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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 27 September 2021

 

 

विषय सूची:

सामान्य अध्ययन-I

1. चक्रवात गुलाब

 

सामान्य अध्ययन-II

1. भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और कार्टेलाइजेशन

2. महाराष्ट्र में बहु-सदस्यीय वार्ड प्रणाली

3. पीएम केयर्स फंड

 

सामान्य अध्ययन-III

1. डार्क एनर्जी

2. चेन्नई की बाढ़ पर राज्य सरकार की रिपोर्ट

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. सामाजिक जवाबदेही कानून के लिए अभियान

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान आदि।

चक्रवात गुलाब


संदर्भ:

हाल ही में बंगाल की खाड़ी में निर्मित, तूफानी चक्रवात ‘गुलाब’ (Cyclone Gulab) के भारत के पूर्वी तट से टकराने की संभावना है।

इस चक्रवात का नामकरण:

तूफानी चक्रवात का नाम ‘गुलाब’ रखे जाने का सुझाव पाकिस्तान ने दिया था।

‘चक्रवातों की उत्पत्ति:

चक्रवातों का निर्माण, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में समुद्रीय जल के ऊपर होता है।

इन क्षेत्रों में सौर-प्रकाश की मात्रा सर्वाधिक होती है, जिसके परिणामस्वरूप स्थलीय  और जलीय भागों की ऊपरी सतह गर्म हो जाती हैं। सतह के गर्म होने के कारण, समुद्र के ऊपर स्थित उष्ण-आर्द्र वायु ऊपर की ओर उठने लगती है, जिसके बाद इस रिक्त स्थान को भरने के लिए तेजी से झपट्टा मारकर आगे बढ़ती है, फिर ये भी गर्म होकर ऊपर की उठ जाती है, और यह चक्र जारी रहता है।

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वायु-चक्रण (Spin) निर्मित होने का कारण:

वायु, सदैव उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब वाले क्षेत्रों की ओर प्रवाहित होती है। उच्च दाब क्षेत्रों का निर्माण ठंडे क्षेत्र में होता है, जबकि निम्न दाब की स्थिति उष्ण या गर्म क्षेत्रों में बनती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में सौर-प्रकाश की मात्रा उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों की तुलना में काफी कम होती है, अतः ये सामान्यतः उच्च दाब के क्षेत्र होते हैं। और इसीलिए वायु का संचरण प्रायः ध्रुवीय क्षेत्रों से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की ओर होता है।

  • इसके बाद, पृथ्वी की गति अपनी भूमिका अदा करती है, जोकि पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। पृथ्वी के अपनी धुरी पर परिक्रमा करने की वजह से, दोनों धुर्वों की ओर से बहने वाली हवा का उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में विक्षेपण होता है, क्योंकि गोलाकार होने के कारण पृथ्वी के घूर्णन की गति ध्रुवों की तुलना में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक होती है। आर्कटिक क्षेत्र से आने वाली हवा, दायीं ओर विक्षेपित हो जाती है तथा अंटार्कटिकक्षेत्र से चलने वाली हवा बायीं ओर विक्षेपित हो जाती है।
  • इस प्रकार, पहले से ही निश्चित दिशाओं में प्रवाहित हो रही वायु, जब किसी गर्म स्थान पर पहुँचने के पश्चात् ऊपर उठती है, तो रिक्त स्थान को भरने के लिए ठंडी हवा, केंद्र की ओर आकर्षित होने लगती है। केंद्र की ओर बढ़ते समय, ठंडी हवा विक्षेपित होती रहती है जिसके परिणामस्वरूप वायु-संचरण में परिवलन होने लगता है, और प्रक्रिया, चक्रवात के स्थल से टकराने तक जारी रहती है।

चक्रवात के स्थल से टकराने के पश्चात:

चक्रवात, स्थलीय क्षेत्रों पर पहुचने के बाद बिखर कर समाप्त हो जाता है, क्योंकि उष्ण जल के संपर्क में आने के कारण वायु गर्म होकर ऊपर उठती है और ठंडी वायु के लिए रिक्त स्थान बनाती है, किंतु स्थल पर इसका अभाव होता है। इसके अलावा, ऊपर उठने वाली आर्द्र हवा से बादलों का निर्माण का निर्माण होता है, जिससे चक्रवातों के दौरान तेज हवाओं के साथ तीव्र बारिश होती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ (World Meteorological Organisation- WMO) द्वारा चक्रवातों के नामों की क्रमिक सूची की देखरेख की जाती है। चक्रवातों का नामकरण किस प्रकार किया जाता?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. चक्रवातों के निर्माण के लिए उत्तरदायी कारक
  2. विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में चक्रवातों का नामकरण
  3. भारत के पूर्वी तट पर अधिक चक्रवात आने का कारण
  4. कोरिओलिस बल क्या है?
  5. संघनन की गुप्त ऊष्मा क्या है?

मेंस लिंक:

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के निर्माण के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

 भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और कार्टेलाइजेशन


(Competition Commission of India and Cartelisation)

संदर्भ:

पिछले हफ्ते, ‘भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग’ (Competition Commission of India – CCI) को एक जांच में, तीन बीयर कंपनियों द्वारा लगभग पूरे एक दशक के लिए – वर्ष 2009 और 2018 के बीच- बीयर की कीमतें तय करने हेतु मिलीभगत किए जाने का पता चला।

नतीजतन, ‘भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग’ ने 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बीयर की बिक्री और आपूर्ति में ‘व्यवसायी समूहन’ या कार्टेलाइज़ेशन (Cartelisation) करने के लिए इन कंपनियों पर 873 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।

‘कार्टेल’ या ‘उत्पादक-संघ’ क्या होता है?

‘भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग’ (CCI) के अनुसार, “कार्टेल (Cartel), उत्पादकों, विक्रेताओं, वितरकों, व्यापारियों या सेवा प्रदाताओं का एक संघ होता है, जो आपस में समझौते द्वारा, माल के उत्पादन, वितरण, बिक्री या मूल्य, व्यापार या सेवाओं को सीमित, नियंत्रित करने या नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं।

‘कार्टेल’ के तीन सामान्य घटक होते हैं: प्रतिस्पर्धियों के मध्य, प्रतिस्पर्धा को प्रतिबंधित करने के, लिए एक समझौता।

कार्टेल की विशेषताएं:

  • कार्टेल (उत्पादक-संघ) बनाने वाला समझौता, औपचारिक या लिखित नहीं होना चाहिए।
  • कार्टेल लगभग हमेशा ‘गुप्त षड्यंत्रों’ में शामिल होते हैं।
  • यहां, ‘प्रतिस्पर्धी कंपनियों’ का तात्पर्य, अर्थव्यवस्था के समान स्तर (निर्माता, वितरक, या खुदरा विक्रेता) पर माल की बिक्री करने या सेवाएं प्रदान करने के लिए एक दूसरे के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा करने वाली कंपनियों से होता है।

इन कार्टेल्स के कार्य:

  1. मूल्य निर्धारण
  2. आउटपुट प्रतिबंध
  3. बाजार आवंटन
  4. बोली प्रक्रिया में हेराफेरी

सरल शब्दों में, “हार्ड-कोर कार्टेल में प्रतिभागी, प्रतिस्पर्धी बाज़ार की मेहनत और कठिनता से खुद को बचाने के लिए, प्रतिस्पर्धा के स्थान पर ‘सहयोग’ करने के लिए सहमत होते हैं”।

कार्टेल द्वारा पेश की जाने वाली चुनौतियाँ:

  1. ये कार्टेल्स, न केवल उपभोक्ताओं को, बल्कि परोक्ष रूप से, समग्र आर्थिक दक्षता और नवाचारों को प्रभावित करते हैं।
  2. कार्टेल में शामिल कंपनियां, कृत्रिम रूप से आपूर्ति को रोककर या समन्वित तरीके से माल की कीमतें बढ़ाकर, या तो उपभोक्ताओं के लिए कुछ कमोडिटी (जैसे, बीयर) को और अधिक दुर्लभ बनाकर, बाजार से बाहर जाने (काले बाजार में खरीदने) पर मजबूर कर देती हैं या ज्यादा मुनाफा कमाती हैं। मुक्त प्रतिस्पर्धा में इस तरह के कार्य नहीं किए जा सकते।
  3. कार्टेल, अपने सदस्यों को बाजार की ताकतों से होने वाले जोखिम से पूरी तरह बचाते हैं और लागत को नियंत्रित करने तथा नवाचार करने के लिए, उन पर पड़ रहे दबाव को कम करते हैं।

 

कंपनियां ‘कार्टेलाइजेशन’ का सहारा क्यों लेती हैं?

कार्टेल बनाने के पीछे, कंपनियां मुख्य रूप से सरकारी नियमों को दोषी ठहराती हैं। सरकारी नियमों के अंतर्गत, कंपनियों को किसी भी मूल्य संशोधन के लिए राज्य के अधिकारियों से अनुमोदन लेना आवश्यक होता है।

‘भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग’ के बारे में:

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI), भारत सरकार का एक सांविधिक निकाय है। इसकी स्थापना प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम, 2002 (Competition Act, 2002) के तहत अधिनियम के प्रशासन, कार्यान्वयन और प्रवर्तन के लिए की गई थी और मार्च 2009 में इसका विधिवत गठन किया गया था। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।

प्रतिस्पर्धा आयोग के कार्य:

  1. भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का कार्य, प्रतिस्पर्द्धा पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले अभ्यासों को समाप्त करना, प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना और उसे जारी रखना, उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना तथा भारतीय बाज़ारों में व्यापार की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है।
  2. आयोग, किसी क़ानून के तहत स्थापित किसी सांविधिक प्राधिकरण से प्राप्त संदर्भ पर प्रतिस्पर्द्धा संबंधी विषयों पर परामर्श प्रदान करता है, तथा प्रतिस्पर्द्धा की भावना को संपोषित करता है।
  3. इसके अतिरिक्त, आयोग द्वारा सार्वजनिक जागरूकता पैदा करने संबंधी कार्य एवं प्रतिस्पर्द्धा के विषयों पर प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता है।

प्रतिस्पर्धा अधिनियम:

(The Competition Act)

राघवन समिति की सिफारिशों पर ‘एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार पद्धति अधिनियम’, 1969  (Monopolies and Restrictive Trade Practices Act, 1969) अर्थात MRTP एक्ट को निरस्त कर, इसके स्थान पर ‘प्रतिस्पर्धा अधिनियम’, 2002 लागू किया गया था।

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 का संशोधित स्वरूप ‘प्रतिस्पर्धा (संशोधन) अधिनियम’, 2007, प्रतिस्पर्धा-रोधी करारों, उद्यमों द्वारा प्रभावी स्थिति के दुरूपयोग का निषेध करता है तथा संयोजनों (अधिग्रहण, नियंत्रण तथा M&A की प्राप्ति) को विनियमित करता है; इन संयोजनों के कारण भारत में प्रतिस्पर्धा पर अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है अथवा उसके पड़ने की संभावना हो सकती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा नेटवर्क’ के बारे में जानते हैं? कार्टेल, बाजार में ‘एकाधिकार’ प्रणाली से भी बदतर कैसे हो सकते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के बारे में
  2. प्रतिस्पर्धा अधिनियम की मुख्य विशेषताएं और इसमें संशोधन।
  3. NCLT और उसके अधिकार क्षेत्र के बारे में
  4. कार्टेलाइजेशन क्या है?

मेंस लिंक:

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की भूमिकाओं और कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण और उसकी चुनौतियाँ।

 महाराष्ट्र में बहु-सदस्यीय वार्ड प्रणाली


संदर्भ:

हाल ही में, महाराष्ट्र मंत्रिमंडल ने मुंबई को छोड़कर राज्य के अन्य शहरी निकायों में बहु-सदस्यीय वार्ड (Multi-Member Wards) बनाए जाने की योजना को मंजूरी दी है।

  • इसके साथ ही, राज्य में मुंबई को छोड़कर, राज्य के अन्य सभी नगर निगमों और नगर परिषदों में हर वार्ड से कई पार्षदों या नगरसेवकों के चुनाव की प्रणाली वापस शुरू हो गयी है।
  • राज्य सरकार द्वारा यह संशोधन करने के लिए एक अध्यादेश जारी किया जाएगा।

महाराष्ट्र में प्रस्तावित प्रावधान:

इस नई व्यवस्था में, नगर निगम क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड में मतदाताओं द्वारा तीन सदस्यीय पैनल का चुनाव किया जाएगा।

  • नगर परिषद क्षेत्रों (Municipal Council Areas) में, मतदाता दो सदस्यों के पैनल का चुनाव करेंगे।
  • एकल सदस्यीय वार्ड प्रणाली में, एक मतदाता द्वारा केवल एक उम्मीदवार के लिए वोट दिया जाता है।

नई व्यवस्था में, वार्ड या पार्षदों की संख्या में कोई बदलाव नहीं होगा। वार्डों को केवल चुनाव के उद्देश्य से एक साथ समूहित किया जाएगा।

current affairs

बहु-सदस्यीय वार्ड व्यवस्था की कार्यपद्धति:

किसी एक निर्दिष्ट बहु-सदस्यीय वार्ड में, एक ही पार्टी या गठबंधन से चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति, दो या तीन वार्डों में प्रचार करेंगे, हालांकि वे अपना नामांकन केवल अपने वार्डों से ही दाखिल करेंगे।

  • निर्वाचित होने पर, प्रत्येक सदस्य केवल अपने वार्ड का ही प्रतिनिधित्व करेगा। हालांकि, मतदाता अपने स्वयं के वार्ड के साथ-साथ, बहु-सदस्यीय वार्ड में एक साथ शामिल किए गए अन्य वार्डों में भी उम्मीदवारों का चयन करने में सक्षम होंगे।
  • हालांकि, बहु-सदस्यीय वार्ड प्रणाली में एक ही पार्टी/गठबंधन के उम्मीदवारों को “पैनल” कहा जाएगा, किंतु मतदाता वास्तव में एक पैनल का चयन करने की बजाय, अकेले उम्मीदवार का ही चयन करता है, और ये उम्मीदवार एक ही पार्टी या विभिन्न दलों से भी हो सकते हैं।
  • मतदाता को केवल एक उम्मीदवार का चयन करने का भी अधिकार होता है। लेकिन इसके लिए मतदाता को बूथ के पीठासीन अधिकारी को लिखित में देना होगा। यह इस बात का दस्तावेजी सबूत होगा, कि यदि कोई पार्टी या उम्मीदवार, अदालत में यह सवाल करता है कि किसी उम्मीदवार को दूसरों की तुलना में कम वोट कैसे मिले।

बहु-सदस्यीय प्रणाली के लाभ:

  • यह प्रणाली, किसी पार्टी या गठबंधन को अपनी सीटों को अधिकतम करने में मदद करने जैसी प्रतीत होती है।
  • इस व्यवस्था में, कोई पार्टी, बहु-सदस्यीय वार्ड में कमजोर उम्मीदवारों को मजबूत उम्मीदवारों के साथ संतुलित कर सकती है।
  • हालांकि, इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है, लेकिन फिर भी उम्मीद की जाती है कि, सबसे मजबूत उम्मीदवार “पैनल” में दूसरों उम्मीदवारों के लिए जिताने में मदद कर सकता है।

संबंधित मुद्दे और चिंताएं:

आमतौर पर, बहु-सदस्यीय वार्ड में कोई भी पार्षद दूसरे सदस्यों को ठीक से काम नहीं करने देता है और सभी सदस्य एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते रहते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘म्यूनिसिपल परफॉर्मेंस इंडेक्स’ के बारे में सुना है? इसके बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

पीएम केयर्स


(PM-CARES)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को सूचित करते हुए कहा है, कि पीएम केयर्स (PM CARES) फंड “भारत सरकार का कोष नहीं है और इसकी राशि ‘भारत के समेकित कोष’ में शामिल नहीं की जाती है”।

पृष्ठभूमि:

केंद्र सरकार द्वारा यह हलफनामा, उच्च न्यायालय के समक्ष दायर एक याचिका के प्रत्युत्तर में दिया गया। उक्त याचिका में, PM CARES फंड को‘सूचना के अधिकार’ (RTI) अधिनियम के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ घोषित करने की मांग की गई थी।

सरकार द्वारा दिया गया जबाब:

भले ही, ‘न्यास’ (Trust) भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 की व्याख्या के भीतर एक “राज्य” या अन्य ‘प्राधिकरण’ समझा जाता है, और यह सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2[h], सामान्य रूप से अधिनियम की धारा 8 और उपबंध [e] और [j] में निहित प्रावधानों के तहत आता है, किंतु ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ के तहत, किसी तीसरे पक्ष की जानकारी का खुलासा करने की अनुमति नहीं है।

और, पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, ट्रस्ट द्वारा प्राप्त धन के उपयोग के विवरण के साथ, एक ऑडिट रिपोर्ट ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी कर दी जाती है।

PM-CARES के बारे में:

आपातकालीन स्थिति में प्रधान मंत्री नागरिक सहायता एवं राहत कोष (Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund : PM-CARES Fund) का गठन, कोविड-19  महामारी, और इसी प्रकार की अन्य आपात स्थितियों के दौरान, दान स्वीकार करने और राहत प्रदान करने के लिए किया गया था।

पीएम केयर्स फंड के बारे में:

  • PM CARES फंड की स्थापना 27 मार्च 2020 को ‘पंजीकरण अधिनियम, 1908’ के तहत एक धर्मार्थ ट्रस्ट के रूप में की गयी थी।
  • यह विदेशी अंशदान से से प्राप्त दान का लाभ उठा सकता है और इस निधि में दिया जाने वाला दान 100% कर-मुक्त होता है।
  • PM-CARES, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से अलग है।

फंड का प्रबंधन कौन करता है?

प्रधानमंत्री, PM CARES फंड के पदेन अध्यक्ष और रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री, भारत सरकार निधि के पदेन न्यासी होते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

आरटीआई के तहत ‘पब्लिक अथॉरिटी’ / ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ क्या है? इस बारे में जानने हेतु पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सार्वजनिक खाता क्या है?
  2. पीएम केयर फंड का प्रबंधन कौन करता है?
  3. आरटीआई अधिनियम के दायरे से किन संगठनों को छूट दी गई है?
  4. भारत की संचित निधि के बारे में
  5. ‘धर्मार्थ ट्रस्ट’ क्या है?
  6. एनडीआरएफ के बारे में

मेंस लिंक:

PM CARES फंड को आरटीआई अधिनियम के दायरे में क्यों लाया जाना चाहिए? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

डार्क एनर्जी


संदर्भ:

हाल ही में, शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने पहली बार प्रत्यक्ष ‘डार्क एनर्जी’ (Dark Energy) का पता लगाया है।

शोधकर्ताओं ने XENON1T प्रयोग करने के दौरान कुछ अप्रत्याशित परिणाम देखे और इसका कारण ‘डार्क एनर्जी’ होने की संभावना व्यक्त की।

‘डार्क एनर्जी’ क्या है?

अब तक जितना कुछ ज्ञात है उससे कही अधिक अज्ञात है। हम जानते हैं कि अंतरिक्ष में कितनी डार्क एनर्जी मौजूद है, क्योंकि हम जानते हैं कि यह ब्रह्मांड के विस्तार को किस प्रकार प्रभावित करती है। इसके अलावा, ‘डार्क एनर्जी’ एक पूर्ण रहस्य है। किंतु यह एक अति महत्वपूर्ण रहस्य है, क्योंकि ब्रह्मांड का लगभग 68% हिस्सा ‘डार्क एनर्जी’ से ही बना हुआ है।

  • ‘डार्क एनर्जी’ ऊर्जा का एक काल्पनिक रूप है, जो गुरुत्वाकर्षण के विपरीत व्यवहार करते हुए एक नकारात्मक, प्रतिकारक दबाव को दर्शाती है।
  • यह, हमारे ब्रह्मांड के विस्तार की दर को धीमा करने के बजाय समय के साथ तेज कर रही है, जोकि बिग बैंग से उत्पन्न हुए ब्रह्मांड से जो अपेक्षा की जा सकती है, उसके ठीक विपरीत है।

current affairs

‘डार्क एनर्जी’, डार्क मैटर से किस प्रकार भिन्न है?

हम जो कुछ भी देखते हैं – ग्रह, चंद्रमा, विशाल आकाशगंगाएँ – यह ब्रह्मांड का 5% से भी कम हिस्सा हैं। पूरे ब्रह्मांड में, लगभग 27% डार्क मैटर है और 68% डार्क एनर्जी है।

  • ‘डार्क मैटर’ (Dark Matter), आकाशगंगाओं को परस्पर आकर्षित करता है और एक साथ जोड़कर रखता है, और ‘डार्क एनर्जी’ हमारे ब्रह्मांड के विस्तार का कारण बनती है।
  • डार्क मैटर के अस्तित्व का संकेत 1920 के दशक में मिल गया था, जबकि ‘डार्क एनर्जी’ की खोज वर्ष 1998 तक नहीं हुई थी।

current affairs

XENON1T प्रयोग के बारे में:

यह विश्व का सबसे संवेदनशील ‘डार्क मैटर’ प्रयोग है, और इसे इटली की ‘INFN लेबोरेटोरी नाज़ियोनाली डेल ग्रान सासो’ (INFN Laboratori Nazionali del Gran Sasso) में भूमिगत रूप से काफी गहराई में संचालित किया जा रहा है।

इस प्रयोग में, दोहरे चरण (तरल/गैस) वाली ज़ीनान (XENON) तकनीक का उपयोग किया गया है।

सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत:

भौतिकी के प्रमुख सिद्धांतों में ‘डार्क एनर्जी’ को अंतरिक्ष का एक विशिष्ट गुण माना जाता है। ‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ यह समझने वाले पहले व्यक्ति थे कि अंतरिक्ष मात्र खाली जगह नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि, अंतरिक्ष का विस्तार होना भी जारी रह सकता है। अन्य वैज्ञानिकों के विचार में ब्रह्माण्ड स्थिर था, इसे देखते हुए, आइंस्टीन ने अपने ‘सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत’ (Theory of General Relativity) में,  ‘ब्रह्माण्ड संबंधी स्थिरांक’ को शामिल किया था।

  • हबल दूरबीन से ब्रह्मांड के विस्तारित होने की जानकारी मिलने के बाद, आइंस्टीन ने अपने ‘स्थिरांक’ को अपनी “सबसे बड़ी भूल” कहा।
  • लेकिन, आइंस्टीन की यह भूल ‘डार्क एनर्जी’ को समझने के लिए सबसे उपयुक्त हो सकती है। यह अनुमान लगाते हुए कि ‘रिक्त स्थान’ की भी अपनी ऊर्जा हो सकती है, आइंस्टीन के ‘स्थिरांक’ इंगित करता है कि जैसे-जैसे अंतरिक्ष का निर्माण होता जाता है, ब्रह्मांड में अधिक ऊर्जा जुड़ती जाएगी, और इसका विस्तार होता जाएगा।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप LUX-Zeplin और PandaX-xT प्रयोगों के बारे में जानते हैं? इनके बारे में जानने के लिए पढ़िए

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: आपदा और आपदा प्रबंधन।

चेन्नई की बाढ़ पर राज्य सरकार की रिपोर्ट


संदर्भ:

तमिलनाडु राज्य सरकार ने बाढ़ की पुनरावृत्ति को रोकने के उपायों के संबंध में सरकार द्वारा की गई कार्रवाई पर एक रिपोर्ट जारी की है।

यह रिपोर्ट ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण’ (NGT) द्वारा स्वत: संज्ञान लेकर मामला दर्ज किए जाने के प्रत्युत्तर में जारी की गयी है। अदालत ने, चेन्नई में सीवेज के अतिप्रवाह और शहर में व्यापक रूप से बाढ़ ग्रस्त  क्षेत्रों के बारे में विभिन्न अखबारों द्वारा रिपोर्ट किए जाने के बाद 30 नवंबर, 2020 को यह मामला दर्ज किया था।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

बाढ़ के कारण:

  • अतिक्रमण, दोषपूर्ण जल निकासी व्यवस्था और पानी के प्राकृतिक प्रवाह से छेड़छाड़ की वजह से महानगर को हर साल बाढ़ के खतरा का सामना करना पड़ता है।
  • ग्रेटर चेन्नई और इसके उपनगरीय क्षेत्रों के तेजी से शहरीकरण के कारण भूमि उपयोग के पैटर्न में बड़े पैमाने पर बदलाव आया है, कृषि क्षेत्रों में आवासीय संरचनाओं का निर्माण किया गया है।
  • पारंपरिक जलाशयों से अतिरिक्त पानी के प्रवाह और जलग्रहण क्षेत्रों से बाढ़ के पानी के प्रबंधन, हेतु उचित जल निकासी प्रणाली के लिए आवश्यक परिवर्तन किए बगैर ही ‘भूमि उपयोग पैटर्न में परिवर्तन’ किया गया है।
  • सिंचाई के लिए बनाए गए जलाशयों को कचरे, कीचड़ और मलबे से भर दिया गया है, जिससे बाढ़ के पानी का प्रवाह बाधित हुआ है। और इससे ‘दलदली भूमि’ की जल-अवशोषक और भूजल पुनर्भरण क्षमता भी कम हुई है।

सुझाए गए उपाय:

चेन्नई को बाढ़ से बचाने के लिए, अतिरिक्त वर्षा जल निकालने और नालों को गाद-मुक्त करने हेतु  उचित सुविधाओं के साथ एक ‘एकीकृत बाढ़ प्रबंधन प्रणाली’ तैयार किए जाने की आवश्यकता है।

रिपोर्ट में इस तरह की प्रणाली के भाग के रूप में, एकीकृत सड़कें और सड़क के किनारे तूफानी जल निकासी नेटवर्क’, सीधे कटाव वाले दिक्परिवर्ती जल-निकास वाहिकाओं, तूफानी जल की निकासी के लिए वृहत जल-वाहिकाएं, अवरोधक बाँध और बैराज बनाए जाने की सिफारिश की गई है।

भारत में शहरी बाढ़- एक सिंहावलोकन:

‘शहरी बाढ़’ (Urban flooding), एक निर्मित किए गए परिवेश में, विशेष रूप से अधिक घनी आबादी वाले क्षेत्रों में, वर्षा के कारण तूफानी-सीवर जैसी जल निकासी प्रणालियों की क्षमता पर अत्यधिक दबाव आपने की वजह से, भूमि या संपत्ति में जलभराव की घटना होती है।

कई भारतीय शहरों में, हाल के वर्षों में शहरी बाढ़, एक सामान्य घटना बन गई है।

अवैज्ञानिक शहरीकरण के कारण शहरी बाढ़:

प्राकृतिक कारक:

  1. बारिश में वृद्धि
  2. चक्रवाती तूफान और तड़ित वृष्टि
  3. तटवर्ती शहरों में उच्च ज्वार की घटनाएँ, जिससे जल निकासी में बाधा उत्पन्न होती है।

मानवजनित कारक:

  1. कंक्रीटी-करण
  2. आर्द्रभूमियों का नष्ट किया जाना
  3. जल और सीवरेज का खराब प्रबंधन
  4. अतिक्रमण और अवैध निर्माण
  5. वनों की कटाई

प्रशासनिक कारक:

  1. बाढ़ नियंत्रण उपायों का अभाव
  2. एक शहर में कई प्राधिकरण, किंतु जिम्मेदारी का अभाव

आवश्यक उपाय:

संरचनात्मक उपाय:

  1. शहरी क्षेत्रों में झीलों, तालाबों, नालों जैसी आर्द्रभूमियों का संरक्षण।
  2. जलाशयों में अतिरिक्त पानी की निकासी के लिए फुटपाथों, सड़कों के किनारे विशेषक ढलानों का निर्माण।
  3. तूफानी-जल निकासी व्यवस्था को मजबूत करना।
  4. हर साल 31 मार्च तक सभी प्रमुख नालों में ‘मानसून से पहले गाद-मुक्त करने का काम पूरा कर लिया जाना चाहिए।
  5. शहरी क्षेत्र के प्रत्येक भवन में भवन उपयोगिता के एक अभिन्न अंग के रूप में ‘वर्षा जल संचयन’ का निर्माण होना चाहिए।
  6. सार्वजनिक पार्कों की योजना में ‘रेन गार्डन’ की अवधारणा शामिल किए जाने, और बड़ी कॉलोनियों तथा अन्य विकसित किए जाने वाले स्थलों के लिए स्थानिक रूप से ‘तूफानी-जल प्रबंधन’ की आवश्यकता।
  7. तूफान-सीवरों में जाने वाले ठोस कचरे की मात्रा को कम करने के लिए ‘जल निकासी व्यवस्था’ में जाली, कचरा-श्रेणीकरण आदि जैसे उपयुक्त हस्तक्षेप किए जा सकते हैं।

गैर-संरचनात्मक उपाय:

  1. भारत के सभी शहरों में NDMA के अनुसार ‘राष्ट्रीय जल-मौसम विज्ञान’ नेटवर्क स्थापित किए जाने की आवश्यकता है।
  2. बाढ़ के खतरे का आकलन, भविष्य में तीव्रता के अनुमानित परिदृश्यों और वर्षा की अवधि और भूमि उपयोग परिवर्तन के आधार पर किया जाना चाहिए।
  3. वर्षा की घटनाओं का बेहतर पूर्वानुमान; जन-जन तक सूचना का समय पर प्रसार या रीयल-टाइम मौसम अपडेट की आवश्यकता।
  4. प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों में अतिक्रमण को प्रतिबंधित किए जाने; नदी तलों की निकासी, तटीय विनियमन क्षेत्र के नियमों का उचित कार्यान्वयन किए जाने की आवश्यकता।
  5. भवनों को ‘बाढ़ रोधक’ बनाए जाने संबंधी प्रावधान।
  6. शहरी वातावरण में अपशिष्ट जल और ठोस अपशिष्ट निपटान के लिए गुणवत्ता मानकों को लागू करके, तूफान-जल प्रदूषण नियंत्रण, अर्थात यानी स्रोत को नियंत्रित किया जाना चाहिए।

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


सामाजिक जवाबदेही कानून के लिए अभियान

राजस्थान में अगले विधानसभा सत्र में ‘सामाजिक जवाबदेही कानून’ (Social Accountability Law) पारित कराने की मांग को लेकर राज्यव्यापी अभियान शुरू हो गया है।

“सामाजिक जवाबदेही” का तात्पर्य नागरिक समूहों द्वारा सार्वजनिक अधिकारियों, राजनेताओं और सेवा प्रदाताओं को सेवाएं प्रदान करने, लोगों के कल्याण में सुधार और लोगों के अधिकारों की रक्षा के संदर्भ में उनके आचरण और प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए शुरू की गई कार्रवाइयों से है।


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