Print Friendly, PDF & Email

[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 25 August 2021

 

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. भारत में कैबिनेट मंत्री को गिरफ्तार करने की प्रक्रिया

2. हरियाणा सरकार का क्रीमी लेयर की उप-श्रेणी बनाने संबंधी आदेश रद्द

3. अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. तमिलनाडु में शहरी गरीबों के लिए ‘मजदूरी रोजगार योजना’

2. संवर्धित सोया खली / केक का आयात

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. युक्तधारा

2. आईएनएस चिल्का

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

 भारत में कैबिनेट मंत्री को गिरफ्तार करने की प्रक्रिया


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय मंत्री नारायण राणे को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ अपमानजनक वक्तव्य देने के बाद महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

केंद्रीय मंत्री को गिरफ्तार करने की प्रक्रिया:

केंद्रीय मंत्री या संसद सदस्य को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश संसद सत्र जारी होने के दौरान उपलब्ध होते हैं।

  • यदि संसद का सत्र नहीं चल रहा होता है, तो किसी आपराधिक मामले में, पुलिस या अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियां ​​‘केंद्रीय कैबिनेट मंत्री’ को गिरफ्तार कर सकती हैं।
  • हालाँकि, राज्यसभा के प्रक्रिया एवं कार्य संचालन विषयक नियमों की उपखंड 222A के तहत, पुलिस या गिरफ्तारी आदेश जारी करने वाले न्यायाधीश को गिरफ्तारी के कारण और स्थान के बारे में राज्यसभा के सभापति को सूचित करना आवश्यक होता है। सभापति द्वारा सभी सदस्यों के सूचनार्थ इसे राज्य सभा बुलेटिन में प्रकाशित करवाया जाता है।

केंद्रीय मंत्रियों को प्राप्त संरक्षण:

किसी भी केंद्रीय मंत्री या सांसद को संसद सत्र शुरू होने से 40 दिन पहले, सत्र जारी रहने के दौरान और सत्र-समापन के 40 दिन बाद तक गिरफ्तारी से सुरक्षा प्राप्त होती है।

  • चूंकि, इसी महीने की शुरुआत में संसद का मानसून सत्र समाप्त हुआ है, अतः ‘नागरिक प्रक्रिया संहिता’ की धारा 135 के तहत, नारायण राणे को एक सिविल/ दीवानी मामले में गिरफ्तारी से सुरक्षा प्राप्त है।
  • हालांकि, उनकी गिरफ्तारी एक आपराधिक मामले में हुई थी, और ‘आपराधिक मामलों’ या ‘निवारक निरोध’ मामले में किसी मंत्री या संसद सदस्य को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि संसद के किसी भी सदन या परिसर में, सदन के पीठासीन अधिकारी – लोकसभा अध्यक्ष या राज्य सभा सभापति की अनुमति के बगैर किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं की जा सकती है।

संविधान के अंतर्गत गिरफ्तारी से सुरक्षा पाने वाला एकमात्र ‘सरकारी व्यक्ति’ गणतंत्र का राष्ट्रपति होता है, जिसे अपना कार्यकाल समाप्त होने तक नागरिक और आपराधिक कार्यवाही से उन्मुक्ति प्राप्त होती है। राष्ट्रपति को और कौन से विशेषाधिकार प्राप्त हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सामूहिक उत्तरदायित्व के बारे में
  2. केंद्रीय मंत्री- नियुक्ति और पद-मुक्ति
  3. विशेषाधिकार
  4. विशेषाधिकारों हनन
  5. गिरफ्तारी की प्रक्रिया

मेंस लिंक:

केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों को उपलब्ध संसदीय विशेषाधिकारों के बारे में चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

हरियाणा सरकार का क्रीमी लेयर की उप-श्रेणी बनाने संबंधी आदेश रद्द


संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना को रद्द करते हुए कहा है कि, आर्थिक आधार ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (OBC) में ‘क्रीमी लेयर’ बनाने का एकमात्र मानदंड नहीं हो सकता है।

‘आरक्षण’ क्या है?

सरल शब्दों में, ‘आरक्षण’ (Reservation) का तात्पर्य सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक संस्थानों और विधायिका में सीटों तक आबादी के कुछ वर्गों की पहुंच आरक्षित करना है।

इसे ‘सकारात्मक कार्रवाई’ (Affirmative Action) के रूप में भी जाना जाता है तथा ‘आरक्षण’ को भारतीय संविधान द्वारा समर्थित ‘सकारात्मक भेदभाव’ (Positive Discrimination) के रूप में भी देखा जा सकता है।

current affairs

 

आरक्षण से संबंधित संवैधानिक और कानूनी आधार:

अनुच्छेद 14: भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों का समान संरक्षण।

अनुच्छेद 15(1) और 15(2): राज्य को, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर विभेद करने से रोकते है।

किंतु, अनुच्छेद 15 के उपबंध (3) से (5) में राज्य को समाज के नितांत कम प्रतिनिधित्व वाले और उपेक्षित वर्गों के पक्ष में सकारात्मक विभेद करने का अधिकार प्रदान किया गया है, ताकि सभी के लिए वास्तविक समानता या भागीदारी को बढ़ावा दिया जा सके।

अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता।

अनुच्छेद 16 के उपबंध (4) में कहा गया है, कि “इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।“

हरियाणा सरकार के उक्त मामले में शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप का कारण:

हरियाणा सरकार द्वारा ‘क्रीमी लेयर’ के लिए मानदंड तय करते हुए पिछड़े वर्गों को ‘पूरी तरह से आर्थिक आधार पर’ उप-वर्गीकृत करते हुए दो अधिसूचनाएं जारी की गईं थी।

  • शीर्ष अदालत के अनुसार, हरियाणा सरकार द्वारा द्वारा जारी अधिसूचनाओं में एकमात्र आय के आधार पर क्रीमी लेयर की पहचान करके ‘इंद्रा साहनी मामले’ में दिए गए फैसले में घोषित कानून का उल्लंघन किया गया है।
  • पिछड़े वर्गों के मध्य”क्रीमी लेयर” को परिभाषित करने से पहले आर्थिक मानदंड के अलावा, सामाजिक, शैक्षिक और अन्य कारकों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

current affairs

‘क्रीमी लेयर’ क्या होती है?

‘क्रीमी लेयर’ (Creamy Layer) अवधारणा के तहत ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (ओबीसी) आरक्षण लाभ प्रदान करने हेतु एक सीमा निर्धारित की जाती है। यद्यपि सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए 27% कोटा निर्धारित है, किंतु “क्रीमी लेयर” के अंतर्गत आने वाले ओबीसी समुदायों के सदस्यों को इस कोटे का लाभ नहीं मिल सकता है।

  • दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) की सिफारिश के आधार पर, सरकार ने 13 अगस्त, 1990 को सिविल पदों और सेवाओं में, सीधी भर्ती के माध्यम से भारी जाने वाली रिक्तियों में ‘सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों’ (SEBC) के लिए 27% आरक्षण अधिसूचित किया था।
  • इस प्रावधान को अदालत में चुनौती दिए जाने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर, 1992 को (इंदिरा साहनी केस) में ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा सहित ‘ओबीसी’ के लिए 27% आरक्षण को बरकरार रखा था।

क्रीमी लेयर के तहत परिभाषित मुख्य श्रेणियां:

  • 8 लाख से अधिक आय: जो लोग सरकारी सेवाओं में कार्यरत नहीं हैं, उनके लिए ‘क्रीमी लेयर’ की वर्तमान सीमा 8 लाख रुपये प्रति वर्ष है।
  • माता-पिता की रैंक: सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए, ‘क्रीमी लेयर’ की सीमा उनके माता-पिता की रैंक पर आधारित होती है न कि आय पर।

इंदिरा साहनी मामले के प्रमुख बिंदु:

वर्ष 1992 के इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने विशेष रूप से इस सवाल का जवाब दिया था कि “क्या पिछड़े वर्गों की पहचान केवल और विशेष रूप से आर्थिक मानदंड के संदर्भ में की जा सकती है।”

  • संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से फैसला सुनाते हुए कहा था, कि किसी पिछड़े वर्ग का निर्धारण एकमात्र और विशेष रूप से आर्थिक मानदंड के संदर्भ में नहीं किया जा सकता है।
  • पीठ ने कहा था, कि ‘आर्थिक मानदंड’ पिछड़े वर्ग का निर्धारण करने हेतु, सामाजिक पिछड़ेपन के साथ-साथ, विचार करने का एक आधार हो सकता है, लेकिन यह इसके लिए कभी भी एकमात्र मानदंड नहीं हो सकता है।

आगे की राह:

यद्यपि, परिवार की आय एक मापदंड हो सकती है, किंतु पूरी तरह से आर्थिक मानदंडों पर आधारित आरक्षण एक पूर्ण समाधान नहीं है। साथ ही, यह हमेशा जारी रखने के बजाय, आरक्षण प्रणाली के लिए एक समय-अवधि तय करने का समय है। इसके अलावा, आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन योजना नहीं है। उत्कृष्टता और योग्यता सहित समाज के कमजोर वर्गों को समान अवसर प्रदान करने के लिए एक मध्यम मार्ग को अपनाने की आवश्यकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, संसद ने ‘सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों’ (SEBC) को निर्दिष्ट करने के लिए राज्यों की शक्ति को बहाल करने के लिए संविधान 127 वां संशोधन विधेयक पारित किया है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क्रीमी लेयर के बारे में
  2. इसका विकास
  3. आरक्षण हेतु संवैधानिक आधार
  4. इंदिरा साहनी फैसले के बारे में

मेंस लिंक:

इंदिरा साहनी निर्णय के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

 अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA)


(UN Assistance Mission in Afghanistan)

संदर्भ:

वैश्विक नेताओं द्वारा ‘अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन’ (UN Assistance Mission in Afghanistan – UNAMA) की कार्यावधि के नवीनीकरण पर चर्चा करने हेतु एक बैठक आयोजित करने की योजना बने जा रही है। विदित हो कि, ‘अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन’ का कार्यकाल 17 सितंबर को समाप्त हो रहा है।

पृष्ठभूमि:

तालिबान द्वारा पिछले कुछ महीनों के दौरान, विदेशी सैनिकों की वापसी होने के साथ ही, अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर राष्ट्रव्यापी आक्रामक कार्यवाहियां शुरू कर दी गई हैं।

‘अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन’ (UNAMA) क्या है?

UNAMA की स्थापना 28 मार्च 2002 को ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ के संकल्प 1401 द्वारा की गई थी।

  • यह मूल रूप से, देश में स्थायी शांति और विकास की नींव रखने हेतु अफगानिस्तान और उसके नागरिकों की सहायता के लिए स्थापित किया गया था।
  • इसका मूल कार्य ‘बॉन समझौते’ (दिसंबर 2001) के कार्यान्वयन में सहयोग करना था।
  • ‘अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन’ की प्रतिवर्ष समीक्षा की जाती है और देश की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समय के साथ इसके अधिदेश को परिवर्तित कर दिया जाता है।
  • UNAMA एक एकीकृत मिशन है। अर्थात, यह एक विशेष राजनीतिक मिशन है, जिसमे संयुक्त राष्ट्र की सभी एजेंसियां, फंड और कार्यक्रम, राष्ट्रीय स्तर पर परिभाषित प्राथमिकताओं के अनुसार अफगानिस्तान की बेहतर सहायता के लिए बहुआयामी और एकीकृत तरीके से कार्य करते हैं।

‘बॉन समझौता’ क्या है?

‘बॉन समझौता’ (Bonn Agreement) एक बंद दरवाजे के भीतर हुई समझौता वार्ता थी; जिसमे भागीदारों को सबसे अलग कर दिया गया था और समझौता वार्ता के दौरान उनके बाहरी संपर्क सीमित कर दिए गए थे, तथा समझौते पर हस्ताक्षर होने के तक कोई जानकारी प्रकाशित नहीं की गयी थी।

  • इस वार्ता में अफगानिस्तान के मौजूदा सांकेतिक राष्ट्राध्यक्ष (रब्बानी) को दरकिनार कर दिया गया और उन्होंने इसमें भाग नहीं लिया, तथा तालिबान को ‘बॉन वार्ता’ से पूरी तरह से बाहर रखा गया था।
  • संयुक्त राष्ट्र और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय अभिकर्ताओं ने वार्ता को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी, और बॉन समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा पूर्ण समर्थन दिया गया था।

बॉन समझौते के द्वारा एक महत्वाकांक्षी तीन-वर्षीय राजनीतिक और प्रशासनिक रोडमैप निर्धारित किया गया, जिसके अनुसरण में,

  • जून 2002 में आयोजित आपातकालीन ‘लोया जिरगा’ (विशाल सभापरिषद) द्वारा संक्रमणकालीन प्रशासन स्थापित किया गया,
  • वर्ष 2004 की शुरुआत में एक नए संविधान को अंगीकार किया गया, और
  • वर्ष 2004 और 2005 में राष्ट्रपति और संसदीय चुनाव कराए गए।

‘संयुक्त राष्ट्र के विशेष राजनीतिक मिशन’ क्या होते हैं?

‘विशेष राजनीतिक मिशन’ (Special Political Mission) में, ‘नरसंहार निवारण पर विशेष सलाहकार कार्यालय’ (Office of the Special Adviser on the Prevention of Genocide) जैसी ‘राजनीतिक और शांति निर्माणक मामलों के विभाग’ (Department of Political and Peacebuilding Affairs DPPA) द्वारा प्रबंधित या निर्देशित संस्थाओं को छोड़कर संयुक्त राष्ट्र और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय अभिकर्ता भाग लेते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘शरिया कानून’ क्या है? इसके तहत फैसले किस प्रकार किए जाते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UNAMA के बारे में
  2. संयुक्त राष्ट्र के विशेष मिशन क्या हैं?
  3. बॉन समझौता क्या है?

मेंस लिंक:

अफगान संकट पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

तमिलनाडु में शहरी गरीबों के लिए ‘मजदूरी रोजगार योजना’


संदर्भ:

तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रस्तावित यह एक शहरी रोजगार योजना है, जिसे ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme – MGNREGS) की तर्ज पर लागू किया जाएगा।

इस योजना का उद्देश्य शहरी गरीबों की आजीविका में सुधार करना है।

आवश्यकता:

  • अन्य राज्यों के विपरीत, तमिलनाडु में शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है और यह वर्ष 2036 तक राज्य की कुल आबादी का 60% तक हो जाएगी।
  • वर्तमान में, कुल चार करोड़ लोग शहरी क्षेत्रों में रह रहे हैं, जोकि राज्य की कुल जनसंख्या का 53 प्रतिशत है।
  • कोविड-19 महामारी के कारण, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले कई लोगों की नौकरियां छूट चुकी हैं।

योजना का कार्यान्वयन:

इस योजना के तहत श्रमिकों का उपयोग जल निकायों से गाद निकालने और सार्वजनिक पार्कों एवं अन्य स्थानों के रखरखाव जैसे कार्यों के लिए किया जाएगा।

 

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) के बारे में:

मनरेगा (MGNREGA) को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में एक सामाजिक उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जिसके अंतर्गत ‘काम करने के अधिकार’ (Right to Work) की गारंटी प्रदान की जाती है।

  • इस सामाजिक उपाय और श्रम कानून का मुख्य सिद्धांत यह है, कि स्थानीय सरकार को ग्रामीण भारत में न्यूनतम 100 दिनों का वैतनिक रोजगार प्रदान करना होगा ताकि ग्रामीण श्रमिकों के जीवन स्तर में वृद्धि की जा सके।

मनरेगा कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य:

  1. मनरेगा कार्यक्रम के तहत प्रत्येक परिवार के अकुशल श्रम करने के इच्छुक वयस्क सदस्यों के लिये न्यूनतम 100 दिन का वैतनिक रोजगार।
  2. ग्रामीण निर्धनों की आजीविका के आधार को सशक्त करके सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करना।
  3. कुओं, तालाबों, सड़कों और नहरों जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई परिसंपत्ति का निर्माण करना।
  1. ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले शहरी प्रवासन को कम करना।
  2. अप्रशिक्षित ग्रामीण श्रम का उपयोग करके ग्रामीण अवसंरचना का निर्माण करना।

मनरेगा योजना के तहत लाभ प्राप्त करने हेतु पात्रता मानदंड:

  1. मनरेगा योजना का लाभ लेने के लिए भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. कार्य हेतु आवेदन करने के लिए व्यक्ति की आयु 18 वर्ष अथवा इससे अधिक होनी चाहिए।
  3. आवेदक के लिए किसी स्थानीय परिवार का हिस्सा होना चाहिए (अर्थात, आवेदन स्थानीय ग्राम पंचायत के माध्यम से किया जाना चाहिए)।
  4. आवेदक को स्वेच्छा से अकुशल श्रम के लिए तैयार होना चाहिए।

योजना का कार्यान्वयन:

  1. आवेदन जमा करने के 15 दिनों के भीतर या जिस दिन से काम की मांग होती है, उस दिन से आवेदक को वैतनिक रोजगार प्रदान किया जाएगा।
  2. रोजगार उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में, आवेदन जमा करने के पंद्रह दिनों के भीतर या काम की मांग करने की तिथि से बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार होगा।
  3. मनरेगा के कार्यों का सामाजिक लेखा-परीक्षण (Social Audit) अनिवार्य है, जिससे कार्यक्रम में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
  4. मजदूरी की मांग करने हेतु अपनी आवाज उठाने और शिकायतें दर्ज कराने के लिए ‘ग्राम सभा’ इसका प्रमुख मंच है।
  5. मनरेगा के तहत कराए जाने वाले कार्यों को मंजूरी देने और उनकी प्राथमिकता तय करने का दायित्व ‘ग्राम सभा’ और ‘ग्राम पंचायत’ का होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि भारतीय संविधान स्पष्ट रूप से ‘काम करने के अधिकार’ को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं देता है? फिर, संविधान के अंतर्गत इस संदर्भ में क्या प्रावधान किए गए हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मनरेगा के तहत ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, राज्यों, राज्य खाद्य आयोग, केंद्र की भूमिकाएँ क्या हैं?
  2. जॉब कार्ड क्या हैं, इन्हें कौन जारी करता है?
  3. ‘राज्य रोजगार गारंटी कोष’ की स्थापना कौन करता है?
  4. वैतनिक रोजगार क्या होता है?
  5. सामाजिक लेखा परीक्षण (सोशल ऑडिट) किसके द्वारा किया जाता है?

मेंस लिंक:

मनरेगा की प्रमुख विशेषताओं और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

संवर्धित सोया खली / केक का आयात


(GM soya cake imports)

संदर्भ:

सोयाबीन की बढ़ती कीमतों के साथ ‘पोल्ट्री उद्योग’ में लागत बढ़ती जा रही है, इसे देखते हुए हाल ही में, केंद्र सरकार द्वारा 31 अक्टूबर, 2021 तक 1.2 मिलियन मीट्रिक टन संदलित और तेल मुक्त जीन संवर्द्धित (genetically modified) सोयाबीन की खली / केक के आयात की अनुमति प्रदान की गयी है।

आवश्यकता:

सोयाबीन खाद्य, पोल्ट्री उद्योग के लिए एक आवश्यक कच्चा माल होता है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में सोयाबीन की कीमतें दोगुनी से अधिक हो गई हैं। इसके अलावा, मछली, मांस और दूध जैसे प्रोटीन स्रोतों में उच्च कीमतें दर्ज की गई है।

भारत में जीएम सोयाबीन और सोयाबीन बीज की स्थिति:

भारत में जीएम सोयाबीन और कैनोला तेल के आयात की अनुमति दी गयी है। जीएम सोयाबीन के बीज के आयात को भारत में अब तक मंजूरी नहीं मिली है।

नवीनतम निर्णय से जुड़ी चिंताएं / आलोचनाएं:

  1. यह देखते हुए, कि भारत की नियामक प्रणाली द्वारा अभी तक ‘जीएम खाद्य पदार्थों’ (GM foods) को मंजूरी नहीं दी गयी है, पर्यावरण कार्यकर्ताओं द्वारा ‘जीन संवर्धित’ पौधे से उत्पन्न किसी खाद्य सामग्री को मानव की आहार-श्रंखला में शामिल करने की अनुमति देने पर चिंता व्यक्त की गयी है।
  2. इसके अलावा, ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम’ के तहत वर्ष 1989 के जारी किए गए नियम ‘जीन संवर्धित जीवों’ के साथ-साथ उनके उत्पादों और पदार्थों पर भी लागू होते हैं।

भारत में जीएम फसलों के लिए अनुमोदन प्रक्रिया:

भारत में, जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (Genetic Engineering Appraisal Committee -GEAC) ‘जीन संवर्द्धित फसलों’ की वाणिज्यिक खेती की अनुमति देने के लिए शीर्ष निकाय है।

  • GEAC क्षेत्र परीक्षण प्रयोगों सहित पर्यावरण में आनुवंशिक रूप से संवर्द्धित किये गए जीवों और उत्पादों को जारी करने संबंधी प्रस्तावों की मंज़ूरी के लिये भी उत्तरदायी है।
  • अप्रमाणित GM संस्करण का उपयोग करने पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1989 के अंतर्गत 5 साल की जेल तथा 1 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है।
  • भारत में आयातित फसलों को विनियमित करने के लिए ‘भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण’ (FSSAI) अधिकृत निकाय है।

‘जीन संवर्द्धित’ फसलें क्या हैं?

जीएम फसल (Genetically Modified-GM), उन फसलों को कहा जाता है जिनके जीन को वैज्ञानिक तरीके से रूपांतरित किया जाता है।

  • जेनेटिक इजीनियरिंग के ज़रिये किसी भी जीव या पौधे के जीन को अन्य पौधों में डालकर एक नई फसल प्रजाति विकसित की जाती है।
  • जीन संवर्द्धित फसल में, प्राकृतिक रूप से परागण की बजाय कृत्रिम रूप से प्रविष्ट कराए हुए जीन होते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि भारत में ‘बीटी कपास’ (Bt cotton)  ही एकमात्र ‘आनुवंशिक रूप से संशोधित’ फसल (Genetically Modified- GM crop) है, जिसकी खेती के लिए अनुमति दी गई है। यह हर्बिसाइड टॉलरेंट बीटी (Ht Bt) कपास से किस प्रकार भिन्न होती है?

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


युक्तधारा

(Yuktdhara)

यह मनरेगा के तहत ग्राम पंचायत स्तर पर योजनाओं को सुगम बनाने के लिए एक ‘भू-स्थानिक योजना’ (Geospatial Planning Portal) पोर्टल है। यह इसरो के जियोपोर्टल ‘भुवन’ के तहत कार्य करेगा।

  • भुवन “युक्तधारा” पोर्टल को ‘ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्रालय’ द्वारा लांच किया गया है।
  • यह प्लेटफॉर्म विभिन्न राष्ट्रीय ग्रामीण विकास कार्यक्रमों यानी मनरेगा, एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम, पर ड्रॉप मोर क्रॉप और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना आदि के अंतर्गत बनाई गई परिसंपत्तियों (जियोटैग) के भंडार के रूप में कार्य करेगा।

आईएनएस चिल्का

  • आईएनएस चिल्का (INS Chilka), भारतीय नौसेना का एकमात्र प्रारंभिक प्रशिक्षण संस्थान है, जो सालाना 6600 से अधिक नवोदित सैनिकों को प्रशिक्षित करता है ताकि उन्हें सक्षम नाविक बनाया जा सके।
  • आईएनएस चिल्का को वर्ष 1980 में शुरू किया गया था और यह संस्थान ओडिशा में चिल्का झील के नजदीक क्षेत्र में स्थित है।

Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates

Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos