Print Friendly, PDF & Email

INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 28 December

 

विषय – सूची

 सामान्य अध्ययन-I

1. पानीपत की लड़ाई, 1761

 

सामान्य अध्ययन-II

1. मौसम विभाग द्वारा उत्तर भारत में लोगों से शीत लहर के दौरान शराब से बचने की सलाह

2. न्यूमोकोकल पॉलीसैकराइड कंजुगेट वैक्सीन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. तेलंगाना सरकार द्वारा ‘विनियमित कृषि’ की समाप्ति

2. 50 लाख से अधिक का मासिक कारोबार करने वाले व्यवसायों के लिए जीएसटी देयता का न्यूनतम एक प्रतिशत नकद भुगतान अनिवार्य

3. ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर

4. इनर-लाइन परमिट

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. LAC हॉटस्पॉट्स के नामों पर घाटी में प्रचलित ब्रांड्स

2. पोर्टुलाका लालजी

3. सही फसल अभियान

4. मोनपा हस्तनिर्मित कागज

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय।

पानीपत की लड़ाई, 1761


संदर्भ:

कला के इतिहास पर एक अमेरिकी शोधकर्ता मनोज दानी ने पानीपत की लड़ाई और इसके मुख्य व्यक्तित्वों से संबंधित दुर्लभ चित्रों को, ‘पानीपत की लड़ाई: पुनः खोजे गए चित्रों के आलोक में’ (Battle of Panipat: In Light of Rediscovered Paintings) शीर्षक से एक पुस्तक के रूप में संकलित किया है।

इस पुस्तक में बिब्लियोथेक नेसनाले डी फ्रांस (Bibliothèque nationale de France- BnF), ब्रिटिश लाइब्रेरी, दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय, ब्रिटेन. के बोनहम्स (Bonhams) और पुणे स्थित ‘भारत इतिहस संसोधक मंडल’ (BISM) की दुर्लभ पेंटिंग सम्मिलित की गयी हैं।

पुस्तक में युद्ध के बारे में विवरण

पानीपत के आस-पास कई मिथक प्रचलित है। पुस्तक में इस निर्णायक घटना से संबंधित एक सुस्थापित विवरण से काफी अलग, इतिहास के इस दौर को खरोंचा गया है और जो कुछ भी प्राप्त हुआ है, वह थोड़े से अथवा कुछ चुने हुए स्रोतों से लिया गया है। हालांकि इन स्रोतों की प्रामणिकता भी संदिग्ध है।

  • इन चित्रों में प्रमुख व्यक्तित्वों, जैसे अहमद शाह अब्दाली, सदाशिवराव भाऊ, नजीब खान रोहिला, दत्ताजी शिंदे, विश्वास राव, सूरज मल जाट और अन्य मराठा, अफगान, रोहिल्ला और जाट सरदार को चित्रित किया गया है।
  • इस पुस्तक को मूल अभिलेखीय स्रोतों से प्राप्त विवरणों के आधार पर अठाहरवीं सदी की भारतीय राजनीति में बदलते संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कुशलतापूर्वक तैयार किया गया है

पृष्ठभूमि:

1761 की लड़ाई के अलावा पानीपत के मैदान पर दो अन्य प्रमुख युद्ध लादे गए:

  1. पानीपत का पहला युद्ध, 1526: इस लड़ाई में तत्कालीन पहले मुग़ल शासक बाबर ने लोधी वंश के शासकों को परास्त कर दिल्ली सल्तनत का अंत किया और भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी।
  2. पानीपत का दूसरा युद्ध, 1556: इस युद्ध में मुग़ल बादशाह अकबर ने राजा हेमू ‘विक्रमादित्य’ को पराजित कर मुग़ल साम्राज्य को सुदृढ़ किया।

पानीपत की तीसरी लड़ाई, 1761:

  1. पानीपत का तीसरा युद्ध वर्ष 1761 में दुर्रानी साम्राज्य के अफगान सरदार अहमद शाह अब्दाली की हमलावर सेनाओं और मराठा सेनाओं के बीच लड़ा गया।
  2. इस लड़ाई में अब्दाली को दो भारतीय सहयोगियों- दोआब क्षेत्र के अफगान रोहिला सरदार नजीब-उद-दौला तथा अवध के नवाब शुजा-उद-दौला ने मदद की।

पानीपत के तीसरे युद्ध की शुरुआत

  • मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के बाद मराठों का अचानक उदय हुआ। मराठों ने दक्कन में मुगलों द्वारा शासित सभी क्षेत्रों को वापस अपने अधिकार में लिया और भारत के एक बड़े हिस्से को जीत लिया।
  • 1739 में नादिर शाह के भारत पर आक्रमण से मुगलों के प्रभुत्व में तेजी से कमी आयी। नादिर शाह ने मुगलों से ‘तख़्त-ए-ताउस’ (मयूर सिंहासन) और कोहिनूर हीरा भी छीन लिया।
  • अब्दाली के बेटे को लाहौर से बाहर कर दिया गया था, इसके बाद उसने मराठों पर हमला करने की योजना बनाई।
  • 1759 के अंत तक, अब्दाली अपने अफगान कबीलाई सरदारों के साथ लाहौर और इसके बाद दिल्ली तक पहुँच गया और मार्ग में उसने देशी शासकों के छोटे-छोटे गढ़ों को हरा दिया।
  • करनाल और कुंजपुरा में दोनों सेनाओं का आमना-सामना हुआ जिसमे पूरे अफगान लश्कर को लगभग समाप्त कर दिया गया या गुलाम बना लिया गया था।
  • कुंजपुरा गढ़ में हुए नरसंहार से दुर्रानी शासक क्रोधित हो उठा और उसने मराठों पर हमला करने के लिए किसी भी कीमत पर नदी पार करने का आदेश दे दिया।
  • छोटी-छोटी लड़ाई महीनों तक चलती रही और अंतिम हमले तक दोनों ओर से सेनाएँ जुटी रहीं। लेकिन मराठों की रसद सामग्री समाप्त हो चली थी।

परिणाम:

  1. इस युद्ध के अंत में मराठों की पराजय हुई। लड़ाई में लगभग 40,000 मराठा सैनिक मारे गए, जबकि अब्दाली के लगभग 20,000 सैनिक हताहत होने का अनुमान लगाया जाता है।
  2. इस युद्ध से मराठों की साख को महत्वपूर्ण क्षति पहुँची, इस लड़ाई के बाद से उत्तर भारत में मराठों का पहले जैसा प्रभुत्व समाप्त हो गया, जिससे ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकतों के लिए इस क्षेत्र में विस्तार करने का मार्ग प्रशस्त हो गया।
  3. इस युद्ध में मराठों के कुछ सबसे महत्वपूर्ण सेनानायक और प्रशासक वीरगति को प्राप्त हो गए, जिनमें सदाशिवराव और पेशवा घराने के उत्तराधिकारी- विश्वासराव, इब्राहिम खान गर्दी, जानकोजी राव सिंधिया और यशवंतराव पुआर सम्मिलित थे।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पानीपत की तीसरी लड़ाई के बारे में
  2. पानीपत की तीसरी लड़ाई में प्रमुख व्यक्तित्व
  3. कारण
  4. परिणाम
  5. शुजा-उद-दौला कौन था?
  6. पानीपत की पहली और दूसरी लड़ाई के बारे में।

मेंस लिंक:

पानीपत की तीसरी लड़ाई के कारणों और परिणामों पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

मौसम विभाग द्वारा उत्तर भारत में लोगों से शीत लहर के दौरान शराब से बचने की सलाह


संदर्भ:

हाल ही में, शीत लहर (Cold Wave) के प्रतिकूल प्रभावों से बचने के लिए, भारतीय मौसम विभाग (IMD) द्वारा सिफारिशों की एक सूची जारी की गयी है, जिसमे शराब के सेवन से बचने के लिए भी कहा गया है।

पृष्ठभूमि:

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, 29 दिसंबर से हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के कुछ हिस्सों में शीत लहर की स्थिति गंभीर होने संभावना है। 28 दिसंबर के बाद अधिकतम तापमान में 3-5 डिग्री सेल्सियस की गिरावट होने का अनुमान भी व्यक्त किया गया है।

ठंड के मौसम में शराब पीने के खतरे

ठंड के दौरान अल्कोहल शरीर के आंतरिक तापमान (core temperature) को कम कर सकता है, जिससे अल्पताप / हाइपोथर्मिया (Hypothermia) का खतरा बढ़ जाता है। 2004 में किये गए एक पूर्वव्यापी अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि आकस्मिक अल्पताप / हाइपोथर्मिया के 68 प्रतिशत मामले शराब का सेवन से संबंधित थे।

यह किस प्रकार कार्य करता है?

  • अल्कोहल एक वैसोडिलेटर (Vasodilator) होता है, अर्थात, यह रक्त वाहिकाओं को शिथिल या लम्बाई में फैला देता है।
  • इसलिए शराब का सेवन करने के बाद त्वचा की सतह पर रक्त की मात्रा बढ़ जाती है, जिस कारण शरीर में गर्मी महसूस होती है।
  • इसी वजह से नशे में कोई व्यक्ति उत्तेजित या लाल दिखता है।
  • जैसा ही शरीर को गर्मी का अहसास होने लगता है, वह पसीना छोड़ना शुरू कर देता है- इस प्रतिक्रिया से शरीर का समग्र तापमान स्वतः ही कम हो जाता है।
  • शराब को प्रचुर मात्रा में पीने से शरीर में ठंड को ठीक तरह से जानने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। शरीर की यह क्षमता, व्यक्ति को शीतदंश / अधिक ठंड से सुन्न होने (frostbite) और हाइपोथर्मिया से बचाती है।

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि मध्यम वातावरण में सामान्य रूप से पीने पर शरीर के आंतरिक तापमान पर महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता है।

हाइपोथर्मिया’ क्या है?

  • अल्पताप / हाइपोथर्मिया (Hypothermia) एक गंभीर चिकत्सीय स्थिति होती है जिसमे, शरीर में उष्मा उत्पन्न होने से पहले ही नष्ट हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर का तापमान खतरनाक स्थिति तक कम हो जाता है।
  • शरीर का सामान्य तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है, हाइपोथर्मिया से पीड़ित होने पर व्यक्ति का शरीर का तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है।
  • इसके सामान्य संकेतों में कंपकंपी होना, सांस लेने की धीमी गति, अस्पष्ट उच्चारण, ठंडी त्वचा और थकान आदि शामिल होते हैं।

शराब के मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक प्रभाव भी होते हैं, जिससे व्यक्ति की ठंड के वास्तविक स्तर को समझने की क्षमता को प्रभावित हो सकती है।

‘शीत लहर’ क्या है?

  • शीत लहर (Cold Wave) की स्थिति में न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस या उससे कम हो जाता है तथा सामान्य तापमान में 4.5 डिग्री सेल्सियस या इससे कम की गिरावट हो जाती है।
  • शीत लहर की गंभीर स्थिति में, सामान्य तापमान से 6.5 डिग्री या उससे कम की गिरावट होती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘शीत लहर’ क्या है?
  2. गंभीर शीत लहरें
  3. वर्गीकरण
  4. भारतीय मौसम विभाग (IMD) के बारे में
  5. वासोडिलेटर क्या है?
  6. हाइपोथर्मिया क्या है?

मेंस लिंक:

मौसम विभाग द्वारा उत्तर भारत में लोगों से शीत लहर के दौरान शराब पीने से बचने के लिए क्यों कहा जा रहा है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

न्यूमोकोकल पॉलीसैकराइड कंजुगेट वैक्सीन


(Pneumococcal Polysaccharide Conjugate vaccine)

संदर्भ:

शीघ्र ही निमोनिया के खिलाफ सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (Serum Institute of India SII) द्वारा विकसित पहला स्वदेशी टीका लॉन्च किया जाएगा।

जुलाई माह में, भारतीय औषधि महानियंत्रक (DCGI) द्वारा स्‍वदेशी तरीके से विकसित विकसित न्यूमोकोकल पॉलीसैकराइड कंजुगेट टीके को बाजार में बेचने की मंजूरी दी गयी थी।

निमोनिया किस प्रकार फैलता है?

निमोनिया, बैक्टीरिया, वायरस तथा कवक आदि संक्रामक एजेंटों के माध्यम से फैलता है।

  • बच्चों में बैक्टीरिया-जनित निमोनिया का सबसे आम कारण स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिया (Streptococcus Pneumoniae) होता है, तथा हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी (Haemophilus influenzae type b- Hib) बैक्टीरिया-जनित निमोनिया का दूसरा सामान्य कारण है। रेस्पिरेटरी सिंक्राइटियल वायरस (Respiratory syncytial virus) निमोनिया का सबसे आम वायरल कारण है।
  • संक्रमित व्यक्ति के फेफड़े (वायु-कोश) में द्रव्य तथा मवाद के जमा होने के कारण अवरुद्ध हो जाते है, जिससे व्यक्ति को सांस लेना कठिन हो जाता है।

न्यूमोकोकल पॉलीसैकराइड वैक्सीन (PPSV23) के बारे में:

  • यह निमोनिया के संक्रमणों से बचाता है।
  • न्यूमोकोकल पॉलीसैकराइड वैक्सीन (PPSV23) 23 प्रकार के न्यूमोकोकल बैक्टीरिया से सुरक्षा प्रदान करता है।

उपयोगी शब्दावली:

  • कंजुगेट (Conjugate): इस प्रकार के वैक्सीन, प्रोटीन को एंटीजन से जोड़ते है जिससे वैक्सीन द्वारा प्रद्दत सुरक्षा में सुधार होता है।
  • पॉलीसेकेराइड (Polysaccharide): एक प्रकार के टीके में, कुछ प्रकार के जीवाणुओं की सतह से मिलती-जुलती शर्करा अणुओं की लंबी श्रंखलाएं होती है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा प्रतिक्रिया करने में सहायक होती हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. निमोनिया- प्रकार, कारण और लक्षण
  2. एंटीजन बनाम एंटीबाडी।
  3. टीका कैसे काम करता है?
  4. टीकों के प्रकार।
  5. DGCI के बारे में।
  6. भारत में वैक्सीन की मंजूरी के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न- सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली- कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन, संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिये ई-प्रौद्योगिकी।

तेलंगाना सरकार द्वारा ‘विनियमित कृषि’ की समाप्ति


संदर्भ:

तेलंगाना सरकार द्वारा पिछले कृषि मौसम में मक्का उत्पादन को कम करने और बाजार में मांग संबंधी कारणों से धान, दलहन और तिलहन की अच्छी किस्म को बढ़ावा देने के लिए लागू की गयी ‘विनियमित कृषि’ (Regulated Farming) को वापस ले लिया गया है।

सरकार ने अपने किसानों से उनके गाँव में उपज की खरीद नहीं करने का भी निर्णय लिया है। अब, किसान अपनी उपज को अच्छी कीमत प्राप्त करने के लिए कही भी बेच सकते हैं।

इस निर्णय के पीछे तर्क:

किसानों की उपज की खरीद या बिक्री करना सरकार के लिए संभव नहीं है क्योंकि सरकार कोई व्यापारिक संगठन अथवा व्यापारी नहीं है।

तेलंगाना की विनियमित कृषि नीति के बारे में:

तेलंगाना सरकार की ‘विनियमित कृषि’ (Regulated Farming) नीति का उद्देश्य बाजार की मांगों के आधार पर कृषि को वैज्ञानिक खेती के माध्यम से अधिक लाभदायक उद्यम बनाना था।

  • नीति के तहत, सरकार द्वारा किसानों के लिए, किस फसल को किस क्षेत्र में और किस सीमा तक उगाने के संबंध में मार्गदर्शन किया जाएगा।
  • इसके अंतर्गत, राज्य सरकार के निर्देशों का पालन करने वाले किसानों के लिए सरकार द्वारा रायथु बंधु (Rythu Bandhu) योजना के लाभ तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी प्रदान किये जाएंगे।

‘रायथु बंधु’ क्या है?

रायथु बंधु (Rythu Bandhu) योजना की शुरुआत तेलंगाना सरकार द्वारा की गयी है, यह किसानों के लिए निवेश सहायता योजना (Farmer’s Investment Support Scheme- FISS) है। यह किसानों को एक वर्ष में दो फसलों के उत्पादन हेतु निवेश करने के लिए सहायता प्रदान करने का कल्याणकारी कार्यक्रम है।

  • यह योजना का उद्देश्य राज्य के किसानों को उनके दिन-प्रतिदिन के कार्यों के लिए प्रोत्साहन देना है।
  • इस योजना के तहत, तेलंगाना राज्य के लगभग 33 लाख किसानों को साल में दो बार (फसल की बुवाई) प्रति एकड़ 4000 रुपये प्रदान किए जाते हैं।
  • इसके अंतर्गत, रबी और खरीफ, दोनों फसलों के लिए कृषि निवेश के रूप में कुल 8,000 रुपये की सहायता की जाती है।
  • इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण ऋणग्रस्तता के दुष्चक्र को तोड़ना है।

रायथु बंधु योजना के तहत लाभार्थी

  1. योजना के तहत आवेदन करने और लाभ प्राप्त करने के लिए, किसान को तेलंगाना राज्य का निवासी होना चाहिए और उसके पास खेती के लिए अपनी जमीन होनी चाहिए।
  2. यह योजना छोटे और सीमांत किसानों के लिए लागू की गयी है; और, वाणिज्यिक किसानों को योजना से बाहर रखा गया है।
  3. इसके अलावा, किराए की जमीन पर खेती करने वाले किसानों को भी इस योजना से बाहर रखा गया है।

वर्तमान में, तेलंगाना में 8 लाख से अधिक किसान रायथु बंधु योजना का लाभ उठा रहे हैं।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

50 लाख से अधिक का मासिक कारोबार करने वाले व्यवसायों के लिए जीएसटी देयता का न्यूनतम एक प्रतिशत नकद भुगतान अनिवार्य


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (Central Board of Indirect Taxes and CustomsCBIC)  द्वारा वस्तु और सेवा कर (GST) नियमों में एक नया नियम 86B को लागू किया गया है, इसमें GST देयता के भुगतान हेतु इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के उपयोग को 99 प्रतिशत तक सीमित किया गया है।

नए नियम के अनुसार, 50 लाख से अधिक का मासिक कारोबार करने वाले व्यवसायों के लिए जीएसटी देनदारी का न्यूनतम एक प्रतिशत नकद भुगतान करना अनिवार्य होगा।

नए नियम के तहत अपवाद:

जिन संस्थानों में प्रबंध निदेशक या किसी अन्य साथी के द्वारा आयकर के रूप में एक लाख रूपये से अधिक का भुगतान किया गया है अथवा पंजीकृत व्यक्ति को पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष में अप्रयुक्त इनपुट टैक्स क्रेडिट के कारण एक लाख रूपये से अधिक की रिफंड राशि प्राप्त हुई है, उनके लिए यह प्रतिबंध लागू नहीं होंगे।

इन नियम की आवश्यकता

इस नियम को व्यवसायों द्वारा नकली चालान जारी करके इनपुट टैक्स क्रेडिट का दुरुपयोग रोकने हेतु लागू किया गया है।

संबंधित मुद्दे:

ऐसी आशंकाएं हैं कि अनिवार्य नकद भुगतान से छोटे व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इससे उनकी कार्यशील पूंजी आवश्यकता में वृद्धि होगी और जीएसटी को एक अधिक जटिल अप्रत्यक्ष कर प्रणाली बन जाएगी।

इनपुट टैक्स क्रेडिट’ (ITC) क्या है?

  • यह एक व्यवसाय द्वारा किसी खरीद पर भुगतान किया जाने वाला कर होता है और बिक्री करने के दौरान इसका उपयोग कर देयता को कम करने के लिए किया जा सकता है।
  • सरल शब्दों में, इनपुट क्रेडिट का मतलब आउटपुट पर टैक्स देते समय इनपुट पर चुकाए गए टैक्स को घटाकर शेष राशि का भुगतान करना है।

अपवाद: कंपोजिशन स्कीम के तहत कोई व्यवसाय इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ नहीं उठा सकता है। ‘इनपुट टैक्स क्रेडिट’ (ITC) का उपयोग व्यक्तिगत उपयोग के लिए अथवा छूट वाले सामानों के लिए  नहीं किया जा सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जीएसटी क्या है?
  2. कंपोजीशन स्कीम क्या है?
  3. इनपुट टैक्स क्रेडिट क्या है?

मेंस लिंक:

इनपुट टैक्स क्रेडिट के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर


(Eastern Dedicated Freight Corridor)

संदर्भ:

शीघ्र ही, प्रधानमंत्री द्वारा न्‍यू भाऊपुर – न्‍यू खुर्जा सेक्‍शन और ईस्‍टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर/ माल ढुलाई हेतु समर्पित गलियारा (Eastern Dedicated Freight Corridor) के परिचालन नियंत्रण केन्‍द्र का उद्घाटन किया जाएगा।

ईस्‍टर्न कॉरीडोर / पूर्वी गलियारे के बारे में:

  • लंबाई: 1856 किमी।
  • यह दो पृथक खंडों से मिलकर बना है: एक विद्युतीकृत डबल-ट्रैक खंड और एक विद्युतीकृत एकल-ट्रैक खंड।
  • विस्तार: इस कॉरिडोर लुधियाना (पंजाब) के पास साहनेवाल से शुरू होकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड राज्यों से होकर गुजरेगा और पश्चिम बंगाल के दनकुनी में समाप्त होगा।
  • इसका निर्माण डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (DFCCIL) द्वारा किया जा रहा है, जिसे डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के निर्माण और संचालन के लिए एक विशेष प्रयोजन वाहन के रूप में स्थापित किया गया है।

महत्व:

पूर्वी गलियारा, पूर्वी कोयला क्षेत्रों से उत्तरप्रदेश के उत्तरी क्षेत्रों, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कुछ भागों में स्थित बिजली संयंत्रों के लिए कोयला-यातायात को सुगम बनाएगा तथा पूर्व में स्थित इस्पात संयत्रों को राजस्थान से चूना पत्थर तथा खाद्यान्न, सीमेंट, उर्वरक आदि वस्तुओं का परिवहन करेगा।

डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर (DFCs) की आवश्यकता

  1. बढ़ा हुआ बोझ: इन गलियारों की कुल लम्बाई 10,122 किलोमीटर है और इन पर सर्वाधिक यातायात होता है इसके अलावा ये अत्यधिक भीड़भाड़ युक्त होते हैं। 2017 की मेक-इन-इंडिया रिपोर्ट के अनुसार, इन मार्गों पर 52% यात्री परिवहन और 58% माल परिवहन होता है। इसके अलावा, इन मार्गों पर क्षमता से अधिक यातायात होता है, और इन लाइनों की क्षमता का उपयोग 150% तक पहुंच जाता है।
  2. मांग में वृद्धि: सड़क परिवहन से जुड़े परिवहन मार्गों, अत्यधिक भीड़ वाले मार्गों और ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को ध्यान में रखते हुए, ये माल ढुलाई गलियारे लागत को कम करने और तीव्र-परिवहन को सुगम बनाने में सहायक होंगे।
  3. राजस्व सृजन: ये गलियारे निवेश के लिए नए रास्ते खोलेंगे, क्योंकि इन मार्गों पर औद्योगिक गलियारों और लॉजिस्टिक पार्कों का भी निर्माण होगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर (DFC) के बारे में
  2. पूर्वी और पश्चिमी लिंक: लंबाई, विस्तार और कवर किए गए राज्य
  3. DFCCIL के बारे में

मेंस लिंक:

डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर (DFC) की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ एवं उनका प्रबंधन- संगठित अपराध और आतंकवाद के बीच संबंध।

इनर-लाइन परमिट


(InnerLine Permit)

संदर्भ:

मेघालय की सिविल सोसाइटी समूहों द्वारा ब्रिटिश-कालीन इनर-लाइन परमिट (Inner Line Permit- ILP) को लागू करने की मांग फिर से तेज की गयी है।

मेघालय में इनर-लाइन परमिट की मांग का कारण

मेघालय में इनर-लाइन परमिट की मांग का प्रमुख कारण, पूर्वोत्तर की स्थानीय आबादी के बीच ‘अवैध आप्रवासियों के प्रवाह’, इसका प्रभाव और दीर्घकालिक नुकसान का डर है। पूर्वोत्तर भारत की सीमाएं चीन, म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान जैसे देशों के साथ लगी हुई हैं।

इनर लाइन परमिट (ILP) क्या है?

इनर लाइन परमिट, गैर-मूल निवासियों के लिए ILP प्रणाली के अंतर्गत संरक्षित राज्य में प्रवेश करने अथवा ठहरने हेतु आवश्यक दस्तावेज होता है।

वर्तमान में, पूर्वोत्तर के चार राज्यों, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड में ILP प्रणाली  लागू है।

  • इनर लाइन परमिट के द्वारा, किसी गैर-मूल निवासी के लिए, राज्य में ठहरने की अवधि तथा भ्रमण करने के क्षेत्र को निर्धारित किया जाता है।
  • ILP को संबंधित राज्य सरकार द्वारा जारी किया जाता है और इसे ऑनलाइन या व्यक्तिगत रूप से आवेदन करके प्राप्त किया जा सकता है।

‘इनर-लाइन परमिट’ का तर्काधार

इनर लाइन परमिट, बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन एक्ट (BEFR) 1873 का एक विस्तार है। अंग्रेजों द्वारा कुछ निर्दिष्ट क्षेत्रों में प्रवेश को प्रतिबंधित करने वाले नियमों को बनाया गया था।

  • पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली स्थानीय जनजातियाँ नियमित रूप से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित चाय बागानों, तेल के कुओं और व्यापारिक चौकियों पर लूटपाट की घटनाओं को अंजाम देती थी।
  • इसलिए ये नियम, ब्रिटिश शासन के हितों की सुरक्षा हेतु कुछ राज्यों में ‘ब्रिटिश प्रजा’ अर्थात भारतीयों को इन क्षेत्रों में व्यापार करने से रोकने हेतु बनाए गए थे।
  • वर्ष 1950 में, ‘ब्रिटिश प्रजा’ शब्द को ‘भारत के नागरिकों’ के साथ बदल दिया गया।
  • वर्तमान में, सभी गैर-मूल निवासियों के लिए इन क्षेत्रों में प्रवेश करने के लिए परमिट की आवश्यकता होती है। यह नियम, इन राज्यों के स्थानीय आदिवासी समुदायों को शोषण से बचाने के लिए आज भी जारी हैं।

मेघालय में इनर-लाइन परमिट की आवश्यकता

  • राज्य में ‘अवैध आप्रवासियों के प्रवाह’ को रोकने के लिए इनर-लाइन परमिट को एकमात्र तंत्र माना जाता है। इस अवैध प्रवाह को काफी खतरनाक माना जा रहा है क्योंकि यह मेघालय के आदिवासियों के नाजुक जनसांख्यिकीय संतुलन को नष्ट कर सकता है।
  • अवैध प्रवाह, निश्चित रूप से चिंता का एक विषय है, लेकिन इसके लिए, दबाव समूहों द्वारा मांग की जा रही त्वरित समाधान के रूप में इनर-लाइन परमिट की नहीं बल्कि इससे बेहतर समाधान की आवश्यकता है। वास्तव में, इस तरह की दूरगामी नीति एक या दो समूहों द्वारा कैसे तय की जा सकती है?

प्रीलिम्स लिंक:

चूंकि इनर लाइन परमिट (ILP) अक्सर चर्चा में रहता है, अतः निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित करें:

  1. उत्तर-पूर्वी राज्यों से जुड़े मानचित्र आधारित प्रश्न।
  2. पूर्वोत्तर राज्य और उनके अंतर्राष्ट्रीय पड़ोसी।

मेंस लिंक:

भारत के पूर्वोत्तर  राज्यों में इनर लाइन परमिट (ILP) प्रणाली को लागू करने संबंधी मुद्दे और इस प्रणाली द्वारा भारत सरकार के समक्ष पेश की गयी दुविधा का विश्लेषण कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


LAC हॉटस्पॉट्स के नामों पर घाटी में प्रचलित ब्रांड्स

दिल्ली स्थित एक जूता कंपनी के लिए, भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर संवेदनशील स्थल, धन कमाने का जरिया बन गए हैं; कश्मीर घाटी में इन स्थानों के नाम पर सर्दियों के जूते की एक श्रृंखला काफी प्रचलित हो रही है।

इसमे मुख्य रूप से शामिल हैं: ‘गलवान’, ’डोकलाम’, ‘कारगिल’ और 5 अन्य स्थल।

(नोट: मानचित्र पर उपर्युक्त बिंदुओं का पता लगाने की कोशिश करें और उनके परिवेश के बारे में एक संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करें)।

पोर्टुलाका लालजी

(Portulaca laljii)

हाल ही में, भारत के पूर्वी घाट से जंगली सन रोज़ की एक नई प्रजाति की खोज की गयी है, जिसे पोर्टुलाका लालजी (Portulaca laljii) नाम दिया गया है।

  • इसे आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले से खोजा गया है।
  • इसमें कई अनूठी विशेषताएं हैं जैसे कि इसका कंद मूल, लाल-गुलाबी रंग का फूल, लंबे आकार के फल, और बिना चमक के भूरे-ताम्र रंग के बीज आदि।
  • इसकी कंद मूल की गुदा-युक्त प्रकृति चट्टानी दरारों पर भी पौधे को जीवित रहने में सक्षम बनाती है।

सही फसल अभियान

(Sahi Fasal Campaign)

  • इस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2019 में राष्ट्रीय जल मिशन के तहत की गयी थी, इसका उद्देश्य पानी की कमी वाले क्षेत्रों में किसानों को कम पानी की जरूरत वाली, पानी का कुशलता पूर्वक उपयोग, आर्थिक रूप से लाभप्रद, स्वास्थ्य और पोषण से भरपूर, क्षेत्र के कृषि-जलवायु-जलीय विशेषताओं के अनुकूल और पर्यावरण के अनुकूल फसलों को उगाने के लिए प्रेरित करना था।
  • ‘सही फसल’ अभियान के तहत उपयुक्त फसलों के उत्पादन, सूक्ष्म सिंचाई, मृदा में नमी संरक्षण आदि पर किसानों के बीच जागरूकता पैदा करना; अधिक पानी की जरूरत वाली फसलों जैसे धान, गन्ना, मक्का इत्यादि से किसानों को दूर रखना, और अंततः किसानों की आय में वृद्धि करने पर ध्यान केंद्रित किये जाने वाले प्रमुख बिंदु है।

मोनपा हस्तनिर्मित कागज

(Monpa handmade paper)

यह अरुणाचल प्रदेश की 1000 साल पुरानी विरासत कला है।

  • मोनपा हस्तनिर्मित कागज निर्माण कला की शुरूआत 1000 वर्ष पूर्व हुई थी।
  • धीरे-धीरे यह कला अरुणाचल प्रदेश के तवांग में स्थानीय रीति-रिवाजों और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गई।
  • उत्कृष्ट बनावट वाला यह हस्तनिर्मित कागज, तवांग की स्थानीय जनजातियों के जीवंत संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, जिसे स्थानीय भाषा में मोन शुगु कहा जाता है।
  • मोनपा हस्तनिर्मित कागज, शुगु शेंग नामक स्थानीय पेड़ की छाल से बनाया जाता है, जिसका अपना औषधीय मूल्य भी है।

संदर्भ:

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) द्वारा तवांग में मोनपा हस्तनिर्मित कागज निर्माण ईकाई की शुरूआत की गई, जिसका उद्देश्य न केवल इस कला को पुनर्जीवित करना है बल्कि स्थानीय युवाओं को इस कला के माध्यम से पेशेवर रूप से जोड़ना और उनको धन अर्जित करवाना भी है।


  • Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates
  • Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos