Print Friendly, PDF & Email

INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 17 May 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164 (3)

2. पीएम-केयर्स फंड

 

सामान्य अध्ययन-III

1. वर्ष 2016 से भारतीय विनिर्माण उद्योग में नौकरियों की होने वाली कमी का कारण

2. चीन का ‘ज़्यूरोंग’ रोवर

3. एयर इंडिया द्वारा ‘जिओलाइट कार्गो उड़ान सेवा’ की शुरुआत

4. दस सालों में 186 हाथियों की रेल की पटरियों पर मौत

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. ‘विंचकंब’ (Winchcombe)

2. ‘सबडॉलूसेप्स नीलगिरिएन्सिस’

3. डूम्सडे सर्फिंग

4. राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164 (3)


संदर्भ:

केरल में नई सरकार के ऑनलाइन शपथ ग्रहण की मांग जोर पकड़ती जा रही है, और इसके साथ ही न्यायविदों ने कहा है कि ऑनलाइन माध्यम से सत्ता ग्रहण करने में सरकार के लिए कानूनी रूप से कोई बाधा नहीं है।

इस सबंध में संवैधानिक प्रावधान:

संविधान के अनुच्छेद 164 (3) के अनुसार, “किसी मंत्री द्वारा अपना पद ग्रहण करने से पहले, राज्यपाल तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूपों के अनुसार, उसको पद की और गोपनीयता की शपथ दिलाएगा।“

ऑनलाइन माध्यम से शपथ ग्रहण आयोजन पर कोई प्रतिबंध नहीं है, क्योंकि संविधान में भौतिक माध्यम से शपथ लेने पर कोई जोर नहीं दिया गया है।

आवश्यकता:

  • भारतीय चिकित्सा संघ (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) सहित कई संगठनों ने कोविड-19 के खतरनाक प्रसार के मद्देनजर शपथ ग्रहण हेतु ऑनलाइन माध्यम का समर्थन किया है।
  • इसके अलावा, संविधान के निर्माताओं ने ‘ऑनलाइन’ दुनिया के आगमन की कल्पना नहीं की थी और इसलिए संविधान में, मंत्रियों के पद ग्रहण करने के तरीके के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया गया था।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कैबिनेट मंत्रियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
  2. उनके उत्तरदायित्व
  3. विशेषाधिकार
  4. अनुच्छेद 164 (3)

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

पीएम केयर्स


(PM-CARES)

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में, वैक्सीन तथा ऑक्सीजन जनरेटर की तत्काल खरीद करने तथा पूरे देश के 738 जिला अस्पतालों में ऑक्सीजन संयत्रों की स्थापना करने हेतु पीएम-केयर्स फंड (PM-CARES fund) का उपयोग करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

याचिका में कहा गया है, कि सरकार को अपना पीएम-केयर्स पर्स खोलकर आम लोगों को चिकित्सा देखभाल और ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में मदद करनी चाहिए।

आवश्यकता:

बुनियादी जीवन रक्षक सहायता के रूप में चिकित्सीय ऑक्सीजन की सख्त जरूरत वाले मरीजों के लिए, पूरे देश के हर जिले में स्थित सरकारी अस्पताल, आम लोगों के लिए बिना किसी कीमत के आसानी से उपलब्ध हैं।

PM-CARES के बारे में:

आपातकालीन स्थिति में प्रधान मंत्री नागरिक सहायता एवं राहत कोष (Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund : PM-CARES Fund) का गठन, कोविड-19  महामारी, और इसी प्रकार की अन्य आपात स्थितियों के दौरान, दान स्वीकार करने और राहत प्रदान करने के लिए किया गया था।

पीएम केयर्स फंड के बारे में:

  • PM CARES फंड की स्थापना 27 मार्च 2020 को ‘पंजीकरण अधिनियम, 1908’ के तहत एक धर्मार्थ ट्रस्ट के रूप में की गयी थी।
  • यह विदेशी अंशदान से से प्राप्त दान का लाभ उठा सकता है और इस निधि में दिया जाने वाला दान 100% कर-मुक्त होता है।
  • PM-CARES, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से अलग है।

फंड का प्रबंधन कौन करता है?

प्रधानमंत्री, PM CARES फंड के पदेन अध्यक्ष और रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री, भारत सरकार निधि के पदेन न्यासी होते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सार्वजनिक खाता क्या है?
  2. पीएम केयर फंड का प्रबंधन कौन करता है?
  3. आरटीआई अधिनियम के दायरे से किन संगठनों को छूट दी गई है?
  4. भारत की संचित निधि के बारे में
  5. ‘धर्मार्थ ट्रस्ट’ क्या है?
  6. एनडीआरएफ के बारे में

मेंस लिंक:

PM CARES फंड को आरटीआई अधिनियम के दायरे में क्यों लाया जाना चाहिए? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

वर्ष 2016 से भारतीय विनिर्माण उद्योग में नौकरियों की होने वाली कमी का कारण


संदर्भ:

प्रायः, “जीवन” और “आजीविका” शब्द एक साथ उल्लेख किए जाते हैं। परंतु, वर्तमान में फ़ैली हुई इस कोविड महामारी ने इन दोनों शब्दों के बीच एक अंतर पैदा कर दिया है: जीवन को बचाने के उद्देश्य से किए जाने वाले उपाय, आजीविका के लिए ख़राब साबित हो रहे हैं।

वर्तमान परिदृश्य:

दूसरी कोविड लहर आने से पहले, अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की ‘कामगार भारत की स्थिति’ (State of Working India– SWI) रिपोर्ट 2021 में आजीविकाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का खुलासा किया गया है।

SWI रिपोर्ट के अनुसार:

  1. महामारी के कारण लोगों को अपनी औपचारिक नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है, और वे औपचारिक काम करने पर विवश हो गए हैं, जिसकी वजह से इनकी आय में भारी कमी हुई है।
  2. पिछले एक साल में गरीबी में अचानक वृद्धि होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
  3. महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में असंगत रूप से सर्वाधिक नौकरियों का नुकसान हुआ है।

‘भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र’ (Centre for Monitoring Indian Economy- CMIE) और ‘आर्थिक आंकड़े एवं विश्लेषण केंद्र’ (Centre for Economic Data and Analysis- CEDA) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई एक रिपोर्ट के अनुसार:

  1. पिछले कुछ वर्षों से भारतीय अर्थव्यवस्था, यहाँ तक कि बगैर कोविड के भी, बदतर होती जा रही है।
  2. अर्थव्यवस्था के विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत लोगों की संख्या 51 मिलियन से घटकर 27 मिलियन हो गई है – अर्थात, केवल चार वर्षों के अंतराल में लगभग आधी हो गई है!
  3. इसके अलावा, कृषि में कार्यरत लोगों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। इतना ही निराशाजनक यह है, कि गैर-वित्तीय सेवाओं में संलग्न रोजगार में भी तेजी से गिरावट आई है।

विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियों का कम होना चिंताजनक क्यों है?

  • परंपरागत रूप से, भारतीय नीति निर्माताओं का यह विचार रहा है, कि देश के अधिशेष श्रम बल की खपत करने के लिए, विनिर्माण क्षेत्र हमारा सबसे बड़ा आसरा है, अन्यथा यह अतिरिक्त श्रमिक बल कृषि में लगा रहता।
  • विनिर्माण क्षेत्र, अधिशेष श्रम बल को रोजगार देने हेतु पूर्णतयः उपयुक्त होता है, क्योंकि, इसमें सेवा क्षेत्र के विपरीत, लाखों अल्प-शिक्षित भारतीय युवाओं को नियोजित किया सकता है। जबकि सेवा क्षेत्र में प्रायः बेहतर शिक्षा और कौशल स्तर आवश्यक होता है।

रोजगार सृजन में भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की विफलता के कारण:

  1. विनिर्माण इकाईयों के लिए, सबसे पहले एक बड़ी राशि के नियत निवेश की जरूरत होती है।
  2. विनिर्माण क्षेत्र को, परंपरागत रूप से वास्तव में जो प्रवृत्ति सबसे जोखिमपूर्ण बनाती है, वह है भारतीय सरकारों की अत्यधिक निष्कर्षी प्रकृति (extractive nature) अर्थात भ्रष्टाचार, आपूर्ति में कमी आदि।
  3. साथ ही, भारतीयों द्वारा, ऐतिहासिक रूप से, विनिर्मित वस्तुओं का हमेशा अपेक्षाकृत कम और भोजन और सेवाओं का अपेक्षाकृत अधिक उपभोग किया जाता है; (ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अधिकांश भारतीय काफी गरीब हैं और इनकी अधिकांश आय भोजन पर व्यय होती है, इसके अलावा, विनिर्मित वस्तुओं की मरम्मत और रखरखाव की लागत अधिक होती है)।
  4. भारत की नीतियों में, गहन-श्रम प्रधान विनिर्माण फर्मों को प्रायः लघु उद्योग की श्रेणी में रखा जाता है, जिससे इनके विकास की गति अवरुद्ध होती है।
  5. भारत के द्वारा, अपने गहन-श्रम प्रधान विनिर्माण उत्पादों को निर्यात में आक्रामकता प्रदर्शित करते हुए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत करने पर जोर नहीं दिया जा रहा है।
  6. इसके बजाय, आत्मनिर्भरता के नाम पर, इसके द्वारा आयात को प्रतिस्थापित करने के विचार को लागू किया जा रहा है।

महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ (MII) पहल और नवीनतम उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना के साथ समस्याएं:

इन पहलों का उद्देश्य, श्रम-गहन विनिर्माण न होकर, फिर से, पूंजी-गहन विनिर्माण है। इसके अलावा, हाल के वर्षों में, भारत एक बार फिर से आत्मनिर्भरता हासिल करने प्रयोजन से संरक्षणवादी दृष्टिकोण की ओर वापस लौट रहा है।

सीधे शब्दों में:

रोजगार सृजन के दृष्टिकोण से भारत दोहरी मार झेल रहा है। विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र में नौकरियां पैदा होने की बजाय इनमे कमी हो रही है। इसके अलावा, कोविड-जनित व्यवधानों के कारण सेवा उद्योग में भी बड़े स्तर पर रोजगार में कमी आई है, जिससे स्थिति और बदतर हो गयी है।

समय की मांग:

भारतीय विनिर्माण क्षेत्र, अभी भी नई नौकरियां पैदा करने और कृषि कार्य में लगे अतिरिक्त अकुशल श्रम बल की खपत करने के लिए भारत की सबसे अच्छी उम्मीद है। नीति निर्माताओं द्वारा, लाखों नए रोजगार सृजित करने हेतु, विनिर्माण क्षेत्र के लिए गहन-श्रम केंद्रित फर्मों, खासकर अनौपचारिक क्षेत्र में (जैसे कि, MSME) को लक्षित करने, तथा बेहतर बुनियादी ढांचे और आसान विनियामको के माध्यम से उनकी मदद किये जाने की आवश्यकता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

चीन का ‘ज़्यूरोंग’ रोवर


(China’s ‘Zhurong’ rover)

संदर्भ:

हाल ही में, चीन का मानव रहित तियानवेन-1′ (Tianwen-1) अंतरिक्ष यान, मंगल की सतह पर सुरक्षित रूप से उतर गया है।

  • यह अंतरिक्ष यान, मंगल ग्रह के उत्तरी गोलार्ध में स्थित, यूटोपिया प्लैनिटिया’ (Utopia Planitia) नामक एक बड़े मैदान में उतरा है।
  • इसके साथ ही, चीन, रहस्यमयी लाल ग्रह पर अन्वेषण करने हेतु रोवर भेजने वाला विश्व का दूसरा देश बन गया है।
  • इस लैंडर पर भेजे गए ‘ज़्यूरोंग’ रोवर (‘Zhurong’ rover) को शीघ्र ही मंगल ग्रह के वातावरण और भूविज्ञान का अध्ययन करने हेतु उतारा जाएगा।

तियानवेन-1: चीन का मंगल अभियान

जुलाई 2020 में प्रक्षेपित किए गए इस मिशन में एक ऑर्बिटर, एक लैंडर और गोल्फ कार्ट के आकार का एक ‘ज़्यूरोंग’ रोवर शामिल है।

यह अंतरिक्ष यान, इसी वर्ष फरवरी में मंगल की कक्षा में पहुंचा था।

यिंगहुओ-1 मिशन:

चीन द्वारा मंगल ग्रह पर अंतरिक्ष यान भेजने का यह पहला प्रयास नहीं है। इसके पूर्व, लगभग दस साल पहले, चीन द्वारा ‘यिंगहुओ –1 (Yinghuo-1) मिशन लॉन्च किया गया था। यह मिशन, इसे ले जाने वाले रूसी रॉकेट द्वारा उड़ान भरने में विफल रहने के कारण पृथ्वी के वायुमंडल में ही अंतरिक्ष यान के जल जाने के बाद असफल हो गया था।

इसके आगे:

यदि ‘ज़्यूरोंग’ रोवर बिना किसी रूकावट अपना कार्य आरंभ कर देता है, तो चीन, अपने पहले मंगल मिशन के दौरान, मंगल ग्रह का सफलतापूर्वक परिक्रमण करने, इसकी सतह पर अंतरिक्ष यान उतारने, तथा रोवर को तैनात करने वाला पहला देश बन जाएगा।

कौन से अन्य देश मंगल ग्रह पर रोवर भेजने में कामयाब रहे हैं?

चीन के अलावा, केवल संयुक्त राज्य अमेरिका ही लाल ग्रह की सतह का अध्ययन करने के लिए रोवर्स तैनात करने में सक्षम है।

  • नासा द्वारा, जुलाई 1976 में, मंगल ग्रह पर पहली सफल लैंडिंग की गई थी। इस मिशन में, ‘वाइकिंग 1’ रोवर (Viking 1 rover) मंगल ग्रह की सतह पर उतरा था।
  • इसके कुछ ही समय बाद, लाल ग्रह पर ‘वाइकिंग 2’ को भेजा गया था।
  • इसके बाद के दशकों में, अमेरिका ने मंगल ग्रह का अन्वेषण करने हेतु, स्पिरिट तथा अपार्चुनिटी रोवर्स भेजे गए।
  • इस साल फरवरी में, नासा का ‘परसिवरेंस रोवर’ (Perseverance rover) मंगल ग्रह की सतह पर स्थित ‘जेज़ेरो क्रेटर’ (Jezero Crater) पर उतरा, और इसने ग्रह पर अतीत के जीवन-संकेतों को खोजने के लिए कार्य शुरू कर दिया है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘ज़्यूरोंग’ रोवर के बारे में
  2. चीन के मंगल मिशन के उद्देश्य
  3. अन्य मंगल मिशन
  4. भारत का मंगल मिशन

मेंस लिंक:

चीन के मंगल मिशन के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

एयर इंडिया द्वारा ‘जिओलाइट कार्गो उड़ान सेवा’ की शुरुआत


(Air India begins zeolite cargo flight service)

संदर्भ:

भारत सरकार द्वारा चिकित्सीय ऑक्सीजन संयंत्रों में उपयोग हेतु विश्व भर से ‘जिओलाइट’ (Zeolite) आयात करने की प्रक्रिया शुरू किए जाने के साथ ही, राष्ट्रीय वायुयान कंपनी ‘एयर इंडिया’ ने अपनी पहली “जियोलाइट कार्गो उड़ान सेवा” (Zeolite Cargo Flights) का आरंभ कर दिया है है।

  • सरकार ने, विदेश से आने वाली इन खेपों के लिए ‘रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन’ (DRDO) को चार्टरर (Charterer) के रूप में नियुक्त किया है।
  • DRDO द्वारा ‘प्रधान मंत्री नागरिक सहायता और आपातकालीन स्थितियों में राहत’ (पीएम केयर्स) कोष के तहत, इन चिकित्सीय ऑक्सीजन संयंत्रों की स्थापना की जाएगी।

चिकित्सीय ऑक्सीजन संयंत्रों में जिओलाइट का उपयोग:

DRDO द्वारा विकसित की जा रही तकनीक में, ऑक्सीजन उत्पादन हेतु ‘दबाव-परिवर्तन अधिशोषण’ (Pressure Swing Adsorption- PSA) प्रक्रिया तथा ‘आणविक रूप से छनित जिओलाइट’ (Molecular Sieve Zeolite) का उपयोग किया जाता है।

  • जिओलाइट्स का उपयोग अधिशोषक पदार्थ (adsorbent material) के रूप में किया जाता है।
  • ऑक्सीजन संकेन्द्रक (oxygen concentrator) वायुमंडलीय नाइट्रोजन का अधिशोषण करने के लिए जिओलाइट्स का उपयोग करते हैं, और फिर नाइट्रोजन को बाहर निकाल निकाल देते है। इसके पश्चात, मरीजों के उपयोग में आने वाली ऑक्सीजन गैस शेष बच जाती है।
  • उच्च दाब पर ‘जिओलाइट्स’ का पृष्ठीय क्षेत्रफल बढ़ जाता है और इस स्थिति में यह अधिक मात्रा में नाइट्रोजन का अधिशोषण करने में सक्षम होती है।

‘दबाव-परिवर्तन अधिशोषण’(PSA) क्या होता है?

दबाव-परिवर्तन अधिशोषण (Pressure Swing Adsorption- PSA), अधिशोषक सामग्री से समानता तथा गैसीय वर्ग की आणविक विशेषताओं के अनुसार, दबाव के माध्यम से, गैसों के मिश्रण से कुछ गैसीय वर्गों को पृथक करने में प्रयुक्त की जाने वाली एक तकनीक है।

  • यह लगभग वातावरण के तापमान पर कार्य करती है, तथा गैस पृथक्करण की क्रायोजेनिक आसवन तकनीक से काफी भिन्न होती है।
  • उच्च दाब पर लक्षित गैसीय वर्ग का अधिशोषण करने हेतु, विशिष्ट अधिशोषक (Adsorbent) सामग्रियों (जैसेकि जिओलाइट्स, सक्रिय कार्बन, आणविक छलनी, आदि) का उपयोग एक जाल (trap) के रूप में किया जाता है।
  • इसके बाद, प्रक्रिया में परिवर्तन कर निम्न दाब करके अधिशोषित सामग्री का विशोषण (desorb) किया जाता है।

‘जिओलाइट्स’ क्या हैं?

जिओलाइट (Zeolites), सूक्ष्मरंध्र युक्त, एल्यूमीनियम सिलिकेट के ठोस त्रिविमीय क्रिस्टल होते हैं। जिओलाइट्स में एक निश्चित आकार के सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जिनमे से छोटे अणु आसानी से गुजर जाते है, किंतु बड़े आकार वाले अणु नहीं गुजर पाते है; इसी वजह से इनके लिए कभी-कभी आणविक छलनी कहा जाता है।

जिओलाइट्स, प्राकृतिक रूप से अथवा संश्लेषण के माध्यम से निर्मित किये जाते हैं।

जिओलाइट्स के गुण:

  • जिओलाइट, विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में काफी स्थिर ठोस पदार्थ होते हैं। जिओलाइट का गलनांक बहुत अधिक, अर्थात 10000 C होता है।
  • ये जल अथवा किसी अन्य अकार्बनिक विलयन में अघुलनशील होते हैं।
  • वायु की उपस्थिति में इनका ऑक्सीकरण नहीं होता है।
  • एल्यूमिना से भरपूर जिओलाइट, जल जैसे ध्रुवीय अणुओं (polar molecules) की ओर आकर्षित होते हैं जबकि सिलिका से भरपूर जिओलाइट, गैर-ध्रुवीय अणुओं की ओर आकर्षित होते हैं।
  • चूंकि जिओलाइट अभिक्रियाशील नहीं होते हैं और प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले खनिजों से प्राप्त होते हैं, इसलिए इनका कोई हानिकारक पर्यावरणीय प्रभाव नहीं होता है; हालांकि त्वचा के संपर्क में आने अथवा श्वांस के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करने पर ‘कैंसर’ का खतरा हो सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. दबाव-परिवर्तन अधिशोषण’ (PSA) तकनीक क्या है?
  2. जिओलाइट्स के बारे में
  3. स्रोत
  4. गुण
  5. अनुप्रयोग

मेंस लिंक:

‘दबाव-परिवर्तन अधिशोषण’(PSA) तकनीक पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

दस सालों में 186 हाथियों की  रेल की पटरियों पर मौत


संदर्भ:

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अनुसार, 2009-10 और 2020-21 के बीच पूरे भारत में ट्रेनों की चपेट में आने से कुल 186 हाथियों की मौत हुई है।

असम में, रेल की पटरियों पर सर्वाधिक (62)  हाथियों की मौतें हुई हैं, इस मामले में, इसके बाद पश्चिम बंगाल (57), और ओडिशा (27) का स्थान है।

किए जाने वाले प्रमुख उपाय:

  1. रेल दुर्घटनाओं से होने वाली हाथियों की मौत को रोकने के लिए रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) और MoEFCC के बीच एक स्थायी समन्वय समिति का गठन।
  2. लोको पायलटों को स्पष्टतयः दिखाई देने के लिए रेलवे पटरियों के किनारे के पेड़-पौधों की सफाई करना।
  3. लोको पायलटों के लिए, हाथियों की उपस्थिति के बारे में सचेत करने हेतु, उपयुक्त स्थानों पर चेतावनी संकेतक बोर्डों का उपयोग करना।
  4. रेलवे पटरियों के ऊपर उठे हुए भागों (elevated sections) के ढलान को मध्यम करना।
  5. हाथियों के सुरक्षित आवागमन के लिए अंडरपास/ओवरपास का निर्माण करना।
  6. हाथियों के आवगमन वाले संवेदनशील हिस्सों में सूर्यास्त से सूर्योदय तक ट्रेन की गति का नियमन करना।
  7. वन विभाग के अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों और वन्यजीव पर्यवेक्षकों द्वारा रेलवे पटरियों के संवेदनशील हिस्सों की नियमित गश्त करना।

समाधान के रूप में इको-ब्रिज (Eco-Bridge):

  • पारिस्थितिकी-पुल अथवा ‘इको-ब्रिज’, वन्यजीव गलियारे होते हैं, जिन्हें समान वन्यजीव आवासों के दो बड़े क्षेत्रों को परस्पर जोड़ने वाले वन्यजीव क्रॉसिंग के रूप में भी जाना जाता है। ये वन्यजीव आवासों के मध्य एक कड़ी की भांति होते हैं।
  • पारिस्थितिकी-पुल, मानव गतिविधियों या संरचनाओं जैसे सड़कों और राजमार्गों, अन्य बुनियादी ढांचे के विकास, और खेती आदि की वजह से अलग-अलग रहने वाली वन्यजीव आबादी को आपस में जोड़ते हैं।
  • इको ब्रिज का उद्देश्य वन्यजीव कनेक्टिविटी को बढ़ाना है।
  • इको ब्रिज, स्थानीय वनस्पतियों से निर्मित होते हैं अर्थात, इसे भू-दृश्यों को एक साथ लगा हुआ दिखने के लिए स्थानीय पेड़-पौधों से तैयार किया जाता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. एशियाई हाथी की IUCN संरक्षण स्थिति
  2. भारत में हाथी गलियारे।
  3. हाथियों का प्रजनन काल
  4. भारत का विरासत पशु
  5. गज यात्रा के बारे में
  6. हाथी झुंड का नेतृत्व किसके द्वारा किया जाता है?
  7. भारत में हाथियों की सर्वाधिक आबादी वाला राज्य

मेंस लिंक:

पर्यावरण मंत्रालय द्वारा मानव-हाथी संघर्ष के प्रबंधन के लिए सुझाए गए उपायों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


‘विंचकंब’ (Winchcombe)

यह एक उल्कापिंड (Meteorite) है।

फरवरी 2021 में ब्रिटेन के ग्लॉस्टरशायर के ‘विंचकंब’ (Winchcombe) नामक शहर में, ‘विंचकंब उल्कापिंड’ (Winchcombe meteorite) का एक हिस्सा पृथ्वी की सतह पर गिरा था।

इसे अगले सप्ताह से, राष्ट्रीय इतिहास संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाएगा।

उल्का (Meteoroid), उल्कापात (Meteor) तथा उल्कापिंड (Meteorite) में अंतर:

  1. उल्का, आकार में धूमकेतु अथवा क्षुद्रग्रह से पिंड होते हैं, जो सूर्य की परिक्रमा करते है।
  2. उल्कापात, जब कोई उल्का पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय वाष्पित हो जाती है, उस समय होने वाली इस प्रकाशीय घटना को उल्कापात कहा जाता है, जिसे ‘टूटता तारा’ भी कहते है।
  3. उल्कापिंड, यह वह उल्का होती है, जो पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते समय नष्ट होने से बच जाती है तथा पृथ्वी की सतह पर आकर टकराती है।

‘सबडॉलूसेप्स नीलगिरिएन्सिस’

(Subdoluseps nilgiriensis)

यह, अनाइकट्टी पहाड़ियों, कोयंबटूर में, हाल ही में खोजी गई एशियाई ग्रेसिल स्किंक (Asian gracile skink) की एक नई प्रजाति है।

  • स्किंक (Skink), छिपकली वर्ग’ के अंतर्गत आने वाले एक प्रकार के सरीसृप जीव होते हैं।
  • यह प्रजाति, पिछली सहस्राब्दी के दौरान भारत की मुख्य भूमि में खोजी जाने वाली तीसरी स्किंक प्रजाति है।
  • इस सरीसृप का शरीर लगभग 7 सेमी पतला होता है और यह रेतीले भूरे रंग का होता है। स्किंक के हाथ-पैर लगभग दिखाई नहीं देते हैं, इस कारण यह सांप की भांति प्रतीत होती है।
  • अधिकांश स्किंक दिनचर (diurnal) तथा विषहीन होते हैं।
  • दीमक, छोटी-छोटी मकड़ियां, झींगुर आदि अन्य कीट स्किंक का भोजन होते हैं।
  • वर्तमान में, इसे ‘असुरक्षित’ (Vulnerable) प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

डूम्सडे सर्फिंग

(Doomsday Surfing)

कयामत के दिन तक सर्फिंग, अर्थात ‘डूम्सडे सर्फिंग’ (Doomsday Surfing), का तात्पर्य इंटरनेट पर बुरी खबरों को लगातार देखते रहना और उन्हें खोजते रहना है, भले ही ये खबरे कितनी भी दुखद या निराशाजनक हो।

चिंता का विषय:

कई सारे लोगों को, लगातार बिना रुके कोविड-19 के बारे में बुरी खबरें पढ़ते हुए पाया गया है, इस प्रक्रिया में ये लोग अपने सोने के महत्वपूर्ण समय तथा कामकाज के समय की भी परवाह नहीं कर रहे हैं।

राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति

(National Crisis Management CommitteeNCMC)

  • प्राकृतिक आपदाओं के मद्देनजर राहत उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए, भारत सरकार द्वारा कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक स्थायी राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति का गठन किया है।
  • अन्य सदस्य: सभी संबंधित संस्थाओं के साथ-साथ मंत्रालयों/विभागों के सचिव इस समिति के सदस्य होते हैं।
  • राष्ट्रीय संकट प्रबंधन समिति (NCMC), आवश्यक समझे जाने पर ‘संकट प्रबंधन समूह’ (CMG) को दिशा निर्देश देती है।

Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates

Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos