रतिरोधक


(Antimalarial drug resistance)

संदर्भ:

हाल के वर्षों में, फाल्सीपेरम मलेरिया के उपचार हेतु केवल आर्टीमिसिनिन या अन्य दवाओं  के साथ ‘आर्टीमिसिनिन’-आधारित संयोजन चिकित्सा (artemisinin-based combination therapy) की विफलता के प्रमाण बढ़ते जा रहे हैं।

  • हाल के एक अध्ययन में, उत्तरी युगांडा में ‘आर्टीमिसिनिन’ दवा के प्रतिरोध के लिए जिम्मेदार दो उत्परिवर्तनों (Mutations) की मौजूदगी का उल्लेख किया गया है।
  • पूर्वी अफ्रीका में ‘आर्टीमिसिनिन’ प्रतिरोध की हालिया रिपोर्ट एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि यह एकमात्र ऐसी दवा है जिसने दुनिया भर में कई लोगों की जान बचाई है।

मलेरिया-रोधी दवा प्रतिरोध में वृद्धि का कारण:

भारत सहित अधिकांश मलेरिया-स्थानिक देशों में, आर्टेमिसिनिन-आधारित मलेरिया-रोधी दवाएं मलेरिया के उपचार के लिए पहली पसंद हैं। इन दवाओं को विशेष रूप से प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम (Plasmodium falciparum) परजीवी के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है; यह परजीवी विश्व में मलेरिया से संबंधित होने वाली लगभग सभी मौतों के लिए जिम्मेदार है।

प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम (पी. फाल्सीपेरम) के ईलाज में आर्टीमिसिनिन का अत्यधिक प्रयोग, परजीवी में ‘उत्परिवर्तन’ होने का संभावित कारण हो सकता है।

आवश्यकता:

दवा-प्रतिरोधी वैरिएंट्स का पता लगाने के लिए सूक्ष्मतम मलेरिया निगरानी किए जाने का समय आ गया है। ताकि किसी भी तरह के व्यापक दुष्परिणामों को रोकने के लिए समय पर सुधारात्मक उपाय किए जा सकें। कुछ विशेषज्ञ दवा के कम प्रभावी होने पर ‘ट्रिपल आर्टीमिसिनिन-आधारित संयोजन’ उपचारों का उपयोग करने की भी सलाह दे रहे हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. एंटीबायोटिक प्रतिरोध क्या है?
  2. एंटीबॉडी क्या हैं?
  3. भारत में दूध उत्पादन और खपत।
  4. गंभीर रूप से महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक्स (CIAs) क्या हैं?

मेंस लिंक:

एंटीबायोटिक प्रतिरोध, 21वीं सदी की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। परीक्षण कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।


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