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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 9 July 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. अफ्रीकन स्वाइन फीवर

2. अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर कार्यक्रम

 

सामान्य अध्ययन-III

1. कृषि अवसंरचना कोष

2. नासा के कैसिनी अंतरिक्ष यान की नवीनतम खोजें

3. मानव-वन्यजीव संघर्ष पर रिपोर्ट

4. राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. स्पर्श: सिस्टम फॉर पेंशन एडमिनिस्ट्रेशन (रक्षा)

2. ‘डीबीजेनवोक’

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

अफ्रीकन स्वाइन फीवर


(African Swine Fever)

संदर्भ:

एशिया के छोटे फ़ार्म, ‘अफ्रीकन स्वाइन फीवर’ (African Swine Fever) के प्रकोप से सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। क्यों?

  1. सुअर फार्म, मुख्य रूप से छोटे किसानो से मामला बने हुए है।
  2. भारत सहित कई देशों में, 70 प्रतिशत सुअर फार्मों का स्वामित्व छोटे किसानों के पास है।
  3. चीन में होने वाले कुल सूअर-मांस उत्पादन का लगभग 98 प्रतिशत, छोटे किसानों द्वारा किया जाता है। इन किसानों के पास सूअरों की संख्या 100 से कम ही होती है।

भारत में ‘अफ्रीकन स्वाइन फीवर’ का प्रभाव:

अफ्रीकी स्वाइन फीवर लगभग एक सदी पुरानी बीमारी है, जो घरेलू सूअरों और जंगली सूअरों को संक्रमित करती है, और इसके संक्रमण से मृत्यु दर लगभग 100 प्रतिशत होती है। इस बीमारी से, वर्ष  2018 से विश्व के लगभग एक तिहाई सूअर मारे जा चुके हैं।

  • इस बीमारी का नवीनतम शिकार भारत है। यहाँ मई 2020 से इससे संक्रमित मामले सामने आ रहे थे, किंतु पिछले कुछ महीनों में इनकी संख्या में जबर्दस्त विस्फोट हुआ है।
  • अनुमानों के अनुसार, अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) की वजह से पूर्वोत्तर राज्यों के सूअर-मांस उत्पादन में 50 प्रतिशत की कमी हुई है।

अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) के बारे में:

  • ASF एक अत्यधिक संक्रामक और घातक पशु रोग है, जो घरेलू और जंगली सूअरों को संक्रमित करता है। इसके संक्रमण से सूअर एक प्रकार के तीव्र रक्तस्रावी बुखार (Hemorrhagic Fever) से पीड़ित होते है।
  • इसे पहली बार 1920 के दशक में अफ्रीका में देखा गया था।
  • इस रोग में मृत्यु दर 100 प्रतिशत के करीब होती है, और इस बुखार का कोई इलाज नहीं है।
  • इसके लिए अभी तक कोई मान्यता प्राप्त टीका नहीं खोजा गया है, इसी वजह से, संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए, संक्रमित जानवरों को मार दिया जाता है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) ‘विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन’ (World Organisation for Animal Health – OIE) की ‘स्थलीय पशु स्वास्थ्य संहिता’ में सूचीबद्ध एक बीमारी है? Read here

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क्या स्वाइन फीवर मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है?
  2. क्या यह एक वायरल बीमारी है?
  3. इसकी खोज सबसे पहले कहाँ हुई थी?
  4. 2020 में कौन से देश इससे प्रभावित हुए हैं?
  5. क्या इसके खिलाफ कोई टीका उपलब्ध है?

मेंस लिंक:

अफ्रीकी स्वाइन स्वाइन फीवर, लक्षण और इसके प्रसरण पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर


(Authorised Economic Operator)

संदर्भ:

हाल ही में, ‘केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड’ (Central Board of Indirect Taxes & Customs- CBIC) द्वारा ‘अधिकृत आर्थिक ऑपरेटरों’ (Authorised Economic Operators- AEO) के आवेदनों की ऑनलाइन फाइलिंग की व्यवस्था का आरंभ किया गया है।

इस वेब एप्लिकेशन का नया संस्करण (V 2.0), समय पर हस्तक्षेप करने और उनमें तेजी लाने के उद्देश्य से भौतिक रूप से दाखिल किए गये आवेदनों की निरंतर और डिजिटल निगरानी सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर (AEO) कार्यक्रम

(Authorised Economic Operator)

  • AEO, वैश्विक व्यापार को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने हेतु ‘विश्व सीमा शुल्क संगठन सेफ फ्रेमवर्क’ (World Customs Organization SAFE Framework) मानकों के तत्वावधान में एक कार्यक्रम है।
  • कार्यक्रम का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा को बढ़ाना और वैध माल की आवाजाही को सुविधाजनक बनाना है।
  • अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर (AEO) एक स्वैच्छिक अनुपालन कार्यक्रम है।

यह किस प्रकार कार्य करता है?

  • इस कार्यक्रम के तहत, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में संलग्न किसी इकाई को WCO द्वारा आपूर्ति श्रंखला सुरक्षा मानकों के अनुपालक (compliant) के रूप में अनुमोदित किया जाता है और AEO का दर्जा और कुछ लाभ प्रदान किए जाते हैं।
  • AEO दर्जा हासिल होने पर व्यापारिक इकाई को प्राप्त होने वाले लाभों में, निकासी में शीघ्रता, कम निरीक्षण, बेहतर सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला भागीदारों के मध्य संचार आदि शामिल होते हैं।

SAFE फ्रेमवर्क

  • जून 2005 में ‘विश्व सीमा शुल्क संगठन’ (WCO) परिषद द्वारा ‘वैश्विक व्यापार को सुरक्षित और सुगम बनाने हेतु मानक फ्रेमवर्क’ अर्थात SAFE फ्रेमवर्क को लागू किया गया था। यह फ्रेमवर्क, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के लिए एक निवारक, राजस्व संग्रह को सुरक्षित करने और पूरे विश्व में व्यापार सुविधा को बढ़ावा देने के रूप में कार्य करेगा।
  • SAFE फ्रेमवर्क, आजमाए जा चुके और दुनिया भर में अच्छी तरह से काम कर रहे आधारिक मानकों का निर्धारण करता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि ‘केंद्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला’ को ‘विश्व सीमा शुल्क संगठन’ की ‘क्षेत्रीय सीमा शुल्क प्रयोगशाला’ (RCL) के रूप में मान्यता प्राप्त है? इसके बारे में अधिक जानने के लिए पढ़ें  

प्रीलिम्स लिंक:

  1. SAFE फ्रेमवर्क के बारे में
  2. WCO के बारे में
  3. AEO कार्यक्रम
  4. AEO कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएं

मेंस लिंक:

अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर (AEO) कार्यक्रम के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नासा के कैसिनी अंतरिक्ष यान की नवीनतम खोजें


संदर्भ:

हाल ही में, नासा के ‘कैसिनी अंतरिक्ष यान’ (Cassini spacecraft) द्वारा शनि ग्रह के चंद्रमाओं ‘प्लूमस’ (Plumes) से उड़ान भरने के दौरान निम्नलिखित खोजें की गई हैं:

  1. शनि के एक चंद्रमा ‘टाइटन’ (Titan) के वायुमंडल में मीथेन गैस मौजूद है।
  2. एन्सेलेडस (Enceladus) नामक एक अन्य चंद्रमा पर एक ‘तरल महासागर’ मौजूद है जिसमें से गैस और पानी के ‘प्लूमस’ का प्रस्फुटन होता रहता है।

शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है, कि ‘एन्सेलेडस’ पर भी अज्ञात मीथेन-उत्पादक प्रक्रियाएं होने की संभावना है, और इस विषय पर खोज की जानी बाकी है।

पृथ्वी पर मीथेन-उत्पादक जीव:

पृथ्वी पर पायी जाने वाली अधिकाँश मीथेन ‘जैविक’ (Biological) स्रोतों से उत्पन्न होती है। मीथेनोजेंस (Methanogens) नामक सूक्ष्मजीव एक ‘चयापचय उपोत्पाद’ (Metabolic Byproduct) के रूप में मीथेन का उत्पादन करने में सक्षम होते हैं।

  • इन जीवों के लिए जीवित रहने हेतु ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है और ये प्रकृति में व्यापक रूप से पाए जाते हैं।
  • मिथेनोजेन, दलदलों, मृत कार्बनिक पदार्थों और यहां तक ​​कि मनुष्यों की आंत में भी पाए जाते हैं।
  • ये उच्च तापमान में जीवित रहने के लिए जाने जाते हैं और सिमुलेशन अध्ययनों से पता चला है, कि ये सूक्ष्मजीव मंगल ग्रह पर मौजूद स्थितियों में जीवित रहने में सक्षम हैं।

एन्सेलेडस पर मीथेन का उत्पादन अन्य किस तरीके से हो सकता है?

  1. एन्सेलेडस के कोर में मौजूद कार्बनिक पदार्थों के रासायनिक विघटन से मीथेन का निर्माण हो सकता है।
  2. इस चंद्रमा पर होने वाली ‘जलतापीय अभिक्रियाएँ’ (Hydrothermal Processes) भी कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के निर्माण में सहायक हो सकती हैं।

‘कैसिनी मिशन’ के बारे में:

‘कैसिनी मिशन’ (Cassini Mission) को वर्ष 1997 में लॉन्च किया गया था।

  • यह नासा (NASA), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (European Space Agency- ESA) और इतालवी अंतरिक्ष एजेंसी का संयुक्त मिशन है।
  • यह मिशन, बाहरी सौर मंडल में अब तक की पहली लैंडिंग थी।
  • कैसिनी, शनि ग्रह की यात्रा करने वाला चौथा और इसकी कक्षा में प्रवेश करने वाला पहला अंतरिक्ष यान है।
  • इसके डिजाइन में एक ‘शनि ऑर्बिटर’ और ‘टाइटन चंद्रमा’ के लिए एक लैंडर (lander) शामिल किया गयाहै। हैगेन्स (Huygens) नामक यह लैंडर वर्ष 2005 में टाइटन पर उतरा था।

मिशन के उद्देश्य:

  • शनि के वलयों की त्रि-आयामी संरचना और गतिक क्रियाओं का निर्धारण करना।
  • उपग्रह सतहों की संरचना और प्रत्येक पिंड के भूवैज्ञानिक इतिहास का निर्धारण करना।
  • इपेटस चंद्रमा (Iapetus Moon) के मुख्य गोलार्ध पर ‘डार्क मटेरियल’ की प्रकृति और उत्पत्ति का निर्धारण करना।
  • मैग्नेटोस्फीयर (magnetosphere) की त्रि-आयामी संरचना और गतिक क्रियाओं का आकलन करना।
  • बादलों के स्तर पर शनि ग्रह के वातावरण की गतिक क्रियाओं का अध्ययन करना।
  • ‘टाइटन’ के बादलों और धुंध की समय-परिवर्तनशीलता का अध्ययन करना।
  • क्षेत्रीय स्तर पर ‘टाइटन’ की सतह के बारे में जानकारी हासिल करना।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

नासा का वॉयेजर-2 इंटरस्टेलर स्पेस में प्रवेश करने वाला वॉयेजर-1 के बाद दूसरा अंतरिक्ष यान है? इंटरस्टेलर स्पेस कहाँ से शुरू होता है? इस बारे में जानने हेतु पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कैसिनी मिशन के बारे में
  2. उद्देश्य
  3. शनि ग्रह- प्रमुख तथ्य
  4. शनि ग्रह के चंद्रमा
  5. मीथेन के बारे में

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।

कृषि अवसंरचना कोष


(Agriculture Infrastructure Fund)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ‘कृषि अवसंरचना कोष’ (Agriculture Infrastructure Fund – AIF) के अंतर्गत वित्तपोषण सुविधा की केंद्रीय क्षेत्र योजना में विभिन्न संशोधनों को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी गयी है।

नवीनतम संशोधन:

  1. योजना के तहत, पात्रता को विस्तारित करते हुए इसमें, राज्य एजेंसियों / APMCs, राष्ट्रीय और राज्य सहकारी समितियों के परिसंघों, किसान उत्पादक संगठनों के परिसंघों (FPOs) तथा स्वयं सहायता समूहों के परिसंघों (SHGs) को भी शामिल किया गया है।
  2. कृषि उपज बाजार समितियों (Agricultural Produce Market Committee – APMC) के लिए एक ही बाजार आहाता के भीतर विभिन्न अवसंरचनाओं जैसे कोल्ड स्टोरेज, सार्टिंग,ग्रेडिंग और परख इकाइयों, कोठों (साइलो) आदि की प्रत्येक परियोजना के लिए 2 करोड़ रुपये तक के ऋण पर ब्याज सहायता प्रदान की जाएगी।
  3. कृषि और किसान कल्याण मंत्री के लिए, योजना में किसी लाभार्थी को शामिल करने या हटाने के संबंध में आवश्यक परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
  4. वित्तीय सुविधा की अवधि 4 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष अर्थात 2025-26 तक कर दी गई है और इस योजना की कुल अवधि 10 से बढ़ाकर 13 अर्थात 2032-33 तक कर दी गई है।

‘कृषि अवसंरचना कोष’ के बारे में:

  • ‘कृषि अवसंरचना फंड / कोष’, ब्याज छूट तथा ऋण गारंटी के जरिये फसल उपरांत प्रबंधन अवसंरचना तथा समुदाय खेती के लिए व्यावहार्य परियोजनाओं में निवेश करने के लिए एक मध्यम-दीर्घ अवधि ऋण वित्तपोषण सुविधा है।
  • इस योजना के तहत, सालाना 3 प्रतिशत की ब्याज छूट के साथ ऋण के रूप में बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों द्वारा 1 लाख करोड़ रुपये तथा 2 करोड़ रुपये तक के ऋण के लिए CGTMSE के तहत क्रेडिट गारंटी कवरेज उपलब्ध कराई जाएगी।

पात्र लाभार्थी:

इस योजना के अंतर्गत पात्र लाभार्थियों में, प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PAC), विपणन सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), स्वयं सहायता समूहों (SHGs), किसानों, संयुक्त देयता समूहों (Joint Liability Groups- JLG), बहुउद्देशीय सहकारी समितियों, कृषि उद्यमियों, स्टार्टअपों, और केंद्रीय/राज्य एजेंसी या स्थानीय निकाय प्रायोजित सार्वजनिक-निजी साझीदारी परियोजनाएं आदि को शामिल किया गया है।

ब्याज में छूट:

इस वित्तपोषण सुविधा के अंतर्गत, सभी प्रकार के ऋणों में प्रति वर्ष 2 करोड़ रुपये की सीमा तक ब्याज में 3% की छूट प्रदान की जाएगी। यह छूट अधिकतम 7 वर्षों के लिए उपलब्ध होगी।

क्रेडिट गारंटी:

  • 2 करोड़ रुपये तक के ऋण के लिए ‘क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज’ (CGTMSE) योजना के अंतर्गत इस वित्तपोषण सुविधा के माध्यम से पात्र उधारकर्ताओं के लिए क्रेडिट गारंटी कवरेज भी उपलब्ध होगा।
  • इस कवरेज के लिए सरकार द्वारा शुल्क का भुगतान किया जाएगा।
  • FPOs के मामले में, कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग (DACFW) के FPO संवर्धन योजना के अंतर्गत बनाई गई इस सुविधा से क्रेडिट गारंटी का लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

‘कृषि अवसंरचना कोष का प्रबंधन:

  • ‘कृषि अवसंरचना कोष का प्रबंधन और निगरानी ऑनलाइन ‘प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (MIS) प्लेटफॉर्म के माध्यम से की जाएगी।
  • सही समय पर मॉनिटरिंग और प्रभावी फीडबैक की प्राप्ति को सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर मॉनिटरिंग कमिटियों का गठन किया जाएगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘पीएम स्वानिधि’ के तहत, ‘क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज’ (CGTMSE) के माध्यम से ऋण देने वाली संस्थाओं के लिए ‘क्रेडिट गारंटी’ का प्रबंधन ‘सिडबी’ द्वारा किया जाएगा? CGTMSE के बारे में अधिक जानने हेतु देखें।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘कृषि अवसंरचना निधि’ के बारे में
  2. FPOs क्या हैं?
  3. सहकारी समितियां (Cooperatives) क्या हैं? संवैधानिक प्रावधान
  4. CGTMSE के बारे में
  5. केंद्रीय क्षेत्रक तथा केंद्र प्रायोजित योजनाएं

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

मानव-वन्यजीव संघर्ष पर रिपोर्ट


संदर्भ:

हाल ही में, ‘प्रकृति संरक्षण हेतु विश्व वन्यजीव कोष’ (Worldwide Fund for Nature – WWF) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UN Environment Programme – UNEP) द्वारा ‘सभी के लिये बेहतर भविष्य- मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की आवश्यकता’ (A future for all – the need for human-wildlife coexistence) शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की गई है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  1. मनुष्यों और जानवरों के मध्य संघर्ष, विश्व की कुछ सर्वाधिक ‘अनुप्रतीकात्मक प्रजातियों’ (iconic species) के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए मुख्य खतरों में से एक है।
  2. विश्व स्तर पर, मानव-वन्यजीव संघर्षों में होने वाली मौतें, विश्व की 75 प्रतिशत से अधिक जंगली बिल्ली-प्रजातियों को प्रभावित करती है। इस संघर्ष से, धुर्वीय भालू, भूमध्यसागरीय मोंक सील (monk seals) और हाथियों जैसे बड़े शाकाहारी जीव भी प्रभावित होते हैं।
  3. 1970 के बाद से वैश्विक वन्यजीव आबादी में औसतन 68 प्रतिशत की गिरावट आई है।

भारतीय परिदृश्य:

  • वर्ष 2014-2015 और 2018-2019 के बीच 500 से अधिक हाथी मारे गए। इनमे से अधिकाँश मौतें मानव-हाथी संघर्ष के कारण हुईं हैं।
  • इसी अवधि के दौरान मानव-हाथी संघर्ष के परिणामस्वरूप 2,361 लोग मारे गए।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष से भारत सर्वाधिक प्रभावित होगा, क्योंकि इसमें विश्व दूसरी सर्वाधिक मानव निवास करती है, और साथ ही बाघों, एशियाई हाथियों, एक सींग वाले गैंडों, एशियाई शेरों और अन्य प्रजातियों की बड़ी आबादी पायी जाती है।

आवश्यकता:

मानव-वन्यजीव संघर्ष को पूर्ण रूप से समाप्त करना संभव नहीं है। लेकिन इसके प्रबंधन हेतु सुनियोजित, एकीकृत दृष्टिकोण, इन संघर्षों को कम कर सकता है, और मनुष्यों और जानवरों के बीच सह-अस्तित्व स्थापित करने में सफल हो सकता है।

शोणितपुर मॉडल:

  1. असम के शोणितपुर जिले में, जंगलों के विनाश से हाथी फसलों पर हमला करने के लिए मजबूर हो गए थे, जिसमे हाथी और मनुष्य दोनों मारे जाते थे।
  2. इसके समाधान हेतु, WWF इंडिया ने वर्ष 2003-2004 के दौरान एक ‘शोणितपुर मॉडल’ विकसित किया, जिसमे विभिन्न समुदायों के सदस्यों को राज्य वन विभाग से जोड़ा गया।
  3. इन लोगों को, हाथियों को फसलों से सुरक्षित रूप से दूर भगाने के लिए प्रशिक्षण दिया गया।
  4. WWF इंडिया ने हाथियों से फसलों की सुरक्षा को आसान बनाने हेतु एक कम लागत वाली, इकहरी (single strand), गैर-घातक बिजली की बाड़ भी विकसित की थी।
  5. इस मॉडल को लागू करने के बाद, चार साल में हाथियों द्वारा फसलों को किया जाने वाला नुकसान शून्य हो गया। और इससे, संघर्ष में होने वाले मानव तथा हाथियों की मौत में भी काफी कमी आई है।

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति (SC-NBWL) द्वारा अनुमोदित मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) के प्रबंधन हेतु सलाहकारी निर्देश:

  • वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अनुसार समस्याग्रस्त जंगली जानवरों से निपटने के लिए ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाया जाना चाहिए।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) के कारण होने वाली फसल-क्षति के लिए फसल मुआवजे के लिए प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना के तहत ऐड-ऑन कवरेज का उपयोग किया जाए।
  • वन क्षेत्रों के भीतर चारा और जल स्रोतों को बढाया जाना चाहिए।
  • अन्य उपाय: एडवाइजरी में स्थानीय/राज्य स्तर पर अंतर-विभागीय समितियों, पूर्व चेतावनी प्रणालियों को अपनाने, अवरोधकों का निर्माण करने, 24X7 कार्य करने वाले टोल फ्री हॉटलाइन नंबरों सहित समर्पित सर्कल-वार कंट्रोल रूम बनाने के लिए कहा गया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL), वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत गठित एक “वैधानिक बोर्ड” है। क्या आप जानते हैं कि बोर्ड का अध्यक्ष कौन होता है? इसके बारे में यहां पढ़ें

 

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980


(National Security Act)

संदर्भ:

हाल ही में, पूर्व सिविल सेवकों द्वारा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ (National Security Act) को एक कठोर निवारक निरोध कानून बताते हुए, इसके दुरुपयोग को समाप्त करने की मांग की गई है।

‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ (NSA) के बारे में:

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (National Security Act) अर्थात NSA एक निवारक निरोध कानून है।

  • निवारक निरोध (Preventive Detention) के अंतर्गत, किसी व्यक्ति के लिए, उसको भविष्य में अपराध करने से रोकने और/या भविष्य में अभियोजन से बचने के लिए, हिरासत में रखना (कैद करना) शामिल होता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 22 (3) (b) में, राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था संबंधी कारणों के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर निवारक निरोध और प्रतिबंध लगाने की अनुमति का प्रावधान किया गया है।

अनुच्छेद 22(4) के अनुसार:

निवारक निरोध का उपबंध करने वाली कोई विधि किसी व्यक्ति का तीन मास से अधिक अवधि के लिए तब तक निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी जब तक कि— एक सलाहकार बोर्ड, तीन मास की उक्त अवधि के निरोध को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त कारणों का प्रतिवेदन नहीं करता है।

  • 44वें संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा ‘सलाहकार बोर्ड’ की राय प्राप्त किए बिना नजरबंदी की अवधि को तीन महीने से घटाकर दो महीने कर दिया गया है।
  • हालाँकि, यह प्रावधान अभी तक लागू नहीं किया गया है, इसलिए, तीन महीने की मूल अवधि का प्रावधान अभी भी जारी है।

हिरासत की अवधि:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत, किसी व्यक्ति को बिना किसी आरोप के 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। लेकिन यदि सरकार को कुछ नए साक्ष्य प्राप्त होते हैं तो यह अवधि आगे भी बढाई जा सकती है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उसके खिलाफ आरोपों को बताए बिना 10 दिनों के लिए हिरासत में रखा जा सकता है। हिरासत में लिया गया व्यक्ति उच्च न्यायालय के सलाहकार बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है लेकिन उसे मुकदमे के दौरान वकील रखने की अनुमति नहीं होती है।

इस कानून के दुरुपयोग से जुड़ी चिंताएं:

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(1) कहता है, कि गिरफ्तार किए गए किसी व्यक्ति को अपनी रुचि के विधि व्यवसायी से परामर्श करने और प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा।
  • ‘आपराधिक प्रक्रिया संहिता’ (CrPC) की धारा 50 के अनुसार, गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधार के बारे में सूचित किया जाना चाहिए और उसे जमानत हासिल करने का अधिकार प्राप्त है।

हालाँकि, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को इनमें से कोई भी अधिकार उपलब्ध नहीं होता है। इस क़ानून के तहत सरकार, उन जानकारियों को रोक सकती है, जिन्हें वह सार्वजनिक हित के विरुद्ध मानती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

भारत में निवारक निरोध कानूनों का इतिहास

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ (NSA) किसके द्वारा लगाया जा सकता है?
  2. निवारक निरोध के विरुद्ध अपील?
  3. NSA के तहत गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार
  4. इस संबंध में संवैधानिक अधिकारों की प्रयोज्यता
  5. संविधान के तहत याचिका

मेंस लिंक:

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम क्या है? इसे एक कठोर कानून के रूप में क्यों जाना जाता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


स्पर्श: सिस्टम फॉर पेंशन एडमिनिस्ट्रेशन (रक्षा)

SPARSH: System for Pension Administration (Raksha)

यह रक्षा विभाग से संबंधित पेंशन हेतु मंज़ूरी और संवितरण के ‘स्वचालन’ हेतु एक एकीकृत प्रणाली है।

  • इसे रक्षा मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा।
  • यह वेब-आधारित प्रणाली पेंशन दावों को संसाधित करती है और किसी बाहरी मध्यस्थ पर निर्भर हुए बिना उनकी पेंशन सीधे रक्षा पेंशनभोगियों के बैंक खातों में जमा करती है।
  • यह वेब-आधारित प्रणाली पेंशन दावों को संसाधित करती है और किसी बाहरी मध्यस्थ पर भरोसा किए बिना पेंशन को सीधे रक्षा पेंशनभोगियों के बैंक खातों में जमा करती है।

‘डीबीजेनवोक’

(dbGENVOC)

  • यह मुंह के कैंसर के जीनोमिक वेरिएंट संबंधी दुनिया का पहला डेटाबेस है।
  • इसे जैव प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित एक स्वायत्त संस्थान, ‘डीबीटी-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स’ (NIBMG), कल्याणी द्वारा तैयार किया गया है। जो है।

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