Print Friendly, PDF & Email

INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 26 April 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-I

1. आर्मेनियाई लोगों के साथ वर्ष 1915 में हुई घटनाएँ

 

सामान्य अध्ययन-II

1. पीएम केयर

 

सामान्य अध्ययन-III

1. साइबर अपराध स्वयंसेवक कार्यक्रम

2. अनिवार्य लाइसेंस

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. डीप टाइम प्रोजेक्ट

 


सामान्य अध्ययन-I


 

विषय: विश्व के इतिहास में 18वीं सदी तथा बाद की घटनाएँ यथा औद्योगिक क्रांति, विश्व युद्ध।

आर्मेनियाई लोगों के साथ वर्ष 1915 में हुई घटनाएँ


संदर्भ:

हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने वर्ष 1915-16 में ऑटोमन तुर्कों द्वारा अर्मेनियाई लोगों की सामूहिक हत्याओं को आधिकारिक तौर पर “नरसंहार का कृत्य” के रूप में से मान्यता दी है।

पृष्ठभूमि:

प्रथम विश्व युद्ध के शुरुआती चरण में, ओटोमन साम्राज्य के राज्य-क्षेत्र के भीतर लगभग 1.5 मिलियन आर्मेनियाई मारे जाने का अनुमान लगाया जाता है।

तुर्की की प्रतिक्रिया:

तुर्की द्वारा अर्मेनियाई लोगों के खिलाफ किये गए अत्याचारों को तो स्वीकार किया गया है, किंतु यह, इन घटनाओं को ‘नरसंहार’ मानने से इंकार करता है (क्योंकि इसके कानूनी निहितार्थ होंगे) तथा 1.5 मिलियन हत्याओं के अनुमान को भी चुनौती देता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति बिडेन की संबंधित घोषणा पर तुर्की के विदेश मंत्रालय द्वारा एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा गया है, कि इसका “कोई शोध-आधारित अथवा विधिक आधार नहीं है, और न ही इसको साबित करने वाला कोई प्रमाण है”।

अर्मेनियाई नरसंहार के पीछे क्या कारण थे?

  • अर्मेनियाई लोग 19 वीं शताब्दी के अंतिम तथा 20 वीं शताब्दी शुरुआती दौर में प्रमुख ताकतों के मध्य होने वाले शक्ति-संघर्ष के शिकार थे।
  • जब 19 वीं शताब्दी में ओटोमन साम्राज्य का पतन हो रहा था, उस समय कांस्टेंटिनोपल में राज करने वालों ने अर्मेनियाई लोगों को ‘देशद्रोहियों का समूह’ या गद्दार (fifth column) माना।
  • 1877-78 में हुए रूस-तुर्की युद्ध में तुर्कों को अपना काफी राज्य क्षेत्र खोना पड़ा था, इसके बाद से अर्मेनियाई लोगों के खिलाफ आक्रोश बढ़ने लगा।
  • युद्धोपरांत हुई बर्लिन की संधि में, बड़ी ताकतों द्वारा ओटोमन साम्राज्य पर कई शर्तें लगा दी गई, जिनके तहत, सुल्तान अब्दुलामहिद द्वितीय पर अर्मेनियाई आबादी वाले प्रांतों में सुधार लागू करने तथा इनको, सर्किशियन (Circassians) तथा कुर्दों से सुरक्षा की गारंटी देने के लिए दबाव डाला गया।
  • सुल्तान ने इसे अर्मेनियाई और अन्य प्रतिद्वंद्वी देशों, विशेष रूप से रूस के बीच संबंध मजबूत होने के संकेत के रूप में देखा।
  • बाद में, अक्टूबर 1914 में, तुर्की, जर्मनी की ओर से प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हो गया। जनवरी 1915 में हुए सारिकमिश (Sarikamish) की लड़ाई में ओटोमन को रूस की सेना से बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा।
  • तुर्कों ने इस हार के लिए अर्मेनियाई लोगों पर “विश्वासघात” करने का आरोप लगाया।

इसके बाद, अर्मेनियाई लोगों पर हमलों की श्रुंखला शुरू हो गई।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुई प्रमुख घटनाएं।
  2. अर्मेनियाई कौन हैं?
  3. तुर्की की अवस्थिति

मेंस लिंक:

तुर्की, अर्मेनियाई लोगों के खिलाफ किये गए अत्याचारों को तो स्वीकार करती है, किंतु इन घटनाओं को ‘नरसंहार’ मानने से इंकार करती है। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

पीएम केयर्स


संदर्भ:

हाल ही में, पीएम केयर्स (PM CARES) फंड द्वारा पूरे देश में ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं’ पर 551 दबाव-परिवर्तन अधिशोषण (Pressure Swing AdsorptionPSA) चिकित्सा ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्रों की स्थापना हेतु धन के आवंटन को मंजूरी दी गई है।

इससे पहले भी, इस कोष द्वारा ऐसे 162 संयंत्रों की स्थापना के लिए 201.58 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे।

‘दबाव-परिवर्तन अधिशोषण’(PSA) क्या होता है?

दबाव-परिवर्तन अधिशोषण (Pressure Swing Adsorption- PSA), अधिशोषक सामग्री से समानता तथा गैसीय वर्ग की आणविक विशेषताओं के अनुसार, दबाव के माध्यम से, गैसों के मिश्रण से कुछ गैसीय वर्गों को पृथक करने में प्रयुक्त की जाने वाली एक तकनीक है।

  • यह लगभग वातावरण के तापमान पर कार्य करती है, तथा गैस पृथक्करण की क्रायोजेनिक आसवन तकनीक से काफी भिन्न होती है।
  • उच्च दाब पर लक्षित गैसीय वर्ग का अधिशोषण करने हेतु, विशिष्ट अधिशोषक (Adsorbent) सामग्रियों (जैसेकि जिओलाइट्स, सक्रिय कार्बन, आणविक छलनी, आदि) का उपयोग एक जाल (trap) के रूप में किया जाता है।
  • इसके बाद, प्रक्रिया में परिवर्तन कर निम्न दाब करके अधिशोषित सामग्री का विशोषण (desorb) किया जाता है।

PM-CARES के बारे में:

आपातकालीन स्थिति में प्रधान मंत्री नागरिक सहायता एवं राहत कोष (Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund : PM-CARES Fund) का गठन, कोविड -19  महामारी, और इसी प्रकार की अन्य आपात स्थितियों के दौरान, दान स्वीकार करने और राहत प्रदान करने के लिए किया गया था।

पीएम केयर्स फंड के बारे में:

  • PM CARES फंड की स्थापना 27 मार्च 2020 को ‘पंजीकरण अधिनियम, 1908’ के तहत एक धर्मार्थ ट्रस्ट के रूप में की गयी थी।
  • यह विदेशी अंशदान से से प्राप्त दान का लाभ उठा सकता है और इस निधि में दिया जाने वाला दान 100% कर-मुक्त होता है।
  • PM-CARES, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से अलग है।

फंड का प्रबंधन कौन करता है?

प्रधानमंत्री, PM CARES फंड के पदेन अध्यक्ष और रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री, भारत सरकार निधि के पदेन न्यासी होते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सार्वजनिक खाता क्या है?
  2. पीएम केयर फंड का प्रबंधन कौन करता है?
  3. आरटीआई अधिनियम के दायरे से किन संगठनों को छूट दी गई है?
  4. भारत की संचित निधि के बारे में
  5. ‘धर्मार्थ ट्रस्ट’ क्या है?
  6. एनडीआरएफ के बारे में

मेंस लिंक:

PM CARES फंड को आरटीआई अधिनियम के दायरे में क्यों लाया जाना चाहिए? चर्चा कीजिए ।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

साइबर अपराध स्वयंसेवक कार्यक्रम


(Cybercrime volunteer programme)

संदर्भ:

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि, चूंकि ‘पुलिस’ संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत एक “राज्य का विषय” है, अतः यह साइबर अपराध स्वयंसेवक कार्यक्रम के तहत भर्ती होने वाले स्वयंसेवकों की केंद्रीकृत सूची नहीं बनाता है।

पृष्ठभूमि:

हाल ही में, सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत एक आवेदन में राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल के साइबर अपराध स्वयंसेवक कार्यक्रम के तहत आवेदन करने वाले स्वयंसेवकों की कुल संख्या के बारे में जानकारी माँगी गई थी। उक्त आरटीआई के जवाब में मंत्रालय ने कहा कि इस बारे में, संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से सीधे जानकारी मांगी जा सकती है।

साइबर अपराध स्वयंसेवक कार्यक्रम’ के बारे में:

भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (Indian Cyber Crime Coordination CentreI4C) द्वारा देश की सेवा करने का जूनून रखने वाले नागरिको को एक साथ एक मंच पर लाने और देश में साइबर अपराध के खिलाफ लड़ाई में योगदान करने हेतु ‘साइबर अपराध स्वयंसेवी कार्यक्रम’ की परिकल्पना की गयी है।

  • संबंधित राज्य / संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा, आवश्यकता के अनुसार, स्वयंसेवकों को पंजीकृत और उनकी सेवाओं का उपयोग किया जाता है।
  • इस कार्यक्रम का लक्ष्य, इंटरनेट पर गैरकानूनी सामग्री को चिह्नित करने के लिए लगभग 500 व्यक्तियों को शामिल करना है।

भूमिकाएँ और कार्य:

  • स्वयंसेवकों के लिए “सौंपे गए / किए गए कार्यों की सख्त गोपनीयता बनाए रखना आवश्यक होगा”।
  • नियमों और शर्तों के उल्लंघन के मामले में, राज्य / केंद्र शासित प्रदेशों के राज्य नोडल अधिकारी को स्वयंसेवकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार होगा।
  • इस योजना के तहत, स्वयंसेवकों को इस कार्यक्रम के साथ उनके संबंध के बारे में कोई भी सार्वजनिक बयान जारी करना निषिद्ध है, और किसी भी सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंच पर गृह मंत्रालय के नाम का उपयोग करने तथा मंत्रालय से किसी प्रकार की संबद्धता का दावा करने के लिए ‘सख्ती से प्रतिबंधित’ है।

संबंधित चिंताएं:

  • मंत्रालय किस प्रकार सुनिश्चित करेगा कि किन्ही तत्वों द्वारा गलत तरीके से व्यक्तिगत या राजनीतिक प्रतिशोध लेने के लिए कार्यक्रम का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा, इस संबंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
  • कार्यक्रम के तहत, एक बार शिकायत करने के बाद उसे वापस लेने की कोई प्रक्रिया नहीं है।
  • “राष्ट्र-विरोधी” गतिविधियों से संबद्ध की जाने वाली ‘विधिविरुद्ध सामग्री’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है।
  • इसके तहत, श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2013) मामले में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उल्लंघन हो सकता है। इस फैसले में यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है, कि ऑनलाइन वार्ताओं पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का उपयोग राज्य द्वारा इंटरनेट पर ‘वाक् स्वातंत्र्य’ (free speech) का अपराधीकरण करने में एक उपकरण के रूप में नहीं किया जाए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. I4C के बारे में।
  2. साइबर स्वयंसेवक कौन हैं?
  3. भूमिकाएं और जिम्मेदारियां

मेंस लिंक:

साइबर स्वयंसेवक कौन हैं? उनकी भूमिकाओं और कार्यों से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

अनिवार्य लाइसेंस


(Compulsory license)

संदर्भ:

रूस द्वारा भारत के कई हिस्सों में तबाही मचा रहे कोरोनोवायरस के उपचार के लिए आवश्यक दवाओं तथा साथ ही ऑक्सीजन उत्पादक तथा संकेन्द्रक यंत्रों और कोविड- संबंधी सहायता सहित विशेष विमानों को भेजने की योजना बनाई जा रही है।

हालाँकि, रूस द्वारा अमेरिकी पेटेंट के मद्देनजर रेमेडिसविर दवा भेजे जाने पर रोक लगाई जा सकती है।

संबंधित प्रकरण:

रेमेडिसविर (Remdesivir) को विकसित करने वाले कैलिफ़ोर्निया स्थित गिलियड साइंसेज इंक (Gilead Sciences)  द्वारा अमेरिकी लाइसेंस कानूनों को लागू किये जाने से रेमेडिसविर का निर्यात करने वालों को कानूनी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है।

  • अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) द्वारा कोविड -19 उपचार के लिए रेमेडिसविर को अक्टूबर 2020 में मंजूरी दी गई थी।
  • रूस द्वारा गिलियड के अंतरराष्ट्रीय पेटेंट की अवहेलना करते हुए देश में दवा बनाने का निर्णय लिया और एक अध्यादेश जारी करके ‘अनिवार्य लाइसेंस’ (Compulsory Licence) के तहत एक रूसी कंपनी फार्मास्यन्तेज़ (Pharmasyntez) को दवा का निर्माण करने की अनुमति दे दी गई।

‘अनिवार्य लाइसेंसिंग’ क्या है?

अनिवार्य लाइसेंस, किसी आवेदक कर्ता को पेटेंटकर्ता की सहमति के बिना, किसी पेटेंट उत्पाद का निर्माण करने, प्रयोग करने अथवा बेचने हेतु, अथवा पेटेंट प्रक्रिया के प्रयोग करने हेतु सरकार द्वारा जारी अधिकार-पत्र पत्र होता है।

  • भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970 के अध्याय XVI तथा ‘बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं’ (Trade Related Aspects of Intellectual Property Rights-TRIPS) समझौते के अंतर्गत अनिवार्य लाइसेंसिंग पर विचार किया जाता है।
  • किसी उत्पाद के पेटेंट प्राप्त करने की तिथि से 3 वर्ष पश्चात किसी भी समय अनिवार्य लाइसेंस के लिए आवेदन किया जा सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनिवार्य लाइसेंस क्या है?
  2. भारत में इससे संबंधित प्रावधान
  3. अनिवार्य लाइसेंस के लिए कौन आवेदन कर सकता है?
  4. अनिवार्य लाइसेंस जारी करने हेतु प्राधिकारी।

मेंस लिंक:

अनिवार्य लाइसेंसिंग की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


डीप टाइम प्रोजेक्ट

(Deep Time Project)

  • फ्रांस की लोम्ब्रिवेस (Lombrives) नामक गुफा में चल रहा ‘डीप टाइम प्रोजेक्ट’ समाप्त हो गया है। इस प्रोजेक्ट के तहत, 15 लोगों के एक समूह को 40 दिनों और 40 रातों के लिए गुफा के अंदर रखा गया था।
  • ये लोग तंबुओं में सोते थे और अपनी बिजली स्वंय बनाते थे तथा इनका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं था।
  • डीप टाइम प्रोजेक्ट के तहत यह अध्ययन किया गया, कि किसी प्रकार का बाह्य संपर्क नहीं होने पर किसी व्यक्ति की समय के बारे में अवधारणा किस प्रकार प्रभावित होती है।
  • इसका उद्देश्य, यह जांच करना था कि लोग, अपने रहने की स्थिति और वातावरण में होने वाले नाटकीय परिवर्तनों से किस प्रकार समायोजित होते हैं।
  • $ 1.5 मिलियन वाले “डीप टाइम” प्रोजेक्ट का नेतृत्व करते हुए मानव अनुकूलन संस्थान (Human Adaption Institute) के वैज्ञानिकों ने कहा है कि, यह प्रयोग से उन्हें यह बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी कि लोग किस तरह से रहने की स्थिति और वातावरण में भारी बदलाव के अनुकूल बन जाते हैं।


Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates

Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos