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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 20 March 2021

 

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

1. बीमा संशोधन विधेयक, 2021

2. सहायताप्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध संबंधी उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक

3. केन्या और सोमालिया के बीच हिंद महासागर सीमा विवाद

4. अनुपूरक अनुदान मांग

 

सामान्य अध्ययन-III

1. ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ की कार्यप्रणाली और आंकड़ों की परिशुद्धता पर सरकार का प्रश्नचिह्न

2. ‘एल्यूमीनियम-एयर बैटरी’

3. पेटेंट सत्यापन हेतु भारत और जापान के मध्य सहयोग वृद्धि करने पर सहमति

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश संशोधन विधेयक 2021

2. सामर अभियान

3. प्रिज़कर आर्किटेक्चर प्राइज़

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

बीमा संशोधन विधेयक, 2021


संदर्भ:

हाल ही में, बीमा संशोधन विधेयक, 2021 राज्यसभा ने पारित कर दिया गया।

विधेयक की प्रमुख विशेषताएं:

  • इस विधेयक के तहत, किसी भारतीय बीमा कंपनी में विदेशी निवेश हेतु अनुमत अधिकतम सीमा को बढ़ाने के लिए विधेयक बीमा अधिनियम, 1938 में संशोधन का प्रावधान किया गया है।
  • विधेयक में, भारतीय बीमा कंपनियों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा 49 प्रतिशत से बढ़ा कर 74 प्रतिशत कर दी गई है, और बीमा कंपनियों के स्वामित्व और नियंत्रण पर प्रतिबंध हटा दिए गए हैं।
  • बीमा कंपनियों का नियंत्रण, विदेशी कंपनियों के पास जाने के बाद भी अधिकाँश निदेशक और प्रबंधन करने वाले प्रमुख व्यक्ति भारतीय होंगे, जिन पर भारत का क़ानून लागू होगा।

महत्व:

भारत में बीमा कंपनियां ‘पूंजी की कमी’ के दबाव का सामना कर रही हैं और विदेशी निवेश की सीमा में वृद्धि करने से वृद्धिमान पूंजी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी।

पृष्ठभूमि:

वर्ष 2000 में, पहली बार बीमा क्षेत्र में 26% तक विदेशी निवेश की अनुमति दी गई थी।

इसके बाद, 2015 के एक संशोधन अधिनियम के तहत, यह सीमा,  भारतीय स्वामित्व एवं नियंत्रण वाली कंपनी के लिए, बढाकर चुकता शेयर पूंजी का 49% कर दी गयी थी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. बीमा क्षेत्र में FDI
  2. हालिया संशोधन
  3. IRDAI के बारे में

मेंस लिंक:

बीमा क्षेत्र में 100% FDI की अनुमति देने से संबंधित मुद्दों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 

शामिल विषय: संघ और राज्यों के कार्य और जिम्मेदारियां, संघीय ढांचे से संबंधित मुद्दे और चुनौतियां, शक्तियों का विचलन और स्थानीय स्तर पर वित्त और उसमें चुनौतियां।

सहायताप्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध संबंधी उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक


संदर्भ:

हाल ही में, उच्चतम न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय द्वारा किए गए एक निर्णय पर रोक लगा दी है। केरल उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में सहायताप्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को विधानसभा चुनाव लड़ने या राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

संबंधित प्रकरण:

उच्च न्यायालय ने ‘विधान सभा (निरर्हक सदस्यों का निष्कासन) अधिनियम,’ 1951 (Legislative Assembly (Removal of Disqualifications) Act of 1951) की धारा 2 (IV) को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इस क़ानून के तहत सहायताप्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों को विधायक बनने की अनुमति दी गयी थी।

  • याचिकाकर्ताओं द्वारा 1951 के इस क़ानून को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा था, कि उनकी राजनीति में भागीदारी से शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी।
  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि, चूंकि केरल सरकारी कर्मचारी आचरण नियमों के तहत सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने से प्रतिबंधित किया गया है, अतः इस नियम को सहायताप्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों पर भी लागू किया जाना चाहिए।

सरकार का पक्ष:

सरकार ने उच्च न्यायालय में दलील दी कि वर्ष 1967 में जारी एक सरकारी आदेश के अनुसार, सहायताप्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों को राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं।

इनको राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने या चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने के लिए कोई नियम या क़ानून नहीं हैं। इसके अलावा, स्थानीय निकायों और विधानसभा के लिए चुने गए सहायताप्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों को अवैतनिक विशेष अवकाश दिया जा सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विधानसभा चुनाव में उमीदवार होने की पात्रता
  2. चुनाव लड़ने से किसे वंचित किया जा सकता है?
  3. विधानसभा चुनाव में कौन मतदान कर सकता है?
  4. विधानसभा चुनाव बनाम पंचायत चुनाव।

मेंस लिंक:

राजनीति में शिक्षकों की भागीदारी, शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

केन्या और सोमालिया के मध्य हिंद महासागर सीमा विवाद


संदर्भ:

केन्या ने सोमालिया के साथ समुद्री सीमा विवाद पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice- ICJ) की कार्यवाही में भाग लेने से मना कर दिया है।

संबंधित प्रकरण:

दोनों पड़ोसी देशों के मध्य असहमति का मुख्य बिंदु, हिंद महासागर में उनकी समुद्री सीमा के विस्तार की ‘दिशा’ से संबंधित है।

विवादित क्षेत्र की अवस्थिति:

  • सोमालिया के अनुसार, हिंद महासागर की ओर समुद्री सीमा का विस्तार उसी दिशा में, अर्थात दक्षिण-पूर्व की ओर होना चाहिए, जिस दिशा में उसकी स्थलीय सीमा का विस्तार है।
  • दूसरी ओर, केन्या का तर्क है कि, समुद्र की ओर पहुचने पर दक्षिण-पूर्व स्थलीय सीमा में 45 डिग्री का मोड़ आना चाहिए और इसके बाद यह अक्षांशीय दिशा में अर्थात भूमध्य रेखा के समानांतर होनी चाहिए।

इस व्यवस्था से केन्या के लिए लाभ होगा। केन्या की तटरेखा की लंबाई मात्र 536  किमी है और यह सोमालिया की तटरेखा (3,333 किमी) से लगभग 6  गुना कम है।

इस क्षेत्र का महत्व:

इस विवादित त्रिकोणीय क्षेत्र का क्षेत्रफल लगभग 1.6 लाख वर्ग किमी है, और समृद्ध समुद्री भंडार से भरपूर है। इस क्षेत्र में तेल और गैस भंडार होने का भी अनुमान है।

Kenya_Somalia

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UNCLOS क्या है?
  2. हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित देश
  3. हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका

मेंस लिंक:

हिंद महासागर क्षेत्र के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

अनुपूरक अनुदान मांग


(Supplementary demand for grants)

संदर्भ:

हाल ही में लोकसभा द्वारा अनुदानों की अनुपूरक मांग (2020-21 के लिए दूसरा बैच) पारित कर दी गयी है।

‘अनुपूरक अनुदान मांग’ क्या होती है?

जब किसी सरकारी व्यय हेतु विनियोग अधिनियम द्वारा प्राधिकृत राशि उस वर्ष हेतु चालू वित्तीय वर्ष में अपर्याप्त पाई जाती है, तो अनुपूरक अनुदानों की मांग (Supplementary Demands for Grants) की जाती है।

संवैधानिक प्रावधान:

वर्ष 1949 में, भारत के संविधान में अनुपूरक (Supplementary), अतिरिक्त (additional) अथवा अधिक अनुदान (excess grants) और प्रत्ययानुदान (votes of credit) और अपवादानुदान (exceptional grants) का उल्लेख में किया गया है।

  • अनुच्छेद 115: अनुपूरक, अधिक तथा अतिरिक्त अनुदान।
  • अनुच्छेद 116: लेखानुदान (Votes on account) प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान।

अनुदान मांगों हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया:

  1. जब सरकार के पास आवश्यक व्यय हेतु संसद द्वारा अधिकृत अनुदान कम पड़ जाता है, तो संसद के समक्ष अतिरिक्त अनुदान के लिए एक आकलन प्रस्तुत किया जाता है।
  2. संसद द्वारा ये अनुदान वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पहले पारित किए जाते हैं।
  3. जब वास्तविक व्यय संसद द्वारा स्वीकृत अनुदान से अधिक हो जाता है, तो वित्त मंत्रालय द्वारा अतिरिक्त अनुदान की मांग पेश की जाती है।
  4. भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा अधिक व्यय संबंधी जानकारी को संसद के संज्ञान में लाया जाता है।
  5. लोक लेखा समिति द्वारा इन अधिक व्यय संबंधी जानकारियों की जांच करती है तथा संसद के लिए सिफारिशें देती है।
  6. अतिरिक्त व्यय हेतु अनुदान मांग, वास्तविक व्यय होने के बाद की जाती है तथा संसद में चालू वित्त वर्ष की समाप्ति के बाद पेश की जाती है।

अन्य अनुदान:

अतिरिक्त अनुदान (Additional Grant): यह तब प्रदान की जाती है, जब उस वर्ष हेतु बजट में किसी नयी सेवा के संबंध में व्यय परिकल्पित न किया गया हो और चालू वित्तीय वर्ष के दौरान अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता उत्पन्न हो गयी हो।

अधिक अनुदान (Excess Grant): इस प्रकार के अनुदान की मांग तब रखी जाती है, जब उस वर्ष के बजट में उस सेवा के लिए निर्धारित राशि से ज्यादा राशि व्यय हो जाती है। वित्त वर्ष के उपरांत इस पर लोक सभा में मतदान होता है। इस परकार की मांग को लोक सभा में पेश करने से पहले संसदीय लोक लेखा समिति से मंजूरी मिलना अनिवार्य होता है।

अपवादानुदान (Exceptional Grants): इसे विशेष प्रयोजन के लिए मंजूर किया जाता है तथा यह वर्तमान वित्तीय वर्ष या सेवा से सम्ब्बंधित नहीं होती है।

सांकेतिक अनुदान (Token Grant): यह अनुदान तब जारी की जाती है जब पहले से प्रस्तावित किसी सेवा के अतिरिक्त नयी सेवा के लिए धन की आवश्यकता होती है। इसके लिए लोकसभा में प्रस्ताव रखा जाता है तथा उस पर मतदान होता है, फिर धन की व्यवस्था की जाती है। यह किसी अतिरिक्त व्यय से संबंधित नहीं होती है।

प्रीलिम्स लिंक:

निम्नलिखित के बारे में जानिए:

  1. अतिरिक्त अनुदान।
  2. अधिक अनुदान।
  3. अपवादानुदान।
  4. सांकेतिक अनुदान।
  5. अनुदान मागों हेतु प्रक्रिया।
  6. संबंधित संवैधानिक प्रावधान
  7. CAG और PAC।

स्रोत: पीआईबी

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।

ग्लोबल हंगर इंडेक्सकी कार्यप्रणाली और आंकड़ों की परिशुद्धता पर सरकार का प्रश्नचिह्न


संदर्भ:

हाल ही में, सरकार ने वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ / ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) रिपोर्ट की कार्यप्रणाली और आंकड़ों की परिशुद्धता पर सवाल उठाया है। सरकार ने आरोप लगाते हुए कहा है कि रिपोर्ट में  रैंकिंग निर्धारित करते हुए जो बच्चे स्वस्थ थे, उनकी भी इसमें गिनती कर ली गई।

रिपोर्ट का संकलन करने वाले गैर-सरकारी संगठन ‘वेल्ट हंगर हिल्फे’ (Welt Hunger Hilfe) के लिए सरकार, इसकी कार्यप्रणाली, आंकड़ों की परिशुद्धता तथा प्रतिदर्श आमाप (sample size) के बारे में अपनी आशंकाएं व्यक्त कर चुकी है। अभी तक NGO द्वारा इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की गयी है।

संबंधित प्रकरण:

‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ की नवीनतम रिपोर्ट में, भारत को नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों से नीचे रखा गया था, जबकि भारत, विश्व के शीर्ष 10 खाद्य-उत्पादक देशों में शामिल है।

भारत को, 107 देशों के सूचकांक में 94 वें स्थान पर रखा गया था।

‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ (GHI) क्या है?

‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ या ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ (GHI) एक सहकर्मियों द्वारा समीक्षा के बाद प्रकाशित (Peer-Reviewed Publication) एक रिपोर्ट है।

  • इसे प्रतिवर्ष वेल्ट हंगर हिल्फे (Welt Hunger Hilfe) तथा कंसर्न वर्ल्डवाइड (Concern Worldwide) द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया जाता है।
  • यह वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर ‘भूखमरी’ संबंधी स्थिति का पता लगाता है।

GHI में देशों की रैंकिंग किस प्रकार की जाती है?

‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ की गणना एक सूत्र पर आधारित होती है, जिसमे, चार घटक संकेतकों का उपयोग करते हुए भुखमरी के तीन आयामों– अपर्याप्त कैलोरी खुराक, बाल कुपोषण तथा बाल मृत्युदर- को शामिल किया जाता है।

GHI के चार घटक संकेतक निम्न है:

  1. अल्पपोषण (UNDERNOURISHMENT): अल्प-पोषित आबादी का हिस्सा जो अपर्याप्त कैलोरी सेवन को दर्शाता है।
  2. बाल-निर्बलता (CHILD WASTING): पांच वर्ष से कम उम्र के वे बच्चे, जिनका वज़न उनकी लंबाई के अनुपात में कम होता है, तीव्र कुपोषण को दर्शाता है।
  3. बच्चों में नाटापन (CHILD STUNTING): पांच वर्ष से कम उम्र के वे बच्चे आते हैं जिनकी लंबाई आयु के अनुपात में कम होती है। यह दीर्घकालिक कुपोषण को दर्शाता है।
  4. बाल मृत्यु दर (CHILD MORTALITY): पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर। यह आंशिक रूप से, अपर्याप्त पोषण और अस्वास्थ्यकर वातावरण के घातक मिश्रण को प्रतिबिंबित करती है।

‘वैश्विक भुखमरी सूचकांक’ की गणना:

  • ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) में 0 से 100 अंको के मापक पर देशों की रंकिग की जाती है, जिसमे ‘0’ सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (भुखमरी-मुक्त) तथा ‘100’ सबसे ख़राब प्रदर्शन को दर्शाता है।
  • 10 अंक से कम स्कोर ‘भूख के निम्न स्तर’ को दर्शाता है; 20 से 34.9 तक का स्कोर ‘भूख के गंभीर स्तर’ का संकेतक होता है; 35 से 49.9 तक का स्कोर ‘भुखमरी के खतरनाक स्तर’ तथा 50 या उससे अधिक का स्कोर ‘भुखमरी के अत्यंत चिंताजनक स्तर’ को प्रदर्शित करता है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

  • भारत में, पांच वर्ष से कम उम्र के नाटे बच्चों, अर्थात जिनका वज़न उनकी लंबाई के अनुपात में कम होता है, की संख्या विश्व में सर्वाधिक है, यह स्थिति तीव्र कुपोषण को दर्शाती है।
  • रिपोर्ट में भारत को 27.2 अंक प्राप्त हुए हैं और इसे ‘गंभीर श्रेणी’ में रखा गया है।
  • दक्षिण, पूर्व और दक्षिण-पूर्वी एशिया क्षेत्रों में, भारत की तुलना में केवल तिमोर-लेस्ते, अफगानिस्तान और उत्तर कोरिया की स्थिति खराब है।
  • भारत में ‘बच्चों में नाटापन’ (Child Stunting) दर 37.4% है।
  • देश में बाल-निर्बलता (Child Wasting) दर 17.3% है।
  • भारत में अल्पपोषण (Undernourishment) दर 14% तथा बाल मृत्यु दर 3.7% है।

india_stand

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) के बारे में
  2. GHI किसके द्वारा जारी किया जाता है?
  3. GHI की गणना
  4. देशों की रैंकिंग
  5. भारत का प्रदर्शन: 2020 बनाम 2019
  6. भारत तथा पड़ोसी देशों की GHI में स्थिति

मेंस लिंक:

नवीनतम ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के प्रदर्शन पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

‘एल्यूमीनियम-एयर बैटरी’


(What are aluminium-air batteries?)

संदर्भ:

सरकार के स्वामित्व वाली इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा इज़राइल के एक बैटरी प्रौद्योगिकी स्टार्टअप फ़िनर्जी के साथ एक संयुक्त उद्यम शुरू करने का निर्णय लिया गया है।

इसके तहत इलेक्ट्रिक वाहनों और अचल भंडारण हेतु एल्यूमीनियम- एयर प्रौद्योगिकी (Aluminium-Air Technology) आधारित बैटरी सिस्टम विकसित किया जाएगा तथा हाइड्रोजन के भंडारण का समाधान भी खोजा जाएगा।

‘एल्यूमीनियम-एयर बैटरी’ क्या है?

एल्यूमीनियम-एयर बैटरियों में हवा में उपस्थित ऑक्सीजन का उपयोग किया जाता है, इस ऑक्सीजन द्वारा एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड के विलयन से अभिक्रिया करने पर एल्यूमीनियम का ऑक्सीकरण होता है तथा विद्युत् उत्पादित होती है।

लाभ:

  • भारत में, वर्तमान में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए लिथियम आयन बैटरियों का व्यापक उपयोग किया जाता है, ‘एल्यूमीनियम-एयर बैटरी’ कम लागत और अधिक ऊर्जा क्षमता के कारण लिथियम आयन बैटरी का विकल्प हो सकती हैं।
  • ये बैटरी, पूर्णतया चार्ज होने के बाद, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए 400 किमी या इससे अधिक दूरी तक यात्रा करने में सक्षम बनाएगी जबकि, वर्तमान में लिथियम-आयन बैटरी मात्र 150-200 किलोमीटर का औसत प्रदान करती है।
  • एल्यूमीनियम-एयर बैटरी में एल्यूमीनियम प्लेट, समय के साथ, एल्यूमीनियम ट्राइहाइड्रोक्साइड में परिवर्तित हो जाती है और एल्यूमीनियम ट्राइहाइड्रोक्साइड से एल्यूमीनियम को पुनः प्राप्त किया जा सकता है तथा सीधे औद्योगिक उपयोगों के लिए बेचा जा सकता है।

चुनौतियाँ:

एल्यूमीनियम-एयर बैटरियों को लिथियम-आयन बैटरी की तरह रिचार्ज नहीं किया जा सकता है। इसलिए, एल्यूमीनियम-एयर बैटरी चालित वाहनों के बड़े पैमाने पर उपयोग हेतु बड़े स्तर पर बैटरी स्वैपिंग स्टेशनों की आवश्यकता होगी।

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रसार हेतु इस तकनीक का महत्व:

वर्तमान में, भारत, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए लिथियम आयन बैटरी के आयात पर काफी हद तक चीन पर निर्भर है। लिथियम-आयन बैटरी का एक व्यवहार्य विकल्प और बैटरियों के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने से भारत में ऊर्जा भंडारण संबंधी बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

पेटेंट सत्यापन हेतु भारत और जापान के मध्य सहयोग वृद्धि करने पर सहमति


संदर्भ:

भारत और जापान, अपने पास किसी अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट हेतु आवेदन किये जाने पर एक सक्षम ‘अंतर्राष्ट्रीय जांच एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रारंभिक परीक्षक प्राधिकरण’ (International Searching and International Preliminary Examining Authority– ISA/IPEA) के रूप में परस्पर एक दूसरे के कार्यालयों को मान्यता देने पर सहमत हो गए हैं।

यह निर्णय, ‘पेटेंट प्रॉसिक्यूशन हाइवे’ (Patent Prosecution Highway- PPH) कार्यक्रम की हालिया समीक्षा बैठक के दौरान लिया गया।

‘पेटेंट प्रॉसिक्यूशन हाइवे’ (PPH) कार्यक्रम के बारे में:

‘पेटेंट प्रॉसिक्यूशन हाइवे’ (PPH), कुछ पेटेंट कार्यालयों के मध्य सूचनाओं को साझा करने में माध्यम से पेटेंट प्रॉसिक्यूशन प्रक्रिया को गति देने के लिए की गयी पहलों का एक समूह है।

कार्यविधि:

  • इसके तहत, भारत में कोई पेटेंट आवेदक अपने पेटेंट आवेदन के फास्ट-ट्रैकिंग समाधान की मांग कर सकता है, इसके लिए उसे यह दिखाना होगा कि उसके उत्पाद को जापान में पेटेंट दिया जा चुका है।
  • इस पायलट प्रोग्राम के तहत, भारतीय पेटेंट कार्यालय को केवल कुछ विशेष तकनीकी क्षेत्रों, जैसे कि, विद्युत्, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, भौतिकी, सिविल, मैकेनिकल, कपड़ा, ऑटोमोबाइल और धातुकर्म आदि में पेटेंट आवेदन प्राप्त हो सकते हैं।

PPH कार्यक्रम से ‘भारतीय बौद्धिक संपदा कार्यालय’ के लिए निम्नलिखित लाभ होंगे:

  1. पेटेंट आवेदनों को निपटाने में लगने वाले समय में बचत।
  2. विचाराधीन पेटेंट आवेदनों में कमी।
  3. पेटेंट आवेदनों की जांच और परीक्षण गुणवत्ता में सुधार।
  4. MSMEs और भारत के स्टार्ट अप सहित भारतीय आविष्कारकों के लिए जापान में अपने पेटेंट आवेदनों की तत्काल जांच का अवसर।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘पेटेंट प्रॉसिक्यूशन हाइवे’ (PPH) के बारे में
  2. विशेषताएं
  3. कार्यविधि
  4. लाभ

मेंस लिंक:

‘पेटेंट प्रॉसिक्यूशन हाइवे’ (PPH) कार्यक्रम के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश संशोधन विधेयक 2021

(Constitution (Scheduled Castes) Order (Amendment) Bill)

  • हाल ही में, यह विधेयक लोकसभा में पारित हो गया है।
  • इस विधेयक में, तमिलनाडु की, (कुछ जिलों के तटीय क्षेत्रों को छोड़कर) सात जातियों को एक जाति ‘देवेन्द्रकुला वेल्लालार’ (Devendrakula Vellalars) में समाहित करने का प्रस्ताव किया गया है।
  • इन जातियों में देवेन्द्रकुलथन, कडड्यन, कल्लादि, कुडुम्बन, पल्लन, पन्नाडी, वाथिरियन शामिल हैं।

सामर अभियान

(SAAMAR Campaign)

  • झारखंड सरकार ने राज्य में कुपोषण से निपटने के लिए SAAMAR अर्थात ‘स्ट्रेटेजिक एक्शन फॉर एलेविएशन ऑफ एलीवेशन एंड एनीमिया रिडक्शन’ अभियान शुरू करने की घोषणा की है।
  • इस अभियान का उद्देश्य रक्ताल्पता से ग्रस्त महिलाओं और कुपोषित बच्चों की पहचान करना और राज्य में कुपोषण एक बड़ी समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए विभिन्न विभागों को परस्पर संबद्ध करना है।
  • SAAMAR अभियान को 1000 दिनों के लक्ष्य के साथ शुरू किया गया है, और इसकी प्रगति को ट्रैक करने के लिए वार्षिक सर्वेक्षण किया जाएगा।

प्रिज़कर आर्किटेक्चर प्राइज़

(Pritzker Architecture Prize)

  • यह, किसी जीवित वास्तुकार को उसके विश्वस्तरीय उल्लेखनीय योगदान हेतु प्रतिवर्ष दिया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय शीर्ष स्तर का पुरस्कार है।
  • इस पुरस्कार की स्थापना 1978 में जय ए प्रिज़कर और उनकी पत्नी कैंडी के द्वारा हयात फाउंडेशन के बैनर तले की गई थी।
  • इसे वास्तुकला में दुनिया के प्रमुख पुरस्कारों में से एक माना जाता है, और अक्सर इसे वास्तुकला का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है।

संदर्भ:

फ्रांसीसी स्टूडियो लैकोटन और वासल के संस्थापक, सोशल हाउसिंग आर्किटेक्ट ऐनी लैकटॉन (Anne Lacaton) और जीन-फिलिप वासल (Jean-Philippe Vassal)  को वर्ष 2021 का प्रिज़कर आर्किटेक्चर प्राइज़ विजेता घोषित किया गया है।


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