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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 16 August 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन संशोधन नियम, 2021

2. नये हालातों में भारत को अफगानिस्तान से क्यों और किस प्रकार के संबंध बनाने चाहिए?

 

सामान्य अध्ययन-III

1. ‘गति शक्ति’ अवसंरचना योजना

2. कुपोषण से निपटने हेतु चावल-संवर्धन योजना

3. राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन

4. जल-मौसम संबंधी आपदाएं

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. केरल में जंगली गुलमेहंदी की तीन नई प्रजातियों की खोज

2. सियाचिन ग्लेशियर

3. लड़कियों के लिए सैनिक स्कूल

4. सोनचिरैया

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन संशोधन नियम, 2021


संदर्भ:

हाल ही में, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ‘प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन संशोधन नियम’, 2021 (Plastic Waste Management Amendment Rules, 2021) को अधिसूचित किया गया है। यह नियम वर्ष 2022 तक कम उपयोगिता वाली और कचरे के रूप में बिखरने की अधिक संभावना वाली ‘एकल उपयोग की प्लास्टिक’ / ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ (Single-Use Plastic) निर्मित वस्तुओं को प्रतिबंधित करता है।

नये नियम:

  • 1 जुलाई, 2022 से निर्धारित की गई ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ वस्तुओं के निर्माण, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग को प्रतिबंधित किया जाएगा।
  • ‘कंपोस्टेबल’ प्लास्टिक से निर्मित वस्तुओं पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा।
  • इस अधिसूचना में सूचीबद्ध प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं को छोड़कर, भविष्य में अन्य प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाने हेतु, सरकार द्वारा ‘उद्योगों’ को इन नियमों का अनुपालन करने हेतु अधिसूचना जारी होने की तारीख से दस साल तक का समय दिया गया है।
  • हल्के वजन वाले प्लास्टिक कैरी बैग की वजह से फैलने वाले कचरे को रोकने के लिए 30 सितंबर, 2021 से प्लास्टिक कैरी बैग की मोटाई 50 माइक्रोन से बढ़ाकर 75 माइक्रोन और 31 दिसंबर, 2022 से 120 माइक्रोन कर दी गई है।
  • राज्य प्रदूषण निकायों के सहयोग से ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ इन प्रतिबंधो की निगरानी करेगा, उल्लंघनों पाए जाने पर ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम’, 1986 के तहत पहले से निर्धारित दंड लगाएगा।
  • जिन ‘प्लास्टिक पैकेजिंग अपशिष्टों’ को निर्धारित ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ वस्तुओं के चरणबद्ध तरीके से हटाने में शामिल नहीं किया गया है, उनके लिए ‘प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम’, 2016 के अनुरूप निर्माता, आयातक और ब्रांड मालिक (Producer, importer and Brand owner – PIBO) की ‘विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व’ (Extended Producer Responsibility – EPR) के जरिए पर्यावरण की दृष्टि से संवहनीय तरीके से एकत्र और प्रबंधित किया जाएगा।

वर्तमान परिदृश्य एवं प्लास्टिक प्रबंधन नियम 2016 में संशोधन हेतु आगामी प्रस्ताव:

वर्तमान में जारी नियमों के तहत, देश में 50 माइक्रोन से कम मोटाई के कैरी बैग और प्लास्टिक शीट के निर्माण, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग को प्रतिबंधित किया गया है।

अगले साल जुलाई से एक श्रृंखला के प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इनमें प्लास्टिक की छड़ियों वाले ईयर बड्स, गुब्बारों के लिए प्लास्टिक की छड़ियां, प्लास्टिक के झंडे, कैंडी की छड़ियां, आइसक्रीम की छड़ियां, सजावट के लिए पॉलीस्टीरीन (थर्मोकोल), प्लेट, कप, गिलास, कांटे, चम्मच, चाकू, स्ट्रॉ, ट्रे जैसी कटलरी, मिठाई के डिब्बों के चारों ओर लपेटी जाने या पैकिंग करने वाली फिल्म, निमंत्रण कार्ड और सिगरेट के पैकेट, 100 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक या पीवीसी बैनर, स्टिरर शामिल होंगे।

‘सिंगल-यूज़ प्लास्टिक’ क्या है?

  • ‘एकल उपयोग प्लास्टिक’ / ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ (Single-Use Plastic), निपटन-योग्य (Disposable) प्लास्टिक का एक रूप होती है, जिसे केवल एक बार इस्तेमाल करके फेंक दिया जाता है या पानी की बोतल, पुआल, कप आदि की तरह जिसको पुनर्चक्रित किया जा सकता है।
  • प्लास्टिक पैकेजिंग अपशिष्ट को अभी तक ‘सिंगल यूज प्लास्टिक आइटम’ के हटाए जाने संबंधी उत्पादों में शामिल नहीं किया गया था।

कुछ उल्लेखनीय तथ्य:

  • भारत में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक की खपत 11 किलोग्राम प्रति वर्ष है, जो अभी भी दुनिया में सबसे कम है। प्रति व्यक्ति प्लास्टिक की खपत का वैश्विक औसत 28 किलोग्राम प्रति वर्ष है।
  • पूरे भारत में, प्रतिदिन लगभग 26,000 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है और जिसमे से लगभग 10,000 टन कचरे का एकत्रण नहीं किया जाता है।

एक नैतिक दुविधा:

कुछ बुद्धिजीवियों का तर्क है, कि यदि प्लास्टिक को अन्य उपयोगों के लिए ठीक से प्रबंधित, एकत्र और पुनर्चक्रित किया जाए, तो यह हानिकारक नहीं है। दूसरी ओर, कुछ लोग प्लास्टिक के अपरिवर्तनीय हानिकारक प्रभावों के डर से, इसे पूर्णतयः प्रतिबंध करने के पक्ष में हैं।

प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध लगाने के कारण:

विश्व वन्यजीव कोष (World Wildlife Fund – WWF) के अनुसार, प्लास्टिक पर्यावरण के लिए हानिकारक है क्योंकि यह गैर-जैवअपघट्य (non-biodegradable) होती है और  इसे विघटित होने में वर्षों का समय लगता है। इसके अलावा:

  • बेकार प्लास्टिक बैग, भूमि और पानी को अत्यधिक प्रदूषित कर रहे हैं।
  • प्लास्टिक की थैलियां, धरती के साथ-साथ पानी में रहने वाले जानवरों के जीवन को भी खतरा बन गई हैं।
  • प्लास्टिक थैलियों के अपशिष्ट से निकलने वाले रसायन मिट्टी में प्रवेश करते हैं और इसे बंजर बना देते हैं।
  • प्लास्टिक की थैलियों का मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
  • प्लास्टिक की थैलियों से जल निकासी की समस्या होती है।

भारत द्वारा किए जा रहे प्रयास:

  • भारत को, पिछले साल ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर घोषित अपने “बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन” संकल्प के लिए वैश्विक प्रशंसा हासिल हुई है। इस संकल्प के तहत भारत ने वर्ष 2022 तक सिंगल-यूज प्लास्टिक को खत्म करने का प्रण किया है।
  • वर्ष 2019 में आयोजित चौथी ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण महासभा’ में, भारत ने एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पादों के कारण होने वाले प्रदूषण का समाधन करने हेतु एक प्रस्ताव भी पेश किया था।

सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को खत्म करने के समक्ष चुनौतियां:

  • ऑल इंडिया प्लास्टिक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (AIPMA) जैसे व्यापार संघों ने सरकार को कोविड ​​​​की वजह से उत्पन्न चुनौतियों के कारण ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ (SUP) निर्मित उत्पादों को हटाने के लिए समय सीमा, एक साल की अवधि के लिए, अर्थात वर्ष 2023 तक बढ़ाने की सिफारिश की है।
  • भारत में अपशिष्टों का प्रभावी तरीके से पृथक्करण, संग्रह और पुनर्चक्रण करने हेतु कोई व्यवस्था कार्यरत नहीं है।
  • प्लास्टिक के पुनर्चक्रण हेतु भी कोई नीति नहीं है। विभिन्न राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों द्वारा उठाए जाने वाले पर्यावरणीय मुद्दों की वजह से ‘रीसाइक्लिंग प्लांट’ स्थापित करने में भी चुनौतियां आती हैं।
  • सिंगल-यूज़ प्लास्टिक, एक बहुत अच्छा व्यवसाय रहा है, और इसी तरह से लाभप्रद रहने का अनुमान है।
  • अर्थव्यवस्था, अधिक प्लास्टिक उत्पादन की पक्षधर है।
  • प्लास्टिक अपशिष्टों की काफी मात्रा नदियों, महासागरों और अपशिष्ट भरावक्षेत्रों में फेंक दी जाती है, जिसका पुनर्चक्रण संभव नहीं हो पाता है।

आगे की राह:

  1. स्वच्छ भारत अभियान के तहत प्लास्टिक के पुनर्चक्रण के प्रयासों को तेज करना।
  2. बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक, खादी बैग, सूती बैग के उपयोग को बढ़ावा देना।
  3. संग्रह को प्रोत्साहित करना।
  4. उत्पादकों पर उनके अपशिष्ट के लिए शुल्क लिया जाना शुरू किया जाए, जिससे कर-वसूली और अपशिष्ट का पुनर्चक्रण होगा।

निश्चित रूप से, हम अपनी अगली पीढ़ियों को, छुट्टियों में ऐसे समुद्र तटों पर जाने के लिए नहीं छोड़ सकते हैं जहां प्लास्टिक के अलावा कुछ भी नहीं है, और जिन समुद्रों की हम बात करते हैं, वहां मछलियों की जगह बस प्लास्टिक बची हो।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप री-प्लान (REPLAN) प्रोजेक्ट के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सिंगल यूज प्लास्टिक के बारे में।
  2. प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के बारे में।
  3. नवीनतम संशोधन।
  4. विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व क्या है?
  5. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा के बारे में।

मेंस लिंक:

‘प्लास्टिक प्रदूषण’ को मात देने संबंधी भारत के प्रयासों पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

नये हालातों में भारत को अफगानिस्तान से क्यों और किस प्रकार के संबंध बनाने चाहिए?


संदर्भ:

हाल ही में, तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के अधिकाँश प्रमुख शहरों पर कब्जा कर लिया है, और अमेरिका एवं ब्रिटेन द्वारा अपने नागरिकों को देश से बाहर निकालने के लिए सैनिकों को लगाया गया है। इसके साथ ही, तालिबान पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने की स्थिति में पहुँच चुका है

संबंधित प्रकरण:

अमरीका द्वारा अफ़ग़ानिस्तान से वापस लौटने संबंधी फैसला किए जाने के बाद से गैर-सरकारी अभिकर्ता ‘तालिबान’ हिंसक प्रदर्शन करते हुए सत्ता में वापसी के लिए आगे बढ़ता जा रहा है।

अफगानिस्तान और इसकी रणनीतिक अवस्थिति:

अफ़गानिस्तान में स्थिरता का महत्व:

  • अफ़गानिस्तान में तालिबान की बहाली का असर इसके पड़ोसी मध्य एशियाई देशों जैसे ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान आदि में फैल सकता है।
  • तालिबान के पुनरुत्थान से इस क्षेत्र में ‘उग्रवाद’ फिर से जिंदा हो जाएगा और यह क्षेत्र ‘लश्कर-ए-तैयबा’, आईएसआईएस आदि के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल बन सकता है।
  • अफगानिस्तान में गृहयुद्ध होने से मध्य एशिया और उसके बाहर के देशों में शरणार्थी संकट उत्पन्न हो जाएगा।
  • अफगानिस्तान की स्थिरता से मध्य एशियाई देशों को हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित बंदरगाहों तक – सबसे कम-दूरी वाले मार्ग से – पहुंचने में मदद मिलेगी।
  • अफगानिस्तान, मध्य-एशिया और शेष विश्व के बीच एक पुल की भूमिका निभाने वाली, क्षेत्रीय व्यापार हेतु और सांस्कृतिक रूप से, एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

नए हालातों में, भारत के लिए तालिबान के साथ संपर्क स्थापित करना क्यों जरूरी है?

  • अफ़ग़ानिस्तान में अब तालिबान की महत्वपूर्ण उपस्थिति है।
  • भारत पहले से ही अफगानिस्तान में भारी निवेश कर चुका है। अपनी 3 अरब डॉलर की परिसंपत्तियों की सुरक्षा हेतु, भारत को अफगानिस्तान में सभी पक्षों के साथ संपर्क स्थापित करने चाहिए।
  • तालिबान का पाकिस्तान के साथ गहन राज्य संबंध बनाना, भारत के हित में नहीं होगा।
  • यदि भारत ने अभी संपर्क स्थापित नहीं किए, तो रूस, ईरान, पाकिस्तान और चीन, अफगानिस्तान के राजनीतिक और भू-राजनीतिक भाग्य-निर्माता के रूप में उभरेंगे, जो निश्चित रूप से भारतीय हितों के लिए हानिकारक होगा।
  • अमेरिका ने क्षेत्रीय-संपर्को पर सबको चौंकाते हुए ‘अमेरिका-उजबेकिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान’ के रूप में एक “क्वाड” (Quad) का गठन करने की घोषणा की है – जिसमें भारत को शामिल नहीं किया गया है।
  • अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए, चाबहार बंदरगाह के माध्यम से अफगानिस्तान के साथ व्यापार करने संबधी भारत का प्रयास संकट में पड़ा हुआ है।

आवश्यकता:

  • तालिबान द्वारा की जा रही हिंसा पर रोक लगाकर, अफ़ग़ान नागरिकों की सुरक्षा हेतु सामूहिक रूप से कार्य करने की तत्काल आवश्यकता है।
  • अफगानिस्तान को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मध्य एशियाई संगठन में पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए।
  • अमरीका, ईरान, चीन और रूस को अफगानिस्तान में स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत को सक्रिय रूप से शामिल करना चाहिए।
  • शरणार्थी संकट उत्पन्न होने पर उसके लिए समेकित कार्रवाई की जानी चाहिए।
  • निकटस्थ पड़ोसियों के साथ शांति बनाए रखने हेतु तालिबान के साथ भारत द्वारा संपर्क स्थापित किए जाने चाहिए।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

अमेरिका-तालिबान शांति समझौते के बारे में जानिए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. तालिबान के बारे में
  2. अफगान संकट
  3. नाटो के बारे में
  4. अफगानिस्तान परियोजनाओं में भारत का निवेश

मेंस लिंक:

नये हालातों में भारत को अफगानिस्तान से क्यों और किस प्रकार के संबंध बनाने चाहिए? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

‘गति शक्ति’ अवसंरचना योजना


संदर्भ:

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘गति शक्ति’ अवसंरचना योजना (‘Gati Shakti’ infrastructure plan) की घोषणा की गयी।

योजना के प्रमुख बिंदु:

  • ‘गति शक्ति’ हमारे देश के लिए एक ‘राष्ट्रीय अवसंरचना मास्टर प्लान’ होगी, जो देश में समग्र अवसंरचना की नींव रखेगी।
  • 100 लाख करोड़ रुपये से अधिक की इस योजना से लाखों युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।
  • यह योजना, स्थानीय विनिर्माताओं के वैश्विक प्रोफाइल को ऊपर उठाने में मदद करेगी और उन्हें दुनिया भर में अपने समकक्षों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद करेगी।
  • ‘गति शक्ति’ योजना, भविष्य में नए आर्थिक क्षेत्रों की संभावनाओं को भी जन्म देती है।

नोट: इसी तरह की एक योजना, जिसे ‘राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन’ (National Infrastructure Pipeline– NIP) कहा जाता है, की घोषणा पहले की जा चुकी है।

राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन के बारे में:

2019-20 के बजट भाषण में वित्त मंत्री द्वारा अगले 5 साल में अवसंरचना परियोजनाओं के लिए 100 लाख करोड़ रुपये के व्यय की घोषणा की गयी थी।

  1. NIP देश भर में विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने और सभी नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में अपनी तरह की एक अनूठी पहल है।
  2. इससे परियोजना की तैयारी में सुधार होगा, तथा अवसंरचना में निवेश (घरेलू और विदेशी दोनों) आकर्षित होगा। साथ ही यह वित्त वर्ष 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अहम होगा।
  3. NIP में आर्थिक और सामाजिक अवसंरचना परियोजना दोनों को सम्मिलित किया गया है।

टास्क फोर्स की रिपोर्ट:

  • मई 2020 में अतनु चक्रवर्ती की अध्यक्षता में राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) पर एक कार्य बल (Task force) का गठन किया गया था।
  • उच्च स्तरीय कार्य बल ने वित्त वर्ष 2020-25 के दौरान 111 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित बुनियादी ढांचा निवेश के साथ राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन पर एक अंतिम रिपोर्ट जमा की थी।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु तथा महत्वपूर्ण सिफारिशें:

  1. निवेश की आवश्यकता: अवसंरचना परियोजनाओं के निर्माण तथा आर्थिक विकास में वृद्धि हेतु अगले पांच वर्षों (2020-2025) में ₹ 111 लाख करोड़ का निवेश।
  2. कुल परियोजनाओं में ऊर्जा, सड़क, रेलवे और शहरी क्षेत्रों की परियोजनाएं सबसे अधिक है, जिन पर कुल राशि का लगभग 70% व्यय अनुमानित है।
  3. इन परियोजनाओं में केंद्र (39 प्रतिशत) और राज्य (40 प्रतिशत) की साझेदारी होगी, जबकि निजी क्षेत्र की 21 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
  4. परिसंपत्तियों की बिक्री हेतु आक्रामक रवैया।
  5. अवसंरचना परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण।
  6. विकास वित्त संस्थानों की स्थापना।
  7. नगरपालिका बांड बाजार को मजबूत करना।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘अवसरंचना निवेश न्यास मॉडल’ (Infrastructure Investment Trust– InvIT) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. NIP क्या है? इसे कब लॉन्च किया गया था?
  2. NIP के तहत शामिल परियोजनाएं
  3. NIP पर अतनु चक्रवर्ती की अध्यक्षता में कार्य बल द्वारा की गई प्रमुख सिफारिशें
  4. कार्य बल द्वारा की गई सिफारिशों के अनुसार प्रस्तावित तीन समितियां
  5. भारत निवेश ग्रिड क्या है?
  6. गति शक्ति के बारे में।

मेंस लिंक:

राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) के महत्व और विशेषताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत में खाद्य प्रसंस्करण एवं संबंधित उद्योग- कार्यक्षेत्र एवं महत्त्व, स्थान, ऊपरी और नीचे की अपेक्षाएँ, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन।

 कुपोषण से निपटने हेतु चावल-संवर्धन योजना


(Rice fortification plan to tackle malnutrition)

संदर्भ:

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने द्वारा 2024 तक स्कूलों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और ‘मध्याह्न भोजन’ सहित विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत ‘संवर्धित चावल’ (Fortified rice) वितरित किए जाने की घोषणा की है।

घोषणा का महत्व:

  • चूंकि, देश में महिलाओं और बच्चों में कुपोषण का स्तर काफी अधिक है, इसे देखते हुए यह घोषणा काफी महत्वपूर्ण है।
  • खाद्य मंत्रालय के अनुसार, देश में हर दूसरी महिला रक्ताल्पता से पीड़ित (anaemic) है और हर तीसरा बच्चा अविकसित या नाटेपन का शिकार है।
  • ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI), भारत, 107 देशों की सूची में 94वें स्थान पर है और इसे भुखमरी से संबंधित ‘गंभीर श्रेणी’ में रखा गया है।
  • गरीब महिलाओं और गरीब बच्चों में कुपोषण और आवश्यक पोषक तत्वों की कमी, उनके विकास में बड़ी बाधा है।

इस योजना से कितने बच्चों को फायदा होगा?

सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ (NFSA), 2013 के अनुसार विभिन्न योजनाओं के तहत 300 लाख टन से अधिक चावल वितरित किए जाते है। वर्ष 2021-22 के लिए, केंद्र सरकार द्वारा लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और ‘मध्याह्न भोजन’ (MDM) और ‘एकीकृत बाल विकास योजना’ (ICDS) जैसी योजनाओं के लिए NFSA के तहत 328 लाख टन चावल आवंटित किए गए हैं।

‘खाद्य-संवर्धन’ क्या होता है?

देश में खाद्य पदार्थों के लिए मानकों का निर्धारण करने वाली संस्था ‘भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण’ (Food Safety and Standards Authority of India – FSSAI) के अनुसार, ‘खाद्य-संवर्धन’ (Food Fortification), ‘किसी खाद्यान्न को पोषणयुक्त बनाने के लिए उसमे सावधानी से आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों अर्थात् विटामिन और खनिज तत्वों, की मात्रा में वृद्धि करने की प्रकिया होती है।

इसका उद्देश्य आपूर्ति किए जाने वाले खाद्यान्न की पोषण गुणवत्ता में सुधार करना तथा न्यूनतम जोखिम के साथ उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करना है।

‘संवर्धित चावल’:

(Fortified rice)

खाद्य मंत्रालय के अनुसार, आहार में विटामिन और खनिज सामग्री को बढ़ाने के लिए चावल का संवर्धन (fortification) किया जाना एक लागत प्रभावी और पूरक रणनीति है।

  • FSSAI द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार, 1 किलो संवर्धित चावल में आयरन (28 mg-42.5 mg), फोलिक एसिड (75-125 माइक्रोग्राम) और विटामिन B-12 (0.75-1.25 माइक्रोग्राम) होगा।
  • इसके अलावा, चावल को सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ, एकल या संयोजन में, जस्ता (10 मिलीग्राम -15 मिलीग्राम), विटामिन A (500-750 माइक्रोग्राम आरई), विटामिन बी-1 (1 मिलीग्राम-1.5 मिलीग्राम), विटामिन बी-2 (1.25 mg-1.75 mg), विटामिन B3 (12.5 mg-20 mg) और विटामिन B6 (1.5 mg-2.5 mg) प्रति किग्रा के साथ भी संवर्धित किया जाएगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप वृहद पोषक तत्वों (macro nutrients) और सूक्ष्म पोषक तत्वों (micro nutrients) के बीच अंतर जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जैव-संवर्धन तथा आनुवांशिक-संवर्धन में भिन्नता
  2. सूक्ष्म पोषक बनाम वृहद पोषक
  3. भारत में जैव उर्वरक और जीएम फसलों के लिए स्वीकृति
  4. भारत में अनुमति प्राप्त जीएम फसलें

मेंस लिंक:

खाद्य पदार्थों के संवर्धन से आप क्या समझते हैं? इसके फायदों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन


(National Hydrogen Mission)

संदर्भ:

हाल ही में, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ‘राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन’ (National Hydrogen Mission) का शुभारंभ करने की घोषणा की गयी है। इसका उद्देश्य, भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और निर्यात हेतु एक वैश्विक केंद्र बनाना है।

पृष्ठभूमि:

वर्ष 2021 के केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री द्वारा औपचारिक रूप से ‘राष्ट्रीय हाइड्रोजन ऊर्जा मिशन’ (NHM) को शुरू करने की घोषणा की गयी थी, जिसका उद्देश्य देश को ‘हरित ऊर्जा संसाधनों से हाइड्रोजन का उत्पादन’ करने में सक्षम बनाना है।

‘हाइड्रोजन ईंधन’ क्या है?

हाइड्रोजन, आवर्त सारणी में सबसे हल्का और पहला तत्व है। चूंकि, हाइड्रोजन का भार, हवा के भार से कम होता है, इसलिए यह वायुमंडल में ऊपर की ओर उठ कर फ़ैल जाता है और यही कारण है, कि इसे अपने शुद्ध रूप ‘H2 में मुश्किल से ही कभी पाया जाता है।

  • मानक ताप और दाब पर, हाइड्रोजन, एक गैर-विषाक्त, अधात्विक, गंधहीन, स्वादहीन, रंगहीन और अत्यधिक दहनशील द्विपरमाणुक गैस है।
  • हाइड्रोजन ईंधन, ऑक्सीजन के साथ दहन करने पर ‘शून्य-उत्सर्जन’ करने वाला ईंधन है। इसका उपयोग ईंधन सेलों अथवा आंतरिक दहन इंजनों में किया जा सकता है। अंतरिक्ष यान प्रणोदनों (spacecraft propulsion) के लिए ईंधन के रूप में भी हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता है।

हाइड्रोजन की उत्पत्ति:

  • यह ब्रह्मांड में पाया जाने वाला सबसे प्रचुर तत्व है। सूर्य और अन्य तारे, व्यापक रूप से हाइड्रोजन से निर्मित होते हैं।
  • खगोलविदों का अनुमान है, कि ब्रह्मांड में पाए जाने वाले 90% परमाणु, हाइड्रोजन परमाणु हैं। किसी भी अन्य तत्व की तुलना में, हाइड्रोजन, सर्वाधिक योगिकों में एक घटक के रूप में शामिल  होता है।
  • पृथ्वी पर उपस्थित हाइड्रोजन का, सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला यौगिक ‘जल’ है।
  • पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले जल-निकायों में आणविक हाइड्रोजन नहीं पाया जाता है।
  • पृथ्वी पर अधिकांशतः हाइड्रोजन, जल और ऑक्सीजन के साथ तथा जीवित या मृत अथवा या जीवाश्म जैवभार में, कार्बन के साथ युग्मित होती है। जल को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के रूप में विखंडित करके हाइड्रोजन का निर्माण किया जा सकता है।

भंडारण:

  • हाइड्रोजन को भौतिक रूप से अथवा गैस या तरल के रूप में संग्रहीत किया जा सकता है।
  • गैस के रूप में हाइड्रोजन का भंडारण करने हेतु आमतौर पर उच्च दाब वाले टैंक की आवश्यकता होती है।
  • तरल के रूप में हाइड्रोजन का भंडारण करने के लिए क्रायोजेनिक तापमान की जरूरत होती है, क्योंकि हाइड्रोजन का क्वथनांक एक वायुमंडलीय दाब पर −252.8 ° C होता है।
  • हाइड्रोजन के लिए ठोस पदार्थों की सतह पर (adsorption / अधिशोषण द्वारा) अथवा ठोस पदार्थों के भीतर (absorption / अवशोषण द्वारा) संग्रहीत किया जा सकता है।

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में ‘स्वच्छ हाइड्रोजन उद्योग’ की क्षमता:

  • हाइड्रोजन ईंधन के उपयोग से उत्सर्जित होने वाला एकमात्र उप-उत्पाद ‘जल’ होता है – जिस कारण यह ईंधन 100 प्रतिशत स्वच्छ हो जाता है।
  • हाइड्रोजन को, शून्य-उत्सर्जन इलेक्ट्रिक वाहनों में ईंधन सेलों की शक्ति, घरेलू उत्पादन में इसकी क्षमता और ईंधन सेलों की उच्च दक्षता क्षमताओं के कारण, एक वैकल्पिक ईंधन माना जाता है।
  • वास्तव में, इलेक्ट्रिक मोटर के साथ फ्यूल सेल/ ईंधन सेल, गैस-चालित आंतरिक दहन इंजन की तुलना में दो से तीन गुना अधिक कुशल है।
  • इलेक्ट्रिक मोटर के साथ मिलकर एक ईंधन सेल दो से तीन गुना अधिक कार्यक्षम होते है।
  • हाइड्रोजन, आंतरिक दहन इंजनों के लिए ईंधन के रूप में भी काम कर सकता है।
  • 2 पाउंड (1 किलोग्राम) हाइड्रोजन गैस की ऊर्जा, 1 गैलन (6.2 पाउंड/ 2.8 किलोग्राम) गैसोलीन की ऊर्जा के बराबर होती है।

नीतिगत चुनौतियां:

  1. हरित अथवा नीले हाइड्रोजन के निष्कर्षण की आर्थिक संधारणीयता, हाइड्रोजन का व्यावसायिक रूप से दोहन करने के लिए उद्योगों के सामने भारी चुनौतियों में से एक है।
  2. हाइड्रोजन के उपयोग तथा उत्पादन में प्रयुक्त होने वाली प्रौद्योगिकी, जैसेकि ‘कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (CCS), अभी प्रारम्भिक चरण में हैं और काफी महंगी है, जिससे हाइड्रोजन की उत्पादन-लागत काफी अधिक हो जाती है।
  3. किसी संयंत्र के पूरा होने के बाद ईंधन सेलों (fuel cells) की रखरखाव लागत काफी महंगी हो सकती है, जैसाकि दक्षिण कोरिया में है।
  4. ईंधन के रूप में और उद्योगों में हाइड्रोजन के व्यावसायिक उपयोग हेतु, हाइड्रोजन के उत्पादन, भंडारण, परिवहन और मांग निर्माण के लिए अनुसंधान और विकास में भारी निवेश की आवश्यकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते है, कि ‘हाइड्रोजन निष्कर्षण’ के कई तरीके होते हैं और विधि के आधार पर उत्पादित हाइड्रोजन को ‘ग्रे’, ‘ब्लू’ या ‘ग्रीन’ हाइड्रोजन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ग्रीन हाइड्रोजन के बारे में
  2. इसका उत्पादन कैसे होता है?
  3. अनुप्रयोग
  4. लाभ
  5. हाइड्रोजन ऊर्जा मिशन के बारे में

मेंस लिंक:

ग्रीन हाइड्रोजन के लाभों की विवेचना कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: आपदा एवं आपदा प्रबंधन।

जल-मौसम संबंधी आपदाएं


(Hydro-meteorological calamities)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा ‘जल-मौसम संबंधी आपदाओं’ (Hydro-meteorological calamities)  के कारण हुई मौतों के आंकड़े जारी किए हैं।

नोट: जल-मौसम संबंधी आपदाओं और खतरों में अचानक बाढ़ आना (flash floods), बादल फटना (cloudburst) और भूस्खलन (landslides) को शामिल किया जाता है।

प्रमुख बिंदु:

  • पिछले तीन वर्षों के दौरान, देश में जल-मौसम संबंधी आपदाओं के कारण लगभग 6,800 लोगों की जान चली गई।
  • सभी राज्यों में, इन आपदाओं की वजह से पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा मौतें दर्ज की गई हैं।
  • अत्यधिक वर्षा की घटनाएं या बादल फटना, इन आपदाओं के कारणो में शामिल हैं।
  • जल-मौसम संबंधी आपदाओं में भूस्खलन की घातक घटनाएं, मुख्यतः हिमालयी राज्यों में, पश्चिमी घाट और कोंकण क्षेत्रों में लगभग हर साल होती हैं ।
  • ‘राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष’ के तहत केंद्र द्वारा जारी की गई धनराशि के संदर्भ में सबसे अधिक धनराशि महाराष्ट्र को आवंटित की गई।
  • पिछले तीन वर्षों में, पश्चिम बंगाल को ‘चार उष्णकटिबंधीय चक्रवातों’ – फानी (मई 2019), बुलबुल (नवंबर 2019), अम्फान (मई 2020) और यास (मई 2021) का सामना करना पड़ा।

राज्यों की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां:

‘आपदा प्रबंधन अधिनियम’ (Disaster Management Act) के तहत, राज्यों को प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली मौतों को रोकने हेतु आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है।

‘आपदा प्रबंधन’ क्या है?

आपदा प्रबंधन (डीएम) अधिनियम, 2005 (Disaster Management (DM) Act), 2005 के तहत ‘आपदा प्रबंधन’ को निम्नलिखित उद्देश्यों हेतु आवश्यक उपायों के संदर्भ में योजना बनाने, व्यवस्था एवं समन्वय करने, और कार्यन्वयन करने हेतु एक समेकित प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है:

  1. किसी भी आपदा के खतरे का निवारण हेतु
  2. किसी भी आपदा या उसके परिणामों के जोखिम कम करने हेतु
  3. किसी भी आपदा से निपटने की तैयारी हेतु
  4. आपदा से निपटने में तत्परता हेतु
  5. किसी भी आपदा के प्रभावों की गंभीरता का आकलन हेतु
  6. बचाव और राहत हेतु
  7. पुनर्वास और पुनर्निर्माण हेतु

राष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन रूपरेखा ढांचे से संबंधित संस्थाएं:

  1. भारतीय राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)
  2. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (NDMP)
  3. राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)
  4. जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA)

नीतियां / पहल:

  1. भारत, ‘आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेंडाई फ्रेमवर्क’ (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction) पर एक हस्ताक्षरकर्ता है।
  2. भारत, ‘संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय’ (United Nations Office for Disaster Risk Reduction- UNISDR) का एक भागीदार देश है, और इसके साथ मिलकर कार्य करता है।
  3. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (National Disaster Management Plan – NDMP) के तहत, केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों, राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन, जिला प्राधिकरणों और स्थानीय स्व-सरकारों सहित विभिन्न हितधारकों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को परिभाषित किया गया है।
  4. वर्ष 2015-16 के दौरान MHA, NDMA, NDRF आदि को परस्पर सम्बद्ध करने के उद्देश्य से एक ‘वेरी स्मॉल अपर्चर टर्मिनल’ (VSAT) नेटवर्क की स्थापना करने हेतु राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन सेवाओं (National Disaster Management Services – NDMS) की परिकल्पना की गई थी, ताकि देश भर में ‘आपातकालीन संचालन केंद्र’ (EOC) के संचालन हेतु बाधा-रहित संचार अवसंरचना और तकनीकी सहायता प्रदान की जा सके।
  5. भूस्खलन जोखिम शमन योजना (Landslide Risk Mitigation SchemeLRMS) में स्थान विशिष्ट भूस्खलन शमन परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता की परिकल्पना की गई है।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 

केरल में जंगली गुलमेहंदी की तीन नई प्रजातियों की खोज

  • जंगली गुलमेहंदी / बालसम (wild balsam) की ये प्रजातियां, बाल्समिनेसी वर्ग (family Balsaminaceae) की इम्पेतिन्स (Impatiens) प्रजाति से संबंधित हैं।
  • इस प्रजाति के पौधों को मलयालम में ‘काशीथुम्बा’ के नाम से जाना जाता है।
  • इन प्रजातियों को दक्षिणी केरल के पश्चिमी घाट क्षेत्र और इडुक्की जिले में खोजा गया है।
  • तीन प्रजातियों में से दो का नामकारण, कम्युनिस्ट दिग्गज और पूर्व मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा के नाम पर किया गया है।

सियाचिन ग्लेशियर

  • ‘टीम CLAW’ नामक विकलांग लोगों के दल द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर सियाचिन ग्लेशियर की ट्रेकिंग के लिए यात्रा शुरू की गयी है।
  • यह दल, विकलांग लोगों के सबसे बड़े दल द्वारा विश्व के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र पर ट्रेकिंग करने का विश्व रिकॉर्ड बनाने का प्रयास करेगा।
  • यह अभियान, ‘ऑपरेशन ब्लू फ्रीडम ट्रिपल वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ के ‘स्थलीय विश्व रिकॉर्ड अभियान’ का हिस्सा है।
  • ‘टीम CLAW’ दिव्यांग-जनों को सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहे ‘सशस्त्र बलों के सेवानिवृत्त कर्मियों का एक दल शामिल है।

सियाचिन ग्लेशियर के बारे में:

  • यह हिमालय में पूर्वी काराकोरम श्रेणी में स्थित है।
  • यह विश्व के गैर-ध्रुवीय क्षेत्रों में स्थित दूसरा सबसे लंबा ग्लेशियर है।
  • सियाचिन ग्लेशियर, यूरेशियन प्लेट को भारतीय उपमहाद्वीप से अलग करने वाले ‘महान जल विभाजक’ के ठीक दक्षिण में स्थित है।

 

लड़कियों के लिए सैनिक स्कूल

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में ‘लड़कियों के लिए सैनिक स्कूल खोले जाने की घोषणा की है।
  • सैनिक स्कूल, अप्रैल 1957 से अक्टूबर 1962 तक केंद्रीय रक्षा मंत्री रहे वीके कृष्ण मेनन के दिमाग की उपज हैं। मेनन ने इस विचार की कल्पना 1961 में की थी।
  • ये स्कूल केंद्रीय रक्षा मंत्रालय (MoD) के तहत सैनिक स्कूल सोसायटी द्वारा चलाए जा रहे हैं।

 

सोनचिरैया

  • आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा शहरी ‘स्वयं सहायता समूह’ (SHG) उत्पादों के विपणन हेतु ‘सोन चिरैया’ (SonChiraiya) ब्रांड और लोगो लॉन्च किया गया है।
  • यह पहल शहरी ‘स्वयं सहायता समूह’ की महिलाओं द्वारा बनाए गए उत्पादों के लिए बढ़ी हुई दृश्यता और वैश्विक पहुंच की दिशा में एक सही कदम साबित होगी।

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