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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 10 May 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-I

1. महाराणा प्रताप

2. गोपाल कृष्ण गोखले

 

सामान्य अध्ययन-II

1. ब्लैक फंगस

2. आर्कटिक विज्ञान मंत्रिस्तरीय बैठक

 

सामान्य अध्ययन-III

1. मालदीव के समीप हिंद महासागर में चीनी रॉकेट का मलबा

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. माउंट सिनाबंग

2. बद्रीनाथ धाम

3. 2-डिऑक्सी-डी-ग्लूकोज (2-DG)

4. शुवुइया डेजर्टी

 


सामान्य अध्ययन-I


 

विषय: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

महाराणा प्रताप


संदर्भ:

9 मई को मेवाड़ के 13 वें राजपूत शासक महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जाती है। महाराणा प्रताप का जन्म वर्ष 1540 में हुआ था और 56 वर्ष की आयु में, वर्ष 1597 में उनकी मृत्यु हो गई थी।

वे उदयपुर शहर के संस्थापक, राणा उदय सिंह द्वितीय के सबसे बड़े पुत्र थे।

हल्दीघाटी का युद्ध:

महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी के युद्ध में उनकी वीरता के लिए जाना जाता है।

  • यह युद्ध, वर्ष 1576 में महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच लड़ा गया था, इस युद्ध में मुग़ल सेना का नेतृत्व आमेर के शासक राजा मान सिंह ने किया था।
  • इस लड़ाई में महाराणा की सेनाएं 6 घंटे में पराजित हो गई, किंतु मुग़ल उन्हें पकड़ने में नाकाम रहे।
  • महाराणा प्रताप ने अपनी सेना पुनः एकत्रित की और छह वर्षों के पश्चात् वर्ष 1582 में मुगलों से युद्ध किया और विजय हासिल की।
  • इस बुरी तरह से हार के बाद, अकबर ने मेवाड़ के खिलाफ अपने सैन्य अभियानों को रोक दिया।

विरासत (Legacy):

  • राणा प्रताप ने शक्तिशाली मुगल साम्राज्य को लगभग अकेले ही चुनौती दी थी और इसमें किसी अन्य राजपूत शासकों ने सहायता नहीं की। यह राजपूत वीरता की शानदार गाथा और अपने सिद्धांतों के लिए आत्म बलिदान की भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • राणा प्रताप की छापेमार युद्ध-पद्धति को, बाद में दक्कन के सेनापति मलिक अंबर, और शिवाजी महाराज द्वारा आगे बढाया गया।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. हल्दीघाटी की लड़ाई- कारण, किनके बीच लड़ी गई और इसके परिणाम।
  2. अकबर का शासनकाल, सांस्कृतिक योगदान।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: स्वतंत्रता संग्राम- इसके विभिन्न चरण और देश के विभिन्न भागों से इसमें अपना योगदान देने वाले महत्त्वपूर्ण व्यक्ति/उनका योगदान।

गोपाल कृष्ण गोखले


संदर्भ:

प्रधानमंत्री द्वारा ‘गोपाल कृष्ण गोखले’ को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि दी गई। इनका जन्म 9 मई 1866 को हुआ था।

गोपाल कृष्ण गोखले का भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान:

  • इन्होंने ‘डेक्कन एजुकेशन सोसायटी’ के सचिव के रूप में कार्य किया।
  • उन्होंने आयरिश राष्ट्रवादी अल्फ्रेड वेब को वर्ष 1894 में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए तैयार करने हेतु आयरलैंड का दौरा किया।
  • गोखले ने ज्ञानप्रकाश नामक एक दैनिक समाचार पत्र भी प्रकाशित किया, जिसके माध्यम से उन्होंने राजनीति और समाज पर अपने सुधारवादी विचारों को प्रचारित किया।
  • बाद में, इनके लिए वर्ष 1903 में, भारत के गवर्नर-जनरल की परिषद का सदस्य चुना गया।
  • इनके लिए वर्ष 1904 के नए साल की सम्मान सूची में भारतीय साम्राज्य के साथी के रूप में नियुक्त किया गया था।
  • वर्ष 1905 में, इन्होंने ‘सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना की, इसके माध्यम से लोगों को निस्वार्थ काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। इनके लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में भी चुना गया था।
  • वर्ष 1909 के मिंटो-मॉर्ले सुधारों को तैयार करने में इनका महत्वपूर्ण योगदान था, जो अंततः कानून के रूप में लागू किये गए।
  • गोखले, मोहम्मद जिन्ना और महात्मा गांधी दोनों के गुरु थे। महात्मा गांधी ने गोखले, मेरे राजनीतिक गुरुनामक एक पुस्तक भी लिखी थी।
  • सभी भारतीयों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार और आर्थिक प्रगति के महत्व के बारे में उनकी मूलभूत अवधारणाएं अभी भी हमारे समय के लिए प्रासंगिक है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. गोखले किन संगठनों के सदस्य थे?
  2. गवर्नर काउंसिल और इम्पीरियल काउंसिल में इनका चुनाव
  3. स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका
  4. गोखले पर गांधी द्वारा लिखित पुस्तक का नाम
  5. किस वर्ष में गोखले कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए?
  6. मराठा पत्र को किसने प्रकाशित किया था?
  7. डेक्कन एजुकेशन सोसायटी की स्थापना किसने की?
  8. गोखले द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र।
  9. मॉर्ले मिंटो सुधारों का सार।

मेंस लिंक:

गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में किए गए महत्वपूर्ण योगदानों के महत्व पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

ब्लैक फंगस


(Black fungus)

संदर्भ:

भारत में तेजी से बढ़ रहे कोरोना संक्रमण के बीच एक नई और दुर्लभ बीमारी ने भी दस्तक दे दी है, जिसे ब्लैक फंगस (Black fungus) के नाम से जाना जाता है।

यह बीमारी, भारत के कुछ राज्यों में कोविड-19 से संक्रमित रोगियों में तुलनात्मक रूप से अक्सर पाई जा रही है।

इस बीमारी के बारे में:

  • यह एक दुर्लभ तथा गंभीर कवक संक्रमण (fungal infection) है।
  • इसे ‘म्यूकॉरमाइकोसिस’ (Mucormycosis) के नाम से भी जाना जाता है।
  • यह बीमारी प्रायः त्वचा पर दिखाई पड़ती है और रोगी के फेफड़ों तथा मस्तिष्क को भी प्रभावित करटी है।
  • ब्लैक फंगस बीमारी, वातावरण में प्राकृतिक रूप से मौजूद ‘म्यूकॉरमाइसेट्स’ (mucormycetes) के रूप में जाने वाले फफूंद अर्थात फंगस के कारण होती है।

भेद्यता:

यह बीमारी, मुख्यतः उन लोगों को प्रभावित करती है, जो स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए वे दवाएं ले रहे होते हैं, जिनके कारण उनकी पर्यावरणीय रोगजनकों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है।

लक्षण:

  • ऐसे व्यक्तियों द्वारा सांस लेने के दौरान कवक जीवाणु (fungal spores), इनके श्वांस छिद्रों या साइनस तथा फेफड़ों में पहुँच कर उन्हें प्रभावित करते हैं।
  • संक्रमण की चेतावनी के संकेत के तौर पर, बुखार, सिरदर्द, खांसी, सांस लेने में तकलीफ, खूनी उल्टी और बदलती हुई मानसिक स्थिति तथा आंखों तथा नाक के आसपास लालिमा और दर्द की शिकायत होती है।

उपचार:

  • कवकरोधी अर्थात एंटीफंगल (antifungal) थेरेपी के द्वारा इलाज किया जाता है।
  • संक्रमण की गंभीर स्थिति में सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है।
  • इस बीमारी के उपचार के लिए, मधुमेह को नियंत्रित करना, स्टेरॉयड के उपयोग को कम करना और इम्यूनोमॉड्यूलेटिंग (immunomodulating) दवाओं को बंद करना अत्यंत आवश्यक होता है।

रोकथाम:

यदि आप धूल भरे निर्माण स्थलों का दौरा कर रहे हैं तो मास्क का उपयोग करें। बागवानी करते समय जूते, लंबी पतलून, लंबी बाजू की शर्ट और दस्ताने पहनें। अच्छी तरह से नहाएं (स्क्रब बाथ) और व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखें।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ब्लैक फंगस बीमारी के बारे में
  2. कारण
  3. प्रसरण
  4. लक्षण
  5. रोकथाम

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

आर्कटिक विज्ञान मंत्रिस्तरीय बैठक


संदर्भ:

हाल ही में, आर्कटिक क्षेत्र में अनुसंधान और सहयोग पर विचार-विर्मश हेतु आयोजित तीसरे आर्कटिक विज्ञान मंत्रिस्तरीय (3rd Arctic Science Ministerial– ASM3) वैश्विक मंच की बैठक में भारत ने भाग लिया।

प्रमुख तथ्य:

  • पहली दो बैठकों ASM1 और ASM2 का आयोजन क्रमश: वर्ष 2016 में अमेरिका और वर्ष 2018 में जर्मनी में किया गया था।
  • ASM3 का आयोजन आइसलैंड और जापान द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है, और यह एशिया में आयोजित की जाने वाली पहली आर्कटिक विज्ञान मंत्रिस्तरीय बैठक है।
  • इस बैठक का आयोजन, आर्कटिक क्षेत्र के बारे में सामूहिक समझ बढ़ाने तथा इसकी निरंतर निगरानी पर जोर देते हुए शिक्षाविदों, स्थानीय समुदायों, सरकारों और नीति निर्माताओं सहित विभिन्न हितधारकों को इस दिशा में अवसर प्रदान करने हेतु किया गया है।
  • इस वर्ष का विषय ‘संवहनीय आर्कटिक के लिए जानकारी’ (Knowledge for a Sustainable Arctic) है।

आर्कटिक क्षेत्र को बनाए रखने में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सहयोग की आवश्यकता:

आर्कटिक क्षेत्र मे बढ़ती गर्मी और इसकी बर्फ पिघलना वैश्विक चिंता का विषय हैं क्योंकि ये जलवायु, समुद्र के स्तर को विनियमित करने और जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं।

  • इसके अलावा, आर्कटिक और हिंद महासागर के करीब होने के प्रमाण हैं (जो भारतीय मॉनसून को नियंत्रित करता है)।
  • इसलिए, भौतिक प्रक्रियाओं की समझ में सुधार करना और भारतीय गर्मियों के मॉनसून पर आर्कटिक बर्फ के पिघलने के प्रभाव को कम करना बहुत महत्वपूर्ण है।

भारत और आर्कटिक:

  • वर्ष 2013 से, भारत को बारह अन्य देशों (जापान, चीन, फ्रांस, जर्मनी, यूके, इटली, स्विट्जरलैंड, पोलैंड, स्पेन, नीदरलैंड, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया) के साथ आर्कटिक परिषद में पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त है।
  • भारत, आर्कटिक से पेरिस में स्वालबार्ड संधि (Svalbard Treaty) पर वर्ष 1920 में हस्ताक्षर करने के बाद से जुड़ा हुआ है।
  • जुलाई 2008 से, भारत का आर्कटिक में नॉर्वे के स्वालबार्ड क्षेत्र के न्यालेसुंड (NyAlesund, Svalbard Area) में हिमाद्री नामक एक स्थायी अनुसंधान स्टेशन है।
  • भारत द्वारा, जुलाई 2014 से कांग्सजोर्डन फ़ियोर्ड (Kongsfjorden fjord) में इंडआर्क (IndARC) नामक एक बहु-संवेदक यथास्थानिक वेधशाला (multi-sensor moored observatory) भी तैनात की गई है।
  • आर्कटिक क्षेत्र में भारत के अनुसंधान कार्यों का समन्वयन, संचालन और प्रचार-प्रसार भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत गोवा में स्थित ‘राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र’ (National Centre for Polar and Ocean Research– NCPOR) द्वारा किया जाता है।

भारत के अन्य योगदान:

  • भारत ने आर्कटिक में, यथास्थान (in-situ) और रिमोट सेंसिंग, दोनों अवलोकन प्रणालियों में योगदान करने की अपनी योजना साझा की।
  • भारत ऊपरी महासागर कारकों और समुद्री मौसम संबंधी मापदंडों की लंबी अवधि की निगरानी के लिए आर्कटिक में खुले समुद्र में नौबंध की तैनाती करेगा।
  • यूएसए के सहयोग से ‘नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार’ (NISER) उपग्रह मिशन का शुभारंभ हो रहा है। NISER का उद्देश्य उन्नत रडार इमेजिंग का उपयोग करके भूमि की सतह के परिवर्तनों के कारण और परिणामों का वैश्विक रूप से मापन करना है।
  • सतत आर्कटिक निगरानी नेटवर्क (Sustained Arctic Observational Network SAON) में भारत का योगदान जारी रहेगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ASM- उद्देश्यों और बैठकों के बारे में
  2. SAON के बारे में
  3. NISER क्या है?
  4. आर्कटिक परिषद के बारे में
  5. NCPOR के बारे में
  6. IndARC क्या है?
  7. आर्कटिक में भारत के स्थायी अनुसंधान स्टेशन के बारे में।

स्रोत: पीआईबी

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

मालदीव के समीप हिंद महासागर में चीनी रॉकेट का मलबा


संदर्भ:

हाल ही में, चीनी रॉकेट लॉन्ग मार्च (Long March rocket) के अंतिम चरण का मलबा मालदीव के पश्चिम में हिंद महासागर में गिर गया। पिछले महीने, इस राकेट से चीन द्वारा अपने निर्माणाधीन अंतरिक्ष स्टेशन के प्रमुख घटक अंतरिक्ष में भेजे गए थे।

प्रमुख तथ्य:

  • लॉन्ग मार्च -5 बी वाई2 (Long March-5B Y2) रॉकेट, चीनी अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण हेतु तीन प्रमुख घटकों में से पहले घटक ‘तियान्हे’ अर्थात ‘स्वार्गिक समरसता’ (Heavenly Harmony) मॉड्यूल (Tianhe module) को ले जा रहा था। चीनी अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण अगले साल के अंत तक पूरा हो जाएगा।
  • तियान्हे मॉड्यूल, तियांगॉन्ग (Tiangong) स्पेस स्टेशन के प्रबंधन और नियंत्रण केंद्र के रूप में कार्य करेगा।
  • तियांगॉन्ग, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के बाद दूसरा अंतरिक्ष स्टेशन होगा। इसे 10 साल के जीवन काल हेतु डिजाइन किया गया है, हालांकि यह 15 साल या वर्ष 2037 तक कार्य कर सकता है।

संबंधित चिंताएं और मुद्दे:

  • इस राकेट के पृथ्वी के वायुमंडल में में पुनः प्रवेश (re-entry) को, खगोलविदों ने इतिहास का चौथा सबसे बड़ा अनियंत्रित पुनः प्रवेश बताया है। यदि यह राकेट कहीं स्थल पर गिरा होता तो इससे कितना नुकसान होता, हाल के दिनों में, इस बारे में चिंताएं उत्पन्न हो गई हैं।
  • अमेरिका की ‘नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन’ (NASA) ने चीन की आलोचना करते हुए इसे “ज़िम्मेदार मानकों को पूरा करने में विफल” बताया।
  • कुछ लोगों ने, इस मलबे के अधिकाँश भाग के वायुमंडल जलने से मनुष्यों को हानि पहुंचने आशंका व्यक्त की है। एक तथ्य यह भी है, कि पृथ्वी का अधिकांश भाग महासागरों से आच्छादित है, और काफी विशाल भूमि क्षेत्र निर्जन हैं।

समय की मांग:

अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले देशों (Spacefaring nations) के लिए अंतरिक्षीय पिंडो के पृथ्वी के वायुमंडल में में पुनः प्रवेश करने के दौरान पृथ्वी निवासियों और संपत्ति को होने वाले नुकसान के खतरे को न्यूनतम करना चाहिए और इन कार्रवाइयों के बारे में अधिकतम पारदर्शिता लाई जानी चाहिए।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


माउंट सिनाबंग

(Mount Sinabung)

यह ज्वालामुखी पर्वत इंडोनेशिया में स्थित है। लगभग 400 वर्षों तक निष्क्रिय रहने के बाद वर्ष 2010 में इसमें उद्भेदन हुआ था, उसके बाद से यह सक्रिय ज्वालामुखी है।

चर्चा का कारण:

हाल ही में, माउंट सिनाबंग में विस्फोट हुआ है।

पृष्ठभूमि:

इंडोनेशिया की “रिंग ऑफ फायर” या ‘परिप्रशांत महासागरीय मेखला’ (Circum-Pacific Belt) में अवस्थिति के कारण यहाँ कई सक्रिय ज्वालामुखी पाए जाते हैं। इसके अलावा, यह क्षेत्र भूकंप प्रवण क्षेत्र के अंतर्गत भी आता है।

बद्रीनाथ धाम

तेल क्षेत्र के पांच सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) ने उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम को स्मार्ट आध्यात्मिक शहर (spiritual smart city) के रूप में विकसित करने के लिए 100 करोड़ रुपये का वादा किया है।

  • विकास गतिविधियों में, नदी के तटबंधों पर किया जाना वाला कार्य, सभी इलाक़ों में वाहन मार्गों का निर्माण, पुल निर्माण, मौजूदा पुलों का सौंदर्यीकरण, आवास-सहित गुरुकुल सुविधाओं की स्थापना करना आदि शामिल होंगे।
  • इन कार्यों पर होने वाले व्यय का वहन कंपनियों द्वारा अपने CSR फंड से किया जाएगा।

बद्रीनाथ धाम की भौगोलिक अवस्थिति:

बद्रीनाथ, अलकनंदा नदी के तट पर गढ़वाल हिमालय में अवस्थित है। यह शहर, नीलकंठ चोटी (6,596 मी) से 9 किमी पूर्व, नर और नारायण पर्वत के मध्य स्थित है। बद्रीनाथ, नंदा देवी चोटी के उत्तर पश्चिम में 62 किमी दूर और ऋषिकेश से 301 किमी उत्तर में स्थित है।

2-डिऑक्सी-डी-ग्लूकोज (2-DG)

(Drug 2-deoxy-D-glucose)

हाल ही में, भारतीय औषधि महानियंत्रक (Drug Controller General of India– DCGI) ने DRDO की 2-DG दवा के आपातकालीन उपयोग की सामान्य तथा गंभीर कोविड-19 रोगियों में सहायक चिकित्सा के रूप में अनुमति प्रदान कर दी है।

  • 2-DG, अस्पताल में भर्ती मरीजों की तेजी से ठीक होने में मदद करती है और एवं बाहर से ऑक्सीजन देने पर निर्भरता को कम करता है।
  • 2-डिऑक्सी-डी-ग्लूकोज (2-DG) दवा को, हैदराबाद स्थित डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज के सहयोग से रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की प्रयोगशाला इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज (INMAS) द्वारा विकसित किया गया है।

शुवुइया डेजर्टी

(Shuvuuia deserti)

यह, 70 मिलियन वर्ष पूर्व पाए जाने वाले निशाचर डायनासोर के समान एक छोटा पक्षी है।

  • यह तीतर पक्षी के आकार का, दो पैरों वाला क्रेटेशियस काल में पाया जाने वाल डायनोसोर था, और इसका वजन एक छोटी घरेलू बिल्ली के बराबर होता था।
  • यह जीवित रहने के लिए उत्कृष्ट रात्रि दृष्टि और श्रवण क्षमता का उपयोग करता था।
  • इसमें, मांसाहारी डायनासोरों की भांति मजबूत जबड़े और नुकीले दांत नहीं पाए जाते थे, और इसकी विशेष रूप से पक्षी की तरह हल्की खोपड़ी और चावल के दाने जैसे कई छोटे दांत होते थे।


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