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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 19 August 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम

2. आपराधिक क़ानून सुधार

3. गुजरात धर्मांतरण रोधी कानून

4. विदेशियों के लिए डिटेंशन सेंटर

5. संयुक्त राष्ट्र शांति-सैनिक

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. ‘एजेंसी बैंक’

2. मवेशी द्वीप

3. टैंकरों के माध्यम से शुद्ध पेयजल आपूर्ति ‘कर योग्य’ घोषित

4. तिवा जनजाति और वांचुवा त्योहार

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम


(Supreme Court Collegium)

संदर्भ:

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा  न्यायालय में न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति करने हेतु सरकार को नौ नामों की सिफारिश की गई है, और इस प्रक्रिया में, कॉलेजियम ने कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायाधीश बी वी नागरत्ना (B.V. Nagarathna) के नाम की सिफारिश करके एक इतिहास रच दिया है। न्यायाधीश बी वी नागरत्ना कुछ साल बाद भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बन सकती हैं।

कॉलेजियम द्वारा की गयी प्रमुख सिफारिशें:

  1. कॉलेजियम द्वारा पहली बार, एक ही प्रस्ताव में, तीन महिला न्यायाधीशों की सिफारिश की गयी है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के पक्ष में एक मजबूत संकेत दिया गया है।
  2. कॉलेजियम ने ‘ सुप्रीम कोर्ट बार’ से ‘कोर्ट की बेंच’ में सीधी नियुक्तियों की सिफारिश करने की हालिया प्रवृत्ति को भी जारी रखा है।
  3. इसने तेलंगाना उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति हेतु छह न्यायिक अधिकारियों और ‘आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण’ (Income Tax Appellate Tribunal) के एक न्यायिक सदस्य की भी सिफारिश की है।

उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति:

उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्तियां, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 के उपबंध (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त किए जाने हेतु नामों की सिफारिश की जाती है।

उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश बनने हेतु अहर्ता:

  1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 में उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति हेतु पात्रता से संबंधित मानदंडों का उल्लेख किया गया है।
  2. उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।
  3. आयु की दृष्टि से, व्यक्ति की आयु 65 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  4. व्यक्ति को किसी एक या एक से अधिक उच्च न्यायालय (निरंतर) के न्यायाधीश के रूप में न्यूनतम पांच साल तक सेवा का अनुभव या उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में न्यूनतम 10 वर्ष का अनुभव या प्रतिष्ठित न्यायविद होना चाहिए।

क्या कॉलेजियम द्वारा की गयी सिफारिशें अंतिम और बाध्यकारी होती है?

कॉलेजियम द्वारा अपनी अंतिम रूप से तैयार सिफारिशों को अनुमोदन के लिए भारत के राष्ट्रपति के पास भेजी जाती हैं। राष्ट्रपति के लिए इन सिफारिशों को स्वीकार करने अथवा अस्वीकार करने की शक्ति प्राप्त होती है। यदि राष्ट्रपति  द्वारा इन सिफारिशों को खारिज कर दिया जाता है, तो इनके लिए कॉलेजियम के पास वापस भेज दिया जाता है। किंतु, यदि कॉलेजियम द्वारा राष्ट्रपति को अपनी सिफारिश दोबारा भेजी जाती हैं, तो राष्ट्रपति  उन सिफारिशों पर स्वीकृति देने के लिए बाध्य होता है।

कॉलेजियम पद्धति के खिलाफ आम आलोचना:

  • अपारदर्शिता और पारदर्शिता की कमी
  • भाई-भतीजावाद की गुंजाइश
  • सार्वजनिक विवादों में फंसना

आवश्यक सुधार:

  1. उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु, अधिमान्य रूप से एक स्वतंत्र व्यापक-आधार सहित संवैधानिक निकाय द्वारा क्रियान्वयित एक पारदर्शी और भागीदारी प्रक्रिया होनी चाहिए। इस प्रक्रिया में  न्यायिक विशिष्टता की बजाय न्यायिक प्रधानता की गारंटी दी जानी चाहिए।
  2. न्यायाधीशों का चयन करते समय स्वतंत्रता की सुनिश्चितता, विविधता का प्रतिबिंबन, पेशेवर क्षमता और सत्यनिष्ठा का प्रदर्शन होना चाहिए।
  3. एक निश्चित संख्या में रिक्तियों को भरने के लिए आवश्यक न्यायाधीशों का चयन करने के बजाय, कॉलेजियम को वरीयता और अन्य वैध मानदंडों के क्रम में राष्ट्रपति को नियुक्ति हेतु संभावित नामों का एक पैनल प्रस्तुत करना चाहिए।

current affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि संविधान में न्यायधीशों के कॉलेजियम के बारे में कोई उल्लेख नहीं है? यह पद्धति सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्मित की गयी है। इसके बारे में अधिक जानने हेतुयहां पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कॉलेजियम प्रणाली’ क्या है?
  2. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को किस प्रकार नियुक्त और हटाया जाता है?
  3. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को किस प्रकार नियुक्त और हटाया जाता है?
  4. संबंधित संवैधानिक प्रावधान

मेंस लिंक:

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

आपराधिक कानून सुधार


(Criminal law reforms)

संदर्भ:

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के तहत विशेषज्ञों के एक समूह द्वारा “त्वरित न्याय सुनिश्चित करने हेतु आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधारों की धीमी गति पर गंभीर चिंता व्यक्त की गयी है”।

वर्तमान चिंताएं/चुनौतियां:

  1. मामलों के निपटारे में होने वाली देरी से विचाराधीन कैदियों और दोषियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है।
  2. पुलिस सुधारों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद, जमीन पर शायद ही कोई बदलाव हुआ हो।
  3. किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने वाले न्यायालय के आदेशों को लागू होने में भी वर्षों का समय लग रहा है।

सुझाए गए सुधार:

  1. प्रत्येक पुलिस थाने में मामलों की भीड़ को कम करने हेतु, भारतीय दंड संहिता के तहत कुछ अपराधों को विशेष कानून और फास्ट ट्रैक अदालतों में निपटाया जा सकता है।
  2. दस्तावेजों के डिजिटलीकरण किया जाना चाहिए, इस से जांच और सुनवाई में तेजी लाने में मदद मिलेगी।
  3. नए अपराधों का निर्माण और अपराधों के मौजूदा वर्गीकरण के नवीनीकरण को आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए जोकि पिछले चार दशकों में काफी हद तक बदल चुके हैं।
  4. अपराधों का वर्गीकरण इस तरह से किया जाना चाहिए , जोकि भविष्य में अपराधों के प्रबंधन के अनुकूल रहे।
  5. एक ही प्रकृति के अपराधों के लिए अलग-अलग सजा की मात्रा और प्रकृति को तय करने में न्यायाधीशों के निर्णय, न्यायिक उदाहरणों के सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए।

भारत में आपराधिक कानून:

भारत में प्रचलित आपराधिक कानून कई स्रोतों में निहित है – भारतीय दंड संहिता, 1860, नागरिक अधिकार अधिनियम, 1955, दहेज निषेध अधिनियम, 1961 तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989

  • आपराधिक न्याय प्रणाली, स्थापित कानूनों का उल्लंघन करने वालों पर दंड लगा सकती है।
  • आपराधिक कानून और आपराधिक प्रक्रिया संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में सम्मिलित हैं।
  • लॉर्ड थॉमस बबिंगटन मैकाले (Lord Thomas Babington Macaulay) को भारत में आपराधिक कानूनों के संहिताकरण का मुख्य वास्तुकार कहा जाता है।

सुधारों की आवश्यकता:

  • औपनिवेशिक युग के कानून।
  • प्रभावहीनता।
  • अनिर्णीत मामलों की भार संख्या।
  • वृहद अभियोगाधीन मामले।

आपराधिक कानून में सुधार हेतु  समिति:

  • गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा आपराधिक कानून में सुधार करने हेतु एक राष्ट्रीय स्तर की समिति का गठन किया है।
  • इस समिति के अध्यक्ष रणबीर सिंह (कुलपति,नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली) हैं।
  • यह समिति, सरकार को दी जाने वाली रिपोर्ट के लिए, विशेषज्ञों से ऑनलाइन परामर्श करके विचार एकत्र करेगी और उपलब्ध सामग्री का मिलान करेगी।

आपराधिक कानूनों से संबंधित पिछली समितियाँ:

  • माधव मेनन समिति: इसने 2007 में CJSI में सुधारों पर विभिन्न सिफारिशों का सुझाव देते हुए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
  • मलिमथ कमेटी की रिपोर्ट: इसने अपनी रिपोर्ट 2003 में आपराधिक न्याय प्रणाली (CJSI) पर प्रस्तुत की।

vsmallmath, current affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

पुलिस सुधारों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2006 में दिए गए फैसले के बारे में यहां पढ़ें।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मलिमथ कमेटी किससे संबंधित है?
  2. संविधान की 7 वीं अनुसूची के तहत आपराधिक कानून।
  3. भारत में आपराधिक कानूनों को किसने संहिताबद्ध किया?
  4. विवादास्पद IPC कानून।
  5. रणबीर सिंह समिति किससे संबंधित है?

मेंस लिंक:

भारत में आपराधिक न्याय सुधार पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

 गुजरात धर्मांतरण रोधी कानून


(Gujarat anti-conversion law)

संदर्भ:

हाल ही में, गुजरात सरकार ने अपने नए धर्मांतरण रोधी कानून का बचाव करते हुए द्वारा उच्च न्यायालय में कहा है, कि विवाह “जबरदस्ती धर्मांतरण” के लिए एक उपकरण नहीं हो सकते हैं।

संबंधित प्रकरण:

  • गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा, विवाह के माध्यम से जबरन धर्म परिवर्तन से संबंधित कानून में नए अधिनियमित संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की जा रही है।
  • सुनवाई के दौरान,अदालत ने कहा है कि संशोधित कानून से इस प्रकार की धारणा बनती है कि राज्य में अंतरधार्मिक विवाह की अनुमति नहीं है, और इस वजह से अंतरधार्मिक जोड़ों पर तलवार लटकती रहती है।

गुजरात धर्म की स्वतंत्रता (संशोधन) अधिनियम, 2021

(Gujarat Freedom of Religion (Amendment) Act, 2021)

  • इस अधिनियम के तहत, शादी के माध्यम से जबरन या धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन कराने पर 3-10 साल की कारावास का प्रावधान किया गया है।
  • यह क़ानून, गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2003 (Gujarat Freedom of Religion Act, 2003) में संशोधन करता है।
  • इस संशोधन का उद्देश्य, महिलाओं को धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से “शादी के लिए फुसलाने” की “उभरती हुई प्रवृत्ति” पर रोक लगाना है।

नए कानून से जुड़ी समस्याएं:

  • संशोधित कानून में अस्पष्ट शब्द का प्रयोग किया गया है, जो विवाह के मूल सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 25 में निहित अंत करण की स्वतंत्रता तथा धर्म के अबाध रूप से मानने की स्वतंत्रता, आचरण करने और प्रचार करने के अधिकार के खिलाफ हैं।
  • इस नए कानून में, दूर के परिवार के सदस्यों को भी आपराधिक शिकायत दर्ज करने की अनुमति दी गयी है।

विवाह और धर्मांतरण पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले:

  1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने कई निर्णयों में यह कहा गया है, कि किसी वयस्क को अपना जीवन साथी चुनने संबंधी मामले में पूर्ण अधिकार होता है, और इस पर राज्य और अदालतों का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है।
  2. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने, लिली थॉमस और सरला मुद्गल, दोनों मामलों में यह पुष्टि की है, कि धार्मिक विश्वास के बिना और कुछ कानूनी लाभ प्राप्त करने के एकमात्र उद्देश्य के लिए किए गए धर्म-परिवर्तन का कोई आधार नहीं है।
  3. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 के ‘सलामत अंसारी-प्रियंका खरवार’ मामले में निर्णय सुनाते हुए कहा कि, किसी साथी को चुनने का अधिकार अथवा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, नागरिकों के ‘जीवन और स्वतंत्रता संबंधी मूल अधिकार’ (अनुच्छेद 21) का भाग है।

समय की मांग:

  1. एकरूपता की आवश्यकता: मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) के अनुच्छेद 18 के अनुसार, सभी व्यक्तियों को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार है, जिसमे उनका धर्म परिवर्तन करने का अधिकार भी शामिल है। चूंकि यह राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार इस विषय पर, अनुबंध खेती पर मॉडल कानून आदि जैसा कोई एक मॉडल कानून बना सकती है।
  2. धर्मांतरण विरोधी कानून बनाते समय राज्यों को, अपनी इच्छा से धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति के लिए कोई अस्पष्ट या अनेकार्थी प्रावधान नहीं करना चाहिए।
  3. धर्मांतरण विरोधी कानूनों में, अल्पसंख्यक समुदाय संस्थानों द्वारा धर्मांतरण के लिए कानूनी चरणों का उल्लेख करने संबंधी प्रावधान को भी शामिल करने की आवश्यकता है।
  4. लोगों को जबरदस्ती धर्मांतरण, प्रलोभन या प्रलोभन आदि से संबंधित प्रावधानों और तरीकों के बारे में भी शिक्षित करने की आवश्यकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘तीन राज्यों के तीन धर्मांतरण-रोधी क़ानूनों में समानताओं एवं भिन्नताओं’ के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 21 के बारे में
  2. अनुच्छेद 25
  3. ‘विशेष विवाह अधिनियम’ (SMA) के बारे में
  4. किन राज्यों द्वारा धर्मांतरण रोधी कानून पारित किए जा चुके हैं।

मेंस लिंक:

जीवन साथी को चुनने का अधिकार अथवा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, नागरिकों के ‘जीवन और स्वतंत्रता संबंधी मूल अधिकार’ का भाग है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

 विदेशियों के लिए डिटेंशन सेंटर


संदर्भ:

असम में विदेशियों और विशिष्ट अधिकरणों द्वारा विदेशी घोषित किए गए नागरिकों के लिए बनाए गए ‘हिरासत केंद्रों’ / ‘डिटेंशन सेंटर्स’ (detention centres for foreigners) का नाम बदलकर ‘ट्रांजिट कैंप’ (Transit Camps) रख दिया गया है।

कृपया ध्यान दें:

वर्तमान में, असम के असम के छह हिरासत केंद्रों (Detention Centre) में 181 कैदी बंद हैं, जिनमें से 61 कैदियों को विदेशी नागरिक घोषित किया जा चुका है और 121 दोषी विदेशी नागरिक अपने निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इनमें से दो केंद्रों में 22 बच्चे अपनी “विदेशी” माताओं के साथ कैद हैं।

डिटेंशन सेंटर / हिरासत केंद्रों के बारे में:

  • ये अधिकारियों द्वारा चिह्नित किए गए अवैध प्रवासियों (वे लोग जो आवश्यक दस्तावेजों के बिना किसी देश में प्रवेश कर चुके हैं) को रखने के लिए निर्दिष्ट स्थान होते हैं। इन केंद्रों पर अवैध प्रवासियों को उनकी राष्ट्रीयता की पुष्टि होने तक और उन्हें उनके मूल देश में भेजे जाने तक रखा जाता है।
  • केंद्र सरकार द्वारा ‘विदेशी विषयक अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946) और विदेशी (अधिकरण) आदेश, 1948 के प्रावधानों के तहत राज्य को डिटेंशन सेंटर स्थापित करने की शक्ति दिए जाने के बाद, असम में इस प्रकार के डिटेंशन सेंटर स्थापित किए गए थे।

विदेशी विषयक अधिनियम, 1946

इस अधिनियम को ‘विदेशी विषयक अधिनियम, 1940 (Foreigners Act, 1940) की जगह लाया गया था, और इसके तहत सभी विदेशियों से निपटने हेतु केंद्र सरकार के लिए व्यापक अधिकार प्रदान किए गए थे।

  • इस अधिनियम में, सरकार को अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए बल प्रयोग सहित आवश्यक कदम उठाने का अधिकार दिया गया है।
  • अधिनियम के तहत, ‘साबित करने का दायित्व’ (burden of proof), अधिकारियों की वजाय प्रश्नगत व्यक्ति पर डाला गया है।
  • यह अधिनियम, मूल रूप से सरकार को, सिविल कोर्ट के समान शक्ति प्राप्त अधिकरण (ट्रिब्यूनल) स्थापित करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • विदेशी (अधिकरण) आदेश, 1964 में वर्ष 2019 में किए गए  संशोधन द्वारा, भारत में अवैध रूप से रहने वाले व्यक्ति की नागरिकता के संबंध में निर्णय करने हेतु सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जिला मजिस्ट्रेटों को ‘अधिकरण’ स्थापित करने का अधिकार दिया गया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

असम के अलावा और किन राज्यों में डिटेंशन सेंटर बनाए गए हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अवैध प्रवासी (अधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम बनाम विदेशी (अधिकरण) आदेश 1964
  2. इस आदेश के अंतर्गत प्रमाण का दायित्व
  3. अधिकरण द्वारा हल किये जाने वाले विषय
  4. अधिकरण की संरचना।
  5. अधिकरण तथा न्यायालय में अंतर
  6. असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की भौगोलिक स्थिति।
  7. शरणार्थी बनाम अवैध प्रवासी।
  8. विदेशियों के लिए उपलब्ध मौलिक अधिकार तथा अन्य संवैधानिक प्रावधान
  9. मानवाधिकार बनाम मौलिक अधिकार

मेंस लिंक:

देश में अवैध गैर-प्रवासियों से निपटने के लिए कानूनों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। विदेशी (अधिकरण) आदेश, 1964 में संशोधन क्यों किया गया?

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

संयुक्त राष्ट्र शांति-सैनिक


(UN peacekeepers)

संदर्भ:

विदेश मंत्री,एस जयशंकर द्वारा संयुक्त राष्ट्र के साथ साझेदारी में ‘संयुक्त राष्ट्र शांति-सैनिकों’ (UN peacekeepers) की सुरक्षा बढ़ाने में मदद करने हेतु ‘संयुक्त राष्ट्र – यूनाइट अवेयर’ (UN — UNITE Aware) नामक एक तकनीकी प्लेटफ़ॉर्म शुरू करने की घोषणा की गयी है। इस प्लेटफ़ॉर्म का संयुक्त राष्ट्र के चार मिशनों में उपयोग किया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में, हाल ही में आयोजित ‘प्रौद्योगिकी और शांति स्थापना’ विषय पर खुली बहस के दौरान इसकी घोषणा की गई थी।

विदेश मंत्री द्वारा शांति सैनिकों की सुरक्षा हेतु चार सूत्री रूपरेखा:

  1. अपने निर्माण में पर्यावरण के अनुकूल, उपयोगिता साबित कर चुकी, लागत प्रभावी और क्षेत्र-सेवा योग्य प्रौद्योगिकियों को तैनात किए जाने की आवश्यकता।
  2. शांति सैनिकों के लिए अच्छी सूचना और खुफिया जानकारी की जरूरत।
  3. सटीक स्थिति और भूमि के ऊपर से दृश्यचित्रण की आवश्यकता।
  4. प्रौद्योगिकी के संबंध में क्षमता निर्माण और शांतिरक्षकों के प्रशिक्षण में निवेश।

बैठक के परिणाम:

भारत और संयुक्त राष्ट्र के बीच “शांति व्यवस्था में प्रौद्योगिकी के लिए साझेदारी” पहल और शांति कार्यवाहियों हेतु संयुक्त राष्ट्र C4ISR अकादमी (UN C4ISR Academy for Peace UNCAP) में सहयोग  हेतु एक समझौता ज्ञापन की घोषणा की गई है।

यूनाइट अवेयर (UNITE AWARE)

UNITE AWARE, संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों को इलाके से संबंधित जानकारी प्रदान करने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता करने हेतु, भारत द्वारा विकसित एक मोबाइल तकनीकी प्लेटफॉर्म है। इसे संयुक्त राष्ट्र के “डिपार्टमेंट ऑफ पीसकीपिंग ऑपरेशंस और ऑपरेशनल सपोर्ट डिपार्टमेंट” के साथ साझेदारी में विकसित किया जा रहा है।

भारत द्वारा इस परियोजना के लिए 1.64 मिलियन अमरीकी डालर खर्च किए गए हैं।

संयुक्त राष्ट्र शांति सुरक्षा अभियानों का वित्त पोषण किस प्रकार किया जाता है?

  • यद्यपि, शांति सुरक्षा अभियानों को शुरू करने, जारी रखने या विस्तार करने के बारे में निर्णय, सुरक्षा परिषद द्वारा लिए जाते हैं, किंतु इन संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों का वित्तपोषण, संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों की सामूहिक जिम्मेदारी होती है।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 17 के प्रावधानों के अनुसार, प्रत्येक सदस्य राष्ट्र शांति अभियानों के लिए निर्धारित राशि का भुगतान करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।

वर्ष 2020-2021 के लिए संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों हेतु आकलन किए गए योगदान के शीर्ष 5 प्रदाता देश निम्नलिखित हैं:

  1. संयुक्त राज्य अमेरिका (27.89%)
  2. चीन (15.21%)
  3. जापान (8.56%)
  4. जर्मनी (6.09%)
  5. यूनाइटेड किंगडम (5.79%)

‘शांति अभियान’ क्या है?

संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान (UN Peacekeeping), ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ पीस ऑपरेशन’ तथा ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ ऑपरेशनल सपोर्ट’ का एक संयुक्त प्रयास है।

प्रत्येक ‘शांति सुरक्षा अभियान’ को ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ द्वारा मंजूरी प्रदान की जाती है।

संरचना:

  • संयुक्त राष्ट्र के शांति रक्षकों में सैनिक, पुलिस अधिकारी और नागरिक कर्मी सम्मिलित हो सकते हैं।
  • सदस्य देशों द्वारा स्वैच्छिक आधार पर शांति सैनिको का योगदान दिया जाता है।
  • शांति अभियानों के नागरिक कर्मचारी, अंतर्राष्ट्रीय सिविल सेवक होते हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सचिवालय द्वारा भर्ती और तैनात किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान तीन बुनियादी सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होते है:

  1. पक्षकारों की सहमति
  2. निष्पक्षता
  3. अधिदेश की सुरक्षा और आत्मरक्षा के अलावा बल प्रयोग नहीं किया जाएगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि 2007 में, भारत, संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में ‘महिला दल’ को तैनात करने वाला पहला देश था?  वर्तमान में जारी 13 शांति अभियानों के बारे में जानिए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. शांति अभियानों का वित्त पोषण किसके द्वारा किया जाता है?
  2. UNSC की भूमिका
  3. शांतिरक्षकों की संरचना?
  4. शांति सैनिकों को ब्लू हेल्मेट क्यों कहा जाता है?
  5. संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के मार्गदर्शक सिद्धांत
  6. वर्तमान में जारी शांति अभियान

मेंस लिंक:

संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान और उसके महत्व पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 

‘एजेंसी बैंक’

(Agency Bank)

  • केरल स्थित निजी क्षेत्र की एक ऋणदाता साउथ इंडियन बैंक को भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ‘एजेंसी बैंक’ (Agency Bank) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
  • ‘एजेंसी बैंक’ के रूप में सूची होने के बाद यह साउथ इंडियन बैंक, भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से केंद्र और राज्य सरकार के सामान्य बैंकिंग कारोबार करने में सक्षम होगा।
  • साउथ इंडियन बैंक, अब सरकारी व्यवसायों से संबंधित लेन-देन, जैसे कि केंद्र / राज्य सरकारों की ओर से राजस्व प्राप्तियां और भुगतान, केंद्र / राज्य सरकारों के संबंध में पेंशन भुगतान, लघु बचत योजनाओं (SSS) से संबंधित कार्य, भौतिक माध्यम या ई-मोड के माध्यम से स्टांप शुल्क संग्रह आदि करने के लिए अधिकृत है।

 

मवेशी द्वीप

(Cattle Island)

  • मवेशी द्वीप (Cattle Island) हीराकुंड जलाशय में स्थित तीन द्वीपों में से एक है।
  • हाल ही में ओडिशा के वन और पर्यावरण विभाग द्वारा इसके लिए एक दर्शनीय स्थल के रूप में चुना गया है।
  • यह द्वीप एक जलमग्न पहाड़ी है,और हीराकुंड बांध के निर्माण से पहले यह एक विकसित गांव था।

इसका नामकरण:

  • 1950 के दशक में जब महानदी पर हीराकुंड बांध का निर्माण किया गया था, उस समय बड़ी संख्या में लोग अपने गांवों से विस्थापित होना पड़ा था, और विस्थापन के दौर में ग्रामीण अपने मवेशियों को अपने साथ नहीं ले जा सकते थे। वे अपने मवेशियों को सुनसान गांवों में छोड़ गए।
  • बांध के निर्माण के बाद जैसे ही यह क्षेत्र जलमग्न होने लगा, सारे मवेशी झारसुगुडा जिले के लखनपुर ब्लॉक के तहत तेलिया पंचायत में एक ऊंचे स्थान भुजापहाड़ पर चले गए। इसके बाद इस पहाडी को, जोकि पानी की एक विशाल चादर से घिरा हुआ एक भूमि का टुकड़ा है, ‘कैटल आइलैंड’ या मवेशी द्वीप कहा जाने लगा।

हीराकुंड बांध:

  • यह महानदी नदी में बार-बार विनाशकारी बाढ़ आने के बाद, वर्ष 1937 में महान अभियंता एम. विश्वेश्वरैया द्वारा परिकल्पित एक बहुउद्देशीय योजना है।
  • यह भारत का सबसे लंबा बांध है।

 

टैंकरों के माध्यम से शुद्ध पेयजल आपूर्ति ‘कर योग्य’ घोषित

हाल ही में, अग्रिम विनिर्णय प्राधिकरण (Authority for Advance RulingAAR) द्वारा सुनाए गए एक फैसले के अनुसार, किसी धर्मार्थ संगठन द्वारा मोबाइल टैंकरों या डिस्पेंसर के माध्यम से जनता को पीने के पानी की आपूर्ति जीएसटी के तहत 18%  कर लगाने योग्य है।

अग्रिम विनिर्णय (एडवांस रूलिंग) और अग्रिम विनिर्णय प्राधिकरण (AAR) के बारे में:

  • एडवांस रूलिंग का तात्पर्य, किसी प्रस्तावित या जारी कार्यवाही या कारोबार पर ‘कर देयता’ के संबंध में आवेदक द्वारा दिए गए आवेदन में निर्दिष्ट कानून या तथ्य के सवाल पर निर्णय करना होता है।
  • संरचना: अग्रिम विनिर्णय प्राधिकरण की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाती है, और दो सदस्य होते हैं जो भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव के पद पर नियुक्त होते हैं। इनमे से एक सदस्य भारतीय राजस्व सेवा और भारतीय विधिक सेवा से लिया जाता है।

 

तिवा जनजाति और वांचुवा त्योहार

वांचुवा त्योहार (Wanchuwa festival), तिवा आदिवासियों (Tiwa tribe) द्वारा अच्छी फसल होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

  • इस त्योहार पर समुदाय के लोग अपना पारम्परिक परिधान धारण करते है और नृत्य, गान और अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।
  • तिवा जनजाति के लोग भरपूर फसल के लिए प्रकृति की महान शक्ति की कृपा मानते हैं। ये लोग सूअरों की खोपड़ी और हड्डियों को देवी- देवताओं के रूप में स्थापित करते हैं और मानते हैं कि ये कई पीढ़ियों तक इनकी सुरक्षा करेंगे।
  • तिवा जनजाति को ‘लालुंग’ के नाम से भी जाना जाता है, और यह असम तथा मेघालय राज्यों में रहने वाला स्वदेशी समुदाय है। इसकी कुछ आबादी अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के कुछ हिस्सों में भी पाई जाती है।

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