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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 18 August 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. अदालतों में बढ़ती हुई रिक्तियां

2. न्यायपालिका एवं अदालतों की सुरक्षा हेतु एक पृथक सुरक्षा बल की आवश्यकता

3. ‘भुलाए जाने का अधिकार’

4. विदेशी अधिकरण

5. RoDTEP योजना

 

सामान्य अध्ययन-III

1. नई दिल्ली में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा नवीकृत जीन बैंक

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ‘वित्तीय समावेशन सूचकांक’ की शुरुआत

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

अदालतों में बढ़ती हुई रिक्तियां


संदर्भ:

सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले कुछ दिनों से, उच्च न्यायालयों और न्यायाधिकरणों में रिक्तियों की बढ़ती हुई संख्या के प्रति सरकार के उदासीन रवैये पर चिंता व्यक्त की है।

1 अगस्त को उच्च न्यायालयों में रिक्तियों की संख्या आश्चर्यजनक ढंग से 455 पहुँच चुकी थी।

संबंधित चिंताएं:

अदालत ने इस संदर्भ में चिंता वयकत करते हुए कहा है, कि उच्च न्यायालयों में नियुक्तियां करने में केंद्र सरकार द्वारा की जा रही देरी से वाणिज्यिक मामलों से संबंधित विवादों के निर्णय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

उच्च न्यायालयों एवं निचली अदालतों में रिक्तियों की संख्या बढ़ने के कारण:

  1. निचली अदालतों में बढ़ती हुई रिक्तियों का एक प्रमुख कारण नियुक्ति प्रक्रिया में प्रणालीगत दोष है। उदाहरण के लिए, जब अदालतों में रिक्तियां उत्पन्न होती हैं, तो उन्हें भरने के लिए अक्सर पर्याप्त रूप से परीक्षाएं से आयोजित नहीं की जाती हैं, और जब भी परीक्षा हो भी जाती है, तो उच्च न्यायालय अक्सर विज्ञापित रिक्तियों को भरने के लिए पर्याप्त मेधावी उम्मीदवारों को खोजने में असमर्थ रहते हैं।
  2. नियुक्ति प्रक्रिया को समय पर संचालित करने के लिए एक सरासर सुस्त रवैया भी रिक्तियों की संख्या में वृद्धि का एक और कारण है।
  3. अस्पष्ट भर्ती प्रक्रिया, तथा उच्च न्यायालय और राज्य लोक सेवा आयोग के बीच समन्वय में होने वाली कठिनाइयों की वजह से अक्सर भर्ती को लेकर विवाद और मुकदमा प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिससे भर्ती की प्रक्रिया फिर से रुक जाती है।
  4. नियुक्ति प्रक्रिया पर बहुत कम मात्रात्मक और गुणात्मक डेटा उपलब्ध है, और इस क्षेत्र में कोई प्रभावशाली सुधार सामने नहीं आया है।
  5. इसके अलावा, यह पाया गया है कि समस्या का स्रोत अक्सर, कोर्ट रूम से लेकर जजों के आवास तक, खराब बुनियादी ढांचे में होता है।

प्रभाव और निहितार्थ:

  1. अदालतों में लंबित मामलों की संख्या में वृद्धि।
  2. आवश्यक मानव संसाधनों और वित्तीय संसाधनों को आवंटित करने में कोई भी विफलता अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक कार्य को पंगु बना देती है।
  3. अद्लातों में रिक्तियों की वजह से गरीब वादियों (litigants) और विचाराधीन कैदियों को निराशा झेलनी पड़ती है, जिन्हें न्यायिक देरी के कारण सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है।
  4. रिक्तियों के कारण, जिले में कार्यरत शेष न्यायाधीशों के लिए अधिक काम हो जाता है।
  5. रिक्तियों के कारण मामलों का भारी बोझ होने की वजह से न्यायाधीशों को अलग-अलग मामलों पर विचार करने के लिए कम समय मिलता है, जिससे न्याय की गुणवत्ता पर चिंताजनक प्रभाव पड़ता है।

आवश्यकता:

  1. इन न्यायाधीशों की सहायता हेतु लोक सेवा आयोगों के लिए आवश्यक कर्मचारियों की भर्ती करनी चाहिए, और राज्य सरकारों को अधिक अदालतों का निर्माण करना चाहिए या नए न्यायाधीशों के लिए कार्य स्थान उपलब्ध कराना चाहिए।
  2. रिक्तियों को भरने के लिए न्यायाधीशों की भर्ती भी गंभीरता से शुरू की जानी चाहिए।
  3. नियुक्तियां करने की एक सहज और समयबद्ध प्रक्रिया हेतु, उच्च न्यायालयों और राज्य लोक सेवा आयोगों के बीच घनिष्ठ समन्वय की आवश्यकता है।
  4. संबंधित राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों द्वारा इस समन्वय को यथासंभव सर्वोत्तम तरीके से कार्यान्वित किया जाना चाहिए।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग’ के बारे में सुना है? इसे किसके द्वारा गठित किया जाता है?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘कॉलेजियम’ क्या है?
  2. सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति किस प्रकार की जाती है?
  3. सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति
  4. संबंधित संवैधानिक प्रावधान
  5. शक्तियां और कार्य

मेंस लिंक:

न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु ‘कॉलेजियम प्रणाली’ से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

न्यायपालिका एवं अदालतों की सुरक्षा हेतु एक पृथक सुरक्षा बल की आवश्यकता


संदर्भ:

हाल ही में, उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायपालिका और अदालतों में बेहतर सुरक्षा की मांग करने वाली वर्ष 2019 से लंबित याचिकाओं के साथ-साथ, न्यायाधीशों पर हमलों का स्वत: संज्ञान लिया गया था।

  • झारखंड राज्य में हाल ही में हुई एक न्यायाधीश उत्तम आनंद की दिनदहाड़े हत्या, इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
  • शीर्ष अदालत ने, अदालतों और न्यायाधीशों की सुरक्षा के लिए ‘रेलवे सुरक्षा बल’ की भांति एक केंद्रीय सुरक्षा संगठन बनाने पर केंद्र सरकार की राय पूछी है।

नवीनतम अपडेट:

हालिया सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित करते हुए कहा है कि:

  1. न्यायपालिका और अदालत परिसरों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय सुरक्षा बल का गठन करना “उचित नहीं” है। अदालतों की सुरक्षा “राज्यों के लिए छोड़ देना” बेहतर है।
  2. ऐसा इसलिए है, क्योंकि सुरक्षा संबंधी समस्याएं हर राज्य में अलग-अलग होती हैं। इसलिए, स्थानीय अदालतों में सुरक्षा हेतु तैनाती की जरूरतों का आकलन करने और अपराधियों को लाने-ले जाने, और गवाहों की सुरक्षा के साथ-साथ अदालत परिसरों के भीतर अन्य महत्वपूर्ण कार्यों का ध्यान रखने के लिए बेहतर ढंग से तैयार होगी।
  3. इसके अलावा, ‘पुलिस’ संविधान के तहत राज्य का विषय है।

शीर्ष अदालत की प्रतिक्रिया:

कई राज्यों ने अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था का विवरण देने वाले हलफनामे दाखिल करने की जहमत नहीं उठाई है। अन्य जिन लोगों द्वारा इस संबंध में हलफनामा दायर किए गए है, उनमे सुरक्षा व्यवस्था की “शिथिल खाका” प्रस्तुत किया गया है।

  1. शीर्ष अदालत ने राज्यों को 10 दिनों में अपने हलफनामे दाखिल करने की अनुमति दी है, जिसके लिए प्रत्येक को लागत के रूप में ₹ 1 लाख का भुगतान करना होगा।
  2. अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा है, कि इस आदेश का अनुपालन न करने की स्थिति में मुख्य सचिवों को तलब किया जाएगा।

आवश्यकता:

  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता, हमारे संविधान की मूल संरचना का एक अभिन्न अंग है। न्यायाधीशों के लिए जिम्मेदारी युक्त कठिन काम सौंपा जाता है।
  • न्याय सुनिश्चित करना, न्यायाधीशों की जिम्मेदारी है।
  • लोकप्रिय भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, न्यायाधीशों को इस तरह से कार्य करने की आवश्यकता है, कि न्याय न केवल किया जाए, बल्कि यह भी प्रतीत हो कि न्याय हुआ है।
  • न्यायाधीशों को बड़े और महत्वपूर्ण निर्णय लेने होते हैं, जिसके लिए उन्हें निडर और निष्पक्ष रूप से कार्य करने की आवश्यकता होती है। जब न्यायाधीश भयभीत होते हैं, तो इससे उनके कार्य करने की क्षमता में बाधा पहुँचती है।
  • पक्षपात का नही होना, न्यायिक ईमानदारी हेतु मूल तत्व होता है।
  • न्यायपालिका पर राज्य या वादियों द्वारा डाले जाने वाले किसी प्रकार के दबाव से, न्याय की निष्पक्ष कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • किसी भी दबाव, प्रलोभन, प्रलोभन या धमकी से मुक्त एक ‘स्वतंत्र न्यायपालिका’ किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र की आधारशिला होती है।

चिंताएं/चुनौतियां:

न्यायाधीशों को अपने न्यायालय कक्ष के अंदर और बाहर सुरक्षा खतरों का सामना करना पड़ता है। उनके कार्यों के लिए उन्हें असामाजिक तत्वों से नियमित रूप से निपटना पड़ता है। इससे उन पर और उनके परिवार के सदस्यों पर हमले का खतरा बना रहता है। झारखंड के एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश उत्तम आनंद की हालिया हत्या न्यायिक अधिकारियों की संवेदनशीलता को उजागर करती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘विधान’ (legislation) और साधारण कानून के मध्य अंतर के बारे में जानते हैं? संदर्भ: इसे पढ़ें।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता से संबंधित प्रमुख प्रावधान।
  2. संविधान के 42 वें संशोधन के बारे में।

मेंस लिंक:

न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आवश्यकता और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

भुलाए जाने का अधिकार’


(Right to be Forgotten)

संदर्भ:

हाल ही में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और सर्च इंजन क्षेत्र में दिग्गज कंपनी गूगल से दो व्यवसायियों द्वारा एक याचिका का जवाब देने को कहा है। इस याचिका में, याचिकाकर्ताओं द्वारा अपने ‘भुलाए जाने का अधिकार’ (Right to be Forgotten) का हवाला देते हुए, विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से, उनके खिलाफ दर्ज एक आपराधिक मामले से संबंधित कुछ लेखों को हटाने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क देते हुए कहा है, कि मामले से संबंधित तथ्यों और परिस्थितियों के संदर्भ में उन्हें ‘भुलाए जाने का अधिकार’ या “असम्बद्ध किए जाने का अधिकार” (right to delink) प्राप्त है।

आवश्यकता:

याचिका में तर्क दिया गया है कि “संबंधित मामलों में उपयुक्त अदालतों द्वारा याचिकाकर्ताओं सम्मानजनक रूप से बरी कर दिया गया है, फिर भी कथित लेख और उनके खिलाफ ऑनलाइन उपलब्ध गलत जानकारी उन्हें परेशान करती रहती है”।

भारतीय संदर्भ में ‘भुलाए जाने का अधिकार’:

  • ‘भुलाए जाने का अधिकार’ (Right to be Forgotten), व्यक्ति के ‘निजता के अधिकार’ के दायरे में आता है।
  • वर्ष 2017 में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने एक ऐतिहासिक फैसले (पुत्तुस्वामी मामले) में ‘निजता के अधिकार’ को एक ‘मौलिक अधिकार’ (अनुच्छेद 21 के तहत) घोषित कर दिया गया था।

इस संदर्भ में ‘निजी डेटा सुरक्षा विधेयक’ के अंतर्गत किए गए प्रावधान:

‘निजता का अधिकार’, ‘निजी डेटा सुरक्षा विधेयक’ (Personal Data Protection Bill) द्वारा प्रशासित होता है, यद्यपि यह विधेयक अभी संसद में लंबित है।

  • इस ‘विधेयक’ में विशिष्ट रूप से “भुलाए जाने का अधिकार” के बारे में बात की गई है।
  • मोटे तौर पर, ‘भुलाए जाने के अधिकार’ के तहत, उपयोगकर्ता ‘डेटा न्यासियों’ (data fiduciaries) द्वारा जमा की गई अपनी व्यक्तिगत जानकारी को डी-लिंक या सीमित कर सकते है तथा इसे पूरी तरह से हटा भी सकते है या जानकारी को सुधार के साथ दिखाए जाने के लिए इसे सही भी कर सकते हैं।

विधेयक में इस प्रावधान से संबंधित विवाद:

  • इस प्रावधान के साथ मुख्य मुद्दा यह है, कि व्यक्तिगत डेटा और जानकारी की संवेदनशीलता को संबंधित व्यक्ति द्वारा स्वतंत्र रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता है, बल्कि ‘डेटा संरक्षण प्राधिकरण’ (Data Protection AuthorityDPA) द्वारा इसका निरीक्षण किया जाएगा।
  • इसका मतलब यह है, कि हालांकि मसौदा विधेयक में किए गए प्रावधान के अनुसार, उपयोगकर्ता अपने निजी डेटा को इंटरनेट से हटाने की मांग कर सकता है, लेकिन उसका यह अधिकार ‘डेटा संरक्षण प्राधिकरण’ (DPA) के लिए काम करने वाले न्यायनिर्णायक अधिकारी की अनुमति के अधीन होगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘भुलाए जाने के अधिकार’ को ‘विलोपन के अधिकार’ (right to erasure) के रूप में भी जाना जाता है? इस संदर्भ में ‘यूरोपीय संघ’ द्वारा कौन सा कानून लागू किया गया है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘भुलाए जाने का अधिकार’ के बारे में।
  2. ‘निजता का अधिकार’ क्या है?
  3. ‘निजी डेटा संरक्षण विधेयक’ की मुख्य विशेषताएं।

मेंस लिंक:

‘भुलाए जाने का अधिकार’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

 विदेशी अधिकरण


(Foreigners’ Tribunals)

संदर्भ:

असम सरकार के राजनीतिक विभाग द्वारा एक अधिसूचना जारी की गयी है, जिसमे राज्य पुलिस की सीमा शाखा को ‘विदेशी विषयक अधिनियम, 1946 ( Foreigners Act, 1946 ) के तहत गोरखाओं के खिलाफ कोई मामला ‘विदेशी अधिकरणों’ (Foreigners’ Tribunal- FT) को नहीं भेजने का आदेश दिया गया है।

पृष्ठभूमि:

राज्य पुलिस की सीमा शाखा को संदिग्ध नागरिकता वाले लोगों की पहचान करने, और इनके बारे में ‘विदेशी अधिकरण’- एक अर्ध-न्यायिक संस्थान – को सूचना देने का कार्य सौंपा गया है।

राज्य में गोरखों की संख्या:

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में 5 लाख से अधिक गोरखा निवास करते हैं, इनमे से अधिकांश ब्रिटिश प्रशासन के अधीन सशस्त्र बलों के सदस्य के रूप में राज्य में आए थे।

31 अगस्त, 2019 को प्रकाशित ‘राष्ट्रीय नागरिक पंजी’ (National Register of Citizens – NRC) के मसौदे में लगभग 22,000 गोरखाओं को शामिल नहीं किया गया था।

नवीनतम निर्णय के निहितार्थ:

असम में लगभग 2,500 गोरखाओं के मामले, राज्य में स्थापित 100 ‘विदेशी अधिकरणों’ में से कुछ ‘अधिकरणों’ में लंबित हैं। इन सभी मामलों को वापस लिया जाएगा।

‘घोषित विदेशी’ कौन होते है?

‘घोषित विदेशी’ (Declared Foreigners-DF), वे व्यक्ति होते हैं, जो राज्य पुलिस की सीमा शाखा द्वारा अवैध अप्रवासी के रूप में चिह्नित किए जाने पर अपनी नागरिकता का प्रमाण देने में विफल रहते है, और उन्हें किसी एक ‘विदेशी अधिकरण’ (Foreigners’ Tribunal- FT) द्वारा ‘विदेशी’ घोषित कर दिया जाता है।

‘विदेशी अधिकरण’ क्या है?

विदेशी अधिकरण’ (Foreigners’ Tribunal- FT)m ‘विदेशी (अधिकरण) आदेश’ [Foreigners (Tribunals) Order], 1964 के तहत स्थापित अर्ध-न्यायिक निकाय होते हैं।

संरचना: विदेशी अधिकरण के सदस्यों में, असम न्यायिक सेवा का सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी, न्यायिक अनुभव रखने वाला सिविल सेवक जो सचिव या अतिरिक्त सचिव के पद से नीचे सेवानिवृत्त नहीं हुआ हो, कम से कम सात वर्ष के वकालत अनुभव सहित 35 वर्ष से कम आयु का अधिवक्ता को सम्मिलित किया जाता है।

विदेशी अधिकरणों को स्थापित करने की शक्ति:

  • गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा विदेशी (अधिकरण) आदेश, 1964 में संशोधन किए जाने के पश्चात सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ज़िला मजिस्ट्रेटों को ट्रिब्यूनल स्थापित करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
  • इसके पूर्व, ट्रिब्यूनल स्थापित करने की शक्तियाँ केवल केंद्र के पास निहित थीं।

‘विदेशी अधिकरणों’ में अपील करने का अधिकार

  • संशोधित आदेश [विदेशी (अधिकरण) संशोधन आदेश 2019] में सभी व्यक्तियों को अधिकरणों में अपील करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
  • इसके पूर्व, केवल राज्य प्रशासन ही किसी संदिग्ध के खिलाफ इन अधिकरणों में मामला दायर कर सकता था।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं ‘राष्ट्रीय नागरिक पंजी’ (NRC) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) में अंतर के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अवैध प्रवासी (अधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम बनाम विदेशी (अधिकरण) आदेश 1964
  2. इस आदेश के अंतर्गत प्रमाण का दायित्व
  3. अधिकरण द्वारा हल किये जाने वाले विषय
  4. अधिकरण की संरचना।
  5. अधिकरण तथा न्यायालय में अंतर
  6. असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों की भौगोलिक स्थिति।
  7. शरणार्थी बनाम अवैध प्रवासी।
  8. विदेशियों के लिए उपलब्ध मौलिक अधिकार तथा अन्य संवैधानिक प्रावधान
  9. मानवाधिकार बनाम मौलिक अधिकार

मेंस लिंक:

देश में अवैध गैर-प्रवासियों से निपटने के लिए कानूनों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। विदेशी (अधिकरण) आदेश, 1964 में संशोधन क्यों किया गया?

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

RoDTEP योजना


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार द्वारा ‘निर्यात उत्पादों पर शुल्क और करों में छूट’ (Remission of Duties and Taxes on Export Products– RoDTEP) योजना के दिशानिर्देशों और दरों को अधिसूचित कर दिया गया है।

योजना के तहत वर्ष 2021-22 के लिए ₹12,454 करोड़ का बजटीय आवंटन किया गया है। RoDTEP के तहत चिह्नित निर्यात क्षेत्रों में 8555 टैरिफ लाइन शामिल हैं, जो व्यापारिक वस्तुओं का लगभग 75% और भारत के कुल निर्यात का 65% है।

RoDTEP योजना के बारे में:

इस योजना की घोषणा वर्ष 2020 में ‘मर्चेंडाइज़ एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम’ (Merchandise Exports from India Scheme-MEIS) की प्रतिस्थापना करने हेतु की गई थी, जो कि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप नहीं थी।

इस योजना के तहत, निर्यातकों के लिए ‘निर्यात उत्पादों’ पर लगने वाले ‘संलग्न केंद्रीय, राज्य और स्थानीय शुल्कों या करों’ को वापस किए जाने का प्रावधान किया गया है। इन करों से अब तक निर्यातकों के लिए छूट नहीं दी जा रही थी अथवा वापस नहीं किए जा रहे थे और इसलिए, भारत के निर्यात को नुकसान में रखते थे।

प्रमुख बिंदु:

  1. घरेलू करों को बाहर भेजने पर रोक को सुनिश्चित करते हुए निर्यात की ‘जीरो रेटिंग’ को चालू करने हेतु, योजना के तहत राज्यों और यहां तक ​​कि ग्राम पंचायतों द्वारा लगाए गए सभी करों को वापस कर दिया जाएगा।
  2. ‘निर्यात उत्पादों पर शुल्क और करों में छूट’ (RoDTEP) योजना के तहत दी जा रही यह छूट, ‘विश्व व्यापार संगठन’ (WTO) द्वारा जारी कानूनी सलाह के अनुपालन में है, जिसके तहत देश से बाहर भेजे जाने बाले माल पर 0.5% से 4.3% तक की छूट दी सकती है।
  3. चॉकलेट, टॉफी और चीनी कन्फेक्शनरी जैसी वस्तुओं पर छूट की सबसे न्यूनतम दर की पेशकश की गयी है, जबकि कच्चे सूत और फाइबर को उच्चतम दर निर्धारित की गई है।
  4. स्टील, फार्मा और रसायनों को इस योजना के तहत शामिल नहीं किया गया है क्योंकि उनके निर्यात ने बगैर किसी प्रोत्साहन के अच्छा प्रदर्शन किया है।

महत्व:

  • इस योजना के माध्यम से भारतीय निर्यातक, निर्यात के लिए आवश्यक अंतर्राष्ट्रीय मानकों को पूरा करने में सक्षम होंगे। इसके तहत अंतर्राष्ट्रीय संगठनों पर निर्भर रहने के बजाय निर्यातकों को देश में ही सस्ती परीक्षण और प्रमाणन उपलब्ध कराया जाएगा।
  • इसके तहत, निर्यातकों के लिए कर निर्धारण प्रक्रिया पूर्णतयः स्वचालित हो जाएगी। व्यवसायों के लिए स्वचालित रिफंड-मार्ग के माध्यम से अपने GST रिफंड हेतु पहुंच हासिल होगी।
  • इससे देश की अर्थव्यवस्था और उद्यमों के लिए कार्यशील पूंजी में वृद्धि होगी।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि RoDTEP योजना की घोषणा 1 जनवरी 2020 में पहले से लागू व्यापारिक और सेवा निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं (MEIS और SEIS) को प्रतिस्थापित करने हेतु की गई थी, जो कि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप नहीं थी।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. RoDTEP योजना की मुख्य विशेषताएं
  2. लाभ
  3. पात्रता

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नई दिल्ली में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा नवीकृत जीन बैंक


(World’s second-largest refurbished gene bank at New Delhi)

संदर्भ:

हाल ही में ‘राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो’ (National Bureau of Plant Genetic Resources- NBPGR), पूसा, नई दिल्ली में विश्व के दूसरे सबसे बड़े नवीकृत अत्याधुनिक राष्ट्रीय जीन बैंक का उद्घाटन किया गया है।

‘जीन बैंक’ (Gene Banks) क्या होता हैं?

आपात स्थिति में लोग बैंकों में अपना पैसा जमा करके बचाते हैं। आनुवंशिक (जेनेटिक) बैंक, दुर्लभ पौधों और जानवरों का संरक्षण करने हेतु कार्य करने वाले किसानों और वैज्ञानिकों के लिए इसी तरह के उद्देश्य की पूर्ति करते हैं।

महत्व:

  1. शोधकर्ता या किसान, दुर्लभ पौधों की किस्मों और जानवरों की नस्लों की आबादी को दोबारा विकसित करने में मदद करने हेतु या विभिन्न प्रजातियों में आनुवंशिक विविधता को बढ़ाने में मदद करने हेतु इन “जीन” बैंकों में रखे हुए नमूने वापस ले सकते हैं।
  2. जीन बैंक में असामान्य जीन वेरिएंट वाली कोशिकाओं या जीवों अर्थात विशेष लक्षणों वाले जींस को भी संरक्षित करते हैं। बाद में यह जींस, किसी महामारी आने पर, जलवायु परिवर्तन की स्थिति में, या किन्ही अन्य कारकों द्वारा पौधों या जानवरों के अस्तित्व को संकट होने पर उपयोगी साबित हो सकते हैं।
  3. किसान बैंक में जमा की गई ‘संग्रहित कोशिकाओं’ या ‘ऊतकों’ का उपयोग आनुवंशिक विविधता को बहाल करने या अपनी फसल में किसी अन्य नस्ल या किस्म के लक्षणों को पाने के लिए कर सकते हैं।

‘नेशनल जीन बैंक’ (NGB) के बारे में:

  • नेशनल जीन बैंक की स्थापना वर्ष 1996 में पादप आनुवंशिक संसाधनों (Plant Genetic Resources – PGR) के बीजों को भावी पीढ़ियों के लिये संरक्षित करने हेतु की गई थी।
  • इसमें बीजों के रूप में लगभग एक मिलियन जर्मप्लाज़्म को संरक्षित करने की क्षमता है।
  • इसमें विभिन्न फसल समूहों जैसे अनाज, बाजरा, औषधीय और सुगंधित पौधों और नशीले पदार्थों आदि का भंडारण किया जाता है।
  • वर्तमान में, नेशनल जीन बैंक 52 लाख अनुवृद्धियों (accessions) को संरक्षित कर रहा है, जिनमें से 2.7 लाख भारतीय जर्मप्लाज़्म हैं जबकि शेष अन्य देशों से आयात किए गए हैं।

‘नेशनल जीन बैंक’ में दीर्घावधि के साथ-साथ मध्यम अवधि के संरक्षण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए चार प्रकार की सुविधाएं हैं:

  1. सीड जीन बैंक (- 18°C)
  2. क्रायो जीन बैंक (-170°C से-196°C)
  3. इन-विट्रो जीन बैंक (25 डिग्री सेल्सियस)
  4. फील्ड जीन बैंक

जीन बैंक की आवश्यकता:

इससे देश के किसान आत्मनिर्भर होंगे और सरकार इस दिशा में हर संभव प्रयास कर रही है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के नियंत्रण में कार्य करता है। ICAR के अधीन कार्य करने वाले अन्य संस्थानों के बारे में जानिए।

क्या आप जानते हैं, कि नॉर्वे में स्थित ‘स्वालबार्ड ग्लोबल सीड वॉल्ट’ दुनिया का सबसे बड़ा बीज संग्रह केंद्र है?

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 

भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ‘वित्तीय समावेशन सूचकांक’ की शुरुआत

  • हाल ही में, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा देश भर में वित्तीय समावेशन की सीमा को मापने के लिए एक सम्मिश्र ‘वित्तीय समावेशन सूचकांक’ (Financial Inclusion Index: FI-Index)) का निर्माण किया गया है।
  • मार्च 2021 को समाप्त अवधि के लिए वार्षिक एफआई-सूचकांक 53.9 है, जबकि मार्च 2017 को समाप्त अवधि के लिए यह 43.4 था।

‘वित्तीय समावेशन सूचकांक’ (एफआई-सूचकांक) के बारे में:

  1. एफआई-सूचकांक को वार्षिक आधार पर प्रति वर्ष जुलाई में प्रकाशित किया जाएगा।
  2. इस एफआई-सूचकांक को सरकार और संबंधित क्षेत्र के विनियामकों के परामर्श से बनाया गया है, जिसमे बैंकिंग, निवेश, बीमा, डाक के साथ-साथ पेंशन क्षेत्र के विवरण को शामिल करते हुए एक व्यापक सूचकांक के रूप में संकल्पित किया गया है।
  3. यह सूचकांक 0 और 100 के बीच की एकल संख्या में वित्तीय समावेशन के विभिन्न पहलुओं पर जानकारी प्राप्त करता है, जहां 0 पूर्ण वित्तीय अपवर्जन का प्रतिनिधित्व करता है वहीं 100 पूर्ण वित्तीय समावेशन को दर्शाता है।
  4. एफआई-सूचकांक में तीन व्यापक पैरामीटर अर्थात्त, पहुंच (access), उपयोग (usage) और गुणवत्ता (quality) शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक में विभिन्न आयाम शामिल हैं, जिसकी गणना कुछ संकेतकों के आधार पर की जाती है।
  5. इस एफआई-सूचकांक का निर्माण बिना किसी ‘आधार वर्ष’ के किया गया है

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