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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 25 March 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-II

1. अटॉर्नी जनरल द्वारा अवमानना ​​कार्यवाही हेतु अनुमति से इंकार

2. उच्चतम न्यायालय द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश का चयन किस प्रकार किया जाता है?

3. उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020

4. भारतीय शाखा के माध्यम से बेचे जाने वाले माल पर डिजिटल टैक्स से छूट

5. वायरस का ‘डबल म्यूटेंट’ प्रकार

6. राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवर आयोग विधेयक 2021

7. सीबीएसई की ‘मूल्यांकन रूपरेखा’

 

सामान्य अध्ययन-III

1. ग्राम उजाला

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. पाकल दुल जलविद्युत परियोजना

2. ट्यूलिप गार्डन

3. संयुक्त राष्ट्र प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान (UNITAR)

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

अटॉर्नी जनरल द्वारा अवमानना ​​कार्यवाही हेतु अनुमति से इंकार


संदर्भ:

भारत के महान्यायवादी (अटॉर्नी जनरल) के.के. वेणुगोपाल ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के खिलाफ अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने के लिए दायर की गई एक याचिका पर अपनी सहमति देने से इंकार कर दिया है। याचिका में कहा गया था, कि राहुल गांधी ने एक इंटरव्यू के दौरान न्यायपालिका के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की थी।

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि कथित साक्षात्कार में सर्वोच्च न्यायालय या उसके न्यायाधीशों के बारे में विशिष्ट रूप कुछ भी जिक्र नहीं किया गया है।

‘अदालत की अवमानना’ से संबंधित कानून

अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) में सिविल अवमानना तथा आपराधिक अवमानना को परिभाषित किया गया है, तथा अवमानना ​​के मामले में दोषियों को दण्डित करने हेतु अदालत की शक्तियाँ एवं प्रक्रिया निर्धारित की गयी है।

अदालत की अवमानना का अर्थ, अदालत की गरिमा, न्याय और इसके प्राधिकार का विरोध अथवा अवज्ञा करने वाले व्यवहार से किसी न्यायालय तथा इसके अधिकारियों की अवहेलना करना तथा उसके अधिकारों के प्रति अनादर प्रदर्शित करना है।

अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने के लिए अटार्नी जनरल की सहमति क्यों आवश्यक है?

किसी शिकायत को संज्ञान में लेने से पहले अटॉर्नी जनरल की सहमति की आवश्यकता का उद्देश्य अदालत का समय बचाना है।

  • अवमानना कार्यवाही शुरू करने हेतु अदालत पहला मंच होती है, यदि सार-हीन याचिकाएं दायर की जाती हैं, तो अदालतों का कीमती समय बर्बाद होता है।
  • अटार्नी जनरल सहमति का उद्देश्य सार-हीन याचिकाओं पर रोक लगाना है। ऐसा माना जाता है, कि अदालत के अधिकारी के रूप में, अटार्नी जनरल स्वतंत्र रूप शिकायतों की वैधता संबंधी जांच करेगा।

किन परिस्थितियों में अटार्नी जनरल की सहमति की आवश्यकता नहीं होती है?

  • जब कोई प्राइवेट सिटीजन, किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ अदालत की अवमानना कार्यवाही शुरू करना चाहता है, तो इसके लिए अटार्नी जनरल की सहमति अनिवार्य होती है।
  • हालाँकि, जब अदालत द्वारा स्वयं ही अवमानना ​​कार्यवाही शुरू की जाती है, तो अटार्नी जनरल की सहमति की आवश्यकता नहीं होती है।
  • ऐसा इसलिए होता है क्योंकि भारतीय संविधान में अदालत को अवमानना कार्यवाही शुरू करने शक्ति प्रदान की गयी है, और अदालत अपनी संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करने के लिए अटार्नी जनरल की सहमति पर निर्भर नहीं है।

अटार्नी जनरल द्वारा सहमति देने से मना करने की स्थिति में:

  • यदि अटार्नी जनरल सहमति देने से इनकार करता है, तो मामला इसके साथ ही खत्म हो जाता है।
  • हालांकि, शिकायतकर्ता, इस मामले को अलग से अदालत के संज्ञान में ला सकता है और अदालत से इस मामले पर संज्ञान लेने का आग्रह कर सकता है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को अदालत की अवमानना ​​के लिए स्वतः कार्रवाई शुरू करने की शक्ति प्राप्त है, इसके लिए उसे अटार्नी जनरल द्वारा प्रस्ताव पेश करने अथवा उसकी सहमति की आवश्यकता नहीं होती है।

 प्रीलिम्स लिंक:

  1. अवमानना के संदर्भ में उच्चत्तम न्यायालय तथा उच्च न्यायलय की शक्तियां
  2. इस संबंध में संवैधानिक प्रावधान।
  3. न्यायलय की अवमानना (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा किये गए परिवर्तन
  4. सिविल बनाम आपराधिक अवमानना
  5. अनुच्छेद 19 के तहत अधिकार
  6. अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 किससे संबंधित है?

मेंस लिंक:

भारत में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवमानना मामलों को किस प्रकार हल किया जाता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

उच्चतम न्यायालय द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश का चयन किस प्रकार किया जाता है?


संदर्भ:

भारत के मुख्य न्यायाधीश शरद ए. बोबडे ने सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एन वी रमण (N.V. Ramana) को उच्चतम न्यायालय के अगले मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की है।

जस्टिस रमण, 24 अप्रैल को भारत के 48 वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार ग्रहण करेंगे।

‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ की नियुक्ति:

  • भारत के मुख्य न्यायाधीश को, परंपरा के अनुसार, भारत के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश द्वारा उनकी सेवानिवृत्ति के दिन नियुक्त किया जाता है।
  • परंपरागत रूप से, भारत के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश, भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में, उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन वरिष्ठतम न्यायाधीश का चयन करते है।

शीर्ष न्यायालय में न्यायाधीशों की वरिष्ठता आयु से नहीं, बल्कि निम्नलिखित कारकों के आधार पर निर्धारित की जाती है:

  1. उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किये जाने की तिथि से।
  2. यदि दो न्यायाधीशों को एक ही दिन सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त किया जाता है, तो पहले शपथ लेने वाले न्यायाधीश को वरिष्ठ माना जाता है।
  3. यदि दोनों न्यायाधीशों को एक ही दिन न्यायाधीश के रूप में शपथ दिलाई जाती है, उच्च न्यायालय के अधिक समय तक कार्य करने वाले न्यायाधीश को वरिष्ठ माना जाएगा।
  4. न्यायाधीशों की पीठ में से नियुक्त न्यायाधीश, वकीलों के समुदाय से नियुक्त न्यायाधीश की तुलना में वरिष्ठ होगा।

क्या यह प्रक्रिया संविधान में उल्लखित है?

भारतीय संविधान में ‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ (CJI) को नियुक्त करने के लिए मानदंड और प्रक्रिया से संबंधित कोई प्रावधान नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) में कहा गया है कि ‘कि भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश (CJI) होगा’।

  • ‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ (CJI) की नियुक्ति से संबंधित कुछ मिलता-जुलता उल्लेख अनुच्छेद 126 में किया गया है।
  • किसी संवैधानिक प्रावधान के अभाव में ‘मुख्य न्यायाधीश’ (CJI) की नियुक्ति प्रक्रिया रीति-रिवाजों तथा परंपरा पर निर्भर है।

नियुक्ति प्रक्रिया:

अगले ‘मुख्य न्यायाधीश’ (CJI) को नियुक्त करने की प्रक्रिया सरकार और न्यायपालिका के मध्य एक प्रक्रिया ज्ञापन (Memorandum of Procedure- MoP) में निर्धारित की गई है:

  1. ‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ (Chief Justice of India- CJI) की नियुक्ति प्रक्रिया केंद्रीय विधि मंत्री द्वारा ‘उपयुक्त समय’ पर अर्थात निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति तिथि नजदीक आने पर शुरू की जाती है। विधि मंत्री, सबसे पहले निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश से अगले मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए अनुशंसाओं की मांग करते है।
  2. CJI अपनी अनुशंसाएं विधि मंत्रालय को भेजते हैं और किसी प्रकार की आशंका होने की स्थिति में मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की ‘मुख्य न्यायाधीश’ के रूप में उपयुक्तता के बारे में कॉलेजियम से परामर्श कर सकता है।
  3. विधि मंत्री, ‘मुख्य न्यायाधीश’ से प्राप्त अनुशंसा को प्रधान मंत्री के लिए प्रेषित करते हैं। प्रधानमंत्री, इसी आधार पर राष्ट्रपति को ‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ की नियुक्ति की सलाह देते हैं।
  4. राष्ट्रपति द्वारा ‘भारत के नए मुख्य न्यायाधीश’ को पद की शपथ दिलाई जाती है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश’ तथा सुप्रीमकोर्ट के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति- महत्वपूर्ण अंतर:

‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ की नियुक्ति के मामले में, सरकार ‘मुख्य न्यायाधीश’ (अथवा कॉलेजियम) की सिफारिश को पुनर्विचार के लिए वापस उनके पास नहीं भेज सकती है; जबकि सुप्रीमकोर्ट के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में सरकार ऐसा कर सकती है। हालाँकि, यदि कॉलेजियम द्वारा पहले अनुशंसित किये गए नामो को फिर से सरकार के पास भेजा जाता है, तो सरकार फिर कोई आपत्ति नहीं कर सकती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ के बारे में।
  2. नियुक्ति
  3. पदत्याग
  4. अनुच्छेद 124 और 126
  5. CJI की नियुक्ति और SC जजों की नियुक्ति- महत्वपूर्ण अंतर

मेंस लिंक:

भारत में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के चयन प्रक्रिया का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। इस प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी कैसे बनाया जा सकता है? सुझाव दीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020


संदर्भ:

हाल ही में, एक संसदीय समिति द्वारा ‘उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियमों (Consumer Protection (E-Commerce) Rules), 2020’ पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी है।

प्रमुख अनुशंसाएं:

  • सरकार के लिए ‘अनुचित’ व्यापार प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्ट रूप में पारिभाषित करना चाहिए।
  • सरकार को इस मुद्दे से निपटने के लिए एक व्यावहारिक कानूनी उपाय निर्धारित करने चाहिए।
  • ई-कॉमर्स फर्मों द्वारा लगाए गए वितरण शुल्क पर एक सीमा निर्धारित की जानी चाहिए।
  • भ्रामक सूचना से संबंधित नियमों के उल्लंघन करने पर दंडात्मक प्रावधान किए जाने चाहिए।
  • ‘उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय’ को, व्यस्ततम समय (peak hours) में सेवाओं की डिलीवरी चार्ज पर उच्चतम सीमा निर्धारित करने के साथ-साथ बाजार में स्थित इकाईयों द्वारा लगाए जाने वाले डिलीवरी चार्ज के निर्धारण हेतु व्यापक दिशानिर्देश जारी करने चाहिए।
  • मंत्रालय के लिए, ‘ड्रिप मूल्य निर्धारण’ (Drip Pricing) को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिए – जिसमें उत्पाद की अंतिम लागत अतिरिक्त शुल्कों के कारण बढ़ जाती है, और इसके उल्लंघन के लिए दंडात्मक प्रावधानों को शामिल करके इसके खिलाफ उपभोक्ताओं की रक्षा करने का प्रावधान करना चाहिए।

संबंधित प्रकरण:

हालांकि, ई-कॉमर्स उद्यम कई लाभ प्रदान करते हैं, किंतु इसके विकास ने उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार प्रक्रियाओं के नए रूपों, निजता के उल्लंघन और शिकायत संबंधी मामलों की गैर-सुनवाई आदि के प्रति संवेदनशील बना दिया है।

  • स्वार्थचालित कीमतें (Predatory pricing), इसी प्रकार का एक मुद्दा हैं, इसके परिणाम स्वरूप बाजार में प्रतिस्पर्धा ख़त्म हो सकती है और लंबे समय में यह उपभोक्ताओं के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।
  • स्वार्थचालित कीमतें (प्रिडेटरी प्राइसिंग) एक अल्पकालिक रणनीति होती है, जिसे बाजार में अधिक पूंजी रखने वाले कुछ दिग्गजों द्वारा अल्पकालिक नुकसान को झेलने तथा अपने उत्पादों की कीमतों को औसत परिवर्तनीय लागत से कम रखने के लिए अपनाई जाती है।
  • इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा का सफाया हो सकता है और यह लंबे समय में उपभोक्ताओं के लिए हानिकारक हो सकता है।

हालिया निर्धारित नियम:

  • 23 जुलाई को अधिसूचित ‘उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम’, 2020, डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क पर बेचे जाने वाले सभी वाणिज्यिक लेनदेन को नियंत्रित करते है।
  • ई-कॉमर्स नियम वर्तमान में दो ई-कॉमर्स बिजनेस मॉडल, अर्थात्, मार्केटप्लेस मॉडल और भंडार-आधारित मॉडल (inventory-based model) को मान्यता देते हैं।
  • इन नियमों में बाज़ार और भंडार -आधारित इकाईयों के लिए अलग-अलग प्रावधान निर्धारित किये गए हैं।
  • ई-कॉम नियमों के तहत, वापसी, धनवापसी, विनिमय, वारंटी और गारंटी, सामान और सेवाओं के वितरण और शिपमेंट की सभी जानकारी, जिसमें उत्पादों के उत्पत्ति देश संबंधी विवरण भी शामिल हैं, को अपने प्लेटफ़ॉर्म पर प्रदर्शित करना अनिवार्य किया गया है।
  • इस प्रकार के विवरण उपभोक्ताओं को समझदारी से फैसला लेने में सक्षम बनाते हैं।

कृपया ध्यान दें:

  • उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020, नए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत अधिसूचित किए गए हैं।
  • उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 प्रकृति में अनिवार्य हैं तथा ये मात्र सलाहकारी नहीं हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के बारे में
  2. उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020- नियम
  3. स्वार्थचालित कीमत (Predatory pricing) निर्धारण क्या है?

मेंस लिंक:

नया उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (CPA) तीन दशक से अधिक पुराने पहले के कानून को प्रतिस्थापित करते हुए लागू किया जा चुका है। दोनों अधिनियमों के बीच मूलभूत अंतर क्या हैं और क्या नया कानून उपभोक्ता की अपेक्षाओं को पूर्ववर्ती क़ानून की तुलना में बेहतर तरीके से पूरा करेगा? स्पष्ट कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

भारतीय शाखा के माध्यम से बेचे जाने वाले माल पर डिजिटल टैक्स से छूट


संदर्भ:

वित्त विधेयक 2021 में संशोधन के माध्यम से, सरकार ने स्पष्ट किया है कि विदेशी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म को भारत में स्थायी प्रतिष्ठान स्थापित करने तथा यहाँ पर आयकर करने पर 2 प्रतिशत समकारी लेवी (Equalisation Levy) का भुगतान नहीं करना पड़ेगा।

हालांकि, जो विदेशी फर्म किसी प्रकार का टैक्स नहीं दे रही हैं उन्हें इसका भुगतान करना होगा।

डिजिटल टैक्स’ किसके लिए देना आवश्यक है?

अप्रैल 2020 में शुरू किया गया डिजिटल टैक्स, भारत में, 2 करोड़ रुपये से अधिक की वार्षिक आय तथा भारतीयों को ऑनलाइन वस्तुएं और सेवाएं प्रदान करने वाली केवल गैर-निवासी कंपनियों पर लागू होता है।

भारत में समकारी लेवी (Equalisation Levy):

यह विदेशी डिजिटल कंपनियों पर लगाया जाने वाला एक ‘कर’ है। यह कर वर्ष 2016 से लागू है।

  • वित्त अधिनियम, 2020 में संशोधन के पश्चात समकारी लेवी के दायरे का विस्तार किया गया है, अब इसे वस्तुओं की ऑनलाइन बिक्री तथा ऑनलाइन सेवा प्रदान करने वाली अनिवासी ई-कॉमर्स कंपनियों तक विस्तारित किया गया है। इन कंपनियों पर 2% की दर से लेवी वसूल की जायेगी तथा यह 1 अप्रैल, 2020 से प्रभावी है।
  • विशेषरूप से इस लेवी का उद्देश्य उन विदेशी कंपनियों को कर-दायरे में लाना है, जो भारत में व्यापार करती है और इनके देश में महत्वपूर्ण संख्या में ग्राहक है, परंतु ये कंपनियां देश की कराधान-व्यवस्था से बचने के लिए, इन देशी ग्राहकों के लिए भारत से बाहर स्थित अपनी ईकाइयों से बिलिंग करती हैं।

कृपया ध्यान दें:

गूगल, एप्पल, फेसबुक और अमेज़न (Google, Apple, Facebook, Amazon) के नाम पर GAFA टैक्स – बड़ी प्रौद्योगिकी और इंटरनेट कंपनियों पर लगाया जाने वाला एक प्रस्तावित डिजिटल कर है। फ्रांस द्वारा यह कर लागू करने का फैसला किया गया है (डिजिटल गतिविधियों से अर्जित राजस्व पर 3% टैक्स)।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. समकारी लेवी के बारे में।
  2. प्रयोज्यता
  3. अपवाद
  4. GAFA कर के बारे में

मेंस लिंक:

समकारी लेवी के कार्यान्वयन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

वायरस का डबल म्यूटेंट प्रकार


(Double mutant’ virus variant)

संदर्भ:

देश भर में 10 प्रयोगशालाओं के एक संघ द्वारा वायरस नमूनों के एक भाग का जीनोम अनुक्रमण, जिसे ‘इंडियन SARS-CoV-2 कंसोर्टियम ऑन जीनोमिक्स’ (INSACOG) का नाम दिया गया है, करने पर एक अनोखे ‘दोहरे उत्परिवर्ती’ (double mutant) कोरोनोवायरस प्रकार का का पता चला है। वायरस के इस ‘प्रकार’ में उत्परिवर्तन का विशिष्ट संयोजन पाया गया है, जिसे अब तक विश्व में कही नहीं देखा गया था।

यह नया वैरिएंट महाराष्ट्र से आने वाले कम से कम वायरस के 200 नमूनों में पाया गया है, साथ ही दिल्ली, पंजाब और गुजरात के कुछ नमूनों में भी पाया गया है।

चिंता का विषय:

वायरस में स्वतः उत्परिवर्तन (Mutations) कोई आश्चर्यजनक नहीं है, लेकिन कुछ विशिष्ट उत्परिवर्तन, वायरस को टीका अथवा प्रतिरक्षा प्रणाली बेअसर करने में मदद करते हैं या वायरस संबंधी मामलों में, या रोग की गंभीरता में वृद्धि करने का कारक होते हैं तथा यह चिंता का विषय बन जाते हैं।

वायरस उत्परिवर्तित क्यों होते हैं?

उत्परिवर्तन अथवा ‘म्युटेशन’ का तात्पर्य, जीनोम अनुक्रमण में होने वाला परिवर्तन होता है।

  • वायरस में ‘उत्परिवर्तन’ उनके क्रमिक विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है।
  • लाखों लोगों के संक्रमित हो जाने के बाद वायरस पर ‘क्रमिक विकास’ का दबाव बढ़ जाता है।

SARS-CoV-2 के मामले में, जोकि एक राइबोन्यूक्लिक एसिड (RNA) वायरस है, उत्परिवर्तन का अर्थ, उसके अणु-क्रम संयोजन व्यवस्था में बदलाव होता है।

आरएनए वायरस में उत्परिवर्तन, प्रायः वायरस द्वारा स्व-प्रतिलिपियाँ (copies of itself) बनाते समय गलती करने के कारण होता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कोविड-19 क्या है?
  2. उत्परिवर्तन क्या है?
  3. mRNA क्या है?
  4. RT- PCR टेस्ट क्या है?

मेंस लिंक:

कोविड- 19 वायरस के उत्परिवर्तन से संबंधित चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवर आयोग विधेयक 2021


(National Commission for Allied and Healthcare Professionals Bill)

संदर्भ:

स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवरों के व्यवसाय को विनियमित करने के लिए संसद द्वारा राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवर आयोग विधेयक (National Commission for Allied and Healthcare Professionals Bill), 2021 पारित किया गया है।

विधेयक के प्रमुख बिंदु:

  • इस विधेयक का उद्देश्य, स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवरों के व्यवसाय तथा शिक्षा को मानकीकृत एवं विनियमित करने हेतु ‘राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवर आयोग’ का गठन करना है।
  • प्रस्तावित राष्ट्रीय आयोग के कार्यों में शिक्षा और अभ्यास के लिए मानदंड निर्धारित करना, सभी पंजीकृत पेशेवरों का एक ऑनलाइन केंद्रीय रजिस्टर तैयार करना, शिक्षा के बुनियादी मानक प्रदान करना तथा एक समान प्रवेश और निकास परीक्षा के लिए प्रावधान करना शामिल है।
  • कानून के तहत, केवल अर्हताप्राप्त स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवर के रूप में राज्य रजिस्टर या राष्ट्रीय रजिस्टर में दर्ज लोगों को स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवर के रूप में व्यवसाय करने की अनुमति होगी।

परिभाषाएँ:

  1. विधेयक में, ‘स्वास्थ्य संबद्ध पेशेवर’ (allied health professional) के लिए, किसी भी रोग, बीमारी, जख्म या असमर्थता के निदान और उपचार में सहायता के लिए एक सहयोगी, तकनीशियन या शिल्प विज्ञानी के रूप में परिभाषित किया गया है। इस विधेयक के तहत, इस प्रकार के पेशेवरों के पास संबद्धित क्षेत्र में कोई डिप्लोमा या डिग्री होना अनिवार्य होगा।
  2. विधेयक में उल्लखित स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशों में जीवन विज्ञान, आघात और जले हुए मरीजों की देखभाल, सर्जिकल और एनेस्थीसिया से संबंधित तकनीकों, फिजियोथेरेपिस्ट और पोषण विज्ञान क्षेत्रों में काम करने वाले पेशेवरों को शामिल किया गया है।

महत्व:

  • यह क़ानून, स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवरों के लिए रोजगार के अवसरों में वृद्धि करेगा तथा उनके मूल्यवान कार्यों को गरिमा प्राप्त करेगा।
  • साथ ही, देश में अहर्ताप्राप्त स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों की अत्यधिक मांग है और यह कानून आम जनता को सस्ती स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं प्रदान करने के लिए आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान करेगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विधेयक का अवलोकन
  2. राष्ट्रीय आयोग के बारे में
  3. कार्य
  4. परिभाषाएँ

मेंस लिंक:

‘राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और संबद्ध पेशेवर आयोग’ विधेयक के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

सीबीएसई की ‘मूल्यांकन रूपरेखा’  


संदर्भ:

  • हाल ही में, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा ‘ब्रिटिश काउंसिल’ के सहयोग से, कक्षा 6-10 के लिए अंग्रेजी, गणित और विज्ञान विषयों हेतु एक नई मूल्यांकन रूपरेखा (assessment framework) शुरू की गई है।
  • यह रूपरेखा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत ‘मूल्यांकन में वैश्विक स्तर हासिल करने संबंधी’ परिकल्पना के अनुरूप है।

प्रमुख तथ्य:

  • यह रूपरेखा, ‘वर्तमान रट कर सीखने वाले प्रतिदर्श (rote learning model) को प्रतिस्थापित करेगी तथा दिन-प्रतिदिन की समस्याओं को हल करने के लिए आवश्यक दक्षताओं के आधार पर छात्रों का आकलन करने पर ध्यान केंद्रित करेगी’।
  • प्रणाली के तहत, शिक्षकों के लिए इन विषयों में छात्रों की पाठ्य पुस्तक के अंशो को याद करने की क्षमता-परीक्षण करने के बजाय, उनकी वास्तविक योग्यता का परीक्षण करने के लिए प्रश्न-पत्र तथा अन्य मूल्यांकन विधियों को तैयार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा।
  • पहले चरण में, यह रूपरेखा, चंडीगढ़ के चुनिंदा केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों, सीबीएसई के विद्यालयों और कुछ निजी विद्यालयों में लागू की जाएगी।
  • वर्ष 2024 तक, यह रूपरेखा देश भर के 1.32 लाख शिक्षकों और दो करोड़ छात्रों वाले 25,000 सीबीएसई स्कूलों में शुरू हो जाएगी।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

शामिल विषय: अवसंरचना- ऊर्जा।

ग्राम उजाला


संदर्भ:

हाल ही में, ग्राम उजाला कार्यक्रम की शुरुआत की गई है।

इस कार्यक्रम के अतर्गत एनर्जी एफिसिएन्सी सर्विसेस लिमिटेड (EESL) के स्वामित्व वाली सब्सिडरी कंपनी कन्वर्जन्स एनर्जी सर्विसेज लिमिटेड (CESL) ग्रामीण क्षेत्रों में 10 रुपये प्रति बल्ब की सस्ती कीमत पर उच्च गुणवत्ता वाले एलईडी बल्बों का वितरण करेगी।

कार्यान्वयन:

  • इस कार्यक्रम के तहत 7 वॉट और 12 वॉट के एलईडी बल्बों को तीन साल की वारंटी के साथ ग्रामीण उपभोक्ताओं को सामान्य चमकीले बल्बों को लौटाने पर उपलब्ध कराया जाएगा।
  • प्रत्येक परिवार को अधिकतम पांच एलईडी बल्ब प्रदान किए जायंगे।
  • इन ग्रामीण घरों में बिजली के उपयोग की निगरानी के लिए मीटर लगाए जाएंगे।

वित्तपोषण प्रणाली:

  • कार्यक्रम को पूरी तरह से कार्बन क्रेडिट के माध्यम से वित्तपोषित किया जाएगा और भारत में इस तरह का पहला कार्यक्रम होगा।
  • कार्बन क्रेडिट से अर्जित राजस्व से प्रति एलईडी बल्ब की कुल कीमत में 60 रुपए चुकाए जाएँगे तथा शेष 10 रुपए का भुगतान ग्रामीण उपभोक्ता द्वारा किया जाएगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ग्राम उजाला कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएं।

मेंस लिंक:

ग्राम उजाला कार्यक्रम के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


पाकल दुल जलविद्युत परियोजना

(Pakal Dul Hydro Electric Project)

पाकल दुल जलविद्युत परियोजना (1,000 मेगावाट) केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में स्थित चिनाब नदी की सहायक नदी मरुसुदर नदी पर प्रस्तावित है।

ट्यूलिप गार्डन

(Tulip garden)

  • यह जम्मू और कश्मीर के श्रीनगर में स्थित एक ट्यूलिप गार्डन है। इसे इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्यूलिप गार्डन के रूप में भी जाना जाता है।
  • यह एशिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन है जो लगभग 30 हेक्टेयर (74 एकड़) के क्षेत्र में फैला है।
  • यह बाग़ ज़बरवान पर्वत श्रेणी की तलहटी में स्थित है।

संयुक्त राष्ट्र प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान (UNITAR)

(UN Institute for Training & Research)

  • यह संयुक्त राष्ट्र तंत्र की, प्रशिक्षण हेतु समर्पित एक शाखा है।
  • मुख्यालय: जिनेवा (स्विट्जरलैंड)
  • इसका गठन, वर्ष 1963 में नए स्वतंत्र हुए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के युवा राजनयिकों को प्रशिक्षित करने तथा कूटनीतिक माहौल में विचरण करने हेतु आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान करने हेतु किया गया था।
  • यह संस्थान, सार्वजनिक ऋण प्रबंधन, वित्त और व्यापार पर अपने पाठ्यक्रमों के माध्यम से वित्त मंत्रालयों को सहायता प्रदान करता है, तथा यह सरकारी अधिकारियों के लिए शांति व्यवस्था बनाए रखने और संघर्ष-रोकथाम हेतु प्रशिक्षण प्रदान करता है।
  • संयुक्तराष्ट्र क्रियाशील उपग्रह अनुप्रयोगों (UN operational satellite applications- UNOSAT) पर अपने कार्यक्रमों के माध्यम से, यह संस्थान उपग्रह बिम्ब और विश्लेषण प्रदान करता है।
  • वर्ष 2003 से, UNITAR नगरपालिका तथा क्षेत्रीय नेताओं को जटिल सार्वजनिक नीतियों से निपटने के लिए सहायता प्रदान करने हेतु पाठ्यक्रम प्रदान कर रहा है।


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