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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 12 July 2021

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-I

1. उत्तर प्रदेश सरकार की नई जनसंख्या नीति

 

सामान्य अध्ययन-II

1. सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का निर्वाचन

2. ‘राइट-टू-रिपेयर’ आंदोलन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. वीएसएस यूनिटी स्पेसशिप की सबऑर्बिटल फ्लाइट

2. नासा का वाईपर मिशन

3. ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ वाहनों हेतु दिशा-निर्देश जारी करेगी सरकार

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. लेमरू हाथी अभ्यारण्य

2. ‘ब्रायम भारतीएंसिस’

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

उत्तर प्रदेश सरकार की नई जनसंख्या नीति


संदर्भ:

विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई) पर, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2021-2030 की अवधि के लिए एक ‘नई जनसंख्या नीति’ (New Population Policy) की घोषणा की गयी है।

इस नई नीति में, जनसंख्या नियंत्रण में योगदान करने वालों के लिए प्रोत्साहन देने का प्रावधान किया गया है।

जनसंख्या नियंत्रण विधेयक ड्राफ्ट के प्रमुख बिंदु:

नई नीति का उद्देश्य-

  1. कुल प्रजनन दर को, वर्तमान में प्रति हजार आबादी पर 2.7 से घटाकर वर्ष 2026 तक 2.1 और वर्ष 2030 तक 1.7 करना है।
  2. आधुनिक गर्भनिरोधक प्रचलन दर को, वर्तमान में 31.7% से बढ़ाकर वर्ष 2026 तक 45% और वर्ष 2030 तक 52% करना है।
  3. पुरुषों द्वारा उपयोग किए जाने वाले गर्भनिरोधक तरीकों को, वर्तमान में 10.8% से बढ़ाकर वर्ष 2026 तक 15.1% और वर्ष 2030 तक 16.4% करना है।
  4. मातृ मृत्यु दर को 197 से घटाकर 150 से 98 तक और शिशु मृत्यु दर को 43 से घटाकर 32 से 22 तक और पांच वर्ष से कम आयु के शिशुओं की मृत्यु दर को 47 से घटाकर 35 से 25 तक लाना है।

नीति के तहत केंद्रीय क्षेत्र:

  1. परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत जारी गर्भनिरोधक उपायों की सुलभता को बढ़ाना और सुरक्षित गर्भपात के लिए उचित व्यवस्था उपलब्ध कराना।
  2. नवजात शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर को कम करना।
  3. बुजुर्गों की देखभाल और 11 से 19 साल के किशोरों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के बेहतर प्रबंधन की व्यवस्था करना।

नीति के तहत प्रोत्साहन:

  1. जनसंख्या नियंत्रण मानदंडों का पालन करने वाले तथा दो या इससे कम बच्चों वाले कर्मचारियों को पदोन्नति, वेतन वृद्धि, आवास योजनाओं में रियायतें और अन्य सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।
  2. दो बच्चे के मानक को पूरा करने वाले लोक सेवकों को उनकी पूरी सेवा के दौरान दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि, पूरे वेतन और भत्तों सहित 12 महीने का पितृत्व या मातृत्व अवकाश और ‘राष्ट्रीय पेंशन योजना’ के अंतर्गत, नियोक्ता की योगदान राशि में तीन प्रतिशत की वृद्धि प्रदान की जाएगी।
  3. जनसंख्या को नियंत्रण में योगदान करने वाले गैर-सरकारी कर्मचारियों को जल, आवास, गृह ऋण आदि पर करों में छूट जैसे लाभ दिए जाएंगे।
  4. यदि किसी बच्चे के माता-पिता द्वारा पुरुष नसबंदी का विकल्प चुनते हैं, तो उस बच्चे के लिए 20 वर्ष की आयु तक मुफ्त चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान की जाएंगी।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा, इन उपायों को लागू करने के लिए एक ‘राज्य जनसंख्या कोष’ (State Population Fund) स्थापित करने की योजना है।

जागरूकता निर्माण:

विधेयक के मसौदा में, राज्य सरकार से सभी माध्यमिक विद्यालयों में जनसंख्या नियंत्रण को अनिवार्य विषय के रूप में शुरू करने के लिए कहा गया है।

प्रयोज्यता:

  1. इस कानून के प्रावधान विवाहित जोड़ों पर लागू होंगे। विवाहित युग्म में पुरुष की न्यूनतम आयु 21 साल तथा महिला की आयु 18 साल से कम नहीं होनी चाहिए है।
  2. यह नीति स्वैच्छिक होगी – इसे किसी पर जबरदस्ती लागू नहीं किया जाएगा।

इन उपायों की आवश्यकता:

अधिक जनसंख्या से उपलब्ध संसाधनों पर ज्यादा दबाव पड़ता है। अतः, सभी नागरिकों को, सस्ता एवं पौष्टिक भोजन, सुरक्षित पेयजल, उपयुक्त आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच, आर्थिक एवं आजीविका हेतु अवसर, घरेलू उपभोग हेतु बिजली और सुरक्षित जीवन सहित मानव जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की उपलब्धता सुलभ होने के लिए ये उपाय अविलंब लागू करना आवश्यक है।

विधेयक से जुड़े मुद्दे और चिंताएं:

  1. विशेषज्ञों द्वारा, महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण को संकट में डालने वाली किसी भी जनसंख्या नीति के प्रति सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।
  2. गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन का बोझ महिलाओं पर असमान रूप से पड़ता है, इसे देखते हुए, इस नीति के लागू होने से महिला नसबंदी में और वृद्धि होने की संभावना है।
  3. भारत में पुत्र को दी जाने वाली वरीयता को देखते हुए, कड़े जनसंख्या नियंत्रण उपायों से असुरक्षित गर्भपात एवं भ्रूण हत्याओं जैसी प्रथाओं में वृद्धि हो सकती है। इस तरह के उदाहरण, अतीत में कुछ राज्यों में देखे जा चुके हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि लगभग 220 मिलियन की आबादी सहित उत्तर प्रदेश, भारत का सर्वाधिक आबादी वाला राज्य है? देश की जनसंख्या की वृद्धि दर को समझने के लिए पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मसौदे के प्रमुख बिंदु
  2. नवीनतम जनगणना आंकड़े

मेंस लिंक:

उत्तर प्रदेश में ‘जनसंख्या नीति’ मसौदा से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का निर्वाचन


संदर्भ:

महाराष्ट्र राज्य की विधानसभा में ‘अध्यक्ष’ का पद इस वर्ष फरवरी माह से रिक्त है, और विधानसभा सत्र की अध्यक्षता, उपाध्यक्ष द्वारा की जा रही है।

यहां तक ​​कि, लोकसभा और कई राज्यों की विधानसभाओं में भी उपाध्यक्ष / डिप्टी स्पीकर (Deputy Speaker) के पद रिक्त हैं।

सदन के अध्यक्ष एव उपाध्यक्ष पद हेतु निर्वाचन प्रक्रिया

संविधान के अनुच्छेद 93 में लोकसभा और अनुच्छेद 178 में राज्य विधानसभाओं के संदर्भ में किए गए प्रावधानों के अनुसार, “सदन, यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अपने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में चुनेंगे।

  • लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में, अध्यक्ष (Speaker) का चुनाव करने हेतु राष्ट्रपति / राज्यपाल द्वारा एक तिथि निर्धारित की जाती है, इसके पश्चात निर्वाचित अध्यक्ष, उपाध्यक्ष का चुनाव करने हेतु तारीख तय करता है।
  • संबंधित सदनों के सांसद / विधायक, इन पदों पर सदन के सदस्यों में से किसी एक का निर्वाचन करने हेतु मतदान करते हैं।

सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष की भूमिकाएं और कार्य:

  • अध्यक्ष, “सदन का प्रमुख प्रवक्ता होता है, और सदन का सामूहिक रूप से प्रतिनिधित्व करता है। वह शेष विश्व के लिए सदन का एकमात्र प्रतिनिधि होता है”।
  • अध्यक्ष, सदन की कार्यवाही और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों की अध्यक्षता करता है।
  • अध्यक्ष, किसी विधेयक के, ‘धन विधेयक’ होने अथवा न होने संबंधी और इसके ‘धन विधेयक’ होने पर दूसरे सदन के अधिकार-क्षेत्र से बाहर होने संबंधी निर्णय करता है।
  • आमतौर पर, अध्यक्ष को सत्ताधारी दल से चुना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान, लोकसभा उपाध्यक्ष के मामले में यह स्थिति भिन्न रही है।
  • संविधान में ‘लोकसभा अध्यक्ष’ की स्वतंत्रता व निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु, इसका वेतन ‘भारत की संचित निधि’ पर भारित किया गया है, और इस पर संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है।
  • किसी विधेयक पर बहस या सामान्य चर्चा के दौरान संसद सदस्यों द्वारा केवल ‘अध्यक्ष’ को ही संबोधित किया जाता है।

चुनाव कराने हेतु समय-सीमा निर्दिष्ट करने वाले राज्य:

संविधान में ‘सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष’ हेतु चुनावों के लिए कोई प्रक्रिया या समय सीमा निर्धारित नहीं की गयी है। इन पदों पर चुनाव आयोजित करने संबंधी निर्णय लेने का दायित्व विधायिकाओं पर छोड़ दिया गया है।

उदाहरण के लिए, हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों में ‘अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष’ पदों के निर्वाचन हेतु एक समय-सीमा निर्दिष्ट की गयी है।

हरियाणा:

  1. हरियाणा में विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव, आम चुनाव संपन्न के पश्चात शीघ्रातिशीघ्र किया जाता है। और फिर, इसके सात दिनों के भीतर उपाध्यक्ष का चुनाव किया जाता है।
  2. निर्धारित नियमों के अनुसार, इन पदों में से कोई पद रिक्त होने पर, विधायिका के अगले सत्र में पहले सात दिनों के भीतर इसके लिए चुनाव किया जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश:

  1. विधानसभा की अवधि के दौरान यदि किसी कारणवश ‘अध्यक्ष’ का पद रिक्त हो जाता है, तो इस पद के हेतु, पद-रिक्त होने की तिथि से 15 दिन के भीतर चुनाव करने हेतु समय सीमा निर्धारित की गई है।
  2. ‘उपाध्यक्ष’ पद के मामले में, पहली बार चुनाव की तारीख ‘अध्यक्ष’ द्वारा तय की जाती है, और इसके बाद में हुई की रिक्तियों को भरने हेतु चुनाव के लिए 30 दिन का समय दिया जाता है।

लोकसभा अध्यक्ष की भूमिकाओं और कार्यों के बारे में अधिक जानने हेतु देखें

 

इंस्टा जिज्ञासु:

  • क्या आप जानते हैं कि उपसभापति, सभापति के अधीनस्थ नहीं होता है, वह राज्यसभा के प्रति सीधे उत्तरदायी होता है, क्योंकि दोनों का चुनाव सदन के सदस्यों में से किया जाता है? यहां पढ़ें
  • क्या आप जानते हैं कि अध्यक्ष की अनुपस्थिति में लोकसभा की कार्यवाही की अध्यक्षता करने हेतु 10 सदस्यों का एक पैनल गठित किया जाता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव।
  2. कार्य
  3. शक्तियां
  4. पद-त्याग
  5. पद-मुक्ति के लिए आधार
  6. लोकसभा अध्यक्ष और संबंधित समितियां

मेंस लिंक:

लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका एवं कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

राइट-टू-रिपेयर’ आंदोलन


(‘Right to Repair’ Movement)

इस आंदोलन के बारे में:

‘राइट-टू-रिपेयर’ (Right to Repair) अर्थात ‘मरम्मत करने का अधिकार’, उपभोक्ताओं को अपने इलेक्ट्रॉनिक्स तथा अन्य उत्पादों की मरम्मत खुद करने हेतु सक्षम बनाता है।

  • इस आंदोलन का लक्ष्य, कंपनियों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक्स तथा अन्य उत्पादों के स्पेयर पार्ट्स, औजार तथा इनको ठीक करने हेतु उपभोक्ताओं और मरम्मत करने वाली दुकानों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध करवाना है, जिससे इन उत्पादों का जीवन-काल बढ़ सके और इन्हें कचरे में जाने से बचाया जा सके।
  • इस आंदोलन की जड़ें 1950 के दशक में कंप्यूटर युग की शुरुआत से जुडी हुई हैं।

आंदोलन की शुरुआत के कारण एवं उद्देश्य:

इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के निर्माताओं द्वारा ‘एक नियोजित अप्रचलन’ (Planned Obsolescence) की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जा रहा है – जिसका अर्थ है कि उपकरणों को विशेष रूप से सीमित समय तक काम करने और इसके बाद इन्हें बदले जाने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।

  • इससे पर्यावरण पर अत्यधिक दबाव पड़ता है और प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय होता है।
  • इसके अलावा, उपभोक्ताओं को अक्सर उत्पाद निर्माताओं की मेहरबानी पर छोड़ दिया जाता है, और ये उत्पाद निर्माता यह निर्धारित करते हैं कि इन उपकरणों को कौन ठीक कर सकता है।
  • इस प्रकार अधिकाँश लोगों के लिए उपकरणों की मरम्मत करवाना काफी महंगा और कठिन हो जाता है।

‘राइट-टू-रिपेयर’ के लाभ:

मरम्मत करने वाली छोटी दुकानें स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का एक महत्वपूर्ण भाग होती हैं, इस अधिकार को दिए जाने से इन दुकानों के कारोबार में वृद्धि होगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभ होगा।

विभिन्न देशों में ‘राइट-टू-रिपेयर’ कानून:

हालिया वर्षों में, विश्व के तमाम देशों में, एक प्रभावी ‘राइट-टू-रिपेयर’ कानून को पारित करने का प्रयास किया जा रहा है।

  • अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन द्वारा, हाल ही में, एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस आदेश में ‘फ़ेडरल ट्रेड कमीशन’ से, उपभोक्ताओं के अपनी शर्तों पर अपने उपकरण की मरम्मत करने पर निर्माताओं द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों पर लगाम लगाने के लिए कहा गया है।
  • ब्रिटेन में ‘राइट-टू-रिपेयर’ नियम लागू किए गए हैं, जिनके तहत, टीवी और वाशिंग मशीन जैसे दैनिक उपयोग के उपकरणों को खरीदना और उनकी मरम्मत करना काफी आसान हो जाएगा।

आंदोलन का विरोध:

इस आंदोलन को पिछले कुछ वर्षों में एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट जैसे तकनीकी दिग्गजों के जबरदस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है।

  • इनका तर्क यह है कि, अपनी बौद्धिक संपदा को, तीसरे पक्ष की मरम्मत सेवाओं या शौकिया मरम्मत करने वालों के लिए खोलने से उनका शोषण हो सकता है और उनके उपकरणों की विश्वसनीयता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
  • इन कंपनियों द्वारा यह तर्क भी दिया जाता है कि, इस तरह की पहल से डेटा सुरक्षा और साइबर सुरक्षा को खतरा हो सकताहै।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप मोबाइल फोन पार्टनरशिप इनिशिएटिव (MPPI) के बारे में जानते हैं? MPPI को बेसल अभिसमय (Basel Convention) के पक्षकार सम्मलेन की छठी बैठक में अपनाया गया था। इस बारे में अधिक जानने हेतु पढ़ें

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

वीएसएस यूनिटी स्पेसशिप की सबऑर्बिटल फ्लाइट


संदर्भ:

हाल ही में ‘वीएसएस यूनिटी स्पेसशिप’ (VSS Unity spaceship) ने न्यू मैक्सिको से उड़ान भरकर पृथ्वी से 85 किमी की ऊंचाई तक की यात्रा की और सकुशल पृथ्वी पर वापस लौट आया। इस अंतरिक्ष यान में छह लोग सवार थे। इस तरह की यात्रा को “उपकक्षीय उड़ान” या ‘सबऑर्बिटल फ्लाइट’ (Suborbital Flight) कहा जाता है।

सबऑर्बिटल’ क्या है?

पृथ्वी की परिक्रमा करने हेतु उपग्रहों को एक निश्चित गति सीमा हासिल करनी होती हैं। यदि कोई पिंड लगभग 28,000 किमी/घंटा या इससे अधिक की क्षैतिज गति से यात्रा करता है, तो वह पिंड वायुमंडल पार करते हुए कक्षा में पहुँच जाता है।

  • इस गति पर कोई उपग्रह, गुरुत्वाकर्षण की वजह से पृथ्वी की ओर गति नहीं कर पाता है।
  • इस प्रकार की यात्रा में, अंतरिक्ष यात्रियों को कुछ पलों तक “भारहीनता” का अनुभव होता है।

इस प्रकार के प्रयोगों का महत्व:

  • ‘उपकक्षीय उड़ानें’ या ‘सबऑर्बिटल फ्लाइट’, माइक्रोग्रेविटी (सूक्ष्म-गुरुत्व) के विषय में शोध करने हेतु सहायक होती हैं।
  • ये उड़ाने, अंतिरक्ष में प्रयोग करने और लोगों को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक ले जाने की तुलना में काफी सस्ती होती है।
  • सबऑर्बिटल फ्लाइट्स, ​​​​वर्तमान में अंतरिक्ष एजेंसियों द्वारा शून्य गुरुत्वाकर्षण की नक़ल करने (simulate) हेतु उपयोग की जाने वाली वायुयानों की ‘परवलयिक उड़ानों’ (Parabolic Flights) का एक विकल्प भी हो सकती हैं।

‘यूनिटी 22’ मिशन के बारे में:

‘यूनिटी 22’ मिशन के एक भाग के रूप में, ‘वर्जिन गेलेक्टिक’ द्वारा विकसित ‘यूनिटी’ रॉकेट यान पर सवार चालक दल सुदूर अंतरिक्ष में उड़ान भरेगा।

  • यह ‘वीएसएस यूनिटी’ का 22वां मिशन होगा।
  • यह ‘वर्जिन गेलेक्टिक’ की चालक दल सहित चौथी अंतरिक्ष उड़ान होगी।
  • इस मिशन में वर्जिन ग्रुप के संस्थापक रिचर्ड ब्रैनसन सहित दो पायलटों और चार मिशन विशेषज्ञों का दल अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे। रिचर्ड ब्रैनसन, निजी तौर पर अंतरिक्ष यात्री का अनुभव प्राप्त करेंगे।

मिशन के उद्देश्य:

  • ‘यूनिटी 22’ केबिन और ग्राहकों के अनुभव परीक्षण पर ध्यान केंद्रित करेगा।
  • वर्तमान में, वर्जिन गेलेक्टिक द्वारा वर्ष 2022 में वाणिज्यिक सेवा शुरू करने की योजना से पहले, दो अतिरिक्त परीक्षण उड़ाने अंतरिक्ष में भेजी जाएंगी।

भारत के लिए महत्व:

भारत में जन्मी अंतरिक्ष यात्री ‘सिरिशा बांडला’ (Sirisha Bandla) ‘यूनिटी 22’ मिशन के चालक दल का हिस्सा होंगी।

  • वह, कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स के बाद अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की तीसरी महिला होंगी।
  • ‘सिरिशा बांडला’ से पहले अंतरिक्ष में जाने वाले एक अन्य भारतीय ‘राकेश शर्मा’ थे।

वीएसएस यूनिटी अंतरिक्षयान की विशिष्टता:

वर्जिन गेलेक्टिक के सबऑर्बिटल अंतरिक्ष यान को ‘व्हाइट नाइट टू’ (White Knight Two) नामक एक कैरीअर एयरक्राफ्ट की तली से हवा में प्रक्षेपित किया गया है। यह अंतरिक्ष यान लगभग 90 किलोमीटर की ऊँचाई तक उड़ान भर सकता है। यह दूरी, यात्रियों को कुछ मिनट तक भारहीनता का अनुभव और अंतरिक्ष से पृथ्वी की गोलाई / वक्रता का दर्शन कराने के लिए पर्याप्त है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

  1. क्या आपने पर्यटकों को अंतरिक्ष में ले जाने वाले ‘न्यू शेफर्ड’ नामक रॉकेट सिस्टम के बारे में सुना? इसके बारे में जानने हेतु पढ़िए
  2. किस ऊंचाई को ‘अंतरिक्ष का किनारा’ (Edge of Space) माना जाता है? क्रेमन लाइन’ (Karman line) कहाँ है? इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए पढ़ें।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘यूनिटी 22’ मिशन के बारे में
  2. उद्देश्य
  3. इसी प्रकार के अन्य मिशन

मेंस लिंक:

‘यूनिटी 22’ मिशन के महत्व पर चर्चा करें।

स्रोत: द हिंदू।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय:  सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नासा का वाईपर मिशन


(NASA’s VIPER Mission)

संदर्भ:

हाल ही में, नासा ने वर्ष 2023 में, ‘वोलाटाइल्स इंवेस्टिगेटिंग पोलर एक्सप्लोरेशन रोवर ‘(Volatiles Investigating Polar Exploration Rover– VIPER) / वाईपर मिशन लांच करने की घोषणा की है।

नासा द्वारा इस मिशन को शुरू करने का उद्देश्य यह पता करना है, कि क्या चंद्रमा पर स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए वहां मानव जीवन संभव हो सकता है?

About the mission:

मिशन के बारे में:

  • VIPER एक मोबाइल रोबोट है।
  • यह किसी अन्य खगोलीय पिंड पर, उसके संसाधनों का मानचित्रण करने हेतु भेजा जाने वाला पहला मिशन है।
  • नासा की वाणिज्यिक लूनर पेलोड सर्विसेज (Commercial Lunar Payload Services – CLPS) 100 दिनों के इस मिशन के लिए प्रक्षेपण वाहन और लैंडर उपलब्ध कराएगी।

मिशन के उद्देश्य:

  1. चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का अन्वेषण करना।
  2. चंद्रमा पर उपलब्ध संसाधनों का मानचित्र बनाने में सहायता करना।
  3. पानी की सांद्रता के साथ-साथ चंद्रमा की सतह पर अन्य संभावित संसाधनों का आंकलन करना।

मिशन का महत्व:

VIPER के निष्कर्षों से “आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत भविष्य में लैंडिंग साइटों के लिए, उन जगहों का निर्धारण करने में मदद मिलेगी, जहाँ पर अंतरिक्ष यात्रिओं के लिए, उनके प्रवास के दौरान पानी और अन्य जीवन के लिए आवश्यक संसाधनों का उपयोग किया जा सके।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप वर्ष 2028 तक चंद्रमा की सतह पर एक मानव की स्थायी मौजूदगी दर्ज करने हेतु नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम के बारे में जानते है?

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

फ्लेक्स-फ्यूलवाहनों हेतु दिशा-निर्देश जारी करेगी सरकार


संदर्भ:

केंद्र सरकार द्वारा अक्टूबर तक, फ्लेक्स इंजनों (flex engines) का उपयोग करने वाले ‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल्स’ (flexible fuel vehicles FFVs) के उपयोग हेतु नए दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे।

इन दिशा-निर्देशों में, मिश्रित ईंधन के अनुरूप इंजन की बनावट और वाहनों में आवश्यक अन्य परिवर्तनों को निर्दिष्ट किया जाएगा।

‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल’ (FFVs) के बारे में:

FFV वाहनों का एक संशोधित प्रारूप है, जो विभिन्न स्तर के इथेनॉल मिश्रण सहित गैसोलीन और मिश्रित पेट्रोल दोनों पर चल सकते हैं।

  • ‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल’, सभी प्रकार के मिश्रित ईधनों का उपयोग करने और बिना मिश्रित ईंधन, दोनों पर चलने में सक्षम होंगे।
  • FFV में 84 प्रतिशत से अधिक इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर चलने में सक्षम इंजन लगा होता है।

लाभ:

  • ‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल’ (FFVs) का उद्देश्य प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करना और हानिकारक उत्सर्जन को कम करना है।
  • वर्तमान में वैकल्पिक ईंधन, इथेनॉल, के कीमत 60-62 रुपये प्रति लीटर है, जबकि पेट्रोल की कीमत देश के कई हिस्सों में 100 रुपये प्रति लीटर से अधिक है। अतः इसलिए इथेनॉल का उपयोग करने से भारतीयों को 30-35 रुपये प्रति लीटर की बचत होगी।
  • भारत में, FFVs का एक अन्य विशेष लाभ होगा, क्योंकि ये वाहनों को, देश के विभिन्न हिस्सों में उपलब्ध इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के विभिन्न मिश्रणों का उपयोग करने में सक्षम करेगा।
  • इसके अलावा, ये वाहन जनवरी 2003 में केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम का तार्किक विस्तार हैं।
  • चूंकि भारत में मक्का, चीनी और गेहूं का उत्पादन अधिशेष मात्रा में होता है, इसलिए इथेनॉल कार्यक्रम के अनिवार्य सम्मिश्रण से किसानों को उच्च आय हासिल होने में मदद मिलेगी।
  • चूंकि, भारत में कच्चे तेल की 80 प्रतिशत से अधिक आवश्यकताओं को आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है, अतः समग्र भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए, इथेनॉल का अधिक उपयोग से ऑटोमोबाइल ईंधन के आयात पर होने वाली लागत बचाने में मदद मिलेगी।

FFVs उपयोग करने के नुकसान/चुनौतियाँ:

  • ग्राहकों की स्वीकृति (Customer acceptance) एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि इन वाहनों को खरीदना और इनको चलाने की लागत, 100 प्रतिशत पेट्रोल वाहनों की तुलना में बहुत अधिक होने वाली है।
  • 100 प्रतिशत इथेनॉल (E100) के साथ वाहन चलाने पर, इसकी लागत (कम ईंधन दक्षता के कारण) 30 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी।
  • फ्लेक्स फ्यूल इंजन की कीमत अधिक होती है क्योंकि इथेनॉल में, पेट्रोल की तुलना में बहुत भिन्न रासायनिक गुण होते हैं। इथेनॉल का ऊष्मीय मान / Calorific value (40 प्रतिशत), गैसोलीन की तुलना में काफी कम, तथा वाष्पीकरण की ‘गुप्त ऊष्मा’ काफी उच्च होती है।
  • इथेनॉल, एक विलायक के रूप में भी कार्य करता है और इंजन के अंदर की सुरक्षात्मक तेल परत को नष्ट कर सकता है जिससे इंजन में टूट-फूट हो सकती है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2022 तक पेट्रोल में 10 फीसदी एथेनॉल ब्लेंडिंग और वर्ष 2030 तक 20 फीसदी मिश्रण का लक्ष्य रखा गया है? हालांकि, हाल ही में इस लक्ष्य को संशोधित करके वर्ष 2025 कर दिया गया है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल’ (FFVs) के बारे में
  2. इथेनॉल क्या है?
  3. इथेनॉल सम्मिश्रण के बारे में

मेंस लिंक:

पारंपरिक ईंधन के साथ एथेनॉल सम्मिश्रण किए जाने वाले लाभों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


लेमरू हाथी अभ्यारण्य

(Lemru Elephant Reserve)

लेमरू हाथी अभ्यारण्य, छत्तीसगढ़ में स्थापित किया जाएगा।

  • इसे वर्ष 2005 में प्रस्तावित किया गया था और वर्ष 2007 में केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदन प्रदान किया गया।
  • इस क्षेत्र में हाथियों के ओडिशा और झारखंड से छत्तीसगढ़ की ओर जाने पर होने वाले ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष’ को रोकने के लिए यह योजना बनाई गई है।

चर्चा का कारण:

सरकार द्वारा प्रस्तावित रिजर्व के क्षेत्र को 1,995 वर्ग किमी से घटाकर 450 वर्ग किमी करने की योजना बनाई जा रही है, इस वजह से लेमरू हाथी अभ्यारण्य पर विवाद उत्पन्न हो गया है।

  • सरकार का कहना है कि, यदि प्रस्तावित रिजर्व के क्षेत्र को कम नहीं किए गया तो, इसमें स्थित कई कोयला खदानें अनुपयोगी हो जाएंगी।
  • रिजर्व के तहत प्रस्तावित क्षेत्र, हसदेव अरण्य जंगलों के अंतर्गत आता है, जोकि समृद्ध जैवविविधता के साथ-साथ कोयले के भंडार में भी समृद्ध है।

ब्रायम भारतीएंसिस

(Bryum bharatiensis)

हाल ही में, भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा अंटार्कटिका में ‘काई’ (Moss) की एक देशी प्रजाति की खोज की है।

  • भारत और भारतीय अंटार्कटिक स्टेशन ‘भारती’ के नाम पर इस प्रजाति का नाम ‘ब्रायम भारतीएंसिस’ (Bryum bharatiensis) रखा गया है।
  • यह, भारतीय अंटार्कटिक मिशन के चार दशकों में खोज की गई पहली पादप प्रजाति है।..


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