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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 23 December

 

विषय – सूची

 सामान्य अध्ययन-II

1. बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद में ‘संयुक्त शक्ति परीक्षण’ कराए जाने का आदेश

2. दो बच्चों की नीति

3. अमेरिकी कांग्रेस द्वारा तिब्बती नीति और समर्थन अधिनियम पारित

 

सामान्य अध्ययन-III

1. CII तथा FICCI द्वारा वेतन संहिता पर रोक लगाने की मांग

2. केंद्र द्वारा ‘विकास वित्त संस्थान’ की स्थापना

3. पोखरण में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को बचाने हेतु ‘जुगनू पक्षी डायवर्टर’

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. पीएम मोदी के लिए ‘लीजन ऑफ मेरिट’ सम्मान

2. भू-अभिलेखों के लिए ‘FRUITS’ पोर्टल की शुरुआत

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद में ‘संयुक्त शक्ति परीक्षण’ कराए जाने का आदेश


संदर्भ:

हाल ही में, गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा असम की स्वायत्त बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (Bodoland Territorial Council BTC) में 26 दिसंबर को या उससे पहले ‘संयुक्त शक्ति परीक्षण’ (Composite Floor Test) कराए जाने का आदेश दिया गया है।

बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (BTC), संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आती है और राज्यपाल इसका संवैधानिक प्रमुख होता है।

संबंधित प्रकरण

  • 40 सदस्यीय बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के हालिया चुनाव में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत की प्राप्ति नहीं हुई और चुनाव में 17 सीटें हासिल करने के साथ बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।
  • हालांकि, भाजपा और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) ने गण शक्ति पार्टी (Gana Shakti  Party- GSP) के समर्थन से परिषद में सरकार बना ली।

इसके बाद, अदालत में एक याचिका दायर की गई थी।

‘स्वायत्त जिला परिषदें’ क्या होती हैं?

  • संविधान की छठी अनुसूची के अनुसार, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम, चार राज्यों के जनजातीय क्षेत्र, तकनीकी रूप से अनुसूचित क्षेत्रों से भिन्न हैं।
  • हालांकि ये क्षेत्र राज्य के कार्यकारी प्राधिकरण के दायरे में आते हैं, किंतु कुछ विधायी और न्यायिक शक्तियों के प्रयोग हेतु जिला परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों के गठन का प्रावधान किया गया है।
  • इसके तहत, प्रत्येक जिला एक स्वायत्त जिला होता है और राज्यपाल एक अधिसूचना के माध्यम से उक्त जनजातीय क्षेत्रों की सीमाओं को संशोधित / विभाजित कर सकते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘स्वायत्त जिला परिषद’ क्या है?
  2. इनका गठन कौन करता है?
  3. शक्तियाँ और भूमिकाएँ?
  4. क्षेत्रीय परिषदें क्या हैं?
  5. क्षेत्रीय परिषदों की संरचना?
  6. भारतीय संविधान की 6 वीं अनुसूची के अंतर्गत कितने राज्य सम्मिलित हैं?

मेंस लिंक:

‘स्वायत्त जिला परिषदें’ क्या होती हैं? इनका गठन करने संबंधी कारणों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानकर्ताओं, लोकोपकारी संस्थाओं, संस्थागत एवं अन्य पक्षों की भूमिका।

दो बच्चों की नीति


(Two-child policy)

संदर्भ:

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण -5 (NFHS-5) के नवीनतम आंकड़ों से ज्ञात होता है कि भारत में दो बच्चों की नीति (Two-child policy) लागू किए जाने की आवश्यकता नहीं है: विशेषज्ञ

समर्थक निष्कर्ष:

  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आधुनिक गर्भ निरोधकों का उपयोग।
  • परिवार नियोजन मांगों में सुधार किया जा रहा है।
  • महिला द्वारा पैदा किए जाने वाले बच्चों की औसत संख्या में गिरावट।

उपरोक्त निष्कर्ष साबित करते हैं कि देश की आबादी स्थिर स्थिति में है।

प्रमुख आंकड़े:

  1. देश के 17 राज्यों में से 14 राज्यों की कुल प्रजनन दर (प्रति महिला जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या) में कमी आयी है और इन राज्यों में कुल प्रजनन दर प्रति महिला 2.1 बच्चे अथवा इससे कम है।
  2. इसका तात्पर्य यह भी है कि अधिकांश राज्य, प्रजनन के प्रतिस्थापन स्तर को प्राप्त कर चुके हैं, अर्थात, प्रति महिला जन्म लेने वाले बच्चों की औसत संख्या, जिसके द्वारा आबादी खुद से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में परिवर्तित हो जाती है।

दो बच्चों की नीति से संबंधित आलोचनाएँ:

  1. आलोचकों का तर्क है कि देश के समृद्ध और अधिक शिक्षित होने पर भारत की जनसंख्या वृद्धि स्वाभाविक रूप से धीमी हो जाएगी।
  2. चीन की एक-बच्चे की नीति से जुडी हुई समस्याएं पहले से ही अच्छी तरह से स्पष्ट हो चुकी हैं, जैसे कि, लड़कों को अत्यधिक वरीयता दिए जाने की प्रवृत्ति से उत्पन्न लैंगिक असंतुलन और माता-पिताओं के पहले से ही एक संतान होने के बाद दूसरी संतान होने पर उसके कागजात नहीं बनने से बिना दस्तावेजों के लाखों बच्चों की समस्या।
  3. जन्म दर में हस्तक्षेप करने पर, भारत को भविष्य में गंभीर नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है, यह एक ऐसी समस्या है, जिससे अधिकांश विकसित देश उबरने की कोशिश कर रहे हैं।
  4. नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि होने पर, सामाजिक सेवाएँ प्राप्त करने वाले उम्रदराज लोगों की संख्या में वृद्धि हो जाती है, जबकि सामाजिक सेवाओं के लिए भुगतान करने हेतु कर-चुकाने वाली युवा आबादी में कमी आती है।
  5. दो बच्चों की नीति से संबंधित संबंधित कानून महिला विरोधी भी हो सकते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि, ये कानून, न केवल जन्म से ही महिलाओं के खिलाफ भेदभाव (गर्भपात, कन्या भ्रूण और शिशुओं के गर्भपात के माध्यम से) करता है, बल्कि इससे तलाक और पारिवार द्वारा परित्याग करने का खतरा भी बढ़ जाता है।
  6. दो बच्चों का कानूनी प्रतिबंध, युगल को लिंग-चयनात्मक गर्भपात कराने के लिए विवश कर सकता है

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

अमेरिकी कांग्रेस द्वारा तिब्बती नीति और समर्थन अधिनियम पारित


(US Congress passes Tibetan Policy and Support Act)

संदर्भ:

हाल ही में, अमेरिकी संसद में सर्वसम्मति से तिब्बती नीति एवं समर्थन अधिनियम (Tibetan Policy and Support Act) 2020 को पास कर दिया गया।

नए कानून की प्रमुख विशेषताएं:

  • यह कानून, चीन के किसी भी हस्तक्षेप के बिना, तिब्बती बौद्धों के दलाई लामा के अगले अवतार को चुनने संबंधी अधिकारों की पुष्टि करता है।
  • यह कानून अमेरिकी सरकार को चीनी सरकार के अधिकारियों पर दलाई लामा के अगले अवतार को चुनने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का प्रयास करने पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार प्रदान करता है। चीन द्वारा पंचेन लामा चुनने के मामले में हस्तक्षेप किया गया था।
  • इसके आलावा, यह क़ानून निर्वासित समुदाय द्वारा निर्वाचित ‘निर्वासित तिब्बती संसद’ (Tibetan Parliament in Exile) और केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (Central Tibetan Administration CTA) को मान्यता प्रदान करता है।
  • यह क़ानून तिब्बती पठार पर पर्यावरण और जल संसाधनों की रक्षा करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण प्रावधानों को लागू करने की मांग करता है।

प्रतिक्रिया:

तिब्बतियों द्वारा इस क़ानून की प्रशंसा की गयी है। तिब्बती समुदाय को वर्तमान दलाई लामा की मृत्यु के बाद चीन के द्वारा अपने किसी वफादार को 15 वें दलाई लामा के रूप में नियुक्त करने और तिब्बत पर अधिग्रहण किये जाने के खिलाफ चलाये जा रहे वैश्विक अभियान को असफल करने में कठपुतली के रूप में उसका उपयोग करने की आशंका थी।

पृष्ठभूमि:

वर्तमान 14 वें दलाई लामा वर्ष 1959 में तिब्बत से पलायन करने के बाद से निर्वासित रूप से भारत में रह रहे हैं। तिब्बत पर चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) द्वारा वर्ष 1950-51 में कब्जा कर लिया गया था।

  • दलाई लामा, तिब्बत और तिब्बतियों को ‘वास्तविक स्वायत्तता’ हासिल करने हेतु आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं।
  • किंतु, उनकी मृत्यु के बाद आंदोलन के भविष्य के बारे में आशंकाएं व्याप्त है।

तिब्बती निर्वासित-संसद (TPiE):

तिब्बती निर्वासित-संसद (Tibetan Parliament-in-Exile: TPiE) का मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में धर्मशाला में स्थित है।

16वीं तिब्बती निर्वासित-संसद में 45 सदस्य हैं। जिनमे से:

  1. तिब्बती के प्रत्येक पारंपरिक प्रांत, यू-त्सांग (U-Tsang), धोतो (Dhotoe) और धोमे (Dhomey) के दस प्रतिनिधि;
  2. पूर्व-बौद्ध बॉन धर्म और तिब्बती बौद्ध धर्म के चार संप्रदायों में से प्रत्येक के दो प्रतिनिधि;
  3. उत्तरी अमेरिका और यूरोप, प्रत्येक में से, तिब्बती समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले दो प्रतिनिधि;
  4. आस्ट्रेलिया और एशिया से (भारत, नेपाल और भूटान को छोड़कर) एक प्रतिनिधि, सम्मिलित है।

तिब्बती संविधान

तिब्बती लोगों का केंद्रीय प्रशासन, तिब्बती सरकार के संविधान के आधार पर कार्य करता है जिसे निर्वासित तिब्बतियों का चार्टर  (The Charter of the Tibetans in Exile) कहा जाता है।

  • वर्ष 1991 में, दलाई लामा द्वारा गठित संविधान पुनर्निर्माण समिति द्वारा निर्वासित तिब्बतियों के लिए चार्टर तैयार किया गया था।
  • 28 जून, 1991 को इस संविधान के लिए दलाई लामा द्वारा मंजूरी दी गई।

‘कशाग’ (Kashag) क्या होता है?

कशाग (मंत्रिमंडल) केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का सर्वोच्च कार्यकारी कार्यालय होता है और इसमें सात सदस्य होते हैं।

  • इसका नेतृत्व सिक्योंग (Sikyong) अर्थात राजनीतिक नेता, द्वारा किया जाता है। सिक्योंग को सीधे निर्वासित तिब्बती आबादी द्वारा चुना जाता है।
  • बाद में, सिक्योंग द्वारा सात कलोन (Kalons) अर्थात मंत्रियों को नामित किया जाता है और इसके लिए संसद की मंजूरी प्राप्त की जाती है।
  • कशाग का कार्यकाल पाँच वर्षों का होता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘सिक्योंग’ कौन होते है?
  2. कशाग क्या है?
  3. ‘निर्वासित तिब्बतियों का चार्टर’
  4. तिब्बती निर्वासित-संसद (TPiE) के बारे में।

मेंस लिंक:

तिब्बती निर्वासित-संसद (TPiE) क्या है? इसे किस प्रकार मान्यता-प्रदान की जाती है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

CII तथा FICCI द्वारा वेतन संहिता पर रोक लगाने की मांग


संदर्भ:

भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) तथा भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (FICCI) सहित उद्योग निकायों के प्रतिनिधियों द्वारा श्रम मंत्रालय से मजदूरी की नई परिभाषा को लागू करने पर रोक लगाने का निवेदन किया गया है। मजदूरी की नई परिभाषा लागू किये जाने से श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा कटौती में वृद्धि और शुद्ध वेतन (take-home pay) में कमी आएगी।

आवश्यकता:

  • ‘मजदूरी की नई परिभाषा’, पिछले साल संसद द्वारा पारित वेतन संहिता (Code on Wages), 2019 का एक भाग है।
  • नई परिभाषा के परिणामस्वरूप श्रमिकों के शुद्ध वेतन में महत्वपूर्ण कटौती होगी और इससे नियोक्ताओं पर भी बोझ पड़ेगा।

 वेतन संहिता अधिनियम के बारे में:

वेतन संहिता अधिनियम- 2019 में, ‘मज़दूरी भुगतान कानून, (Payment of Wages Act)1936, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, (Minimum Wages Act) 1948, बोनस भुगतान कानून, (Payment of Bonus Act) 1965, समान पारिश्रमिक अधिनियम, (Equal Remuneration Act), 1976’ को समाहित किया गया है।

  1. वेतन संहिता अधिनियम पूरे देश में एक समान वेतन एवं सभी कर्मचारियों को समय पर भुगतान किये जाने का प्रावधान करता है।
  2. इसके अंतर्गत, प्रत्येक कामगार के लिए ‘जीवन निर्वाह का अधिकार’ सुनिश्चित किया गया है तथा इसके तहत वर्तमान में 40% कार्यबल को प्राप्त न्यूनतम मजदूरी का विधायी संरक्षण शत-प्रतिशत कार्यबल तक विस्तृत किया जायेगा।
  3. इस अधिनियम के मुताबिक, हर पांच साल या उससे पहले केंद्र या राज्य सरकार द्वारा त्रिपक्षीय समिति के माध्यम से न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा और पुनर्निधारण किया जाएगा।
  4. मजदूरी की न्यूनतम दर तय करते समय, केंद्र सरकार संबंधित भौगोलिक क्षेत्र को तीन श्रेणियों – महानगरीय क्षेत्र, गैर-महानगरीय क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्र में विभाजित करेगी।
  5. मजदूरी में वेतन, भत्ता तथा अन्य घटकों को सम्मिलित किया जाएगा। इसमें कर्मचारियों के लिए देय बोनस अथवा यात्रा-भत्ता सम्मिलित नहीं होता है।
  6. केंद्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी (minimum wages), मानक मजदूरी (floor wage) से अधिक होनी चाहिए।
  7. इसके अधिनियम के तहत, नियोक्ता अपने कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान नहीं कर सकता। न्यूनतम मजदूरी की राशि मुख्य तौर पर क्षेत्र और कुशलता के आधार पर काम के घंटे अथवा उत्पादन-मात्रा देखते हुए तय की जाएगी।
  8. मजदूरी का भुगतान: वेतन का भुगतान (i) सिक्के, (ii) करेंसी नोट, (iii) चेक द्वारा, (iv) बैंक खाते में जमा करके, या (v) इलेक्ट्रॉनिक मोड के माध्यम से किया जाएगा। वेतन अवधि नियोक्ता द्वारा (i) दैनिक, (ii) साप्ताहिक, (iii) पाक्षिक, या (iv) मासिक के रूप में तय की जायेगी।

सलाहकार बोर्ड:

केंद्र और राज्य सरकारें सलाहकार बोर्ड का गठन करेंगी। केंद्रीय सलाहकार बोर्ड में निम्नलिखित को सम्मिलित किया जायेगा:

  • नियोक्ता,
  • कर्मचारी (नियोक्ता के बराबर संख्या में),
  • स्वतंत्र व्यक्ति, और
  • राज्य सरकारों के पांच प्रतिनिधि।

राज्य सलाहकार बोर्ड में नियोक्ता, कर्मचारी तथा स्वतंत्र व्यक्ति सम्मिलित होंगे। इसके अलावा, केंद्रीय और राज्य बोर्डों के कुल सदस्यों में से एक तिहाई महिलाएं होंगी। यह बोर्ड संबंधित सरकारों को, (i) न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण, और (ii) महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने, से संबंधित विषयों पर सलाह देंगे।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. वेतन संहिता अधिनियम के तहत स्थापित केंद्रीय सलाहकार बोर्ड की संरचना और कार्य।
  2. मानक मजदूरी (floor wage) क्या है और इसे कौन तय करता है?
  3. न्यूनतम मजदूरी कौन तय करता है?
  4. अधिनियम के तहत मजदूरी क्या है?
  5. न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के लिए मानदंड।

मेंस लिंक:

वेतन संहिता अधिनियम, 2019 पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

केंद्र द्वारा ‘विकास वित्त संस्थान’ की स्थापना


(Centre to set up development finance entity)

संदर्भ:

सरकार द्वारा आगामी तीन से चार महीनों में विकास वित्त संस्थान (Development Finance InstitutionDFI) स्थापित करने की योजना पर कार्य किया जा रहा है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने पिछले बजट भाषण में बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देने हेतु  विकास वित्त संस्थान (DFI) की स्थापना का प्रस्ताव दिया था।

DFI की आवश्यकता:

  • महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन के वित्तपोषण के लिए आवश्यक 111 लाख करोड़ रुपए की राशि जुटाने हेतु।
  • परियोजनाओं की क्रेडिट रेटिंग बढ़ाने हेतु। DFI द्वारा उन परियोजनाओं के लिए राशि उपलब्ध कराई जाएगी, जिनमे जोखिम होने के कारण अन्य संस्थान निवेश करने को तैयार नहीं होते हैं।

भारत में विकास वित्त संस्थानऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

विकास वित्त संस्थान (DFI), वित्त पोषण के अलावा महत्वपूर्ण विकासात्मक भूमिका भी निभाएंगे।

  • भारत में उदारीकरण से पहले, उद्योगों के विकास में विकास वित्त संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
  • ICICI और IDBI जैसे वित्तीय संस्थान अपने पिछले स्वरूपों में, विकास वित्त संस्थान (DFI) के रूप में कार्य करते थे।
  • देश की सबसे पुरानी वित्तीय संस्था IFCI Ltd भी DFI के रूप में कार्य करती थी।

राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) के बारे में:

2019-20 के बजट भाषण में वित्त मंत्री द्वारा अगले 5 साल में अवसंरचना परियोजनाओं के लिए 100 लाख करोड़ रुपये के व्यय की घोषणा की गयी थी।

  • NIP देश भर में विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने और सभी नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में अपनी तरह की एक अनूठी पहल है।
  • इससे परियोजना की तैयारी में सुधार होगा, तथा अवसंरचना में निवेश (घरेलू और विदेशी दोनों) आकर्षित होगा। साथ ही यह वित्त वर्ष 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अहम होगा।
  • NIP में आर्थिक और सामाजिक अवसंरचना परियोजना दोनों को सम्मिलित किया गया है।

आवश्यक उपाय:

  1. निवेश की आवश्यकता: अवसंरचना परियोजनाओं के निर्माण तथा आर्थिक विकास में वृद्धि हेतु अगले पांच वर्षों (2020-2025) में 111 लाख करोड़ ₹ का निवेश।
  2. कुल परियोजनाओं में ऊर्जा, सड़क, रेलवे और शहरी क्षेत्रों की परियोजनाएं सबसे अधिक है, जिन पर कुल राशि का लगभग 70% व्यय अनुमानित है।
  3. इन परियोजनाओं में केंद्र (39 प्रतिशत) और राज्य (40 प्रतिशत) की साझेदारी होगी, जबकि निजी क्षेत्र की 21 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
  4. परिसंपत्तियों की बिक्री हेतु आक्रामक रवैया।
  5. अवसंरचना परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण।
  6. नगरपालिका बांड बाजार को मजबूत करना।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. NIP क्या है? इसे कब लॉन्च किया गया था?
  2. NIP के तहत शामिल परियोजनाएं
  3. NIP पर अतनु चक्रवर्ती की अध्यक्षता में कार्य बल द्वारा की गई प्रमुख सिफारिशें
  4. कार्य बल द्वारा की गई सिफारिशों के अनुसार प्रस्तावित तीन समितियां
  5. भारत निवेश ग्रिड क्या है?

मेंस लिंक:

राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) के महत्व और विशेषताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

पोखरण में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को बचाने हेतु ‘जुगनू पक्षी डायवर्टर’


संदर्भ:

भारत में भारतीय वन्यजीव संरक्षण सोसायटी (Wildlife Conservation SocietyWCS) और  पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा वन्य पक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) की आबादी वाले क्षेत्रों में ऊपर से गुजरने वाली बिजली की लाइनों का संकेत करने के लिए एक ‘जुगनू पक्षी डायवर्टर’ (firefly bird diverter) का प्रयोग करने की अनोखी पहल शुरू की गयी है।

आवश्यकता:

  • थार-क्षेत्र में, बिजली की लाइनें, विशेषकर ऊपर से गुजरने वाले हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनें, वर्तमान में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) के सबसे बड़ा खतरा हैं। यह समस्या ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की लगभग 15% आबादी में उच्च मृत्यु दर का कारण बन रही है।
  • हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संबंधी परिदृश्य में बिजली लाइनों को भूमिगत रखे जाने का निर्देश भी दिया गया था।

‘जुगनू पक्षी डायवर्टर’ क्या हैं?

इन मार्ग-परिवर्तकों (Diverters) को जुगनू (fireflies) कहा जाता है, क्योंकि ये रात में बिजली लाइनों पर चमकते हुए दूर से फायरफ्लाइज की तरह दिखते हैं।

  • इस मॉडल का अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (International Union for Conservation of Nature- IUCN) प्रजाति उत्तरजीविता आयोग (Species Survival CommissionSSC) के बस्टर्ड स्पेशलिस्ट ग्रुप के विशेषज्ञों द्वारा समर्थन किया गया है।
  • जुगनू संकेतकों को राजस्थान के पोखरण तहसील में लगाया गया है।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड्स (GIB)

IUCN स्थिति: गंभीर रूप से संकटग्रस्त।

भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची 1 और CMS कन्वेंशन तथा CITES की  परिशिष्ट I में सूचीबद्ध।

पर्यावरण और वन मंत्रालय के वन्यजीव आवास के एकीकृत विकास कार्यक्रम के तहत पुन:प्राप्ति कार्यक्रम के लिए चिह्नित।

प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड – राजस्थान- मौजूदा संरक्षित क्षेत्रों में बस्टर्ड प्रजनन स्थलों की पहचान करना और बाड़ लगाना और साथ ही संरक्षित क्षेत्रों के बाहर के क्षेत्रों में सुरक्षित प्रजनन बाड़ा प्रदान करना।

संरक्षित क्षेत्र: मरुस्थल राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य – राजस्थान, रोलपाडु वन्यजीव अभयारण्य – आंध्र प्रदेश और करेरा वन्यजीव अभयारण्य- मध्य प्रदेश।

भारत में वास-स्थल:

राजस्थान में केवल दो जिले – जैसलमेर और बाड़मेर के वन्य क्षेत्रों में प्रजनन करने वाली ग्रेट इंडियन बस्टर्ड्स की आबादी पायी जाती है। यह पक्षी मामूली संख्या में गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में भी पाया जाते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड्स (GIB) के बारे में।
  2. IUCN स्थिति
  3. संरक्षित क्षेत्र
  4. वास-स्थल

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स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


पीएम मोदी के लिए ‘लीजन ऑफ मेरिट’ सम्मान

संदर्भ:

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन और पूर्व जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के सर्वोच्च सैन्य अलंकरण – द लीजन ऑफ मेरिट, डिग्री चीफ कमांडर – से सम्मानित किया गया है।

यह सम्मान, अतीत में दो भारतीयों को प्राप्त हो चुका है: 1950 में फील्ड मार्शल के एम करियप्पा, और 1955 में जनरल एस एम श्रीनागेश।

प्रमुख बिंदु:

  • इस पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1943 में हुई थी।
  • यह, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा आमतौर पर अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों या शासनाध्यक्षों को प्रदान किया जाना वाला प्रतिष्ठित पुरस्कार है।

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भू-अभिलेखों के लिए ‘FRUITS’ पोर्टल की शुरुआत

  • ‘FRUITS’ (Farmer Registration and Unified Beneficiary Information System / किसान पंजीकरण और एकीकृत लाभार्थी सूचना प्रणाली) पोर्टल, कर्नाटक सरकार द्वारा ई-गवर्नेंस की परियोजना है।
  • यह पोर्टल भूमि विवरण प्राप्त करने और सत्यापित करने के लिए राज्य के भूमि पोर्टल से एकीकृत किया गया है।
  • इससे, किसानों को उप-पंजीयक कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने होंगे।

कार्य-विधि

  • इस पोर्टल में, सभी किसानों को पंजीकृत किया जाएगा और उन्हें एक एफआईडी (FID) नंबर दिया जाएगा।
  • वित्तीय और उधार देने वाले संस्थान, इस FID नंबर से किसानों की भूमि का विवरण और इनकी जरूरतों के हिसाब से ऋण देने का त्वरित निर्णय ले सकते हैं।
  • सभी वित्तीय संस्थानों को पोर्टल पर लाया जाएगा, जिससे किसानों के ऋण से संबंधित सभी आंकड़े एक ही स्थान पर उपलब्ध हो सकेंगे।

मुख्य परीक्षा हेतु अतिरिक्त लेख

ग्रामीण सर्वेक्षण के अनुसार- कीमत देकर टीके लगवाने की कोई इच्छा नहीं

हाल ही में, एक ग्रामीण मीडिया प्लेटफॉर्म ‘गाँव-कनेक्शन’ द्वारा ‘कोविड-19 वैक्सीन और ग्रामीण भारत’ नामक सर्वेक्षण किया गया था।

प्रमुख निष्कर्ष:

  1. कोविड-19 के खिलाफ टीकाकरण के लिए आधे से भी कम आधे से कम (44%) उत्तरदाता भुगतान करने को तैयार थे।
  2. 36% उत्तरदाताओं ने कोविड-19 वैक्सीन के लिए कीमत देने को स्पष्ट मना कर दिया।
  3. चूंकि ग्रामीण क्षेत्रों में टीके की कीमत चुकाने की क्षमता एक बड़ा मुद्दा है, इसलिए उत्तरदाताओं से पूछा गया कि मान लो उन्हें वैक्सीन की दो खुराकों के लिए 1,000 रुपए का भुगतान करना पड़ता है, तो उनके परिवार में पहले कौन टीका लगवाएगा? इसके लिए, 33% से अधिक उत्तरदाताओं ने कहा कि वे अपने बूढ़े माता-पिता का टीकाकरण कराएंगे।
  4. सर्वेक्षण में शामिल लोगों में से 43.5% ने कहा कि टीकों को पहले डॉक्टरों और नर्सों को दिया जाना चाहिए।
  5. 51% से अधिक उत्तरदाताओं ने कहा कि बीमारी “चीन की साजिश” थी, 22% का मानना ​​था कि यह लोगों की सावधानी बरतने में विफलता थी और 18% का मानना ​​था कि यह सरकार की विफलता थी।
  6. कोविड-19 ने लगभग 70% उत्तरदाताओं के साथ ग्रामीण नागरिकों के भोजन की आदतों में बदलाव किया है, उन्होंने कहा कि उन्होंने बाहर का खाना खाना बंद कर दिया है। 33% से अधिक ने कहा कि उन्होंने अधिक सब्जियां खाना शुरू कर दिया है, जबकि 30% ने कहा कि वे अधिक फल खा रहे हैं।

Link: The Hindu


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