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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 28 August 2021

 

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-III

1. राष्ट्रिक स्‍वर्ण बॉण्‍ड योजना

2. तीन विशाल कृष्ण-विवरों का विलय

3. ‘दीपोर बील वन्यजीव अभ्यारण्य’ का पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र

4. ‘जीवों की खोज’ 2020

5. पंजाब सरकार द्वारा ‘पराली’ के उपयोग करने पर उद्योगों को प्रोत्साहन

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

 राष्ट्रिक स्‍वर्ण बॉण्‍ड योजना


(Sovereign Gold Bond Scheme)

संदर्भ:

हाल ही में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा ने ‘राष्ट्रिक स्‍वर्ण बॉण्‍ड योजना’ / सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड स्कीम (Sovereign Gold Bond Scheme) 2021-22 छठी श्रंखला की घोषणा की गई है। इस योजना के अंतर्गत स्वर्ण बॉण्‍ड का सब्स्क्रिप्शन 30 अगस्त से 3 सितंबर, 2021 तक किया जा सकेगा।

‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना’ के बारे में:

भारत सरकार द्वारा ‘राष्ट्रिक स्‍वर्ण बॉण्‍ड’ (सॉवरेन गोल्ड बांड) की शुरुआत वर्ष 2015 में की गई थी।

  • सरकार ने स्‍वर्ण के आयात पर भारत की अधिक निर्भरता को कम करने में मदद करने हेतु इन बांडों को शुरू किया था।
  • इस कदम का उद्देश्य, अपनी बचत को ‘स्वर्ण के भौतिक रूप से जमा करने’ संबंधी भारतीयों की आदत को ‘सॉवरेन प्रतिभूति के दस्तावेजों’ में जमा करने की प्रवृत्ति में बदलना था।

महत्वपूर्ण तथ्य:

पात्रता: सॉवरेन गोल्ड बांड की बिक्री ‘निवासी भारतीय व्‍यक्तियों, हिंदू अविभक्‍त परिवार (HUFs), ट्रस्‍ट, विश्‍वविद्यालय, धर्मार्थ संस्‍थाओं आदि तक ही सीमित रहेगी।

मूल्यवर्ग और अवधि: सॉवरेन गोल्ड बांडों को 1 ग्राम की मूल इकाई के साथ सोने के ‘ग्राम’ के गुणकों में मूल्यांकित किया जाएगा। इनकी समयावधि 8 वर्ष की होगी और पाँचवें साल के पश्चात इससे बाहर निकलने का विकल्प‍ रहेगा, जिसका इस्‍तेमाल ब्‍याज भुगतान की तिथियों पर किया जा सकता है।

न्यूनतम और अधिकतम सीमा: बॉण्‍ड एक ग्राम स्‍वर्ण के मूल्‍यवर्ग में तथा उसके गुणजों में होता है। निवेश की न्‍यूनतम सीमा एक ग्राम तथा अधिकतम सीमा प्रति वर्ष (अप्रैल – मार्च) में प्रत्यके व्यक्ति/ हिंदू अविभक्त परिवार के लिए 4 किलोग्राम और ट्रस्ट तथा भारत सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित समान संस्थाओं के लिए 20 किलोग्राम है।

संयुक्‍त खरीद: यदि बॉण्‍ड संयुक्‍त रूप से खरीदे जाते हैं, तो अधिकतम 4 किलोग्राम की सीमा पहले आवेदक पर ही लागू होगी।

वार्षिक उच्चतम सीमा में सरकार द्वारा पहले विभिन्न श्रृंखलाओं में जारी बॉण्‍ड और माध्यमिक बाजार से खरीदे जाने वाले बॉण्‍ड शामिल होंगे। निवेश की सीमा में बैंक या वित्तीय संस्था द्वारा जमानत के रूप में धारित बॉण्ड को शामिल नहीं किया जाएगा।

संपार्श्विक (Collateral): इन प्रतिभूतियों का उपयोग बैंकों, वित्‍तीय संस्‍थानों तथा गैर-बैंकिंग वित्‍तीय संस्‍थानों से ऋण लेने के लिए जमानत / संपार्श्विक (Collateral) के रूप में किया जा सकता है। ऋण और मूल्‍य का अनुपात वही होगा जो सामान्‍य स्‍वर्ण ऋण के मामले में रिज़र्व बैंक द्वारा समय-समय पर जारी निदेशानुसार होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड’ और ‘गोल्ड ईटीएफ’ (Exchange Traded Fund) के मध्य अंतर जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना’ के लिए पात्रता?
  2. क्या उन्हें संपार्श्विक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है?
  3. न्यूनतम और अधिकतम अनुमेय सीमा क्या है?
  4. ये बांड कौन जारी कर सकता है?

मेंस लिंक:

‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड योजना’ की प्रमुख विशेषताओं और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

तीन विशाल कृष्ण-विवरों का विलय


(Merger of three jumbo black holes)

संदर्भ:

हाल ही में, भारत में खगोल भौतिकीविदों की एक टीम ने तीन महा-विशाल कृष्ण-विवरों / ब्लैक होल्स (Black Holes) के परस्पर विलय होने की दुर्लभ घटना का पता लगाया है।

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • परस्पर विलय होने वाले तीनों ब्लैक होल ‘टूकेन तारामंडल’ (Toucan constellation) में स्थित आकाशगंगाओं का भाग थे।
  • यह खोज, भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला ‘एस्ट्रोसैट’ (ASTROSAT) पर लगे ‘पराबैंगनी इमेजिंग टेलीस्कोप’ (UltraViolet Imaging Telescope- UVIT), चिली में स्थापित ‘वेरी लार्ज टेलीस्कोप’ (VLT) पर लगे MUSE नामक ‘यूरोपीय इंटीग्रल फील्ड ऑप्टिकल टेलीस्कोप’ और दक्षिण अफ्रीका में स्थापित ‘इंफ्रारेड इमेज फ्रॉम ऑप्टिकल टेलीस्कोप’ (IRSF) से प्राप्त डेटा का उपयोग करके की गयी थी।

इस खोज से प्राप्त महत्वपूर्ण सीख: तीसरे ब्लैक होल की उपस्थिति, ‘अंतिम पारसेक समस्या’ (Parsec Problem) का समाधान करती है।

‘अंतिम पारसेक समस्या’ क्या है?

जब दो आकाशगंगाएँ परस्पर टकराती हैं, तो उनके ब्लैक होल्स की गतिज ऊर्जा आसपास की गैस में स्थानांतरित हो जाती है, और वे भी एक दूसरे के करीब आ जाते हैं।

समय के साथ ब्लैक होल्स के बीच की दूरी, लगभग ‘एक पारसेक’ (3.26 प्रकाश-वर्ष) रह जाने तक, घटती जाती है। इसके बाद दोनों ब्लैक होल, एक दूसरे के और अधिक करीब आने और परस्पर विलय होने के लिए और गतिज ऊर्जा खोने में असमर्थ हो जाते हैं। इसे ही ‘अंतिम पारसेक समस्या’ (Final Parsec Problem) के रूप में जाना जाता है।

तीसरे ब्लैक होल की उपस्थिति इस समस्या का किस प्रकार समाधान करती है?

तीसरे ब्लैक होल की उपस्थिति इस समस्या को हल कर सकती है। जब कोई अन्य ब्लैक होल या कोई तारा, नजदीक आते दो ब्लैक होल्स के करीब से होकर गुजरता है, तो वह दोनों ब्लैक होल्स के संयुक्त ‘कोणीय संवेग’ (Angular Momentum) का कुछ अंश अपनी ओर खींच लेता है, जिसकी वजह से दोनों ब्लैक होल्स एक दूसरे के करीब आ सकते हैं, और इस प्रकार, दोनों ब्लैक होल्स, तीसरे ब्लैक होल की उपस्थिति में परस्पर एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं।

इस खोज का महत्व:

अतीत में कई ‘सक्रिय आकाशगंगा केंद्रों’ / ‘सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक’ (Active Galactic Nuclei – AGN), अर्थात आकाशगंगा के केंद्र में स्थित महा-विशाल ब्लैक होल, युग्मों का पता लगाया गया जा चुका है, लेकिन ट्रिपल एजीएन (triple AGN) अत्यंत दुर्लभ घटना हैं। एक्स-रे प्रेक्षणों का उपयोग किए जाने से पहले मात्र कुछ ‘सक्रिय आकाशगंगा केंद्रों’ का ही पता चल सका था।

ब्लैक होल/ कृष्ण विवर क्या होते है?

ब्लैक होल अंतरिक्ष में पाए जाने ऐसे पिंड होते है, जिनका घनत्व तथा गुरुत्वाकर्षण बहुत अधिक होता है। अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण, कोई भी पदार्थ अथवा प्रकाश इनके खिंचाव से बच नहीं सकता है। चूंकि,प्रकाश इनसे होकर नहीं गुजर पाता है, इसीलिये यह काले और अदृश्य होते है।

  • ब्लैक होल के किनारे पर स्थित सीमा को ‘घटना दिक मण्डल’ (Event Horizon) कहा जाता है। इस सीमा के आगे जाने पर कोई भी प्रकाश या पदार्थ वापस नहीं लौट सकता, और उसे ब्लैक होल द्वारा खींच लिया जाता है। इससे गुजरने के लिए, पदार्थ की गति ‘प्रकाश की गति’ से तीव्र होनी चाहिए, जो कि असंभव होती है।
  • ‘घटना दिक मण्डल’ को पार करने वाला कोई भी पदार्थ अतवा प्रकाश ब्लैक होल के केंद्र में समाहित होकर अनंत घनत्व वाले एक बिंदु में संकुचित हो जाता है, जिसे सिंगलुरिटी (singularity) कहा जाता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

आकाशगंगाओं के केंद्रों पर महा-विशाल ब्लैकहोल पाए जाते हैं, जो आकार में कई मिलियन सौर-पिंडो के बराबर होते हैं। इनके लिए ‘सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक’ (Active Galactic Nuclei) के रूप में जाना जाता है। इनके बारे में अधिक जानने हेतु पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सामान्य सापेक्षता सिद्धांत (general theory of relativity) के बारे में।
  2. पहली गुरुत्वाकर्षण तरंग का पता कब लगाया गया था?
  3. LIGO- मिशन के उद्देश्य, वेधशालाएँ और वित्त पोषण।
  4. ब्लैक होल के संदर्भ में ‘घटना दिक मण्डल’ क्या हैं?
  5. LIGO इंडिया- प्रस्तावित स्थल, साझेदार और उद्देश्य।
  6. विर्गो डिटेक्टर कहाँ स्थित है?

मेंस लिंक:

लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO) डिटेक्टर के निष्कर्षों के महत्व तथा इसके अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

 ‘दीपोर बील वन्यजीव अभ्यारण्य’ का पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र


संदर्भ:

हाल ही में, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा गुवाहाटी के दक्षिण-पश्चिमी किनारे पर स्थित ‘दीपोर बील वन्यजीव अभ्यारण्य’ (Deepor Beel Wildlife Sanctuary) का  ‘पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र’ या इको-सेंसिटिव ज़ोन (Eco-Sensitive Zone – ESZ) अधिसूचित कर दिया गया है।

मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में एक क्षेत्र को, जिसकी सीमा 294 मीटर से लेकर 16.32 किमी तक हो सकती है, को ‘पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र’ (ESZ) के रूप में निर्दिष्ट किया गया है, और इसका कुल क्षेत्रफल 148.9767 वर्ग किमी है।

आवश्यकता:

‘दीपोर बील’ आर्द्रभूमि पर दशकों से, इसके दक्षिणी भाग से गुजरने वाले ‘रेलवे ट्रैक’ (जिसको ‘दोहरी लाइन’ और विद्युतीकृत किया जाना प्रस्तावित है), कचरा फेके जाने तथा मानव आबादी और  वाणिज्यिक इकाइयों से अतिक्रमण का खतरा मंडरा रहा है।

नवीनतम निर्णय के निहितार्थ:

  1. पारिस्थितिक पर्यटन गतिविधियों के लिए छोटे अस्थायी अवसंरचनाओं को छोड़कर, संरक्षित क्षेत्र की सीमा के 1 किमी के भीतर या पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र की सीमा तक, जो भी निकट हो, किसी भी नए वाणिज्यिक होटल और रिसॉर्ट का निर्माण करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
  2. पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र में, जलविद्युत परियोजनाओं, ईंट भट्टों, जलाऊ लकड़ी का व्यावसायिक उपयोग और प्राकृतिक जल निकायों या भूमि क्षेत्रों में अनुपचारित अपशिष्ट का निस्सरण आदि गतिविधियों को निषिद्ध किया गया है।

‘दीपोर बील’ के बारे में:

  • ‘दीपोर बील’ (Deepor Beel) असम की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में से एक है और एक महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र होने के अलावा, राज्य का एकमात्र ‘रामसर स्थल’ है।
  • यह ब्रह्मपुत्र नदी मुख्य धारा के दक्षिण में, और ब्रह्मपुत्र की एक पुरानी धारा में स्थित मीठे पानी की स्थायी झील है।

इस आर्द्रभूमि को सुरक्षा की आवश्यकता:

  • ‘दीपोर बील’ आर्द्रभूमि, जलीय वनस्पतियों और उड़ने वाले जीवों के लिए एक अद्वितीय निवास स्थान है।
  • अभयारण्य में पक्षियों की लगभग 150 प्रजातियां पायी जाती हैं, जिनमें से दो प्रजातियां गंभीर रूप से संकटग्रस्त, एक लुप्तप्राय, पांच संवेदनशील और चार लगभग संकटग्रस्त प्रजातियां हैं।
  • ‘दीपोर बील’ आर्द्रभूमि में निकटवर्ती ‘रानी आरक्षित वन’ और गरभंगा आरक्षित वनों’ से हाथियों का आवागमन होता रहता है, और यह आर्द्रभूमि हाथी के आवास का एक अभिन्न अंग है।
  • इनके अलावा, अभयारण्य में सरीसृपों की 12 प्रजातियां, मछलियों की 50 प्रजातियां, उभयचरों की छह प्रजातियां और जलीय सूक्ष्म-जीवों की 155 प्रजातियां दर्ज की गई हैं।

‘पारिस्थितिक-संवेदनशील क्षेत्र’ (ESZ) क्या होते हैं?

  1. इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) अथवा पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Fragile Areas- EFAs), संरक्षित क्षेत्रों, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा अधिसूचित क्षेत्र होते हैं।
  2. किसी क्षेत्र को ‘पारिस्थितिक-संवेदनशील क्षेत्र’ (ESZ) घोषित करने का उद्देश्य, इन क्षेत्रों में गतिविधियों को विनियमित और प्रबंधित करके संरक्षित क्षेत्रों में एक प्रकार का ‘आघात-अवशोषक’ (shock absorbers) बनाना होता है।
  3. ये क्षेत्र, उच्च-संरक्षित क्षेत्रों तथा निम्न संरक्षित वाले क्षेत्रों के मध्य एक संक्रमण क्षेत्र के रूप में भी कार्य करते हैं।
  4. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 में “इको-सेंसिटिव जोन” शब्द का उल्लेख नहीं है।
  5. वन्यजीव संरक्षण रणनीति, 2002 के अनुसार, किसी संरक्षित क्षेत्र के आसपास 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र को एक ESZ घोषित किया जा सकता है।
  6. इसके अलावा, जहां संवेदनशील गलियारे, कनेक्टिविटी और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण भाग, परिदृश्य शृंखला के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र, 10 किमी के क्षेत्र से आगे स्थित हैं, तो इन क्षेत्रों को भी ESZ में शामिल किया जा सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

हाल ही में, भारत की चार और आर्द्रभूमियों (Wetlands) को ‘रामसर अभिसमय’ (Ramsar Convention) के तहत अंतरराष्ट्रीय महत्व के आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता दी गई है। इनके बारे में जानिए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र’ किस प्रकार घोषित किया जाता है?
  2. ESZ की सीमा
  3. वायनाड वन्यजीव अभयारण्य के बारे में
  4. नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व के बारे में

मेंस लिंक:

संरक्षित क्षेत्रों के आसपास ‘पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र’ की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

‘जीवों की खोज’ 2020


(Animal Discoveries 2020)

संदर्भ:

‘जीवों की खोज’ 2020 (Animal Discoveries 2020), हाल ही में ‘भारतीय प्राणी सर्वेक्षण’ / ‘जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ (ZSI) द्वारा प्रकाशित एक दस्तावेज है।

  • इसके अनुसार, वर्ष 2020 में भारत के प्राणी-जगत में 557 नई प्रविष्टियों को जोड़ा गया है, जिसमें 407 नई प्रजातियां और 150 नए रिकॉर्ड शामिल हैं।
  • अब, भारत में जीव-प्रजातियों की संख्या बढ़कर 1,02,718 हो गई है।

शामिल की गईं महत्वपूर्ण प्रजातियां:

  1. ट्राइमेरेसुरस सालाजार (Trimeresurus Salazar), अरुणाचल प्रदेश में खोजे गए ‘ग्रीन पिट वाइपर’ की एक नई प्रजाति;
  2. लाइकोडोन डेक्कनेंसिस (Lycodon deccanensis), कर्नाटक से खोजा गया ‘डक्कन वुल्फ सांप’;
  3. स्पैरोथेका बेंगलुरु (Sphaerotheca Bengaluru), बेंगलुरू शहर के नाम पर बिल में रहने वाले मेंढक की एक नई प्रजाति।
  4. ऐक्सरिअस अन्जालाई (Xyrias anjaalai), केरल में खोजी गई, गहरे पानी में पाई जाने वाले ‘स्नेक ईल’ की एक नई प्रजाति;
  5. ग्लायप्तोहोराक्स गिउडीक्येंसिस (Glyptohorax giudikyensis), मणिपुर में खोजी गई, कैटफ़िश की एक नई प्रजाति;
  6. क्लाइस्टर गैलाटेन्सिस (Clyster galateansis), ग्रेट निकोबार बायोस्फीयर से ‘स्कारब बीटल’ की एक नई प्रजाति।
  7. मायोटिस सीएफ फ्रेटर (Myotis cf. frater), एक चमगादड़ की प्रजाति जिसे पहले चीन, ताइवान और रूस में देखा गया था, पहली बार भारत के उत्तराखंड से देखी गई है;
  8. ज़ूथेरा सिट्रिना गिब्सनहिली (Zoothera citrina gibsonhilli), एक नारंगी सिर वाली सारिका (thrush), जिसे पहले दक्षिणी म्यांमार से लेकर दक्षिण थाईलैंड (मध्य मलय प्रायद्वीप) के क्षेत्रों में देखा जाता था, भारत से पहली बार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में नारकोंडम द्वीप में देखा गया है।

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण:

  • ‘भारतीय प्राणी सर्वेक्षण’ / ‘जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ (Zoological Survey of India – ZSI), पर्यावरण और वन मंत्रालय के अधीन एक संगठन है, इसे वर्ष 1916 में स्थापित किया गया था।
  • यह देश की असाधारण रूप से समृद्ध जैव विविधता पर जानकारी बढ़ाने हेतु जैव संसाधनों के सर्वेक्षण और अन्वेषण के लिए ‘एक राष्ट्रीय केंद्र’ है।
  • इसका मुख्यालय कोलकाता में है और इसके देश के विभिन्न भागों 16 क्षेत्रीय कार्यालय स्थित हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप, वन्यजीव आवासों के एकीकृत विकास (Integrated Development of Wildlife Habitats– IDWH) कार्यक्रम के तीन घटकों में से एक ‘प्रजाति रिकवरी कार्यक्रम’ के बारे में जानते हैं?

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

पंजाब सरकार द्वारा ‘पराली’ के उपयोग करने पर उद्योगों को प्रोत्साहन


संदर्भ:

हाल ही में, पंजाब सरकार द्वारा धान के मौसम में पराली जलाने की समस्या पर रोक लगाने हेतु कई उपायों की घोषणा की गयी है।

प्रमुख बिंदु:

  1. ‘वित्तीय प्रोत्साहन हासिल करने के लिए, कुछ श्रेणियों के उद्योगों को धान-पुआल से चलने वाले बॉयलर स्थापित करने की अनुमति दी गई है।
  2. ‘पहले आओ पहले पाओ’ के आधार पर, पहले 50 मौजूदा उद्योगों को बॉयलरों में ईंधन के रूप में धान की पुआल का उपयोग करने के लिए ₹25 करोड़ का संचयी वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जायेगा।
  3. गैर-राजकोषीय प्रोत्साहन के तौर पर उद्योगों को, धान की पराली के भंडारण हेतु 33 वर्ष तक के लीज समझौते के साथ ‘पंचायत’ भूमि उपलब्ध कराई जाएगी।
  4. जिन क्षेत्रों में बॉयलर में धान के पुआल का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है, वहां प्राथमिकता के आधार पर बेलर (प्रवाहक) उपलब्ध कराए जाएंगे।

महत्व:

राज्य सरकार के इस निर्णय से, खरीफ फसलों की कटाई के दौरान पराली जलाने के खतरे से निपटने में मदद मिलेगी और इससे मिट्टी की उर्वरता को भी संरक्षित किया जा सकेगा और लाभकारी सूक्ष्म जीवों को भी बचाया जा सकेगा।

पराली दहन’ (stubble Burning) क्या है?

किसानों द्वारा नवंबर में गेहूं की बुवाई के लिए खेत तैयार करने के दौरान ‘पराली दहन’ या पराली जलाना, एक आम बात है, क्योंकि धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच बहुत कम समय बचता है।

प्रभाव: पराली जलाने से हानिकारक गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के साथ-साथ पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन होता है।

किसानों द्वारा ‘पराली जलाने’ का विकल्प चुनने का कारण:

  1. किसानों के पास, पराली का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के विकल्प नहीं होते हैं।
  2. किसान, इस कृषि-अपशिष्ट से निपटने में अक्षम होते हैं क्योंकि वे अपशिष्ट पदार्थो का निपटान करने के लिए उपलब्ध नई तकनीक को वहन नहीं कर सकते।
  3. बहुधा, फसल खराब होने जाने की वजह से किसान की आय पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, ऐसी स्थिति में किसान लागत में कटौती करने और पराली प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकों पर खर्च करने की बजाय, खेत में ही पराली जलाने का विकल्प चुनता है।

पराली जलाने के फायदे:

  • इससे खेत, जल्दी साफ हो जाता है और यह सबसे सस्ता विकल्प है।
  • खरपतवार नाशकों सहित खरपतवारों को नष्ट हो जाते हैं।
  • सुंडिया और अन्य कीट मर जाते हैं।
  • नाइट्रोजन बंध दुर्बल हो जाते हैं।

पराली जलाने के प्रभाव:

  • प्रदूषण: खुले में पराली जलाने से वातावरण में बड़ी मात्रा में जहरीले प्रदूषक उत्सर्जित होते हैं जिनमें मीथेन (CH4), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOC) और कार्सिनोजेनिक पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसी हानिकारक गैसें होती हैं। अंततः ये स्मॉग का कारण बन जाते हैं।
  • मृदा उर्वरता: पराली को खेत में जलाने से मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे यह कम उपजाऊ हो जाती है।
  • ऊष्मा का प्रवेश: पराली जलाने से उत्पन्न गर्मी मिट्टी में प्रवेश करती है, जिससे जमीन में नमी और लाभकारी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।

पराली जलाने से बचने हेतु वैकल्पिक उपाय:

  1. धान की पुआल आधारित बिजली संयंत्रों को बढ़ावा देना। इससे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
  2. मृदा में फसल अवशेषों को शामिल करने से मिट्टी की नमी में सुधार हो सकता है, और बेहतर पौधों की वृद्धि के लिए मृदा के सूक्ष्मजीवों के विकास को सक्रिय करने में मदद मिल सकती है।
  3. कृषि-अवशिष्टों को कम्पोस्टिंग के माध्यम से समृद्ध जैविक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है।
  4. वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से ‘यीस्ट प्रोटीन के निष्कर्षण’ जैसे औद्योगिक उपयोग के नए अवसरों की खोज की जा सकती है।

आवश्यकता: सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियां?

  1. पराली नहीं जलाने वालों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है और इस पद्धति को जारी रखने वालों पर दंड लगाया जा सकता है।
  2. मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) योजना की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए, जिसके तहत, कृषि-अवशिष्टों को जलाने वाले लोगों को संबंधित राज्य MSP के लाभ से पूर्ण या आंशिक रूप से वंचित कर सकें।

छत्तीसगढ़ मॉडल:

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा ‘गौठान’ स्थापित कर एक अभिनव प्रयोग किया गया है।

  • ‘गौठान’ (Gauthans), प्रत्येक गाँव में पांच एकड़ का एक सामूहिक भूखंड होता है, जहाँ गाँव के सभी लोग अपनी-अपनी अप्रयुक्त पराली को इकठ्ठा करते हैं और इस पराली को गाय के गोबर और कुछ प्राकृतिक एंजाइमों को मिलाकर जैविक उर्वरक में परिवर्तित किया जाता है।
  • इस योजना से ग्रामीण युवाओं के लिए ‘रोजगार’ भी उत्पन्न होता है।
  • सरकार द्वारा ‘पराली’ को खेत से नजदीकी गौठान तक पहुंचाने में सहायता प्रदान की जाती है।
  • छत्तीसगढ़ में अब तक 2,000 गौठानों को सफलतापूर्वक विकसित किया जा चुका है।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत

आईएस-के या ‘इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत’ (Islamic State Khorasan Province – IS-K) ‘इस्लामिक स्टेट’ समूह का क्षेत्रीय सहयोगी संगठन है।

  • यह अफगानिस्तान में मौजूद सभी जिहादी आतंकवादी समूहों में सबसे चरम और हिंसक संगठन है।
  • आईएस-के की स्थापना जनवरी 2015 में की गई थी, जब इराक और सीरिया में ‘इस्लामिक स्टेट’ (आईएस) की शक्ति के चरम पर थी। बाद में, इसकी स्व-घोषित खलीफात को अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन द्वारा पराजित और नष्ट कर दिया गया था।
  • “खुरासान” आधुनिक अफगानिस्तान और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में विस्तारित एक ऐतिहासिक क्षेत्र है। शुरुआत में आईएस-के समूह का विस्तार पाकिस्तान में भी था, किंतु मई 2019 में ‘इस्लामिक स्टेट’ का पाकिस्तान में एक अलग समूह बन गया।

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