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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 13 February 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-I

1. भुखमरी-उन्मूलन हेतु स्वैच्छिक दिशानिर्देशों का अनुमोदन

 

सामान्य अध्ययन-II

1. नागालैंड के सात विधायकों की निरर्हता

2. मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) विधेयक, 2021

3. ‘शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत

4. नेता प्रतिपक्ष

5. इबोला

 

सामान्य अध्ययन-III

1. फरक्का बैराज में ‘लॉक’ और हिल्सा मछली: आशाएं और आशंका

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. कलारिपयट्टू (Kalaripayattu)

2. थोलपावाक्कूथु

3. विज्ञान ज्योति कार्यक्रम

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

भुखमरी-उन्मूलन हेतु स्वैच्छिक दिशानिर्देशों का अनुमोदन


संदर्भ:

हाल ही में, ‘भुखमरी एवं कुपोषण उन्मूलन’ हेतु खाद्य प्रणालियों और पोषण संबंधी पहली बार तैयार किये गए स्वैच्छिक दिशानिर्देशों को विश्व खाद्य सुरक्षा समिति’ (Committee on World Food Security- CFS) के सदस्यों ने अनुमोदित कर दिया है।

ये दिशानिर्देश, देशों द्वारा, एक व्यापक खाद्य तंत्र दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए, सभी प्रकार के भूख और कुपोषण उन्मूलन के लिए किये जा रहे प्रयासों में सहयोग प्रदान करने हेतु तैयार किए गए हैं।

इन दिशा-निर्देशों में निम्नलिखित सात प्रमुख क्षेत्रों को केंद्र में रखा गया है:

  1. पारदर्शी, लोकतांत्रिक और जवाबदेह संचालन।
  2. आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संवहनीयता और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में स्वस्थ आहार हासिल करने हेतु संवहनीय खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाएं।
  3. संवहनीय खाद्य प्रणालियों के माध्यम से स्वस्थ आहार तक समान और न्यायसंगत पहुंच।
  4. संवहनीय खाद्य प्रणालियों में खाद्य सुरक्षा।
  5. जन-केंद्रित पोषण संबंधी ज्ञान, शिक्षा और जानकारी।
  6. खाद्य प्रणालियों में लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण।
  7. मानवीय संदर्भों में लचीली खाद्य प्रणाली।

उद्देश्य और फोकस:

  • ये दिशानिर्देश, अन्य अंतरराष्ट्रीय निकायों के कार्यों और इनके अधिदेश पर आधारित है, तथा इनका उद्देश्य इन संस्थानों के कार्यों, जैसे कि, संयुक्त राष्ट्र पोषण कार्यवाही दशक (2016-2025), में सहायता करना है।
  • इनमे सभी के लिए, विशेष रूप से सर्वाधिक कमजोर और प्रभावित समूहों के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में ‘पर्याप्त भोजन का अधिकार’ हासिल करने की मांग की गयी है।
  • इन दिशानिर्देशों में, नीति नियोजन और इनके संचालन पर ध्यान केंद्रित किया गया हैं, ताकि खाद्य प्रणालियों को उपभोक्ताओं और उत्पादकों की जरूरतों के अनुसार, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए, अधिक लचीला और उत्तरदायी बनाया जा सके।

‘विश्व खाद्य सुरक्षा समिति’

(Committee on World Food Security- CFS)

‘विश्व खाद्य सुरक्षा समिति’ (CFS) की स्थापना, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में, उत्पादन तथा भौतिक और आर्थिक पहुंच सहित विश्व खाद्य सुरक्षा से संबंधित नीतियों की समीक्षा और उन पर आगे की कार्यवाही करने हेतु एक मंच प्रदान करने हेतु, वर्ष 1974 में, एक अंतर-सरकारी निकाय के रूप में की गयी थी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘विश्व खाद्य सुरक्षा समिति’ के बारे में।
  2. भुखमरी-उन्मूलन हेतु तैयार किये गए दिशानिर्देशों का अवलोकन।

मेंस लिंक:

‘भुखमरी एवं कुपोषण उन्मूलन’ हेतु खाद्य प्रणालियों और पोषण संबंधी स्वैच्छिक दिशानिर्देशों के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

नागालैंड के सात विधायकों की निरर्हता  


(Disqualification of 7 Nagaland MLAs)

संदर्भ:

गुवाहाटी उच्च न्यायालय की कोहिमा पीठ ने, नागा पीपुल्स फ्रंट (NPF) द्वारा दायर किए गए दो अंतर्वादीय-आवेदनों (interlocutory applications) को खारिज कर दिया है। इन आवेदनों में नागा पीपुल्स फ्रंट के सातो निलंबित विधायकों को 60-सदस्यीय नागालैंड विधानसभा से दूर रखने की मांग की गई थी।

पृष्ठभूमि:

सातों विधायकों ने उनकी निरर्हता से संबंधित रिट याचिका की अनुरक्षणीयता (Maintainability) को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की गयी थी, जिस पर अंतिम फैसला अभी अदालत में लंबित है। इसी कारण अंतर्वादीय-आवेदनों को खारिज कर दिया गया।

संबंधित प्रकरण:

  • नागा पीपुल्स फ्रंट (NPF) ने 24 अप्रैल, 2019 को, अपने सात निलंबित विधायकों के खिलाफ निरर्हता याचिका दायर की थी। NPF ने आरोप लगाया है कि, इन सातो विधायकों ने वर्ष 2019 में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने के पार्टी के सामूहिक निर्णय की अवहेलना की।
  • NPF ने दावा किया कि इन सात विधायकों ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता त्याग दी है, जिससे संविधान की 10 वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून- Anti-Defection Law) के प्रावधानों के अंतर्गत निरर्हक (Disqualified) घोषित किया जाना चाहिए।
  • इन विधायकों का तर्क है, कि कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करने हेतु NPF का निर्णय “क्षेत्रीयता के सिद्धांत के खिलाफ” था। इन विधायकों का कहना है कि उन्होंने दूसरे उम्मीदवार का समर्थन किया है। नागा पीपुल्स फ्रंट (NPF) ने 2019 में हुए लोकसभा चुनावों में अपना कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था।

‘दलबदल विरोधी कानून’ क्या है?

(Anti-defection law)

संविधान में, 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा एक नयी अनुसूची (दसवीं अनुसूची) जोड़ी गई थी।

  • इसमें सदन के सदस्यों द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में सम्मिलित होने पर ‘दल-बदल’ के आधार पर निरर्हता (Disqualification) के बारे में प्रावधान किया गया है।
  • इसमें उस प्रक्रिया को निर्धारित किया गया है, जिसके द्वारा विधायकों तथा सांसदों को सदन के किसी अन्य सदस्य की याचिका के आधार पर सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा ‘दल-बदल’ के आधार पर अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
  • दल-बदल कानून लागू करने के सभी अधिकार सदन के अध्यक्ष या सभापति को दिए गए हैं एवं उनका निर्णय अंतिम होता है।

यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों पर समान रूप से लागू होता है।

निरर्हता (Disqualification) के आधार:

यदि किसी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का सदस्य:

  1. स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता त्याग देता है, अथवा
  2. यदि वह सदन में अपने राजनीतिक दल के निर्देशों के विपरीत मत देता है अथवा मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा अपने राजनीतिक दल से उसने पंद्रह दिनों के भीतर क्षमादान न पाया हो।
  3. यदि चुनाव के बाद कोई निर्दलीय उम्मीदवार किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
  4. यदि विधायिका का सदस्य बनने के छह महीने बाद कोई नामित सदस्य (Nominated Member) किसी पार्टी में शामिल होता है।

कानून के तहत अपवाद:

सदन के सदस्य कुछ परिस्थितियों में निरर्हता के जोखिम के बिना अपनी पार्टी बदल सकते सकते हैं।

  • इस विधान में किसी दल के द्वारा किसी अन्य दल में विलय करने करने की अनुमति दी गयी है बशर्ते कि उसके कम से कम दो-तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों।
  • ऐसे परिदृश्य में, अन्य दल में विलय का निर्णय लेने वाले सदस्यों तथा मूल दल में रहने वाले सदस्यों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है।

पीठासीन अधिकारी के निर्णय की न्यायिक समीक्षा:

  • इस विधान के प्रारम्भ में कहा गया है कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं होगा। वर्ष 1992 में उच्चत्तम न्यायालय ने इस प्रावधान को खारिज कर दिया तथा इस सन्दर्भ में पीठासीन अधिकारी के निर्णय के विरूद्ध उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में अपील की अनुमति प्रदान की।
  • हालाँकि, यह तय किया गया कि पीठासीन अधिकारी के आदेश के बिना कोई भी न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. दल-बदल कानून संबधित विभिन्न समितियों और आयोगों के नाम
  2. समिति तथा आयोग में अंतर
  3. पीठासीन अधिकारी तथा न्यायिक समीक्षा का निर्णय
  4. राजनीतिक दलों के विलय तथा विभाजन में अंतर
  5. क्या पीठासीन अधिकारी पर दलबदल विरोधी कानून लागू होता है?
  6. संबंधित मामलों में उच्चत्तम न्यायालय के निर्णय

मेंस लिंक:

दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों का परीक्षण कीजिए। क्या यह कानून अपने उद्देश्यों को पूरा करने में विफल रहा है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकार की नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास और उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न मुद्दों के लिए हस्तक्षेप।

मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) विधेयक, 2021


(Arbitration and Conciliation (Amendment) Bill)

संदर्भ:

हाल ही में, मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) विधेयक, 2021 लोकसभा में पारित कर दिया गया है। हालाँकि, यह क़ानून 4 नवंबर, 2020 को घोषित किए गए, एक अध्यादेश के माध्यम से पहले से ही लागू है।

विधेयक की प्रमुख विशेषताएं:

  1. इस विधेयक में, ‘मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम’, 1996 में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है, जिसके अंतर्गत (i) कुछ मामलों में दिए गए ‘मध्यस्थता निर्णयों’ पर स्वचालित रूप से ‘रोक’ (Stay) लगाई जा सकेगी और (ii) मध्यस्थों (Arbitrators) के लिए आवश्यक अहर्ता प्रमाणन संबंधी योग्यता, अनुभव और मानदंडों को निर्धारित किया जाएगा।
  2. विधेयक में, ‘धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार से किये जाने वाले मध्यस्थता समझौते अथवा अनुबंधों’ के मामले में संबंधित पक्षकारों को ‘मध्यस्थता निर्णय’ के प्रवर्तन पर बिना शर्त ‘रोक’ (Stay) लगाए जाने का प्रावधान किया गया है।
  3. इसके अलावा, मध्यस्थता अधिनियम की 8 वीं अनुसूची को निरसित कर दिया गया है। 8 वीं अनुसूची में मध्यस्थों (Arbitrators) की आवश्यक अहर्ता के प्रमाणन संबंधी प्रावधान सम्मिलित थे।
  4. विधेयक के अंतर्गत, मध्यस्थता अधिनियम की धारा 36 में एक प्रावधान जोड़ा गया है जो 23 अक्टूबर, 2015 से पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा।
  5. इस संशोधन के अनुसार, यदि न्यायालय संतुष्ट होता है, कि संबंधित मामले में दिया गया ‘मध्यस्थता निर्णय’, प्रथमदृष्टया, ‘धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार से किये जाने वाले मध्यस्थता समझौते अथवा अनुबंधों’ पर आधारित है, तो अदालत अधिनियम की धारा 34 के तहत, प्रदान किये गए ‘मध्यस्थता निर्णय’ पर अपील लंबित रहने तक बिना शर्त रोक लगा देगी।

अधिनियम की धारा 36 में प्रस्तावित संशोधन पर उठाए गए मुद्दे:

  • हारने वाली पार्टी के लिए भ्रष्टाचार पर आरोप लगाना और ‘मध्यस्थता निर्णय’ के प्रवर्तन पर एक स्वचालित ‘रोक’ (automatic stay) हासिल करना बहुत आसान होगा। इसके बाद, संबंधित पक्षकारों को, अदालत द्वारा मामले के अंतिम निपटान तक, निर्णय लागू होने के लिए इंतजार करना होगा।
  • इस प्रकार यह संसोधन, पक्षकारों को अदालतों तक लाने और लंबे समय तक मुकदमे में फंसाने के कारण, वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली के प्रमुख उद्देश्य को ही समाप्त कर देता है।
  • क़ानून में ‘धोखाधड़ी / भ्रष्टाचार’ को परिभाषित नहीं किया गया है।
  • स्वचालित ‘रोक’ (automatic stay) के संदर्भ में, संशोधन अधिनियम के पूर्वव्यापी रूप से (2015 से) लागू होने से मुकदमों की बाढ़ आ सकती है।
  • इस संशोधन से अनुबंधों के प्रवर्तन पर भी प्रभाव पड़ेगा और अंततः भारत में सुगम व्यापार (ease of doing business) को भी प्रभावित करेगा।

पृष्ठभूमि:

अभी तक किसी मध्यस्थता फैसले के खिलाफ कानून की धारा 36 के तहत अपील दायर किए जाने के बावजूद इसे लागू किया जा सकता था। हालांकि, अदालत उपयुक्त शर्तों के साथ इस पर स्थगन दे सकती थी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मध्यस्थता (Arbitration) क्या होती है?
  2. मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम में किये गए हालिया संशोधन
  3. अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र के बारे में
  4. भारतीय मध्यस्थता परिषद के बारे में
  5. 1996 अधिनियम के तहत मध्यस्थों की नियुक्ति

मेंस लिंक:

मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

‘शक्तियों का पृथक्करण’ सिद्धांत


(Doctrine of Separation of Power)

संदर्भ:

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने, हाल ही में, लोकसभा में कहा है, जिस प्रकार ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ संविधान की मूल संरचना का एक भाग है, उसी प्रकार शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत (Doctrine of Separation of Power) भी उसी मूल संरचना का एक भाग है। उन्होंने जोर देकर कहा है, कि शासन और कानून-निर्माण का कार्य, विधायिका के निर्वाचित सदस्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

उन्होंने, जनहित याचिकाओं को स्वीकार करने में न्यायपालिका से अपने विवेक का इस्तेमाल करने का भी आग्रह किया।

संबंधित प्रकरण:

आजकल, लगभग हर मुद्दे पर जनहित याचिका दायर करने की होड़ लगी हुई है।

शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत क्या है?

‘शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत, शासन के एक मॉडल को संदर्भित करता है, जिसमे कार्यकारी, विधायी और न्यायिक शक्तियां किसी एक निकाय में केंद्रित नहीं होती हैं, बल्कि विभिन्न शाखाओं में विभाजित होती हैं।

यह भारतीय संविधान की मूल संरचना का एक भाग है, किंतु, इसका संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है।

संविधान में ‘शक्तियों के पृथक्करण’ को अभिव्यक्त करने संबंधी अनुच्छेद:

  1. अनुच्छेद 50: राज्य, न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक्‌ करने के लिए कदम उठाएगा। इसका उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है।
  2. अनुच्छेद 122 और 212: संसद‌ एवं विधानसभाओं की किसी कार्यवाही की विधिमान्यता को प्रक्रिया की किसी ‍अभिकथित अनियमितता के आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा। साथ ही, इन अनुच्छेदों के तहत सांसदों / विधायकों के लिए अभिव्यक्ति के संदर्भ में कुछ विशेषाधिकार प्रदान किये गए है, और सदन के पटल पर कही गई कोई भी बात उनके खिलाफ इस्तेमाल नहीं की जा सकती।
  3. संविधान के अनुच्छेद 121 और 211 के अनुसार; सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के न्यायिक आचरण पर संसद और राज्य विधानमंडल में चर्चा नहीं की जा सकती है।
  4. अनुच्छेद 53 और 154 में प्रावधान है, कि संघ और राज्य की कार्यकारी शक्ति राष्ट्रपति और राज्यपाल में निहित होगी और इनके लिए नागरिक और आपराधिक दायित्व से प्रतिरक्षा प्राप्त होगी।
  5. अनुच्छेद 361: राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पद की शक्तियों और कर्त्तव्यों के निर्वहन और उसके तहत किये जाने वाले किसी भी कार्य के लिये किसी न्यायालय में उत्तरदायी नहीं होंगे।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘जनहित याचिका’ क्या है?
  2. ‘जनहित याचिका’ किसके द्वारा दाखिल की जा सकती है?
  3. जनहित याचिका के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की शक्तियां।
  4. संविधान में शक्तियों के पृथक्करण संबंधी अनुच्छेद।

मेंस लिंक:

‘शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत क्या है? क्या है? भारतीय संविधान के अंतर्गत इसका पालन किस प्रकार किया जाता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

नेता प्रतिपक्ष


(Leader of Opposition)

संदर्भ:

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को राज्यसभा में ‘नेता प्रतिपक्ष’ / ‘विपक्ष के नेता’ (Leader of Opposition) चुने जाने की तैयारी हो चुकी है। वर्तमान ‘नेता प्रतिपक्ष’ ग़ुलाम नबी आज़ाद का कार्यकाल 15 फरवरी को समाप्त हो रहा है।

‘नेता प्रतिपक्ष’ कौन होता है?

  • ‘नेता प्रतिपक्ष’ (Leader of OppositionLoP), सदन में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी का नेता होता है, जिसके सदस्यों की संख्या, सदन की कुल संख्या के दसवें हिस्से से कम नहीं होनी चाहिए।
  • यह एक वैधानिक पद है, तथा इसके लिए संसद अधिनियम, 1977 के अंतर्गत विपक्ष के नेताओं के वेतन और भत्ते संबंधी प्रावधान में परिभाषित किया गया है ।

‘नेता प्रतिपक्ष’ के पद का महत्व:

  • ‘नेता प्रतिपक्ष’ (LoP) को ‘छाया प्रधान मंत्री’ (shadow Prime Minister) भी कहा जाता है।
  • सरकार गिरने की स्थिति में ‘नेता प्रतिपक्ष’ से सत्ता संभालने हेतु तैयार रहने की अपेक्षा की जाती है।
  • अगर वह सरकार गिरती है, तो वह उम्मीद कर सकती है कि वह सत्ता संभालने के लिए तैयार रहेगी।
  • नीतिगत और विधायी कार्यों में विपक्ष के कामकाज में सामंजस्य और प्रभावशीलता लाने में ‘नेता प्रतिपक्ष’ महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • जवाबदेही और पारदर्शिता संबंधी, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), केंद्रीय सूचना आयोग ( CIC), लोकपाल आदि संस्थानों में नियुक्तियों हेतु द्विदलीयता और तटस्थता लाने में ‘नेता प्रतिपक्ष’ की अहम भूमिका होती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘नेता प्रतिपक्ष’ के बारे में?
  2. पात्रता
  3. शक्तियाँ और कार्य

मेंस लिंक:

भारतीय राजनीति में ‘विपक्ष के नेता’ का क्या महत्व है? प्रभावी लोकतंत्र के लिए प्रभावी विपक्ष किस तरह से महत्वपूर्ण है? स्पष्ट कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

इबोला (Ebola)


संदर्भ:

हाल ही में, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में ‘इबोला’ (Ebola) के एक नए मामले की पहचान की गई।

पृष्ठभूमि:

जून 2020 में फैले इबोला प्रकोप के बाद, 48 दिनों तक कोई भी नए मामला सामने नहीं आने पर, नवंबर माह में इस क्षेत्र को इबोला-मुक्त घोषित कर दिया गया था।

‘इबोला’ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी:

इबोला विषाणु रोग (Ebola virus disease– EVD), मनुष्यों में फैलने वाली एक घातक बीमारी है। इसके लिए पहले ‘इबोला रक्तस्रावी बुखार’ (Ebola haemorrhagic fever) के रूप में जाना जाता था।

इबोला का प्रसरण: यह विषाणु, वन्यजीवों से मनुष्यों में फैलता है और फिर मानव आबादी में मानव-से-मानव संचरण के माध्यम से फैलता है।

औसतन इबोला विषाणु रोग (EVD) मामलों में मृत्यु दर लगभग 50% होती है। इस बीमारी के पिछले प्रकोपों ​​के दौरान संक्रमित मामलों में मृत्यु दर 25% से 90% तक परिवर्तित होती रही है।

निवारण / रोकथाम: इस बीमारी के प्रकोप को सफलतापूर्वक नियंत्रित करने के लिए सामुदायिक भागीदारी अति महत्वपूर्ण है। प्रकोप पर अच्छे तरीके से नियंत्रण, संक्रमित मामलों का प्रबंधन, निगरानी और संपर्क में आने वाले लोगों की पहचान करना, उपयुक्त प्रयोगशाला सेवाएँ, और सामाजिक जागरूकता पर निर्भर करता है।

उपचार: पुनर्जलीकरण (rehydration) सुविधा प्रदान करने के साथ प्रारंभिक सहायक देखभाल और लाक्षणिक उपचार, रोगी के जीवित रहने में अवसरों में सुधार करता है। अभी तक, इस विषाणु को निष्प्रभावी करने के कोई भी प्रमाणिक उपचार उपलब्ध नहीं है। हालांकि, रक्त- चिकित्सा, प्रतिरक्षा और ड्रग थेरेपी आदि रोगोपचार विकसित किए जा रहे हैं।

वैक्सीन / टीका:

  • वर्ष 2015 में, इबोला विषाणु रोग (EVD) के खिलाफ, ‘गिनी’ (Guinea) गणराज्य में किए गए एक प्रमुख परीक्षण के दौरान ‘rVSV-ZEBOV’ नामक एक प्रायोगिक इबोला वैक्सीन काफी प्रभावी साबित हुई थी।
  • वर्ष 2018-2019 इबोला प्रकोप के दौरान कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में ‘rVSV-ZEBOV’ वैक्सीन का उपयोग किया गया था। गर्भवती और स्तनपान करने वाली महिलाओं को भी सामान्य आबादी के समान वैक्सीन उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
  • लोगों में अविश्वास और आतंकी हमलों के कारण, दुर्गम क्षेत्रों में टीकाकरण करने में स्वास्थ्य कर्मियों को परेशानी हो रही है।

Ebola

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘इबोला’ बीमारी किस प्रकार फैलती है?
  2. ‘ज़ूनोटिक रोग’ क्या होते हैं?
  3. वायरस, बैक्टीरिया और अन्य रोगजनकों के मध्य अंतर
  4. ‘कांगो’ की अवस्थिति?
  5. इबोला प्रकोप से ग्रसित होने वाले अफ्रीकी क्षेत्र?

स्रोत: डाउन टू अर्थ

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

फरक्का बैराज में ‘लॉक’ और हिल्सा मछली: आशाएं और आशंका


संदर्भ:

फरवरी 2019 में, सरकार ने हिल्सा मछलियों के लिए एक ‘फिश पास’ / मछली मार्ग (fish pass) बनाने हेतु 360 करोड़ रुपये की लागत से फरक्का बैराज पर ‘नेविगेशन लॉक’ को फिर से डिज़ाइन करने के लिए एक परियोजना का अनावरण किया था।

फरक्का में निर्मित किये जाने वाले ‘फिश पास’ को ‘मछली मार्ग’ या ‘फिश लैडर’ भी कहा जाता है, इसका उद्देश्य बांधों और बैराज के कारण होने अवरोधों को पार करने में मछलियों की सहायता करना है।

हिल्सा मछली प्रवासन (Hilsa fish migration):

  • वैज्ञानिक भाषा में, हिल्सा (Tenualosa ilisha- तेनुआलोसा इलिशा) एक समुद्रापगामी / एनाड्रोमस (anadromous) मछली है।
  • अर्थात्, इसका अधिकांश जीवन समुद्र में बीतता है लेकिन बरसात के मौसम या प्रजनन के समय यह नदी और समुद्र के मुहाने पर पर आ जाती है, जहाँ भारत और बांग्लादेश की नदियाँ बंगाल की खाड़ी से मिलती हैं।
  • मछलियों के समूहों (shoal) का एक बड़ा भाग पद्मा और गंगा में ऊपर की ओर प्रवास करता है, कुछ मछलियों के समूह, गोदावरी की ओर भी प्रवास करने के लिए जाने जाते है, इसके अलावा, कावेरी नदी में भी हिल्सा प्रवास के साक्ष्य मिलते हैं।

मछलियों की आवाजाही पर असर:

  • ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि के अनुसार वर्ष 1970 तक हिलसा गंगा नदी में प्रयागराज से आगरा तक तैरती थी।
  • वर्ष 1975 में गंगा पर बने फरक्का बैराज ने हिल्सा के पश्चिम की ओर बढ़ने वाले मार्ग को बाधित कर दिया।
  • फरक्का बैराज में एक ‘नेविगेशन लॉक’ लगाया गया था जिसके कारण मछलियों के फरक्का से आगे तैरने में बाधा उत्पन्न होने लगी थी।

‘फिश लैडर’ (fish ladders) क्या होते हैं?

ये, सामान्यतः छोटी-छोटी सीढ़ियों से बने होते हैं, जिनके सहारे मछलियाँ बाधाओं को पार करने और दूसरी तरफ खुले पानी तक पहुँचने में सक्षम होती हैं।

इस विधि के सुचारू रूप से काम करने के लिए, इन सीढ़ियों पर बहने वाले पानी को नियंत्रित करना होता है। इन सीढ़ियों पर जल का प्रवाह और मात्रा इतनी होनी चाहिए कि मछलियों को आकर्षित कर सके, किंतु इतनी भी नहीं होनी चाहिए, कि वे इसमें तैरने से बचें।

fish_ladder

 स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


कलारिपयट्टू (Kalaripayattu)

  • यह एक मार्शल आर्ट है जिसकी उत्पत्ति केरल में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी के दौरान एक युद्ध शैली के रूप में हुई थी।
  • कलारी शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख संगम साहित्य में मिलता है, जिसमे यह ‘युद्ध के मैदान’ और ‘मुठभेड़ क्षेत्र’ दोनों को वयक्त करता है।
  • इसके लिए अब तक ज्ञात सबसे पुरानी युद्ध प्रणाली में से एक माना जाता है।
  • कलारिपयट्टू तकनीकों में कदमों (चुवातु) और मुद्राओं (वाडिवु) का संयोजन होता है। चुवातु का शाब्दिक अर्थ होता है ‘कदम’, अर्थात मार्शल आर्ट का मूल चरण। वाडिवु का शाब्दिक अर्थ होता है ‘आसन’ या मुद्रा। ये कलारिपयट्टू प्रशिक्षण की मूल विशेषताएं होती हैं। इन मुद्राओं का नामकरण जानवरों के नाम पर होता है, और ये आमतौर पर संख्या में आठ होती हैं।

tholpavakkoothu

थोलपावाक्कूथु

(Tholpavakkoothu)

  • इसे छाया कठपुतली, निज़लक्कूथु और ओलाक्कूथु भी कहा जाता है।
  • यह केरल की एक पारंपरिक मंदिर-कला है, जिसका उद्गम पलक्कड़ और पड़ोसी क्षेत्रों में हुआ था।
  • इस कला में पलक्कड़ के भद्रकाली मंदिरों में रामायण की कथाओं का प्रदर्शन किया जाता है।
  • इसमें, एजुपारा, चेंडा और मद्दालम आदि उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।
  • इस कला रूप में महारत हासिल करने के लिए कलाकारों को कई वर्षों के कठोर प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है।
  • इस कठपुतली का मंचन मंदिर परिसर में कूथुमदम (Koothumadam) नामक एक विशेष मंच पर होता है।

विज्ञान ज्योति कार्यक्रम

  • विज्ञान ज्योति कार्यक्रम लड़कियों को विज्ञान में रुचि लेने और करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) की एक नई पहल है जिसके तहत STEM में अपना करियर बनाने के लिए मेधावी लड़कियों को समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए शुरु किया गया है।
  • यह कार्यक्रम STEM के कुछ क्षेत्रों में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व की समस्या का समाधान करता है।
  • विज्ञान ज्योति कार्यक्रम से जुड़ी गतिविधियों में छात्र-अभिभावक परामर्श, प्रयोगशालाओं और ज्ञान केंद्रों का दौरा, पार्टनर रोल मॉडल इंटरैक्शन, विज्ञान शिविर, शैक्षणिक सहायता कक्षाएं, संसाधन सामग्री वितरण और टिंकरिंग गतिविधियाँ शामिल हैं।

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