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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 11 June 2021

 

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-I

1. अटलांटिक चार्टर

2. दिल्ली मास्टर प्लान 2041: प्रमुख क्षेत्र और चुनौतियाँ

 

सामान्य अध्ययन-II

1. विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव

2. नागालैंड में नागा मुद्दों के समाधान हेतु समिति का गठन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. फसल बीमा का ‘बीड मॉडल’

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. पक्के टाइगर रिजर्व

2. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI)

3. ओडिशा वन विभाग द्वारा घड़ियालों को बचाने पर नकद इनाम की घोषणा

4. केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा भारतीय रेल को 5 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम को मंजूरी

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: विश्व के इतिहास में 18वीं सदी तथा बाद की घटनाएँ यथा औद्योगिक क्रांति, विश्व युद्ध, राष्ट्रीय सीमाओं का पुनःसीमांकन, उपनिवेशवाद, उपनिवेशवाद की समाप्ति, राजनीतिक दर्शन जैसे साम्यवाद, पूंजीवाद, समाजवाद आदि शामिल होंगे, उनके रूप और समाज पर उनका प्रभाव।

अटलांटिक चार्टर


(Atlantic Charter)

संदर्भ:

हाल ही में, अगस्त 1941 में ब्रिटिश प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल और अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट द्वारा हस्ताक्षरित एक घोषणापत्र, जिसे अटलांटिक चार्टर कहा जाता है, से संबंधित दस्तावेजों का अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन और ब्रिटिश प्रधान मंत्री बोरिस जॉनसन ने निरीक्षण किया।

दोनों नेताओं द्वारा ‘लोकतंत्र और खुले समाज के सिद्धांतों, मूल्यों और संस्थानों की रक्षा’ का संकल्प लेते हुए एक नए अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर करने की योजना है।

‘अटलांटिक चार्टर’ के बारे में:

अटलांटिक चार्टर, संयुक्त राज्य अमेरिका और ग्रेट ब्रिटेन द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के दौरान जारी एक संयुक्त घोषणापत्र था, जिसमे युद्ध के पश्चात् विश्व के लिए एक दृष्टिकोण निर्धारित किया गया था।

  • इस घोषणापत्र को सर्वप्रथम 14 अगस्त 1941 को जारी किया गया था, बाद में इस पर 26 मित्र राष्ट्रों द्वारा जनवरी 1942 तक अपना समर्थन देने का वादा किया गया।
  • किसी राष्ट्र को अपनी सरकार चुनने का अधिकार, व्यापार प्रतिबंधों में ढील और युद्ध के पश्चात् निरस्त्रीकरण का अधिवचन, इसके प्रमुख बिंदुओं में शामिल थे
  • इस दस्तावेज़ को 1945 में गठित संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

अटलांटिक चार्टर में शामिल प्रमुख बिंदु:

  • अटलांटिक चार्टर में आठ सामूहिक सिद्धांत शामिल किए गए थे।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन द्वार विश्व-युद्ध से कोई भी क्षेत्रीय लाभ नहीं उठाने पर सहमति व्यक्त की गई, और उन्होंने संबंधित नागरिकों की इच्छा के विरुद्ध किए जाने वाले किसी भी क्षेत्रीय परिवर्तन का विरोध किया।
  • जिन राष्ट्रों पर युद्ध के दौरान दूसरे देशों के कब्ज़ा हो गया था, या उनकी सरकार गिर गई थी, उनके लिए, अपनी सरकार बनाने के लिए सहायता करना।
  • नागरिकों को अपनी खुद की सरकार चुनने का अधिकार होना चाहिए।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि अटलांटिक चार्टर के समर्थकों द्वारा 1 जनवरी 1942 को घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए गए थे, और यह बाद में आधुनिक संयुक्त राष्ट्र का आधार बना? यहां पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षरकर्ता
  2. घटक
  3. द्वतीय विश्व युद्ध- कारण और परिणाम

मेंस लिंक:

अटलांटिक चार्टर के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

 दिल्ली मास्टर प्लान 2041: प्रमुख क्षेत्र और चुनौतियाँ


संदर्भ:

हाल ही में, दिल्ली विकास प्राधिकरण ने ‘दिल्ली के लिए मास्टर प्लान-2041’ (Master Plan for Delhi 2041) के मसौदे को अपनी प्रारंभिक मंजूरी दे दी है। इस मास्टर प्लान के मसौदे को सार्वजनिक कर आम नागरिकों से आपत्ति और सुझाव आमंत्रित किए गए हैं, जिसके बाद इसे लागू किया जाएगा।

सबसे पहले, मास्टर प्लान’ क्या होता है?

किसी भी शहर का मास्टर प्लान, शहर के योजनाकारों और इसकी जमीन पर स्वामित्व रखने वाली एजेंसीज के परिकल्पना दस्तावेज (Vision Document) की भांति होता है। यह भविष्य में शहर का विकास करने हेतु एक रूपरेखा होती है। इसमें, जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, आवास, परिवहन, सामुदायिक सुविधाओं और भूमि उपयोग को ध्यान में रखते हुए विश्लेषण, सिफारिशें और प्रस्ताव शामिल होते हैं।

‘दिल्ली मास्टर प्लान- 2041 क्या है?

  1. ‘दिल्ली मास्टर प्लान- 2041’ का उद्देश्य, दिल्ली को वर्ष 2041 तक एक संवहनीय, निवास योग्य और जीवंत बनाने हेतु तैयार करना है।
  2. आवास क्षेत्र: आवास क्षेत्र के लिए इस मसौदे में, बड़ी संख्या में प्रवासी आबादी को ध्यान में रखते हुए, निजी क्षेत्र और सरकारी एजेंसियों अधिक निवेश करने के लिए आमंत्रित करके, किराए के आवासों को प्रोत्साहित करने की बात की गई है।
  3. उपयोगकर्ता भुगतानसिद्धांत (‘User pays’ principle): पार्किंग की समस्याओं को दूर करने के लिए, मसौदे में ‘उपयोगकर्ता भुगतान’ सिद्धांत का सुझाव दिया गया है, जिसका अर्थ है कि गैर-मोटर चालित वाहनों को छोड़कर, सभी निजी मोटर वाहनों के उपयोगकर्ताओं को अधिकृत पार्किंग सुविधाओं, स्थानों और सड़कों के लिए भुगतान करना होगा।
  4. इसका उद्देश्य, सार्वजनिक परिवहन को हरित ईंधन में परिवर्तित करना और आवागमन-उन्मुख विकास (Transit-Oriented Development TOD) के बहु-उपयोग मॉडल को अपनाते हुए, प्रमुख रणनीतियों के माध्यम से वाहनों के प्रदूषण को कम करना है।
  5. मसौदा में यमुना नदी के निकट ‘बफर जोन’ की स्पष्ट सीमा निर्धारित की गई है- शहर में प्रवाहित होने वाली नदी के किनारों पर, जहां भी संभव हो, 300 मीटर की चौड़ाई का ‘बफर जोन’ बनाया जाएगा।

महामारी के मद्देनजर प्रस्तावित बदलाव:

  • इसका उद्देश्य आपात स्थिति के दौरान, आश्रय स्थल, सामूहिक रसोई और संगरोध हेतु स्थान (Quarantine Space) उपलब्ध कराने हेतु सामूहिक सामुदायिक स्थलों को विकसित करना है।
  • रात्री-कालीन अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए, सांस्कृतिक उत्सवों, बसों में मनोरंजन, मेट्रो, खेल सुविधाओं और खुदरा स्टोरों पर केंद्रित योजनाओं को, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की नाइट लाइफ सर्किट योजना में शामिल किया गया है।
  • इसमें, यांत्रिक वातायन-व्यवस्था (mechanical ventilation systems) पर निर्भरता कम करने हेतु, विकेन्द्रीकृत कार्यक्षेत्रों, अनिवार्यतः खुले क्षेत्रों का निर्माण, बेहतर आवास योजनाएं और हरित-प्रमाणिक  विकास के माध्यम से, वायुवाहित महामारी (airborne epidemics) के प्रति संवेदनशीलता कम करने का भी प्रस्ताव किया गया है।

कार्यान्वयन में चुनौतियां:

  1. राजनीतिक दलों से टकराव
  2. संसाधनों और धन की कमी
  3. विभिन्न विभागों में भ्रष्टाचार
  4. राजनीतिक और नौकरशाही इच्छाशक्ति की कमी और एजेंसियों की अधिकता

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘न्यू अर्बन एजेंडा’ औपचारिक रूप से 20 अक्टूबर 2016 को आयोजित ‘हाउसिंग एंड सस्टेनेबल अर्बन डेवलपमेंट पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ में राष्ट्रीय सरकारों द्वारा अपनाया गया था, जिसे आमतौर पर पर्यावास III  (Habitat III) के रूप में जाना जाता है। यह समझौता क्या है? यहां पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक और मेंस लिंक:

मास्टर प्लान के घटक और महत्व।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव


(Breach of Privilege motion)

संदर्भ:

लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल के. पटेल द्वारा द्वीपों का दौरा करने की अनुमति देने से इनकार करने पर, भाकपा सांसद बिनॉय विश्वम ने उनके खिलाफ ‘विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव’ (Breach of Privilege motion) दायर किया है।

सांसद ने कहा है, कि एक सांसद का स्वतंत्र रूप से घूमने और लोगों से मिलने का अधिकार, उनके पद के विशेषाधिकार का अभिन्न अंग है

पृष्ठभूमि:

जिला प्रशासन ने यह कहते हुए जवाब दिया है, कि जारी कोविड प्रोटोकॉल के अनुसार सांसद को द्वीप की यात्रा करने की अनुमति नहीं है।

संसदीय विशेषाधिकार’ क्या होते हैं?

संसदीय विशेषाधिकार (Parliamentary Privileges), संसद सदस्यों को, व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से, प्राप्त कुछ अधिकार और उन्मुक्तियां होते हैं, ताकि वे “अपने कार्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन” कर सकें।

  • संविधान के अनुच्छेद 105 में स्पष्ट रूप से दो विशेषाधिकारों का उल्लेख किया गया है। ये हैं: संसद में वाक्-स्वतंत्रता और इसकी कार्यवाही के प्रकाशन का अधिकार।
  • संविधान में विनिर्दिष्ट विशेषाधिकारों के अतिरिक्त, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में सदन या उसकी समिति की बैठक के दौरान तथा इसके आरंभ होने से चालीस दिन पूर्व और इसकी समाप्ति के चालीस दिन पश्चात सिविल प्रक्रिया के अंतर्गत सदस्यों की गिरफ्तारी और उन्हें निरुद्ध किए जाने से स्वतंत्रता का उपबंध किया गया है।

विशेषाधिकार हनन के खिलाफ प्रस्ताव:

  • सांसदों को प्राप्त किसी भी अधिकार और उन्मुक्ति की अवहेलना करने पर, इस अपराध को विशेषाधिकार हनन कहा जाता है, और यह संसद के कानून के तहत दंडनीय होता है।
  • किसी भी सदन के किसी भी सदस्य द्वारा विशेषाधिकार हनन के दोषी व्यक्ति के खिलाफ एक प्रस्ताव के रूप में एक सूचना प्रस्तुत की जा सकती है।

लोकसभा अध्यक्ष / राज्य सभा अध्यक्ष की भूमिका:

विशेषाधिकार प्रस्ताव की जांच के लिए, लोकसभा अध्यक्ष / राज्य सभा अध्यक्ष, पहला स्तर होता है।

  • लोकसभा अध्यक्ष / राज्यसभा अध्यक्ष, विशेषाधिकार प्रस्ताव पर स्वयं निर्णय ले सकते हैं या इसे संसद की विशेषाधिकार समिति के लिए संदर्भित कर सकते हैं।
  • यदि लोकसभा अध्यक्ष / राज्यसभा अध्यक्ष, संगत नियमों के तहत प्रस्ताव पर सहमति देते हैं, तो संबंधित सदस्य को प्रस्ताव के संदर्भ में एक संक्षिप्त वक्तव्य देने का अवसर दिया जाता है।

प्रयोज्यता:

  • संविधान में, उन सभी व्यक्तियों को भी संसदीय विशेषाधिकार प्रदान किए गए है, जो संसद के किसी सदन या उसकी किसी समिति की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने के हकदार हैं। इन सदस्यों में भारत के महान्यायवादी और केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं।
  • हालांकि, संसद का अभिन्न अंग होने बावजूद, राष्ट्रपति को संसदीय विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होते हैं। राष्ट्रपति के लिए संविधान के अनुच्छेद 361 में विशेषाधिकारों का प्रावधान किया गया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

  1. क्या आप जानते हैं कि संसदीय विशेषाधिकारों को अभी तक संहिताबद्ध नहीं किया गया है? इनके संहिताकरण की आवश्यकता क्यों है? इसे जानने के लिए पढ़े
  2. क्या आप ‘विशेषाधिकार समिति’ के बारे में जानते हैं? यहां पढ़ें,

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. संविधान के कौन से प्रावधान विधायिका के विशेषाधिकारों की रक्षा करते हैं?
  2. विधायिका के विशेषाधिकार के कथित उल्लंघन के मामलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया क्या है?
  3. संसद और राज्य विधानमंडलों में विशेषाधिकार समितियों की संरचना और कार्य
  4. विधायिका के विशेषाधिकार हनन का दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के लिए क्या सजा है?
  5. क्या राज्य विधानसभाओं के विशेषाधिकार हनन से जुड़े मामलों में न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं?

मेंस लिंक:

विधायिका के विशेषाधिकारों से आप क्या समझते हैं? भारत में समय-समय पर देखी जाने वाली विधायिका विशेषाधिकारों की समस्या पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण और उसकी चुनौतियाँ।

नागालैंड में नागा मुद्दों के समाधान हेतु समिति का गठन


संदर्भ:

नागालैंड सरकार द्वारा काफी समय से लंबित नागा शांति समझौते और नागा राजनीतिक मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ वार्ता आगे बढ़ाने के लिए, विपक्षी नेताओं को शामिल करते हुए एक समिति गठित करने का फैसला किया गया है।

इस समिति की अध्यक्षता मुख्यमंत्री नेफियू रियो (Neiphiu Rio) करेंगे।

नागा राजनीतिक मुद्दों का संक्षिप्त इतिहास:

स्वतंत्रता पूर्व:

  1. अंग्रेजों ने वर्ष 1826 में असम पर कब्जा कर लिया और वर्ष 1881 में नागा हिल्स भी ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गयीं। नागा विद्रोह का पहला संकेत वर्ष 1918 में ‘नागा क्लब’ के गठन में देखा जाता है। इसके सदस्यों ने वर्ष 1929 में साइमन कमीशन को नागा पहाडियों से निकल जाने को कहा था।
  2. वर्ष 1946 में नागा नेशनल काउंसिल (Naga National Council- NNC) का गठन हुआ, जिसने 14 अगस्त 1947 को नागालैंड को एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया।
  3. ‘नागा नेशनल काउंसिल’ ने “संप्रभु नागा राज्य” स्थापित करने का संकल्प लिया और वर्ष 1951 में एक “जनमत संग्रह” कराया, जिसमें “99 प्रतिशत” ने एक “स्वतंत्र” नागालैंड के पक्ष में मतदान किया।

स्वतंत्रता पश्चात:

22 मार्च, 1952 को एक भूमिगत नागा फ़ेडरल गवर्नमेंट (NFG) और नागा फ़ेडरल आर्मी (NFA) का गठन किया गया। भारत सरकार ने विद्रोह कुचलने के लिए सेना भेजी तथा वर्ष 1958 में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम बनाया गया।

इस संबंध में समझौता:

  • वर्ष 1997 में, नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड-आईएम (NSCN-IM) द्वारा केंद्र सरकार के साथ एक युद्धविराम समझौता किया गया था और उस समय से दोनों के बीच वार्ता जारी है।
  • इसके अलावा, वर्ष 2017 से सात अलग-अलग नागा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों (Naga national political groups- NNPGs) के एक समूह की भी केंद्र के साथ वार्ता चल रही है।
  • वर्ष 2015 में केंद्र सरकार और NSCN (IM) के बीच एक ‘फ्रेमवर्क समझौता’ पर हस्ताक्षर किये गए, तथा वर्ष 2017 में केंद्र ने NNPG के साथ एक “सहमत स्थिति” (agreed position) पर हस्ताक्षर किए।
  • हालांकि, NSCN (IM) द्वारा अलग नागा ध्वज और संविधान की मांग किए जाने की वजह से, काफी लंबे समय से लंबित नागा राजनीतिक मुद्दों पर अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने में देरी हो रही है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

वर्ष 1947 के पश्चात भारत के मानचित्र में होने वाले परिवर्तनों के बारे में जानिए: Click here

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘ग्रेटर नागालैंड’ के तहत शामिल राज्यों के हिस्से
  2. नागा क्लब और ‘नागा नेशनल काउंसिल’ (NNC)
  3. नागा जनमत संग्रह कब आयोजित किया गया था?
  4. AFSPA का अवलोकन।
  5. अनुच्छेद 371 का अवलोकन

मेंस लिंक:

नागा शांति समझौते से जुड़े मुद्दों और चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।

फसल बीमा का ‘बीड मॉडल’


संदर्भ:

हाल ही में, महाराष्ट्र सरकार द्वारा ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ (PMFBY) के ‘बीड मॉडल’ (Beed Model) के राज्यव्यापी कार्यान्वयन के लिए कहा गया है।

बीड मॉडलक्या है?

समस्याएं:

  • बीड (Beed), महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थित एक जिला है।
  • यह जिला, किसी भी बीमा कंपनी के लिए एक चुनौती है क्योंकि यहां के किसानों को बार-बार या तो सूखे या भारी बारिश के कारण फसलें गंवानी पड़ती हैं।
  • इस कारण, इस जिले के लिए उच्च भुगतान को देखते हुए, बीमा कंपनियों को लगातार घाटा होता है।

समाधान:

बीमा कंपनियों को आकर्षित करने हेतु राज्य के कृषि विभाग ने इस जिले के लिए ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ (PMFBY) दिशानिर्देशों में बदलाव करने का फैसला किया है।

  • नए दिशानिर्देशों के तहत, कुछ चेतावनियों सहित बीमा कंपनी एकत्रित प्रीमियम राशि के 110% की सुरक्षा प्रदान करेगी।
  • यदि मुआवजा की राशि, बीमा कंपनी द्वारा दी गई सुरक्षा से अधिक हो जाती है, तो इस अतरिक्त मुआवजा राशि का भुगतान राज्य सरकार करेगी।
  • यदि मुआवजा के रूप में दी गई राशि, एकत्रित प्रीमियम से कम रहती है, तो बीमा कंपनी इस राशि का 20% प्रबंधन शुल्क के रूप में अपने पास रख लेगी और शेष राशि को राज्य सरकार के लिए वापस कर देगी।

राज्य सरकार पर प्रभाव:

  • सामान्य मौसम के दौरान, जब किसानों को होने वाला नुकसान न्यूनतम होता है, तब राज्य सरकार को प्रीमियम की शेष राशि वापस मिलने की अपेक्षा होती है, जिसे आगामी वर्ष के लिए योजना का वित्त-पोषण करने हेतु एक कोष में जमा किया जा सकता है।
  • हालांकि, चरम मौसमी घटनाओं के कारण होने वाले नुकसान संबंधी मामलों में राज्य सरकार को वित्तीय दायित्व वहन करना होगा।

महाराष्ट्र सरकार, इस मॉडल को पूरे राज्य में लागू करने जोर क्यों दे रही है?

धन का एक अन्य स्रोत: बीड मॉडल में, बीमा कंपनी का लाभ कम होने की उम्मीद होती है, इसके अलावा राज्य सरकार के लिए धन के एक अन्य स्रोत तक पहुँच मिलती है।

राज्य पर कम बोझ: राज्य सरकार को वापस मिली राशि को अगले वर्ष किए जाने वाले व्यय में जोड़ा जा सकेगा या इससे, फसल-नुकसान होने वाले किसी वर्ष में अतिरिक्त मुआवजा राशि का भुगतान करने में मदद मिल सकती है।

PMFBY के बारे में:

जनवरी 2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), खराब मौसमी परिघटनाओं के कारण फसलों को होने वाले नुकसान के लिए बीमा सुरक्षा प्रदान करती है।

  • इस योजना के तहत, किसानों को प्रीमियम का 1.5-2% भुगतान करना होता हैं, और शेष राशि का भुगतान राज्य और केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है।
  • यह एक केंद्रीय योजना है तथा राज्य के कृषि विभागों द्वारा, केंद्रीय दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्यान्वित की जाती है।

PMFBY से PMFBY 2.0:

पूर्णतया स्वैच्छिक: वर्ष 2020 के खरीफ सीजन से सभी किसानों के लिए नामांकन को शत प्रतिशत स्वैच्छिक बनाने का निर्णय लिया गया है।

सीमित केंद्रीय सब्सिडी: केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा इस योजना के तहत गैर-सिंचित क्षेत्रों/फसलों के लिये बीमा किस्त की दरों पर केंद्र सरकार की हिस्सेदारी को 30% और सिंचित क्षेत्रों/फसलों के लिये 25% तक सीमित करने का निर्णय लिया गया है।

राज्यों के लिये अधिक स्वायत्तता: केंद्र सरकार द्वारा राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू करने के लिये व्यापक छूट प्रदान की गयी है और साथ ही उन्हें बुवाई, स्थानिक आपदा, फसल के दौरान मौसम प्रतिकूलता, और फसल के बाद के नुकसान आदि किसी भी अतिरिक्त जोखिम कवर/ सुविधाओं का चयन करने का विकल्प भी दिया गया है।

निर्णय में देरी होने पर दंड: संशोधित PMFBY में, एक प्रावधान शामिल किया गया है, जिसमें राज्यों द्वारा खरीफ सीजन के लिए 31 मार्च से पहले और रबी सीजन के लिए 30 सितंबर से पहले अपना हिस्सा जारी नहीं करने पर, उन्हें बाद के फसल सीजनों में योजना के तहत भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

सूचना, शिक्षा और संचार गतिविधियों में निवेश: अब इस योजना के तहत बीमा कंपनियों द्वारा एकत्र किये गए कुल प्रीमियम का 0.5% सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियों पर खर्च करना अनिवार्य किया गया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप मौसम आधारित फसल बीमा योजना (WBCIS) के बारे में जानते हैं? यहां पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. PMFBY की प्रमुख विशेषताएं
  2. लाभ
  3. पात्रता
  4. PMFBY 0

मैंस लिंक:

PMFBY 2.0 के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


पक्के टाइगर रिजर्व

  • पक्के टाइगर रिजर्व को ‘पाखुई टाइगर रिजर्व’ (Pakhui Tiger Reserve) के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस टाइगर रिजर्व के लिए अपने ‘हॉर्नबिल नेस्ट एडॉप्शन प्रोग्राम’ (Hornbill Nest Adoption Programme) के लिए ‘संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण’ की श्रेणी में भारत जैव विविधता पुरस्कार 2016 प्रदान किया गया था।
  • पक्के टाइगर रिजर्व के पश्चिम और उत्तर में, भरेली या कामेंग नदी और पूर्व में पक्के नदी बहती है।
  • निकटवर्ती अभ्यारण्य: अरुणाचल प्रदेश में पापुम रिजर्व फॉरेस्ट, असम का नामेरी नेशनल पार्क, डोइमारा रिजर्व फॉरेस्ट और ईगलनेस्ट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी।
  • इस क्षेत्र में बहने वाली प्रमुख बारहमासी नदियाँ नामेरी, खारी और ऊपरी डिकोराई हैं। कामेंग नदी के पश्चिम में सेसा आर्किड अभयारण्य स्थित है।
  • पक्के टाइगर रिजर्व, पूर्वी हिमालय जैव विविधता हॉटस्पॉट के अंतर्गत आता है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI)

खाद्य सुरक्षा नियामक FSSAI ने खाद्य व्यवसाय संचालकों के लिए 1 अक्टूबर से भुगतान रसीदों या खरीद बिल पर FSSAI लाइसेंस या पंजीकरण संख्या का उल्लेख करना अनिवार्य किया है।

FSSAI के बारे में:

  1. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (FSS अधिनियम) के तहत स्थापित एक स्वायत्त वैधानिक निकाय है।
  2. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार FSSAI का प्रशासनिक मंत्रालय है।
  3. किसी भी खाद्य संबंधित व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए, व्यवसाय-स्वामी के लिए FSSAI की अनुमति से एक प्रमाण पत्र और लाइसेंस हासिल करना आवश्यक होता है।

 

ओडिशा वन विभाग द्वारा घड़ियालों को बचाने पर नकद इनाम की घोषणा

ओडिशा ने घड़ियाल, जोकि एक गंभीर रूप से लुप्तप्राय मगरमच्छ प्रजाति है, को बचाने और वन्यजीव कर्मियों को सूचित करने के लिए 1,000 रुपये के नकद इनाम की घोषणा की है।

साथ ही, घड़ियालों की वजह से जिन मछुआरों के जाल नष्ट हो जाते हैं, उनके लिए ओडिशा सरकार मुआवजा भी प्रदान करेगी।

प्रमुख तथ्य:

  • घड़ियाल को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची 1 में सूचीबद्ध किया गया है और अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में घोर-संकटग्रस्त (Critically Endangered) के रूप से शामिल है।
  • घड़ियाल, खारे पानी में पाए जाने वाले मगरमच्छों और मगरों की तुलना में आनुवंशिक रूप से कमजोर होते हैं।

केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा भारतीय रेल को 5 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम को मंजूरी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय रेल को स्टेशन परिसर एवं रेलगाड़ियों में सार्वजनिक बचाव व सुरक्षा सेवाओं के लिए 700 मेगाहर्ट्ज फ्रीक्वेंसी बैंड में 5 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम के आवंटन संबंधी प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

लाभ:

  • इस स्पेक्ट्रम के माध्यम से भारतीय रेल ने अपने मार्ग पर ‘लॉन्ग टर्म इवोल्यूशन’ अर्थात एलटीई (Long-Term EvolutionLTE) आधारित मोबाइल ट्रेन रेडियो संचार प्रदान करने की परिकल्पना की है।
  • इसका उपयोग आधुनिक सिग्नलिंग और ट्रेन सुरक्षा प्रणालियों के लिए किया जाएगा तथा लोको पायलटों व गार्डों के बीच निर्बाध संचार सुनिश्चित करने के लिए किया जाएगा।
  • यह इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित रिमोट ऐसेट मॉनिटरिंग विशेष रूप से कोच, वैगन व लोको की निगरानी और ट्रेन के डिब्बों में सीसीटीवी कैमरों की लाइव वीडियो फीड, ट्रेन के सुरक्षित एवं तेज संचालन को सुनिश्चित करने में सक्षम करेगा।
  • LTE (लॉन्ग-टर्म इवोल्यूशन) चौथी पीढ़ी का (4G) वायरलेस मानक है जो तीसरी पीढ़ी (3G) तकनीक की तुलना में सेलफोन और अन्य सेलुलर उपकरणों के लिए बढ़ी हुई नेटवर्क क्षमता और गति प्रदान करता है।

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