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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 10 February 2021

 

विषयसूची

 सामान्य अध्ययन-I

1. विशेष विवाह अधिनियम (SMA)

 

सामान्य अध्ययन-II

1. उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने संबंधी याचिका उच्चतम न्यायालय में ख़ारिज

2. लोकपाल समिति के कार्य-विवरण को सार्वजनिक करने की आवश्यकता नहीं

3. वेनेजुएला के नागरिकों को कोलंबिया में अस्थायी वैधानिक दर्जा

 

सामान्य अध्ययन-III

1. ओडीशा में ‘कृषि उत्पाद बाजार समिति’ पर अध्यादेश फिर से लागू

 

प्रारम्भिक परिक्षा हेतु तथ्य

1. बेंगलुरु में वैज्ञानिकों द्वारा ‘गेंदा’ की एक नई किस्म विकसित की गई

2. सेसा आर्किड अभयारण्य

3. सदियाभूकंप

4. शाहतूत बांध

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ, भारत की विविधता।

विशेष विवाह अधिनियम (SMA)


(Special Marriage Act)

संदर्भ:

वर्तमान में, विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act– SMA) के तहत विवाह पंजीकरण हेतु आवेदन करते समय जनता से आपत्तियों को दर्ज करने के लिए एक सूचना प्रकाशित करने का प्रावधान है। हाल ही में, इस प्रावधान को समाप्त करने की मांग करते हुए एक याचिका दायर की गयी थी, जिस पर केंद्र सरकार ने आपत्ति जताई है।

सरकार ने अपने कदम का यह कहते हुए बचाव किया है, कि इस प्रावधान के पीछे का उद्देश्य संबंधित विभिन्न पक्षों के हित की सुरक्षा करना है।

‘संबंधित विभिन्न पक्षों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा बनाए रखना’ है।

संबंधित प्रकरण:

याचिका में, विवाह पंजीकरण से पहले सार्वजनिक सूचना प्रकाशित करने का प्रावधान करने वाली  ‘विशेष विवाह अधिनियम’ (SMA) की धारा 6 और 7 को, अतर्कसंगत तथा मनमाना बताते हुए, रद्द करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता का तर्क है, कि 30-दिन की अवधि दंपति के परिजनों के लिए अंतरजातीय या अंतर-धर्म विवाह को हतोत्साहित करने का मौका प्रदान करती है।

‘विशेष विवाह अधिनियम’, 1954 क्या है?

‘विशेष विवाह अधिनियम’ एक ऐसा कानून है, जो बिना किसी धार्मिक रीति-रिवाजों या परम्पराओं के विवाह करने की अनुमति देता है।

  1. विभिन्न जातियों या धर्मों अथवा राज्यों के लोग विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह करते हैं, तथा इसमें पंजीकरण के माध्यम से विवाह किया जाता है।
  2. इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य अंतर-धार्मिक विवाह संपन्न करना तथा सभी धार्मिक औपचारिकताओं को अलग करते हुए विवाह को एक धर्मनिरपेक्ष संस्थान के रूप स्थापित करना है, जिसमे विवाह हेतु मात्र पंजीकरण की आवश्यकता होती है।

विशेष विवाह अधिनियम के तहत प्रक्रिया:

विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act- SMA) के अंतर्गत विवाह पंजीकृत करने के लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की गयी है।

  1. विवाह के लिए इच्छुक पक्षकारों में से एक व्यक्ति को जिले के विवाह-अधिकारी एक सूचना देनी होती है, और इसके लिए विवाह हेतु आवेदन करने वाले पक्षकार को, नोटिस दिए जाने की तिथि से, जिले में तीस दिनों से अधिक समय से निवास करना आवश्यक होता है।
  2. विवाह हेतु दी जाने वाली सूचना को, विवाह अधिकारी, विवाह-सूचना रजिस्टर में दर्ज करेगा तथा प्रत्येक ऐसी सूचना की एक प्रतिलिपि अपने कार्यालय के किसी सहजदृश्य स्थान पर लगवायेगा।
  3. विवाह अधिकारी द्वारा प्रकाशित, विवाह सूचना में पक्षकारों के नाम, जन्म तिथि, आयु, व्यवसाय, माता-पिता के नाम और विवरण, पता, पिन कोड, पहचान की जानकारी, फोन नंबर आदि सम्मिलित होते हैं।
  4. इसके पश्चात, अधिनियम के तहत प्रदान किए गए विभिन्न आधारों पर कोई भी विवाह पर आपत्ति उठा सकता है। यदि 30 दिनों की अवधि के भीतर कोई आपत्ति नहीं उठाई जाती है, तो विवाह संपन्न किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति विवाह पर आपत्ति करता है, तो विवाह अधिकारी, इसकी जांच करेगा, तदुपरांत वह विवाह के संबंध में निर्णय लेगा।

आलोचना:

  1. परिवार द्वारा बलप्रयोग रणनीति के प्रति असुरक्षित
  2. निजता का उल्लंघन
  3. धर्म-परिवर्तन का दबाव

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विशेष विवाह अधिनियम के उद्देश्य
  2. विशेष विवाह अधिनियम की धारा 5 और 6
  3. विवाह के पंजीकरण हेतु अधिनियम के तहत प्रमुख आवश्यकताएं
  4. विवाह अधिकारी द्वारा प्रकाशित विवरण
  5. संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का अवलोकन

मेंस लिंक:

विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के विवादास्पद प्रावधान कौन से हैं? इस कानून की समीक्षा की आवश्यकता क्यों है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण और उसकी चुनौतियाँ।

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने संबंधी याचिका उच्चतम न्यायालय में ख़ारिज


संदर्भ:

हाल ही में, उच्चतम न्यायालय द्वारा, उत्तर प्रदेश में, कथित रूप से संवैधानिक प्रशासन के भंग होने और राज्य में बढ़ते अपराधों के मद्देनजर राष्ट्रपति शासन लगाने हेतु एक जनहित याचिका खारिज कर दी गयी।

अदालत की टिप्पणी:

अदालत ने याचिकाकर्ता-अधिवक्ता को याचिका की प्रकृति को देखते हुए भारी जुर्माना लगाने की चेतावनी दी तथा याचिकाकर्ता से अन्य राज्यों के अपराध रिकॉर्ड का अध्ययन करने के संबंध में पूछताछ की।

पृष्ठभूमि:

  • याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था, कि उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा न्यायेतर हत्याओं (extrajudicial killings) सहित अवैध और मनमानी हत्याएं की जा रही हैं।
  • उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में इस प्रकार की स्थितियां उत्पन्न हो गई है, जिसमें संविधान के प्रावधानों के अनुसार उत्तर प्रदेश की सरकार को शासन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

राष्‍ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्‍यूरो (NCRB) की वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार:

उत्तर प्रदेश में, महिलाओं के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध दर्ज हुए हैं। वर्ष 2019 के दौरान, पूरे भारत में महिलाओं के खिलाफ 4,05,861 मामले दर्ज किए गए, जिनमे से उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की 59,853 घटनाएं दर्ज हुईं।

भारतीय संदर्भ में राष्ट्रपति शासन:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत, भारत के राष्ट्रपति को, यह समाधान होने पर कि, ‘राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है’, राज्य सरकार को निलंबित करने और देश के किसी भी राज्य के राष्ट्रपति शासन लगाने की शक्ति प्रदान की गयी है।

इसके लिए राज्य आपातकाल (State Emergency) या संवैधानिक आपातकाल (Constitutional Emergency) के रूप में भी जाना जाता है।

निहितार्थ:

  • राष्ट्रपति शासन लागू होने पर कोई मंत्रिपरिषद नहीं होती है। इस दौरान विधान सभा या तो स्थगित या भंग हो जाती है।
  • राज्य की सरकार केंद्र सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में आ जाती है और राज्यपाल भारत के राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करते हुए कार्यवाही जारी रखते हैं।

संसदीय स्वीकृति और अवधि:

  • राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए संसद के दोनों सदनों की मंजूरी की आवश्यकता होती है।
  • अनुमोदित होने के बाद किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन छह महीने की अवधि तक लागू रह सकता है।
  • राष्ट्रपति शासन को अधिकतम तीन साल तक के लिए लगाया जा सकता है और इसके लिए प्रति छह महीने के बाद संसद के दोनों सदनों से अनुमोदन लेना आवश्यक होता है।

राज्यपाल की रिपोर्ट:

अनुच्छेद 356 के तहत,  राष्ट्रपति को राज्यपाल से रिपोर्ट प्राप्त करने अथवा इस तथ्य से संतुष्ट होने पर कि,  राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है, कि राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार शासन नहीं चला पा रही है, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है।

निरसन (Revocation)

राष्ट्रपति शासन को राष्ट्रपति द्वारा एक घोषणा के बाद किसी भी समय निरसित किया जा सकता है। इस तरह की उद्घोषणा को संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राष्ट्रपति शासन क्या होता है?
  2. अनुच्छेद 356 किससे संबंधित है?
  3. राष्ट्रपति शासन कब और किस प्रकार लागू किया जाता है?
  4. राष्ट्रपति शासन का निरसन।
  5. भारतीय संविधान के तहत ‘शक्तियों का पृथक्करण सिद्धांत’

मैंस लिंक:

राष्ट्रपति शासन से संबंधित मुद्दों और इसकी सिफारिश करने में राज्य के राज्यपाल की भूमिका पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

लोकपाल समिति के कार्य-विवरण को सार्वजनिक करने की आवश्यकता नहीं


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार ने लोकपाल चयन समिति की बैठकों के कार्य-विवरण को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया। केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission– CIC) ने केंद्र सरकार के इस निर्णय को बरकरार रखा है।

केंद्र सरकार द्वारा अपने बचाव में आरटीआई अधिनियम की धारा 8 (1) (e) के अंतर्गत दिए गए छूट के प्रावधान को लागू किया गया है।

चयन समिति:

सदस्यों की नियुक्ति, एक चयन समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

चयन समिति की संरचना:

  • प्रधानमंत्री- अध्यक्ष
  • लोकसभा अध्यक्ष,
  • लोकसभा में विपक्ष के नेता,
  • भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा उनके द्वारा नामित न्यायाधीश
  • एक प्रख्यात न्यायविद्

लोकपाल अधिनियम (संशोधन) 2016 के माध्यम से, मान्यता प्राप्त नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति में लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को चयन समिति का सदस्य बनाने का प्रावधान किया गया।

लोकपाल अधिनियम, 2013 की प्रमुख विशेषताएं:

  1. अधिनियम के अंतर्गत, एक भ्रष्टाचार-रोधी ‘प्रशासनिक शिकायत जाँच अधिकारी’ (Ombudsman) का गठन करने का प्रावधान किया गया है, जिसे केंद्र स्तर पर ‘लोकपाल’ तथा राज्य स्तर पर ‘लोकायुक्त’ कहा जाएगा।
  2. लोकपाल एक बहु-सदस्यीय निकाय होगा, जिसमे एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य होंगे।
  3. लोकपाल का अधिकार क्षेत्र, प्रधानमंत्री सहित सभी श्रेणियों के लोक सेवक पर विस्तारित होता है। किंतु सशस्त्र बल, लोकपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर होते हैं।
  4. अधिनियम में, अभियोजन के लंबित होने पर भी, भ्रष्ट साधनों द्वारा अर्जित संपत्ति की कुर्की और जब्ती का प्रावधान किया गया है।
  5. अधिनियम लागू होने के एक वर्ष के भीतर, राज्यों के लिए लोकायुक्त का गठन करना होगा।
  6. अधिनियम में, सूचना प्रदाता (whistleblowers) के रूप में कार्य करने वाले लोक सेवकों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने संबंधी प्रावधान भी किए गए हैं।

शक्तियां:

  1. लोकपाल के लिए, ‘प्रशासनिक शिकायत जाँच अधिकारी’ द्वारा उसके लिए संदर्भित किये गए मामलों में, सीबीआई सहित किसी भी जांच एजेंसी के ऊपर अधीक्षण करने और उसे निर्देश जारी करने की शक्ति होगी।
  2. अधिनियम के अनुसार, लोकपाल, किसी भी लोक सेवक के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला होने पर, उसे पूछताछ के लिए बुला सकता है, भले ही उसके खिलाफ किसी जांच एजेंसी (जैसे सतर्कता आयोग या सीबीआई) द्वारा अभी जांच शुरू नहीं की गयी हो।
  3. यदि लोकपाल ने कोई मामला सीबीआई को सौंपा है, तो बिना लोकपाल की अनुमति के ऐसे मामले के जाँच अधिकारी को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
  4. जांच-कार्यवाही, छह महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए। हालांकि, लोकपाल या लोकायुक्त, जांच की अवधि, एक बार में छह महीने तक बढ़ा दे सकते हैं, बशर्ते इसके लिए लिखित में उचित कारण दिया गया हो।
  5. लोकपाल द्वारा संदर्भित मामलों पर सुनवाई करने के लिए विशेष अदालतों का गठन किया जाएगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. लोकपाल के बारे में
  2. शक्तियाँ
  3. कार्य
  4. चयन
  5. लोकपाल अधिनियम, 2013 का अवलोकन

मेंस लिंक:

लोकपाल अधिनियम में किए गए परिवर्तनों और इसके कार्यान्वयन के होने वाली देरी पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

वेनेजुएला के नागरिकों को कोलंबिया में अस्थायी वैधानिक दर्जा


संदर्भ:

हाल ही में, कोलंबियाई राष्ट्रपति इवान डुके ने घोषणा की है, कि वेनेजुएला के नागरिकों को अगले दस वर्षों के लिए ‘अस्थायी संरक्षित दर्जा (temporary protected status) प्रदान किया जाएगा। कोलंबियाई राष्ट्रपति के इस निर्णय को “ऐतिहासिक” कहा जा रहा है।

  • यह ‘अस्थायी सुरक्षा क़ानून’ (temporary protection statute), वेनेजुएला में तानाशाही के कारण पलायन करने वाले प्रवासियों के लिए बनाया गया है।
  • यह फैसला, पिछले कुछ वर्षों के दौरान कोलंबिया में पलायन करने वाले 7 मिलियन से अधिक वेनेजुएला-नागरिकों पर लागू होगा।

वेनेजुएला-नागरिकों के अपने देश से पलायन करने संबंधी कारण:

  • वेनेजुएला, दो प्रतिद्वंद्वी राजनेताओं द्वारा देश के वैधानिक नेता होने का दावा किये जाने से एक राजनीतिक संकट में घिरा हुआ है।
  • वर्तमान में, वेनेजुएला में ‘सत्तावादी’ राष्ट्रपति निकोलस माडुरो का शासन है। राष्ट्रपति माडुरो, यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी ऑफ वेनेजुएला से संबंधित है।
  • पहले कार्यकाल की समाप्ति के बाद, जनवरी 2019 में राष्ट्रपति माडुरो ने अपना दूसरा कार्यकाल शुरू कर दिया। इसके लिए वेनेजुएला के अधिकाँश नागरिकों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा अवैध माना जा रहा है।
  • वेनेजुएला, आर्थिक संकट से घिरा हुआ है, और यह वर्ष 2014 से ही मंदी के दौर से गुजर रहा है।
  • आर्थिक पतन के बाद से देश में अपराध दर दोगुनी हो गई है और मुद्रास्फीति कई गुना हो गई है। यह हालत, पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से और बदतर हो गई।

अमेरिकी भूमिका:

माडुरो ने, देश में वर्तमान हालात के लिए, वेनेजुएला सरकार और सरकारी तेल कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों को जिम्मेदार ठहराया है, जिस कारण देश में बेलगाम मुद्रास्फीति (hyperinflation), भोजन और दवा की कमी, बिजली ब्लैकआउट आदि की स्थिति व्याप्त है। माडुरो ने अमेरिका पर, अप्रत्यक्ष रूप से, देश पर शासन करने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया है।

पृष्ठभूमि:

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक, अप्रैल 2019 में देश की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबी में जीवन-यापन कर रही थी, और फरवरी 2020 तक लगभग 4.8 मिलियन वेनेजुएला-वासी लैटिन अमेरिका के अन्य देशों और कैरेबियाई देशों के लिए पलायन कर चुके हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. वेनेजुएला की अवस्थिति
  2. वर्तमान संकट के कारण

मेंस लिंक:

वेनेजुएला के वर्तमान संकट संबंधी कारणों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न- सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली- कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन, संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिये ई-प्रौद्योगिकी।

ओडीशा में ‘कृषि उत्पाद बाजार समिति’ पर अध्यादेश फिर से लागू


संदर्भ:

हाल ही में, ओडिशा में राज्य मंत्रिमंडल ने तीसरी बार ‘कृषि उपज और पशुधन विपणन (संवर्धन और सुविधा)’ [Agricultural Produce and Livestock Marketing (Promotion and Facilitation)] को फिर से लागू करने के लिए मंजूरी दी है।

ओडिशा सरकार, अध्यादेश के माध्यम से किसानों की उपज के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के उद्देश्य से, निजी बाजार यार्ड और किसान उपभोक्ता बाजार यार्ड की स्थापना और संचालन के लिए एक वातावरण बना रही है।

अध्यादेश का अवलोकन:

  • ओडिशा सरकार ने, यह क़ानून, केंद्रीय कृषि मंत्रालय और किसान कल्याण मंत्रालय के ‘कृषि उपज और पशु धन विपणन (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम’, 2017 की तर्ज पर तैयार किया गया है।
  • इस अध्यादेश में, जहां तक ​​कृषि उपज और पशुधन बाजार समिति द्वारा विनियमन के प्रवर्तन के संदर्भ में, अधिसूचित बाजार क्षेत्र की अवधारणा को हटाकर राज्य के भीतर बाजार के विखंडन को समाप्त करने का प्रस्ताव किया गया है।
  • सरकार का लक्ष्य, किसानों को बेहतर बाजार पहुंच अथवा संपर्क प्रदान करने हेतु वेयरहाउस / कोष्‍ठागारों (silos) / कोल्ड स्टोरेज और अन्य संरचनाओं अथवा बाजार को सब-यार्ड (sub-yard) घोषित करना है।

मॉडल अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं:

  • राज्य सरकार, पूरे राज्य को एकल एकीकृत बाजार क्षेत्र के रूप में घोषित कर सकती है।
  • इन क्षेत्रों में, कृषि उपज और पशुधन के व्यापार हेतु एक एकल लाइसेंस सुविधा लागू की जाएगी।
  • बाजार समिति: बाजार समिति (मार्केट कमेटी) एक निर्दिष्ट क्षेत्र में बाजार आहाता (मार्केट यार्ड) का प्रबंधन करेगी।
  • व्यापारियों और कमीशन एजेंटों की सुविधा के लिए निजी व्यक्तियों द्वारा ‘निजी बाजार आहाता’ स्थापित किए जा सकते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कृषि उत्पाद बाजार समिति (APMC) क्या हैं?
  2. ओडिशा के हालिया APMC अध्यादेश का अवलोकन
  3. मॉडल अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं

मेंस लिंक:

‘कृषि उपज और पशुधन विपणन (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम’, 2017, एक मॉडल कानून के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


बेंगलुरु में वैज्ञानिकों द्वारा ‘गेंदा’ की एक नई किस्म विकसित की गई

  • हेसरघट्टा स्थित भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) द्वारा विकसित की गई गेंदे की इस नई प्रजाति को ‘अर्का शुभा’ (Arka Shubha) नाम दिया गया है।
  • गेंदे की इस किस्म में कैरोटीन की मात्रा 8% होती है, जोकि किसी पादप स्रोत में पाई जाने वाली सर्वाधिक मात्रा है।
  • इस प्रजाति के गेंदे पूरी तरह से खराब हो जाने के बाद भी मौद्रिक रूप से लाभप्रद होंगे, क्योंकि इसका उपयोग कच्चे कैरोटीन के निष्कर्षण के लिए किया जा सकता है। कैरोटीन का उपयोग मुख्य रूप से दवा क्षेत्र में किया जाता है।

कैरोटीन (Carotenes) प्रकाश संश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण प्रकाश संश्लेषक वर्णक होते हैं। कैरोटीन में ऑक्सीजन अणु नहीं पाए जाते हैं। ये पराबैंगनी, बैंगनी और नीले प्रकाश को अवशोषित करते हैं और नारंगी या लाल प्रकाश तथा (कम सांद्रता में) पीले प्रकाश का प्रकीर्णन करते हैं।

marigold

सेसा आर्किड अभयारण्य

(Sessa Orchid Sanctuary)

  • यह अभयारण्य, अरुणाचल प्रदेश में स्थित है।
  • नवंबर 1989 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत अधिसूचित किया गया।
  • यह अभयारण्य, ऑर्किड की 236 से अधिक प्रजातियों के साथ-साथ मशरूम और अन्य औषधीय पौधों का प्राकृतिक वास क्षेत्र है।
  • यह देश में अपनी तरह का एकमात्र अभयारण्य है, जहाँ ये फूल पौधे प्राकृतिक रूप से उगते हैं।

सदिया भूकंप

(Sadiya earthquake)

  • वैज्ञानिकों को असम और अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर स्थित हिमबस्ती गाँव में भूकंप का पहला भूगर्भीय साक्ष्य मिला है। इतिहासकारों ने इसे इस क्षेत्र में बड़े विनाश का कारण बने सदिया भूकंप के रुप में दर्ज किया है।
  • ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 1667 ईस्वी में आए इस भूकंप ने सदिया शहर को पूरी तरह से तहस नहस कर दिया था।
  • यह खोज पूर्वी हिमालय क्षेत्र में भूंकप की संभावना वाले क्षेत्रों की पहचान करने और उसके अनुरुप यहां निर्माण गतिविधियों की योजना बनाने में मददगार हो सकती है।

शाहतूत बांध

(Shahtoot dam)

संदर्भ:

अफगानिस्तान में लालंदर (शाहतूत) बांध के निर्माण के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर।

प्रमुख बिंदु:

  • यह परियोजना भारत और अफगानिस्तान के बीच नई विकास साझेदारी का एक हिस्सा है।
  • लालंदर (शाहतूत- Shahtoot) बांध काबुल शहर की सुरक्षित पेयजल संबंधी जरूरतों को पूरा करेगा ।
  • इस बांध का निर्माण काबुल नदी की सहायक, मैदान नदी (Maidan river) पर किया जाएगा।
  • यह भारत द्वारा अफगानिस्तान में बनाया जा रहा दूसरा बड़ा बांध है। इससे पहले, भारत-अफगानिस्तान मैत्री बांध (सलमा बांध) का उद्घाटन जून 2016 में किया गया था।

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