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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 18 May 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-II

1. पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ‘विधान परिषद’ का गठन

2. कॉलेजियम पद्धति से ‘भारत निर्वाचन आयोग’ के सदस्यों की नियुक्ति

3. नए जिले का निर्माण: क्यों और कैसे?

4. राजनयिक उन्मुक्ति

 

सामान्य अध्ययन-III

1. ‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी’ के फोकस में रहने का कारण तथा इसकी कार्यविधि

2. कोविड-19 के इलाज हेतु डीआरडीओ द्वारा निर्मित 2-डीजी दवा की क्रियाविधि

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. सुलावेसी

2. एल्डरलाइन (14567)

3. ‘संवेदना’

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: संसद और राज्य विधानमंडल – संरचना, कामकाज, व्यवसाय का संचालन, शक्तियां और विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले मुद्दे।

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ‘विधान परिषद’ का गठन


संदर्भ:

हाल ही में आयोजित कैबिनेट की बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा एक ‘विधान परिषद’ (Legislative Council) का गठन किया जाएगा।

इसके लिए कार्रवाई:

‘विधान परिषद’ की स्थापना करने के लिए, विधानसभा में एक विधेयक पेश करना होता है और फिर इसके लिए राज्यपाल का अनुमोदन आवश्यक होती है।

ज्ञातव्य है, कि इससे पहले, पश्चिम बंगाल में ‘उच्च सदन’ अर्थात ‘विधान परिषद’ की स्थापना वर्ष 1952 में की गई थी और वर्ष 1969 तक यह अस्तित्व में रहा।

‘विधान परिषदें’ और इनका महत्व:

  • भारत में द्विसदनीय (Bicameral) शासन पद्धति प्रचलित है, अर्थात संसद के दो सदन होते हैं; लोकसभा तथा राज्यसभा।
  • राज्य स्तर पर, लोकसभा के समकक्ष विधानसभा (Legislative Assembly) होती है; तथा राज्य सभा के समकक्ष ‘विधान परिषद’ (Legislative Council) होती है।

‘विधान परिषद’ का निर्माण किस प्रकार किया जाता है?

संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत, यदि किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन अथवा उत्सादन करने हेतु, इस आशय का कोई संकल्प राज्य की विधानसभा द्वारा विशेष बहुमत से पारित किया जाता है, तो संसद विधि द्वारा राज्य में विधान परिषद का सृजन अथवा उत्सादन कर सकती है।

सदन में सदस्यों की संख्या:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171 खंड (1) के अनुसार, विधान परिषद वाले किसी राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या, उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होनी चाहिए, तथा किसी राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या किसी भी दशा में चालीस से कम नहीं होगी।

विधान परिषद के सदस्यों का निर्वाचन:

  1. 1/3 सदस्यों का चुनाव विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है।
  2. 1/3 सदस्य राज्य की नगरपालिकाओं, ज़िला बोर्ड और अन्य स्थानीय संस्थाओं द्वारा निर्वाचित होते हैं।
  3. 1/12 सदस्य, अध्यापकों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा।
  4. 1/12 सदस्य, पंजीकृत स्नातकों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा।
  5. शेष 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा, साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा क्षेत्रों में प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्तियों में से मनोनीत किये जाते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विधान परिषद- सृजन और उत्सादन
  2. राज्य सरकारों की भूमिका
  3. संरचना
  4. शक्तियां
  1. विधान सभा के साथ तुलना
  2. विधान परिषद वाले राज्य

मेंस लिंक:

‘राज्य विधान परिषद’ की आवश्यकता पर विवेचना कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

कॉलेजियम पद्धति से ‘भारत निर्वाचन आयोग’ के सदस्यों की नियुक्ति


संदर्भ:

हाल ही में, ‘भारत निर्वाचन आयोग’ (Election Commission of India- ECI) के सदस्यों की नियुक्ति करने हेतु एक स्वतंत्र कॉलेजियम का गठन की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी।

यह याचिका ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ नामक एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर की गई।

एक स्वतंत्र कॉलेजियम की आवश्यकता:

याचिका में कहा गया है, कि पूर्णतयः कार्यपालिका द्वारा की जाने वाली, निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति हेतु वर्तमान प्रक्रिया, संविधान के अनुच्छेद 324 (2) के साथ असंगत है।

  • निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति पर कार्यपालिका द्वारा ‘अपनी पसंद के हिसाब से चुनाव करना’ (pick and choose), निर्वाचन आयोग के उस आधार का ही उल्लंघन करती है, जिस पर इसका गठन किया गया था। और,
  • इस प्रक्रिया से, निर्वाचन आयोग, कार्यपालिका की मात्र एक शाखा बन कर रह जाता है।

समय की मांग:

लोकतंत्र, हमारे संविधान की मूल संरचना का एक पहलू है, और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने तथा हमारे देश में स्वस्थ लोकतंत्र बनाए रखने के लिए, निर्वाचन आयोग को राजनीतिक और / या कार्यकारी हस्तक्षेप से पृथक होना चाहिए।

इस संदर्भ में विभिन्न विशेषज्ञ समितियों द्वारा की गई सिफारिशें:

  1. विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट में की गई अनुशंसा के अनुसार, सभी निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, प्रधान मंत्री, लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश से मिलकर बनी, एक तीन-सदस्यीय कॉलेजियम या चयन समिति के परामर्श से राष्ट्रपति द्वारा की जानी चाहिए।
  2. द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा, जनवरी 2007 में प्रस्तुत चौथी रिपोर्ट में एक तटस्थ और स्वतंत्र कॉलेजियम के गठन की भी सिफारिश की गई थी। प्रधान मंत्री की अध्यक्षता वाले इस कॉलेजियम में सदस्य की रूप में, लोक सभा अध्यक्ष, लोक सभा में नेता-प्रतिपक्ष, विधि मंत्री और राज्यसभा के उपसभापति सम्मिलित होने चाहिए।
  3. डॉ. दिनेश गोस्वामी समिति ने मई 1990 में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में, निर्वाचन आयोग में नियुक्ति के लिए, भारत के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता जैसे तटस्थ अधिकारियों के साथ प्रभावी परामर्श किए जाने की सिफारिश की थी।
  4. न्यायमूर्ति तारकुंडे समिति ने 1975 की अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की, कि निर्वाचन आयोग के सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश से मिलकर बनी एक समिति के परामर्श से नियुक्त किया जाना चाहिए।

नियुक्ति की वर्तमान प्रणाली:

नियुक्ति संबधी संवैधानिक बनाम कार्यकारी शक्तियां:

  • संविधान में ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त’ (CEC) तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों (EC) की नियुक्ति के लिए कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं है।
  • वर्तमान में, ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त’ तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, प्रधान मंत्री की सिफारिशों के आधार राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अतः, ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त’ तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों के अंतर्गत आती है।
  • हालांकि, अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, संसद के लिए, निर्वाचन आयोग की सेवा-शर्तों और कार्यकाल को विनियमित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त’ (CEC) तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों (EC) के बारे में
  2. नियुक्ति
  3. पदत्याग
  4. कार्यकाल
  5. कार्य
  6. संबंधित संवैधानिक प्रावधान
  7. इनकी नियुक्तियों को विनियमित करने संबंधी संसद की शक्तियाँ।

मेंस लिंक:

‘भारत निर्वाचन आयोग’ (ECI) के सदस्यों की नियुक्ति हेतु एक स्वतंत्र कॉलेजियम की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

नए जिले का निर्माण: क्यों और कैसे?


संदर्भ:

हाल ही में, मलेरकोटला, पंजाब राज्य का 23वां जिला बनाया गया है।

नए जिले का गठन किस प्रकार किया जाता है?

  • नए जिले का निर्माण करने या मौजूदा जिलों की सीमा में परिवर्तन करने अथवा इन्हें समाप्त करने की शक्ति राज्य सरकारों के पास होती है।
  • यह प्रक्रिया, किसी कार्यकारी आदेश के माध्यम से अथवा राज्य विधानसभा में कोई कानून पारित करके निष्पादित की जा सकती है।
  • कई राज्यों में नए जिलों का निर्माण करने हेतु, कार्यकारी आदेश को प्राथमिकता दी जाती है, और इसके लिए आधिकारिक राजपत्र में मात्र एक अधिसूचना जारी कर दी जाती है।

यह किस प्रकार सहायक होते हैं?

राज्यों का तर्क है, कि प्रशासन और शासन के लिहाज से छोटे जिले बेहतर होते हैं। उदाहरण के लिए, 2016 में, असम सरकार द्वारा “प्रशासनिक सुविधा” के लिए माजुली उप-मंडल को एक अधिसूचना जारी करके ‘माजुली जिले’ में अपग्रेड कर दिया गया था।

इस संदर्भ में केंद्र सरकार की भूमिका:

  • जिलों में परिवर्तन करने अथवा नए जिलों का निर्माण करने में केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं होती है। राज्य, इस संबंध में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं।
  • हालांकि, जब कोई राज्य किसी जिले या रेलवे स्टेशन का नाम बदलना चाहता है, तो इसमें गृह मंत्रालय की भूमिका होती है।
  • इस संबंध में राज्य सरकार के अनुरोध को, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, खुफिया ब्यूरो, डाक विभाग, भारतीय भौगोलिक सर्वेक्षण विज्ञान और रेल मंत्रालय आदि विभागों और एजेंसियों को मंजूरी के लिए भेजा जाता है। इन विभागों और एजेंसियों के उत्तरों की जांच के बाद, इसके लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया जा सकता है।

वर्तमान प्रवृत्ति:

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 593 जिले थे।
  • जनगणना के परिणामों से पता चला है, कि 2001-2011 के बीच, राज्यों द्वारा 46 जिलों का निर्माण किया गया था।
  • हालांकि वर्ष 2021 की जनगणना अभी बाकी है, फिर भी, भारत सरकार द्वारा संचालित एक वेबसाइट ‘नो इंडिया’ (Know India) के अनुसार, वर्तमान में देश में 718 जिले हैं।
  • जिलों की संख्या में वृद्धि का एक कारण, पूर्ववर्ती आंध्र प्रदेश राज्य का, वर्ष 2014 में, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में होने वाला विभाजन भी है। वर्तमान में तेलंगाना में 33 जिले हैं और आंध्र प्रदेश में 13 जिले हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. नए जिले की निर्माण- प्रक्रिया।
  2. राज्य और केंद्र सरकार की भूमिकाएँ।
  3. जिले का नाम बदलने की प्रक्रिया।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

‘राजनयिक उन्मुक्ति’


(The diplomatic immunity)

संदर्भ:

पिछले महीने, दक्षिण कोरिया में बेल्जियम के राजदूत की पत्नी ने राजधानी सियोल (Seoul) के एक बुटीक में दो कर्मचारियों को कथित रूप से चोट पहुचाई थी। अब, आपराधिक आरोपों से बचने के लिए राजदूत की पत्नी, अपने लिए प्राप्त ‘राजनयिक उन्मुक्ति’ (Diplomatic Immunity) का प्रयोग करेगी।

इस घटना के बाद से दक्षिण कोरिया में गुस्सा फूट पड़ा है, तथा राजनयिकों और उनके परिवार के सदस्यों को प्रदान की जाने वाली सुरक्षा की सीमा पर बहस छिड़ गई है।

‘राजनयिक उन्मुक्ति’ क्या होती है?

‘राजनयिक उन्मुक्ति’ या ‘राजनयिक प्रतिरक्षा’, राजनयिकों को उनकी तैनाती वाले देश में, कुछ कानूनों और करों से छूट संबंधी प्रदान किए जाने वाले विशेषाधिकार होते हैं।

इस परंपरा का गठन इसलिए किया गया था, ताकि राजनयिक मेजबान देश में बिना किसी भय, धमकी या दबाव के साथ कार्य कर सकें।

‘राजनयिक उन्मुक्ति’ दो अभिसमयों के आधार पर प्रदान की जाती है:

  1. राजनयिक संबंधों पर अभिसमय (Convention on Diplomatic Relations), 1961, जिसे ‘वियना कन्वेंशन’ भी कहा जाता है।
  2. दूतावास संबंधों पर अभिसमय (Convention on Consular Relations), 1963।

इन अभिसमयों पर 187 देशों द्वारा अभिपुष्टि (Ratified) की जा चुकी है, जिसका अर्थ है कि यह अभिसमय, संबंधित देश के कानूनी ढांचे के अंतर्गत एक कानून है और इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है।

इस उन्मुक्ति या प्रतिरक्षा की सीमा:

  • ‘राजनयिक संबंधों पर विएना अभिसमय’ (Vienna Convention on Diplomatic Relations), 1961 के अनुसार, दूतावास में तैनात एक राजनयिक के लिए प्राप्त प्रतिरक्षा ‘अनुल्लंघनीय’ (Inviolable) होती है।
  • इसके अनुसार, राजनयिक को गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया जा सकता है और उसके घर के लिए भी दूतावास की तरह ही ‘अनुल्लंघनीयता’ और सुरक्षा प्राप्त होगी।

अपवाद:

राजनयिक के गृह देश द्वारा, उसे प्रदान की जाने वाली ‘प्रतिरक्षा’ को हटाया जा सकता है, लेकिन, लेकिन यह तभी हो सकता है जब उस राजनयिक द्वारा अपनी राजनयिक भूमिका से असंबद्ध, कोई ‘गंभीर अपराध’ किया हो, अथवा ऐसे किसी अपराध का साक्षी रहा हो। वैकल्पिक रूप से, राजनयिक का गृह देश उस व्यक्ति पर मुकदमा चला सकता है।

संबंधित चिंताएं:

यद्यपि, ‘राजनयिक उन्मुक्ति’ का उद्देश्य राजनयिकों किसी क्षति से ‘अलग’ रखना होता है, फिर भी यह, उनके देशों को खराब प्रतिष्ठा और द्विपक्षीय संबंधों के लिए लगने वाले झटके से नहीं बचा पाती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘राजनयिक उन्मुक्ति’ क्या होती है?
  2. प्रकार
  3. पात्रता
  4. अपवाद
  5. राजनयिक संबंधों पर अभिसमय, 1961
  6. दूतावास संबंधों पर अभिसमय, 1963

मेंस लिंक:

‘राजनयिक उन्मुक्ति’ क्या होती है? इसकी क्या आवश्यकता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी के फोकस में रहने का कारण तथा इसकी कार्यविधि


संदर्भ:

वर्तमान में, भारत, दो ‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपीज़’ (Monoclonal Antibody Therapies) – इटोलिज़ुमैब (Itolizumab) और टोसीलिज़ुमैब (Tocilizumab) की कमी का सामना कर रहा है।

इस लेख में, हम एंटीबॉडी और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के बारे में समझेंगे।

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (Monoclonal antibodiesmAbs) क्या होती हैं?

  • ये कृत्रिम रूप से निर्मित एंटीबॉडी होती हैं, जिनका उद्देश्य शरीर की ‘प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली’ की सहायता करना होता है।
  • मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, एक विशेष एंटीजन को लक्षित करती हैं। यह विशेष एंटीजन, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया प्रेरित करने वाले रोगाणु का ‘प्रोटीन’ होता है

‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडी’ किस प्रकार निर्मित की जाती हैं?

प्रयोगशाला में, श्वेत रक्त कोशिकाओं को एक विशेष एंटीजन के संपर्क में लाने पर ‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़’ का निर्माण किया जा सकता है।

  • ‘एंटीबॉडीज़’ को अधिक मात्रा में निर्मित करने के लिए, एकल श्वेत रक्त कोशिका का प्रतिरूप (Clone) बनाया जाता है, जिसे एंटीबॉडी की समरूप प्रतियां तैयार करने में प्रयुक्त किया जाता है।
  • कोविड -19 के मामले में, मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़’ तैयार करने के लिए वैज्ञानिक प्रायः SARS-CoV-2 वायरस के स्पाइक प्रोटीन का उपयोग करते है। यह ‘स्पाइक प्रोटीन’ मेजबान कोशिका में वायरस को प्रविष्ट कराने में सहायक होता है।

 ‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़’ की आवश्यकता:

एक स्वस्थ शरीर में, इसकी ‘प्रतिरक्षा प्रणाली’ (Immune System), एंटीबॉडीज़ अर्थात ‘रोग-प्रतिकारकों का निर्माण करने में सक्षम होती है।

  • ये एंटीबॉडीज़, हमारे रक्त में वाई-आकार (Y-shape) के सूक्ष्म प्रोटीन होते हैं, जो सूक्ष्मजीव रोगाणुओं की पहचान करके उन्हें जकड़ लेते हैं तथा प्रतिरक्षा प्रणाली को इन रोगाणुओं पर हमला करने का संकेत करते है।
  • यद्यपि, जिन लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली, इन एंटीबॉडीज़ को पर्याप्त मात्रा में निर्मित करने में असमर्थ होती हैं, उनकी सहायता के लिए वैज्ञानिकों द्वारा ‘मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़’ की खोज की गई है।

इतिहास:

किसी बीमारी के इलाज के लिए एंटीबॉडी दिए जाने का विचार 1900 के दशक प्रचलित हुआ था, जब  नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मन प्रतिरक्षा विज्ञानी (Immunologist) ‘पॉल एर्लिच’ (Paul Ehrlich) द्वारा जाबरक्युग्ल’ (Zauberkugel) अर्थात ‘मैजिक बुलेट’ का विचार प्रतिपादित किया गया था। ‘जाबरक्युग्ल’, चुनिंदा रूप से किसी रोगाणु को लक्षित करने वाला योगिक है।

  • तब से, मानवों में नैदानिक ​​उपयोग हेतु स्वीकृत होने वाली विश्व की पहली मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, ‘म्युरोमोनाब-सीडी3 (Muromonab-CD3) तैयार होने तक आठ दशकों का समय लगा।
  • ‘म्युरोमोनाब-सीडी3’, एक प्रतिरक्षादमनकारी (Immunosuppressant) दवा है। इसे ‘अंग प्रत्यारोपण’ किए गए रोगियों में तीव्र अस्वीकृति (Acute Rejection) को कम करने के लिए दी जाती है।

अनुप्रयोग:

मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ अब अपेक्षाकृत आम हो चुकी हैं। इनका उपयोग इबोला, एचआईवी, त्वचा-रोगों (psoriasis) आदि के इलाज में किया जाता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. एंटीबॉडीज़ क्या होती हैं?
  2. मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ क्या होती हैं?
  3. ये किस प्रकार निर्मित की जाती हैं?
  4. अनुप्रयोग

स्रोत: द प्रिंट।

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

कोविड-19 के इलाज हेतु डीआरडीओ द्वारा निर्मित 2-डीजी दवा की क्रियाविधि


संदर्भ:

हाल ही में, स्वदेश में विकसित एंटी-कोविड-19 दवा, ‘2-डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज’ (2-deoxy-D-glucose), अथवा ‘2-डीजी’ (2-DG) का पहला बैच जारी कर दिया गया है।

पृष्ठभूमि:

भारतीय औषधि महानियंत्रक (Drug Controller General of India– DCGI) द्वारा 1 मई को कोविड-19 के सामान्य तथा गंभीर रोगियों के लिए 2-DG दवा को सहायक चिकित्सा थेरपी के रूप में आपातकालीन उपयोग करने की अनुमति प्रदान की गई थी।

2- डीजी के बारे में:

2-डिऑक्सी-डी-ग्लूकोज (2-DG) दवा को, हैदराबाद स्थित डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज (DRL) के सहयोग से रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की प्रयोगशाला इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज (INMAS) द्वारा विकसित किया गया है।

यह किस प्रकार कार्य करती है?

  • यह दवा, वायरस से संक्रमित कोशिकाओं में संग्रहीत हो जाती है, तथा वायरल के संश्लेषण और ऊर्जा उत्पादन को रोककर वायरस को विकसित होने से रोक देती है।
  • वायरल से संक्रमित कोशिकाओं में इसका चयनात्मक संग्रहण, इस दवा को अद्वितीय बनाता है।

लाभ:

2-DG दवा, अस्पताल में भर्ती मरीजों की तेजी से ठीक होने में मदद करती है और एवं बाहर से ऑक्सीजन देने पर निर्भरता को कम करता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. 2- डीजी के बारे में
  2. यह किस प्रकार कार्य करती है?

मेंस लिंक:

भारत में टीकों के विकास और इनको लगाए जाने से संबंधित मुद्दों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


सुलावेसी

(Sulawesi)

शोधकर्ताओं द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप पर स्थित दक्षिणी सुलावेसी के गुफा स्थलों में पाई जाने वाले 45,000-20,000 साल पूर्व के ‘प्रातिनूतन युग’ अर्थात प्लाइस्टसीन-काल (Pleistocene-era) के शैल-चित्र, खतरनाक दर से अपक्षय का शिकार हो रहे हैं।

  • इस क्षेत्र की कलाकृतियों को, विश्व के सबसे प्राचीन (लगभग 40,000 साल पूर्व), हाथ की छाप से निर्मित चित्रों में से माना जाता है, जिन्हें गुफा-भित्तियों पर हाथ का पंजा रखकर, उसके ऊपर गीले लाल-शहतूत के रंगों का छिड़काव करके बनाया गया था।
  • इसके निकट की एक गुफा में, किसी जानवर का, विश्व का सबसे पुराना चित्र बना हुआ है। यह गुफा-भित्ति चित्र लगभग 45,500 वर्ष पूर्व का माना जाता है, और यह किसी मस्सेदार सुअर का चित्र है।
  • सुलावेसी की गुफा-कला, यूरोप की प्रागैतिहासिक गुफा-कला से काफी पुरानी है।

कारण:

रंगों से निर्मित कलाकृतियों का, हेलोक्लास्टी (Haloclasty) नामक प्रक्रिया के कारण क्षय होने लगता है। यह प्रक्रिया, क्षेत्र में आद्र और शुष्क मौसम की बारम्बारता के कारण तापमान और आर्द्रता में बार-बार होने वाले परिवर्तनों के कारण, बनने वाले नमक-क्रिस्टलों के विकास के साथ शुरू हो जाती है।

एल्डरलाइन (14567)

(ELDERLINE)

कोविड महामारी के दौरान वृद्धजनों की समस्याओं को दूर करने के लिए, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने एल्डरलाइन योजना के तहत पांच प्रमुख राज्यों में राज्यवार कॉल सेंटर शुरू किए हैं।

  • बुजुर्ग व्यक्तियों के लिए एल्डरलाइन (ELDERLINE) नामक टोल फ्री हेल्पलाइन को मई, 2021 के अंत तक सभी राज्यों में इस सेवा को शुरू करने का प्रयास किया जा रहा है।
  • यह सुविधा 5 राज्यों, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और कर्नाटक में पहले से ही चालू है। तेलंगाना में, यह सुविधा एक साल से अधिक समय से काम कर रही है।
  • इन कॉल सेंटरों पर टोल फ्री नंबर 14567 के जरिए संपर्क किया जा सकता है।

‘संवेदना’

(SAMVEDNA)

  • संवेदना टेली-परामर्श सेवा महामारी के दौरान बच्चों के तनाव, चिंता, भय और अन्य समस्याओं को दूर कर उनको मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करने के लिए है।
  • यह सेवा, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा प्रदान की जा रही है।
  • यह सेवा सितंबर 2020 में शुरू की गई थी और यह विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है।
  • संवेदना अर्थात SAMVEDNA (सेंसिटाइजिंग एक्शन ऑन मेंटल हेल्थ वल्नरबिलिटी थ्रू इमोशनल डेवलपमेंट एंड नेससरी एक्सप्टेंस- Sensitizing Action on Mental Health Vulnerability through Emotional Development and Necessary Acceptance) का संक्षिप्त रूप है।

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