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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 5 August 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. न्यायाधीशों का सुनवाई से इंकार या ‘न्यायिक निरर्हता’

2. उपद्रवी आचरण करने पर संसद सदस्यों का निलंबन

3. फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालय (FTSCs)

4. ‘संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ (MPLADS)

5. सीमित देयता भागीदारी (संशोधन) विधेयक 2021

 

सामान्य अध्ययन-III

1. विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA)

2. ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र हेतु वायु गुणवत्ता आयोग’ विधेयक

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. अन्नामलाई का उड़ने वाला मेंढक

2. भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In)

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

न्यायाधीशों का सुनवाई से इंकार या ‘न्यायिक निरर्हता’


(Recusal of Judges)

संदर्भ:

हाल ही में, भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण (N.V. Ramana) ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच कृष्णा जल विवाद की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। आंध्र प्रदेश राज्य द्वारा तेलंगाना के खिलाफ एक याचिका दायर की गई है, जिसमे आंध्र प्रदेश ने आरोप लगाया है, कि तेलंगाना, उसके राज्य-वासियों को पीने और सिंचाई के उद्देश्यों के लिए कृष्णा नदी के पानी के उनके वैध हिस्से से वंचित कर रहा है।

सुनवाई से अलग होने का कारण:

मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण मूलतः अविभाजित आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं। पिछली सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों राज्यों से हैं, और इसलिए वह दोनों राज्यों के मध्य कानूनी मुद्दों पर मामले की सुनवाई नहीं कर सकते ।

संबंधित प्रकरण:

आंध्र प्रदेश ने तेलंगाना पर ‘आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014 के तहत गठित ‘शीर्ष परिषद’ (Apex Council) में ‘नदी जल प्रबंधन’ के संबंध में लिए गए निर्णयों का पालन करने से इंकार करने का आरोप लगाया है। आंध्र प्रदेश का कहना है, कि तेलंगाना, 2014 के अधिनियम और केंद्र सरकार के निर्देश के तहत गठित ‘कृष्णा नदी प्रबंधन बोर्ड’ (Krishna River Management Board – KRMB) के निर्देशों की भी अनदेखा कर रहा है।

‘न्यायिक निरर्हता’ अथवा ‘सुनवाई से इंकार’ का तात्पर्य:

किसी पीठासीन न्यायायिक अधिकारी अथवा प्रशासनिक अधिकारी द्वारा हितों के टकराव के कारण किसी न्यायिक सुनवाई अथवा आधिकारिक कार्रवाई में भागीदारी से इंकार करने को न्यायिक निरर्हता (Judicial disqualification), ‘सुनवाई से इंकार’ करना अथवा ‘रिक्युजल’ (Recusal) कहा जाता है।

‘सुनवाई से इंकार’ करने हेतु सामान्य आधार:

  1. किसी तर्कशील निष्पक्ष पर्यवेक्षक को लगता है कि, न्यायाधीश किसी एक पक्षकार के प्रति सद्भाव रखता है, अथवा अन्य पक्षकार के प्रति द्वेषपूर्ण है, अथवा न्यायाधीश किसी के प्रति पक्षपाती हो सकता है।
  2. न्यायाधीश का मामले में व्यक्तिगत हित है अथवा वह मामले में व्यक्तिगत हित रखने वाले किसी व्यक्ति से संबंध रखता है।
  3. न्यायाधीश की पृष्ठभूमि अथवा अनुभव, जैसे कि न्यायाधीश के वकील के रूप में किये गए पूर्व कार्य।
  4. मामले से संबंधित तथ्यों अथवा पक्षकारों से व्यक्तिगत तौर पर परिचय।
  5. वकीलों या गैर-वकीलों के साथ एक पक्षीय संवाद।
  6. न्यायाधीशों के अधिनिर्णय, टिप्पणियां अथवा आचरण।

इस संबंध में क़ानून:

न्यायाधीशों द्वारा ‘सुनवाई से इंकार’ करने संबंधी कोई निश्चित नियम निर्धारित नहीं हैं।

हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा पद की शपथ लेने के समय, न्याय करने हेतु ‘बिना किसी डर या पक्षपात, लगाव या वैमनस्य के’ अपने कर्तव्यों को निभाने का वादा किया जाता है ।

इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी:

जस्टिस जे चेलमेश्वर ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015) मामले में अपनी राय दी थी कि ’जहां भी किसी न्यायाधीश के आर्थिक हित प्रतीत होते है, वहां पक्षपात संबंधी किसी ‘वास्तविक खतरे’ अथवा ‘तर्कपूर्ण संदेह’ की जांच की आवश्यकता नहीं है।

‘सुनवाई से इंकार’ से संबंधित चिंताएं एवं मुद्दे:

  1. न्यायाधीश द्वारा ‘सुनवाई से इंकार’ करने से ‘वादी पक्ष’ (litigants) को अपनी पसंद की न्यायिक पीठ चुनने का अवसर मिल जाता है, जिससे न्यायिक निष्पक्षता भंग हो सकती है।
  2. यह न्यायाधीशों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता, दोनों को कमजोर करता है और इन पर प्रश्नचिह्न उठाता है।
  3. न्यायाधीश द्वारा किसी मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने के संबंध में कोई नियम निर्धारित नहीं हैं। इस संदर्भ में, एक ही स्थिति की केवल अलग-अलग व्याख्याएँ हैं।
  4. ‘सुनवाई से इंकार’ करने से अदालतों की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न हो सकती है और इसमें विलंब हो सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

भारतीय संविधान में संघ और राज्य, दोनों कानूनों को प्रशासित करने हेतु न्यायालयों की एकल एकीकृत प्रणाली का प्रावधान लिया गया है। इसका क्या तात्पर्य है? क्या उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय के अधीनस्थ होते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. न्यायिक निरर्हता के लिए आधार।
  2. सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को शपथ कौन दिलाता है?
  3. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 127 और 128 किससे संबंधित हैं?
  4. कृष्णा की सहायक नदियाँ
  5. गोदावरी की सहायक नदियाँ
  6. अंतरराज्यीय नदी जल विवाद- प्रमुख प्रावधान
  7. कृष्णा और गोदावरी नदी प्रबंधन बोर्ड- गठन, कार्य और आदेश

मेंस लिंक:

‘सुनवाई से इंकार’ (Recusal), सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के लिए नैतिकता की एक चयनात्मक आवश्यकता बन गया है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

 उपद्रवी आचरण करने पर संसद सदस्यों का निलंबन


संदर्भ:

हाल ही में, राज्यसभा सभापति द्वारा तृणमूल कांग्रेस के छह सांसदों को उनके ‘अत्यंत उपद्रवी’ आचरण के कारण, राज्यसभा में दिन भर की शेष कार्यवाही के लिए सदन से बाहर जाने के आदेश दिया गया था। ये संसद सदस्य पेगासस कांड का विरोध करते हुए हाथों में पोस्टर लेकर सभापति के आसन के सामने आ गए थे।

राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक सामान्य ‘नियम 255’:

सभापति द्वारा इन सांसदों को निलंबित करने के लिए, राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक सामान्य नियमवाली के नियम – 255 लागू किया गया।

राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक नियमों के ‘नियम 255’ (सदस्य का चले जाना) के अनुसार- “सभापति किसी भी सदस्य को जिसका आचरण, उसकी राय में पूरी तरह से अव्यव्स्थापूर्ण हो, तत्काल राज्यसभा से चले जाने का निदेश दे सकेगा, और जिस सदस्य को इस तरह चले जाने का आदेश दिया जाए वह तुरंत चला जाएगा और और उस दिन की बैठक के अवशिष्ट समय तक अनुपस्थिति रहेगा।“

‘नियम 255’ के तहत निलंबन एवं ‘नियम 256’ के तहत निलंबन में अंतर:

  • राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक सामान्य ‘नियम 256’ में ‘सदस्य के निलंबन’ का प्रावधान है; जबकि ‘नियम 255’ में लघुतर सजा का प्रावधान है।
  • नियम 256 के अंतर्गत, ” यदि सभापति आवश्यक समझे तो वह किसी सदस्य को मौजूदा चालू सत्र की शेष अवधि के लिए सदन से निलंबित कर सकता है।

लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति की शक्तियों में अंतर:

  • लोकसभा अध्यक्ष की भांति, राज्यसभा के सभापति को राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक नियम पुस्तिका के नियम संख्या 255 के तहत “किसी भी सदस्य को जिसका आचरण, उसकी राय में पूरी तरह से अव्यव्स्थापूर्ण हो, तत्काल राज्यसभा से चले जाने का निदेश” की शक्ति प्राप्त है।
  • हालांकि, राज्यसभा के सभापति के पास, लोकसभा अध्यक्ष के विपरीत, किसी सदस्य को निलंबित करने की शक्ति नहीं होती है।

राज्यसभा सांसद के निलंबन हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया:

  1. सभापति, सभापीठ के अधिकार की उपेक्षा करने या बार-बार और जानबूझकर बाधा डालकर राज्यसभा के कार्य में बाधा डालकर राज्यसभा के नियमों का दुरुपयोग करने वाले सदस्य का नाम ले सकता है।
  2. यदि सभापति द्वारा किसी सदस्य का इस तरह से नाम लिया जाए, तो वह प्रस्ताव पेश किया जाने पर तत्काल बिना किसी संशोधन, स्थगन या वाद-विवाद के, उस सदस्य को राज्यसभा की सेवा से मौजूदा सत्र की अवशिष्ट अवधि तक के लिए निलंबित करने का निदेश दे सकता है।
  3. परन्तु, राज्यसभा किसी भी समय, प्रस्ताव किए जाने पर निलंबन को समाप्त कर सकती है।

सदन में व्यवस्था बनाए रखने हेतु प्रयास:

राज्यसभा के सभापति के रूप में, उपराष्ट्रपति अंसारी ने सदन में व्यवस्था लाने के लिए कई कदम उठाने का प्रयास किया था। वर्ष 2013 में, उन्होंने सदन में मर्यादा बनाए रखने हेतु कई क्रांतिकारी समाधान प्रस्तुत किए।

इसमें शामिल हैं:

  • राज्यसभा के नियमों का उल्लंघन करने वाले सांसदों का नाम राज्यसभा बुलेटिन में प्रकशित करना व उन्हें शर्मिंदा करना।
  • सभापति द्वारा सभापीठ के सामने आकर प्रदर्शन करने या ‘अत्यंत ख़राब’ आचरण करने वाले सासदों का नाम लिया जा सकता है।
  • सदन में अव्यवस्था के दृश्यों को सार्वजनिक करने से रोकने हेतु ‘सदन की कार्यवाही’ का प्रसारण स्थगित किया जा सकता है।

सांसदों के निलंबन को किस प्रकार उचित ठहराया जा सकता है? क्या यह अनियंत्रित व्यवहार को रोकने हेतु उठाया गया एक चरम कदम नहीं है?

सांसदों के अनियंत्रित व्यवहार का समाधान, दीर्घकालिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए।

  • इसमें कोई संदेह नहीं है, कि कार्यवाही के सुचारू रूप से संचालन हेतु पीठासीन अधिकारी के सर्वोच्च अधिकार का प्रवर्तन किया जाना आवश्यक है।
  • तथापि, एक संतुलन बना रहना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि पीठासीन अधिकारी का कार्य सदन का संचालन करना है, न कि उस पर शासन करना।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

यद्यपि, राज्यसभा और लोकसभा में सांसदों के निलंबन के संबंध में समान नियम निर्धारित किए गए हैं, किंतु, फिर भी इनमे कुछ अंतर है। लोकसभा में, नियम 374A के तहत, किसी उपद्रवी सदस्य के लिए “स्वतः निलंबन का प्रावधान है। यह प्रावधान किस स्थिति में लागू किया जा सकता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सांसदों को निलंबित करने व निलंबन रद्द करने संबंधी शक्तियां।
  2. इस संबंध में लोकसभा और राज्यसभा की प्रक्रियाओं में अंतर।
  3. सांसदों के निर्वाचन के संबंध में अपील।
  4. इस संबंध में नियम।

मेंस लिंक:

सांसदों के अनियंत्रित व्यवहार का समाधान दीर्घकालिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

 फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालय (FTSCs)


(Fast Track Special Courts)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 1,023 फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों (Fast Track Special Courts – FTSCs) को ‘केंद्र प्रायोजित योजना’ के रूप में अगले दो वर्षो तक जारी रखने की मंजूरी दी गई है। इसके लिए ₹1,572.86 करोड़ की राशि का परिव्यय किया जाएगा।

योजना के तहत, केंद्रीय हिस्से की धनराशि, ₹971.70 करोड़, निर्भया फंड से उपलब्ध करायी जाएगी।

योजना के बारे में:

यह योजना, अक्टूबर 2019 में शुरू की गई थी।

  • ‘फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों’ का गठन ‘राष्ट्रीय महिला सुरक्षा मिशन’ (the National Mission for Safety of Women – NMSW) के अंग के रूप में किया जा रहा है।
  • इस योजना को ‘विधि एवं न्याय मंत्रालय’ के अधीन ‘न्याय विभाग’ द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।
  • यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, और इसका उद्देश्य ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम’ (POCSO), 2012 के तहत बच्चों के खिलाफ बलात्कार और अपराधों के लंबित मामलों पर त्वरित सुनवाई और निपटान करना है।

‘फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालय’ (FTSC) योजना की विशेषताएं:

  1. इस योजना को एक वर्ष से आगे बढ़ाने का निर्णय, बाह्य मूल्यांकन द्वारा की की गयी सिफारिशों पर निर्भर करता है।
  2. इस योजना का उद्देश्य, किसी तरह की स्थायी आधारभूत सुविधाओं का निर्माण करना नहीं है। ‘फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों’ को, किराए पर लिए गए अथवा राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों और संबंधित उच्च न्यायालयों के निर्णय के अनुसार, उपयुक्त परिसर में संचालित किया जाएगा।
  3. ‘फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों’ की संरचना: प्रत्येक FTSC में एक न्यायिक अधिकारी और सात कर्मचारी सदस्य होंगे। जिन स्थानों पर पर्याप्त जनशक्ति उपलब्ध नहीं होगी, वहां राज्य/संघ राज्य क्षेत्र, संविदा के आधार पर, न्यायिक अधिकारियों और अदालती कर्मचारियों को नियुक्त कर सकते हैं। ‘फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों’ में मामलों के निपटान हेतु उपयुक्त अनुभव वाले सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।

योजना के लाभ और महत्व:

  • इस योजना के तहत, विशेष रूप से पॉक्सो मामलों की सुनवाई और निपटान हेतु 389 ‘फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों’ का गठन किया गया है।
  • प्रत्येक फास्ट-ट्रैक विशेष अदालत से, हर तिमाही 41-42 मामलों और एक वर्ष में न्यूनतम 165 मामलों का निपटान करने की अपेक्षा की गयी है।
  • योजना की शुरुआत के समय, सरकार ने विभिन्न अदालतों में लंबित बलात्कार और पॉक्सो अधिनियम संबंधी 1,66,882 मामलों को निपटाने का लक्ष्य रखा था।

योजना के अंर्तगत प्रदर्शन:

योजना के तहत देश में कुल 1,023 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए जाने का लक्ष्य रखा गया है, जिनमे से अब तक मात्र 597 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए हैं। संसदीय समिति द्वारा इस योजना को लागू करने में होने वाली देरी पर चिंता व्यक्त की गयी है।

आवश्यकता:

महिलाओं और बच्चों के बलात्कार और सामूहिक बलात्कार जैसे अपराधों पर प्रभावी तरीके से रोक लगाने हेतु यौन अपराधों से संबंधित मुकदमों को तेजी से और समयबद्ध तरीके से पूरा करने की आवश्यकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘पोक्सो अधिनियम’ के प्रावधानों के अनुसार, मामलों की जांच दो महीने में और इन पर सुनवाई का कार्य 6 महीने में पूरा किया जाना चाहिए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. POCSO के बारे में
  2. ‘फास्ट-ट्रैक विशेष न्यायालय’ (FTSC) के बारे में।
  3. स्थापना
  4. संरचना
  5. कार्यप्रणाली

मेंस लिंक:

फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों (Fast Track Special Courts – FTSCs) की आवश्यकता और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

 ‘संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ (MPLADS)


(MP Local Area Development Scheme)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार ने जानकारी देते हुए कहा है, कि सरकार, वित्तीय वर्ष 2021 और 2122 के लिए ‘संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ (MP Local Area Development Scheme – MPLADS) के तहत फिर से ‘निधि’ जारी करने संबंधी किसी भी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है।

पृष्ठभूमि:

सरकार द्वारा अप्रैल, 2020 में वित्तीय वर्ष 2020-21 और 2021-22 के लिए ‘संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ (MPLADS) को जारी नहीं करने का निर्णय लिया गया था; और इन दो वर्षो के दौरान MPLAD योजना के तहत जारी की जाने वाली राशि को, लोगों की आकस्मिक जरूरतों को पूरा करने हेतु, वित्त मंत्रालय के नियंत्रण में रख दिया गया था।

इस योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान ₹5,012 करोड़ खर्च किए गए, जबकि वित्तीय वर्ष 2019-20 में योजना के तहत मात्र ₹2,491.45 करोड़ खर्च किए गए थे।

इस राशि का उपयोग:

सरकार के अनुसार, MPLAD योजना से बचाई गई धनराशि का उपयोग, स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे में सुधार हेतु धन-आवंटन में वृद्धि करने, प्रधान मंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत निःशुल्क राशन प्रदान करने और लोगों के मुफ्त टीकाकरण के लिए किया गया है।

‘संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ (MPLADS) के बारे में:

इस योजना की शुरुआत  दिसंबर, 1993 में की गयी थी।

  • इसका उद्देश्य संसद सदस्यों के लिए, स्थानीय जरूरतों के आधार पर सामुदायिक अवसंरचनाओं सहित मूलभूत सुविधाओं और स्थाई सामुदायिक परिसंपत्तियों का विनिर्माण करने के लिए विकासात्मक प्रकृति के कार्यों की सिफारिश करने हेतु, एक तंत्र प्रदान करना था।
  • MPLAD योजना, पूरी तरह से भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना है।
  • इसके तहत प्रत्येक संसदीय क्षेत्र को वार्षिक रूप से 5 करोड़ रुपए की MPLADS निधि प्रदान की जाती है।

विशेष फोकस:

सांसदों के लिए, वार्षिक रूप से दी जाने वाली MPLADS निधि की न्यूनतम 15 प्रतिशत राशि अनुसूचित जाति की आबादी वाले क्षेत्रों में, तथा 7.5 प्रतिशत राशि अनुसूचित जनजाति की आबादी वाले क्षेत्रों में कराए जाने वाले कार्यों पर व्यय करना अनिवार्य है।

निधियां जारी करना:

इस योजना के तहत, सांसद निधि, सीधे जिला अधिकारियों को सहायता अनुदान (Grants in-Aid) के रूप में जारी की जाती है।

  • योजना के तहत जारी की गयी निधि गैर-व्यपगत (Non-Lapsable) होती है।
  • यदि किसी विशेष वर्ष में निधि जारी नहीं जाती है तो इसे पात्रता के अनुसार, अगले वर्षो में कराए जाने वालों कार्यों में जोड़ दिया जाएगा। इस योजना के तहत सांसदों की भूमिका अनुसंशा करने की होती है।
  • इस योजना के तहत, सांसदों की भूमिका मात्र सिफ़ारिशी होती है।
  • जिला प्राधिकरण के लिए, कार्यों संबंधी पात्रता की जांच करने, निधि स्वीकृत करने और कार्यान्वयन हेतु एजेंसियों का चयन करने, कार्यों को प्राथमिकता देने, समग्र निष्पादन का निरीक्षण करने और योजना की जमीनी स्तर पर निगरानी करने का अधिकार होता है
  • जिला प्राधिकरण द्वारा, सम्बंधित जिले में कार्यान्वयित की जा रही कम से कम 10% परियोजनाओं का प्रति वर्ष निरीक्षण किया जाएगा।

कार्यों के लिए अनुसंशा:

  1. लोकसभा सदस्य अपने संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों में कराए जाने वाले कार्यों की सिफारिश कर सकते हैं।
  2. राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य, संबंधित राज्य में कहीं भी कराए जाने वाले कार्यों की सिफारिश कर सकते हैं।
  3. लोकसभा और राज्यसभा के नामित सदस्य, देश में कहीं भी कराए जाने वाले कार्यों का चयन व सिफारिश कर सकते हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. MPLAD योजना, ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ से किस प्रकार संबद्ध है?
  2. मनोनीत सांसद द्वारा कार्यों की सिफारिश किन क्षेत्रों में की जा सकती है?
  3. क्या योजना के तहत, एससी और एसटी कल्याण पर कोई विशेष ध्यान दिया जाता है?
  4. अनुदान और ऋण के बीच अंतर?
  5. कार्यान्वयन करने वाली एजेंसियां

मेंस लिंक:

क्या MPLADS द्वारा सार्वजनिक सेवाओं को प्रदान किए जाने वाले प्रावधानों में मौजूदा अंतराल को पाटने में सहायता की गयी है? आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

सीमित देयता भागीदारी (संशोधन) विधेयक 2021


(Limited Liability Partnership (Amendment) Bill 2021)

संदर्भ:

हाल ही में, ‘सीमित देयता भागीदारी (संशोधन) विधेयक’ 2021 (Limited Liability Partnership (Amendment) Bill 2021) राज्यसभा में पारित कर दिया गया। इस विधेयक के तहत, ‘सीमित देयता भागीदारी अधिनियम’ (LLP Act), 2008 में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है।

विधेयक के उद्देश्य, प्रमुख प्रावधान और फोकस:

  1. विधेयक का उद्देश्य, ‘व्यापार में सुगमता’ (Ease of Doing Business को आसान बनाना और देश भर में स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करना है।
  2. मौजूदा कानून में, 24 दंडात्मक प्रावधान, 21 प्रशम्य अपराध (compoundable offences) और 3 गैर-शमनीय (non-compoundable) अपराध शामिल हैं। प्रस्तावित विधेयक में इन अपराधों में से 12 को गैर-अपराध घोषित करने का प्रावधान किया गया है।
  3. न्यायनिर्णायक अधिकारी (Adjudicating Officers): विधेयक में, केंद्र सरकार को ‘अधिनियम के तहत दंड देने हेतु ‘न्यायनिर्णायक अधिकारियों’ की नियुक्ति करने का अधिकार दिया गया है। ये अधिकारी केंद्र सरकार के अधीन होंगे तथा इन पदों पर रजिस्ट्रार के पद नीचे पर कार्यरत व्यक्ति की नियुक्ति नहीं की जाएगी। न्यायनिर्णायक अधिकारियों के आदेशों के विरुद्ध ‘क्षेत्रीय निदेशक’ के समक्ष अपील की जा सकेगी।
  4. विशेष अदालतें: विधेयक में केंद्र सरकार को अधिनियम के तहत अपराधों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने की अनुमति दी गई है।
  5. अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील: अधिनियम के तहत, राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) के आदेशों के खिलाफ ‘राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण’ (NCLAT) के समक्ष अपील की जा सकती है। विधेयक के अनुसार, कि दोनों पक्षों की सहमति से पारित आदेश के खिलाफ अपील नहीं की जा सकती है, और NCLT द्वारा जारी आदेश के 60 दिनों के भीतर अपील दायर की जानी चाहिए (जिसे अगले 60 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है)।
  6. विधेयक में लघु ‘सीमित देयता भागीदारी’ (LLP) के गठन का प्रावधान किया गया है: जिसमे (i) भागीदारों का योगदान 25 लाख रुपये तक है (पांच करोड़ रुपये तक बढ़ाया जा सकता है), (ii) पिछले वित्तीय वर्ष के लिए कारोबार40 लाख रुपये तक है (50 करोड़ रुपये तक बढ़ाया जा सकता है)।
  7. स्टार्ट-अप ‘सीमित देयता भागीदारी’: केंद्र सरकार कुछ LLP को स्टार्ट-अप LLP के रूप में भी अधिसूचित कर सकती है।
  8. एकाउंटिंग हेतु मानक: केंद्र सरकार, राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण के परामर्श से एलएलपी की श्रेणियों के लेखांकन और लेखा परीक्षा के मानकों को निर्धारित कर सकती है।

LLP क्या है?

सीमित देयता भागीदारी (Limited Liability Partnerships- LLPs) व्यापार संगठन का एक स्वरूप होती है, जिसमें प्रत्येक भागीदार की देयता कानूनी रूप से सीमित होती है। अतएव, यह भागीदारी और निगमों के तत्वों को प्रदर्शित करता है।

सीमित देयता भागीदारी (LLP) में  एक भागीदार, किसी दूसरे भागीदार के कदाचार अथवा लापरवाही के लिए जिम्मेदार या उत्तरदायी नहीं होता है।

‘सीमित देयता भागीदारी’ की प्रमुख विशेषताएं:

  • एलएलपी, एक निगमित निकाय (Body Corporate) और एक कानूनी इकाई होती है, जो इसके भागीदार से यह अलग होगी। इसमें एक सतत अनुक्रमण होता है।
  • एक पृथक कानून (अर्थात एलएलपी अधिनियम, 2008) होने के नाते, भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के प्रावधान एलएलपी पर लागू नहीं होते हैं और यह भागीदारों के मध्य अनुबंध संबंधी समझौते द्वारा विनियमित होता है।
  • प्रत्येक सीमित देयता भागीदारी द्वारा “सीमित देयता भागीदारी” शब्द अथवा इसका संक्षिप्त नाम ‘एलएलपी’ (LLP) का उपयोग अपने नाम के अंत में किया जाएगा।

संरचना:

प्रत्‍येक एलएलपी में कम से कम दो भागीदार होंगे और इसमें कम से कम दो व्‍यक्ति नामनिर्दिष्‍ट भागीदार के रूप में होंगे, जिसमें से कम से कम एक भारत का निवासी होगा और सभी भागीदार, ‘सीमित देयता भागीदारी’ के प्रतिनिधि होंगे।

LLP की आवश्यकता और महत्व:

  • एलएलपी प्रारूप एक वैकल्पिक कॉर्पोरेट व्यावसायिक संस्करण है, जिसमे किसी कंपनी के सीमित दायित्व का लाभ प्रदान किया जाता है, किन्तु साझेदारी फर्म की भांति इसके सदस्यों के लिए पारस्परिक सहमति के आधार पर आंतरिक प्रबंधन को व्यवस्थित करने की अनुमति होती है।
  • सामान्यतः यह प्रारूप लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए और विशेष रूप से सेवा क्षेत्र उद्यमों के लिए काफी उपयोगी होगा।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, विशेष रूप से सेवा उद्योग के लिए अथवा पेशेवरों से संबंधित गतिविधियों वाले व्यवसायों के लिए सीमित देयता भागीदारी (LLP) एक लोकप्रिय प्रारूप है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘वाणिज्यिक कार्य मंत्रालय’ (MCA) द्वारा स्थापित ‘कंपनी लॉ कमेटी’ (CLC) के बारे में जानते हैं? इसके उद्देश्य क्या है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. एलएलपी और कंपनियों के मध्य अंतर।
  2. देयता भागीदारी (Liability Partnerships- LP) और एलएलपी के मध्य अंतर।
  3. निगमित निकाय (Body Corporate) क्या होता है?
  4. एलएलपी भागीदारों के कार्य और भूमिकाएं।

मेंस लिंक:

सीमित देयता भागीदारी (LLP) पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: आंतरिक सुरक्षा के लिये चुनौती उत्पन्न करने वाले शासन विरोधी तत्त्वों की भूमिका।

विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA)


(Unlawful Activities (Prevention) Act)

संदर्भ:

वर्ष 2019 से, जम्मू और कश्मीर (J & K) प्रशासन द्वारा विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम’ (Unlawful Activities (Prevention) Act – UAPA) के तहत 1,200 से अधिक मामलों में 2,300 से अधिक व्यक्तियों और ‘सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम’ (Public Safety Act – PSA) के तहत 954 लोगों पर मामला दर्ज के जा चुके हैं।

इनमें से, विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA) के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए 46 प्रतिशत और ‘सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम’ (PSA) के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्तियों में से लगभग 30 प्रतिशत व्यक्ति अभी भी जम्मू-कश्मीर के अंदर और बाहर की जेलों में कैद हैं।

विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम के बारे में:

1967 में पारित, विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (Unlawful Activities (Prevention) Act-UAPA) का उद्देश्य भारत में गैरकानूनी गतिविधि समूहों की प्रभावी रोकथाम करना है।

  • यह अधिनियम केंद्र सरकार को पूर्ण शक्ति प्रदान करता है, जिसके द्वारा केंद्र सरकार किसी गतिविधि को गैरकानूनी घोषित कर सकती है।
  • इसके अंतर्गत अधिकतम दंड के रूप में मृत्युदंड तथा आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है।

प्रमुख बिंदु:

UAPA के तहत, भारतीय और विदेशी दोनों नागरिकों को आरोपित किया जा सकता है।

  • यह अधिनियम भारतीय और विदेशी अपराधियों पर समान रूप से लागू होता है, भले ही अपराध भारत के बाहर विदेशी भूमि पर किया गया हो।
  • UAPA के तहत, जांच एजेंसी के लिए, गिरफ्तारी के बाद चार्जशीट दाखिल करने के लिए अधिकतम 180 दिनों का समय दिया जाता है, हालांकि, अदालत को सूचित करने के बाद इस अवधि को और आगे बढ़ाया जा सकता है।

वर्ष 2019 में किए गए संशोधनों के अनुसार:

  • यह अधिनियम राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के महानिदेशक को, एजेंसी द्वारा मामले की जांच के दौरान, आतंकवाद से होने वाली आय से निर्मित संपत्ति पाए जाने पर उसे ज़ब्त करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • यह अधिनियम राज्य में डीएसपी अथवा एसीपी या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के अतिरिक्त, आतंकवाद संबंधी मामलों की जांच करने हेतु ‘राष्ट्रीय जाँच एजेंसी’ के इंस्पेक्टर या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारियों को जांच का अधिकार प्रदान करता है।
  • अधिनियम में किसी व्यक्ति को आतंकवादी के रूप में अभिहित करने का प्रावधान भी शामिल है।

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा परिभाषित UAPA की रूपरेखा:

जून 2021 में, विधिविरूद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम (Unlawful Activities Prevention Act- UAPA), 1967 की एक अन्य रूप से “अस्पष्ट” धारा 15 की रूपरेखा को परिभाषित करते हुए, दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा, अधिनियम की धारा 18, 15, 17 को लागू करने पर कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए गए थे।

UAPA की धारा 15, 17 और 18:

  1. अधिनियम की धारा 15, ‘आतंकवादी कृत्यों’ से संबंधित अपराधों को आरोपित करती है।
  2. धारा 17 के तहत आतंकवादी कृत्यों के लिए धन जुटाने पर दण्डित करने का प्रावधान किया गया है।
  3. धारा 18, के अंतर्गत ‘आतंकवादी कृत्य करने हेतु साजिश आदि रचने’ या आतंकवादी कृत्य करने हेतु तैयारी करने वाले किसी भी कार्य’ संबंधी अपराधों के लिए आरोपित किया जाता है।

अदालत द्वारा की गई प्रमुख टिप्पणियां:

  1. “आतंकवादी अधिनियम” (Terrorist Act) को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
  2. अदालत ने ‘हितेंद्र विष्णु ठाकुर मामले’ में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि, ‘आतंकवादी गतिविधियां’ वे होती है, जिनसे निपटना, सामान्य दंड कानूनों के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता से बाहर होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप, अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र अभिसमय’ के बारे में जानते हैं? यह अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध के खिलाफ लड़ाई में मुख्य अंतरराष्ट्रीय उपकरण है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विधिविरूद्ध क्रियाकलाप की परिभाषा
  2. अधिनियम के तहत केंद्र की शक्तियां
  3. क्या ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा लागू है?
  4. 2004 और 2019 में संशोधन द्वारा किए गए बदलाव।
  5. क्या विदेशी नागरिकों को अधिनियम के तहत आरोपित किया जा सकता है?

मेंस लिंक:

क्या आप सहमत हैं कि विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) संशोधन अधिनियम मौलिक अधिकारों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए स्वतंत्रता का बलिदान करना न्यायसंगत है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र हेतु वायु गुणवत्ता आयोग’ विधेयक


संदर्भ:

हाल ही में, ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और इसके निकटवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन हेतु आयोग विधेयक, 2021’ (‘The Commission for Air Quality Management in National Capital Region and Adjoining Areas Bill, 2021’) लोकसभा में पारित कर दिया गया है।

ध्यान दें:

हाल ही में, हम इस लेख को विस्तार से कवर कर चुके है। इस विषय पर और कोई उल्लेखनीय घटनाक्रम नहीं है। अतः इस विधेयक के बारे में जानकारी हेतु कृपया इस लिंक को देखें।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


अन्नामलाई का उड़ने वाला मेंढक

(Anaimalai flying frog)

वैज्ञानिक नाम: रैकोफोरस स्यूडोमालाबेरिकस (Racophorus pseudomalabaricus)

  • अन्य नाम: भ्रामक मालाबार ग्लाइडिंग मेंढक और भ्रामक मालाबार ट्री फ्रॉग।
  • यह एक ‘गंभीर रूप से लुप्तप्राय’ (critically endangered) मेंढक प्रजाति है।
  • यह, पश्चिमी घाट के दक्षिणी भाग की स्थानिक प्रजाति है, और वास-स्थलों के नष्ट होने की वजह से इन मेंढकों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है।
  • वर्तमान में, यह प्रजाति, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उद्यान और परम्बिकुलम टाइगर रिजर्व, दो संरक्षित क्षेत्रों में पायी जाती है।

 

भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In)

भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम (Indian Computer Emergency Response Team – CERT-In), ‘इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय’, भारत सरकार के अधीन ‘भारतीय साइबर स्पेस’ को सुरक्षित करने के उद्देश्य से गठित एक संस्था है।

  • इसे वर्ष 2004 में स्थापित किया गया था।
  • यह हैकिंग और फ़िशिंग जैसे साइबर सुरक्षा खतरों से निपटने हेतु ‘नोडल एजेंसी’ है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम 2008 के तहत, CERT-In के लिए कुछ निश्चित कार्य करने के लिए राष्ट्रीय एजेंसी के रूप में अभिहित किया गया है।

संदर्भ:

वर्ष 2021 के पहले छह महीनों में, CERT-In द्वारा 6.07 लाख साइबर सुरक्षा घटनाओं को ट्रैक किया गया है,  इनमे से लगभग 12,000 साइबर सुरक्षा संबंधी मामले सरकारी संगठनों से संबंधित थे।


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