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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 17 August 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. उत्तर प्रदेश सरकार की ‘दो बच्चा नीति’

2. अधिकरण कानून सुधार

3. भारतीय ध्वज संहिता

 

सामान्य अध्ययन-III

1. क्रिप्टोकरेंसी संबंधी विधेयक

2. रामसर सूची में भारत के चार और आर्द्र स्थल शामिल

3. भारत में मादक पदार्थों की तस्करी

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In)

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानकर्ताओं, लोकोपकारी संस्थाओं, संस्थागत एवं अन्य पक्षों की भूमिका।

उत्तर प्रदेश सरकार की ‘दो बच्चा नीति


संदर्भ:

जनता से प्राप्त 8,000 से अधिक सुझावों की समीक्षा करने के बाद, उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग द्वारा एक नए जनसंख्या नियंत्रण कानून “उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण एवं कल्याण) विधेयक, 2021” (The Uttar Pradesh Population (Control, Stabilisation and Welfare) Bill, 2021) पर एक रिपोर्ट और मसौदा विधेयक प्रस्तुत किया गया है। ‘राज्य विधि आयोग’ के मसौदा में राज्य सरकार के लिए ‘दो बच्चा नीति’ (Two-Child Policy) लागू करने का प्रस्ताव दिया गया है।

आयोग द्वारा स्वीकार किए गए प्रमुख सुझाव:

  • जिस परिवार में केवल एक बच्चा है और उसने स्वैच्छिक नसबंदी करा ली है, ऐसे सभी परिवारों को (चाहे वे बीपीएल श्रेणी में आते हो अथवा नहीं) विशेष सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए।
  • कानून लागू होने के बाद जिस व्यक्ति के दो से अधिक बच्चे होते हैं, उसे कल्याणकारी योजनाओं जैसे कई लाभों से वंचित कर दिया जाना चाहिए।

पृष्ठभूमि:

इस वर्ष विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई) के अवसर पर, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2021-2030 की अवधि के लिए एक ‘नई जनसंख्या नीति’ (New Population Policy) की घोषणा की गयी थी।

इस नई नीति में, जनसंख्या नियंत्रण में योगदान करने वालों के लिए प्रोत्साहन देने का प्रावधान किया गया है।

जनसंख्या नियंत्रण विधेयक ड्राफ्ट के प्रमुख बिंदु:

नई नीति का उद्देश्य-

  1. कुल प्रजनन दर को, वर्तमान में प्रति हजार आबादी पर 2.7 से घटाकर वर्ष 2026 तक 2.1 और वर्ष 2030 तक 1.7 करना है।
  2. आधुनिक गर्भनिरोधक प्रचलन दर को, वर्तमान में 31.7% से बढ़ाकर वर्ष 2026 तक 45% और वर्ष 2030 तक 52% करना है।
  3. पुरुषों द्वारा उपयोग किए जाने वाले गर्भनिरोधक तरीकों को, वर्तमान में 10.8% से बढ़ाकर वर्ष 2026 तक 15.1% और वर्ष 2030 तक 16.4% करना है।
  4. मातृ मृत्यु दर को 197 से घटाकर 150 से 98 तक और शिशु मृत्यु दर को 43 से घटाकर 32 से 22 तक और पांच वर्ष से कम आयु के शिशुओं की मृत्यु दर को 47 से घटाकर 35 से 25 तक लाना है।

नीति के तहत केंद्रीय क्षेत्र:

  1. परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत जारी गर्भनिरोधक उपायों की सुलभता को बढ़ाना और सुरक्षित गर्भपात के लिए उचित व्यवस्था उपलब्ध कराना।
  2. नवजात शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर को कम करना।
  3. बुजुर्गों की देखभाल और 11 से 19 साल के किशोरों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के बेहतर प्रबंधन की व्यवस्था करना।

नीति के तहत प्रोत्साहन:

  1. जनसंख्या नियंत्रण मानदंडों का पालन करने वाले तथा दो या इससे कम बच्चों वाले कर्मचारियों को पदोन्नति, वेतन वृद्धि, आवास योजनाओं में रियायतें और अन्य सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।
  2. दो बच्चे के मानक को पूरा करने वाले लोक सेवकों को उनकी पूरी सेवा के दौरान दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि, पूरे वेतन और भत्तों सहित 12 महीने का पितृत्व या मातृत्व अवकाश और ‘राष्ट्रीय पेंशन योजना’ के अंतर्गत, नियोक्ता की योगदान राशि में तीन प्रतिशत की वृद्धि प्रदान की जाएगी।
  3. जनसंख्या को नियंत्रण में योगदान करने वाले गैर-सरकारी कर्मचारियों को जल, आवास, गृह ऋण आदि पर करों में छूट जैसे लाभ दिए जाएंगे।
  4. यदि किसी बच्चे के माता-पिता द्वारा पुरुष नसबंदी का विकल्प चुनते हैं, तो उस बच्चे के लिए 20 वर्ष की आयु तक मुफ्त चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान की जाएंगी।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा, इन उपायों को लागू करने के लिए एक ‘राज्य जनसंख्या कोष’ (State Population Fund) स्थापित करने की योजना है।

जागरूकता निर्माण:

विधेयक के मसौदा में, राज्य सरकार से सभी माध्यमिक विद्यालयों में जनसंख्या नियंत्रण को अनिवार्य विषय के रूप में शुरू करने के लिए कहा गया है।

प्रयोज्यता:

  1. इस कानून के प्रावधान विवाहित जोड़ों पर लागू होंगे। विवाहित युग्म में पुरुष की न्यूनतम आयु 21 साल तथा महिला की आयु 18 साल से कम नहीं होनी चाहिए है।
  2. यह नीति स्वैच्छिक होगी – इसे किसी पर जबरदस्ती लागू नहीं किया जाएगा।

इन उपायों की आवश्यकता:

अधिक जनसंख्या से उपलब्ध संसाधनों पर ज्यादा दबाव पड़ता है। अतः, सभी नागरिकों को, सस्ता एवं पौष्टिक भोजन, सुरक्षित पेयजल, उपयुक्त आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच, आर्थिक एवं आजीविका हेतु अवसर, घरेलू उपभोग हेतु बिजली और सुरक्षित जीवन सहित मानव जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की उपलब्धता सुलभ होने के लिए ये उपाय अविलंब लागू करना आवश्यक है।

विधेयक से जुड़े मुद्दे और चिंताएं:

  1. विशेषज्ञों द्वारा, महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण को संकट में डालने वाली किसी भी जनसंख्या नीति के प्रति सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।
  2. गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन का बोझ महिलाओं पर असमान रूप से पड़ता है, इसे देखते हुए, इस नीति के लागू होने से महिला नसबंदी में और वृद्धि होने की संभावना है।
  3. भारत में पुत्र को दी जाने वाली वरीयता को देखते हुए, कड़े जनसंख्या नियंत्रण उपायों से असुरक्षित गर्भपात एवं भ्रूण हत्याओं जैसी प्रथाओं में वृद्धि हो सकती है। इस तरह के उदाहरण, अतीत में कुछ राज्यों में देखे जा चुके हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप मिशन परिवार विकास’ के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मसौदे के प्रमुख बिंदु
  2. नवीनतम जनगणना आंकड़े

मेंस लिंक:

उत्तर प्रदेश में ‘जनसंख्या नीति’ मसौदा से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

अधिकरण कानून सुधार


(Tribunal law Reforms)

संदर्भ:

हाल ही में, अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 (Tribunal Reforms Act, 2021) दोनों सदनों में पारित कर दिया गया। इस कानून ने ‘विधि-निर्माण करने की शक्तियों और सीमाओं’ के संदर्भ में विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक नया गतिरोध शुरू कर दिया है।

विवादास्पद प्रावधान:

  1. विधेयक के अनुसार, अधिकरणों के सदस्यों के रूप में अधिवक्ताओं की नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु 50 वर्ष और कार्यकाल चार वर्ष होगा। अदालत के अनुसार, यह ‘निर्धारित सीमा रेखा’ एकपक्षीय और मनमानी है। इस पर सरकार ने तर्क दिया है कि यह प्रावधान, अधिकरणों के सदस्यों के चुनाव हेतु अधिवक्ताओं के एक विशेषज्ञ प्रतिभा पूल को तैयार करेगा।
  2. अधिनियम की धारा 3(1), धारा 3(7), 5 और 7(1), संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 50 के दायरे से बाहर हैं। अधिनियम की धारा 3(1) में 50 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को अधिकरणों में नियुक्ति से प्रतिबंधित किया गया है। यह प्रावधान कार्यकाल की लंबाई /सुरक्षा को दुर्बल करता है तथा न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत, दोनों का उल्लंघन करता है।
  3. अधिनियम की धारा 3(7) के तहत ‘खोज एवं चयन समिति’ (Search-cum-Selection Committee) द्वारा केंद्र सरकार के लिए दो नामों के एक पैनल की सिफारिश करना अनिवार्य किया गया था। यह प्रावधान भी ‘शक्तियों के पृथक्करण’ और ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

अधिकरण सुधार (सुव्यवस्थीकरण और सेवा शर्तें) अधिनियम, 2021 के प्रमुख बिंदु:

अधिनियम में, ‘अधिकरण’ (ट्रिब्यूनल) के विभिन्न सदस्यों हेतु समान नियम और सेवा-शर्तों का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, विधेयक में, अधिकरणों को युक्तिसंगत बनाने हेतु प्रयास के रूप में कुछ अधिकरणों को समाप्त करने प्रस्ताव किया गया है।

मुख्य परिवर्तन:

  1. विधेयक में, कुछ मौजूदा अपीलीय निकायों को भंग करने और उनके कार्यों (जैसे अपीलों पर न्यायिक निर्णय लेना) को दूसरे मौजूदा न्यायिक निकायों को अंतरित करने का प्रावधान किया गया है।
  2. विधेयक के तहत, केंद्र सरकार को अधिकरणों के सदस्यों की योग्यता, नियुक्ति, पदावधि, वेतन और भत्ते, त्यागपत्र, पद-मुक्ति और अन्य नियमो व सेवा-शर्तों हेतु नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है।
  3. विधेयक के अनुसार, केंद्र सरकार ‘खोज एवं चयन समिति’ (Search-cum-Selection Committee) के सुझाव पर अधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति करेगी। इस समिति की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा की जाएगी।
  4. राज्य प्रशासनिक अधिकरणों (State Tribunals) के लिए, एक पृथक ‘खोज समिति’ होगी।
  5. केंद्र सरकार को ‘खोज एवं चयन समितियों’ के सुझावों पर तीन महीने के भीतर ‘अधिमान्य रूप से’ फैसला लेना लेना होगा।
  6. कार्यकाल: अधिकरण का अध्यक्ष, 4 साल की अवधि या 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, तक पद धारण करेगा। अधिकरण के अन्य सदस्य, 4 साल की अवधि या 67 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, तक पद धारण करेंगे।

अपीलीय अधिकरणों का उन्मूलन:

विधेयक के तहत, पांच अधिकरणों – ‘फिल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण’,  ‘हवाईअड्डा अपीलीय अधिकरण’, ‘अग्रिम निर्णय प्राधिकरण’, ‘बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड’ और ‘पादप प्रजाति संरक्षण अपीलीय अधिकरण’ – को समाप्त करने तथा उनके कार्यों को मौजूदा न्यायिक निकायों के लिए अंतरित किया जाने का प्रस्ताव किया गया है।

विधेयक के संदर्भ में अदालत का निर्णय:

  • ‘मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ’ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने किसी अधिकरण के अध्यक्ष एवं सदस्यों के के रूप में नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु 50 वर्ष और चार साल का कार्यकाल, निर्धारित करने वाले प्रावधानों को रद् कर दिया था।
  • अदालत के अनुसार- इस प्रकार की शर्तें, शक्तियों के पृथक्करण, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, विधि के शासन और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं।

संबंधित विवाद:

विधेयक के द्वारा निम्नलिखित प्रावधानों के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने का प्रयास किया गया है:

  1. विधेयक में आवश्यक न्यूनतम आयु को 50 वर्ष रखा गया है।
  2. अधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल चार वर्ष का प्रस्तावित किया गया है।
  3. प्रत्येक पद पर नियुक्ति के लिए ‘खोज एवं चयन समिति’ द्वारा दो नामों की सिफारिश और सरकार द्वारा तीन महीने के भीतर निर्णय लेने की अपेक्षा की गयी है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप न्यायाधिकरणों एवं न्यायालयों के बीच अंतर के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अधिकरण क्या होते हैं?
  2. इस संबंध में संवैधानिक प्रावधान।
  3. संरचना और कार्य।
  4. नवीनतम अध्यादेश का अवलोकन।

मेंस लिंक:

क्या ‘अधिकरण’, न्यायिक दक्षता के लिए रामबाण के समान होते हैं? क्या ‘न्याय’ हेतु अधिकरणों का गठन करना हमारे संविधान में निर्धारित सिद्धांतों को कमजोर करता है? जांच कीजिए।

 स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

भारतीय ध्वज संहिता


(Flag Code of India)

22 जुलाई, 1947 को, भारत की स्वतंत्रता से 23 दिन पहले संविधान सभा की एक बैठक में भारत के राष्ट्रीय ध्वज को इसके वर्तमान स्वरूप (क्षैतिज आयताकार तिरंगा) में अपनाया गया था और 15 अगस्त 1947 को यह भारतीय स्वतंत्र-उपनिवेश (Dominion of India) का आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज बन गया।

राष्ट्रीय ध्वज का विकास:

  • वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज, ‘पिंगली वेंकय्या’ द्वारा अधिकल्पित किए गए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्वराज ध्वज पर आधारित है।
  • ध्वज में कई बार परिवर्तन किए जाने के बाद, वर्ष 1931 में कराची में आयोजित कांग्रेस कमेटी की बैठक में तिरंगे को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया था।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज के संबंध में संवैधानिक और वैधानिक प्रावधान:

अनुच्छेद 51A(a) – संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान सम्मान करना।

ध्वज का उपयोग करने के संदर्भ में क़ानून:

  1. संप्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, 1950 (Emblems and Names (Prevention of Improper Use) Act, 1950)
  2. राष्ट्र-गौरव अपमान-निवारण अधिनियम, 1971 (Prevention of Insults to National Honour Act, 1971)

तिरंगे के प्रदर्शन संबंधी नियम:

‘ध्वज संहिता, 2002’ को तीन भागों में बांटा गया है:

  1. तिरंगे का एक सामान्य विवरण।
  2. सरकारों और सरकारी निकायों द्वारा ध्वज-प्रदर्शन हेतु नियम।
  3. सार्वजनिक एवं निजी निकायों तथा शैक्षणिक संस्थानों द्वारा ध्वज के प्रदर्शन हेतु नियम।

उल्लेखनीय तथ्य:

  • भारत का राष्ट्रीय ध्वज, हाथ से काते गए और हाथ से बुने हुए ऊन / कपास /रेशम खादी की पट्टियों से निर्मित होगा।
  • राष्ट्रीय ध्वज, आकार में आयताकार होगा। झंडे की लंबाई और ऊंचाई (चौड़ाई) का अनुपात 3:2 होगा।
  • सरकार द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार सार्वजनिक भवनों पर झंडे को आधा झुकाए जाने के अवसरों को छोड़कर, आधा झुका हुआ झंडा नहीं फहराया जाएगा।
  • राज्य द्वारा किए जाने वाले अंतिम संस्कार या सशस्त्र बलों अथवा अन्य अर्धसैनिक बलों के अंत्येष्टि संस्कार को छोड़कर, निजी अंतिम संस्कार सहित किसी भी रूप में ध्वज का उपयोग, किसी भी रूप में शव- आवरण के रूप में नहीं किया जाएगा।
  • ध्वज का उपयोग किसी भी प्रकार की पोशाक या वर्दी के हिस्से के रूप में नहीं किया जाएगा, और न ही इसकी, किसी तकिया, रूमाल, नैपकिन या किसी ड्रेस सामग्री पर छपाई या कशीदाकारी की जाएगी।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का महत्व निम्नलिखित तरीके से बताया गया है:

  1. “अशोक चक्र” धर्म के विधान का पहिया है। चक्र यह प्रदर्शित करता है, कि गति में जीवन है और ठहराव में मृत्यु है।
  2. भगवा रंग, अनासक्ति के परित्याग को दर्शाता है।
  3. ध्वज के केंद्र में सफेद रंग की पट्टिका है, जो प्रकाश एवं हमारे आचरण का मार्गदर्शन करने के लिए सत्य के मार्ग को को दर्शाती है।
  4. हरा रंग, यहां की मिट्टी और वनस्पति से हमारे संबंध को दर्शाता है, जिस पर अन्य सभी जीवन का निर्भर होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप वर्ष 1923 में, मध्य प्रदेश के जबलपुर और महाराष्ट्र के नागपुर में आयोजित में ‘ध्वज सत्याग्रह’ / ‘झंडा सत्याग्रह’ के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. एंग्लो बोअर युद्ध के बारे में।
  2. वेंकैया द्वारा डिज़ाइन किया गया झंडा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा आधिकारिक तौर पर कब स्वीकार किया गया था?
  3. संविधान सभा द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को कब अपनाया गया।
  4. भारतीय धवज संहिता- अवलोकन।
  5. भारत में राष्ट्रीय ध्वज को कौन निर्मित करता है?
  6. भारत में हुए ‘झंडा सत्याग्रह’ के बारे में।

मेंस लिंक:

भारतीय धवज संहिता, 2002 के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

क्रिप्टोकरेंसी संबंधी विधेयक


संदर्भ:

क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) को विनियमित करने संबंधी प्रस्तावित कानून को केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष पेश किया गया है और इस पर मंत्रिमंडल की स्वीकृति की प्रतीक्षा की आ रही है।

क्रिप्टोकरेंसी पर वर्तमान स्थिति:

  • क्रिप्टोकरेंसी मामले पर गठित एक अंतर-मंत्रालयी समिति द्वारा, भारत में राज्य द्वारा जारी किसी भी आभासी मुद्राओं को छोड़कर, सभी निजी क्रिप्टोकरेंसी को प्रतिबंधित किए जाने की सिफारिश की गयी है।
  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी बाजार में कारोबार की जाने वाली क्रिप्टोकरेंसी पर चिंता जताई है और इस बारे में केंद्र के लिए अवगत कराया है।
  • मार्च 2020 में वापस, सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों को आरबीआई द्वारा वर्ष 2018 में जारी सर्कुलर की उपेक्षा करते हुए क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित सेवाओं को बहाल करने की अनुमति दी थी। आरबीआई द्वारा क्रिप्टोकरेंसी को (“अनुरूपता” के आधार पर) प्रतिबंधित कर दिया था।

विधेयक का अवलोकन:

क्रिप्टोकरेंसी एवं आधिकारिक डिजिटल मुद्रा विनियमन विधेयक, 2021 (Cryptocurrency and Regulation of Official Digital Currency Bill, 2021) के तहत सभी प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसीज पर प्रतिबंध लगाने तथा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा ऑफिशियल डिजिटल करेंसी जारी किए जाने का प्रावधान किया गया है।

इस कानून के उद्देश्य:

  1. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी आधिकारिक डिजिटल मुद्रा हेतु सुविधाजनक ढांचा तैयार करना।
  2. भारत में सभी प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसीज को प्रतिबंधित करना।

‘क्रिप्टोकरेंसी’ क्या हैं?

क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrencies) एक प्रक्रार की डिजिटल करेंसी होती है, जो क्रिप्टोग्राफी के नियमों के आधार पर संचालित और बनाई जाती है। क्रिप्टोग्राफी का अर्थ को कोडिंग की भाषा को सुलझाने की कला है। यह एक इलेक्ट्रॉनिक कैश सिस्टम होता है, जिसमे ‘किसी वित्तीय संस्था के बगैर एक पार्टी द्वारा दूसरी पार्टी को ऑनलाइन भुगतान किया जाता है ।

उदाहरण: बिटकॉइन, एथेरियम (Ethereum)आदि।

 

सरकार द्वारा क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध लगाए जाने संबंधी कारण:

  1. संप्रभु प्रत्याभूत (Sovereign guarantee): क्रिप्टोकरेंसी उपभोक्ताओं के लिए जोखिम उत्पन्न करती है। इनके पास कोई सॉवरेन गारंटी / संप्रभु प्रत्याभूत नहीं होता है और इसलिए ये वैध मुद्रा नहीं होती हैं।
  2. बाजार में उतार-चढ़ाव (Market volatility): इनकी प्रत्याशित प्रकृति भी इन्हें अत्यधिक अस्थिर बनाती है। उदाहरण के लिए, बिटकॉइन का मूल्य दिसंबर 2017 में 20,000 अमेरिकी डॉलर से गिरकर नवंबर 2018 में 3,800 अमेरिकी डॉलर हो गया।
  3. सुरक्षा जोखिम: यदि किसी प्रकार से उपयोगकर्ता की अपनी निजी कुंजी खो जाती है (पारंपरिक डिजिटल बैंकिंग खातों के विपरीत, इसे पासवर्ड रीसेट नहीं किया जा सकता है) तो उपयोगकर्ता अपनी क्रिप्टोकरेंसी तक पहुंच खो देता है।
  4. मैलवेयर संबंधी धमकी: कुछ मामलों में, इन निजी कुंजियों को तकनीकी सेवा प्रदाताओं (क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज या वॉलेट) द्वारा संग्रहीत किया जाता है, जो मैलवेयर या हैकिंग के प्रति संवेदनशील होते हैं।
  5. मनी लॉन्ड्रिंग।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा बेंगलुरु में ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी में उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence – CoE) की स्थापना की गई है। क्या आप जानते हैं कि यह कैसे काम करता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विभिन्न क्रिप्टोकरेंसी
  2. विभिन्न देशों द्वारा शुरू की गई क्रिप्टोकरेंसी
  3. ब्लॉकचेन तकनीक क्या है?

मेंस लिंक:

क्रिप्टोकरेंसी क्या हैं? इसके विनियमन की आवश्यकता कर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

रामसर सूची में भारत के चार और आर्द्र स्थल शामिल


संदर्भ:

हाल ही में, भारत की चार और आर्द्रभूमियों (Wetlands) को ‘रामसर अभिसमय’ (Ramsar Convention) के तहत अंतरराष्ट्रीय महत्व के आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता दी गई है। इसके साथ ही भारत में रामसर स्थलों की संख्या 46 हो गई है और इन स्थलों से आच्छादित सतह क्षेत्र अब 1,083,322 हेक्टेयर हो गया है।

नए आर्द्र-स्थलों में शामिल हैं:

  1. सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान, हरियाणा: यह उद्यान पक्षियों, शीतकालीन प्रवासी और स्थानीय प्रवासी जलपक्षियों की 220 से अधिक प्रजातियों की उनके अपने जीवन चक्र के महत्वपूर्ण चरणों में आश्रय देकर संभरण करता है। इनमें से दस से अधिक प्रजातियाँ विश्व स्तर पर खतरे में आ चुकी हैं, जिनमें अत्यधिक संकट में लुप्तप्राय होने की कगार पर आ चुके मिलनसार टिटहरी (लैपविंग) और लुप्तप्राय मिस्र के गिद्ध, सेकर फाल्कन, पलास की मछली(फिश) ईगल और ब्लैक-बेलिड टर्न शामिल हैं।
  2. भिंडावास वन्यजीव अभयारण्य, हरियाणा: यह मानव निर्मित मीठे पानी की आर्द्रभूमि है। यह इस प्रकार की हरियाणा की सबसे बड़ी आर्द्रभूमि है।
  3. थोल, गुजरात: गुजरात की थोल झील वन्यजीव अभयारण्य पक्षियों के मध्य एशियाई उड़ान मार्ग (फ्लाईवे) पर स्थित है और यहां 320 से अधिक पक्षी प्रजातियां पाई जा सकती हैं। यह आर्द्रभूमि अत्यधिक संकट-ग्रस्त लुप्तप्राय सफेद-पंख वाले गिद्ध और मिलनसार टिटहरी (लैपविंग) और संकटग्रस्त सारस बगुले (क्रेन), बत्तखें (कॉमन पोचार्ड) और हल्के सफ़ेद हंस (लेसर व्हाइट-फ्रंटेड गूज़), जैसे 30 से अधिक संकटग्रस्त जलपक्षी प्रजातियों की शरण-स्थली भी है।
  4. वाधवाना, गुजरात: गुजरात में वाधवाना आर्द्रभूमि (वेटलैंड) अपने पक्षी जीवन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रवासी जलपक्षियों को सर्दियों में रहने के लिए उचित स्थान प्रदान करती है। इनमें लुप्तप्राय पलास की मछली-ईगल, दुर्बल संकटग्रस्त सामान्य बत्तखें (कॉमन पोचार्ड) और आसन्न संकट वाले डालमेटियन पेलिकन, भूरे सर वाली (ग्रे-हेडेड) फिश-ईगल और फेरुगिनस डक, जैसी कुछ संकटग्रस्त या संकट के समीप आ चुकी प्रजातियां शामिल हैं।

स्वस्थ-ग्रह के लिए आर्द्रभूमियाँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?

हमारे ग्रह पर लोगों की सेहत, आर्द्रभूमियों के स्वास्थ्य पर निर्भर करती है।

  • विश्व की 40% प्रजातियाँ आर्द्रभूमियों में निवास करती हैं अथवा इनमे प्रजनन करती हैं।
  • आर्द्रभूमियां ‘जीवन की नर्सरी’ होती हैं – लगभग 40% जीव आर्द्रभूमियों में प्रजनन करते हैं।
  • आर्द्रभूमियां ‘पृथ्वी के फेफड़े’ होती हैं, और यह वातावरण से प्रदूषकों को साफ करते हैं।
  • आर्द्रभूमियां ‘जलवायु परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण’ होती हैं- ये 30% भूमि आधारित कार्बन का भंडारण करती हैं।
  • आर्द्रभूमियां ‘आपदा जोखिम को कम करती हैं’- ये तूफानों के वेग को अवरुद्ध करती हैं।

रामसर अभिसमय’ के बारे में:

‘रामसर अभिसमय’ (Ramsar Convention) आर्द्रभूमियों के संरक्षण को प्रोत्साहित करने वाला एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है।

  • इस अभिसमय पर 2 फरवरी 1971 को कैस्पियन सागर के तट पर स्थति ईरान के शहर रामसर में हस्ताक्षर किए गए थे, इसलिए इसे ‘रामसर अभिसमय’ (Ramsar Convention) कहा जाता है।
  • संयुक्त राष्ट्र के लगभग 90% सदस्य देश इस ‘अभिसमय’ का हिस्सा हैं।
  • आधिकारिक तौर पर इसे, ‘अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्र्भूमियों, विशेषकर जल-पक्षी वास-स्थल पर अभिसमय’ (Convention on Wetlands of International Importance especially as Waterfowl Habitat) कहा जाता है।

मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड’ (Montreux Record)

‘रामसर अभिसमय’ के तहत ‘मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड’ (Montreux Record) अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्र्भूमियों की सूची में आर्द्र्भूमि स्थलों का एक रजिस्टर है। इसमें मानवीय हस्तक्षेप व प्रदूषण के कारण पारिस्थितिकी रूप से संकटापन्न आर्द्र्भूमियों को शामिल किया जाता है ।

इसे रामसर सूची के भाग के रूप में बरकरार रखा जाता है।

  • मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड की स्थापना ‘कॉन्फ्रेंस ऑफ कॉन्ट्रैक्टिंग पार्टीज़’ (Conference of the Contracting Parties), 1990 की सिफारशों के तहत की गयी थी।
  • मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड में किसी भी स्थल को केवल संबंधित अनुबंधित पक्षकारों (Contracting Parties) की सहमति से जोड़ा और हटाया जा सकता है।
  • वर्तमान में, मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड में दो भारतीय स्थल लोकटक झील, मणिपुर और केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, राजस्थान हैं।
  • एक बार चिल्का झील (ओडिशा) को इस सूची में स्थान दिया गया था, परन्तु आगे चलकर इसे वहाँ से हटा दिया गया।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘महत्वपूर्ण पक्षी और जैव विविधता क्षेत्र’ (Important Bird and Biodiversity Area – IBA) क्या हैं? इन क्षेत्रों का संरक्षण किस प्रकार किया जाता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘रामसर अभिसमय’ के बारे में।
  2. मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड के बारे में।
  3. भारत में रामसर अभिसमय’ के अंतर्गत आर्द्र्भूमियां।
  4. त्सो कार बेसिन के बारे में।
  5. इस क्षेत्र में पायी जाने वाली महत्वपूर्ण पक्षी प्रजातियाँ।
  6. मध्य एशियाई उड़ान-मार्ग के बारे में।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ एवं उनका प्रबंधन- संगठित अपराध और आतंकवाद के बीच संबंध।

भारत में मादक पदार्थों की तस्करी


संदर्भ:

नशीली दवाओं के खिलाफ कानून प्रवर्तन एजेंसियों को, अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा के तेजी से कब्ज़ा होने के साथ ही ‘हेरोइन’ और ‘क्रिस्टल मेथामफेटामाइन’ (crystal methamphetamine) की सीमा पार तस्करी में भारी वृद्धि होने का संदेह है।

संबंधित प्रकरण:

तालिबान के लिए नशीली दवाएं (ड्रग्स) राजस्व का एक प्रमुख स्रोत रहता है। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था के पतन के साथ, तालिबान अपने लड़ाकों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए नशीली दवाओं से अर्जित मुद्रा पर बहुत अधिक निर्भर रहेगा।

ड्रग्स एंड क्राइम पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय की नवीनतम ‘वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट’ के अनुसार:

  • अफगानिस्तान में पिछले वर्ष की तुलना में 2020 के दौरान अफीम पोस्ता की अवैध खेती के लिए प्रयुक्त होने काली भूमि में 37% की वृद्धि हुई थी।
  • पिछले वर्ष,वैश्विक अफीम उत्पादन में अफगानिस्तान का योगदान 85% था।
  • अफगान विशेषज्ञ इकाइयों की बेहतर क्षमताओं के बावजूद, पिछले कुछ वर्षों में नशीली दवाओं की बरामदगी और गिरफ्तारी किए जाने का अफीम-पोस्ता की खेती पर न्यूनतम प्रभाव पड़ा है।
  • अफगानिस्तान, मेथामफेटामाइन उत्पादन का एक प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है।

 

‘वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट’ 2021

(World Drug Report)

  1. पिछले वर्ष, वैश्विक स्तर पर लगभग 275 मिलियन लोगों द्वारा नशीली दवाओं इस्तेमाल किया गया, और 36 मिलियन से अधिक लोग, नशीली दवाओं के उपयोग संबंधी विकारों से पीड़ित थे।
  2. अधिकांश देशों में महामारी के दौरान ‘भांग’ के उपयोग में वृद्धि देखी गई है।
  3. इसी अवधि में फार्मास्युटिकल दवाओं के गैर-चिकित्सा उपयोग में भी वृद्धि हुई है।
  4. नवीनतम वैश्विक अनुमानों के अनुसार, 15 से 64 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 5.5 प्रतिशत आबादी द्वारा पिछले वर्ष के दौरान, कम से कम एक बार नशीली दवाओं का उपयोग किया गया है।
  5. अनुमान है, कि वैश्विक स्तर पर 11 मिलियन से अधिक लोग दवाओं का इंजेक्शन लगाते हैं – इनमे से आधे लोग ‘हेपेटाइटिस सी’ से पीड़ित हैं।
  6. नशीली दवाओं के उपयोग के कारण होने वाली बिमारियों के लिये ‘ओपिओइड’ (Opioids) पदार्थ सर्वाधिक जिम्मेदार बने हुए है।

मादक पदार्थों की तस्करी की समस्या से निपटने हेतु भारत सरकार की नीतियाँ और पहलें:

  1. विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर, देश के 272 जिलों में नशा मुक्त भारत अभियान या ड्रग्स-मुक्त भारत अभियान’ को 15 अगस्त 2020 को हरी झंडी दिखाई गई।
  2. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा वर्ष 2018-2025 की अवधि के लिए ‘नशीली दवाओं की मांग में कमी लाने हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना’ (National Action Plan for Drug Demand Reduction- NAPDDR) का कार्यान्वयन शुरू किया गया है।
  3. सरकार द्वारा नवंबर, 2016 में नार्को-समन्वय केंद्र (NCORD) का गठन किया गया है।
  4. सरकार द्वारा नारकोटिक ड्रग्स संबंधी अवैध व्यापार, व्यसनी / नशेड़ियों के पुनर्वास, और नशीली दवाओं के दुरुपयोग के खिलाफ जनता को शिक्षित करने आदि में होने वाले व्यय को पूरा करने हेतु “नशीली दवाओं के दुरुपयोग नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कोष” (National Fund for Control of Drug Abuse) नामक एक कोष का गठन किया गया है ।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि 26 जून को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 7 दिसंबर 1987 को नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में चुना गया था।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UNODC के बारे में
  2. “नारकोटिक्स नियंत्रण हेतु राज्यों को वित्तीय सहायता” की योजना का अवलोकन
  3. नार्को-समन्वय केंद्र (NCORD) की संरचना
  4. नशीली दवाओं के दुरुपयोग नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कोष
  5. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के बारे में
  6. नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस और इस वर्ष की थीम

मेंस लिंक:

भारत, मादक पदार्थों की तस्करी की चपेट में है। इसके कारणों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। नशीली दवाओं की समस्या से निपटने में सरकार की भूमिका पर भी टिप्पणी करिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 

भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In)

भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (Indian Computer Emergency Response Team – CERT-In), ‘इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय’, भारत सरकार के अधीन ‘भारतीय साइबर स्पेस’ को सुरक्षित करने के उद्देश्य से गठित एक संस्था है।

  • इसे वर्ष 2004 में स्थापित किया गया था।
  • यह हैकिंग और फ़िशिंग जैसे साइबर सुरक्षा खतरों से निपटने हेतु ‘नोडल एजेंसी’ है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम 2008 के तहत, CERT-In के लिए कुछ निश्चित कार्य करने के लिए राष्ट्रीय एजेंसी के रूप में अभिहित किया गया है।
  • यह साइबर घटनाओं पर जानकारी एकत्र, विश्लेषण और प्रसार करता है, और साइबर सुरक्षा घटनाओं पर चेतावनी भी जारी करता है।

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