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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 04 June 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-II

1. उत्तरदायित्व को लेकर क्षतिपूर्ति से सुरक्षा

2. सेवानिवृत्त अधिकारियों को नियोजित करने के लिए मानदंड

3. ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ के तहत भुगतान हेतु जाति श्रेणियां

4. भारत के मतदान में भाग नहीं लेने पर फ़िलिस्तीन द्वारा कड़ी आलोचना

 

सामान्य अध्ययन-III

1. नासा द्वारा शुक्र ग्रह पर भेजे जाने वाले दो नए मिशन की घोषणा

2. आठवां वैश्विक नाइट्रोजन सम्मेलन

3. श्रीलंका, डूबने वाले मालवाहक जहाज से तेल रिसाव के लिए तैयार

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

 उत्तरदायित्व को लेकर क्षतिपूर्ति से सुरक्षा


(Indemnity from liability)

संदर्भ:

देश में वैक्सीन संकट की तीक्ष्ण स्थिति को देखते हुए, भारत द्वारा ‘फाइजर’ और ‘मॉर्डर्ना’ सहित अन्य विदेशी वैक्सीन निर्माताओं को ‘क्षतिपूर्ति से सुरक्षा’ (Indemnity) दिए जाने की संभावना है। इससे इन विदेश-निर्मित टीकों का भारत में आना सुगम हो जाएगा।

अब, सीरम इंस्टीट्यूट भी, ‘उत्तरदायित्व को लेकर क्षतिपूर्ति से सुरक्षा’ (Indemnity from liability) की मांग करने वाली फार्मा कंपनियों में शामिल हो गई है। इसका कहना है, कि सभी वैक्सीन निर्माताओं, चाहे भारतीय हों या विदेशी, को किसी भी गंभीर दुष्प्रभाव होने पर ‘कानूनी मुकदमों’ से सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

‘क्षतिपूर्ति शर्त’ (Indemnity Clause) के बारे में:

सरल शब्दों में, क्षतिपूर्ति (Indemnity) का अर्थ, किसी नुकसान की स्थिति में अथवा वित्तीय तनाव के विरुद्ध प्रदान की जाने वाली सुरक्षा होता है।

  • कानूनी भाषा में, इसका अर्थ, किसी एक पक्ष द्वारा, उसकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई, दूसरे पक्ष के लिए करना उसका संविदात्मक दायित्व होता है।
  • यह शर्त, आमतौर पर बीमा अनुबंधों में प्रयोग की जाती है।

भारत के मामले में, यदि सरकार विदेशी टीका निर्माताओं को देश में अपनी वैक्सीन शुरू करने के लिए क्षतिपूर्ति सुरक्षा देती है, तो टीका लेने के बाद किसी तरह की शिकायत करने वाले नागरिकों को क्षतिपूर्ति करने का दायित्व सरकार का होगा, न कि वैक्सीन निर्माता का।

ब्रिजिंग ट्रायलक्या हैं?

‘ब्रिजिंग ट्रायल’ (Bridging trial) स्थानीय स्तर पर किए जाने वाले कृत नैदानिक परीक्षण होते हैं। किसी विदेशी वैक्सीन या दवाई को देश में आम जनता को दिए जाने से पहले, स्थानीय लोगों पर इनके प्रभाव संबंधी आकड़ों को प्राप्त करने के लिए ‘ब्रिजिंग ट्रायल’ किए जाते हैं।

  • ये परीक्षण दवा/वैक्सीन से संबंधित प्रभावकारिता और संभावित दुष्प्रभावों का पता लगाने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
  • क्षतिपूर्ति शर्त पर मंजूरी के अलावा, फाइजर और मॉडर्ना सहित विदेशी टीका निर्माताओं ने अपने टीकों को अनुमोदन मिलने के बाद ‘ब्रिजिंग ट्रायल’ की अनिवार्यता से छूट दिए जाने की मांग भी की गई है।

क्षतिपूरण के लिए अपवाद:

क्षतिपूरण (indemnification) हेतु कई सामान्य अपवाद हैं।

क्षतिपूर्ति प्रावधान के तहत उन दावों या हानियों के लिए क्षतिपूर्ति दिए जाने की सूची से बाहर किया जा सकता है, जो क्षतिपूर्ति प्राप्त करने वाले पक्ष के निम्नलिखित कार्यों की वजह से होते हैं:

  1. लापरवाही या घोर लापरवाही।
  2. उत्पादों का अनुचित तरीके से उपयोग।
  3. समझौते में अपने दायित्वों का पालन करने में विफलता।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

  1. क्षतिपूर्ति का दावा अनुबंध का उल्लंघन होने से पहले भी किया जा सकता है, जबकि नुकसान का दावा (damages claim) अनुबंध के उल्लंघन के बाद ही किया जा सकता है। इसके बारे में और पढ़ें,
  2. क्या आप जानते हैं कि WHO ने Covax गठबंधन के माध्यम से कोविड-19 टीकों के लिए एक ‘नो फॉल्ट क्षतिपूर्ति कार्यक्रम’ शुरू किया है? यहां पढ़ें, 

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क्षतिपूर्ति शर्त क्या है?
  1. इसका प्रयोग प्रायः कहाँ किया जाता है?
  2. शर्त के लाभ।
  3. भारत में आयात किए जा रहे महत्वपूर्ण टीके।

मेंस लिंक:

क्षतिपूर्ति शर्त के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

 सेवानिवृत्त अधिकारियों को नियोजित करने के लिए मानदंड


संदर्भ:

केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission – CVC) द्वारा संविदा या परामर्श के आधार पर किसी सेवानिवृत्त अधिकारी को नियुक्त करने से पहले सतर्कता मंजूरी प्राप्त करने हेतु सरकारी संस्थाओं द्वारा अपनाई जाने वाली एक निश्चित प्रक्रिया निर्धारित की गई है।

प्रक्रिया के अनुसार:

  • प्रयोज्यता: केंद्र सरकार के सेवानिवृत्त अखिल भारतीय सेवाओं और समूह ए अधिकारियों या केंद्र के स्वामित्व या नियंत्रण वाले अन्य संगठनों में, इन अधिकारियों के समकक्षों को रोजगार देने से पहले, नियोक्ता संस्थाओं द्वारा, जिन संस्थानों से अधिकारी सेवानिवृत्त हुए थे, वहां से सतर्कता मंजूरी प्राप्त की जानी चाहिए।,
  • यदि कोई सेवानिवृत्त अधिकारी एक से अधिक संगठनों में कार्य कर चुका है, तो उसके सेवानिवृत्ति होने के पहले 10 वर्षों में तैनाती वाले सभी संस्थानों से सतर्कता मंजूरी प्राप्त करनी होगी।
  • अनापत्ति मंजूरी मांगने से संबंधित संप्रेषण की एक प्रति CVC को भी भेजी जानी चाहिए। यदि स्पीड पोस्ट द्वारा संप्रेषण भेजने के 15 दिनों के भीतर पूर्व नियोक्ता (ओं) से कोई उत्तर प्राप्त नहीं होता है, तो एक अनुस्मारक भेजा जा सकता है। यदि 21 दिनों के भीतर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है, तो सतर्कता मंजूरी को स्वीकृत समझा जाएगा।
  • यदि कोई कर्मचारी सतर्कता से संबंधित किसी मामले में लिप्त पाया जाता है या सतर्कता की दृष्टि से उसे सही घोषित नहीं किया जाता है, तो इसके द्वारा किये जाने वाले सभी परिणामी कार्यों के लिए पूर्ववर्ती नियोक्ता संस्था जिम्मेदार होगी।

इन नियमों की आवश्यकता:

  • ‘एक समान प्रक्रिया’ के अभाव में कभी-कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसमे दागी अतीत वाले अधिकारी या जिनके खिलाफ मामले लंबित होते हैं, उन्हें सेवा में नियोजित कर लिया जाता है।
  • ऐसी स्थिति से अनावश्यक शिकायतों/पक्षपात के आरोपों संबंधी मामले पैदा होते हैं, इसके अलावा ये स्थिति सरकारी संगठनों के कामकाज को नियंत्रित करने वाले, निष्पक्षता और ईमानदारी के मूल सिद्धांतों के खिलाफ भी होती है।

केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के बारे में:

  • ‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ (Central Vigilance Commission- CVC) की स्थापना, फरवरी, 1964 में सरकार द्वारा के. संथानम की अध्‍यक्षता वाली भ्रष्टाचार निवारण समिति की सिफारिशों के आधार पर की गई थी।
  • वर्ष 2003 में, संसद द्वारा ‘केन्‍द्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम’ पारित किया गया, जिसके तहत ‘केन्‍द्रीय सतर्कता आयोग’ को वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
  • ‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ (CVC), किसी मंत्रालय अथवा विभाग के अधीन कार्य नहीं करता है। अपितु, यह एक स्वतंत्र निकाय है तथा केवल संसद के प्रति उत्तरदायी होता है।
  • यह अपनी रिपोर्ट सीधे ‘भारत के राष्ट्रपति’ को सौंपता है। यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अंतर्गत आने वाले अपराधों की जांच से संबंधित मामलों पर ‘दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना’ (CBI) के कामकाज का अधीक्षण का करता है।

‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ के बारे में और अधिक पढ़ें- INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 30 October – INSIGHTSIAS (insightsonindia.com)

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, अनुच्छेद-319, UPSC के सदस्यों के सेवानिवृत्त होने के बाद कोई पद धारण करने पर रोक लगाता है? यहां पढ़ें,

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के बारे में
  2. नियुक्ति
  3. पद-मुक्ति
  4. शक्तियाँ और कार्य
  5. रिपोर्ट
  6. सेवानिवृत्त शासकीय अधिकारियों की नियुक्ति के संबंध में नवीनतम दिशा-निर्देश।

मेंस लिंक:

केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की भूमिका और कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ के तहत भुगतान हेतु जाति श्रेणियां


संदर्भ:

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने राज्यों से इस वित्तीय वर्ष से ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act- MGNREGA) योजना के अंतर्गत किये जाने वाले वेतन भुगतान को, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य जातियों के लिए अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करने के लिए कहा है।

कृपया ध्यान दें, वर्तमान में, मनरेगा योजना के तहत मजदूरी के लिए केवल एक प्रणाली है, अर्थात मजदूरी भुगतान के लिए कोई श्रेणीवार प्रावधान नहीं है।

इस निर्णय के पीछे तर्क:

बजटीय परिव्यय से, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को प्राप्त होने वाले लाभों का आकलन करने और उन्हें उजागर करने के लिए यह निर्णय लिया गया है।

  • इस निर्णय का उद्देश्य काफी हद तक, केंद्र सरकार द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए किए जा रहे कार्यो पर, प्रकाश डालना है।

इस निर्णय के विरुद्ध चिंताएं:

  1. इससे भुगतान प्रणाली और जटिल हो सकती है।
  2. इससे योजना के वित्त पोषण में कमी आ सकती है।
  3. इससे वेतन भुगतान में देरी हो सकती है।
  4. इससे मनरेगा कार्यक्रम को एससी/एसटी की अधिक आबादी वाले जिलों तक भी सीमित किया जा सकता है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ के बारे में:

  • मनरेगा (MGNREGA) को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में एक सामाजिक उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जिसके अंतर्गत ‘काम करने के अधिकार’ (Right to Work) की गारंटी प्रदान की जाती है।
  • इस सामाजिक उपाय और श्रम कानून का मुख्य सिद्धांत यह है, कि स्थानीय सरकार को ग्रामीण भारत में न्यूनतम 100 दिनों का वैतनिक रोजगार प्रदान करना होगा ताकि ग्रामीण श्रमिकों के जीवन स्तर में वृद्धि की जा सके।

मनरेगा कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य:

  1. मनरेगा कार्यक्रम के तहत प्रत्येक परिवार के अकुशल श्रम करने के इच्छुक वयस्क सदस्यों के लिये न्यूनतम 100 दिन का वैतनिक रोजगार।
  2. ग्रामीण निर्धनों की आजीविका के आधार को सशक्त करके सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करना।
  3. कुओं, तालाबों, सड़कों और नहरों जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई परिसंपत्ति का निर्माण करना।
  1. ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले शहरी प्रवासन को कम करना।
  2. अप्रशिक्षित ग्रामीण श्रम का उपयोग करके ग्रामीण अवसंरचना का निर्माण करना।

मनरेगा योजना के तहत लाभ प्राप्त करने हेतु पात्रता मानदंड:

  1. मनरेगा योजना का लाभ लेने के लिए भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. कार्य हेतु आवेदन करने के लिए व्यक्ति की आयु 18 वर्ष अथवा इससे अधिक होनी चाहिए।
  3. आवेदक के लिए किसी स्थानीय परिवार का हिस्सा होना चाहिए (अर्थात, आवेदन स्थानीय ग्राम पंचायत के माध्यम से किया जाना चाहिए)।
  4. आवेदक को स्वेच्छा से अकुशल श्रम के लिए तैयार होना चाहिए।

योजना का कार्यान्वयन:

  1. आवेदन जमा करने के 15 दिनों के भीतर या जिस दिन से काम की मांग होती है, उस दिन से आवेदक को वैतनिक रोजगार प्रदान किया जाएगा।
  2. रोजगार उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में, आवेदन जमा करने के पंद्रह दिनों के भीतर या काम की मांग करने की तिथि से बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार होगा।
  3. मनरेगा के कार्यों का सामाजिक लेखा-परीक्षण (Social Audit) अनिवार्य है, जिससे कार्यक्रम में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
  4. मजदूरी की मांग करने हेतु अपनी आवाज उठाने और शिकायतें दर्ज कराने के लिए ‘ग्राम सभा’ इसका प्रमुख मंच है।
  5. मनरेगा के तहत कराए जाने वाले कार्यों को मंजूरी देने और उनकी प्राथमिकता तय करने का दायित्व ‘ग्राम सभा’ और ‘ग्राम पंचायत’ का होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि योजना के अंतर्गत ‘जॉब कार्ड’ जारी करने के लिए ग्राम पंचायतें जिम्मेदार हैं?  ग्राम पंचायत की भूमिकाओं के बारे में यहाँ और पढ़ें:

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मनरेगा के तहत ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, राज्यों, राज्य खाद्य आयोग, केंद्र की भूमिकाएँ क्या हैं?
  2. जॉब कार्ड क्या हैं, इन्हें कौन जारी करता है?
  3. ‘राज्य रोजगार गारंटी कोष’ की स्थापना कौन करता है?
  4. वैतनिक रोजगार क्या होता है?
  5. सामाजिक लेखा परीक्षण (सोशल ऑडिट) किसके द्वारा किया जाता है?

मेंस लिंक:

मनरेगा की प्रमुख विशेषताओं और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

भारत के मतदान में भाग नहीं लेने पर फ़िलिस्तीन द्वारा कड़ी आलोचना


संदर्भ:

इजरायल और फिलिस्तीनी क्षेत्र के तटीय भाग गाजा पट्टी के बीच हालिया संघर्ष की पृष्ठभूमि में, हाल ही में, मानवाधिकार परिषद (Human Rights Council HRC) में ‘इज़राइल के कब्जे वाले पूर्वी यरुशलम सहित फिलिस्तीनी क्षेत्र और इज़राइल में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और मानवतावादी कानून का समादर सुनिश्चित किया जाना चाहिए” (Ensuring respect for international human rights law and humanitarian law in Occupied Palestinian Territory including East Jerusalem and in Israel) शीर्षक से एक प्रस्ताव लाया गया था।

इस प्रस्ताव पर होने वाले मतदान में भारत ने भाग नहीं लिया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए फिलिस्तीन ने कहा है, कि इस तरह से मतदान में भाग नहीं लेने से (Abstention) से ‘सभी लोगों’ के मानवाधिकारों का दमन होता है।

पृष्ठभूमि:

24 सदस्यों द्वारा प्रस्ताव के पक्ष में मतदान के साथ इसे प्रस्ताव पारित कर दिया गया। नौ सदस्यों ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया, और भारत सहित 14 सदस्य देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया। इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद, इज़राइल द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किए जाने की जांच करने हेतु ‘एक स्वतंत्र जांच आयोग’ की स्थापना की जाएगी।

समय के साथ इजरायल और फिलिस्तीन के संबंध में भारत की नीति का विकास:

विश्व में सर्वाधिक लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष पर भारत की नीति ने, पहले चार दशकों के दौरान स्पष्ट रूप से फिलिस्तीन-समर्थक रहने से लेकर, इजरायल के साथ अपने तीन दशक पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों तक, एक कठिन संतुलन बनाने तक का मार्ग तय किया है। हाल के वर्षों में, भारत की स्थिति इजरायल-समर्थक के रूप में मानी जाती है।

वर्ष 1948 के बाद भारत की नीति:

  • 1948 में, भारत उन 13 देशों में एकमात्र गैर-अरब-राष्ट्र था, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन को विभाजित करने संबंधी योजना के खिलाफ मतदान किया। संयुक्त राष्ट्र में इसी योजना के पारित होने की वजह से इज़राइल का निर्माण हुआ था।
  • 1975 में, भारत ‘फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन’ (PLO) को फिलीस्तीनियों के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश था। भारत ने PLO को दिल्ली में अपना कार्यालय खोलने के लिए भी आमंत्रित किया, तथा पांच साल बाद इसे राजनयिक दर्जा भी प्रदान किया।
  • 1988 में, जब PLO ने फ़िलिस्तीन को एक स्वतंत्र देश, और पूर्वी यरुशलम को इसकी राजधानी के रूप घोषित किया की, तो भारत ने इसे तत्काल ही मान्यता प्रदान की।

1992 के बाद भारत की नीति:

इजराइल- फ़िलिस्तीन के साथ संबंधों में संतुलन की शुरुआत, वर्ष 1992 में भारत द्वारा इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करने का निर्णय करने के साथ हुई।

  • भारत द्वारा यह निर्णय, तत्कालीन सोवियत संघ के भंग होने तथा वर्ष 1990 में हुए पहले खाड़ी युद्ध के कारण पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़े पैमाने पर होने वाले बदलावों की पृष्ठभूमि में लिया गया था।
  • जनवरी 1992 में इजराइल के तेल अवीव में एक भारतीय दूतावास खोला गया, इसे भारत के पूर्व-नजरिए के अंत की शुरुआत माना जाता है।

वर्ष 2017 तक भारत की नीति:

  • वर्ष 2017 तक भारत द्वारा ‘फिलिस्तीनी आंदोलन का समर्थन किया जाता रहा, तथा इसने, इज़राइल के साथ शांति से रहते हुए, सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर, पूर्वी यरुशलम राजधानी सहित एक संप्रभु, स्वतंत्र, व्यवहार्य और संयुक्त फिलिस्तीन राज्य की स्थापना हेतु बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने का आह्वान किया- जोकि मुख्यतः दो-राष्ट्र समाधान था।
  • तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने नवंबर 2013 में अपना यह दृष्टिकोण स्पष्ट किया था, और अक्टूबर 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी यही नजरिया रखा था।

वर्ष 2017 के बाद भारत की नीति:

वर्ष 2017 में, फिलिस्तीनी प्राधिकरण के अध्यक्ष महमूद अब्बास के दिल्ली-प्रवास के दौरान, भारत ने पूर्वी यरुशलम और सीमाओं के संदर्भ को छोड़ दिया था। वर्ष 2018 में, जब प्रधानमंत्री मोदी, रामल्लाह (Ramallah) की यात्रा पर गए, तो उन्होंने भी उसी नजरिए को बरकरार रखा।

यह क्या दर्शाता है?

यह प्रवृत्ति स्पष्ट करती है, कि – भारत के निर्णय इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दों की एक परिपक्व समझ और मूल्यांकन पर आधारित हैं और नई दिल्ली भी अब इसी दृष्टिकोण का अनुसरण कर रही है। जिस तरह से इजरायल और फिलिस्तीन एक दूसरे पर रॉकेट दागते रहते हैं, भारत ने किसी एक का पक्ष लेने से इनकार कर दिया है और तनाव कम करने तथा बातचीत करने का आह्वान किया है।

इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष पर अधिक जानकारी के लिए पढ़ें:

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. वेस्ट बैंक कहाँ है?
  2. गाजा पट्टी
  3. गोलन हाइट्स
  4. ‘हमास’ कौन हैं?
  5. ‘अल-नकबा’ क्या है?
  6. इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के बारे में

मेंस लिंक:

लंबे समय से चले आ रहे इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष को समाप्त करने के उपाय सुझाएं।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नासा द्वारा शुक्र ग्रह पर भेजे जाने वाले दो नए मिशन की घोषणा


संदर्भ:

मैगलन ऑर्बिटर (Magellan orbiter), वर्ष 1990 में, शुक्र ग्रह के लिए अमेरिका द्वारा भेजा जाने वाले अंतिम ‘प्रोब’ था।

  • अब, नासा ने शुक्र ग्रह के लिए दो नए मिशन की घोषणा की है।
  • इन दो सहयोगी अभियानों का उद्देश्य यह समझना है, कि शुक्र ग्रह अपनी सतह पर सीसे को पिघलाने में सक्षम तापमान वाली, नरक जैसी दुनिया किस तरह से बन गया।

इनमे शामिल है:

डाविंसी प्लस (Davinci+)

डाविंसी प्लस’ ‘डीप एटमॉस्फियर वीनस इन्वेस्टिगेशन ऑफ नोबल गैस, केमिस्ट्री, एंड इमेजिंग’ (Deep Atmosphere Venus Investigation of Noble gases, Chemistry, and Imaging : Davinci+) का संक्षिप्त रूप है। और इस मिशन के निम्नलिखित उद्देश्य होंगे:

  • शुक्र ग्रह का निर्माण और विकास किस प्रकार हुआ, इस बारे में जानकारी हासिल करने के लिए ग्रह के वायुमंडल का आकलन करना।
  • शुक्र ग्रह पर क्या कभी कोई महासागर था, इसका निश्चय करना।
  • शुक्र ग्रह के ‘गोलीय आकार’ (Tesserae) वाली भूगर्भीय विशेषताओं (ये विशेषताएं पृथ्वी पर स्थित महाद्वीपों के समान हो सकती हैं), की पहली उच्च रिज़ॉल्यूशन वाले चित्र भेजना)।

वेरिटास (Veritas):

वेरिटास, ‘वीनस एमिस्सिविटी, रेडियो साइंस, आईएनएसएआर, टोपोग्राफी और स्पेक्ट्रोस्कोपी’ (Venus Emissivity, Radio Science, InSAR, Topography, and Spectroscopy : VERITAS) का संक्षिप्त रूप है।

  • यह मिशन, शुक्र ग्रह की सतह का, उसके भूगर्भीय इतिहास को समझने के लिए, मानचित्र तैयार करेगा और यह जांच करेगा कि, पृथ्वी की तुलना में यह ग्रह इतने भिन्न तरीके से किस प्रकार विकसित हुआ।
  • इस मिशन में, ग्रह की सतह पर स्थित ऊँचे स्थानों का चार्ट बनाने तथा ग्रह पर ज्वालामुखी और भूकंप की घटनाओं के होने अथवा न होने के बारे में पता लगाने के लिए एक तरह के राडार का प्रयोग किया जाएगा।

शुक्र ग्रह के बारे में:

  • शुक्र (Venus), सूर्य से दूसरा ग्रह है और सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है, जिसकी सतह का तापमान 500C है – जो सीसा को पिघलाने के लिए पर्याप्त है।
  • ग्रह का वातावरण काफी सघन है, जो मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फ्यूरिक एसिड के समूहन से बना है।
  • शुक्र ग्रह के परिघूर्णन में पृथ्वी के 243.0226 दिनों के बराबर समय लगता है। अर्थात शुक्र ग्रह पर एक दिन की अवधि, ग्रह के एक वर्ष से अधिक होती है, क्योंकि शुक्र को सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा लगाने में पृथ्वी के 225 दिनों के बराबर समय लगता है।
  • पृथ्वी की तुलना में शुक्र ग्रह के कोर का व्यास लगभग 4,360 मील (7,000 किमी) है।
  • शुक्र ग्रह, पूर्व से पश्चिम की ओर घूर्णन करने वाले मात्र दो ग्रहों में से एक है। केवल शुक्र और यूरेनस “विपरीत दिशा में” घूर्णन करते है।

शुक्र ग्रह के लिए भेजे गए ऐतिहासिक मिशन:

  1. मैगलन (Magellan) – नासा मिशन. जो 1994 में समाप्त हो गया।
  2. वीनस एक्सप्रेस (Venus Express) – यूरोपीय मिशन- वायुमंडलीय विज्ञान पर केंद्रित है।
  3. अकात्सुकी (Akatsuki) – जापानी अंतरिक्ष यान- वायुमंडलीय विज्ञान पर केंद्रित।

भविष्य में भेजे जाने वाले मिशन:

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) द्वारा थेसस (Theseus) और स्पिका (Spica) नामक दो खगोलीय प्रस्तावों तथा ‘एनविज़न’ (EnVision) नामक एक शुक्र मिशन पर विचार किया जा रहा है। नासा के लिए अन्य अवधारणाएं भी पेश की जा रही हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

  1. क्या आप जानते हैं कि सोवियत संघ ने ही 1960 के दशक में शुक्र पर मिशन शुरू किया था? यहां पढ़ें, 
  2. क्या आप जानते हैं कि कैलिफोर्निया के मोजावे रेगिस्तान में नासा के गोल्डस्टोन एंटीना से शोधकर्ताओं ने 2006 से 2020 तक 21 बार शुक्र की ओर रेडियो तरंगों को प्रसारित किया? यहां निष्कर्षों के बारे में पढ़ें, 

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. शुक्र ग्रह की अवस्थिति
  2. शुक्रयान मिशन
  3. उद्देश्य
  4. शुक्र ग्रह के लिए विभिन्न मिशन

मेंस लिंक:

नासा द्वारा शुक्र ग्रह पर भेजे जाने वाले नवीनतम मिशन के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

आठवां वैश्विक नाइट्रोजन सम्मेलन


संदर्भ:

3-7 मई 2020 को आठवें ‘अंतर्राष्ट्रीय नाइट्रोजन पहल सम्मेलन’ (International Nitrogen Initiative Conference- INI2020), का आयोजन जर्मनी के बर्लिन में किया जाना निर्धारित था। किंतु, महामारी के कारण इसे पिछले साल रद्द कर दिया गया था और हाल ही में, इसे आभासी-प्रारूप में आयोजित किया गया।

‘अंतर्राष्ट्रीय नाइट्रोजन पहल सम्मेलन’ के बारे में:

  • इस पहल की स्थापना, ‘पर्यावरण समस्याओं पर वैज्ञानिक समिति’ (Scientific Committee on Problems of the Environment – SCOPE) और ‘अंतर्राष्ट्रीय भूमंडल-जैवमंडल कार्यक्रम’ (International Geosphere-Biosphere Program – IGBP) की प्रायोजकता में वर्ष 2003 में की गई थी।
  • यह एक त्रैवार्षिक आयोजन है, जिसमें कृषि, उद्योग, यातायात, मृदा, जल और वायु में प्रतिक्रियाशील नाइट्रोजन यौगिकों संबंधी शोधों में लगे संपूर्ण विश्व से वैज्ञानिक भाग लेते हैं।
  • उद्देश्य: प्रतिक्रियाशील नाइट्रोजन के भविष्यत समग्र प्रबंधन में सुधार हेतु नीति निर्माताओं और परिणामों, विचारों और दृष्टिकोण संबंधी अन्य प्रासंगिक हितधारकों के बीच जानकारी और अनुभवों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना।
  • यह कार्यक्रम, वर्तमान में ‘फ्यूचर अर्थ’ नामक संगठन का एक सतत भागीदार है।

एक आवश्यक पोषक तत्व के रूप में नाइट्रोजन:

  • नाइट्रोजन, वातावरण में सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला तत्व है, तथा अधिकांश पौधों के लिए एक महत्वपूर्ण बृहत् पोषक (Macronutrient) तत्व होती है।
  • पृथ्वी पर के वायुमंडल में पाई जाने वाली शुष्क हवा में नाइट्रोजन की मात्रा 78% से कुछ अधिक होती है। किंतु यह वायुमंडलीय नाइट्रोजन, या डाईनाइट्रोजन (dinitrogen) अक्रियाशील होती है, और पादपों द्वारा इसका सीधे उपयोग नहीं किया जा सकता है।
  • इसलिए नाइट्रोजन स्थिर करने वाले राइजोबिया (rhizobia) जैसे जीवाणु, पौधों और मृदा के लिए ‘अमोनिया’ और ‘नाइट्रेट’ जैसे प्रतिक्रियाशील यौगिकों के रूप में नाइट्रोजन प्रदान करते हैं। नाइट्रोजन-स्थिर करने वाले जीवाणु, फलीदार पौधों के साथ सहजीवी रूप से रहते हैं।

नाइट्रोजन, पोषक तत्व से प्रदूषक में किस प्रकार बदल जाता है और यह स्वास्थ्य तथा पर्यावरण को किस प्रकार प्रभावित करता है?

  • कृषि-भूमि से निस्सृत होने वाले नाइट्रोजन यौगिकों ने दुनिया भर में जल-प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है, जबकि उद्योग, कृषि और वाहनों से होने वाले नाइट्रोजन उत्सर्जन का वायु प्रदूषण में बड़ा योगदान होता है।
  • मृदा में उपस्थित नाइट्रोजन की 80% से अधिक मात्रा का मानव द्वारा उपयोग नहीं किया जाता है। जबकि चार बटा पांच भाग से अधिक नाइट्रोजन का उपयोग पशुओं को खिलाने के लिए किया जाता है। मांसाहारी भोजन के माध्यम से केवल छह प्रतिशत नाइट्रोजन ही मनुष्यों तक पहुंचती है, जबकि शाकाहारी भोजन के माध्यम से लगभग 20% नाइट्रोजन का मनुष्यों द्वारा उपभोग किया जाता है।

जब नाइट्रोजन पर्यावरण में निर्मुक्त होकर पहुँचती है, और अन्य कार्बनिक यौगिकों के साथ अभिक्रिया करती है तो यह प्रदूषक में परिवर्तित हो जाती है। प्रदूषक के तौर पर नाइट्रोजन, या तो वायुमंडल में विमोचित की जाती है, नदियों, झीलों या भूजल आदि जल स्रोतों में घुल जाती है, या मृदा में बनी रहती है।

नाइट्रोजन प्रदूषण का पर्यावरण पर प्रभाव:

  • यह जलमार्गों और महासागरों में हानिकारक शैवाल के पैदा होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है; ये शैवाल ल विषाक्त पदार्थों का उत्पादन करते हैं जो मानव और जलीय जीवों के लिए हानिकारक होते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से तटीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन और जैव विविधता को प्रभावित करते हैं।
  • पेय-जल संदूषण: यूरोप में 10 मिलियन लोग संभावित रूप से, नाइट्रेट सांद्रता के अनुशंसित स्तर से अधिक मात्रा वाले, पेय-जल के संपर्क में रहते हैं। इसका मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • खाद्य सुरक्षा: नाइट्रोजन उर्वरक के अत्यधिक प्रयोग से मृदा के पोषक तत्वों में कमी आती है। चूंकि दुनिया को लगातार बढ़ती आबादी के लिए अधिक मात्रा में खाद्यान्नों की जरूरत है, अतः कृषि योग्य भूमि का नुकसान एक प्रमुख वैश्विक समस्या है।
  • नाइट्रस ऑक्साइड एक ग्रीनहाउस गैस है जो पर्यावरण के लिए हानिकारक है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि उच्च तापमान और दाब पर वायुमंडलीय नाइट्रोजन के साथ हाइड्रोजन गैस के संयोजन से अमोनिया का उत्पादन होता है और इस प्रक्रिया को हैबर-बॉश प्रक्रिया के रूप में जाना जाता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘अक्रिय गैस’ क्या है?
  2. नाइट्रोजन और इसके प्रमुख गुणों के बारे में
  3. नाइट्रस ऑक्साइड कैसे बनता है?
  4. शैवालीय प्रस्फुटन क्या होते हैं?
  5. आईएनआई 2020 के बारे में
  6. फ्यूचर अर्थ क्या है?

मेंस लिंक:

नाइट्रोजन प्रदूषण पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रो: डाउन टू अर्थ

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

 श्रीलंका, डूबने वाले मालवाहक जहाज से तेल रिसाव के लिए तैयार


संदर्भ:

रसायनों और प्लास्टिक से लदे हुए, सिंगापुर में पंजीकृत MV X -प्रेस पर्ल, नामक एक मालवाहक जहाज में, 20 मई को आग लगने और विस्फोट होने की घटना हुई थी। इस घटना के बाद, श्रीलंका के समुद्र तटों पर कई टन प्लास्टिक के गुटिके / पैलेट (pellet) पाए गए।

तैयारियां:

देश के समुद्री पर्यावरण संरक्षण प्राधिकरण (Marine Environment Protection Authority- MEPA) ने इस घटना को इतिहास में श्रीलंका की सबसे खराब पारिस्थितिक आपदाओं में से एक करार दिया है। MEPA ने पोत से होने वाले संभावित रिसाव से निपटने के लिए, ‘तेल रिसाव नियंत्रण बूम’ (oil spill containment booms) को तैयार कर दिया है। अधिकारियों के अनुसार, पोत के ईंधन टैंक में350 टन तेल था।

तेल रिसाव’ क्या होता है?

  • आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) द्वारा ‘तेल रिसाव’ (Oil Spill) को दुर्घटनावश या जानबूझकर निर्मुक्त होने वाले तेल के रूप में पारिभाषित किया है, जो जल निकायों की सतह पर एक प्रच्छन द्रव्य के रूप में तैरता है और हवाओं, जल धाराओं और ज्वारीय लहरों के साथ इधर-उधर बहता रहता है।
  • तेल रिसाव, भूमि, वायु तथा पानी को प्रदूषित कर सकता है, हालांकि इसका प्रयोग ज्यादातर समुद्री तेल रिसाव के संदर्भ में किया जाता है।

तेल रिसाव के प्रभाव:

  • पारिस्थितिक तंत्र का विनाश: तेल रिसाव से जीवों और मछलियों के वास-स्थलों का अस्थायी, किंतु अत्यधिक नुकसान हो सकता है। भारी तेल से श्वसन, भोजन और ताप-विनियमन जैसी, जीवों के लिए अनिवार्य क्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं।
  • बिखरे हुए तेल घटकों से प्रदूषित पर्यावरण के सीधे संपर्क में आने पर जीवित प्राणियों के प्रभावित होने का खतरा होता है, जैसे प्रदूषित पानी पीना या सांस के साथ प्रदूषित धूल कणों का शरीर में पहुचना।
  • वनस्पतियों पर प्रभाव: यदि तेल-रिसाव, तटीय दलदलों, मैंग्रोव जंगलों, या अन्य आर्द्रभूमि में पहुच जाता है, तो रेशेदार पौधे और घास, इस तेल को अवशोषित कर लेते हैं, जोकि पौधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और क्षेत्र को वन्यजीवों के आवास के रूप में अनुपयुक्त बना सकते हैं।
  • समुद्री जीवों पर: तेल रिसाव के कारण, अक्सर व्हेल, डॉल्फ़िन, सील और समुद्री ऊदबिलाव, जैसे समुद्री स्तनधारियों की मौत होने लगती है।
  • पक्षियों पर: तेल रिसाव से पक्षियों के प्रजनन स्थलों को भी क्षति पहुँचती है, जिसका पूरी प्रजातियों पर गंभीर और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।

अर्थव्यवस्था पर तेल रिसाव का प्रभाव:

  1. समुद्र तटों और आबादी वाले तटीय क्षेत्रों में तेल रिसाव के कारण संदूषण होने लगता है, जिससे पर्यटन और वाणिज्य बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।
  2. समुद्र के पानी पर निर्भर बिजली संयंत्र और अन्य उपयोगिताएँ, तेल रिसाव से गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं।
  3. प्रमुख तेल रिसाव के बाद, प्रायः वाणिज्यिक मछली पकड़ने का तत्काल निलंबन कर दिया जाता है।

तेल रिसाव को साफ करने वाली विधियाँ:

  • नियंत्रण बूम (Containment Booms): फ्लोटिंग बैरियर, जिन्हें बूम कहा जाता है, का उपयोग तेल के प्रसार को प्रतिबंधित करने और इसकी रिकवरी करने, हटाने या बिखराने के लिए किया जाता है।
  • स्किमर्स (Skimmers): ये पानी की सतह से विखरे तेल को भौतिक रूप से अलग करने वाले उपकरण होते हैं।
  • सॉर्बेंट्स (Sorbents): पानी से तेल को अवशोषित करने के लिए विभिन्न सॉर्बेंट्स (जैसे, पुआल, ज्वालामुखी राख, और पॉलिएस्टर-से बनी प्लास्टिक की छलनी) का उपयोग किया जाता है।
  • बिखराव एजेंट (Dispersing agents): ये, तेल जैसे तरल पदार्थों को छोटी बूंदों में तोड़ने का काम करने वाले ‘पृष्ठ संक्रियक (surfactants) अथवा यौगिक होते हैं। ये समुद्र में तेल के प्राकृतिक बिखराव को तेज करते हैं।
  • बायो-एजेंट: पोषक तत्व, एंजाइम, या अल्केनिवोरैक्स बैक्टीरिया या मिथाइलोसेला सिल्वेस्ट्रिस जैसे सूक्ष्मजीव, तेल का प्राकृतिक जैव-अपघटन की दर को तेज करते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘डीपवाटर होराइजन ऑयल स्पिल’, जिसे मैक्सिको की खाड़ी का तेल रिसाव भी कहा जाता है, इतिहास का सबसे बड़ा समुद्री तेल रिसाव, 20 अप्रैल, 2010 को मैक्सिको की खाड़ी में स्थित ‘डीपवाटर होरिजन ऑयल रिग’ पर विस्फोट होने के कारण हुआ था। इस बारे में जानने हेतु यहां पढ़ें, https://www.britannica.com/event/Deepwater-Horizon-oil-spill.

स्रोत: द हिंदू


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