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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 07 April 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-I

1. ‘ग्रीष्म लहरें’ (Heat Waves)

 

सामान्य अध्ययन-II

1. सतर्कता अधिकारियों का प्रति तीन वर्ष में स्थानांतरण

2. ‘राष्ट्रीय प्रवासी श्रमिक नीति’ मसौदा

3. उत्तर अटलांटिक संधि संगठन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. कॉन्वलसंट प्‍लाज्‍मा

2. अंतरिक्षीय मलबा

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. लैब ऑन व्हील्स

2. वुल्फ-रेएट तारे

 


सामान्य अध्ययन-I


 

विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ आदि।

‘ग्रीष्म लहरें’


(Heat Waves)

संदर्भ:

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ‘राष्ट्रीय मौसम पूर्वानुमान केंद्र’ के अनुसार, राजस्थान, विदर्भ और तमिलनाडु के भीतरी भागों में छिटपुट जगहों पर ‘गर्म हवा की लहरें’ अर्थात ‘ग्रीष्म लहरें’ (Heat Waves) चलने की की संभावना है।

यह चेतावनी, हाल ही में अधिकांश जगहों पर 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान दर्ज करने के पश्चात जारी की गई है।

‘ग्रीष्म लहरें’ क्या होती हैं?

‘भारतीय मौसम विज्ञान विभाग’ के अनुसार, जब किसी जगह पर तापमान, मैदानी क्षेत्रों में 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक, तथा तटीय क्षेत्रों में 37 डिग्री सेल्सियस या इससे अधिक तथा पर्वतीय क्षेत्रों न्यूनतम 30 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो जाता है, तो इसे ‘गर्म हवा की लहर’ अर्थात ‘ग्रीष्म लहर’ (Heat Wave) माना जाता है।

‘ग्रीष्म लहर’ घोषित करने संबंधी ‘मानदंड’:

  • तापमान में सामान्य से 5 से 6.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर ‘ग्रीष्म लहर’ की स्थिति घोषित कर दी जाती है, और तापमान में सामान्य से 6.4 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि होने पर इसे ‘प्रचंड ग्रीष्म लहर’ (severe heatwave) कहा जाता है।
  • मैदानी इलाकों के लिए, वास्तविक अधिकतम तापमान के आधार पर, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा, वास्तविक अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर ‘ग्रीष्म लहर’ तथा 47 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर ‘प्रचंड ग्रीष्म लहर’ घोषित की जाती है।

भारत में अधिक ‘ग्रीष्म लहरें’ आने का कारण:

  1. शहरी क्षेत्रों में पक्की और कंक्रीट सतहों से गर्मी का आवर्धित प्रभाव और वृक्षावरण की कमी।
  2. शहरी गर्म द्वीपीय प्रभाव (Urban heat island effects) के कारण आस-पास का तापमान, वास्तविक तापमान से 3 से 4 डिग्री अधिक महसूस होता हिया।
  3. पिछले 100 वर्षों में वैश्विक स्तर पर तापमान में औसत 8 डिग्री की वृद्धि होने से ‘ग्रीष्म लहरों’ की तीव्रता में वृद्धि होने की संभावना है। रात्री-कालीन तापमान में भी वृद्धि हो रही है।
  4. जलवायु परिवर्तन के कारण, वैश्विक स्तर पर दैनिक उच्च तापमान में वृद्धि, लंबे समय तक चलने वाली और और अधिक तीव्र ‘ग्रीष्म लहरों’ की आवृति में लगातार वृद्धि होती जा रही है।
  5. मध्यम से उच्च ‘ग्रीष्म लहर’ क्षेत्रों में पराबैगनी किरणों की उच्च तीव्रता।
  6. असाधारण गर्मी का दबाव और मुख्यतः ग्रामीण आबादी का संयोजन, भारत को ‘ग्रीष्म लहरों’ के प्रति अधिक संवेदनशील बना देता है।

भारत के लिए आगे की राह: भारत को ‘ग्रीष्म लहरों’ से किस प्रकार निपटना चाहिए?

  • मौसम संबंधी आंकड़ों की उपयुक्त ट्रैकिंग के माध्यम से ‘ऊष्मा हॉट-स्पॉट’ की पहचान करना और संबंधित संस्थाओं के मध्य रणनीतिक समन्वय के साथ, सबसे कमजोर समूहों को लक्षित करते हुए स्थानीय स्तर पर ‘गर्मी कार्य योजना’ के निर्माण, कार्यान्वयन तथा प्रतिक्रिया को बढ़ावा देना।
  • जलवायु परिस्थितियों के संबंध में श्रमिकों की सुरक्षा हेतु मौजूदा व्यावसायिक स्वास्थ्य मानकों, श्रम कानूनों और क्षेत्रीय नियमों की समीक्षा करना।
  • स्वास्थ्य, जल और विद्युत, तीनो क्षेत्रों में नीतिगत हस्तक्षेप और समन्वय की आवश्यकता है।
  • पारंपरिक अनुकूलन पद्धतियों, जैसेकि घर के अंदर रहना और आरामदायक कपड़े पहनना आदि को बढ़ावा देना।
  • सरल डिजाइन सुविधाओं जैसेकि छायादार खिड़कियां, भूमिगत जल भंडारण टैंक और ‘ऊष्मा-रोधी भवन सामग्री’ को प्रचलित करना।
  • कमजोर समूहों को सुरक्षित करने के क्रम में सरकार द्वारा, स्थानीय स्तर पर ‘गर्मी कार्य योजनाओं’ (Heat Action Plans) का अग्रिम कार्यान्वयन तथा साथ ही विभिन्न संस्थाओं के मध्य प्रभावी रणनीतिक समन्वय, महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया साबित हो सकती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘हीट वेव’ कब घोषित की जाती है?
  2. मानदंड?
  3. हीटवेव और सुपर हीटवेव के बीच अंतर?
  4. IMD क्या है?

मेंस लिंक:

गीष्म लहरों के कारण पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का परीक्षण कीजिए तथा भारत को इससे कैसे निपटना चाहिए?

स्रोत: पीआईबी

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

सतर्कता अधिकारियों का प्रति तीन वर्ष में स्थानांतरण


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC)  द्वारा सरकारी संस्थाओं की सतर्कता इकाइयों में तैनात अधिकारियों के स्थानांतरण और पोस्टिंग’ से संबंधित दिशानिर्देशों को संशोधित किया गया है।

नवीनतम दिशानिर्देशों के अनुसार:

  1. कार्मिकों के लिए, विभिन्न स्थानों पर, सतर्कता इकाइयों में दो लगातार ‘पोस्टिंग’ दी जा सकती है, इनमे से प्रत्येक ‘पोस्टिंग’ अधिकतम तीन वर्षों की होगी।
  2. जो कार्मिक, किसी एक स्थान पर तीन साल से अधिक समय तक काम कर चुके हैं, उनमे से अधिकतम समय तक तैनात रह चुके कार्मिको को प्राथमिकता देते हुए, चरणबद्ध तरीके से स्थानांतरित किया जाए।
  3. जो कार्मिक, किसी एक स्थान पर पाँच वर्षों से अधिक समय से तैनात हैं, उन्हें शीर्ष प्राथमिकता के आधार पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
  4. यदि कोई कार्मिक किसी एक स्थान पर तीन वर्षों से अधिक समय से तैनात है, तो अगली जगह पर उसका कार्यकाल की अवधि को कम कर दिया जाएगा। अर्थात, कार्मिक का दोनों जगहों पर संयुक्त कार्यकाल छह साल तक का रहेगा।
  5. सतर्कता इकाई से स्थानांतरण के बाद, किसी कार्मिक की ‘इकाई’ में फिर से पोस्टिंग पर विचार करने से पहले, उसे तीन साल का ‘कूलिंग ऑफ’ (cooling off) पीरियड पूरा करना अनिवार्य होगा।

आवश्यकता:

सतर्कता विभाग में किसी अधिकारी के लंबे समय तक तैनात रहने से, अनावश्यक शिकायतों या आरोपों में वृद्धि होने के अलावा उसके निहित स्वार्थ विकसित होने की संभावना रहती है।

‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ (CVC) के बारे में:

  • फरवरी, 1964 में, ‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ (Central Vigilance Commission- CVC) की स्थापना, सरकार द्वारा के. संथानम की अध्‍यक्षता वाली भ्रष्टाचार निवारण समिति की सिफारिशों के आधार पर की गई थी।
  • वर्ष 2003 में, संसद द्वारा ‘केन्‍द्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम’ पारित किया गया, जिसके तहत ‘केन्‍द्रीय सतर्कता आयोग’ को वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
  • ‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ (CVC), किसी मंत्रालय अथवा विभाग के अधीन कार्य नहीं करता है। अपितु, यह एक स्वतंत्र निकाय है तथा केवल संसद के प्रति उत्तरदायी होता है।
  • यह अपनी रिपोर्ट सीधे ‘भारत के राष्ट्रपति’ को सौंपता है।
  • ‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ भ्रष्टाचार अथवा पद के दुरुपयोग संबंधी शिकायतों की जांच करता है और इन पर उचित कार्रवाई की सिफारिश करता है।

‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ के समक्ष कौन शिकायत कर सकता है?

  • केंद्र सरकार
  • लोकपाल
  • ‘सचेतक’ (Whistle blowers )

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ (CVC) के बारे में
  2. नियुक्ति
  3. निष्कासन
  4. शक्तियाँ और कार्य
  5. रिपोर्ट

मेंस लिंक:

‘केंद्रीय सर्तकता आयोग’ (CVC) की भूमिकाओं और कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

‘राष्ट्रीय प्रवासी श्रमिक नीति’ मसौदा


(Draft National Migrant Labour Policy)

संदर्भ:

हाल ही में, नीति आयोग द्वारा कार्यकारी अधिकारियों के एक उपसमूह तथा सिविल सोसाइटी के सदस्यों के सहयोग से ‘राष्ट्रीय प्रवासी श्रमिक नीति’ (National Migrant Labour Policy) का मसौदा तैयार किया गया है।

यह नीति, अर्थव्यवस्था में प्रवासी श्रमिकों के योगदान को चिह्नित करने और उन्हें उनके प्रयत्नों में सहायता प्रदान करने संबंधी इरादों की एक स्पष्ट अभिव्यक्ति है।

मसौदे के प्रमुख बिंदु- प्रमुख सिफारिशें:

  • प्रवासन को सुगम बनाना: ‘प्रवासन’ के लिए विकास के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, और सरकारी नीतियों द्वारा इसमें बाधा उत्पन्न करने की बजाए, आंतरिक प्रवासन को सुविधाजनक बनाना चाहिए।
  • मजदूरी में वृद्धि: मसौदे में प्रवासी श्रमिकों के मूल राज्यों से आदिवासियों की स्थानीय आजीविका में महत्वपूर्ण बदलाव लाने के लिए न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि करने को कहा गया है, जिससे कुछ हद तक प्रवासन पर रोक लगाई जा सकती है।
  • केंद्रीय डेटाबेस: नियोक्ताओं को “मांग और आपूर्ति के मध्य अंतर पाटने” और “सामाजिक कल्याण योजनाओं का अधिकतम लाभ” सुनिश्चित करने में मदद करने हेतु एक केंद्रीय डेटाबेस तैयार किया जाना चाहिए।
  • शिकायत निवारण प्रकोष्ठ: ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण’ (National Legal Services authority- NALSA) और श्रम मंत्रालय द्वारा ‘शिकायत निवारण प्रकोष्ठों’ की स्थापना की जानी चाहिए और प्रवासी श्रमिकों के संबंध में, तस्करी, न्यूनतम मजदूरी उल्लंघन, और कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार और दुर्घटनाओं हेतु ‘त्वरित कानूनी प्रतिक्रियाएं’ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
  • मसौदे में एक नई राष्ट्रीय प्रवासन नीति तथा अन्य मंत्रालयों के साथ समन्वय स्थापित करने हेतु श्रम और रोजगार मंत्रालय के अंतर्गत एक विशेष इकाई के गठन करने का भी प्रस्ताव किया गया है।

प्रस्तावित नीति के साथ समस्याएं:

  1. यह नीति, भर्ती और नियुक्ति की राजनीतिक अर्थव्यवस्था से जुड़े, श्रम कानूनों के खराब क्रियान्वयन संबंधी कारणों पर गहराई से विचार नहीं करती है।
  2. इस दस्तावेज़ में अन्यायपूर्ण भर्ती पद्धतियों का उल्लेख किया गया है, लेकिन वस्तुतः इस बात का कोई विश्लेषण नहीं किया गया है कि सिस्टम क्यों जारी रहता है और इसे व्यवसायों और उद्यमों के रोजगार ढांचों द्वारा किस प्रकार मजबूत किया जाता है।

पृष्ठभूमि:

प्रवासन संबंधी नवीनतम सरकारी आंकड़े, वर्ष 2011 की जनगणना से लिए जाते है। जनगणना के अनुसार, वर्ष 2011 में भारत में प्रवासियों की संख्या 45.6 करोड़ (कुल जनसंख्या का 38 प्रतिशत) थी। जबकि, वर्ष 2001 में प्रवासियों की संख्या 31.5 करोड़ (जनसंख्या का 31%) थी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आंतरिक और बाह्य प्रवास पर डेटा
  2. अंतर राज्य प्रवासी श्रमिक अधिनियम, 1979 के बारे में
  3. ड्राफ्ट का अवलोकन

मेंस लिंक:

नीति आयोग के ‘प्रवासी श्रमिक नीति’ मसौदे पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO)


(North Atlantic Treaty Organization)

संदर्भ:

यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की (Volodymyr Zelensky) ने, हाल ही में, नाटो (NATO) से उनके देश को गठबंधन की सदस्यता प्रदान करने संबंधी प्रक्रिया को तेज करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा है, कि रूस समर्थक अलगाववादियों के साथ जारी संघर्ष को समाप्त करने का यही एकमात्र तरीका है।

पृष्ठभूमि:

पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र में, जहाँ मुख्यतः रूसी-भाषी आबादी की संख्या अधिक है, वर्ष 2014 से सरकारी बलों तथा अलगाववादियों के मध्य लड़ाई जारी है, तथा इस क्षेत्र में इस संघर्ष के और तीव्र होने की आशंका बढ़ती जा रही है। वर्ष 2014 में मास्को ने क्रीमिया प्रायद्वीप पर अपना कब्ज़ा कर लिया था।

‘उत्तर अटलांटिक संधि संगठन’ (नाटो) के बारे में:

  • यह एक ‘अंतर-सरकारी सैन्य गठबंधन’ है।
  • ‘वाशिंगटन संधि’ द्वारा स्थापित किया गया था।
  • इस संधि पर 4 अप्रैल 1949 को हस्ताक्षर किए गए थे।
  • मुख्यालय – ब्रुसेल्स, बेल्जियम।
  • मित्र राष्ट्रों का ‘कमान संचालन मुख्यालय’ – मॉन्स (Mons), बेल्जियम।

महत्व:

नाटो, एक ‘सामूहिक रक्षा प्रणाली’ का निर्माण करता है, जिसके अंतर्गत इसके स्वतंत्र सदस्य राष्ट्र, किसी भी बाहरी हमले के जवाब में परस्पर प्रतिरक्षा हेतु सहमत होते हैं।

संरचना:

नाटो की स्थापना के बाद से, गठबंधन में नए सदस्य देश शामिल होते रहें है। शुरुआत में, नाटो गठबंधन में 12 राष्ट्र शामिल थे, बाद में इसके सदस्यों की संख्या बढ़कर 30 हो चुकी है। नाटो गठबंधन में शामिल होने वाला सबसे अंतिम देश ‘उत्तरी मकदूनिया’ था, उसे 27 मार्च 2020 को शामिल किया गया था।

नाटो की सदस्यता, ‘इस संधि के सिद्धांतों को आगे बढ़ाने और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र की सुरक्षा में योगदान करने में योगदान करने में सक्षम किसी भी ‘यूरोपीय राष्ट्र’ के लिए खुली है’।

उद्देश्य:

राजनीतिक: नाटो, लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देता है, और सदस्य देशों के लिए, समस्याओं का समाधान करने, विश्वास का निर्माण करने तथा दीर्घ-काल में संघर्ष रोकथाम हेतु रक्षा और सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर परामर्श और सहयोग करने में सक्षम बनाता है।

सामरिक- नाटो, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध है। राजनयिक प्रयास विफल होने की स्थिति में, नाटो, के पास संकट-प्रबंधन कार्रवाई करने हेतु सैन्य शक्ति उपलब्ध है। ये सैन्य-कार्रवाई, नाटो की संस्थापक संधि के ‘सामूहिक रक्षा अनुच्छेद’- वाशिंगटन संधि के अनुच्छेद 5 अथवा संयुक्त राष्ट्र के अधिदेश के तहत, अकेले या अन्य देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से- के अंतर्गत की जाती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. नाटो- स्थापना एवं मुख्यालय
  2. नाटो ‘एलाइड कमांड ऑपरेशन’ क्या है?
  3. ‘नाटो’ का सदस्य बनने हेतु शर्ते?
  4. वाशिंगटन संधि का अवलोकन।
  5. ‘उत्तरी अटलांटिक महासागर’ के आसपास के देश।
  6. नाटो में शामिल होने वाला अंतिम सदस्य।

मेंस लिंक:

नाटो के उद्देश्यों और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

कॉन्वलसंट प्‍लाज्‍मा


(Convalescent Plasma)

संदर्भ:

कोविड-19 मामलों में अचानक वृद्धि होने के साथ ही गुरुग्राम में, पिछले एक सप्ताह में, ‘स्वास्थ्य लाभकारी प्लाज्मा’ अर्थात ‘कॉन्वलसंट प्‍लाज्‍मा’ (Convalescent Plasma) की मांग लगातार बढ़ रही है।

हालांकि, इसकी मांग और आपूर्ति के बीच एक असंतुलन बना हुआ है, क्योंकि, विशेष रूप से प्लाज्मा दान करने हेतु लोग आगे नहीं आ रहे हैं।

चुनौतियाँ:

वर्तमान में, प्लाज्मा प्रदाता को खोज पाना काफी मुश्किल हो रहा है, क्योंकि जिन लोगों का ‘टीकाकरण’ किया जा चुका है, वे प्लाज्मा डोनेट करने के पात्र नहीं होते है। इस वजह से, मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन और अधिक विस्तृत होता जा रहा है।

प्लाज्मा थेरेपी’ क्या होती है?

प्लाज्मा, रक्त का एक तरल भाग होता है। संक्रमण से ठीक होने वाले रोगियों के रक्त से निकाला गया ‘कॉन्वलसंट प्लाज़्मा’ (Convalescent plasma), संक्रमण के विरुद्ध एंटीबॉडीज का एक स्रोत होता है।

  • इस थेरेपी में कॉन्वलसंट प्लाज़्मा का प्रयोग अन्य रोगियों को ठीक करने में किया जाता है।
  • यह थेरेपी कोविड-19 के लिए उपचार के लिए उपलब्ध विकल्पों में से एक है। इसके तहत प्लाज्मा प्रदाताओं को ‘कोविड-19 संक्रमण से ठीक होने संबंधित प्रलेखित मामले’ के रूप में दर्ज होना चाहिए और साथ ही, प्रदाता को संक्रमण के अंतिम लक्षण समाप्त होने के बाद से 28 दिनों तक स्वस्थ रहना आवश्यक होता है।

 प्रीलिम्स लिंक:

  1. टीकाकरण और प्लाज्मा थेरेपी के बीच अंतर?
  2. अप्रतिरोधी प्रतिरक्षण क्या है?
  3. एंटीबॉडी और एंटीजन क्या हैं?
  4. चिकित्सा में प्रथम नोबेल पुरस्कार?
  5. रक्तदान और प्लाज्मा दान के बीच अंतर।

मेंस लिंक:

कान्वलेसन्ट प्लाज्मा थेरेपी के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

अंतरिक्षीय कचरा


(Space debris)

संदर्भ:

हाल ही में, इंद्रप्रस्थ सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT), दिल्ली को ‘अंतरिक्षीय मलबे से टकराव का पूर्वानुमान लगाने हेतु एक प्रणाली विकसित करने हेतु’ विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा कार्यान्वित किए जा रहे ‘नेशनल सुपर कम्प्यूटिंग मिशन’ (NSM) के तहत अनुसंधान राशि प्रदान की गई है।

इस परियोजना को ऑर्बिट कम्प्यूटेशन ऑफ़ रेजिडेंट स्पेस ऑब्जेक्ट्स फॉर स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस’ नाम दिया गया ही, और इसे दो साल में पूरा किया जाएगा।

‘अंतरिक्षीय कचरा’ क्या होता है?

अंतरिक्षीय कचरा अथवा अंतरिक्षीय मलबा (Space debris), संचार, परिवहन, मौसम और जलवायु निगरानी, ​​रिमोट सेंसिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के निष्पादन में सहयोग करने वाली, अंतरिक्ष में स्थित प्रौद्योगिकियों के समक्ष, एक वैश्विक खतरा उत्पन्न करता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से, और भारतीय मूल की सार्वजनिक और निजी संपत्ति की सुरक्षा के लिए भी, इन अंतरिक्षीय-पिण्डों से टकराव की संभावना का अनुमान लगाना काफी महत्वपूर्ण है।

अंतरिक्ष में मलबे की मात्रा:

चूंकि, वर्तमान सेंसर तकनीक छोटे आकार के पिंडों का पता लगाने में सक्षम नहीं है, फिर भी इसके द्वारा प्रदान किये गए आंकड़ों के आधार पर माना जाता है, कि अंतरिक्षीय मलबे में 500,000 से एक मिलियन टुकड़े / खंड शामिल हैं।

ये सभी खंड 17,500 मील प्रति घंटे (28,162 किमी प्रति घंटे) की गति से भ्रमण कर रहे है, तथा कक्षीय मलबे का एक छोटा सा टुकड़ा भी किसी उपग्रह या अंतरिक्ष यान को नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त है।

इस परियोजना का महत्व:

इस परियोजना के नतीजों में, एक कार्यात्मक रूप से अनुकूल, मापनीय (scalable), पारदर्शी और स्वदेश निर्मित टक्कर संभावना समाधान तैयार किया जाएगा, जिससे भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र को प्रत्यक्ष $ 7 बिलियन (51,334 करोड़ रुपये) की सहायता मिलेगी।

नेत्र (NETRA):

पिछले दिसंबर में, इसरो द्वारा, अंतरिक्ष मलबे से अपनी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए, बेंगलुरु में ‘नेत्र’ (NETRA) नामक ‘स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस’ (SSA) नियंत्रण केंद्र स्थापित किया गया था।

  • ‘नेत्र’ का मुख्य उद्देश्य, राष्ट्रीय अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की देखरेख, निगरानी और सुरक्षा करना तथा सभी SSA गतिविधियों के केंद्र के रूप में कार्य करना है।
  • केवल अमेरिका, रूस और यूरोप में पास, अंतरिक्ष पिंडों पर नज़र रखने और टकराव संबंधी चेतावनियों को साझा करने वाली, इस तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

स्रोत: पीआईबी

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


लैब ऑन व्हील्स

(Lab on wheels)

  • ‘पहियों पर प्रयोगशाला’ (लैब ऑन व्हील्स), दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) की ‘एजुकेशन रीचेज़ यू’ (Education Reaches You) योजना का एक हिस्सा है।
  • ‘लैब ऑन व्हील्स’ एक विशिष्ट रूप से निर्मित बस है, जिसमे 17 कंप्यूटर, दो टेलीविज़न, एक 3 डी प्रिंटर, कैमरा और सामान्य प्रिंटर लगे है। यह बस, गणित, विज्ञान और उन्नत प्रौद्योगिकी क्षेत्र में छात्रों को मार्गदर्शन करने हेतु अपने आउटरीच कार्यक्रम के भाग के रूप में शैक्षिक व्याख्यान, ट्यूटोरियल देने के लिए शहर में भ्रमण करेगी।
  • यह प्रयोगशाला, दिल्ली के सरकारी स्कूलों में और अल्पसुविधाप्राप्‍त बालकों के लिए विज्ञान संबंधी शिक्षा प्रदान करेगी।

वुल्फ-रेएट तारे

(Wolf-Rayet stars)

  • हाल ही में, भारतीय खगोलविदों ने वुल्फ-रेएट तारों (Wolf-Rayet stars) में एक दुर्लभ सुपरनोवा विस्फोट का पता लगाया है।
  • ये दुर्लभ वुल्फ-रिएट तारे, सूर्य की तुलना में एक हजार गुना अधिक चमकदार पिंड हैं।
  • ये असाधारण स्पेक्ट्रा वाले विविध तारों का समूह है, तथा आयनित हीलियम और अत्यधिक आयनित नाइट्रोजन या कार्बन की विशिष्ट एवं विस्तृत उत्सर्जन रेखाओं को दिखाते हैं।
  • अब तक ज्ञात वुल्फ-रेएट तारों की सतह का तापमान 30,000 K से लेकर 210,000 K है, जोकि लगभग सभी अन्य प्रकार के तारों की तुलना में अधिक है।
  • इनके लिए पहले W- टाइप स्टार कहा जाता था।


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