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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 26 March 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-II

1. सत्र की समाप्ति

2. सुप्रीमकोर्ट द्वारा उच्च न्यायालयों में बैकलॉग निपटाने हेतु सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का सुझाव

3. ‘डाक मतपत्र’ क्या होते हैं?

4. आरटी-पीसीआर परीक्षण

5. भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिकों हेतु राज्य कल्याण बोर्ड

6. दक्षिण चीन सागर

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. स्वेज़ नहर

2. केंद्रीय संवीक्षा केंद्र (CSC)

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

सत्र की समाप्ति


(Termination of Session)

संसद के किसी सत्र को ‘स्थगन’ (Adjournment), अनिश्चित काल के लिए स्थगन (Adjournment Sine Die), सत्रावसान (Prorogation) अथवा विघटन (Dissolution) के द्वारा समाप्त किया जा सकता है।

‘स्थगन’ (Adjournment): इसके तहत, सदन के सत्र के कार्यों को एक निर्दिष्ट समय के लिए निलंबित किया जाता है। इसके तहत निलंबन की अवधि कुछ घंटे, दिन या सप्ताह तक हो सकती है।

अनिश्चित काल के लिए स्थगन (Adjournment Sine Die): इसका अर्थ है कि सदन की बैठक को अनिश्चित काल के लिए समाप्त करना। दूसरे शब्दों में, इसके तहत सत्र को पुनः समवेत करने की तिथि निर्धारित किए बिना सदन को स्थगित कर दिया जाता है।

‘स्थगन’ तथा ‘अनिश्चित काल के लिए स्थगन’ घोषित करने की शक्ति सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति) के पास होती है।

सत्रावसान (Prorogation): सत्र के कार्यों के पूरा हो जाने के बाद राष्ट्रपति द्वारा सत्रावसान करने संबंधी अधिसूचना जारी की जाती है और इसके बाद पीठासीन अधिकारी सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने की घोषणा कर देता है। राष्ट्रपति, सत्र जारी रहने के दौरान भी सदन का सत्रावसान कर सकता है।

विघटन (Dissolution): सदन का विघटन केवल लोकसभा में हो सकता है। चूंकि, राज्य सभा एक स्थायी सदन होती है, अतः इस पर विघटन संबंधी प्रावधान लागू नहीं होता है।

  • विघटन की घोषणा के पश्चात् मौजूदा सदन का कार्यकाल समाप्त हो जाता है, और आम चुनाव होने के पश्चात् एक नए सदन का गठन किया जाता है।
  • राष्ट्रपति को लोकसभा का विघटन करने की शक्ति प्राप्त होती है।

संदर्भ:

हाल ही में, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, पुदुचेरी और केरल में होने वाले चुनावों के मद्देनजर इन राज्यों के सांसदों द्वारा बजट सत्र के दूसरे भाग को संक्षिप्त करने के लिए किए गए अनुरोधों को ध्यान में रखते हुए संसद के दोनों सदनों को निर्धारित समय से लगभग दो सप्ताह पूर्व अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. संसद के सदनों को किसके द्वारा आहूत किया जाता है।
  2. राष्ट्रपति एवं सभापति की शक्तियों में अंतर।
  3. ‘अनिश्चित काल के लिए स्थगन’ क्या है?
  4. ‘सदन के विघटन’ का क्या तात्पर्य है?
  5. राज्यसभा को भंग क्यों नहीं किया जा सकता है?

मेंस लिंक:

संसद के दोनों सदनों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

सुप्रीमकोर्ट द्वारा उच्च न्यायालयों में बैकलॉग निपटाने हेतु सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का सुझाव


संदर्भ:

उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों का निपटारा करने हेतु सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति किए जाने पर जोर दिया है।

अदालत ने कहा है, कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को विवाद संबंधी विशेष क्षेत्रों में उनकी विशेषज्ञता के आधार पर चुना जा सकता है और कानून के उस क्षेत्र में लंबित मामलों का निपटारा हो जाने पर इनके लिए सेवानिवृत्त किया जा सकता है।

इस संबंध में संवैधानिक प्रावधान:

अनुच्छेद 224A के अंतर्गत तहत संविधान में तदर्थ न्यायाधीशों (ad-hoc judges) की नियुक्ति संबंधी प्रावधान किये गए हैं।

अपनाई जाने वाली प्रक्रिया:

अनुच्छेद के तहत, किसी राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश किसी भी समय, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उसी उच्च न्यायालय अथवा किसी अन्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुके किसी व्यक्ति से राज्य के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध कर सकता है।

इस प्रकार नियुक्त किये गए न्यायाधीश को राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित भत्ते प्रदान किये जाएंगे। उसके लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के सभी आधिकारिता, शक्तियां और विशेषाधिकार प्राप्त होंगे, किंतु उसके लिए उस उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नहीं माना जाएगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति।
  2. शक्तियाँ और कार्य।
  3. प्रक्रिया।

मेंस लिंक:

उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों का निपटारा करने हेतु सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति किए जाने पर जोर दिया है। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ।

डाक मतपत्र क्या होते हैं?


(What are postal ballots?)

संदर्भ:

तमिलनाडु के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में 80 वर्ष से अधिक आयु के मतदाताओं के लिए डाकपत्र के माध्यम से मतदान की प्रक्रिया प्रगति पर है।

राज्य में पहली बार जनता के कुछ वर्गों को डाक मतपत्र डालने की अनुमति दी गई है। इससे पहले, केवल सेवा मतदाताओं और चुनाव कार्य में संलग्न कर्मियों को ही यह सुविधा प्रदान की जाती थी।

‘डाकपत्र के माध्यम से मतदान’ क्या होता है?

‘डाकपत्र के माध्यम से मतदान’ अर्थात ‘पोस्टल वोटिंग’ (Postal Voting) का उपयोग कुछ सीमित मतदाताओं के समूहों द्वारा किया जा सकता है। इस सुविधा के माध्यम से, मतदाता मतपत्र पर अपनी पसंद अंकित कर तथा मतगणना से पहले इसे चुनाव अधिकारी के लिए वापस भेजकर दूर से ही मतदान कर सकता है।

इस सुविधा का लाभ कौन लोग उठा सकते हैं?

सशस्त्र बलों जैसे कि सेना, नौसेना और वायु सेना के सदस्य, किसी राज्य की सशस्त्र पुलिस बल के सदस्य (राज्य से बाहर सेवारत), भारत के बाहर तैनात सरकारी कर्मचारी और उनके पति या पत्नी केवल डाक द्वारा मतदान करने के हकदार होते हैं।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 60 के अंतर्गत उपरोक्त श्रेणियों के मतदाताओं को यह छूट प्रदान की गई है।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951:

‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ (Representation of the People Act), 1951 के तहत भारत में चुनावों के वास्तविक संचालन हेतु प्रावधान किये गए हैं। यह निम्नलिखित मामलों से संबंधित है:

  1. संसद एवं राज्य विधानसभाओं के दोनों सदनों के सदस्यों की योग्यता और निर्हरता जैसे विवरण,
  2. चुनाव कराने के लिए प्रशासनिक मशीनरी,
  3. राजनीतिक दलों का पंजीकरण,
  4. चुनाव का संचालन,
  5. चुनावी विवाद,
  6. भ्रष्ट आचरण और चुनावी अपराध, और
  1. उपचुनाव।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘पोस्टल वोटिंग’ क्या होती है?
  2. ‘पोस्टल वोटिंग’ कौन कर सकता है?
  3. डाक मतदान से संबंधित मामले कौन तय कर सकता है?
  4. भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका।
  5. क्या ‘मतदान का अधिकार’ संवैधानिक अधिकार है?

मेंस लिंक:

डाकपत्र के माध्यम से मतदान की सुविधा और संबंधित लाभों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

आरटी-पीसीआर परीक्षण


(RT-PCR)

संदर्भ:

कर्नाटक सरकार के नवीनतम आदेश के अनुसार, बेंगलुरु में किसी भी राज्य से आने वाले यात्रियों के  पास ‘आरटी-पीसीआर परीक्षण’ की निगेटिव रिपोर्ट होना अनिवार्य है।

कोविड-19 का पता लगाने हेतु RT-PCR का किस प्रकार उपयोग किया जाता है?

COVID-19 बीमारी SARS-COV-2 नामक विषाणु के संक्रमण से होती है। यह एक आरएनए वायरस (RNA virus) होता है, अर्थात, यह अपनी वृद्धि करने हेतु एक स्वस्थ कोशिका में घुसपैठ करता है।

इस लिए, SARS-CoV-2 RNA पता लागने हेतु RT-PCR परीक्षण किया जाता है। इसमें, वायरस की पहचान करने हेतु,  RNA को ‘रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन’ नामक एक प्रक्रिया के माध्यम से DNA में परिवर्तित किया जाता है।

परीक्षण क्रियाविधि (नोट: इसे सिर्फ समझने के लिए पढ़ें):

  • आमतौर पर, SARS-CoV-2 RNA वायरस का संक्रमण के तीव्र चरण के दौरान ‘श्वसन नमूनों’ (respiratory specimens) में पता लगाया जा सकता है।
  • इसके लिए ऊपरी और निचले श्वसन नमूने (जैसे कि नाक तथा नासाग्रसनी संबंधी- Nasopharyngeal) एकत्र किए जाते हैं।
  • इन नमूनों को कई रासायनिक विलयनों में संशोधित करके, इनमे से प्रोटीन तथा वसा जैसे पदार्थों को हटा दिया जाता है, और इसके बाद नमूने में उपस्थित RNA को अलग किया जाता है।
  • रियल-टाइम RT-PCR सेटअप, आमतौर पर 35 चक्रों से होकर गुजरता है, अर्थात, प्रक्रिया के अंत तक, नमूने में मौजूद वायरस के प्रत्येक कतरे से लगभग विषाणुजनित DNA खंडो की लगभग 35 बिलियन नई प्रतियां बनाई जाती हैं।
  • विषाणुजनित DNA खंडो की नई प्रतियां बनते ही प्रत्येक को चिन्हित करके फ्लोरोसेंट रंग छोड़ा जाता है, जिसे रियल टाइम में मशीन से जुड़े कंप्यूटर से मापा जाता है। प्रत्येक चक्र के बाद, कंप्यूटर, नमूने में फ्लोरोसेंट की मात्रा को ट्रैक करता है। जब फ्लोरोसेंट की मात्रा, एक निश्चित स्तर से अधिक हो जाती है, तब नमूने में वायरस की मौजूदगी की पुष्टि हो जाती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आरएनए और डीएनए के बीच अंतर।
  2. आरटी-पीसीआर और एंटीबॉडी परीक्षणों के बीच अंतर।
  3. आरएनए वायरस क्या है? यह कैसे बचता है?
  4. ‘एंटीबॉडी’ क्या होती हैं?

मेंस लिंक:

RT- PCR टेस्ट के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिकों हेतु राज्य कल्याण बोर्ड


(State welfare boards for building and other construction workersBOCW)

संदर्भ:

केंद्र सरकार ने ‘भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिकों हेतु राज्य कल्याण बोर्डों’ (State welfare boards for building and other construction workersBOCW) से श्रमिकों के लिए घरेलू उपभोग के सामान वितरित करने से मना किया है और इसके स्थान पर श्रमिकों के बैंक खातों में मौद्रिक सहायता अंतरण जारी रखने को कहा है।

BOCW बोर्डों का उद्देश्य विनिर्माण कार्यों पर राज्यों द्वारा एकत्र किए गए ‘उपकर’ से श्रमिकों के लिए कल्याणकारी गतिविधियों का कार्यान्वयन करना है।

पृष्ठभूमि:

भारत में, ‘भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक’ (BOCW) असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों में सबसे कमजोर वर्ग है। ये अति निकृष्ट परिस्थितियों में काम करते हैं और उनका भविष्य अनिश्चित होता है। इस समूह के अधिकाँश श्रमिक अपने मूल स्थानों से दूर अलग-अलग राज्यों में प्रवासी मजदूर के रूप में काम करते हैं। ये राष्ट्र-निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, फिर भी खुद समाज में हाशिये पर पड़े रहते हैं।

‘भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम’, 1996 के बारे में:

यह क़ानून, भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिकों के रोजगार एवं सेवा शर्तों को विनियमित करने तथा इनके लिए सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याणकारी उपायों का प्रावधान करने हेतु अधिनियमित किया गया था।

  • अधिनियम के तहत, राज्य सरकारों को राज्य कल्याण बोर्डों के माध्यम से विनिर्माण श्रमिक कल्याणकारी योजनाओं की रूपरेखा तैयार करने और उसके कार्यान्वयन का दायित्व सौंपा गया है।
  • इस कानून के तहत, विनिर्माण लागत पर 1% उपकर (Cess) से एक कोष का गठन किया गया है। इस उपकर को राज्य सरकारों द्वारा लगाया लगाया और एकत्र किया जाता है, तथा इसे कल्याण कोष में भेज दिया जाता है।

‘उपकर’ क्या होता है?

  • उपकर (Cess), ‘कर योग्य आय’ (taxable income) पर लगाने की बजाय ‘देय कर’ (tax payable) पर लगाया जाता है। एक अर्थ में, करदाता के लिए उपकर, करों पर अधिभार के बराबर होता है।
  • उपकर, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों दोनों पर लगाया जा सकता है। आयकर, निगम कर, और अप्रत्यक्ष करों से प्राप्त राजस्व को विभिन्न प्रयोजनों के लिए आवंटित किया जा सकता है।
  • सभी करों और उपकरों से प्राप्त आय, भारत सरकार की संचित निधि में जमा की जाती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. उपकर और कर के बीच अंतर
  2. उपकर किसके द्वारा लगाया एवं संग्रहीत किया जा सकता है?
  3. BOCW अधिनियम के बारे में

मेंस लिंक:

उपकर क्या होता है? यह अधिभार से किस प्रकार भिन्न होता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

दक्षिण चीन सागर


(South China sea)

संदर्भ:

हाल ही में, विवादित रीफ- ‘रीड बैंक’ के पास खड़ी चीनी नौकाओं के एक बेड़े पर बढ़ते हुए राजनयिक विवाद के बीच फिलीपीन की सेना द्वारा दक्षिण चीन सागर में नौसेना के और अधिक जहाजों की तैनाती का आदेश दिया गया है।

दक्षिण चीन सागर विवाद के बारे में:

चीन का दक्षिणी चीन सागर तथा इस क्षेत्र में अवस्थित अन्य देशो से विवाद, समुद्री क्षेत्रों में संप्रभुता स्थापित करने संबंधित है।

  • इस क्षेत्र में ‘पारसेल द्वीप समूह’ (Paracels Islands) तथा ‘स्प्रैटली द्वीप समूह’ (Spratley Islands) दो श्रंखलाएं अवस्थित है, यह द्वीप समूह कई देशों की समुद्री सीमा में बिखरे हुए है, जोकि इस क्षेत्र में विवाद का एक प्रमुख कारण है।
  • पूर्ण विकसित द्वीपों के साथ-साथ स्कारबोरो शोल (Scarborough Shoal) जैसी, दर्जनों चट्टाने, एटोल, सैंडबैंक तथा रीफ भी विवाद का कारण हैं।
  • चीन ने 2016 के अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के फैसले को नजरअंदाज कर दिया है, जिसमे ट्रिब्यूनल ने चीन के दावे को बिना आधार का बताया था।

विभिन्न देशों के विवादित क्षेत्र पर दावे

  1. चीन:

इस क्षेत्र में सबसे बड़े क्षेत्र पर अधिकार का दावा करता है, इसके दावे का आधार ‘नाइन-डैश लाइन’ है, जो चीन के हैनान प्रांत के सबसे दक्षिणी बिंदु से आरंभ होकर सैकड़ों मील दक्षिण और पूर्व में फली हुई है।

  1. वियतनाम:

वियतनाम का चीन के साथ पुराना ऐतिहासिक विवाद है। इसके अनुसार, चीन ने वर्ष 1940 के पूर्व कभी भी द्वीपों पर संप्रभुता का दावा नहीं किया था, तथा 17 वीं शताब्दी के बाद से ‘पारसेल द्वीप समूह’ तथा ‘स्प्रैटली द्वीप समूह’ पर वियतनाम का शासन रहा है – और इसे साबित करने के लिए उसके पास पर्याप्त दस्तावेज मौजूद हैं।

  1. फिलीपींस:

फिलीपींस और चीन दोनों स्कारबोरो शोल (इसे चीन में हुआंग्यान द्वीप के रूप में जाना जाता है) पर अपने अधिकार का दावा करते हैं। यह फिलीपींस से 100 मील और चीन से 500 मील की दूरी पर स्थित है।

  1. मलेशिया और ब्रुनेई:

ये देश दक्षिण चीन सागर में अपने अधिकार-क्षेत्र का दावा करते हैं, इनका कहना है कि, संबंधित क्षेत्र ‘यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑफ द लॉ ऑफ द सी’ (United Nations Convention on the Law of the Sea- UNCLOS), 1982 द्वारा निर्धारित उनके विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में आता है।

हालांकि, ब्रुनेई किसी भी विवादित द्वीप पर अपने अधिकार-क्षेत्र का दावा नहीं करता है, परन्तु मलेशिया ‘स्प्रैटली द्वीप समूह’ में एक छोटे से हिस्से पर अपना दावा करता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विवाद में शामिल देश
  2. नाइ-डैश लाइन क्या है?
  3. इस क्षेत्र में स्थित महत्वपूर्ण खाड़ियाँ, मार्ग एवं सागर
  4. विवादित द्वीप और उनकी अवस्थिति
  5. UNCLOS क्या है?
  6. ताइवान स्ट्रेट और लूजॉन स्ट्रेट की अवस्थिति

मेंस लिंक:

दक्षिण चीन सागर विवाद पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


स्वेज़ नहर

(Suez Canal)

चर्चा का कारण:

हाल ही में, खराब मौसम के कारण हुई दुर्घटना के कारण स्वेज नहर के दक्षिणी छोर के पास एवर गिवेन’ नामक एक बड़ा मालवाहक जहाज फंस गया था। इस कारण, इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्ग के दोनों छोर पर जहाजों का एक बड़ा जाम लग गया है।

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • स्वेज नहर, मिस्र में स्थित भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ने वाले ‘स्वेज स्थलडमरूमध्य’ (Isthmus of Suez) पर उत्तर से दक्षिण की ओर बहने वाला एक कृत्रिम समुद्र-स्तरीय जलमार्ग है।
  • यह नहर एशिया महाद्वीप से अफ्रीकी महाद्वीप को पृथक करती है।
  • यह नहर, भारतीय और पश्चिमी प्रशांत महासागर के निकटवर्ती क्षेत्रों तथा यूरोप के मध्य सबसे छोटा समुद्री मार्ग है।
  • यह विश्व के सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली शिपिंग लेन में से एक है। मात्रा की दृष्टि से कुल विश्व व्यापार का 12% से अधिक इस मार्ग से किया जाता है।

केंद्रीय संवीक्षा केंद्र (CSC)

(Central Scrutiny Centre)

  • यह ‘स्ट्रेट थ्रू प्रोसेस’ के तहत उपयोगकर्ताओं द्वारा की गई फाइलिंग की प्राथमिक रूप से जांच करने के लिए कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की एक पहल है।
  • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि, डेटा गुणवत्ता में कोई सेंध न लगा सके तथा दोष मुक्त रहे।
  • CSC मुख्य रूप से उपयोगकर्ताओं द्वारा स्ट्रेट थ्रू प्रोसेस के तहत की गई फाइलिंग की प्राथमिक रूप से स्क्रूटनी करेगा, डाटा गुणवत्ता मुद्दों तथा अनियमितताओं की पहचान करेगा, संबंधित रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज को इसकी जानकारी देगा, जिससे कि डाटा की प्रमाणिकता और शुद्धता बहाल की जा सके। आवश्यकता पड़ने पर इसे अऩ्य विनियामकों के साथ साझा किया जा सकता है।

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