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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 11 February 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-II

1. विशेषाधिकार हनन

2. स्कूल बंद होने से छात्रों की बुनियादी क्षमताओं पर प्रभाव

3. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र

 

सामान्य अध्ययन-III

1. प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण विधेयक, 2020

2. विश्व सतत विकास शिखर सम्मेलन

3. विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA)

 

प्रारम्भिक परिक्षा हेतु तथ्य

1. फर्नेस ऑइल / भट्ठी का तेल

2. आईएनएस विराट

3. मेरी सहेली पहल

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

विशेषाधिकार हनन


(Breach of Privilege)

संदर्भ:

भाजपा सांसद पी.पी. चौधरी द्वारा, लोकसभा में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ टिप्पणी करने के लिए तृणमूल कांग्रेस के सांसद महुआ मोइत्रा के खिलाफ विशेषाधिकार हनन नोटिस दिया गया है।

संबंधित प्रकरण:

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान बोलते हुए, सांसद महुआ मोइत्रा ने न्यायाधीश के आचरण के संबंध में कुछ आक्षेप लगाए थे। तो सवाल यह है कि सदन के पटल पर, किसी न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा की जा सकती है अथवा नहीं?

संविधान के अनुच्छेद 121 में, किसी वर्तमान अथवा पूर्व न्यायाधीश पर आरोप लगाए जाने को प्रतिबंधित किया गया है।

‘विशेषाधिकार’ क्या होते हैं?

संसदीय विशेषाधिकार, मूलतः सदन के सदस्यों को प्राप्त अधिकार और उन्मुक्ति को संदर्भित करते है। इन अधिकारों के तहत  सदन के सदस्यों के विरुद्ध अपने विधायी दायित्वों को पूरा करने के दौरान किये गए कृत्यों अथवा दिए गए व्यक्तव्यों के लिए किसी प्रकार की सिविल अथवा आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती है।

विशेषाधिकार संबंधी संवैधानिक प्रावधान:

संविधान के अनुच्छेद 105 के अंतर्गत भारतीय संसद, इसके सदस्यों तथा समितियों को प्राप्त विशेषाधिकार उन्मुक्तियों का उल्लेख किया गया है।

संविधान का अनुच्छेद 194, राज्य विधानसभाओं, इसके सदस्यों तथा समितियों को प्राप्त, शक्तियों, विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों से संबंधित है।

‘विशेषाधिकार हनन’ क्या होता है?

विशेषाधिकार हनन निर्धारित करने तथा उसके लिए दंड के संबंध में कोई स्पष्ट, अधिसूचित नियम नहीं हैं।

  • सामान्यतः, ऐसा कोई कार्य जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, संसद के किसी सदन के काम में बाधा या अड़चन डालता है अथवा संसद के किसी सदस्य या अधिकारी के कर्त्तव्य निर्वहन में बाधा उत्पन्न करता है, विशेषाधिकार हनन के रूप में माना जाता है।
  • सदन, उसकी समितियों या सदस्यों पर आक्षेप लगाने वाले भाषण, अध्यक्ष के कर्त्तव्यों के पालन में उसकी निष्पक्षता या चरित्र पर प्रश्न करना, सदन में सदस्यों के आचरण की निंदा करना, सदन की कार्यवाहियों का झूठा प्रकाशन करना आदि सदन के विशेसधिकारों का हनन तथा अवमानना होगा।

विधायिका के कथित विशेषाधिकार हनन संबंधी मामलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया

सदन के अध्यक्ष अथवा सभापति द्वारा एक विशेषाधिकार समिति का गठन किया जाता है, जिसमें  निचले सदन में 15 सदस्य होते हैं तथा उच्च सदन में 11 सदस्य होते हैं।

  • समिति के सदस्यों को सदन में दल की संख्या के आधार पर नामित किया जाता है।
  • अध्यक्ष अथवा सभापति द्वारा सर्वप्रथम प्रस्ताव पर निर्णय लिया जाता है।
  • प्रथम दृष्टया, विशेषाधिकार हनन अथवा अवमानना पाए जाने पर अध्यक्ष अथवा सभापति द्वारा, निर्धारित प्रक्रिया का पालन करके मामले को विशेषाधिकार समिति के पास भेज दिया जाता है।
  • समिति, आरोपी व्यक्ति द्वारा दिए गए बयानों से राज्य विधायिका और उसके सदस्यों की अवमानना तथा जनता के सामने छवि पर पड़ने वाले प्रभाव की जांच करेगी।
  • समिति को अर्ध-न्यायिक शक्तियां प्राप्त होती हैं तथा वह सभी संबंधित व्यक्तियों से स्पष्टीकरण की मांग कर सकती है, तथा परीक्षण करने के उपरान्त अपने निष्कर्षों के आधार पर राज्य विधायिका के विचारार्थ सिफारिश देगी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. संविधान के कौन से प्रावधान ‘संसदीय विशेषाधिकारों’ को सुरक्षा प्रदान करते हैं?
  2. ‘विधायिका के कथित विशेषाधिकार हनन संबंधी मामलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया’ क्या है?
  3. संसद और राज्य विधानसभाओं में विशेषाधिकार समितियों की संरचना और कार्य।
  4. विशेषाधिकार हनन के दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के लिए सजा के बारे में।
  5. क्या राज्य-विधायिका के विशेषाधिकार-हनन संबंधी मामलों में न्यायालय हस्तक्षेप कर सकते हैं?
  6. भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान में किस प्रकार संरक्षित किया गया है?

मेंस लिंक:

‘विधायी विशेषाधिकारों’ से आप क्या समझते हैं? भारत में विधायी विशेषाधिकारों के संबंध में अक्सर देखी जाने वाली समस्या पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

स्कूल बंद होने से छात्रों की बुनियादी क्षमताओं पर प्रभाव


संदर्भ:

हाल ही में, अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा, छात्रों पर, कोविड-19 के कारण लागू होने वाले लॉकडाउन से पड़ने वाले प्रभाव का करने हेतु एक क्षेत्र-अध्ययन (field study) किया गया है।

इस अध्ययन का शीर्षक था: ‘महामारी के दौरान सीखने का नुकसान’ (Loss of Learning during the Pandemic)।

प्रमुख निष्कर्ष:

  1. बच्चों को, स्कूलों के खुले होने पर, उनमे होने वाली पढाई संबंधी नियमित गतिविधियों से वंचित होना पड़ा।
  2. बच्चे, पिछले सालों में जो कुछ भी सीखे थे, उसे भी भूल रहे हैं।
  3. कक्षा II से कक्षा VI के औसतन 92% छात्र, पिछले वर्षों में अर्जित की गयी, भाषाओं से संबंधित कम से कम एक विशिष्ट बुनियादी निपुणता खो चुके हैं। गणित के संबंध में तदनुरूप आंकड़ा 82% है।

‘बुनियादी क्षमताएं’ क्या होती हैं?

‘बुनियादी क्षमताएं’ (foundational abilities) वे होती हैं, जो आगे सीखने / अध्ययन का आधार बनती हैं। किसी परिच्छेद को समझते हुए पढना, जोड़ और घटाव आदि, ‘बुनियादी क्षमताओं’ के कुछ उदाहरण है।

गणित के संबंध में, ‘बुनियादी क्षमताओं’ के तहत, इकाई और दहाई अंकों की पहचान करना; अंकगणितीय संक्रियाओं को करना; सवालों को हल करने हेतु बुनियादी अंकगणितीय संक्रियाओं का उपयोग करना; और आंकड़ो को पढना और उनसे निष्कर्ष निकालना,आदि शामिल होते हैं।

आगे की चुनौतियां:

स्कूलों के दुबारा खुलने पर, इस नुकसान की भरपाई करने हेतु शिक्षकों के लिए अतिरिक्त समय तथा अन्य सहायता प्रदान की जानी चाहिए। सभी राज्यों में, सावधानीपूर्वक तैयार किये गए समकालिक उपायों को लागू किये जाने की आवश्यकता होगी।

सुझाव:

छुट्टियों को खत्म करना; स्कूल कब खुले? इस पर ध्यान दिए बगैर, वर्ष 2021 में शैक्षणिक वर्ष को अच्छी तरह से विस्तारित करना; पाठ्यक्रम फिर से तैयार करना।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘बुनियादी मूल्य’ क्या होते हैं?
  2. अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष।

मेंस लिंक:

कोविड-19 के कारण लागू होने वाले लॉकडाउन से छात्रों की बुनियादी क्षमताओं पर पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र


संदर्भ:

हाल ही में, अमेरिका ने भारत को ‘हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र’ / इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भागीदार बताया है।

इसके साथ ही, अमेरिका ने कहा है कि, वह, भारत के अग्रणी वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने और क्षेत्र में समग्र सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत की भूमिका का स्वागत करता है।

‘इंडो-पैसिफिक’ क्या है?

एकल रणनीतिक क्षेत्र के रूप में ‘इंडो-पैसिफिक’ (Indo- Pacific) की अवधारणा, हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के परिणाम है। यह, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के मध्य परस्पर संपर्क तथा सुरक्षा और वाणिज्य के लिए महासागरों के महत्व का प्रतीक है।

‘इंडो-पैसिफिक क्षेत्र’ का महत्व:

  1. क्षेत्रीय संतुलन को बनाए रखने हेतु।
  2. भारत की रणनीतिक स्थिति में बढ़त के लिए, अमेरिका के साथ मजबूत संबंधों को एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में देखा जाता है।
  3. राष्ट्रीय हितों के लिए दीर्घकालिक परिकल्पना।
  4. हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की तेजी से बढ़ती उपस्थिति, व्यापार और सेना के माध्यम से एशिया त्तथा उससे आगे भूराजनीतिक पहुंच का विस्तार करने के चीनी प्रयास।
  5. नौ-परिवहन की स्वतंत्रता, क़ानून-आधारित व्यवस्था का पालन करने तथा व्यापार हेतु सुव्यवस्थित माहौल का निर्माण करने हेतु।
  6. मुक्त समुद्र एवं मुक्त हवाई मार्गो तथा कनेक्टिविटी के लिए; और अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानकों को बनाए रखने के लिए।

भारत के लिए ‘इंडो-पैसिफिक क्षेत्र’ की भूमिका एवं निहितार्थ:

  • इंडो-पैसिफिक / हिंद-प्रशांत क्षेत्र, जैसा कि, राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में वर्णित है, विश्व के सबसे अधिक आबादी वाले और आर्थिक रूप से गतिमान हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। यह, भारत के पश्चिमी तट से संयुक्त राज्य के पश्चिमी तट तक विस्तृत है।
  • भारत, सदैव से गंभीर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं वाला देश रहा है और “इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी” अवधारणा का सबसे महत्वपूर्ण पैरोकार है।
  • मुक्त अर्थव्यवस्था के साथ, भारत, हिंद महासागर में आने निकटवर्ती देशों और विश्व की प्रमुख समुद्री शक्तियों के साथ संबंध स्थापित कर रहा है।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘प्रशांत क्षेत्र’ के बारे में।
  2. ‘हिंद महासागर क्षेत्र’ का अवलोकन।
  3. इन क्षेत्रों में अवस्थित महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य, खाड़ियाँ और मार्ग।

मेंस लिंक:

भारत के लिए ‘इंडो-पैसिफिक क्षेत्र’ के सामरिक महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण विधेयक, 2020


(Major Ports Authority Bill)

संदर्भ:

‘प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण विधेयक’ (Major Ports Authority Bill), 2020, राज्य सभा में, 44 मतों के मुकाबले 84 मतों से पारित हो गया है।

  • इस विधेयक का उद्देश्य बंदरगाहों को विश्व-स्तरीय बनाना और बंदरगाह अधिकारियों के लिए निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करना है।
  • यह विधेयक, ‘प्रमुख बंदरग्राह ट्रस्ट कानून’ (Major Port Trusts Act), 1963 की जगह लेगा।

अभिप्राय और उद्देश्य:

  1. निर्णय लेने की प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण और प्रमुख बंदरगाहों के प्रशासन में पेशेवर रवैये का समावेश करना।
  2. तीव्र और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया को सुनिश्चित करते हुए सभी हितधारकों एवं और परियोजना को बेहतर तरीके से लागू करने की क्षमता को लाभान्वित करना।
  3. सफल वैश्विक प्रथाओं के अनुरूप केन्द्रीय बंदरगाहों में प्रशासन मॉडल का लैंडलॉर्ड पोर्ट मॉडल (landlord port model) के रूप में पुनर्विन्यास करना।

प्रमुख विशेषताऐं:

विधेयक में प्रत्येक प्रमुख बंदरगाह के लिए एक ‘प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण बोर्ड’ के गठन का प्रस्ताव किया गया है। ये बोर्ड, ‘प्रमुख बंदरग्राह ट्रस्ट अधिनियम’ 1963 के अंतर्गत मौजूदा पोर्ट ट्रस्टों की जगह लेंगे। इनमे, केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए गए सदस्य के शामिल होंगे।

बोर्ड की संरचना:

बोर्ड में एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष शामिल होंगे। दोनों को एक चयन समिति की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा। इसके अलावा बोर्ड में, ‘प्रमुख बंदरगाह’ से संबंधित राज्य की सरकार; रेल मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, और सीमा शुल्क विभाग, से प्रत्येक का एक सदस्य शामिल होगा। बोर्ड में, दो से चार स्वतंत्र सदस्य भी होंगे, जो मेजर पोर्ट अथॉरिटी से कर्मचारियों के हितों का प्रतिनिधित्व करेंगे, और एक सदस्य, केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाएगा, जो निदेशक के पद से ऊपर का होगा।

बोर्ड की शक्तियाँ:

विधेयक में, बोर्ड को प्रमुख बंदरगाह के विकास हेतु, अपने हिसाब से अपनी संपत्ति, परिसंपत्तियों, और धन का उपयोग करने की अनुमति प्रदान की गयी है। बोर्ड, (i) बंदरगाह संबंधी गतिविधियों और सेवाओं के लिए बंदरगाह परिसंपत्तियों की उपलब्धता संबंधी घोषणा, (ii) नए बंदरगाह, जेटी स्थापित करने जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित करने, और (iii) जहाजों पर अथवा किसी भी सामान पर भुगतान किये जाने वाले शुल्क से छूट संबंधी नियम भी बना सकता है:

न्यायनिर्णायक बोर्ड (Adjudicatory Board)

विधेयक में, एक न्यायिक निर्णय करने वाला (Adjudicatory) बोर्ड बनाने का प्रस्ताव किया गया है। जो, 1963 अधिनियम के तहत मौजूदा टैरिफ प्राधिकरण को प्रतिस्थापित करेगा। इसके सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी और इसमें एक पीठासीन अधिकारी और दो सदस्य शामिल होंगे।

न्यायनिर्णायक बोर्ड के कार्य:

न्यायिक निर्णय करने वाले बोर्ड, प्रमुख बंदरगाहों के लिए पूर्ववर्ती 1963 अधिनियम अधीन टैरिफ प्राधिकरण के बचे हुए कार्य को पूरा करने, बंदरगाहों और सार्वजनिक-निजी साझेदारी (PPP) से संबंधित रियायत पाने वालों के बीच उत्पन्न विवादों को हल करने, संकट में पड़ी PPP परियोजनाओं की समीक्षा करने का कार्य करेगा।

विधेयक के संदर्भ में चिंताएं:

  1. यह विधेयक, शिपिंग और पोर्ट्स क्षेत्र के निजीकरण को प्रोत्साहित कर सकता है।
  2. न्यायनिर्णायक बोर्ड के अध्यक्ष को नियुक्त करने वाली चयन समिति के बारी में कोई स्पष्टता नहीं है।

‘लैंडलॉर्ड पोर्ट मॉडल’:

  • लैंडलॉर्ड पोर्ट मॉडल (landlord port model) में, सार्वजनिक रूप से शासित बंदरगाह प्राधिकरण, एक नियामक निकाय और एक लैंडलॉर्ड के रूप में कार्य करता है, जबकि निजी कंपनियां बंदरगाह परिचालन-मुख्य रूप से कार्गो-हैंडलिंग संबंधी गतिविधियां करती हैं।
  • इस मॉडल में, बंदरगाह प्राधिकरण का बंदरगाह पर स्वामित्व अधिकार बना रहता है, जबकि बंदरगाह के बुनियादी ढाँचे के लिए निजी फर्मों को पट्टे पर दिया जाता है। निजी फर्में, कार्गो को संभालने हेतु, अपने निजी उपकरण स्थापित करते हैं।
  • बदले में, निजी इकाइयां, लैंडलॉर्ड पोर्ट के लिए, अर्जित होने वाले राजस्व का एक हिस्सा देती हैं।
  • लैंडलॉर्ड पोर्ट प्राधिकरण का कार्य, मालवाहक टर्मिनलों और इनकी सफाई के लिए बोली का आयोजन करना तथा सभी सार्वजनिक क्षेत्र की सेवाओं के परिचालन होता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. प्रमुख बनाम लघु बंदरगाह, भारत में प्रमुख बंदरगाहों की अवस्थिति।
  2. प्रमुख बंदरगाहों तथा लघु बंदरगाहों का प्रशासन।
  3. ‘प्रमुख बंदरग्राह ट्रस्ट अधिनियम’ 1963 बनाम प्रमुख बंदरगाह प्राधिकरण विधेयक, 2020।
  4. लैंडलॉर्ड पोर्ट मॉडल बनाम सर्विस पोर्ट मॉडल बनाम हाइब्रिड वार्षिकी मॉडल।
  5. पोर्ट अथॉरिटी बोर्ड की संरचना।
  6. राज्य में स्थित बंदरगाहों के लिए विशिष्ट मास्टर प्लान बनाने में राज्य सरकारों की भूमिका।

मेंस लिंक:

लैंडलॉर्ड पोर्ट मॉडल पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

विश्व सतत विकास शिखर सम्मेलन


(World Sustainable Development Summit)

संदर्भ:

हाल ही में, ‘विश्व सतत विकास शिखर सम्मेलन’ के 20 वें संस्करण का उद्घाटन किया गया है।

इस शिखर सम्मेलन का विषय है: “हमारे सामान्य भविष्य को पुनर्परिभाषित करना: सभी के लिए सुरक्षित एवं संरक्षित वातावरण”। (Redefining our common future: Safe and secure environment for all).

‘विश्व सतत विकास शिखर सम्मेलन’ के बारे में:

  • यह, ‘ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान’ (The Energy and Resources Institute-TERI) द्वारा वार्षिक रूप से आयोजित किया जाने वाला प्रमुख कार्यक्रम है।
  • यह, वैश्विक मुद्दों पर, विकासशील देशों में आयोजित होने वाला एकमात्र शिखर सम्मेलन है।
  • यह, वैश्विक नेताओं और कार्यकर्ताओं को सार्वभौमिक महत्व के जलवायु मुद्दों पर चर्चा एवं विचार-विमर्श करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।
  • यह विश्व के प्रबुद्ध नेताओं और विचारकों को एक मंच पर इकट्ठा करके वैश्विक समुदाय के हित में दीर्घकालिक समाधान प्रदान करने का प्रयास करता है।
  • यह ‘दिल्ली सतत विकास शिखर सम्मेलन’ (Delhi Sustainable Development Summit-DSDS) की परंपरा को जारी रखे हुए है। DSDS की शुरुआत, वर्ष 2001 में, ‘सतत विकास’ को विश्व स्तर पर साझा लक्ष्य बनाने के उद्देश्य से की गयी थी।

ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान’ (TERI):

  • TERI, भारत और दक्षिणी विश्व (Global South) के ‘सतत विकास’ हेतु अनुसंधान करने के लिए समर्पित एक अग्रणी थिंक टैंक है।
  • इसकी स्थपाना, वर्ष 1974 में ऊर्जा मुद्दों पर एक सूचना केंद्र के रूप में की गयी थी।
  • हालाँकि, बाद के दशकों में, ‘ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान’ (TERI) ने एक शोध संस्थान के रूप में एक नई पहचान स्थापित की, जिसकी नीतियों और प्रौद्योगिकी समाधान से लोगों के जीवन और पर्यावरण में काफी परिवर्तन हुए हैं।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: आंतरिक सुरक्षा के लिये चुनौती उत्पन्न करने वाले शासन विरोधी तत्त्वों की भूमिका।

विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA)


(Unlawful Activities (Prevention) Act)

संदर्भ:

राष्‍ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्‍यूरो (National Crime Records Bureau- NCRB) द्वारा संकलित ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट, 2019 के अनुसार:

  • वर्ष 2016 और 2019 के मध्य, ‘विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम’ (Unlawful Activities (Prevention) Act- UAPA) के तहत दर्ज किए गए मामलों में से केवल 2% मामलों में ही अदालत में अपराध सिद्धि हो सकी।
  • देश में UAPA के तहत वर्ष 2016 से 2019 के मध्य गिरफ्तार किए जाने वाले और दोषी साबित होने वाले व्यक्तियों की कुल संख्या क्रमशः 5,922 और 132 है।
  • वर्ष 2019 में ‘देशद्रोह’ / Sedition (आईपीसी की धारा 194A) के तहत 96 लोगों को गिरफ्तार किया गया था लेकिन इनमे से मात्र दो व्यक्तियों को ही दोषी साबित किया जा सका और 29 लोगों को बरी कर दिया गया था।

विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम के बारे में:

  • 1967 में पारित, विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम [Unlawful Activities (Prevention) Act-UAPA] का उद्देश्य भारत में गैरकानूनी गतिविधि समूहों की प्रभावी रोकथाम करना है।
  • यह अधिनियम केंद्र सरकार को पूर्ण शक्ति प्रदान करता है, जिसके द्वारा केंद्र सरकार किसी गतिविधि को गैरकानूनी घोषित कर सकती है।
  • इसके अंतर्गत अधिकतम दंड के रूप में मृत्युदंड तथा आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है।

प्रमुख बिंदु:

  • UAPA के तहत, भारतीय और विदेशी दोनों नागरिकों को आरोपित किया जा सकता है।
  • यह अधिनियम भारतीय और विदेशी अपराधियों पर समान रूप से लागू होता है, भले ही अपराध भारत के बाहर विदेशी भूमि पर किया गया हो।
  • UAPA के तहत, जांच एजेंसी के लिए, गिरफ्तारी के बाद चार्जशीट दाखिल करने के लिए अधिकतम 180 दिनों का समय दिया जाता है, हालांकि, अदालत को सूचित करने के बाद इस अवधि को और आगे बढ़ाया जा सकता है।

वर्ष 2019 में किए गए संशोधनों के अनुसार:

  • यह अधिनियम राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के महानिदेशक को, एजेंसी द्वारा मामले की जांच के दौरान, आतंकवाद से होने वाली आय से निर्मित संपत्ति पाए जाने पर उसे ज़ब्त करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • यह अधिनियम राज्य में डीएसपी अथवा एसीपी या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के अतिरिक्त, आतंकवाद संबंधी मामलों की जांच करने हेतु ‘राष्ट्रीय जाँच एजेंसी’ के इंस्पेक्टर या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारियों को जांच का अधिकार प्रदान करता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विधिविरूद्ध क्रियाकलाप की परिभाषा।
  2. अधिनियम के तहत केंद्र की शक्तियां।
  3. क्या ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा लागू है?
  4. 2004 और 2019 में संशोधन द्वारा बदलाव लाया गया।
  5. क्या विदेशी नागरिकों को अधिनियम के तहत आरोपित किया जा सकता है?

मेंस लिंक:

क्या आप सहमत हैं कि विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) संशोधन अधिनियम मौलिक अधिकारों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए स्वतंत्रता का बलिदान करना न्यायसंगत है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


फर्नेस ऑइल / भट्ठी का तेल

(furnace oil)

  • ईंधन तेल (Fuel oil) के लिए फर्नेस ऑइल / भट्ठी का तेल (furnace oil) भी कहा जाता है। यह ईंधन, मुख्य रूप से कच्चे तेल के आसवन का अवशिष्ट होता है।
  • इसका उपयोग मुख्यतः विद्युत् संयंत्रों, जहाजों और औद्योगिक संयंत्रों के स्टीम बॉयलरों में किया जाता है।
  • वांछित श्यानता (viscosity) और स्फुरांक (flash point) हासिल करने हेतु, वाणिज्यिक ईंधन तेल में, आमतौर पर, अन्य पेट्रोलियम पदार्थों की अल्प मात्रा का मिश्रण किया जाता है।
  • ईंधन तेल का स्फुरांक, सामान्यतः केरोसिन की तुलना में अधिक होता है।
  • ईंधन तेल, की श्रेणी में आमतौर पर केरोसिन जैसे ईंधन शामिल नहीं किये जाते हैं।

आईएनएस विराट

  • आईएनएस विराट को मूल रूप से एच.एम.एस. हर्मस (HMS Hermes) के रूप में 18 नवंबर, 1959 को ब्रिटिश नौसेना में तैनात किया गया था।
  • इस विमान वाहक पोत द्वारा वर्ष 1982 में फ़ॉकलैंड द्वीप युद्ध में भाग लिया गया था।
  • भारत द्वारा इस ब्रिटिश विमान वाहक पोत को वर्ष 1986 में खरीदा गया तथा इसे आईएनएस विराट के रूप में भारतीय नौसेना में सम्मिलित किया गया।
  • आईएनएस विराट विश्व में सबसे अधिक समय तक सेवारत रहने वाला युद्धपोत है।

मेरी सहेली पहल

  • दक्षिण पूर्व रेलवे, ने ट्रेनों से यात्रा करने वाले महिला यात्रियों को स्टेशन से गंतव्य स्टेशन तक की पूरी यात्रा के लिए सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से “मेरी सहेली” पहल की शुरुआत शुरू की है।
  • महिला यात्रियों के बीच, सुरक्षा की भावना पैदा करने में इसकी सफलता को ध्यान में रखते हुए, यह पहल 10.2020 से पूरे भारतीय रेलवे के नेटवर्क के सभी जोनल रेलवे में लागू की जा रही है।

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