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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 12 August 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. सचेतक (व्हिप) क्या होता है?

2. संसदीय सत्र की समाप्ति

3. उपभोक्ता विवाद निवारण समिति

4. राजनीति का अपराधीकरण

5. अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय

 

सामान्य अध्ययन-III

1. विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ)

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. महाराष्ट्र दवारा ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ क्षेत्र में राजीव गांधी पुरस्कार

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

सचेतक (व्हिप) क्या होता है?


(What is a whip?)

संदर्भ:

हाल ही में, कांग्रेस पार्टी द्वारा सांसद ‘सैयद नसीर हुसैन’ और ‘छाया वर्मा’ को राज्यसभा का सचेतक नियुक्त किया गया है।

इसके बाद, लोकसभा और उच्च सदन राज्य सभा में सचेतकों और मुख्य सचेतकों की संख्या समान हो गयी है।

‘सचेतक’ क्या होता है?

सचेतक (Whip), किसी राजनीतिक दल का एक अधिकारी होता है जो संसद अथवा विधान सभा के अंदर दल के प्रवर्तक’ (Enforcer) के रूप में कार्य करता है।

  • राजनीतिक पार्टियां, सदन के अंदर व्हिप जारी करने के लिए अपने सदस्यों में से वरिष्ठ सदस्य को नियुक्त करती हैं – इस सदस्य को मुख्य सचेतक (Chief Whip) कहा जाता है, तथा इसकी सहायता के लिए पार्टियों द्वारा अतिरिक्त सचेतक भी नियुक्त किये जाते है।
  • भारत को व्हिप की अवधारणा ब्रिटिश संसदीय प्रणाली से विरासत में प्राप्त हुई है।

 

(नोट: संसदीय भाषा में व्हिप, सदन में होने वाले किसी मतदान में उपस्थित रहने तथा किसी विशेष तरीके से मतदान में भाग लेने के लिए, राजनीतिक पार्टी द्वारा अपने सदस्यों को जारी किया गया लिखित आदेश भी होता है।)

सचेतक की भूमिका:

पार्टी सचेतक/व्हिप, सदन में अपनी पार्टी की आधिकारिक नीति के अनुसार, अपने दल के सदस्यों द्वारा मतदान सत्र में भाग लेने और मतदान करने को सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं।

व्हिप के उल्लंघन करने पर स्थिति

  • सदन में पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने पर सदन के सदस्य को अयोग्यता कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है। यदि, सदन में किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते है, उन्हें दल-बदल क़ानून के तहत अयोग्यता कार्यवाही से छूट प्राप्त होती है।
  • सदस्यों की अयोग्यता का निर्धारण सदन के अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।

 

सचेतक की सीमा:

राष्ट्रपति निर्वाचन, जैसे कुछ मामलों में सचेतक/व्हिप किसी संसद सदस्य अथवा विधान सभा सदस्य को किसी विशेष प्रकार से मतदान करने का निर्देश नहीं दे सकते।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप 1992 के सुप्रीम कोर्ट किहोतो होलोहन के फैसले के बारे में जानते हैं? इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था, कि सदन के अध्यक्ष द्वारा अंतिम निर्णय किए जाने से पहले अदालतों को सदस्यों की निर्हरता संबंधी कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

क्या आप जानते हैं, कि राजनीतिक पार्टी द्वारा तीन प्रकार के व्हिप अथवा निर्देश – वन-लाइन व्हिप, टू-लाइन व्हिप और थ्री लाइन व्हिप – जारी किए जाते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारतीय संविधान की 10 वीं अनुसूची किससे संबंधित है?
  2. सचेतक (Whip) क्या है?
  3. मुख्य सचेतक कौन होता है?
  4. किहोतो होलोहान प्रकरण’,1992 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अवलोकन
  5. व्हिप के उल्लंघन करने पर स्थिति
  6. व्हिप की सीमा
  7. व्हिप के प्रकार

मेंस लिंक:

सचेतक (Whip) क्या होता है? सरकार द्वारा निचले सदन में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने पर सहेतक की भूमिकाओं और कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

संसदीय सत्र की समाप्ति


(Termination of a Session of Parliament)

लोकसभा के मानसून सत्र को समाप्त करने की निर्धारित तिथि 13 अगस्त थी, किंतु पेगासस जासूसी विवाद, कृषि कानूनों और अन्य मुद्दों पर विपक्ष द्वारा किए जा रहे विरोध के कारण सत्र को निर्धारित तिथि से दो दिन पहले अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है।

हालिया संसदीय सत्र का प्रदर्शन/परिणाम:

शून्यकाल (Zero Hour)- यह महत्वपूर्ण मुद्दों को सदन में उठाने के लिए व्यक्तिगत सदस्यों को आवंटित समय होता है- और सत्र के दौरान यह सबसे अधिक प्रभावित रहा, इसके अलावा सत्र के अधिकांश दिनों में ‘प्रश्नकाल’ भी बाधित रहा।

सत्र के दौरान, सदन 20 विधेयकों को पारित करने में सफल रहा, जिनमें से अधिकाँश विधेयक बिना किसी बहस या विपक्ष की भागीदारी के पारित कर दिए गए थे।

सत्र की समाप्ति:

संसद के किसी सत्र को ‘स्थगन’ (Adjournment), अनिश्चित काल के लिए स्थगन (Adjournment Sine Die), सत्रावसान (Prorogation) अथवा विघटन (Dissolution) के द्वारा समाप्त किया जा सकता है।

‘स्थगन’ (Adjournment): इसके तहत, सदन के सत्र के कार्यों को एक निर्दिष्ट समय के लिए निलंबित किया जाता है। इसके तहत निलंबन की अवधि कुछ घंटे, दिन या सप्ताह तक हो सकती है।

अनिश्चित काल के लिए स्थगन (Adjournment Sine Die): इसका अर्थ है कि सदन की बैठक को अनिश्चित काल के लिए समाप्त करना। दूसरे शब्दों में, इसके तहत सत्र को पुनः समवेत करने की तिथि निर्धारित किए बिना सदन को स्थगित कर दिया जाता है।

‘स्थगन’ तथा ‘अनिश्चित काल के लिए स्थगन’ घोषित करने की शक्ति सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति) के पास होती है।

सत्रावसान (Prorogation): सत्र के कार्यों के पूरा हो जाने के बाद राष्ट्रपति द्वारा सत्रावसान करने संबंधी अधिसूचना जारी की जाती है और इसके बाद पीठासीन अधिकारी सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने की घोषणा कर देता है। राष्ट्रपति, सत्र जारी रहने के दौरान भी सदन का सत्रावसान कर सकता है।

विघटन (Dissolution): सदन का विघटन केवल लोकसभा में हो सकता है। चूंकि, राज्य सभा एक स्थायी सदन होती है, अतः इस पर विघटन संबंधी प्रावधान लागू नहीं होता है।

  • विघटन की घोषणा के पश्चात् मौजूदा सदन का कार्यकाल समाप्त हो जाता है, और आम चुनाव होने के पश्चात् एक नए सदन का गठन किया जाता है।
  • राष्ट्रपति को लोकसभा का विघटन करने की शक्ति प्राप्त होती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि दसवीं अनुसूची (दलबदल रोधी कानून) के तहत एक राजनीतिक दल को अपने विधायकों को व्हिप जारी करने का संवैधानिक अधिकार है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. संसद के सदनों को किसके द्वारा आहूत किया जाता है।
  2. राष्ट्रपति एवं सभापति की शक्तियों में अंतर।
  3. ‘अनिश्चित काल के लिए स्थगन’ क्या है?
  4. ‘सदन के विघटन’ का क्या तात्पर्य है?
  5. राज्यसभा को भंग क्यों नहीं किया जा सकता है?

मेंस लिंक:

संसद के दोनों सदनों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

उपभोक्ता विवाद निवारण समिति


(Consumer Dispute Redressal Panels)

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने ‘उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों’ (Consumer Disputes Redressal Commissions – CDRC) में रिक्त पदों को भरने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के लिए आठ सप्ताह का समय दिया है।

अदालत ने केंद्र सरकार से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 पर एक विस्तारपूर्वक “विधायी प्रभाव अध्ययन” करने के लिए भी कहा है।

अदालत द्वारा की गयी टिप्पणियाँ:

  1. कानून लोगों के फायदे के लिए बनाए गए हैं। लेकिन, जिस उद्देश्य के लिए ‘उपभोक्ता संरक्षण कानून’ बनाया गया है, राज्य उसे असफल कर रहे हैं।
  2. अदालत ने यह सवाल भी किया है, कि क्या केंद्र और राज्यों में सरकारों द्वारा, लोगों को शिकायत दर्ज करने से रोकने के लिए, जानबूझकर रिक्तियों को लंबित रखा जा रहा है।

 रिक्तियां भरने में देरी पर केंद्र की दलील:

न्यायाधिकरण के सदस्यों के कार्यकाल को लेकर न्यायालय में मामला विचाराधीन है। केंद्र सरकार इस मामले पर अदालत के निर्णय का इंतजार कर रहा है। इसके अलावा, मुकदमेबाजी और सबंधित कानून के आगे-पीछे होने से “भ्रम” की स्थिति रही है, जिससे न्यायाधिकरण में सदस्यों की नियुक्तियां करने में देरी हुई है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत विवाद निवारण:

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत, उपभोक्ता विवादों के त्वरित समाधान हेतु ‘राष्ट्रीय आयोग’ और ‘राज्य आयोग’ और ‘जिला स्तर पर मंचों’ (डिस्ट्रिक्ट-फोरम) के त्रिस्तरीय ढांचे का प्रावधान किया गया है। ये सभी अर्ध-न्यायिक निकाय हैं।

संरचना: प्रत्येक जिला फोरम की अध्यक्षता एक ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के योग्य है अथवा जिला न्यायाधीश के पद पर कार्यरत है या रह चुका है। राज्य स्तर पर ‘उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग’ के अध्यक्ष के रूप में उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश या सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नियुक्त किया जाता है।

अधिनियम का विस्तार:

  • इस अधिनियम के प्रावधान ‘वस्तुओं’ के साथ-साथ ‘सेवाओं’ पर भी लागू होते हैं। ‘वस्तुओं’ में, उपभोक्ताओं को, थोक विक्रेताओं और खुदरा विक्रेताओं के माध्यम से बेची जाने वाली, निर्मित या उत्पादित सामग्री को शामिल किया जाता है।
  • अधिनियम के तहत- परिवहन, टेलीफोन, बिजली, आवास, बैंकिंग, बीमा, चिकित्सा उपचार आदि को ‘सेवाओं’ में शामिल किया जाता है।

 

शिकायत निवारण प्रक्रिया:

  • वस्तु या माल में खराबी होने या ‘सेवाओं’ में कमी होने के संबंध में जिला उपभोक्ता फोरम/राज्य आयोग / राष्ट्रीय आयोग के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज की जा सकती है।
  • हालांकि, नि: शुल्क अथवा किसी निजी सेवा अनुबंध के तहत प्रदान की जाने वाली किसी भी सेवा में कथित कमी के लिए, कोई शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती है।
  • वस्तु या माल में खराबी अथवा सेवा से असंतुष्ट व्यक्ति / उपभोक्ता, इस संदर्भ में सिविल मुकदमा दायर कर सकते हैं, इसके अलावा असंतुष्ट उपभोक्ता, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत भी अपनी शिकायतों का निवारण करा सकते हैं।
  • अधिनियम के तहत दर्ज कराई गई शिकायत / अपील /याचिका के लिए उपभोक्ता को कोई न्यायालय शुल्क नहीं देना पड़ता है, बल्कि अन्य शुल्क के रूप में केवल मामूली राशि चुकानी होती है।

अपील:

  • यदि कोई उपभोक्ता, जिला फोरम के निर्णय से संतुष्ट नहीं होता है, तो वह राज्य आयोग में अपील कर सकता है। ‘राज्य आयोग’ के आदेश के विरुद्ध उपभोक्ता द्वारा ‘राष्ट्रीय आयोग’ में अपील की सकती है।
  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करने में मदद करने हेतु, ‘राष्ट्रीय आयोग’ को सभी राज्य आयोगों पर प्रशासनिक नियंत्रण प्रदान किया गया है, जिसके तहत ‘राष्ट्रीय आयोग’ समय-समय पर संस्थाओं, मामलों के निपटान और लंबित मामलों के संबंध में कार्रवाही स्थिति की मांग कर सकता है।

 

अधिनियम में किए गए नवीनतम संशोधन:

  • नवीनतम उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अनुसार- जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों की स्थापना की जाएगी। ये आयोग, क्रमशः एक करोड़ रुपये, एक करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये तक और 10 करोड़ रुपये से अधिक राशि से संबंधित मामलों की सुनवाई करेंगे।
  • अन्यायपूर्ण अनुबंधों के मामले में, राज्य आयोग, 10 करोड़ रुपये तक के मामलों पर शिकायतों की सुनवाई करेंगे, और इससे अधिक राशि का मामला होने पर ‘राष्ट्रीय आयोग’ द्वारा शिकायतों की सुनवाई की जाएगी।
  • ये आयोग ऐसे अनुबंधों की अन्यायपूर्ण शर्तों को अमान्य घोषित कर सकते हैं।

Consumer_Protection

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में उपभोक्ता आयोगों द्वारा मध्यस्थता के संदर्भ में प्रावधान किया गया है, जिसके तहत जहां भी मामले को शुरुआती निपटाने की गुंजाइश मौजूद हो और सभी पक्ष सहमत हों, वहां उपभोक्ता आयोग द्वारा मध्यस्थता का प्रबंध किया जा सकता है। इन मध्यस्थता प्रकोष्ठों की स्थापना किस प्रकार की जाती है और उनकी क्या संरचना होती है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राष्ट्रीय, राज्य तथा जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग मंच तथा उनकी संरचना।
  2. उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों का क्षेत्राधिकार, तथा अपील।
  3. न्यायालय शुल्क की आवश्यकता।
  4. उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग- क्षेत्राधिकार।
  5. राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में अपील।
  6. अधिनियम के तहत परिभाषित उपभोक्ता परिभाषा और अधिकार।

मेंस लिंक:

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत उपभोक्ता विवाद निवारण तंत्र पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ।

राजनीति का अपराधीकरण


(Criminalization of Politics)

संदर्भ:

हाल ही में, उच्चतम न्यायालय द्वारा संसद को राजनीति में अपराधियों के आगमन के बारे में आगाह किया गया है, और अदालत ने, पिछले वर्ष हुए बिहार विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों के आपराधिक अतीत के बारे में मतदाताओं से जानकारी छिपाने के लिए प्रमुख राजनीतिक दलों पर जुर्माना लगाया है।

शीर्ष अदालत द्वारा फरवरी 2020 में जारी निर्देश:

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों को, उनके द्वारा अपने चुनावी उम्मीदवारों का चयन करने के 48 घंटों के भीतर अपनी वेबसाइट के होमपेज पर ‘आपराधिक इतिहास वाले उम्मीदवार’ शीर्षक के तहत आपराधिक इतिहास, यदि कोई हो, को प्रकाशित करने का निर्देश दिया था।

इसके आगे:

मतदाता को प्राप्त ‘सूचना के अधिकार’ को “अधिक प्रभावी और सार्थक” बनाने हेतु अदालत ने कई निर्देश जारी किए है:

  • भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा मात्र एक बटन के स्पर्श से उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास का विवरण प्राप्त करने हेतु मतदाताओं के लिए मोबाइल ऐप लॉन्च किया गया है।
  • अदालत के फैसले के अनुपालन में, राजनीतिक दलों की निगरानी हेतु निर्वाचन आयोग द्वारा एक अलग प्रकोष्ठ (सेल) का गठन किया जाएगा।

 

शीर्ष अदालत के ‘न्यायालय मित्र’ (Amicus Curiae) द्वारा सितंबर 2020 में दायर की गई रिपोर्ट के अनुसार:

  1. देशभर में विधि-निर्माताओं के खिलाफ कुल 4,442 मामले लंबित हैं। इसमें से मौजूदा सांसदों और राज्य विधानसभा सदस्यों के खिलाफ मामलों की संख्या 2,556 है।
  2. इनमे से अधिकाँश मामले, राजनेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों की सुनवाई हेतु विशेष रूप से गठित विभिन्न विशेष अदालतों में लंबित थे।
  3. विधि-निर्माताओं के खिलाफ दर्ज मामलों में, भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, मानहानि और धोखाधड़ी के मामले शामिल हैं।
  4. अधिकाँश मामले, जानबूझकर अवज्ञा करने और लोक सेवकों द्वारा जारी आदेशों में बाधा डालने के लिए आईपीसी की धारा 188 के उल्लंघन से संबंधित है।
  5. अपराधों के संबंध में 413 मामलों में ‘आजीवन कारावास’ का दंड देने का प्रावधान है, जिनमें से 174 मामलों में मौजूदा सांसद/विधायक आरोपी हैं।
  6. कई मामले, दर्ज किए जाने के शुरुआती स्तर पर ही लंबित है, और यहां तक ​​कि अदालतों द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट (non-bailable warrants – NBW) भी निष्पादित नहीं किए गए हैं।
  7. विधि-निर्माताओं के खिलाफ सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश में लंबित हैं।

 

इस विषय पर ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ (RPA) के प्रावधान:

वर्तमान में, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People- RPA) 1951 के तहत, किसी आपराधिक मामले में सजा-युक्त होने के पश्चात चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 के अंतर्गत, किसी भी आपराधिक मामले में दो अथवा दो से अधिक वर्षो के सजायाफ्ता व्यक्ति को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया गया है। परन्तु, जिन व्यक्तियों का मामला अदालत में विचारधीन है, वे चुनाव में भाग ले सकते हैं।

राजनीति में अपराधीकरण के मुख्य कारण:

  1. भ्रष्टाचार
  2. वोट बैंक
  3. शासन में कमियां

 

आगे की राह:

  1. राजनीतिक दलों को स्वयं ही दागी व्यक्तियों को टिकट देने से मना कर देना चाहिए।
  2. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन करके, उन व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर देना चाहिए जिनके खिलाफ जघन्य प्रकृति के मामले लंबित हैं।
  3. फास्ट-ट्रैक अदालतों को दागी नीति-निर्माताओं से संबंधित मामलों को शीघ्रता से निपटाना चाहिए।
  4. चुनाव अभियानों के वित्तपोषण में अधिक पारदर्शिता लाई जाए।
  5. भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) को में राजनीतिक दलों के वित्तीय खातों के ऑडिट की शक्ति प्रदान की जानी चाहिए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8
  2. उच्चत्तम न्यायालय दिशानिर्देश।
  3. ECI – रचना और कार्य।
  4. CEC- नियुक्ति।
  5. उम्मीदवारों के चुनाव से संबंधित मामलों पर निर्वाचन आयोग की शक्तियां।

मेंस लिंक:

राजनीति के अपराधीकरण से संबंधित चिंताओं पर चर्चा कीजिए और इन चिंताओं को दूर करने के लिए उच्चत्तम न्यायालय ने क्या कदम उठाये हैं?

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC)


(International Criminal Court)

संदर्भ:

हाल ही में, अफ्रीकी देश ‘सूडान’ ने ‘दारफुर संघर्ष’ (Darfur conflict) के लिए, अन्य अधिकारियों सहित लंबे समय तक तानाशाह रहे ‘ओमार अल-बशीर’ को ‘अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय’ (International Criminal Court – ICC) के लिए सौंपने का फैसला किया है।

पृष्ठभूमि:

‘’ओमार अल-बशीर’, सूडानी क्षेत्र में नरसंहार, युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोपों में एक दशक से अधिक समय से ‘अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय’ द्वारा वांछित हैं।

‘दारफुर संघर्ष’ के बारे में:

वर्ष 2003 में, ‘ओमार अल-बशीर’ की अरबी समुदाय के प्रभुत्व वाली सरकार द्वारा गैर-अरबी समुदायों के खिलाफ संस्थागत भेदभाव किए जाने शिकायत करते हुए गैर-अरब विद्रोहियों हथियार उठा लिए थे, इसके बाद सूडान के दारफुर क्षेत्र में सरकार और गैर-अरब विद्रोहियों के बीच युद्ध छिड़ गया था।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दारफुर संघर्ष में 300,000 लोग मारे गए और 25 लाख लोग विस्थापित हुए थे।

आईसीसी (ICC) के बारे में:

अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (International Criminal Court -ICC) हेग, नीदरलैंड में स्थित है। यह नरसंहार, युद्ध अपराधों तथा मानवता के खिलाफ अपराधों के अभियोजन के लिए अंतिम न्यायालय है।

  • ICC पहला स्थायी, संधि आधारित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय है, जिसकी स्थापना अंतरराष्ट्रीय समुदायों से संबधित गंभीर अपराधों को करने वाले अपराधियों पर मुकदमा चलाने तथा उन्हें सजा देने के लिए की गयी है।
  • ICC की स्थापना ‘रोम क़ानून’ (Rome Statute) के अंतर्गत की गयी, जो 1 जुलाई 2002 से प्रभावी हुई।

फंडिंग (Funding): न्यायालय का खर्च मुख्य रूप से सदस्य देशों द्वारा उठाया जाता है, परन्तु इसे सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, निजी व्यक्तियों, निगमों तथा अन्य संस्थाओं से स्वैच्छिक योगदान भी प्राप्त होता है।

संरचना और मतदान शक्ति

  • अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के प्रबंधन, विधायी निकाय तथा सदस्य सभा में प्रत्येक सदस्य राज्य का एक प्रतिनिधि शामिल होता है।
  • प्रत्येक सदस्य का एक वोट होता है तथा सर्वसम्मति से निर्णय लेने के लिए “हर संभव प्रयास” किया जाता है। किसी विषय पर सर्वसम्मति नहीं होने पर वोटिंग द्वारा निर्णय किया जाता है।
  • ICC में एक अध्यक्ष तथा दो उपाध्यक्ष होते है, इनका चुनाव सदस्यों द्वारा तीन वर्ष के कार्यकाल के लिए किया जाता है।

Icj_vs_ICC 

 

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘भारतीय मध्यस्थता परिषद’ के बारे में जानते हैं? इसकी संरचना और कार्य क्या हैं?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ICJ और ICC के मध्य अंतर
  2. इन संगठनों की भौगोलिक स्थिति
  3. यूएस और तालिबान के मध्य दोहा समझौता
  4. रोम क़ानून क्या है?
  5. अफगानिस्तान की अवस्थिति
  6. अमेरिकी तालिबान शांति समझौता

मेंस लिंक:

अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ)


(Special Economic Zones)

संदर्भ:

सरकार द्वारा विशेष आर्थिक क्षेत्रों (Special Economic Zones – SEZ) के भीतर की खाली पडी हुई जमीन और लगभग 30,000 करोड़ रुपये की लगत वाले ‘अप्रयुक्त निर्मित क्षेत्र’ को अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए छोड़ने का प्रस्ताव किया गया है।

आवश्यकता:

भारत के सकल निर्यात में, ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों’ (Special Economic Zones – SEZ) की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी है। लेकिन, 250 से अधिक ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों’ में निर्मित सुविधाओं में से लगभग 10 करोड़ वर्ग फुट जगह खाली पडी है। कीमत के हिसाब से, ₹3,000 प्रति वर्ग फुट की दर से ₹30,000 करोड़ का ‘निर्मित क्षेत्र’ अप्रयुक्त पड़ा है, जिसे किसी अन्य कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ (SEZ) क्या हैं?

विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड), भौगोलिक रूप से ‘चिह्नित’ किए गए ‘एन्क्लेव’ / ‘अंतः क्षेत्र’  होते हैं, जिनमें व्यापार और व्यापार से संबंधित नियम और पद्धतियाँ, देश के बाकी हिस्सों से अलग होती हैं और इसलिए इन क्षेत्रों में स्थापित सभी इकाइयों को विशेष सुविधाएं प्राप्त होती हैं।

SEZs का मूल विचार इस तथ्य से उत्पन्न होता है, कि यद्यपि पूरी अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढांचे और व्यावसायिक वातावरण में नाटकीय रूप से ‘रातोंरात’ सुधार करना काफी मुश्किल हो सकता है, किंतु ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों’ (Special Economic Zones – SEZ) को काफी कम समय में तैयार किया जा सकता है और ये एक ‘एन्क्लेव’ के रूप में इन समस्याओं को हल करने की दिशा में कुशलतापूर्वक कार्य कर सकते हैं।

सेज (SEZ) अधिनियम के मुख्‍य उद्देश्‍य:

  1. अतिरिक्‍त आर्थिक कार्यकलाप का सृजन
  2. वस्‍तुओं एवं सेवाओं के निर्यात का संवर्धन
  3. घरेलू एवं विेदेशी स्रोतों से निवेश का संवर्द्धन
  4. रोजगार अवसरों का सृजन
  5. अवसंरचना सुविधाओं का विकास

 

एसईजेड में सुविधाएं और प्रोत्साहन:

  1. सेज इकाइयों के विकास, संचालन और रखरखाव हेतु आयात / माल की घरेलू खरीद पर शुल्क से छूट।
  2. निर्यात से होने वाली आय पर आयकर छूट
  3. न्यूनतम वैकल्पिक कर (Minimum Alternate Tax – MAT) से छूट।
  4. केंद्र और राज्य स्तर पर मंजूरी के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस।

 

वर्तमान SEZs से संबंधित समस्याएं:

  • भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड), कई अन्य देशों में स्थापित एसईजेड की तरह सफल नहीं रहे हैं। कई एशियाई अर्थव्यवस्थाओं, विशेष रूप से चीन, कोरिया, मलेशिया और सिंगापुर को इन क्षेत्रों से बहुत लाभ हुआ है।
  • भारत में नई पीढ़ी के अधिकांश एसईजेड निर्यात की बजाय करों से बचने के लिए स्थापित किए गए हैं। केंद्रीय करों और राज्य द्वारा लगाए जाने वालों करों से छूट के रूप में, दी जाने वाली भारी राजकोषीय रियायते, डेवलपर्स को एसईजेड बनाने के लिए आकर्षित करती हैं।
  • भारत में अधिकांश औद्योगिक एसईजेड का प्रदर्शन उनके निर्धारित स्तर से नीचे रहा है, इसका मुख्य कारण शेष अर्थव्यवस्था के साथ इनके खराब संबंध रहे हैं। तटीय ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों’ के अपने भीतरी इलाकों के साथ खराब संपर्कों की वजह से, ये क्षेत्र अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने में विफल रहे हैं।
  • कई राज्यों में, केंद्रीय सेज अधिनियम, राज्य-स्तरीय कानून से मेल नहीं खाता है, जिसकी वजह से ‘सिंगल विंडो सिस्टम’ अप्रभावी बना जाता है।
  • एक सशक्त नीति तंत्र, कुशल कार्यान्वयन और प्रभावी निगरानी की कमी के कारण, SEZ के माध्यम से औद्योगीकरण करने संबंधी भारत का प्रयास गंभीर रूप से संकट में पड़ गया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम’ वर्ष 2005 में पारित किया गया था? हालांकि, वर्ष 2000 से 2006 तक, भारत में ‘विदेश व्यापार नीति’ के तहत एसईजेड कार्यरत थे।

क्या आप जानते हैं, कि भारत की मौजूदा SEZ नीति का अध्ययन करने के लिए वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा बाबा कल्याणी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था? इसकी सिफारिशें क्या हैं?

स्रोत: द हिंदू।


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


महाराष्ट्र दवारा ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ क्षेत्र में राजीव गांधी पुरस्कार

  • हाल ही में, महाराष्ट्र सरकार द्वारा ‘सूचना प्रौद्योगिकी’ में उत्कृष्टता हेतु ‘राजीव गांधी पुरस्कार’ शुरू करने की घोषणा की गयी है।
  • यह पुरस्कार, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती, 20 अगस्त, के अवसर पर सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए संस्थानों और कंपनियों को यह पुरस्कार दिया जाएगा।

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