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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 10 June 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. निर्वाचन आयुक्त

2. केरल का स्मार्ट किचन प्रोजेक्ट

3. क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2022

4. वैक्सीन राष्ट्रवाद

 

सामान्य अध्ययन-III

1. धान, दलहन, तिलहन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की घोषणा

2. अल सल्वाडोर में बिटकॉइन को कानूनी मान्यता

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. अड्डू प्रवालद्वीप

2. अर्गोस्टेम्मा क्वारंटेना

3. नागोर्नो-काराबाख़ क्षेत्र

4. इंडो-थाई कॉर्पेट

5. दिहिंग पटकाई

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

निर्वाचन आयुक्त


(Election Commissioner)

संदर्भ:

हाल ही में, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव अनूप चंद्र पांडे को नया ‘निर्वाचन आयुक्त’ (Election Commissioner) नियुक्त किया गया है।

पांडे की नियुक्ति से तीन सदस्यीय आयोग के रूप में ‘निर्वाचन- दल’ की पूर्ण शक्ति बहाल हो जाएगी।

भारत निर्वाचन आयोग के बारे में:

‘भारत निर्वाचन आयोग’ (Election commission of India- ECI) एक स्‍वायत्त संवैधानिक प्राधिकरण है जो भारत में संघ एवं राज्‍य निर्वाचन प्रक्रियाओं का संचालन करने के लिए उत्तरदायी है।

  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत, संसद, राज्य विधानमंडल, राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचन के लिए संचालन, निर्देशन व नियंत्रण तथा निर्वाचक मतदाता सूची तैयार कराने के लिए निर्वाचन आयोग का प्रावधान किया गया है।
  • संविधान के अनुसार निर्वाचन आयोग की स्थापना , 25 जनवरी 1950 को की गई थी। इसीलिए, 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारत निर्वाचन आयोग की संरचना

संविधान में चुनाव आयोग की संरचना के संबंध में निम्नलिखित उपबंध किये गए हैं:

  1. निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य आयुक्तों से मिलकर बना होता है
  2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी
  3. जब कोई अन्य निर्वाचन आयुक्त इस प्रकार नियुक्त किया जाता है तो मुख्य निर्वाचन आयुक्त निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा।
  4. राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग की सहायता के लिए आवश्यक समझने पर, निर्वाचन आयोग की सलाह से प्रादेशिक आयुक्तों की नियुक्ति कर सकता है।
  5. निर्वाचन आयुक्तों और प्रादेशिक आयुक्तों की सेवा शर्तें तथा पदावधि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जायेंगी।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (EC):

यद्यपि मुख्य निर्वाचन आयुक्त, निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष होते हैं, फिर भी उनकी शक्तियाँ अन्य निर्वाचन आयुक्तों के सामान ही होती हैं। आयोग के सभी मामले, सदस्यों के बीच बहुमत से तय किए जाते हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य दोनो निर्वाचन आयुक्तों को एक-समान वेतन, भत्ते व अन्य अनुलाभ प्राप्त होते हैं।

पदावधि:

मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल छह वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, तक होता है। वे राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए किसी भी समय त्यागपत्र दे सकते हैं।

पदत्याग:

  • निर्वाचन आयुक्त, किसी भी समय त्यागपत्र दे सकते हैं या उन्हें कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व भी हटाया जा सकता है।
  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से व उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाया जाता है।

सीमाएं:

  • संविधान में, निर्वाचन आयोग के सदस्यों के लिए कोई योग्यता (कानूनी, शैक्षिक, प्रशासनिक या न्यायिक) निर्धारित नहीं की गई है।
  • संविधान में, सेवानिवृत्त होने वाले निर्वाचन आयुक्तों को सरकार द्वारा, दोबारा किसी भी पद पर की जाने वाली नियुक्ति से प्रतिबंधित नहीं किया गया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि 26 नवंबर 1949 को संविधान के कौन से प्रावधान लागू हुए थे? यहां पढ़ें, 

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 243 तथा अनुच्छेद 324 में अंतर
  2. राज्य निर्वाचन आयोगों तथा भारत निर्वाचन आयोग की शक्तियों में समानताएं और अंतर
  3. निर्वाचन आयोगों के फैसलों के खिलाफ अपील
  4. संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव तथा स्थानीय निकाय चुनाव में भिन्नता

मेंस लिंक:

क्या भारत में राज्य निर्वाचन आयोग, भारत निर्वाचन आयोग की भांति स्वतंत्र हैं? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

 केरल का ‘स्मार्ट किचन प्रोजेक्ट’


संदर्भ:

केरल सरकार द्वारा एक ‘स्मार्ट किचन प्रोजेक्ट’ (Smart Kitchen project) शुरू करने की घोषणा की गई है। इस योजना का उद्देश्य रसोई-घरों का आधुनिकीकरण करना तथा घरेलू काम-काज में गृहणियों के सामने आने वाली कठिनाईयों को कम करना है।

योजना के बारे में:

  • इस योजना का कार्यान्वयन, एक राज्य द्वारा संचालित चिट-फंड एवं ऋण-दाता फर्म ‘केरल राज्य वित्तीय उद्यम’ (KSFE) द्वारा किया जाएगा।
  • इस योजना के तहत, KSFE द्वारा घरेलू गैजेट या उपकरण खरीदने हेतु सभी वर्गो की महिलाओं लिए सुलभ ऋण (Soft Loans) उपलब्ध कराया जाएगा।
  • इस ऋण/लागत पर लगने वाले ब्याज को लाभार्थी, स्थानीय स्वशासी निकाय और राज्य सरकार के मध्य समान रूप से साझा किया जाएगा।

योजना की आवश्यकता / महत्व:

  • जेंडर बजटिंग (Gender budgeting): सरकार का मानना है कि श्रम में महिलाओं की बेहतर भागीदारी के लिए, इन पर पड़ने वाले घर के कामों के बोझ को कम करना होगा।
  • महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना: रसोई में मशीनीकरण बढ़ाकर, श्रम में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाया जा सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

जेंडर बजट स्टेटमेंट (GBS) को पहली बार 2005-06 में भारतीय बजट में पेश किया गया था। इसके बारे में यहाँ और पढ़ें,

 

इंस्टालिंक्स:

‘स्मार्ट किचन योजना’ की मुख्य विशेषताएं और महत्व।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2022


(QS World University Rankings)

संदर्भ:

अग्रणी वैश्विक उच्च शिक्षा विश्लेषक ‘क्यूएस (क्वाक्वेरेली साइमंड्स)’ अर्थात (QS – Quacquarelli Symonds) द्वारा विश्व की अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय रैंकिंग का 18 वां संस्करण जारी किया गया है।

‘क्वाक्वेरेली साइमंड्स’ (QS) एकमात्र अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग है जिसे ‘अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग विशेषज्ञ समूह’ (IREG) का अनुमोदन प्राप्त है।

विश्व के शीर्ष तीन संस्थान:

  1. मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने लगातार 10 वें साल शीर्ष स्थान हासिल किया है।
  2. वर्ष 2006 के बाद पहली बार ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने दूसरा स्थान हासिल किया है।
  3. स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय को संयुक्त रूप से तीसरा स्थान हासिल हुआ है।

भारतीय संस्थानों का प्रदर्शन:

  1. भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे और आईआईटी दिल्ली, शीर्ष-200 रैंक में स्थान हासिल करने वाले भारत के तीन विश्वविद्यालय बने रहे।
  2. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में पहली बार जगह हासिल की है, और इसे 561-570 बैंड में रखा गया है।
  3. भारत के 35 विश्वविद्यालयों में से सत्रह ने CPF स्कोर में बढ़त हासिल की है, जबकि 12 विश्वविद्यालयों का प्रदर्शन इस संकेतक में गिरा है।
  4. चुनौतियां: हालांकि, भारतीय विश्वविद्यालय क्यूएस के ‘संस्थागत शिक्षण क्षमता’ मापदंड में संघर्ष करना पड़ रहा है। भारत के 35 विश्वविद्यालयों में से तेईस विश्वविद्यालयों की ‘संकाय/छात्र अनुपात संकेतक’ में गिरावट हुई है, और मात्र छह विश्वविद्यालयों ने इस संकेतक में सुधार किया है।
  5. संकाय/छात्र अनुपात’ श्रेणी में कोई भी भारतीय विश्वविद्यालय ‘शीर्ष 250 में शामिल नहीं है।

विश्वविद्यालयों की रैंकिंग किस प्रकार की जाती है?

निम्नलिखित छह संकेतकों के आधार पर संस्थानों की रैंकिंग निर्धारित की जाती है:

  1. शैक्षणिक प्रतिष्ठा (Academic Reputation)
  2. नियोक्ता की प्रतिष्ठा (Employer Reputation)
  3. संकाय-छात्र अनुपात (Faculty-Student Ratio)-
  4. प्रकाशित शोध / संकाय (Citations per faculty)
  5. अंतर्राष्ट्रीय छात्रों का अनुपात (Proportion of International Students)
  6. अंतर्राष्ट्रीय संकाय अनुपात (Proportion of International Faculty)

 

इंस्टा जिज्ञासु:

राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (National Institutional Ranking Framework- NIRF), देश भर के शिक्षण संस्थानों को रैंकिंग करने हेतु एक प्रक्रिया रूपरेखा तैयार करता है। NIRF के बारे में यहां और पढ़ें,

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारतीय संस्थानों का प्रदर्शन
  2. इंस्टिट्यूट ऑफ़ एमिनेंस योजना कब शुरू की गई थी?
  3. दुनिया भर में शीर्ष 3 संस्थान
  4. संस्थानों की रैंकिंग करने हेतु प्रयुक्त 6 संकेतकों के नाम बताइए

मेंस लिंक:

इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस योजना के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

 ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’


(Vaccine nationalism)

संदर्भ:

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के निर्वाचित अध्यक्ष और मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद ने वैक्सीन राष्ट्रवाद (Vaccine nationalism) के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा है, कि इससे महामारी को मिटाने के लिए विभिन्न देशों द्वारा किये जा रहे प्रयासों को बरबाद कर देगा और “हर कीमत पर” इसे टाला जाना चाहिए।

उन्होंने, विकसित देशों और शेष विश्व के ‘टीकाकरण कवरेज’ में असमानता को “अस्वीकार्य” बताया।

वैक्सीन राष्ट्रवाद क्या है?

  • जब कोई देश, किसी वैक्सीन की खुराक को अन्य देशों को उपलब्ध कराने से पहले अपने देश के नागरिकों या निवासियों के लिए सुरक्षित कर लेता है, तो इसे वैक्सीन राष्ट्रवाद (Vaccine Nationalism) कहा जाता है।
  • इसे, सरकार और वैक्सीन निर्माता के बीच खरीद-पूर्व समझौता करने के माध्यम से किया जाता है।

अतीत में इसका उपयोग:

वैक्सीन राष्ट्रवाद नयी अवधारणा नहीं है। वर्ष 2009 में फ़ैली H1N1 फ्लू महामारी के आरंभिक चरणों में विश्व के धनी देशों द्वारा H1N1 वैक्सीन निर्माता कंपनियों से खरीद-पूर्व समझौते किये गए थे।

  • उस समय, यह अनुमान लगाया गया था कि, अच्छी परिस्थितियों में, वैश्विक स्तर पर वैक्सीन की अधिकतम दो बिलियन खुराकों का उत्पादन किया जा सकता है।
  • अमेरिका ने समझौता करके अकेले 600,000 खुराक खरीदने का अधिकार प्राप्त कर लिया। और, जिन देशों द्वारा इस वैक्सीन के लिए खरीद-पूर्व समझौता किया गया, वे सभी विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देश थे।

संबंधित चिंताएँ:

  1. वैक्सीन राष्ट्रवाद, किसी बीमारी की वैक्सीन हेतु सभी देशों की समान पहुंच के लिए हानिकारक है।
  2. यह अल्प संसाधनों तथा मोल-भाव की शक्ति न रखने वाले देशों के लिए अधिक नुकसान पहुंचाता है।
  3. यह विश्व के दक्षिणी भागों में आबादी को समय पर महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य-वस्तुओं की पहुंच से वंचित करता है।
  4. वैक्सीन राष्ट्रवाद, चरमावस्था में, विकासशील देशों की उच्च-जोखिम आबादी के स्थान पर धनी देशों में सामान्य-जोखिम वाली आबादी को वैक्सीन उपलब्ध करता है।

इसके लिए सुझाव:

  • निष्पक्षता के लिए, भूगोल और भू-राजनीति पर ध्यान दिए बिना, वैक्सीन की खरीदने की क्षमता तथा वैश्विक आबादी की वैक्सीन तक पहुच, दोनों अपरिहार्य होते है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के दौरान टीकों के समान वितरण हेतु फ्रेमवर्क तैयार करने तथा आने वाली किसी महामारी से पहले वैश्विक स्तर पर समझौता वार्ताओं का समन्वय करना चाहिए।

इसका समाधान:

वैक्सीन डिप्लोमेसी: वैक्सीन डिप्लोमेसी, वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति की वह शाखा है, जिसमें एक राष्ट्र अन्य देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए टीकों के विकास या वितरण का उपयोग करता है।

भारत की वैक्सीन कूटनीति:

(India’s vaccine diplomacy)

  • भारत, पहले ही कई देशों को महामारी से निपटने में मदद करने के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, रेमेडिसविर और पैरासिटामोल टैबलेट के साथ-साथ डायग्नोस्टिक किट, वेंटिलेटर, मास्क, दस्ताने और अन्य चिकित्सा सामग्रियों की आपूर्ति कर चुका है।
  • भारत के द्वारा, पड़ोसी देशों के लिए क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण कार्यशालाएं भी आयोजित की गई हैं।

हालांकि, केंद्र ने इस साल अप्रैल में, इन सामग्रियों के निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगाए थे, जिसकी वजह से, विकासशील मित्र देशों को टीकों की मुफ्त आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय COVAX कार्यक्रम के तहत निम्न आय वाले देशों को टीकों की आपूर्ति में पर्याप्त योगदान से अर्जित अच्छी साख को नुकसान पहुँच सकता है।

 

इंस्टालिंक्स:

क्या आपने ‘हर्ड इम्युनिटी’ के बारे में सुना है? इसके क्या लाभ हैं? यहां पढ़ें, 

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. वैक्सीन राष्ट्रवाद क्या है?
  2. COVID 19 रोग के उपचार में किन दवाओं का उपयोग किया जा रहा है?
  3. SARS- COV 2 का पता लगाने के लिए विभिन्न परीक्षण।
  1. H1N1 क्या है?

मेंस लिंक:

वैक्सीन राष्ट्रवाद क्या है? इससे संबंधित चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।

धान, दलहन, तिलहन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की घोषणा


संदर्भ:

केंद्र सरकार द्वारा साधारण धान, दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों के लिए ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (Minimum Support Price- MSP) में बढ़ोतरी की घोषणा की गई है।

हाल ही में, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Economic AffairsCCEA) द्वारा यह निर्णय लिया गया।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) क्या होता है?

‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (Minimum Support Prices -MSPs), किसी भी फसल का वह ‘न्यूनतम मूल्य’ होता है, जिस पर सरकार किसानों से फसल खरीदती है, और इसकी गणना, किसानों की उत्पादन लागत के कम से कम डेढ़ गुना कीमत, के आधार पर की जाती है।

  • 2018-19 के केंद्रीय बजट में की गई घोषणा के अनुसार, MSP को उत्पादन लागत के डेढ़ गुना के बराबर रखा जाएगा।
  • ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) का निर्धारण ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ (Commission for Agricultural Costs and PricesCACP) की संस्तुति पर, एक वर्ष में दो बार किया जाता है।
  • कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ (CACP) एक वैधानिक निकाय है, जो खरीफ और रबी मौसम के लिए कीमतों की सिफारिश करने वाली अलग-अलग रिपोर्ट तैयार करता है।

MSP निर्धारित करने में शामिल की जाने वाली उत्पादन लागतें: 

‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) का निर्धारण करते समय, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP), ‘A2+FL’ तथा ‘C2’ लागत, दोनों को ध्यान में रखता है।

  1. A2’ लागत में कि‍सान द्वारा सीधे नकद रूप में और बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन, सिंचाई आदि पर किये गए सभी तरह के भुगतान को शामिल किया जाता है।
  2. A2+FL’ में ‘A2’ सहित अतिरिक्त अवैतनिक पारिवारिक श्रम का एक अनुमानित मूल्य शामिल किया जाता है।
  3. C2 लागत में, कुल नगद लागत और किसान के पारिवारिक पारिश्रामिक (A2+FL) के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है।

MSP की सीमाएं:

  1. ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) के साथ प्रमुख समस्या गेहूं और चावल को छोड़कर अन्य सभी फसलों की खरीद के लिए सरकारी मशीनरी की कमी है। गेहूं और चावल की खरीद ‘भारतीय खाद्य निगम’ (FCI) के द्वारा ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली’ (PDS) के तहत नियमित रूप से की जाती है।
  2. चूंकि राज्य सरकारों द्वारा अंतिम रूप से अनाज की खरीद की जाती है और जिन राज्यों में अनाज की खरीद पूरी तरह से सरकार द्वारा की जाती हैं, वहां के किसानो को अधिक लाभ होता है। जबकि कम खरीद करने वाले राज्यों के किसान अक्सर नुकसान में रहते हैं।
  3. MSP-आधारित खरीद प्रणाली बिचौलियों, कमीशन एजेंटों और APMC अधिकारियों पर भी निर्भर होती है, और छोटे किसानों के लिए इन तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।

 

इंस्टालिंक्स:

किसानों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन के मूल में मुख्यतः दो कारण हैं: पहला, किसानों को भय है, कि निजी मंडियों के आने के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू नहीं किया जाएगा; तथा दूसरा, कृषि उत्पाद विपणन समिति (APMC) अधिनियम में संशोधन।

‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) के लिए वैधानिक समर्थन की आवश्यकता क्यों है? यहां पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. CCEA की संरचना।
  2. CACP क्या है?
  3. MSP योजना में कितनी फसलें शामिल हैं?
  4. MSP की घोषणा कौन करता है?
  5. खरीफ और रबी फसलों के बीच अंतर

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

 अल सल्वाडोर में बिटकॉइन को कानूनी मान्यता


संदर्भ:

मध्य अमेरिका का एक छोटा सा तटीय देश ‘अल साल्वाडोर’, बिटकॉइन (Bitcoin) को कानूनी मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है।

इस निर्णय के पीछे तर्क:

अल साल्वाडोर, विभिन्न देशों में काम करने वाले से सल्वाडोरियों द्वारा देश में भेजे जाने वाले धन पर (Remittances) काफी निर्भर है, और इस राशि का देश की कुल जीडीपी में 20% से अधिक योगदान होता है। परन्तु, इस राशि का अधिकांश भाग बिचौलियों को चला जाता है।

  • बिटकॉइन के माध्यम से, एक मिलियन से अधिक निम्न आय वाले परिवारों को प्राप्त होने वाली राशि में हर साल अरबों डॉलर के बराबर वृद्धि होगी।
  • इसके अलावा, अल साल्वाडोर में 70% आबादी के पास बैंक खाता नहीं है और यह अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर निर्भर रहती है, ऐसे में बिटकॉइन, देश में वित्तीय समावेशन को बढ़ाने में मदद करेगा।

कृपया ध्यान दें:

वर्ष 2001 में अल सल्वाडोर की दक्षिणपंथी सरकार ने अमेरिकी डॉलर को देश आधिकारिक मुद्रा बना दिया था, उस समय से अल सल्वाडोर की अपनी मौद्रिक नीति नहीं है। अल सल्वाडोर, वर्तमान में इक्वाडोर और पनामा सहित लैटिन अमेरिका के उन तीन देशों में से एक है, जहाँ ‘डॉलर-अर्थव्यवस्था’ का प्रयोग किया जाता है।

इस कदम की आलोचना:

किसी ‘केंद्रीय नियामक प्राधिकरण’ की अनुपस्थिति में बिटकॉइन को वैध घोषित करने से धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग, उच्च ऊर्जा लागत और अत्यधिक अस्थिरता की संभावना होगी।

क्या वैश्विक स्तर पर आभासी मुद्राओं को अपनाने हेतु कोई पहल की जा रही है:

विश्व के कई भाग, आर्थिक अनिश्चितताओं से ग्रसित हैं, और इन हिस्सों में  क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। क्यूबा, वेनेजुएला और मैक्सिको जैसे कई देशों में, विकेंद्रीकृत और अनियमित आभासी टोकन को पसंद किया जा रहा है।

इस प्रकार का वैधीकरण भारत में क्यों प्रभावी नहीं हो सकता है?

  • अल सल्वाडोर की अपनी कोई मौद्रिक नीति नहीं है और उसके पास संरक्षण करने हेतु कोई ‘स्थानीय मुद्रा’ भी नहीं है। वह अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति पर चलता है। अतः, फेडरल रिजर्व की नीतियों में कोई भी बदलाव, निश्चित रूप से देश को प्रभावित करेगा। इसलिए अल सल्वाडोर इस प्रकार के विकल्पों पर विचार कर रहा है।
  • लेकिन, भारत के साथ ऐसा नहीं है। भारत की अपनी मुद्रा और एक केंद्रीय बैंक है। इसलिए बिटकॉइन और रुपये का साथ-साथ प्रचालन मुश्किल है।

क्रिप्टोकरेंसी पर भारत की प्रतिक्रिया:

भारत में, सरकार द्वारा ‘क्रिप्टोकरेंसी एवं आधिकारिक डिजिटल मुद्रा विनियमन विधेयक’, 2021 (Cryptocurrency and Regulation of Official Digital Currency Bill, 2021) तैयार किया गया है।

  • इसके द्वारा सभी प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसीज पर प्रतिबंध लगाने तथा ‘ऑफिशियल डिजिटल करेंसी’ जारी करने हेतु एक नियामक ढांचा तैयार किए जाने का प्रावधान किया गया है।
  • यह विधेयक, इस साल की शुरुआत में संसद के बजट सत्र में पेश किया जाना था, लेकिन सरकार द्वारा हितधारकों के साथ इस पर चर्चा जारी रहने की वजह से इसे रोक दिया गया था।

निष्कर्ष:

अल सल्वाडोर प्रकरण से भारत के लिए समग्र निष्कर्ष- यह इस बात का उदाहरण हो सकता है, कि इस उभरते हुए क्षेत्र में संलग्न नवप्रवर्तकों और उद्यमियों को आकर्षित करने के लिए देश किस हद तक जाने को तैयार हैं। भारत के पास इस धन की माइनिंग हेतु काफी संभावनाएं है और इसे किसी विशिष्ट नीति के अंतर्गत नहीं लाया गया है।

हालांकि. भारत में क्रिप्टोकरेंसी के विषय में मौद्रिक और वित्तीय नियमों पर विचार-विमर्श जारी है, फिर भी, इस क्षेत्र में प्रमुख नवाचारों पर काम कर रहे भारत के डेवलपर्स के लिए प्रोत्साहन पर ध्यान दिया जाना महत्वपूर्ण है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि बिटकॉइन ब्लॉकचेन तकनीक पर कार्य करता है? यहां पढ़ें, 

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विभिन्न क्रिप्टोकरेंसी
  2. विभिन्न देशों द्वारा शुरू की गई क्रिप्टोकरेंसी
  3. ब्लॉकचेन तकनीक क्या है?

मेंस लिंक:

क्रिप्टोकरेंसी क्या हैं? इनके विनियमन की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


अड्डू प्रवालद्वीप

(Addu Atoll)

मालदीव में अवस्थित है।

हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक स्थिति के अलावा, अड्डू द्वीपसमूह का दूसरा सबसे बड़ा शहर है, और इसकी आबादी 30,000 से अधिक है।

चर्चा का कारण:

राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने हाल ही में कहा है, कि मालदीव ने अपने दक्षिणी अड्डू प्रवालद्वीप/ ऐटॉल में भारतीय वाणिज्य दूतावास खोलने पर कोई निर्णय नहीं लिया है।

अर्गोस्टेम्मा क्वारंटेना

(Argostemma quarantena)

  • यह कहवा / कॉफी परिवार से संबंधित पौधों की एक नई प्रजाति है।
  • हाल ही में, इसे केरल की वागामोन पहाड़ियों (Wagamon Hills) में देखा गया था।
  • महामारी में मारे गए लाखों लोगों की स्मृति में इसको ‘अर्गोस्टेम्मा क्वारंटेना’ नाम दिया गया है।

नागोर्नो-काराबाख़ क्षेत्र

(Nagorno-Karabakh region)

नागोर्नो-काराबाख़ क्षेत्र को आर्त्शाख़ (Artsakh) नाम से भी जाना जाता है। यह काराबाख़ पर्वत श्रेणी में स्थित दक्षिण काकेशस का स्थलरुद्ध क्षेत्र है।

  • यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अज़रबैजान के हिस्से के रूप में मान्यता प्राप्त है, लेकिन इसकी आबादी बहुसंख्यक अर्मेनियाई है।
  • 1980 के दशक में सोवियत संघ के घटक गणराज्यों में बढ़ते तनाव के दौरान, नागोर्नो-काराबाख़ क्षेत्र के लोगों द्वारा आर्मेनिया में शामिल होने के लिए मतदान किया था, जिसके बाद युद्ध छिड़ गया और 1994 में युद्ध विराम के साथ इसका अंत हुआ।

चर्चा का कारण:

पिछले साल विवादित नागोर्नो-काराबाख़ में आर्मेनिया द्वारा फिर से कब्जा किए गए क्षेत्र में एक संक्षिप्त युद्ध हुआ था।

  • अज़रबैजान ने तुर्की के लड़ाकू ड्रोन और अंकारा से प्राप्त अन्य हथियारों की मदद से अलगाववादी आर्मेनिया क्षेत्र में अपने क्षेत्रों को वापस अपने कब्जे में ले लिया।
  • इस लड़ाई में 6,000 लोग मारे गए, और इसका अंत नवंबर में रूस की मध्यस्था से संघर्ष विराम के साथ हुआ। इस लड़ाई के परिणामस्वरूप, अर्मेनियाई लोगों द्वारा 1990 के दशक में सोवियत संघ के भंग हूने के बाद हुए युद्ध में जीते गए क्षेत्रों से इन्हें बाहर कर दिया गया।

इंडो-थाई कॉर्पेट

(Indo-Thai CORPAT)

भारतीय नौसेना और रॉयल थाई नौसेना के बीच ‘भारत-थाईलैंड समन्वित गश्त’ अर्थात ‘इंडो-थाई कॉर्पेट’ (India-Thailand Coordinated Patrol : Indo-Thai CORPAT) का 31 वां संस्करण आयोजित किया जा रहा है।

दिहिंग पटकाई

(Dihing Patkai)

दिहिंग पटकाई, असम का 7वां राष्ट्रीय उद्यान है।

  • असम में अब मध्य प्रदेश के 12 और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के नौ राष्ट्रीय उद्यानों के बाद सबसे अधिक राष्ट्रीय उद्यान है।
  • इसमें बाघ और क्लाउडड तेंदुए सहित सरीसृप और स्तनधारियों की 47 प्रजातियां पाई जाती हैं।
  • असम में राष्ट्रीय उद्यान: काजीरंगा, मानस, नामेरी, ओरंग, डिब्रू-सैखोवा, रायमोना राष्ट्रीय उद्यान और दिहिंग पटकाई। काजीरंगा और मानस को यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल दर्जा प्राप्त है और नामेरी तथा ओरंग राष्ट्रीय उद्यानों के साथ ये टाइगर रिजर्व भी हैं।
  • रायमोना राष्ट्रीय उद्यान, पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व के पश्चिम में स्थित है तथा उत्तर में भूटान के फिप्सू वन्यजीव अभयारण्य और पूर्व में मानस राष्ट्रीय उद्यान के साथ जुड़ा हुआ है।

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