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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 23 July 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता

2. बिना टीका लगवाए हुए व्यक्तियों के लिए ‘वर्क परमिट’ पर प्रतिबंध संबंधी आदेश पर रोक

 

सामान्य अध्ययन-III

1. अंतर्देशीय पोत विधेयक

2. गंगा नदी में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण

3. भारत में निगरानी संबंधी कानून एवं निजता संबंधी चिंताएं

4. उच्च न्यायालय द्वारा आईटी नियमों के खिलाफ याचिका पर केंद्र को नोटिस

5. सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC)

6. भारत, मादक पदार्थों की तस्करी से निपटने हेतु 26 द्विपक्षीय समझौतों में शामिल

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP)

2. ‘गांव बूरा’

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता


(Independence of the Judiciary)

संदर्भ:

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्याय की दो “समानांतर प्रणालियों” का उल्लेख किया किया गया – एक अमीरों के लिए और दूसरी गरीबों के लिए।

अदालत द्वारा यह टिप्पणी, मध्य प्रदेश में एक विधायक के पति को जमानत दिए जाने से संबंधित मामले की सुनवाई करने के दौरान की गई थी।

संबंधित प्रकरण:

कुछ समय पूर्व मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा एक अभियुक्त को जमानत दे दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से बचने का प्रयास रहे और आपराधिक इतिहास वाले व्यक्ति को जमानत देना, एक “गंभीर त्रुटि” करार दिया है।

शीर्ष अदालत की टिप्पणी:

  • भारत में क़ानून की दो समानांतर प्रणालियाँ नहीं हो सकतीं है – एक समृद्ध, साधन संपन्न और राजनीतिक शक्ति एवं प्रभाव रखने वालों के लिए, और दूसरी न्याय प्राप्त करने या अन्याय से लड़ने हेतु संसाधनों और क्षमताओं के बगैर छोटे लोगों के लिए।
  • इस तरह की दोहरी कानूनी प्रणाली के होने से, कानून की वैधता ही खत्म हो जाएगी।
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रत्येक न्यायाधीश की स्वतंत्रता है। संबंधित मामला, सुनवाई करने वाले जजों पर राजनीतिक दबाव डालने जैसी एक बड़ी बुराई की ओर संकेत करता है।

भारत का संविधान न्यायपालिका की स्वतंत्रता को किस प्रकार सुनिश्चित करता है?

  1. कार्यकाल की सुरक्षा: एक बार नियुक्त होने के बाद, न्यायाधीशों को, सिवाय राष्ट्रपति के आदेश के, उन्हें उनके पद से नहीं हटाया जा सकता है। और राष्ट्रपति भी इन्हें ‘कदाचार या असमर्थता के अन्वेषण और साबित होने पर ही’ पद से हटाने के आदेश दे सकता है। (अनुच्छेद 124 और 217)
  2. न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते नियत होते हैं और विधायिका द्वारा इस पर मतदान नहीं किया जा सकता है।
  3. सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियाँ और क्षेत्राधिकार: संसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र में केवल विस्तार किया जा सकता है, किंतु उन्हें कम नहीं किया जा सकता।
  4. उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के अपने कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान आचरण के संबंध में, राज्य की विधायिका में कोई चर्चा नहीं की जा सकती है।
  5. सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय, दोनों को किसी भी व्यक्ति को, अदालत की अवमानना करने पर दंडित करने की शक्ति प्राप्त है।

न्यायिक स्वतंत्रता की आवश्यकता:

  • न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence), अदालतों के प्रति जनता के उस विश्वास को सुनिश्चित करती है, कि अदालत ऐसा अंतिम जगह हैं जहाँ किसी भी विरोध और प्रभाव के बावजूद, न्याय किया जाएगा।
  • कार्यपालिका द्वारा किसी भी प्रकार के कदाचार के मामले में न्याय पाने हेतु, लोगों का न्यायपालिका में विश्वास और उच्च विश्वसनीयता होती है।
  • यदि न्यायिक कार्यवाही प्रक्रिया में कार्यपालिका का हस्तक्षेप और कार्यपालिका के प्रति न्यायिक पक्षपात को अनुमति दी जाती है, तो आम जनता का न्यायपालिका पर विश्वास और इसकी विश्वसनीयता समाप्त हो जाएगी।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि 1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा अनुच्छेद 312 (1) में संशोधन के माध्यम से संसद को, संघ और राज्यों के लिए एक समान अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) सहित, एक या एक से अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का गठन करने हेतु कानून बनाने का अधिकार दिया गया था। AIJS के बारे में अधिक जानने हेतु देखे

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता से संबंधित प्रमुख प्रावधान
  2. संविधान में लगभग 42वां संशोधन

मेंस लिंक:

न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आवश्यकता और महत्व की चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ एवं उनका प्रबंधन- संगठित अपराध और आतंकवाद के बीच संबंध।

बिना टीका लगवाए हुए व्यक्तियों के लिए ‘वर्क परमिट’ पर प्रतिबंध संबंधी आदेश पर रोक


संदर्भ:

हाल ही में, गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना पर रोक लगा दी गयी है। इस अधिसूचना के अनुसार, राज्य में कार्य करने हेतु प्रवेश के लिए अस्थायी परमिट केवल उन व्यक्तियों को जारी किया जाएगा, जो कोविड -19 महामारी से बचाव का टीका लगवा चुके हैं।

संबंधित आदेश:

30 जून को जारी अरुणाचल प्रदेश सरकार के एक आदेश में कहा गया है, कि फिलहाल, राज्य में प्रवेश करने के लिए आवश्यक “इनर लाइन परमिट’ (ILP) निलंबित रहेंगे, किंतु ‘सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में विकास कार्यों हेतु’ अस्थायी परमिट जारी किए जा सकते हैं, बशर्ते इन व्यक्तियों के लिए कोविड -19 से बचाव का टीका लगाया चुका हो।”

अदालत द्वारा इस आदेश पर रोक लगाने का कारण:

  • अरुणाचल सरकार द्वारा जारी अधिसूचना, टीकाकृत और गैर-टीकाकृत व्यक्तियों के बीच भेदभाव करती हैं जोकि संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (d) और 21 का उल्लंघन है।
  • टीका लगवा चुके और बिना टीका लगवाए हुए व्यक्तियों के बीच इस प्रकार का वर्गीकरण किसी “बोधगम्य विभेदक” पर आधारित नहीं है और न ही ‘इस तरह के वर्गीकरण का, कोविड -19 महामारी पर नियंत्रण या इसके प्रसार पर रोक आदि जैसे किसी उद्देश्य को पूरा करने से कोई तर्कपूर्ण संबंध है।’

इनर लाइन परमिट (ILP) क्या है?

इनर लाइन परमिट, गैर-मूल निवासियों के लिए ILP प्रणाली के अंतर्गत संरक्षित राज्य में प्रवेश करने अथवा ठहरने हेतु आवश्यक दस्तावेज होता है।

वर्तमान में, पूर्वोत्तर के चार राज्यों, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड में ILP प्रणाली  लागू है। लक्षद्वीप में प्रवेश करने के लिए भी ‘इनर लाइन परमिट’ अनिवार्य है।

  • इनर लाइन परमिट के द्वारा, किसी गैर-मूल निवासी के लिए, राज्य में ठहरने की अवधि तथा भ्रमण करने के क्षेत्र को निर्धारित किया जाता है।
  • ILP को संबंधित राज्य सरकार द्वारा जारी किया जाता है और इसे ऑनलाइन या व्यक्तिगत रूप से आवेदन करके प्राप्त किया जा सकता है।

‘इनर लाइन परमिट’ केवल घरेलू पर्यटकों के लिए मान्य होता है।

‘इनर-लाइन परमिट’ का तर्काधार

इनर लाइन परमिट, ‘बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन एक्ट’ (BEFR) 1873 का एक विस्तार है। यह अंग्रेजों द्वारा कुछ निर्दिष्ट क्षेत्रों में प्रवेश पर रोक लगाने वाले वाले नियम हैं।

  • अंग्रेजों द्वारा पूर्वोत्तर भारत पर कब्जा करने के बाद, उपनिवेशवादियों ने आर्थिक लाभ के लिए इस क्षेत्र और इसके संसाधनों का शोषण करना शुरू कर दिया।
  • उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मपुत्र घाटी में चाय बागान लगाए और तेल उद्योग शुरू किए।
  • पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली स्थानीय जनजातियाँ नियमित रूप से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित चाय बागानों, तेल के कुओं और व्यापारिक चौकियों पर लूटपाट की घटनाओं को अंजाम देती थी।
  • इसलिए ये नियम, ब्रिटिश शासन के हितों की सुरक्षा हेतु कुछ राज्यों में ‘ब्रिटिश प्रजा’ अर्थात भारतीयों को इन क्षेत्रों में व्यापार करने से रोकने हेतु बनाए गए थे, और इसी संदर्भ में BEFR 1873 को लागू किया गया था।

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इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘इनर लाइन परमिट’ (ILP) और ‘संरक्षित क्षेत्र परमिट’ (Protected Area Permit- PAP) के बीच अंतर जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

चूंकि इनर लाइन परमिट (ILP) अक्सर चर्चा में रहता है, अतः निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित करें:

  1. उत्तर-पूर्वी राज्यों से जुड़े मानचित्र आधारित प्रश्न।
  2. पूर्वोत्तर राज्य और उनके अंतर्राष्ट्रीय पड़ोसी।

मेंस लिंक:

भारत के पूर्वोत्तर  राज्यों में इनर लाइन परमिट (ILP) प्रणाली को लागू करने संबंधी मुद्दे और इस प्रणाली द्वारा भारत सरकार के समक्ष पेश की गयी दुविधा का विश्लेषण कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

अंतर्देशीय पोत विधेयक


(Inland Vessels Bill)

संदर्भ:

हाल ही में, सरकार द्वारा लोकसभा में ‘अंतर्देशीय पोत विधेयक’, 2021 (Inland Vessels Bill, 2021) पेश किया गया है।

विधेयक के प्रमुख बिंदु:

  1. ‘अंतर्देशीय पोत विधेयक’ में विभिन्न राज्यों द्वारा बनाए गए अलग-अलग नियमों के बजाय पूरे देश के लिए एक संयुक्त कानून का प्रावधान किया गया है।
  2. प्रस्तावित कानून के तहत जारी किया जाने वाला ‘पंजीकरण प्रमाण पत्र’ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मान्य होगा, और इसके लिए राज्यों से अलग अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।
  3. विधेयक में एक इलेक्ट्रॉनिक पोर्टल पर, पोत, पोत पंजीकरण और चालक दल का विवरण दर्ज करने के लिए एक केंद्रीय डेटा बेस बनाने का प्रावधान किया गया है।
  4. विधेयक के तहत, यांत्रिक रूप से चालित सभी जहाजों के लिए पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया है। सभी गैर-यांत्रिक रूप से चालित जहाजों को भी जिला, तालुक या पंचायत या ग्राम स्तर पर पंजीकरण करना होगा।

भारत में ‘अंतर्देशीय जल परिवहन’:

(Inland Water Transport-IWT)

  1. भारत में नौगम्य जलमार्ग की लम्बाई लगभग 14,500 किलोमीटर हैं, और इसमें नदियाँ, नहरें, अप्रवाही जल या बैकवाटर (Backwaters), खाड़ियाँ आदि शामिल हैं।
  2. अंतर्देशीय जल परिवहन (IWT) एक ईंधन-किफायती और पर्यावरण अनुकूल परिवहन माध्यम है।
  3. राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम 2016 के अनुसार, 111 जलमार्गों को राष्ट्रीय जलमार्ग (National Waterways- NW) घोषित किया गया है।
  4. भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) द्वारा, विश्व बैंक की तकनीकी और वित्तीय सहायता से, गंगा के हल्दिया-वाराणसी विस्तार (राष्ट्रीय जलमार्ग (NW)-1 का भाग) पर नौपरिवहन क्षमता बढ़ाने के लिए लगभग ₹ 18 करोड़ की लागत के साथ जल मार्ग विकास परियोजना (JMVP) का कार्यान्वयन किया जा रहा है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘राष्ट्रीय जलमार्ग’ (NW ) 1 और राष्ट्रीय जलमार्ग-2 की अवस्थिति के बारे में जानते हैं? ‘राष्ट्रीय जलमार्ग’ 1 किन राज्यों से होकर गुजरता हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. महत्वपूर्ण जलमार्ग
  2. इनकी अवस्थिति
  3. JMVP के बारे में
  4. IWAI के बारे में

मेंस लिंक:

राष्ट्रीय जलमार्गों के महत्व की विवेचना कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

गंगा नदी में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण


(Microplastics in Ganga)

संदर्भ:

हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि गंगा नदी के विभिन्न हिस्से ‘माइक्रोप्लास्टिक’ से प्रदूषित हैं।

इस प्रकार के प्लास्टिक का सर्वाधिक सांद्रण वाराणसी में पाया गया है, और इसमें ‘सिंगल-यूज़ प्लास्टिक’ तथा द्वितीयक प्लास्टिक उत्पाद शामिल पाए गए हैं।

‘माइक्रोप्लास्टिक’ के बारे में:

‘माइक्रोप्लास्टिक्स’ (Microplastics) को पानी में अघुलनशील, सिंथेटिक ठोस कणों के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिनका आकार 1 माइक्रोमीटर से 5 मिलीमीटर (मिमी) तक होता है।

माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के कारण:

  • नदी के किनारे अवस्थित कई शहरों के अनुपचारित सीवेज का नदी की धारा में प्रवाह किया जाना।
  • कई घनी आबादी वाले शहरों के निकट, औद्योगिक अपशिष्ट और गैर-अपघटनीय प्लास्टिक में लिपटे धार्मिक प्रसाद का नदी में विसर्जन करने से नदी में प्रदूषकों का ढेर एकत्रित हो जाता है।
  • नदी में छोड़े गए या फेंके गए प्लास्टिक उत्पाद और अपशिष्ट पदार्थ बिखंडित होकर अंततः माइक्रोपार्टिकल्स के रूप में विभिक्त हो जाते हैं।

प्लास्टिक प्रदूषण विशेष रूप से हानिकारक क्यों है?

  1. प्लास्टिक को विघटित होने में सैकड़ों से हजारों वर्ष का समय लग सकता है, और यह प्लास्टिक के प्रकार और इसे ‘डंप’ करने वाली जगह पर भी निर्भर करता है।
  2. जूप्लैंकटंस जैसी कुछ समुद्री प्रजातियां, सूक्ष्म कणों को भोजन के रूप में ग्रहण करने पर वरीयता देतीं है, इससे इनके लिए खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करना आसान हो जाता है। ‘माइक्रोप्लास्टिक’ जैसे सूक्ष्म कणों को खाने से ये समुद्री जीव, शीघ्र ही ‘विष्ठा की गोलियों’ में परिवर्तित हो जाते है।
  3. पिछले कुछ वर्षों में, विभिन्न समाचार रिपोर्टों से पता चला है कि व्हेल, समुद्री पक्षी और कछुए जैसे समुद्री जानवर अनजाने में प्लास्टिक को निगल जाते हैं और इससे अक्सर इनकी दम घुटने से मौत हो जाती है।

मनुष्यों पर प्रभाव:

  1. जब समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण, खाद्य श्रृंखला में पहुँच जाता है, तो यह मनुष्यों के लिए भी हानिकारक हो जाता है। उदाहरण के लिए, बहुधा नल के पानी, बीयर और यहां तक ​​कि नमक में भी माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए जाते हैं।
  2. मनुष्य द्वारा ग्रहण किए जाने वाले खाद्य पदार्थों में प्लास्टिक प्रदूषण की मात्रा का अनुमान लगाने वाले कुछ अध्ययनों में से, जून 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, एक सामान्य व्यक्ति हर साल माइक्रोप्लास्टिक के कम से कम 50,000 कण अपने भोजन के साथ खा जाता है।
  3. मनुष्यों द्वारा प्लास्टिक का अंतर्ग्रहण हानिकारक होता है, क्योंकि प्लास्टिक के उत्पादन हेतु प्रयुक्त कई रसायन कैंसर-जनक हो सकते हैं।
  4. फिर भी, चूंकि माइक्रोप्लास्टिक्स अध्ययन का एक उभरता हुआ क्षेत्र है, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर इसके सटीक जोखिम स्पष्ट रूप से अभी ज्ञात नहीं हैं।

प्लास्टिक प्रदूषण को मात देने हेतु भारत के प्रयास:

  • 20 से अधिक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ‘प्लास्टिक प्रदूषण को मात देने की लड़ाई’ में शामिल हो गए हैं, और इनके द्वारा कैरी बैग, कप, प्लेट, कटलरी, स्ट्रॉ और थर्मोकोल उत्पादों जैसे सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की गई है।
  • भारत के “बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन” अभियान की वैश्विक रूप से सराहना की गयी है। इस अभियान के तहत भारत ने वर्ष 2022 तक ‘सिंगल-यूज प्लास्टिक’ को खत्म करने का संकल्प लिया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘समुद्री कचरे पर वैश्विक सहभागिता’ (Global Partnership on Marine Litter – GPML) के बारे में सुना है? यह विभिन्न सरकारों, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, व्यवसायों, शिक्षाविदों, स्थानीय प्राधिकरणों, गैर सरकारी संगठनों और व्यक्तियों के लिए एक स्वैच्छिक एवं मुक्त भागीदारी है। इसके क्या उद्देश्य हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. माइक्रोप्लास्टिक्स के बारे में
  2. ‘जैव संचय’ (Bioaccumulation) क्या होता है?
  3. अच्छी खाद्य श्रृंखला क्या होती है?
  4. ‘खाद्य जाल’ क्या हैं?

मेंस लिंक:

माइक्रोप्लास्टिक द्वारा मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

 भारत में निगरानी संबंधी कानून एवं निजता संबंधी चिंताएं


संदर्भ:

इजरायली स्पाईवेयर पेगासस के कारण हुए विवाद के बीच, भारत सरकार द्वारा दावा किया गया है, कि भारत में सभी इंटरसेप्शन / अवरोध कानूनी रूप से किए जाते हैं।

भारत में निगरानी संबंधी प्रमुख कानून कौन से हैं?

भारत में संचार निगरानी मुख्य रूप से दो कानूनों के अंतर्गत की जाती है:

  1. टेलीग्राफ अधिनियम, 1885
  2. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000

टेलीग्राफ अधिनियम’:

टेलीग्राफ अधिनियम, मूल रूप से कॉल्स के अवरोधन / इंटरसेप्शन से संबंधित है।

  • इस कानून के तहत सरकार केवल कुछ स्थितियों– भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध या सार्वजनिक व्यवस्था, किसी अपराध को करने हेतु उकसाने से रोकने – में ही कॉल को इंटरसेप्ट कर सकती है।
  • ये वही प्रतिबंध हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए गए हैं।
  • इस कानून में इस बात काभी उल्लेख है कि वैध होने के बाद भी यह अवरोधन, पत्रकारों के खिलाफ, कुछ परिस्थितियों को छोड़कर, लागू नहीं किया जा सकता है।

पब्लिक यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत संघ’ (1996) वाद:

इस मामले में, सीबीआई द्वारा “राजनेताओं के फोन टैपिंग” पर रिपोर्ट के मद्देनजर एक जनहित याचिका दायर की गई थी।

वाद की सुनवाई के दौरान, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा टेलीग्राफ अधिनियम के प्रावधानों में प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की कमी की ओर इशारा करते हुए अवरोधन के लिए कुछ दिशानिर्देश निर्धारित किए गए थे।

इन दिशानिर्देशों के आधार पर निम्नलिखित नियमों को तैयार किया गया था:

  1. टेलीग्राफ नियमावली, 2007 का नियम 419A
  2. वर्ष 2009 में आईटी एक्ट के तहत निर्धारित नियम

टेलीग्राफ नियमावली, 2007 का नियम 419A:

  • नियम 419A के अनुसार, केंद्र के मामले में, गृह मंत्रालय में भारत सरकार का सचिव और राज्य सरकार के मामले में, एक सचिव स्तर का अधिकारी जो गृह विभाग का प्रभारी होता है, इंटरसेप्शन किए जाने संबंधी आदेश जारी कर सकता है।
  • अपरिहार्य परिस्थितियों में इस प्रकार के आदेश, केंद्रीय गृह सचिव या राज्य के गृह सचिव द्वारा विधिवत अधिकृत किए गए, भारत सरकार के संयुक्त सचिव के पद से नीचे के अधिकारी द्वारा भी जारी किए जा सकते हैं।

आईटी अधिनियम, 2000:

आईटी एक्ट के तहत, डेटा के सभी इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन को इंटरसेप्ट किया जा सकता है।

  • टेलीग्राफ अधिनियम की धारा 5(2) और संविधान के अनुच्छेद 19(2) में प्रदान किए गए प्रतिबंधों के अलावा, आईटी अधिनियम की धारा 69 इस प्रावधान के लिए अधिक व्यापक बना देती है। धारा 69 के द्वारा क़ानून में ‘किसी अपराध की जांच हेतु’ डिजिटल जानकारी का अवरोधन, निगरानी और डिक्रिप्शन करना शामिल किया गया है।
  • महत्वपूर्ण बात यह है, कि यह प्रावधान, टेलीग्राफ अधिनियम के तहत निर्धारित शर्त ‘सार्वजनिक सुरक्षा के हित में सार्वजनिक आपात स्थिति’ को समाप्त कर देता है, जिससे इस कानून के तहत शक्तियों का दायरा और विस्तारित हो जाता है।

निगरानी के संबंध में सुधारों और एक व्यापक कानून की आवश्यकता:

मौजूदा कानूनों में तत्कालीन योजना आयोग द्वारा चिह्नित कमियों को पूरा करने हेतु एक व्यापक कानून की आवश्यकता है। वर्तमान में, इन कानूनों के साथ निम्नलिखित समस्याएं हैं:

  1. अनुमति दिए जाने का आधार
  2. इंटरसेप्शन का प्रकार
  3. सूचना की कणिकता / ग्रैन्युलैरिटी जिसे इंटरसेप्ट किया जा सकता है
  4. सेवा प्रदाताओं द्वारा सहायता की सीमा
  5. इंटरसेप्टेड सामग्री का ‘नष्ट किया जाना और रोक कर रखना’

निष्कर्ष:

टैपिंग, किसी व्यक्ति की निजता का गंभीर अतिक्रमण है। अत्यधिक परिष्कृत संचार प्रौद्योगिकी के विकसित होने के साथ ही, बिना किसी हस्तक्षेप के किसी के घर या कार्यालय की गोपनीयता, टेलीफोन वार्ता को बेचने संबंधी अधिकार, दुरुपयोग के प्रति अतिसंवेदनशील होता जा रहा है। इसलिए, निगरानी के लिए मौजूदा ढांचे में कमियों को दूर करने हेतु एक व्यापक डेटा संरक्षण कानून अधिनियमित किए जाने की आवश्यकता है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

निम्नलिखित कानूनों में प्रमुख प्रावधान:

  1. टेलीग्राफ अधिनियम
  2. आईटी नियम
  3. नियम 419ए
  4. आईटी अधिनियम की धारा 69ए

 

मेंस लिंक:

भारत में टेलीफोन निगरानी से जुड़ी चिंताओं की चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

उच्च न्यायालय द्वारा आईटी नियमों के खिलाफ याचिका पर केंद्र को नोटिस


संदर्भ:

दिल्ली उच्च न्यायालय ने नए आईटी नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है। याचिका में, नए आईटी नियमों को व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों के उपयोगकर्ताओं की निजता और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकारों की कथित तौर पर घोर अवहेलना करने वाला बताया गया है।

नए नियमों में विवादास्पद प्रावधान:

  1. नए नियमों में, मूल कानून, आईटी अधिनियम के प्रदत्त शक्तियों को अधिक व्यापक बनाया गया है, और इसके तहत नियम 3(1)(b) से असंगत जानकारी तक पहुंच को स्वेच्छा हटाने का प्रावधान किया गया है।
  2. ये नियम, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उपयोगकर्ताओं को निरंतर अपनी निगरानी में रखने की अनुमति देते हैं जोकि ‘निजता के अधिकार’ का घोर उल्लंघन है।
  3. नए नियमों के अनुसार, भले ही कोई व्यक्ति, नियमों के उल्लंघन संबंधी किसी जांच के दायरे में न हो, फिर भी ‘मध्यस्थ’ को बिना किसी औचित्य के उसका डेटा अपने पास रखना होगा। यह किसी भी उपयोगकर्ता के ‘निजता के अधिकार’ का घोर उल्लंघन है।
  4. शिकायत अधिकारी और/अथवा मुख्य अनुपालन अधिकारी के निर्णय के विरुद्ध, नए नियमों के तहत किसी अपीलीय प्रक्रिया का प्रावधान नहीं किया गया है।
  5. कथित आपत्तिजनक जानकारी के लेखक को, उसके खिलाफ किसी भी शिकायत पर निर्णय लेने से पहले, अपनी बात रखने के संबंध में कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

सरल शब्दों में, याचिकाकर्ता का कहना है, कि सोशल मीडिया मध्यस्थों को शिकायत या अन्य किसी आधार पर, किसी ‘जानकारी’ को हटाए जाने के संबंध में निर्णय लेने की शक्ति नहीं दी जानी चाहिए।

नए नियमों का अवलोकन:

  1. इन नियमों के तहत, देश भर में ‘ओवर द टॉप’ (OTT) और डिजिटल पोर्टलों द्वारा एक ‘शिकायत निवारण प्रणाली’ (Grievance Redressal System) गठित करना अनिवार्य किया गया है। उपयोगकर्ताओं के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग किए जाने के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज कराने हेतु यह आवश्यक है।
  2. महत्वपूर्ण सोशल मीडिया कंपनियों के लिए ‘एक मुख्य अनुपालन अधिकारी’ (Chief Compliance Officer) की नियुक्ति करना अनिवार्य होगा, इसके साथ ही ये कंपनियां एक नोडल संपर्क अधिकारी भी नियुक्त करेंगी, जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियां कभी भी संपर्क कर सकेंगी।
  3. शिकायत अधिकारी (Grievance Officer): सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, एक शिकायत अधिकारी को भी नियुक्त करेंगे, जो 24 घंटे के भीतर कोई भी संबंधित शिकायत दर्ज करेगा और 15 दिनों में इसका निपटारा करेगा।
  4. सामग्री को हटाना (Removal of content): यदि किसी उपयोगकर्ता, विशेष रूप से महिलाओं की गरिमा के खिलाफ शिकायतें- व्यक्तियों के निजी अंगों या नग्नता या यौन कृत्य का प्रदर्शन अथवा किसी व्यक्ति का प्रतिरूपण आदि के बारे में- दर्ज कराई जाती हैं, तो ऐसी सामग्री को, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को शिकायत दर्ज करने के 24 घंटे के भीतर हटाना होगा।
  5. मासिक रिपोर्ट: इनके लिए, हर महीने प्राप्त होने वाली शिकायतों की संख्या और इनके निवारण की स्थिति के बारे में मासिक रिपोर्ट भी प्रकाशित करनी होगी।
  6. समाचार प्रकाशकों के लिए विनियमन के तीन स्तर होंगे – स्व-विनियमन, किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश या एक प्रतिष्ठित व्यक्ति की अध्यक्षता में एक स्व-नियामक निकाय, और ‘प्रथा सहिंता एवं शिकायत समिति’ सहित सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा निगरानी। ​​

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध’ (ICCPR) के बारे में जानते हैं? इसमें  निगरानी के संबंध में क्या प्रावधान किए गए हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. नए नियमों का अवलोकन
  2. परिभाषा के अनुसार ‘मध्यस्थ’ कौन हैं?
  3. ‘सेफ हार्बर’ संरक्षण क्या है?
  4. नए नियमों के तहत ‘शिकायत निवारण तंत्र’

मेंस लिंक:

नए आईटी नियमों के खिलाफ क्या चिंता जताई जा रही है? इन चिंताओं को दूर करने के तरीकों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC)


(Central Bank Digital Currency)

संदर्भ:

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा शीघ्र ही, अपनी केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (Central Bank Digital Currency) शुरू करने संबंधी रणनीति को जांचने में मदद करने हेतु, थोक और खुदरा भुगतान करने के लिए डिजिटल मुद्रा का उपयोग करने की व्यवहार्यता का आकलन करने हेतु पायलट परियोजनाओं को शुरू किए जाने की योजना है।

आवश्यकता:

  1. एक आधिकारिक डिजिटल मुद्रा, बिना किसी इंटर-बैंक सेटलमेंट के ‘रियल-टाइम भुगतान’ को सक्षम करते हुए मुद्रा प्रबंधन की लागत को कम करेगी।
  2. भारत का काफी उच्च मुद्रा-जीडीपी अनुपात, सेंट्रल बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) का एक और लाभ है- इसके माध्यम से, काफी हद तक नकदी के उपयोग को CBDC द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है तथा कागज़ी मुद्रा की छपाई, परिवहन और भंडारण की लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
  3. चूंकि, इस व्यवस्था के तहत, व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को मुद्रा-अंतरण केंद्रीय बैंक की जिम्मेदारी होगी, अतः ‘अंतर-बैंक निपटान’ / ‘इंटर-बैंक सेटलमेंट’ की जरूरत समाप्त हो जाएगी।

CBDC या ‘राष्ट्रीय डिजिटल मुद्रा’ क्या है?

सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC), या राष्ट्रीय डिजिटल करेंसी, किसी देश की साख मुद्रा का डिजिटल रूप होती है। इसके लिए, कागजी मुद्रा या सिक्कों की ढलाई करने के बजाय, केंद्रीय बैंक इलेक्ट्रॉनिक टोकन जारी करता है। इस सांकेतिक टोकन को, सरकार का पूर्ण विश्वास और साख का समर्थन हासिल होता है।

एस सी गर्ग समिति की सिफारिशें (2019)

  1. किसी भी रूप में क्रिप्टोकरेंसी का खनन, स्वामित्व, लेन-देन या सौदा करने को प्रतिबंधित किया जाए।
  2. समिति के द्वारा, डिजिटल मुद्रा में विनिमय या व्यापार करने पर एक से 10 साल तक के कारावास का दंड की सिफारिश की गयी थी।
  3. समिति ने, सरकारी खजाने को हुए नुकसान या क्रिप्टोकरेंसी उपयोगकर्ता द्वारा अर्जित किए गए लाभ, जो भी अधिक हो, के तीन गुना तक मौद्रिक दंड का प्रस्ताव किया गया था।
  4. हालांकि, समिति ने सरकार से ‘भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा क्रिप्टोकरेंसी जारी करने की संभवना’ पर अपना दिमाग खुला रखने की सलाह भी दी गयी थी।

राष्ट्रीय डिजिटल मुद्रा शुरू करने में चुनौतियाँ:

  1. संभावित साइबर सुरक्षा खतरा
  2. आबादी में डिजिटल साक्षरता का अभाव
  3. डिजिटल मुद्रा की शुरूआत से, विनियमन, निवेश और खरीद पर नज़र रखने, व्यक्तियों पर कर लगाने आदि से संबंधित विभिन्न चुनौतियाँ भी उत्पन्न होती हैं।
  4. निजता के लिए खतरा: डिजिटल मुद्रा के लिए किसी व्यक्ति की कुछ बुनियादी जानकारी एकत्र करनी आवश्यक होती है, ताकि व्यक्ति यह साबित कर सके कि वह उस डिजिटल मुद्रा का धारक है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप, अपनी राष्ट्रीय डिजिटल मुद्रा शुरू कर चुके देशों के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ब्लॉकचेन क्या है?
  2. क्रिप्टोकरेंसी क्या हैं?
  3. किन देशों द्वारा क्रिप्टोकरेंसी जारी की गई है?
  4. बिटकॉइन क्या है?

मेंस लिंक:

सीबीडीसी के लाभ और हानियों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां और उनका प्रबंधन; संगठित अपराध का आतंकवाद से संबंध।

भारत, मादक पदार्थों की तस्करी से निपटने हेतु 26 द्विपक्षीय समझौतों में शामिल


संदर्भ:

गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, भारत द्वारा मादक पदार्थों, दवाओं और मन:प्रभावी औषधियों (Psychotropic Substances) तथा रासायनिक उत्तेजकों की अवैध तस्करी से निपटने हेतु 26 द्विपक्षीय समझौते, 15 समझौता-ज्ञापनों और विभिन्न देशों के साथ सुरक्षा सहयोग संबंधी दो समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

स्वापक नियंत्रण ब्यूरो (Narcotics Control Bureau – NCB) का अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ समन्वय:

  1. सार्क औषध अपराध निगरानी डेस्क (SAARC Drug Offences Monitoring Desk)।
  2. ब्रिक्स कोलंबो योजना (BRICS Colombo Plan)।
  3. औषधि मामलों पर आसियान सीनियर ऑफिसियल्स (ASEAN Senior Officials on Drug Matters – ASOD)।
  4. बंगाल की खाड़ी बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग पहल (BIMSTEC)।
  5. संयुक्त राष्ट्र ड्रग्स एवं अपराध कार्यालय (UNODC)।
  6. इंटरनेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (INCB)।

देश में किए गए उपाय:

  1. विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय हेतु, वर्ष 2016 में गृह मंत्रालय द्वारा नार्को समन्वय केंद्र (Narco Coordination Centre NCORD) तंत्र की स्थापना की गई थी।
  2. बड़ी मात्रा में बरामदगी से जुड़े मामलों संबंधी जांच की निगरानी हेतु 19 जुलाई, 2019 को NCB के महानिदेशक के अध्यक्षता में एक ‘संयुक्त समन्वय समिति’ का गठन किया गया था।
  3. अखिल-भारतीय स्तर पर ड्रग्स जब्ती डेटा के डिजिटलीकरण हेतु, गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 2019 में ‘स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम’ (Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act – NDPS) के अंतर्गत ‘सिम्स’ (Seizure Information Management SystemSIMS) नामक एक ई-पोर्टल की शुरुआत की गयी।
  4. सहयोगी सुरक्षा एजेंसियां: एनडीपीएस अधिनियम के तहत, राजस्व खुफिया निदेशालय के अलावा, सीमा सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल, भारतीय तटरक्षक बल, रेलवे सुरक्षा बल और राष्ट्रीय जांच एजेंसी को भी नशीली दवाओं की जब्ती करने का अधिकार दिया गया है।

इन उपायों की आवश्यकता:

  • देश में नशीली दवाओं के दुरुपयोग की व्यापकता पर एम्स-दिल्ली द्वारा वर्ष 2019 में राष्ट्रीय स्तर पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार-
  • काफी अधिक संख्या में लोगों द्वारा साइकोएक्टिव पदार्थों (शराब, भांग और ओपिओइड) का उपयोग किया जाता हैं, और नशीली दवाओं के उपयोगकर्ताओं की सूची में ‘वयस्क पुरुष’ शीर्ष स्थान पर हैं।
  • शराब, सर्वाधिक उपयोग किया जाने वाला मनःप्रभावी पदार्थ है, इसके बाद भांग, ओपिओइड (हेरोइन, अफीम) और इनहेलर आदि पदार्थ आते हैं।
  • नशीले पदार्थों का व्यसन, आमतौर पर शराब से शुरू होता है, और फिर नशे का आदी व्यक्ति निकोटीन और भांग की ओर बढ़ता है – जिसे हार्ड ड्रग्स का प्रवेश द्वार माना जाता है – और अंत में कड़े पदार्थों का सेवन करने लगता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ‘भारत में वार्षिक दुर्घटना और आत्महत्या मृत्यु’ (Accidental Death & Suicides in India – ADSI) रिपोर्ट:

  1. वर्ष 2019 में मादक द्रव्यों के सेवन/शराब की लत के कारण हुई कुल 7860 आत्महत्याओं से मरने वाले 7719 पुरुष थे।
  2. यहां तक ​​कि, सड़क दुर्घटनाओं के कारण होने वाली मौतों के आंकड़ों में भी, ‘ड्रग्स और शराब’ सर्वाधिक मौतों का कारण है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

UNODC के अनुसार, ‘गोल्डन ट्रायंगल’ (Golden Triangle) क्षेत्र में मादक पदार्थों की तस्करी लंबे समय से एक समस्या रही है। ‘गोल्डन ट्रायंगल’ के अंतर्गत कौन से देश आते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UNODC के बारे में
  2. “नारकोटिक्स नियंत्रण के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता” की योजना का अवलोकन
  3. नार्को-समन्वय केंद्र (NCORD) की संरचना
  4. नशीली दवाओं के दुरुपयोग के नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कोष
  5. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के बारे में
  6. नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस और इस वर्ष की थीम

मेंस लिंक:

भारत, मादक पदार्थों की तस्करी की चपेट में है। इसके कारणों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। नशीली दवाओं की समस्या से निपटने में सरकार की भूमिका पर भी टिप्पणी करिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP)

  • सरकार द्वारा पारंपरिक स्वदेशी पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2020-21 से ‘परम्परागत कृषि विकास योजना’ (PKVY) की एक उप-योजना के रूप में ‘भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति’ (BPKP) को लागू किया जा रहा है।
  • इसमें मुख्य रूप से, सभी सिंथेटिक रासायनिक उपयोग के बहिष्कार पर जोर देता है और ‘बायोमास मल्चिंग’ पर जोर देने के साथ ‘ऑन-फार्म बायोमास रीसाइक्लिंग’, गोबर-मूत्र मिश्रण का उपयोग; पौधों पर आधारित तैयारियों को बढ़ावा दिया जाता है।
  • BPKP के तहत क्लस्टर निर्माण, क्षमता निर्माण और प्रशिक्षित कर्मियों द्वारा निरंतर साथ देने, प्रमाणीकरण और अपशिष्टों के विश्लेषण हेतु 3 साल के लिए 12200 रुपए / हेक्टेयर की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

‘गांव बूरा’

(Gaon Buras)

  • असम में ‘गांव बूरा’ (अंग्रेजों की जुबान में ‘गाँव का बूढ़ा’) एक औपनिवेशिक युग की व्यवस्था है। तब अंग्रेज़ अधिकारियों द्वारा गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति को मुखिया के रूप में नियुक्त किया जाता था, जो एक विशेष क्षेत्र में भूमि और राजस्व से संबंधित मामलों की देखरेख करते थे।
  • यह पद, आमतौर पर सबसे बुजुर्ग, सबसे जानकार और गाँव में सभी के साथ अच्छे व्यक्तिगत संबंध रखने वाले व्यक्ति को दिया जाता था।
  • अरुणाचल प्रदेश में भी, गांव बूरा (और बूरी) सबसे महत्वपूर्ण ग्राम स्तर के पदाधिकारी होते हैं।

चर्चा का कारण:

हाल ही में असम मंत्रिमंडल ने घोषणा की है, कि ग्राम स्तर के इन अधिकारियो ‘गाँव बूरा’ को अब ‘गाँव प्रधान’ कहा जाएगा।


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