Print Friendly, PDF & Email

INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 22 April 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-II

1. अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) की रिपोर्ट

2. संविधान का अनुच्छेद 311 (2) (C)

3. उच्च न्यायालयों में ‘तदर्थ न्यायाधीशों’ की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त

4. विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक

 

सामान्य अध्ययन-III

1. बैंकिंग सुधारों के जनक: भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एम नरसिंहम का निधन

2. पंजाब सरकार की ड्रग्स मामलों पर पुरस्कार नीति

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. नागरिक सेवा दिवस

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) की रिपोर्ट


संदर्भ:

हाल ही में, ‘अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग’ (United States Commission on International Religious Freedom-USCIRF) द्वारा अपनी वर्ष 2021 की वार्षिक रिपोर्ट जारी की गई है। USCIRF, एक स्वतंत्र, द्विस्तरीय, संघीय सरकारी आयोग है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  • रिपोर्ट में कहा गया है, कि 14 देशों को ‘‘विशेष चिंताजनक देश” (Countries of Particular Concern-CPC) के रूप में अभिहित किया जाना चाहिए।
  • इन देशों की सरकारे, धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी ‘सुनियोजित, निरंतर तथा घोर उल्लंघन करने में लिप्त रही हैं या इन्हें अनदेखा करती रही हैं। भारत भी इसमें शामिल है।

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के संबंध में USCIRF की गई टिप्पणियां:

  • USCIRF ने कहा है, कि इस वर्ष भारत में धार्मिक स्वतंत्रता स्थिति “अपने नकारात्मक प्रक्षेपपथ पर बनी रही”।
  • सरकार द्वारा प्रोत्साहन प्राप्त हिंदू राष्ट्रवादी नीतियों के परिणामस्वरूप धार्मिक स्वतंत्रता का ‘सुनियोजित, निरंतर तथा घोर उल्लंघन होता रहा।
  • रिपोर्ट में विशेष रूप से, धार्मिक रूप से भेदभावपूर्ण ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम’ (CAA) के पारित किए जाने का उल्लेख किया गया है।
  • रिपोर्ट में, गत वर्ष हुए दिल्ली दंगों में पुलिस की मिलीभगत होने की और इशारा किया गया है।
  • इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है, कि सरकार द्वारा “बाबरी मस्जिद मस्जिद को ध्वस्त करने के आरोपी सभी व्यक्तियों को बरी कर दिया गया” तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा और हिंसा फैलाने वालों के लिए ‘दण्ड मुक्ति (Impunity) की संस्कृति’ के कारण होने वाली धार्मिक हिंसा से निपटने में सरकार की निष्क्रियता दिखाई।

USCIRF द्वारा की गई सिफारिशें:

  • प्रशासन द्वारा ‘धार्मिक स्वतंत्रता का घोर उल्लंघन’ करने वाले भारतीय व्यक्तियों और संस्थाओं पर नियोजित प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए।
  • प्रशासन द्वारा, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों, ‘जैसे कि चतुर्पक्षीय क्वाड समूह के मंत्रि-स्तरीय सम्मलेन’, पर अंतर-धार्मिक वार्ताओं और सभी समुदायों के अधिकारों को बढ़ावा देना।”
  • अमेरिका-भारत द्विपक्षीय मंचो पर, मामलों पर सुनवाईयों का आयोजन करके, पत्र लिखकर तथा कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल का गठन करने, आदि माध्यमों से इन विषयों को उठाना चाहिए।

निहितार्थ:

USCIRF की सिफारिशें गैर-बाध्यकारी होती हैं और पिछले वर्ष दिसंबर में जारी की गई रिपोर्ट में भारत को “विशेष चिंताजनक देश” (CPC) के रूप में नामित करने की सिफारिश की गई थी, जिसे ट्रम्प प्रशासन द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया था।

अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF):

अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (United States Commission on International Religious Freedom-USCIRF), एक स्वतंत्र, द्विस्तरीय, संयुक्त राज्य अमेरिका का एक फ़ेडरल गवर्नमेंट कमीशन/ संघीय सरकारी आयोग है।

  • इसकी स्थापना अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (International Religious Freedom Act- IRFA) के तहत वर्ष 1998 में की गयी थी।
  • यह, विश्व में धर्म और आस्था संबंधी स्वतंत्रता के सार्वभौमिक अधिकार की निगरानी करता है।
  • USCIRF, वैश्विक स्तर पर, अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप, धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी उल्लंघनों की निगरानी करता है, और राष्ट्रपति, विदेश सचिव और कांग्रेस को नीतिगत सिफारिशें प्रदान करता है।

“विशेष चिंताजनक देश” (CPC) क्या हैं?

वर्ष 1998 के अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (International Religious Freedom Act- IRFA) के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का घोर उल्लंघन करने के दोषी राष्ट्र के लिए “विशेष चिंताजनक देश” (Countries of Particular Concern-CPC) घोषित किया जाता है। ‘धार्मिक स्वतंत्रता का विशेषतः घोर उल्लंघन’ का तात्पर्य ‘धार्मिक स्वतंत्रता का ‘सुनियोजित, निरंतर तथा घोर उल्लंघन’ से है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. USCIRF क्या है?
  2. प्रमुख चिंता वाले देश (Countries of Particular Concern-CPC) क्या है?
  3. मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के बारे में

मेंस लिंक:

देश में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने में भारतीय राजनीति कितनी सफल रही है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

संविधान का अनुच्छेद 311 (2) (C)


संदर्भ:

हाल ही में, जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा, सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करने वाले अथवा राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से संबंधित किसी मामले में शामिल होने वाले, सरकारी कर्मचारियों की पहचान करने और उनकी जांच करने हेतु ‘विशेष कार्यबल’ (Special Task Force– STF) का गठन किया गया है।

यह ‘विशेष कार्यबल’ (STF), संविधान के अनुच्छेद 311 (2) (C) के अंतर्गत जिन गतिविधियों पर कार्रवाई की आवश्यकता निर्धारित की गई है, उनमें शामिल होने वाले संदिग्ध कर्मचारियों के मामलों की जांच करेगा।

पृष्ठभूमि:

  • सरकार द्वारा यह कदम इसलिए उठाया गया है, क्योंकि अतीत में कई सरकारी कर्मचारियों द्वारा कश्मीर में जारी संघर्ष पर खुले आम अपनी राजनीतिक राय व्यक्त करते हुए पाए गए थे।
  • एक आधिकारिक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2016 में पांच महीने तक चले आंदोलन के दौरान कई कर्मचारी, भारत-विरोधी प्रदर्शनों में भाग लेने और सोशल मीडिया पर भारत-विरोधी भावनाओं को व्यक्त करने में शामिल पाए गए।

अनुच्छेद 311 (2) (C) के तहत:

  • जब राष्ट्रपति को यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यक्ति को लोकसेवा में बनाए रखना राज्य की सुरक्षा के हित में समीचीन नहीं है, तो उसकी सेवाएँ, अनुच्छेद 311 (2) में निर्धारित सामान्य प्रक्रिया का पालन किये हुए बगैर, समाप्त की जा सकती हैं।
  • इस प्रावधान में संदर्भित ‘समाधान’, राज्य की सुरक्षा के हित में संबंधित कर्मचारी को अवसर नहीं देने की समीचीनता के बारे में ‘राष्ट्रपति का व्यक्तिपरक समाधान’ (subjective satisfaction) होता है।
  • इस अनुच्छेद के तहत, ‘समाधान’ के कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना अनिवार्य नहीं है। इसका अर्थ है, कि राष्ट्रपति के लिए प्रदत्त यह शक्ति ‘बंधनमुक्त’ (Unfettered) है, और इसे न्यायोचित मुद्दा नहीं बनाया जा सकता है। क्योंकि, इस शक्ति को अदालत में प्रश्नगत करना, ‘राष्ट्रपति का समाधान’ के स्थान पर ‘न्यायालय की संतुष्टि’ को प्रतिस्थापित करने के समतुल्य होगा।

क्या ‘निलंबन’ अथवा ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ सजा का एक स्वरूप होता है?

  • ‘बंशी सिंह बनाम पंजाब राज्य’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा, कि सेवा से निलंबित किया जाना, सेवा से बर्खास्त करना या निष्कासित करना अथवा ओहदे को कम करना नहीं है, इसलिए, यदि किसी सरकारी कर्मचारी को निलंबित किया जाता है तो वह अनुच्छेद 311 के अंतर्गत प्रदत्त संवैधानिक गारंटी का दावा नहीं कर सकता है।
  • ‘श्याम लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में सुप्रीम ने कहा, कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति (compulsory retirement), सेवा से बर्खास्त करने और निष्काषित करने से भिन्न है, क्योंकि इसमें किसी प्रकार का कोई दंडात्मक परिणाम भुगतना नहीं पड़ता है, और ‘अनिवार्य सेवानिवृत्त’ होने वाले सरकारी कर्मचारी को सेवा के दौरान अर्जित लाभों से किसी रूप में वंचित किया जाता है, अतः इस पर भी अनुच्छेद 311 के प्रावधान लागू नहीं होते हैं।

लोक सेवकों के लिए प्राप्त संरक्षोपाय:

  • अनुच्छेद 311 (1): के अनुसार, किसी लोक सेवक को, उसकी नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी द्वारा पदच्युत नहीं किया जाएगा या पद से नहीं हटाया जाएगा।
  • अनुच्छेद 311 (2): के अनुसार, किसी लोक सेवक को, उसके विरुद्ध आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिए बगैर उसे पदच्युत अथवा पद से नहीं हटाया जाएगा या ओहदे में अवनत नहीं किया जाएगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 311 (2) के बारे में।
  2. संविधान के तहत लोक सेवकों के लिए प्राप्त संरक्षोपाय

मेंस लिंक:

संविधान के अंतर्गत लोक सेवकों के लिए प्राप्त संरक्षोपाय पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों के लिए विभिन्न संवैधानिक पदों, शक्तियों, कार्यों और जिम्मेदारियों की नियुक्ति।

उच्च न्यायालयों में ‘तदर्थ न्यायाधीशों’ की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त


संदर्भ:

उच्च न्यायालयों में लगभग 57 लाख लंबित मामलों को “कार्य-सूची में अचानक वृद्धि” (docket explosion) बताते हुए उच्चतम न्यायालय ने, पिछले शेष कार्य (बैकलॉग) को समाप्त करने हेतु अनुच्छेद 224A का प्रयोग करते हुए, दो से तीन साल की अवधि के लिए, ‘तदर्थ न्यायाधीशों’ के रूप में उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। साथ ही इन नियुक्तियों को विनियमित करने के लिए दिशानिर्देश भी जारी कर दिए गए है।

‘अनुच्छेद 224Aक्या है?

‘अनुच्छेद 224A’ के अंतर्गत तहत संविधान में तदर्थ न्यायाधीशों (ad-hoc judges) की नियुक्ति संबंधी प्रावधान किये गए हैं। इस अनुच्छेद का उपयोग कभी कभार ही किया जाता है।

इसके अनुसार, “किसी राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश किसी भी समय, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उसी उच्च न्यायालय अथवा किसी अन्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुके किसी व्यक्ति से राज्य के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध कर सकता है”।

बड़ी मात्रा में मामलों के लंबित होने का कारण:

  • सरकार ही सबसे बड़ी वादी / मुकदमेबाज है।
  • कम बजटीय आवंटन: न्यायपालिका को आवंटित बजट, सकल घरेलू उत्पाद का 08% और 0.09% के बीच होता है।
  • कार्यस्थगन की मांग करने की परंपरा।
  • न्यायिक नियुक्तियों में देरी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति।
  2. संबंधित संवैधानिक प्रावधान।
  3. शक्तियाँ और कार्य।
  4. प्रक्रिया।

मेंस लिंक:

उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों का निपटारा करने हेतु सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति किए जाने पर जोर दिया है। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक


(World Press Freedom Index)

संदर्भ:

हाल ही में, मीडिया निगरानी समूह, ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ द्वारा ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ (World Press Freedom Index) 2021 जारी की गई है।

  • सूचकांक में ‘नॉर्वे’ लगातार पाँच वर्षों से शीर्ष स्थान पर बना हुआ है।
  • रिपोर्ट में 132 देशों को “बहुत खराब”, ” खराब” या “समस्याग्रस्त” के समूह में श्रेणीबद्ध किया गया है।
  • इस रिपोर्ट में कहा गया है, कि पत्रकारों को अभिगम्यता (access) प्रदान करने से वंचित करने और कोविद -19 प्रकोप के बारे में सरकार द्वारा प्रायोजित अधिप्रचार को बढ़ावा देने के लिए, महामारी का उपयोग किया गया है।

सूचकांक में भारत और पड़ोसी देशों का प्रदर्शन:

  1. 180 देशों की सूची में भारत 142 वें स्थान पर रहा है।
  2. भारत के लिए ब्राजील, मैक्सिको और रूस के साथ “खराब” श्रेणी में रखा गया है।
  3. रिपोर्ट में कहा गया है, भारत, ठीक से अपना काम करने की कोशिश करने वाले पत्रकारों के लिए विश्व के सबसे खतरनाक देशों में से एक है।
  4. वर्ष 2016 में, भारत 133 वें स्थान पर था, जोकि वर्ष 2020 में तेजी से लुढककर 142 वें स्थान पर पहुंच गया है।
  5. ‘सरकार की आलोचना करने का साहस करने वाले’ पत्रकारों के खिलाफ ‘सोशल मीडिया पर बेहद हिंसक नफरत फैलाने वाले अभियान’ चलाए जाने पर, भारत की कड़ी आलोचना की जाती है।
  6. सूचकांक में, दक्षिण एशिया में, नेपाल को 106, श्रीलंका को 127, म्यांमार को 140, पाकिस्तान को 145 और बांग्लादेश को 152 वें स्थान पर रखा गया है।
  7. चीन को 177 वां और अमेरिका को 44 वां स्थान प्राप्त हुआ है।

‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ के बारे में:

  • वर्ष 2002 से ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (Reporters Without Borders) द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाने वाला, ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ 180 देशों में मीडिया की स्वतंत्रता के स्तर का आकलन करना है।
  • यह सूचकांक, मीडिया की स्वतंत्रता के निर्धारण के आधार पर तैयार किया जाता है, जिसमे मीडिया में बहुलवाद, मीडिया को प्राप्त आज़ादी, कानूनी तंत्र की गुणवत्ता तथा पत्रकारों की सुरक्षा आदि का आकलन किया जाता है।
  • सूचकांक में, प्रत्येक क्षेत्र में मीडिया स्वतंत्रता के उल्लंघन स्तर संबंधी संकेतक भी शामिल होते हैं।
  • यह सूचकांक, दुनिया भर के विशेषज्ञों द्वारा 20 भाषाओं में तैयार की गई एक प्रश्नावली के माध्यम से संकलित किया जाता है।
  • इस गुणात्मक विश्लेषण को आकलन-अवधि के दौरान पत्रकारों के खिलाफ हुई हिंसा तथा दुर्व्यवहार संबंधी मात्रात्मक आंकड़ो के साथ संयोजित किया जाता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ के बारे में।
  2. भारत और उसके पड़ोसी देशों का प्रदर्शन।
  3. सबसे अच्छा और सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देश।
  4. पिछले वर्षों के दौरान विभिन्न देशों का प्रदर्शन और उनकी तुलना।

मेंस लिंक:

भारत के संदर्भ में ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ के निष्कर्षों पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय।

बैंकिंग सुधारों के जनक: भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एम नरसिंहम का निधन


संदर्भ:

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एम नरसिंहम का मंगलवार को 94 साल की उम्र में निधन हो गया है। एम नरसिंहम को भारतीय बैंकिंग सेक्टर में सुधारों का आर्किटेक्ट कहा जाता है।

‘एम नरसिम्हम’ के बारे में:

  • नरसिम्हम को बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में सुधारों हेतु दो उच्चस्तरीय समितियों की अध्यक्षता करने के लिए जाना जाता है।
  • दोनों नरसिम्हम समितियों का इतना महत्व है, कि आज भी इनके कुछ दृष्टिकोणों को संदर्भित किया जाता है और काम में लिया जाता है। उदाहरण के लिए, बैंकों का विलय करना और सशक्त मेगाबैंक बनाने का विचार सबसे पहले नरसिंहम समिति द्वारा पेश किया गया था।

नरसिम्हम समिति की रिपोर्ट- I :

वर्ष 1991 में प्रस्तुत की गई थी।

  • रिपोर्ट में एक चार स्तरीय बैंकिंग संरचना बनाने की सिफारिश की गई थी, जिसमे तीन बड़े बैंकों को शीर्ष पर रखने का सुझाव दिया गया था।
  • इसमें, ‘स्थानीय क्षेत्र के बैंक’ जैसे ‘ग्रामीण क्षेत्र-केंद्रित बैंकों’, की अवधारणा को भी पेश किया गया था।
  • इसमें, बैंकों के लिए ‘अनिवार्य बॉन्ड निवेश’ और ‘नकद आरक्षित सीमा’ में चरणबद्ध कटौती का प्रस्ताव रखा गया था, ताकि बैंक, अर्थव्यवस्था की अन्य उत्पादक जरूरतों के लिए ऋण देने में सक्षम हो सकें।
  • इसके द्वारा, ‘पूंजी पर्याप्तता अनुपात’ (capital adequacy ratio- CAR) की अवधारणा पेश की गई और शाखा लाइसेंसिंग नीति को समाप्त करने का प्रस्ताव दिया गया था।
  • इस पहली नरसिम्हम समिति द्वारा, ‘गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों’ का वर्गीकरण करने और खातों का पूर्ण प्रकटीकरण करने संबंधी अवधारणाओं की भी सिफारिश की गई थी।
  • ब्याज दरों को कम करने का प्रस्ताव करके, यह समिति ने, बैंकों के मध्य अधिक प्रतिस्पर्धा की शुरूआत की।
  • इस समिति ने खराब ऋण लेने के लिए एक ‘परिसंपत्ति पुनर्संरचना निधि’ की अवधारणा पेश की।

नरसिम्हम समिति रिपोर्ट II – 1998:

वर्ष 1998 में सरकार द्वारा श्री नरसिम्हम की अध्यक्षता में एक अन्य समिति का गठन किया गया। इसे ‘बैंकिंग सेक्टर कमेटी’ के रूप में जाना जाता है। इस समिति को, बैंकिंग सुधार प्रगति की समीक्षा करने और भारत की वित्तीय प्रणाली को और मजबूत करने के लिए एक कार्यक्रम डिजाइन करने का कार्य सौंपा गया था। इस समिति द्वारा विभिन्न क्षेत्रों जैसे पूंजी पर्याप्तता, बैंको के विलय, बैंक कानून आदि विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

प्रीलिम्स एवं मेंस लिंक:

‘एम नरसिम्हम’ की अध्यक्षता में गठित समितियों द्वारा की गई मुख्य सिफारिशें।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ एवं उनका प्रबंधन- संगठित अपराध और आतंकवाद के बीच संबंध।

पंजाब सरकार की ड्रग्स मामलों पर पुरस्कार नीति


संदर्भ:

हाल ही में, पंजाब सरकार द्वारा, ‘स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम’ (Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act) अर्थात NDPS एक्ट के तहत ड्रग्स की रिकवरी करने हेतु जानकारी तथा सूचना देने को प्रोत्साहित करने हेतु एक पुरस्कार नीति को मंजूरी दी गई है।

प्रमुख बिंदु:

  • इस नीति के तहत सरकारी कर्मचारियों-मुखबिरों-स्रोतों को, पर्याप्त मात्रा में ड्रग्स पकड़वाने हेतु दी गई जानकारी में, तथा NDPS अधिनियम, 1985 और PIT NDPS अधिनियम, 1988 के विभिन्न प्रावधानों को सफलतापूर्वक लागू करने में उनकी भूमिका को मान्यता प्रदान की जाएगी।
  • सफल अन्वेषण, अभियोजन, अवैध रूप से अर्जित संपत्ति की जब्ती, निवारक हिरासत और अन्य महत्वपूर्ण नशीली दवाओं के खिलाफ कार्यो के लिए पुरस्कार की मात्रा, मामले-दर-मामला के आधार पर तय की जाएगी।

‘स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम’ 1985:

  1. ‘स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम’ (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सबस्टेंस एक्ट) को नारकोटिक ड्रग्स संबंधित एकमात्र अभिसमय, ‘कन्वेंशन ऑन साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस’ तथा ‘नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रोपिक सबस्टेंस’ के अवैध व्यापार पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय के अंतर्गत भारत द्वारा समझौते के दायित्वों को पूरा करने के लिए तैयार किया गया था।
  2. NDPS एक्ट, 1985, भारत में ड्रग कानून प्रवर्तन के लिए वैधानिक ढांचा तैयार करता है।
  3. इस अधिनियम के तहत, ‘स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थों’ की खेती, उत्पादन, निर्माण, स्वामित्व, बिक्री, खरीद, परिवहन, भंडारण, उपभोग, अंतर-राज्य गतिविधि, ट्रांसशिपमेंट, आयात और निर्यात प्रतिबंधित है।
  4. हालाँकि, चिकित्सा या वैज्ञानिक उद्देश्यों को छोड़कर, सरकार द्वारा दिए गए किसी भी लाइसेंस, परमिट या प्राधिकरण के नियमों और शर्तों के अनुसार उपरोक्त मामलों में छूट प्रदान की गई है।
  5. केंद्र सरकार को स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थों’ की खेती, उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, बिक्री, खपत, उपयोग आदि को विनियमित करने का अधिकार है।
  6. राज्य सरकारों के लिए, अफीम, खसखस, औषधीय अफीम के निर्माण और हशीश को छोड़कर भांग की खेती तथा अफीम की अंतर-राज्य गतिविधियों के लिए अनुमति देने तथा विनियमित करने का अधिकार दिया गया है।
  7. केंद्र सरकार, किसी पदार्थ को, स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थों के निर्माण में इसके संभावित उपयोग के आकलन के आधार पर, ‘नियंत्रित पदार्थ’ (controlled substance) घोषित कर सकती है।
  8. अधिनियम के प्रयोजनों हेतु, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों, दोनों को अधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार है।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


नागरिक सेवा दिवस

  • प्रति वर्ष, 21 अप्रैल को भारत सरकार द्वारा ‘नागरिक सेवा दिवस’ (Civil Services Day) के रूप में मनाया जाता है।
  • यह दिवस, सिविल सेवकों के लिए, नागरिकों के कार्यों हेतु खुद को फिर से समर्पित करने और सार्वजनिक सेवा और काम में उत्कृष्टता के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं को दोहराने, के लिए एक अवसर के रूप में मनाया जाता है।
  • इस तिथि का चुनाव, स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री, सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा वर्ष 1947 में मेटकाफ हाउस, दिल्ली में प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के परिवीक्षकों को संबोधित करने की स्मृति को ताजा करने के लिए किया गया है।

Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates

Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos