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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 7 July 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. पश्चिम बंगाल में ‘विधान परिषद’ का गठन करने संबंधी प्रस्ताव पारित

2. न्यायाधीशों का सुनवाई से इंकार

3. मसौदा सिनेमैटोग्राफ (संशोधन) विधेयक 2021

4. दिल्ली उच्च न्यायालय में समलैंगिक विवाह पर नई याचिका

 

सामान्य अध्ययन-III

1. नदी तट पर बसे शहर और ‘नदी संरक्षण योजनाएं’

2. वन अधिकारों के कार्यान्वयन की समीक्षा

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. मलेशिया में सफेद झंडा अभियान

2. इथियोपिया का ‘ग्रैंड रेनेसां डैम’

3. ‘रिवेंज टूरिज्म’

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: संसद और राज्य विधानमंडल – संरचना, कामकाज, व्यवसाय का संचालन, शक्तियां और विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले मुद्दे।

पश्चिम बंगाल में ‘विधान परिषद’ का गठन करने संबंधी प्रस्ताव पारित


संदर्भ:

हाल ही में, पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा राज्य में ‘विधान परिषद’ (Legislative Council) का गठन करने संबंधी प्रस्ताव दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दिया गया है।

विधान परिषद’ और इसका महत्व:

भारत में द्विसदनीय शासन पद्धति (Bicameral System) प्रचलित है, अर्थात संसद के दो सदन होते हैं; लोकसभा तथा राज्यसभा।

इस प्रणाली में, केंद्र की लोकसभा के समकक्ष, राज्य स्तर पर ‘विधानसभा’ (Legislative Assembly) होती है; तथा राज्य सभा के समकक्ष ‘विधान परिषद’ (Legislative Council)  होती है।

विधान परिषद’ का सृजन किस प्रकार किया जाता है?

संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत, यदि किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन अथवा उत्सादन करने हेतु, इस आशय का कोई संकल्प राज्य की विधानसभा द्वारा विशेष बहुमत से पारित किया जाता है, तो संसद, विधि द्वारा राज्य में विधान परिषद का सृजन अथवा उत्सादन कर सकती है।

सदन में सदस्यों की संख्या:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171 खंड (1) के अनुसार, विधान परिषद वाले किसी राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या, उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होनी चाहिए, तथा किसी राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या किसी भी दशा में चालीस से कम नहीं होगी।

विधान परिषद के सदस्यों का निर्वाचन:

  1. 1/3 सदस्यों का चुनाव विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है।
  2. 1/3 सदस्य राज्य की नगरपालिकाओं, ज़िला बोर्ड और अन्य स्थानीय संस्थाओं द्वारा निर्वाचित होते हैं।
  3. 1/12 सदस्य, अध्यापकों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा।
  4. 1/12 सदस्य, पंजीकृत स्नातकों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा।
  5. शेष 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा, साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा क्षेत्रों में प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्तियों में से मनोनीत किये जाते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

वर्तमान में, भारत के किन राज्यों में विधान परिषद है?  Click here

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विधान परिषद- सृजन और उत्सादन
  2. राज्य सरकारों की भूमिका
  3. संरचना
  4. शक्तियां
  5. विधान सभा के साथ तुलना
  6. विधान परिषद वाले राज्य

मेंस लिंक:

‘राज्य विधान परिषद’ की आवश्यकता पर विवेचना कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

 न्यायाधीशों का सुनवाई से इंकार


(Recusal of Judges)

संदर्भ:

हाल ही में, कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर, न्यायाधीश के ‘भारतीय जनता पार्टी’ के साथ कथित संबंधों को लेकर, नंदीग्राम चुनाव याचिका पर सुनवाई करने वाले न्यायमूर्ति कौशिक चंदा को, सुनवाई से अलग करने की मांग करने के लिए 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है।

  • अदालत ने कहा है, कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा जुर्माने के रूप में भुगतान की गई राशि का इस्तेमाल कोविड -19 से प्रभावित वकीलों के परिवारों की सहायता के लिए किया जाएगा।
  • हालांकि, संबंधित न्यायाधीश ने व्यक्तिगत विवेक के आधार पर मामले से हटने का फैसला करते हुए मामले को अपनी पीठ से अलग कर दिया है।

‘न्यायिक निरर्हता’ अथवा ‘सुनवाई से इंकार’ का तात्पर्य:

किसी पीठासीन न्यायायिक अधिकारी अथवा प्रशासनिक अधिकारी द्वारा हितों के टकराव के कारण किसी न्यायिक सुनवाई अथवा आधिकारिक कार्रवाई में भागीदारी से इंकार करने को न्यायिक निरर्हता (Judicial disqualification), ‘सुनवाई से इंकार’ करना अथवा ‘रिक्युजल’ (Recusal) कहा जाता है।

‘सुनवाई से इंकार’ करने हेतु सामान्य आधार:

  1. किसी तर्कशील निष्पक्ष पर्यवेक्षक को लगता है कि, न्यायाधीश किसी एक पक्षकार के प्रति सद्भाव रखता है, अथवा अन्य पक्षकार के प्रति द्वेषपूर्ण है, अथवा न्यायाधीश किसी के प्रति पक्षपाती हो सकता है।
  2. न्यायाधीश का मामले में व्यक्तिगत हित है अथवा वह मामले में व्यक्तिगत हित रखने वाले किसी व्यक्ति से संबंध रखता है।
  3. न्यायाधीश की पृष्ठभूमि अथवा अनुभव, जैसे कि न्यायाधीश के वकील के रूप में किये गए पूर्व कार्य।
  4. मामले से संबंधित तथ्यों अथवा पक्षकारों से व्यक्तिगत तौर पर परिचय।
  5. वकीलों या गैर-वकीलों के साथ एक पक्षीय संवाद।
  6. न्यायाधीशों के अधिनिर्णय, टिप्पणियां अथवा आचरण।

इस संबंध में क़ानून:

न्यायाधीशों द्वारा ‘सुनवाई से इंकार’ करने संबंधी कोई निश्चित नियम निर्धारित नहीं हैं।

हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा पद की शपथ लेने के समय, न्याय करने हेतु ‘बिना किसी डर या पक्षपात, लगाव या वैमनस्य के’ अपने कर्तव्यों को निभाने का वादा किया जाता है ।

इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी:

  1. रंजीत ठाकुर बनाम भारत संघ (1987) में, सुप्रीमकोर्ट ने माना कि पक्षपात होने की संभावना की जांच, पक्षकार के दिमाग में उत्पन्न आशंका को देखते हुए तर्कसंगत है। न्यायाधीश को अपने सामने खड़े पक्षकार के दिमाग में चल रहे विचारों को देखना चाहिए और, तय करना चाहिए कि वह पक्षपाती है अथवा नहीं।
  2. जस्टिस जे चेलमेश्वर ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015) मामले में अपनी राय दी थी कि ’जहां भी किसी न्यायाधीश के आर्थिक हित प्रतीत होते है, वहां पक्षपात संबंधी किसी ‘वास्तविक खतरे’ अथवा ‘तर्कपूर्ण संदेह’ की जांच की आवश्यकता नहीं है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. न्यायिक निरर्हता के लिए आधार।
  2. सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को शपथ कौन दिलाता है?
  3. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 127 और 128 किससे संबंधित हैं?

मेंस लिंक:

‘सुनवाई से इंकार’ (Recusal), सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के लिए नैतिकता की एक चयनात्मक आवश्यकता बन गया है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

मसौदा सिनेमेटोग्राफ (संशोधन) विधेयक 2021


(The draft Cinematograph (Amendment) Bill 2021)

संदर्भ:

हाल ही में, ‘सूचना और प्रौद्योगिकी’ पर गठित संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) ने ‘सिनेमेटोग्राफ (संशोधन) विधेयक’ 2021 (Cinematograph (Amendment) Bill 2021) के ड्राफ्ट में प्रस्तावित “सुपर सेंसरशिप” संबंधी प्रावधान पर असंतोष व्यक्त करते हुए ‘सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय’ को इस बारे में अवगत करा दिया है।

चिंता का विषय:

‘सिनेमेटोग्राफ (संशोधन) विधेयक 2021’ के मसौदे में एक प्रावधान है, जिसके तहत केंद्र सरकार को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा प्रमाणित की जा चुकी फिल्म का पुन: प्रमाणन करने का आदेश देने की शक्ति प्रदान की गयी है।

सरकार के अनुसार, इस धारा को केवल उसी समय लागू किया जाएगा, जब किसी फिल्म की सामग्री, राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता को प्रभावित करती हुई पायी जाएगी।

वर्त्तमान मुद्दे:

  • जब ऐसी स्थिति से निपटने हेतु पहले से ही दंडात्मक प्रावधान मौजूद हैं, तो मंत्रालय ने इस प्रावधान को विधेयक में शामिल करना आवश्यक क्यों समझा।
  • न्यायनिर्णयन संबंधी शक्ति किसी नौकरशाह को क्यों सौंपी जानी चाहिए?
  • इसके अलावा, वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित एक आदेश में कहा गया है कि सरकार ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ द्वारा पहले से प्रमाणित की जा चुकी फिल्मों पर पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकती है।

विधेयक मसौदा में प्रमुख प्रावधान:

  1. आयु-आधारित प्रमाणीकरण (Age-based certification): विधेयक में आयु-आधारित वर्गीकरण और श्रेणीकरण का प्रावधान लागू करने का प्रस्ताव किया गया है। इसके तहत, फिल्मो के लिए मौजूदा श्रेणियों (U, U/A और A) को दोबारा आयु-आधारित समूहों (U /A 7+, U/A 13+ और U/A 16+) में विभाजित करने का प्रस्ताव है।
  2. पायरेसी के खिलाफ प्रावधान (Provision against piracy): वर्तमान में, फिल्म पायरेसी को रोकने के लिए कोई सक्षम प्रावधान नहीं हैं। विधेयक में पायरेसी की समस्या पर लगाम लगाने के लिए प्रावधान किए गये हैं, जिनका उल्लंघन करने पर कारावास और जुर्माने की सजा भुगतनी होगी।
  3. अपरिवर्तनशील प्रमाण पत्र (Eternal certificate): इसके अंतर्गत, फिल्मों को सदा के लिए प्रमाणित करने का प्रस्ताव है। वर्तमान में CBFC द्वारा जारी प्रमाण पत्र केवल 10 वर्षों के लिए वैध होते है।

अन्य संबंधित चिंताएं:

अक्सर, किसी फिल्म की प्रमाणन प्रक्रिया के बाद, किंतु उसकी रिलीज से ठीक पहले, विभिन्न समूहों या व्यक्तियों द्वारा फिल्म पर आपत्ति जताई जाती है। प्रस्तावित नए नियमों के लागू होने से, फिल्मों को यादृच्छिक आपत्तियों के आधार पर पुन: प्रमाणन के लिए लंबे समय तक रोका जा सकता है, भले ही इनके लिए CBFC प्रमाणित कर चुका हो।

इस विषय पर सरकार का पक्ष:

सरकार, जिन फिल्मों पर उसके लिए शिकायतें प्राप्त होती हैं, उन फिल्मों के लिए सुपर-सेंसर के रूप में कार्य करने के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करने का औचित्य साबित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 19 में उल्लखित ‘उचित प्रतिबंधों’ का हवाला देती है- भले ही ‘सिनेमैटोग्राफ अधिनियम’ को क्रियान्वित करने वाले, अधिकार प्राप्त आधिकारिक निकाय ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ (CBFC) के अनुसार इन फिल्मों में प्रतिबंध लगाए जाने योग्य सामग्री नहीं पाई गई हो।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं? कि सरकार ने हाल ही में ‘फ़िल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण’ (Film Certificate Appellate Tribunal- FCAT) को भंग कर दिया था। इस अधिकरण का मुख्य कार्य केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के फैसलों से असंतुष्ट प्रमाणपत्र आवेदकों द्वारा की गई अपीलों पर सुनवाई करना था।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. CBFC के बारे में
  2. संरचना
  3. सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के बारे में
  4. नवीनतम संशोधन

मेंस लिंक:

सिनेमैटोग्राफ अधिनियम में प्रस्तावित अधिनियमों से संबंधित चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

 दिल्ली उच्च न्यायालय में समलैंगिक विवाह पर नई याचिका


संदर्भ:

हाल ही में, दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा ‘विदेशी विवाह अधिनियम’ (Foreign Marriage Act) और ‘विशेष विवाह अधिनियम’ (Special Marriage Act) के तहत सभी समान-लिंगी (Same-Sex), समलैंगिक पुरुषों (Queer) या गैर-विषमलैंगिक (non-Heterosexual) विवाहों को कानूनी मान्यता देने की मांग करने वाली एक नई याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया गया है।

संबंधित प्रकरण:

उच्च न्यायालय में एक विवाहित समलैंगिक जोड़े द्वारा एक याचिका दायर की गई है, जिसमें से एक ‘भारत का प्रवासी नागरिक’ (OCI) कार्ड धारक है और उसका साथी एक अमेरिकी नागरिक है। ये जोड़ा, OCI दर्जा हासिल करने हेतु आवेदन कर रहा है, किंतु इनके लिए डर है, कि ‘भारत का प्रवासी नागरिक’ दर्जे लिए उनके आवेदन तथा विवाह प्रमाणीकरण के लिए अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जाएगा। OCI दर्जा हासिल करने हेतु ‘विवाह प्रमाणीकरण’ एक आवश्यक शर्त होती है।

याचिका में की गयी मांगें?

  1. नागरिकता अधिनियम, 1955, विषमलैंगिक, समान-लिंगी या समलैंगिक पति-पत्नी के बीच अंतर नहीं करता है। अतः ‘भारत के प्रवासी नागरिक’ (OCI) से विवाहित व्यक्ति, जिसकी शादी पंजीकृत है और विवाह को दो साल से अधिक समय हो चुका है, को ओसीआई कार्ड हासिल करने हेतु ‘जीवनसाथी’ के रूप में आवेदन करने के लिए योग्य घोषित किया जाना चाहिए।
  2. याचिका में भारत के महावाणिज्य दूतावास, न्यूयॉर्क को निषेध की प्रकृति में एक निर्देश जारी करने के लिए भी प्रार्थना की गई है। इसमें, दूतावास, को मात्र समलैंगिक विवाह या गैर-विषमलैंगिक विवाह करने के आधार पर, उनके लिए ओसीआई कार्ड के लिए आवेदन करने वाले ओसीआई के जीवनसाथी को अपात्र घोषित करने से रोकने को निर्देश देने के लिए मांग की गई है।
  3. विदेशी विवाह अधिनियम’ के विषय पर, याचिका में यह निर्देश देने की मांग की गई है कि विदेशी विवाह अधिनियम, 1969 के अंतर्गत, जिस सीमा तक समलैंगिक विवाह को मान्य नहीं किया गया है, उसके लिए भारत के संविधान अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन घोषित किया जाना चाहिए।
  4. विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के संबंध में इसी तरह की एक प्रार्थना की गई है, जिसमें कहा गया है कि “इस अधिनियम में समलैंगिक विवाह को शामिल नहीं किया गया है, यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन है।”.

भारत में वर्तमान परिदृश्य:

  • भारत में, वर्तमान में, समान-लिंगी दो व्यक्तियों के बीच विवाह प्रतिष्ठापन, किसी भी असंहिताबद्ध जातीय कानूनों या किसी संहिताबद्ध वैधानिक कानूनों में न तो मान्यता प्राप्त है और न ही स्वीकार की जाती है।
  • केंद्र के अनुसार, यह प्रचलित है कि, ‘नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ मामले’ में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समलैंगिकता को वैध बना दिया गया है, किंतु इस धारणा के विपरीत, अदालत ने ‘केवल सीमित अर्थ में एक विशेष मानव-व्यवहार को गैर-अपराध घोषित किया था, जो पहले आईपीसी की धारा 377 के तहत दंडनीय अपराध था’।
  • ‘पुट्टास्वामी निर्णय (निजता संबंधी मामला) और ‘नवतेज जौहर’ मामले (जिसमें आईपीसी की धारा 377 को रद्द कर दिया गया) में की गई टिप्पणियां समलैंगिक-विवाह को मान्यता प्राप्त करने का मौलिक अधिकार प्रदान नहीं करती हैं।

‘विशेष विवाह अधिनियम’, 1954 क्या है?

‘विशेष विवाह अधिनियम’ (Special Marriage Act – SMA) एक ऐसा कानून है, जो बिना किसी धार्मिक रीति-रिवाजों या परम्पराओं के विवाह करने की अनुमति देता है।

  1. विभिन्न जातियों या धर्मों अथवा राज्यों के लोग ‘विशेष विवाह अधिनियम’ (SMA) के तहत विवाह करते हैं, तथा इसमें पंजीकरण के माध्यम से विवाह किया जाता है।
  2. इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य अंतर-धार्मिक विवाह संपन्न करना तथा सभी धार्मिक औपचारिकताओं को अलग करते हुए विवाह को एक धर्मनिरपेक्ष संस्थान के रूप स्थापित करना है, जिसमे विवाह हेतु मात्र पंजीकरण की आवश्यकता होती है।

‘विशेष विवाह अधिनियम’ के तहत प्रक्रिया:

विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act- SMA) के अंतर्गत विवाह पंजीकृत करने के लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की गयी है।

  1. विवाह के लिए इच्छुक पक्षकारों में से एक व्यक्ति को जिले के विवाह-अधिकारी एक सूचना देनी होती है, और इसके लिए विवाह हेतु आवेदन करने वाले पक्षकार को, नोटिस दिए जाने की तिथि से, जिले में तीस दिनों से अधिक समय से निवास करना आवश्यक होता है।
  2. विवाह हेतु दी जाने वाली सूचना को, विवाह अधिकारी, विवाह-सूचना रजिस्टर में दर्ज करेगा तथा प्रत्येक ऐसी सूचना की एक प्रतिलिपि अपने कार्यालय के किसी सहजदृश्य स्थान पर लगवायेगा।
  3. विवाह अधिकारी द्वारा प्रकाशित, विवाह सूचना में पक्षकारों के नाम, जन्म तिथि, आयु, व्यवसाय, माता-पिता के नाम और विवरण, पता, पिन कोड, पहचान की जानकारी, फोन नंबर आदि सम्मिलित होते हैं।
  4. इसके पश्चात, अधिनियम के तहत प्रदान किए गए विभिन्न आधारों पर कोई भी विवाह पर आपत्ति उठा सकता है। यदि 30 दिनों की अवधि के भीतर कोई आपत्ति नहीं उठाई जाती है, तो विवाह संपन्न किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति विवाह पर आपत्ति करता है, तो विवाह अधिकारी, इसकी जांच करेगा, तदुपरांत वह विवाह के संबंध में निर्णय लेगा।

आलोचना:

  1. परिवार द्वारा बलप्रयोग रणनीति के प्रति असुरक्षित
  2. निजता का उल्लंघन
  3. धर्म-परिवर्तन का दबाव

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि विवाह के लिए निर्धारित न्यूनतम आयु, वयस्क होने की आयु से भिन्न होती है? वयस्कता, लैंगिक रूप से तटस्थ होती है। इस बारे में जानने हेतु पढ़ें।  

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विशेष विवाह अधिनियम के उद्देश्य
  2. विशेष विवाह अधिनियम की धारा 5 और 6
  3. विवाह के पंजीकरण हेतु अधिनियम के तहत प्रमुख आवश्यकताएं
  4. विवाह अधिकारी द्वारा प्रकाशित विवरण
  5. संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का अवलोकन

मेंस लिंक:

विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के विवादास्पद प्रावधान कौन से हैं? इस कानून की समीक्षा की आवश्यकता क्यों है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

नदी तट पर बसे शहर और ‘नदी संरक्षण योजनाएं’


संदर्भ:

हाल ही में, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान (National Mission for Clean Ganga- NMCG)  द्वारा गंगा नदी संरक्षण पर एक नीतिगत दस्तावेज जारी किया गया है।

नीति के प्रमुख बिंदु:

  • गंगा नदी के किनारे बसे शहरों को अपना मास्टर प्लान तैयार करते समय ‘नदी संरक्षण योजनाओं’ को शामिल किया जाए।
  • ‘नदी के प्रति संवेदनशील’ इन योजनाओं को व्यावहारिक होना चाहिए और इन्हें तैयार करते समय अतिक्रमण और भूमि स्वामित्व संबंधी सवालों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • पुनर्वास रणनीति के अलावा वैकल्पिक आजीविका विकल्पों पर जोर देने वाली अतिक्रमणकारी संस्थाओं के लिए एक व्यवस्थित पुनर्वास योजना भी तैयार करने की आवश्यकता है।
  • मास्टर प्लान में ‘विशिष्ट तकनीकों’ को अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए, किंतु इसमें नदी प्रबंधन हेतु अत्याधुनिक तकनीकों (प्रदाताओं का नाम लिए बगैर) के उपयोग को आसान बनाने हेतु ‘उपयुक्त वातावरण’ तैयार किया जा सकता है।

प्रयोज्यता:

ये सिफारिशें वर्तमान में गंगा नदी की मुख्य धारा पर बसे शहरों के लिए जारी की गईं हैं। इन शहरों में 5 राज्यों -उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल- के 97 शहर शामिल है।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान (NMCG)  के बारे में:

NMCG को सोसाइटी पंजीकरण अधिनियमन, 1860 के अंतर्गत 12 अगस्त 2011 को एक सोसाइटी के रुप में पंजीकृत किया गया था।

यह ‘पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम’ (EPA), 1986 के प्रावधानों के तहत गठित ‘राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण’ (NGRBA) की कार्यान्वयन शाखा के रूप में कार्य करता था।

कृपया ध्यान दें: ‘राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण’ (NGRBA) को ‘गंगा नदी के पुनरुद्धार, संरक्षण और प्रबंधन हेतु राष्ट्रीय परिषद’ (National Council for Rejuvenation, Protection and Management of River Ganga), जिसे ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ (National Ganga Council – NGC) भी कहा जाता है, का गठन किए जाने बाद 7 अक्टूबर 2016 को भंग कर दिया गया था।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री करते हैं? इसके कार्यों और अन्य संबंधित संस्थानों के बारे में अधिक जानने हेतु देखें: राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन | एनएमसीजी (nmcg.nic.in)

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ (NGC) की संरचना
  2. राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण’ (NGRBA) के बारे में
  3. राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान (NMCG) क्या है?
  4. नमामि गंगे कार्यक्रम के घटक
  5. विश्व बैंक समूह

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: केंद्र और राज्यों द्वारा आबादी के कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं और इन योजनाओं का प्रदर्शन; इन कमजोर वर्गों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए गठित तंत्र, कानून, संस्थान और निकाय।

वन अधिकारों के कार्यान्वयन की समीक्षा


संदर्भ:

पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) और जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) द्वारा संयुक्त रूप से सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को एक परिपत्र जारी किया गया है। इस परिपत्र में राज्य सरकारों को ‘वन अधिकार अधिनियम’, 2006  (Forest Rights Act 2006) को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है।

परिपत्र में, राज्यों को अधिनियम के कार्यान्वयन की समीक्षा करने और प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए आवश्यक किसी भी स्पष्टीकरण के बारे में भारत सरकार को सूचित करने के लिए कहा गया है।

चिंता के विषय:

  • इस अधिनियम के लागू के पश्चात् काफी समय बीत जाने के बाद भी वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देने की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है।
  • अधिनियम की धारा 5 का कार्यान्वयन भी चिंता का विषय है। धारा 5, मान्यता प्राप्त वनवासियों के कर्तव्यों जैसे कि वन्यजीव, वन और जैव विविधता की रक्षा करना; जलग्रहण क्षेत्र, जल स्रोत और अन्य पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्रों के पर्याप्त रूप से संरक्षण को सुनिश्चित करना आदि से संबंधित है।
  • अधिनियम की धारा 3(1) (i) के तहत, किसी भी सामुदायिक वन संसाधन के संरक्षण, पुनर्जनन, संरक्षण या प्रबंधन के अधिकारों के बारे में प्रावधान किए गए हैं, किंतु इन प्रावधानों का कार्यान्वयन काफी शिथिल है।

वन अधिकार अधिनियम (FRA) के बारे में:

वर्ष 2006 में पारित अधिनियम पारंपरिक वनवासी समुदायों के अधिकारों को कानूनी मान्यता प्रदान करता है।

अधिनियम के अंतर्गत प्रद्दत अधिकार:

  • स्वामित्व अधिकार – वनवासियों अथवा आदिवासियों द्वारा 13 दिसंबर 2005 तक कृषि की जाने वाली भूमि पर, जो कि 4 हेक्टेयर से अधिक नहीं होनी चाहिए, उक्त तारीख तक वास्तव में कृषि करने वाले संबंधित परिवार को स्वामित्व अधिकार प्रदान किए जाएंगे। अर्थात, कोई अन्य नयी भूमि प्रदान नहीं की जाएगी।
  • अधिकारों का उपयोग- वनवासियों अथवा आदिवासियों के लिए, लघु वन उपज (स्वामित्व सहित), चारागाह क्षेत्र, तथा पशुचारक मार्ग संबंधी अधिकार उपलब्ध होंगे।
  • राहत और विकास अधिकार – वनवासियों अथवा आदिवासियों के लिए अवैध निकासी या बलपूर्वक विस्थापन के मामले में पुनर्वास का अधिकार तथा वन संरक्षण हेतु प्रतिबंधों के अधीन बुनियादी सुविधाओं का अधिकार प्राप्त होगा।
  • वन प्रबंधन अधिकार – जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा करने संबधी अधिकार होंगे।

पात्रता मापदंड:

वन अधिकार अधिनियम (FRA) की धारा 2(c) के अनुसार, वनवासी अनुसूचित जनजाति (Forest Dwelling Scheduled Tribe – FDST) के रूप में अर्हता प्राप्त करने और FRA के तहत अधिकारों की मान्यता हेतु पात्र होने के लिए, आवेदक द्वारा निम्नलिखित तीन शर्तों को पूरा किया जाना आवश्यक है।

व्यक्ति अथवा समुदाय;

  1. अधिकार का दावा किये जाने वाले क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति का सदस्य होना चाहिए;
  2. 13-12-2005 से पहले मूल रूप से वन अथवा वन भूमि का निवासी होना चाहिए;
  3. आजीविका हेतु वास्तविक रूप से वन अथवा वन भूमि पर निर्भर होना चाहिए।

तथा, अन्य पारंपरिक वनवासियों (Other Traditional Forest Dweller – OTFD) के रूप में अर्हता प्राप्त करने और FRA के तहत अधिकारों की मान्यता हेतु पात्र होने के लिए,  निम्नलिखित दो शर्तों को पूरा करना आवश्यक है:

व्यक्ति अथवा समुदाय;

  1. जो 13 दिसम्बर, 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढि़यों (75 वर्ष) तक मूल रूप से वन या वन भूमि में निवास करता हो।
  2. आजीविका हेतु वास्तविक रूप से वन अथवा वन भूमि पर निर्भर हो।

अधिकारों की मान्यता प्रदान करने हेतु प्रक्रिया:

  • ग्राम सभा द्वारा एक प्रस्ताव पारित किया जाएगा, जिसमें, किन संसाधनों पर किनके अधिकारों को मान्यता दी जानी चाहिए, इस संबंध में सिफारिश की जाएगी।
  • इसके पश्चात, इस प्रस्ताव की उप-मंडल (या तालुका) स्तर पर और बाद में जिला स्तर पर जांच की जाएगी और अनुमोदित किया जाएगा।
  • इन स्क्रीनिंग समितियों में वन, राजस्व और आदिवासी कल्याण विभाग के तीन सरकारी अधिकारी और उस स्तर पर स्थानीय निकाय के तीन निर्वाचित सदस्य होते हैं। ये समितियां, वन अधिकारों की मान्यता से संबंधित अपीलों पर सुनवाई भी करती हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत परिभाषित महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पांचवी अनुसूची के तहत क्षेत्रों को सम्मिलित करने अथवा बहिष्कृत करने की शक्ति
  2. अनुसूचित क्षेत्र क्या होते हैं?
  3. वन अधिकार अधिनियम- प्रमुख प्रावधान
  4. इस अधिनियम के तहत अधिकार
  5. पात्रता मानदंड
  6. इन अधिकारों को मान्यता देने में ग्राम सभा की भूमिका
  7. महत्वपूर्ण वन्यजीव वास स्थल क्या होते हैं?

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


मलेशिया में सफेद झंडा अभियान

(The white flag campaign in Malaysia)

मलेशिया में,  निम्न आय वाले कुछ परिवारों द्वारा तथाकथित “सफेद झंडा अभियान” या #benderaputi मूवमेंट में भाग लेने के रूप में अपने घरों पर सफेद झंडे लहराना शुरू कर दिया है।

  • ये लोग कोविड-19 के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान अपनी आर्थिक तंगी के संकट को अवगत कराने के लिए यह अभियान चला रहे हैं।
  • पिछले सप्ताह शुरू किए गए आंदोलन में, जिन परिवारों के पास खाद्य सामग्री की कमी होती है या उन्हें किसी अन्य प्रकार की सहायता की आवश्यकता है, उन्हें इसका संकेत देने के लिए, सफेद झंडा लहराने या अपने घरों के बाहर सफेद कपड़े का एक टुकड़ा रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
  • सफेद झंडे को देखकर उनके पड़ोसी और भले आदमी उन तक सहायता पहुंचा सकते हैं।

इथियोपिया का ‘ग्रैंड रेनेसां डैम’

(Grand Ethiopian Renaissance Dam)

  • अवस्थिति: बेनिशानगुल-गुमुज़ (Benishangul-Gumuz) क्षेत्र, इथियोपिया।
  • पहले इसे ‘मिलेनियम बांध’ के रूप में जाना जाता था। यह बाँध, इथियोपिया के बेनिशानगुल-गुमुज क्षेत्र में, ‘ब्लू नील नदी’ पर निर्माणाधीन है, तथा सूडान से लगभग 40 किमी पूर्व में स्थित है।
  • पूरा होने के बाद, यह अफ्रीका की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना होगी।

रिवेंज टूरिज्म

वर्तमान में, ‘रिवेंज टूरिज्म’ (Revenge Tourism) भारतीयों को काफी प्रभावित कर रहा है।

  • ‘रिवेंज टूरिज्म’ शब्द 1980 के दशक की चीनी अवधारणा ‘रिवेंज स्पेंडिंग’ (Revenge Spending) से उत्पन्न हुआ है। चीन में तत्कालीन प्रतिबंधों को हटाए जाने के बाद, लोगों द्वारा ‘खर्च’ करने की एक विस्फोटक प्रवृत्ति देखी गई थी, इसे ही ‘रिवेंज स्पेंडिंग’ का नाम दिया गया था।
  • वर्तमान में, इसका उपयोग, कई महीनों के लॉकडाउन के बाद यात्रा के लिए व्यग्र मांग को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
  • रिवेंज ट्रैवल या रिवेंज टूरिज्म, लॉकडाउन के नीरस जीवन से मुक्त होने की इच्छा से उत्पन्न हुआ है। इसे ‘लॉकडाउन-थकान’ (lockdown-fatigue) कही जाने वाली एक अन्य घटना का उत्पाद भी बताया जाता है।

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