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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 21 September 2021

 

विषय सूची:

सामान्य अध्ययन-II

1. राष्ट्रीय सर्पदंश जागरूकता सम्मेलन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. आईपीओ ग्रे मार्केट

2. 5G तकनीक

3. तुर्की में ‘सी स्नोट’ का प्रकोप

4. ‘राज्य के खिलाफ अपराधों’ पर NCRB के आंकड़े

5. अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (ARSA) और रोहिंग्या संकट

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. समुद्र खीरा

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

राष्ट्रीय सर्पदंश जागरूकता सम्मेलन


(National Snakebite Awareness Summit)

संदर्भ:

हाल ही में, ‘एकीकृत स्वास्थ्य और कल्याण परिषद’ (Integrated Health and Wellbeing CouncilIHWC), नई दिल्ली द्वारा वर्चुअल मोड में ‘राष्ट्रीय सर्पदंश जागरूकता सम्मेलन’ (National Snakebite Awareness Summit) आयोजित किया गया था।

यह सम्मेलन, हर साल 19 सितंबर को मनाए जाने वाले ‘अंतर्राष्ट्रीय सर्पदंश जागरूकता दिवस’ (International Snakebite Awareness Day) की पूर्व संध्या पर आयोजित किया गया।

संबंधित प्रकरण:

भारत में सर्पदंश से होने वाली मौतों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ती जा रही है। व्यापक जागरूकता और स्वास्थ्य देखभाल सुलभ कराए जाने से, इससे होने वाली अधिकांश मौतों को रोका जा सकता है।

प्रायः सतही स्तर पर सर्पदंश के उपचार के लिए, प्रबंधन का कोई तंत्र मौजूद नहीं होता है – डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को सर्पदंश प्रबंधन सीखने की जरूरत है लेकिन अभी तक इसके लिए कोई मॉड्यूल उपलब्ध नहीं हैं।

आवश्यकता:

  • सर्पदंश के कारण गुर्दा फेल हो जाने की स्थिति में मरीजों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराए जाने हेतु ‘प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) से संबद्ध एक डायलिसिस केंद्र की स्थापना की जानी चाहिए।
  • सर्पदंश पीड़ितों के उपचार के लिए क्षेत्र-विशिष्ट उपचार प्रोटोकॉल और आवश्यकता पड़ने पर विष-रोधी इंजेक्शन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
  • इसके अलावा, इसके उपचार के लिए, पारंपरिक चिकित्सा और औषधीय पौधों के बारे में जानकारी रखने वाले जनजातीय चिकित्सकों को शामिल करने की आवश्यकता है।
  • सर्पदंश, अधिसूचित बीमारी (Notified Disease) घोषित की जानी चाहिए, जिससे फार्मा उद्योग इसके लिए सरल व आसान समाधान निर्मित कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए नीति निर्माताओं की सहायता की जरूरत होगी।
  • सर्पदंश के सर्वाधिक शिकार खेतों में माता-पिता के साथ काम करने वाले बच्चे, ग्रामीण और आदिवासी होते हैं, अतः स्थानीय स्तर पर व्यापक सर्वेक्षण करने की आवश्यकता है, इससे क्योंकि सर्पदंश को रोकने से समानता आएगी।

भारत में सर्पदंश के मामले:

  • वर्ष 2000 से 2019 तक 20 साल की अवधि में, देश में सर्पदंश से हर साल औसतन 58,000 मौतों के साथ कुल 2 मिलियन मौतें दर्ज की गईं।
  • इनमें से 97 प्रतिशत मौतें गांवों में हुईं और मरने वाले व्यक्तियों में आधे से अधिक पुरुष थे और उत्पादक- आयु वर्ग के थे।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सर्पदंश और उसके परिणामी विष को ‘उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों’ (Neglected Tropical Diseases) की अपनी प्राथमिकता सूची में शामिल कर लिया है। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

‘आईपीओ ग्रे मार्केट’


(IPO Grey Market)

संदर्भ:

हाल ही में, विभिन्न लेखों में ‘ग्रे मार्केट’ (Grey Market) का जिक्र किया जा रहा था। व्यापारी वर्ग ग्रे मार्केट के शेयरों में काफी रुचि रखता है, क्योंकि इस तरीके से उनके लिए, किसी कंपनी के शेयरों के सूचीबद्ध होने से पहले, उनकी कीमत में उतार-चढ़ाव का लाभ उठाने का अवसर मिल जाता है।

साथ ही, ‘ग्रे मार्केट’ की किसी भी गतिविधि को आमतौर पर उस दिशा के संकेतक के रूप में लिया जाता है, जिस दिशा में सूचीबद्ध होने के बाद स्टॉक की कीमत होगी। शेयरों के बाजार में जारी होने से पहले की कीमत का उपयोग, शेयरों की मांग का अनुमान लगाने के लिए किया जा सकता है।

‘आईपीओ ग्रे मार्केट’ क्या होती है?

आम तौर पर, जब कंपनियां अपनी वृद्धि को तेज करने के लिए धन जुटाना चाहती है, तो वे अपने स्टॉक का कुछ हिस्सा शेयर बाजार में बिक्री कर देती हैं। इस प्रक्रिया को ‘शुरुआती सार्वजनिक प्रस्ताव / पेशकश’ (Initial Public Offering) या ‘आईपीओ’ कहा जाता है।

  • लेकिन, आईपीओ ग्रे मार्केट’ (IPO grey market), ऐसी अनौपचारिक बाजार होती है, जिसमे ‘आईपीओ के शेयर या आवेदन, शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध होने से पहले खरीदे और बेचे जाते हैं।
  • इसे ‘समानांतर बाजार’ (Parallel Market) या ‘ओवर-द-काउंटर बाजार’ (Over-the-Counter Market) भी कहा जाता है।

इसकी वैधता एवं प्रशासन:

चूंकि ‘आईपीओ ग्रे मार्केट’ एक अनौपचारिक बाजार होती है, अतः स्वाभाविक है कि इसको विनियमित करने के लिए कोई नियम नहीं होते हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI), स्टॉक एक्सचेंज और दलालों की इसमें कोई भूमिका नहीं होती है। इनका खरीद-बिक्री, निजी तौर पर नकद रूप में होती है।

‘कोस्टक दर’ क्या है?

‘कोस्टक रेट’ (Kostak rate), आईपीओ आवेदन (IPO application) से संबंधित होती है। अतएव, किसी निवेशक द्वारा जिस दर पर, लिस्टिंग होने से पहले ‘आईपीओ आवेदन’ खरीदे जाते हैं, उसे ‘कोस्टक रेट’ या ‘कोस्टक दर’ कहा जाता है।

निवेशक ‘ग्रे मार्केट’ में व्यापर क्यों करते हैं?

  1. जब निवेशकों को लगता है, कि किसी कंपनी के शेयरों की कीमतों में वृद्धि होने वाली है, तो इनके लिए, कंपनी के सूचीबद्ध होने से पहले ही इसके शेयर खरीदने का यह एक उत्कृष्ट अवसर होता है।
  2. यदि कोई निवेशक, आईपीओ आवेदन के लिए निर्धारित समय सीमा से चूक जाता है या अधिक शेयर खरीदना चाहता है, तो वे आईपीओ ग्रे मार्केट में संपर्क कर सकता है।

इसमें कंपनियों के लिए क्या लाभ होता है?

  • कंपनियों के लिए, ग्रे मार्केट यह जानने का एक बढ़िया तरीका होती है, कि उनके शेयरों की मांग कैसी है और सूचीबद्ध होने के बाद कंपनी के शेयरों का प्रदर्शन कैसा हो सकता है।
  • इसके अलावा, एक ‘आईपीओ ग्रे मार्केट’ का इस्तेमाल, सूचीबद्ध होने के बाद कंपनी के स्टॉक के प्रदर्शन के बारे में जानने के लिए किया जा सकता है।

संबंधित चिंताएं:

आईपीओ ग्रे मार्केट, एक अनौपचारिक बाजार होती है, जो सेबी के अधिकार-क्षेत्र से बाहर संचालित होती है। अतः इसमें कोई गारंटी नहीं दी जाती हैं।

  • सभी लेन-देन, विश्वास और प्रतिपक्ष जोखिम (counterparty risk) के आधार पर किए जाते हैं।
  • इसलिए, स्टॉक टैंक हो जाने अर्थात स्टॉक के खराब प्रदर्शन करने पर पार्टियों के लिए बहुत कम कानूनी सुरक्षा उपलब्ध होती हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

अन्य शब्दावली:

क्या आप ‘ब्लैक मार्केट’ और ‘स्पॉट मार्केट’ में अंतर जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘आईपीओ’ क्या होते है?
  2. ‘सूचीबद्ध कंपनियां’ कौन सी होती हैं?
  3. प्राथमिक और द्वितीयक बाजार क्या हैं?
  4. सेबी के बारे में

मेंस लिंक:

भारत में ‘ग्रे मार्केट’ से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

5 जी टेक्नोलॉजी


(5G technology)

संदर्भ:

वोडाफोन आइडिया (Vi) ने महाराष्ट्र के पुणे में, किए गए एक हालिया परीक्षण में “मिलीमीटर वेव” (mmWave) स्पेक्ट्रम बैंड पर 3.7Gbps की चरम 5G डेटा गति प्राप्त करने का दावा किया है। गांधीनगर और पुणे में 3.5Ghz बैंड 5G ट्रायल नेटवर्क पर पीक डाउनलोड स्पीड 1.5Gbps तक की रही।

5G क्या है?

5G तकनीक, मोबाइल ब्रॉडबैंड की अगली पीढ़ी है। यह तकनीक अंततः 4G LTE कनेक्शन को प्रतिस्थापित करेगी या इसमें महत्वपूर्ण वृद्धि करेगी।

5G तकनीक की विशेषताएं और लाभ:

  1. यह तकनीक, ‘मिलीमीटर वेव स्पेक्ट्रम’ (30-300 गीगाहर्ट्ज़) पर कार्य करती है, जिसके द्वारा काफी बड़ी मात्रा में डेटा को बहुत तेज गति से भेजा जा सकता है।
  2. 5G तकनीक, तीन बैंड्स अर्थात् निम्न, मध्य और उच्च आवृत्ति स्पेक्ट्रम में काम करती है।
  3. मल्टी-जीबीपीएस ट्रान्सफर रेट तथा अत्याधिक कम विलंबता (ultra-low latency), 5G तकनीक, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ताकत का उपयोग करने वाली एप्लीकेशंस का समर्थन करेगी।
  4. 5G नेटवर्क की बढ़ी हुई क्षमता, लोड स्पाइक्स के प्रभाव को कम कर सकती है, जैसे कि खेल आयोजनों और समाचार कार्यक्रमों के दौरान होती है।

current affairs

 

प्रौद्योगिकी का महत्व:

भारत की राष्ट्रीय डिजिटल संचार नीति 2018 में 5G के महत्व पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें कहा गया है कि एक वृद्धिशील स्टार्ट-अप समुदाय सहित 5G, क्लाउड, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और डेटा एनालिटिक्स, अवसरों के एक नए क्षितिज को खोलने तथा डिजिटल जुड़ाव को तीव्र एवं गहन करने का वादा करता है।

5G से होने वाले संभावित स्वास्थ्य जोखिम:

  • आज तक, और बहुत सारे शोध किए जाने के बाद, वायरलेस तकनीकों के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के बारे में पता नहीं लगा है।
  • ‘ऊतक तापन’ (Tissue heating), रेडियोफ्रीक्वेंसी क्षेत्रों और मानव शरीर के बीच अंतःक्रिया का मुख्य तंत्र होता है। वर्तमान प्रौद्योगिकियों से रेडियोफ्रीक्वेंसी स्तर के संपर्क में आने से मानव शरीर के तापमान में नगण्य वृद्धि होती है।
  • जैसे-जैसे रेडियो आवृत्ति बढ़ती है, शरीर के ऊतकों में इसका प्रवेश कम होता जाता है और ऊर्जा का अवशोषण शरीर की सतह (त्वचा और आंख) तक सीमित हो जाता है।
  • यदि, समग्र रेडियोफ्रीक्वेंसी स्तर का संपर्क अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों से नीचे रहता है, तो, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कोई असर पड़ने की संभावना नहीं है।

‘अंतर्राष्ट्रीय एक्सपोजर दिशानिर्देश’ क्या हैं?

विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों हेतु एक्सपोजर दिशानिर्देश, दो अंतरराष्ट्रीय निकायों द्वारा तैयार किये जाते हैं। वर्तमान में इनके द्वारा सुझाए गए दिशानिर्देशों का कई देश पालन करते हैं:

  1. अंतर्राष्ट्रीय गैर-आयनीकरण विकिरण संरक्षण आयोग (International Commission on Non-Ionizing Radiation Protection)
  2. अंतर्राष्ट्रीय विद्युत चुम्बकीय सुरक्षा समिति के माध्यम से ‘विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स संस्थान’ (Institute of Electrical and Electronics Engineers)
  3. These guidelines are not technology-specific. They cover radiofrequencies up to 300 GHz, including the frequencies under discussion for 5G.

ये दिशानिर्देश, प्रौद्योगिकी-विशिष्ट नहीं होते हैं। इनके द्वारा 300 GHz तक की रेडियोफ्रीक्वेंसी को कवर किया जाता है, जिसमे 5G तकनीक संबंधी आवृत्तियां भी शामिल होती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय प्रयास– ‘अंतर्राष्ट्रीय विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र (EMF) परियोजना’:

WHO द्वारा वर्ष 1996 में एक ‘अंतर्राष्ट्रीय विद्युतचुंबकीय क्षेत्र’ (International Electromagnetic Fields -EMF) परियोजना की स्थापना की गई थी। यह परियोजना 0-300 गीगाहर्ट्ज़ आवृत्ति रेंज में बिजली और चुंबकीय क्षेत्रों के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की जांच करती है और EMF विकिरण संरक्षण पर राष्ट्रीय अधिकारियों को सलाह देती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘ऑर्थोगोनल फ़्रीक्वेंसी-डिवीज़न मल्टीप्लेक्सिंग’ (Orthogonal frequency-division multiplexing) के बारे में जानते हैं? (संक्षेप में पढ़ें) ।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. 5G क्या है?
  2. 3G, 4G और 5G के बीच अंतर।
  3. अनुप्रयोग
  4. ‘स्पेक्ट्रम’ क्या होता है?
  5. EMF परियोजना के बारे में।

मेंस लिंक:

5G तकनीक के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: बिजनेस स्टैंडर्ड।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

तुर्की में ‘सी स्‍नॉट’ का प्रकोप


(‘Sea Snot’ outbreak in Turkey)

संदर्भ:

इस साल की शुरुआत में, स्थलरुद्ध ‘मरमारा सागर’ में ‘सी स्‍नॉट’ (Sea Snot) का प्रकोप देखा गया था, जो वर्तमान में, इसकी सतह पर कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा है, लेकिन, विशेषज्ञों के लिए इसका नतीजा शुरू में अनुमानित परिणामों से कही अधिक बड़ा प्रतीत हो रहा है।

सी स्‍नॉट’ का प्रभाव:

  1. ‘मरमारा सागर’ में कुल मिलाकर, 60% प्रजातियां पहले ही इसके प्रभाव से गायब हो चुकी हैं।
  2. सी स्‍नॉट’ की परतें सतह के नीचे बैठ चुकी हैं और सड़ने लगी हैं।
  3. इन परतों के सड़ने / अपघटित होने से पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो रही है, जिसकी वजह से नए ‘समुद्री श्लेष्म’ की उत्पप्ति हो सकती है।
  4. अक्टूबर में ‘सी स्‍नॉट’ के फिर से प्रसार के लिए स्थितियां विशेष रूप से अनुकूल होंगी। इसलिए, नवंबर में फिर से ‘मरमारा सागर’ की सतह पर कीचड़ दिखाई दे सकता है।
  5. यह कीचड़ ‘काला सागर’ और ‘एजियन सागर’ में भी फैल सकता है और क्षेत्रीय पारिस्थितिक संकट का कारण बन सकती है।

पृष्ठभूमि:

कुछ समय पूर्व, काला सागर को एजियन सागर से जोड़ने वाले तुर्की के ‘मरमारा सागर’ में ‘सी स्‍नॉट’ (Sea Snot) का सबसे बड़ा प्रकोप देखा गया था। इस चिपचिपे पदार्थ को निकटवर्ती ‘काले सागर (ब्लैक सी) और एजियन सागर में भी देखा गया।

सी स्‍नॉट’ क्या है?

यह धूसर या हरे रंग की कीचड़ / पंक की एक चिपचिपी परत होती है, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को काफी नुकसान पहुंच सकता है।

  • यह, शैवालों में पोषक तत्वों की अति-प्रचुरता हो जाने पर निर्मित होती है।
  • तुर्की में ‘सी स्‍नॉट’ का प्रकोप पहली बार वर्ष 2007 में दर्ज किया गया था। उसी समय, ग्रीस के नजदीक एजियन सागर में भी ‘सी स्‍नॉट’ को देखा गया था।

शैवालों में पोषक तत्वों की अति-प्रचुरता, का कारण मुख्यतः वैश्विक उष्मन, जल प्रदूषण, घरेलू और औद्योगिक कचरे के समुद्र में अनियंत्रित निर्मोचन, आदि की वजह से होने वाला गर्म मौसम होता है।

प्रभाव एवं चिंताएं:

  • ‘सी स्‍नॉट’, समुद्र से होती हुई इस्तांबुल के दक्षिण में फ़ैल चुकी है, और इसने शहर के किनारे समुद्र तटों और बंदरगाहों को ढँक लिया है।
  • इसकी वजह से देश के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है- ‘सी स्‍नॉट’ के कारण बड़ी संख्या में मछलियों की मौत हो चुकी है, तथा मूंगा (कोरल) और स्पंज जैसे अन्य जलीय जीव भी मरते जा रहे हैं।
  • अगर इसे अनियंत्रित किया गया, तो यह समुद्री सतह के नीचे पहुँच कर समुद्र तल को ढक सकती है, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए व्यापक क्षति हो सकती है।
  • समय के साथ, यह मछलियों, केकड़ों, सीप (oysters), कौड़ी या मसल्स (mussels) और समुद्री सितारा मछलियों सहित सभी जलीय जीवों को विषाक्त बना सकती है।
  • जलीय जीवन के अलावा, ‘सी स्‍नॉट’ के प्रकोप से मछुआरों की आजीविका भी प्रभावित हो रही है।
  • इससे इस्तांबुल जैसे शहरों में हैजा जैसी जल-जनित बीमारियों का प्रकोप भी फ़ैल सकता है।

इसके प्रसार को रोकने हेतु तुर्की द्वारा उठाए जा रहे कदम:

  • तुर्की ने संपूर्ण मरमरा सागर को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने का फैसला किया है।
  • तटीय शहरों और जहाजों से होने वाले प्रदूषण को कम करने और अपशिष्ट जल-उपचार में सुधार हेतु कदम उठाए जा रहे हैं।
  • आपदा प्रबंधन योजना तैयार की जा रही है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि सभी शैवालीय प्रस्फुटन हानिकारक नहीं होते हैं,  बल्कि कुछ वास्तव में फायदेमंद भी हो सकते हैं। इसके बारे में आधिक जानकारी के लिए पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘सी स्‍नॉट’ क्या है?
  2. शैवालीय प्रस्फुटन क्या होते हैं?
  3. काला सागर के बारे में
  4. एजियन सागर के बारे में
  5. मरमारा का समुद्र कहाँ है?

मेंस लिंक:

‘सी स्‍नॉट’ की उत्पत्ति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: आंतरिक सुरक्षा के लिये चुनौती उत्पन्न करने वाले शासन विरोधी तत्त्वों की भूमिका।

राज्य के खिलाफ अपराधों’ पर NCRB के आंकड़े


(NCRB data on ‘Offences against State’)

संदर्भ:

‘राष्‍ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्‍यूरो’ (NCRB) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार:

  1. वर्ष 2020 में, ‘राज्य के खिलाफ अपराध’ के तहत सबसे ज्यादा मामले ‘मणिपुर, असम और उत्तर प्रदेश’ में दर्ज किए गए।
  2. हालांकि, वर्ष 2020 में दर्ज किए गए मामलों की कुल संख्या में, पिछले वर्ष की तुलना में कमी देखी गई। वर्ष 2020 में ‘राज्य के खिलाफ अपराध’ के तहत 5,613 मामले (कुल दर्ज मामलों का 26.7 प्रतिशत) दर्ज किए गए, जबकि वर्ष 2019 में ऐसे मामलों की संख्या 7,656 थी।
  3. 5,613 मामलों में से 4,524 मामले (80.6 प्रतिशत) ‘सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की रोकथाम अधिनियम’ (Prevention of Damage to Public Property Act) के तहत दर्ज किए गए। इसके बाद 796 मामले (14.2 प्रतिशत) ‘विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम’ (Unlawful Activities (Prevention) Act- UAPA) के तहत दर्ज किए गए।
  4. केंद्र शासित प्रदेशों में, दिल्ली में देशद्रोह के 5 मामले दर्ज किए गए।

‘राज्य के खिलाफ अपराध’ का तात्पर्य:

‘राज्य के खिलाफ अपराध’ (Offences against State) में राजद्रोह, ‘विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम’ (UAPA), आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, और राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक भाषण आदि के तहत दर्ज मामलों को शामिल किया जाता है।

आइए, राजद्रोह के बारे में जानें।

राजद्रोह’ (Sedition) क्या होता है?

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A के अनुसार, “किसी भी व्यक्ति के द्वारा, शब्दों द्वारा, लिखित अथवा बोलने के माध्यम से, अथवा संकेतों द्वारा, या दृश्य- प्रदर्शन द्वारा, या किसी अन्य तरीके से, विधि द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ, घृणा या अवमानना दिखाने, उत्तेजित होने अथवा उत्तेजना भड़काने का प्रयास करने पर उसे, आजीवन कारावास और साथ में जुर्माना, या तीन साल तक की कैद और साथ में जुर्माना, या मात्र जुर्माने का दंड दिया जा सकता है।

यथोचित परिभाषा की आवश्यकता:

राजद्रोह कानून लंबे समय से विवादों में रहा है। अक्सर सरकारों के ‘भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124-A कानून का उपयोग करने पर, उनकी नीतियों के मुखर आलोचकों द्वारा आलोचना की जाती है।

इसलिए, इस धारा को व्यक्तियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रतिबंध के रूप में देखा जाता है, और एक प्रकार से संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए जाने वाले उचित प्रतिबंधों संबंधी प्रावधानों के अंतर्गत आती है।

इस क़ानून को औपनिवेशिक ब्रिटिश शासकों द्वारा 1860 के दशक में लागू किया गया था, उस समय से लेकर आज तक यह क़ानून बहस का विषय रहा है। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू सहित स्वतंत्रता आंदोलन के कई शीर्ष नेताओं पर राजद्रोह कानून के तहत मामले दर्ज किए गए थे।

  1. महात्मा गांधी द्वारा इस क़ानून को “नागरिक की स्वतंत्रता का हनन करने हेतु तैयार की गई भारतीय दंड संहिता की राजनीतिक धाराओं का राजकुमार” बताया था।
  2. नेहरू ने इस कानून को “अत्यधिक आपत्तिजनक और निंदनीय” बताते हुए कहा, कि “हमारे द्वारा पारित किसी भी कानूनों प्रावधानों में इसे कोई जगह नहीं दी जानी चाहिए” और “जितनी जल्दी हम इससे छुटकारा पा लें उतना अच्छा है।”

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के प्रासंगिक फैसले:

केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य मामला (1962):

  1. आईपीसी की धारा 124A के तहत अपराधों से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान, उच्चतम न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य मामले (1962) में कुछ मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए थे।
  2. अदालत ने फैसला सुनाया था, कि सरकार के कार्यों की चाहें कितने भी कड़े शब्दों में नापसंदगी व्यक्त की जाए, यदि उसकी वजह से हिंसक कृत्यों द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था भंग नहीं होती है, तो उसे दंडनीय नहीं माना जाएगा।

बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य (1995) मामला:

  1. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था, कि केवल नारे लगाना, इस मामले में जैसे कि ‘खालिस्तान जिंदाबाद’, राजद्रोह नहीं है।

जाहिर है, राजद्रोह कानून को गलत तरीके से समझा जा रहा है और असहमति को दबाने के लिए इसका दुरुपयोग किया जा रहा है।

current affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि ‘के.एम. मुश्शी’ (K.M. Mushshi) संशोधन द्वारा संविधान से ‘राजद्रोह’ को हटा दिया था और सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से भारत में राजद्रोह कानून को किस प्रकार वापस लाया गया? इस बारे में जानने के लिए पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राजद्रोह को किस क़ानून के तहत परिभाषित किया गया है?
  2. आईपीसी की धारा 124A किससे संबंधित है?
  3. आईपीसी की धारा 153 किससे संबंधित है?
  4. इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के प्रासंगिक फैसले
  5. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19

मेंस लिंक:

भारत में राजद्रोह कानून लागू करने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ एवं उनका प्रबंधन- संगठित अपराध और आतंकवाद के बीच संबंध।

अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (ARSA) और रोहिंग्या संकट


संदर्भ:

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की जानकारी के अनुसार, ‘अराकान रोहिंग्या मुक्ति सेना’ (Arakan Rohingya Salvation Army – ARSA) और इसके पदाधिकारियों द्वारा देश में शरण लिए जाने की संभावना है।

ARSA क्या है?

‘अराकान रोहिंग्या मुक्ति सेना’ (ARSA) को पहले ‘हराका अल-याकिन’ (Harakah al-Yakin) या ‘फेथ मूवमेंट’ (Faith Movement) के नाम से जाना जाता था।

  • वर्तमान में यह म्यांमार और बांग्लादेश में, रोहिंग्या समुदाय के बीच सक्रिय है।
  • ARSA म्यांमार में रोहिंग्या आबादी के सरकार द्वारा छीने गए अधिकारों के लिए लड़ने का दावा करती है।

संबंधित प्रकरण:

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ‘रोहिंग्या समुदाय’ को इनके साथ व्यवस्थित तरीके से भेदभाव किए जाने के कारण “दुनिया में सबसे अधिक सताए गए अल्पसंख्यक” के रूप में वर्णित किया गया है। म्यांमार के सुरक्षा बलों द्वारा सामूहिक बलात्कार, यातना और हत्या जैसे भयानक कृत्य किए जाने का दावा करने वाले भारी संख्या में ‘रोहिंग्या समुदाय’ के लोग, म्यांमार से पलायन करने के बाद 2017 से पड़ोसी देशों में शरण मांग रहे हैं।

रोहिंग्या समुदाय के बारे में:

  1. रोहिंग्या, म्यांमार के कई जातीय अल्पसंख्यकों में से एक समुदाय है, जिसमे अधिकाँश आबादी मुस्लिम है। इस समुदाय के लोगों को म्यांमार द्वारा पूर्ण नागरिकता नहीं दी गई है।
  2. यह समुदाय मूल रूप से, एक देश-विहीन (स्टेटलेस), इंडो-आर्यन जातीय समूह हैं जो म्यांमार के रखाइन प्रांत में रहते हैं।
  3. इनकी अपनी भाषा और संस्कृति है और कहा जाता है, वे अरब व्यापारियों और अन्य समूहों के वंशज हैं, जो इस क्षेत्र में कई पीढ़ियों से बसे हुए हैं।
  4. वर्ष 2017 की शुरुआत में म्यांमार में ‘रोहिंग्या समुदाय के लोगों की संख्या लगभग एक मिलियन थी।
  5. अगस्त 2017 के बाद से लगभग 625,000 शरणार्थी रखाइन प्रांत से पलायन कर बांग्लादेश की सीमा में बस गए थे।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस द्वारा ‘रोहिंग्या समुदाय के लोगों को, विश्व में सर्वाधिक नहीं, तो सबसे अधिक भेदभाव किये जाने वाले लोगों में से एक, के रूप में वर्णित किया गया है।

अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के तहत रोहिंग्याओं को उपलब्ध सुरक्षा:

1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी अभिसमय और इसका प्रोटोकॉल 1967 (The 1951 Refugee Convention and its 1967 Protocol):

इसके अंतर्गत ‘शरणार्थी’ शब्द को परिभाषित किया गया है, तथा ‘शरणार्थियों’ के अधिकारों और शरण देने वाले राष्ट्रों की जिम्मेदारी को निर्धारित किया गया है।

  • इस अभिसमय का मूल सिद्धांत, ‘शरणार्थियों को उनके मूल-देश में वापस नहीं भेजे जाने’ (non-refoulement) से संबंधित है, जिसके अनुसार, अपने देश में होने वाले उत्पीड़न से बचने के लिए, किसी दूसरे देश में शरण मागने आये हुए व्यक्ति को वापस लौटने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए।
  • हालांकि, चिंता का विषय यह है कि बांग्लादेश इस समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।

नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्‍ट्रीय नियम‘ (International Covenant on Civil and Political Rights ICCPR):

  • भले ही शरणार्थी व्यक्ति शरण देने वाले देश में विदेशी होते हैं, किंतु उन्हें ‘नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्‍ट्रीय नियम’ (ICCPR), 1966 के अनुच्छेद 2 के आधार पर, नागरिकों के समान मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता, जैसेकि ‘कानून के समक्ष समानता का अधिकार’, ‘कानून का समान संरक्षण’ और ‘गैर-भेदभाव का अधिकार’ प्राप्त होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

विश्व के कुछ महत्वपूर्ण शरणार्थी संकटो के बारे में जानिए। इस बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. रोहिंग्या कौन हैं?
  2. रखाइन राज्य की अवस्थिति
  3. अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) बनाम अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय
  4. आईसीसीपीआर के बारे में
  5. 1951 का संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी अभिसमय

मेंस लिंक:

रोहिंग्या संकट पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


समुद्र खीरा

(Sea cucumber)

भारत में ‘समुद्री खीरे’ (Sea cucumber) ‘वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972’ की अनुसूची I के तहत सूचीबद्ध एक ‘लुप्तप्राय’ (Endangered) प्रजाति के रूप में माना जाता है।

  • समुद्र खीरा, एक अकशेरूकीय समुद्री जीव है, जो आमतौर पर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में समुद्री तल पर पाया जाता है। मोटे खीरे की तरह दिखने वाले, इनके असामान्य लंबोतर आकार, की वजह से इनका नाम समुद्र खीरा रखा गया है।
  • ये जीव ‘प्रवाल पारिस्थितिकी तंत्र’ (coral ecosystem) का एक अभिन्न अंग होते हैं क्योंकि समुद्री खीरा चयापचय के बाद मुख्य उपोत्पाद के रूप में कैल्शियम कार्बोनेट मुक्त करता है, जो कि प्रवाल भित्तियों के अस्तित्व के लिये आवश्यक होता है।
  • ‘समुद्री खीरे’, सागरीय जगत के अपशिष्ट संग्रहकर्त्ता के रूप में कार्य करते हैं और पोषक तत्त्वों को पुन: चक्रित करते हैं, इस प्रकार ये प्रवाल भित्तियों को अनुकूल स्थिति में रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • चीन और दक्षिण पूर्व एशिया में समुद्री खीरे की अत्यधिक मांग है।
  • मुख्य रूप से रामनाथपुरम और तूतीकोरिन जिलों से मछली पकड़ने के जहाजों में तमिलनाडु से श्रीलंका तक इनकी तस्करी की जाती है।

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