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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 27 November

 

विषय – सूची:

 सामान्य अध्ययन-II

1. अमेरिका तथा भारत के राष्ट्रपति की क्षमा करने संबंधी शक्तियाँ

2. एक देश-एक चुनाव

3. अधिशासी प्रकार्यों पर उच्च न्यायालय का कब्ज़ा: आंध्र प्रदेश सरकार

 

सामान्य अध्ययन-III

1. वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा निवेश सम्मलेन और प्रदर्शनी

2. मुंबई की समुद्रीय तटरेखा पर ‘नीला ज्वार’

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. सूचना प्रबंधन और विश्लेषण केंद्र (IMAC)

2. स्कॉटलैंड, मुफ्त सैनिटरी पैड व टैम्पोन प्रदान करने वाला पहला राष्ट्र

3. SDG निवेशक मानचित्र

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: भारतीय संवैधानिक योजना की अन्य देशों के साथ तुलना।

अमेरिका तथा  भारत के राष्ट्रपति की क्षमा करने संबंधी शक्तियाँ

संदर्भ:

हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, अपने पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल फ्लिन (Michael Flynn) को क्षमा कर दिया गया। माइकल फ्लिन को फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन (FBI) के समक्ष दो बार गलत बयान देने का दोषी ठहराया गया था।

अमेरिकी राष्ट्रपति की क्षमादान-शक्ति का विस्तार

  • अमेरिकी राष्ट्रपति को संघीय अपराधों से संबंधित मामलों में क्षमा प्रदान करने अथवा सजा कम करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति की यह शक्ति असीमित होती है, और यह कांग्रेस द्वारा प्रतिबंधित नहीं की जा सकती है।
  • अमेरिकी संविधान के अनुसार, क्षमादान (Clemency) एक व्यापक कार्यकारी शक्ति है और राष्ट्रपति के विवेकाधीन होती है- अर्थात, राष्ट्रपति, क्षमा प्रदान करने पर किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है, और इसके लिए उसे कोई भी कारण स्पष्ट करना आवश्यक नहीं है।

सीमाएं:

  • अमेरिकी राष्ट्रपति की क्षमादान-शक्ति का महाभियोग के मामलों में प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
  • यह शक्ति केवल संघीय अपराधों पर लागू होती है और राज्य अपराधों पर नहीं।

अनुच्छेद 72 के तहत भारतीय राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियाँ:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 में कहा गया है कि, राष्ट्रपति को, किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन (Reprieve), विराम (Respite) या परिहार (Remission) करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण (Commutation) करने की शक्ति होगी।

राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान शक्ति का प्रयोग

  • उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश सेना न्यायालय ने दिया है,
  • उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय संबंधी किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया है जिस विषय तक संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है,
  • उन सभी मामलों में, जिनमें दंडादेश, मृत्यु की सजा होती है।

प्रमुख तथ्य:

  1. राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया जाता है।
  2. संविधान में, राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल के ‘दया अधिकार क्षेत्र’ (mercy jurisdiction) से संबधित निर्णय की वैधता पर प्रश्न उठाने का कोई प्रावधान नहीं किया गया है।
  3. हालांकि, ईपुरु सुधाकर (Epuru Sudhakar) मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा, किसी भी मनमानी को रोकने के उद्देश्य से राष्ट्रपति और राज्यपालों की क्षमादान शक्तियों की न्यायिक समीक्षा का विकल्प दिया गया है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारत में राष्ट्रपति तथा राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों में अंतर
  2. न्यायिक समीक्षा की प्रयोज्यता
  3. अनुच्छेद 72 किससे संबंधित है?
  4. अमेरिकी राष्ट्रपति को क्षमा करने की शक्ति

मेंस लिंक:

भारत में राष्ट्रपति तथा राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों की विस्तार से तुलना कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ।

एक देश-एक चुनाव


(One NationOne Election)

संदर्भ:

हाल ही में, प्रधानमंत्री ने एक बार फिर देश में ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ की जरूरत पर जोर देते हुए कहा है, कि देश में हर कुछ महीनों में चुनाव होते हैं और इससे विकास कार्य बाधित होता है।

  • प्रधानमंत्री द्वारा यह सुझाव हाल ही में आयोजित 80 वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में दिया गया था।
  • इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि लोकसभा, विधानसभा और अन्य चुनावों के लिए केवल एक मतदाता सूची का उपयोग किया जाना चाहिए।

एक देश-एक चुनाव’ क्या है?

एक देश-एक चुनाव / ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ (One Nation-One Election) का तात्पर्य लोकसभा, राज्य विधानसभाओं, पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों के लिए प्रति पांच वर्षो में एक बार और एक साथ चुनाव कराने से है।

बहुधा होने वाले चुनावों होने से उत्पन्न चुनौतियाँ

  1. भारी व्यय।
  2. चुनाव के समय में आदर्श आचार संहिता लागू होने के परिणामस्वरूप नीतियों में रूकावट।
  3. आवश्यक सेवाओं के वितरण पर प्रभाव।
  4. चुनाव के दौरान तैनात किये जाने वाले जन-बल पर अतिरिक्त भार
  5. राजनीतिक दलों, विशेषकर छोटे दलों पर दबाव में वृद्धि, क्योंकि दिन प्रतिदिन महंगे होते जा रहे हैं।

एक साथ चुनाव कराए जाने के लाभ:

  • प्रशासन एवं अनुरूपता: सत्तारूढ़ दल, हमेशा चुनाव अभियान मोड में रहने के बजाय कानून और प्रशासन पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
  • धन के व्यय और प्रशासन में किफ़ायत।
  • नीतियों और कार्यक्रमों में निरंतरता
  • प्रशासन क्षमता: सरकारों द्वारा लोकलुभावन उपायों में कमी।
  • सभी चुनाव एक ही बार होने से मतदाताओं पर काले धन के प्रभाव में कमी।

क्षेत्रीय दलों पर प्रभाव:

लोकसभा और राज्य विधान सभा चुनाव एक साथ होने पर, मतदाताओं में केंद्र व राज्य, दोनों में एक ही पार्टी को सत्ता में लाने के लिए मतदान करने की प्रवृत्ति हमेशा होती है

एक साथ चुनाव कराए जाने संबंधी प्रावधान लागू किये जाने पर, संविधान और कानूनों में किए जाने वाले परिवर्तन:

  1. अनुच्छेद 83, संसद के सदनों के कार्यकाल से संबंधित है, इसमें संशोधन किए जाने की आवश्यकता होगी।
  2. अनुच्छेद 85 (राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को भंग करने संबंधी अनुच्छेद)
  3. अनुच्छेद 172 (राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल से संबंधित अनुच्छेद)
  4. अनुच्छेद 174 (राज्य विधानसभाओं के विघटन से संबंधित अनुच्छेद)
  5. अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन से संबंधित अनुच्छेद)

संसद और विधानसभाओं, दोनों के कार्यकालों की स्थिरता हेतु जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of People Act), 1951 में संशोधन किये जाने की आवश्यकता होगी।

इसमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण तत्व सम्मिलित किए जाने चाहिए:

  1. एक साथ चुनाव कराने संबंधी आवश्यक प्रक्रियाओं को सुविधाजनक बनाने हेतु भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) की शक्तियों और कार्यों का पुनर्गठन।
  2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 2 में ‘एक साथ चुनाव’ की परिभाषा जोड़ी जा सकती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आदर्श आचार संहिता क्या है?
  2. निर्वाचन आयोग की चुनाव कराने संबंधी शक्तियाँ
  3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 अधिनियम का अवलोकन
  4. अनुच्छेद 83, 85 और 172 का अवलोकन

मेंस लिंक:

भारतीय राजनीति के लिए “एक देश- एक चुनाव” की अवधारणा के लाभ और हानियों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

अधिशासी प्रकार्यों पर उच्च न्यायालय का कब्ज़ा: आंध्र प्रदेश सरकार


(HC has taken over executive functions: A.P)

संदर्भ:

हाल ही में, आंध्र प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया है, कि आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने “राज्य के अधिशासी प्रकार्यों को लगभग अपने हाथों में लिया है”।

इस आरोप को साबित करने वाले साक्ष्य:

2 नवंबर को, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य को विशाखापत्तनम में प्रस्तावित गेस्ट हाउस की निर्माण योजना को इसके समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

वर्तमान प्रकरण

राज्य सरकार का कहना है कि उच्च न्यायालय द्वारा “शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का गंभीर उल्लंघन” किया गया है।

इसके अलावा, ऐसा करने में, उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दी गयी चेतावनी को पूर्णतयः नजरअंदाज कर दिया है, जिसमे उच्चतम न्यायालय द्वारा अदालतों को राज्य के अन्य सह-समान अंगों का सम्मान करने तथा इस तरह की शक्तियों को स्वयं धारित करने से बचने की सलाह दी गयी है।

इस विषय पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2008 के एक फैसले में कहा गया था, “न्यायिक सक्रियता (judicial activism) के नाम पर, न्यायाधीश अपनी सीमा पार नहीं कर सकते हैं, और न ही राज्य के अन्य अंगो से संबंधित कार्यों को अपने हाथों में लेने की कोशिश कर सकते हैं।”

न्यायिक सक्रियता से संबंधित चिंताएँ:

जब अदालतें तात्कालिक जूनून में उलझ जाती हैं, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाती है। (The independence of the judiciary is jeopardised when courts become embroiled in the passions of the day).

(अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी टिप्पणी)

‘न्यायिक सक्रियता’ क्या है?

न्यायिक सक्रियता (judicial activism) का तात्पर्य, अदालत के उन फैसलों से होता है, जिसमे न्यायाधीशों द्वारा, विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनी लेखों की बजाय, निजी विद्वता और ज्ञान के आधार पर निर्णय लिया जाता है और विभिन्न सामाजिक कुरीतियों से राहत प्रदान करने के लिए समुचित न्याय सुनिश्चित करने हेतु न्यायिक शक्ति का प्रयोग किया जाता है।

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत:

संविधान में, विभिन्न प्रावधानों के तहत, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संबंधित कार्यप्रणाली में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिये स्पष्ट रूप से रेखा खींची गयी है।

  • अनुच्छेद 121 और 211 के द्वारा, विधायिका को, किसी न्यायाधीश के, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए आचरण के विषय में चर्चा करने से प्रतिबंधित किया गया है।
  • अनुच्छेद 122 और 212 में, अदालतों को विधायिका की आंतरिक कार्यवाही पर निर्णय लेने पर रोक लगाई गयी है।
  • अनुच्छेद 105 (2) और 194 (2) में विधायकों को उनके भाषण की स्वतंत्रता और मतदान करने की स्वतंत्रता के संबंध में अदालतों के हस्तक्षेप से सुरक्षा प्रदान की गयी है।

न्यायिक सक्रियता के लाभ:

  1. सरकार की विभिन्न प्रशाखाओं में संतुलन स्थापित करने हेतु एक प्रणाली प्रदान करता है।
  2. यह समाधान के रूप में आवश्यक नवाचार प्रस्तुत करती है।
  3. न्यायाधीशों को उन मामलों में अपने व्यक्तिगत ज्ञान का उपयोग करने का अवसर प्रदान करती है जहाँ कानून एक संतुलन प्रदान करने में विफल रहता है।
  4. यह स्थापित न्याय प्रणाली और उसके निर्णयों में विश्वास को दर्शाती है।
  5. सार्वजनिक शक्ति के दुरुपयोग पर रोक लगाती है।
  6. विधायिका के बहुमत संबंधी मामलों में फसने पर, यह शीघ्र समाधान उपलब्ध कराती है।

न्यायिक सक्रियता से हानियाँ अथवा संबधित चिंताएं

  1. संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से खीची गई सीमा रेखा का उल्लंघन करती है।
  2. न्यायाधीशों की न्यायिक राय अन्य मामलों पर निर्णय करने के लिये मानक बन जाती है।
  3. निर्णय निजी या स्वार्थी उद्देश्यों से प्रेरित हो सकते हैं।
  4. अदालतों के बार-बार हस्तक्षेप से सरकारी संस्थानों की गुणवत्ता, अखंडता और दक्षता के प्रति लोगों का विश्वास कम हो सकता है।
  5. अदालत द्वारा जब सरकारी एजेंसियों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए अपनी शक्ति का प्रयोग किया जाता है, तो यह सरकार के कामकाज को सीमित करता है।

निष्कर्ष:

राम जवाया बनाम पंजाब राज्य (1955) मामले में, अदालत ने टिप्पणी की: “हमारे संविधान में, किसी एक अंग अथवा राज्य के कार्यों का, किसी दूसरे अंग द्वारा कार्यभार-ग्रहण करने पर विचार नहीं किया गया है।“

इसका तात्पर्य है कि राज्य के तीनों अंगों (विधायी, कार्यकारी, न्यायपालिका) के मध्य संविधान में शक्तियों का व्यापक पृथक्करण किया गया है और एक अंग को दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं करेगा। ऐसा होने पर संविधान द्वारा स्थापित किया गया संवेदनशील संतुलन बिगड़ जाएगा और इससे अराजकता फ़ैल सकती है।

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स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा निवेश सम्मलेन और प्रदर्शनी


(Global Renewable Energy Investment Meeting and Expo)

संदर्भ:

हाल ही में, तीसरी वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा निवेश सम्मलेन और प्रदर्शनी / आरई-इनवेस्ट 2020 (Global Renewable Energy Investment Meeting and Expo (RE-Invest 2020) का उद्घाटन किया गया है।

  • इस शिखर सम्मेलन का आयोजन नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
  • RE-Invest 2020 का विषय ‘संवहनीय ऊर्जा परिवर्तन के लिए नवाचार’ (Innovations for Sustainable Energy Transition) है।

इस क्षेत्र में भारत का प्रदर्शन

  • भारत नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में विश्व में चौथे स्थान पर पहुंच गया है और दुनिया के सबसे तेज नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन वाले देशों में तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है।
  • भारत की नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता वर्तमान में बढ़ कर 136 गीगावॉट हो गई है जो कि हमारे कुल ऊर्जा क्षमता का 36 प्रतिशत है।
  • 2017 के बाद से भारत की वार्षिक नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता कोयला आधारित तापीय विद्युत उत्पादन के समान बढ़ रही है।
  • बीते 6 वर्षों में भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में ढाई गुना की वृद्धि हुई है।

कुल मिलाकर, भारत ने दुनिया को दिखा दिया है कि, नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में जिस समय निवेश सस्ता नहीं था, उस समय किए गए निवेश के चलते आज इसके उत्पादन में यह अपेक्षित और उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इसी के चलते अब लागत में कमी आने लगी है। पर्यावरण अनुकूल नीतियां भी अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर हो सकती हैं।

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स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

मुंबई की समुद्रीय तटरेखा पर ‘नीला ज्वार’


संदर्भ:

मुंबई के जुहू बीच और सिंधुदुर्ग के देवगढ़ बीच सहित महाराष्ट्र में समुद्रीय तटरेखाओं पर नीले ज्वार (Blue Tide) की घटना देखी गयी है। इस नीले रंग के प्रतिदीप्त (Fluorescent Blue Hue) ज्वार को लोकप्रिय रूप में जैव-संदीप्‍ति / बायोलुमिनेसेंस (Bioluminescence) के नाम से जाना जाता है।

पृष्ठभूमि:

वर्ष 2016 के बाद से, विशेष रूप से नवंबर और दिसंबर के महीनों के दौरान,  भारत के पश्चिमी तट पर जैव-संदीप्‍ति (Bioluminescence) एक वार्षिक घटना है।

संबंधित कारण

यह अद्भुत दृश्य, आमतौर पर डाइनोफ्लैगलेट्स (Dinoflagellates) के रूप में पहचाने जाने वाले पादप प्लवकों (Phytoplankton), सूक्ष्म समुद्रीय पौधों के कारण होता है। इन डाइनोफ्लैगलेट्स के प्रोटीन में रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से हल्के प्रकाश का उत्पादन निकलता है। समुद्र की लहरें इन एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों में हलचल पैदा करती है, जिससे ये सूक्ष्मजीव नीली रोशनी छोड़ते है।

इस घटना का एक प्रमुख कारक अतिपोषण (Eutrophication)– जल में ऑक्सीजन की कमी – हो सकता है। यूट्रोफिकेशन की स्थिति में पादप प्लवकों (फाइटोप्लांक्टन) की संख्या में काफी वृद्धि होती है।

इसके खतरनाक होने के कारण

  • ये दृश्य खूबसूरत होने के साथ-साथ खतरे का संकेत भी हो सकता है। इस समूह की कई प्रजातियां विषाक्त होती हैं। यदि, डाइनोफ्लैगलेट्स में तेजी से प्रजनन होता है, तो तथाकथित ‘लाल ज्वार’ (Red Tides) का कारण भी बन सकते हैं।
  • इस दौरान, डाइनोफ्लैगलेट्स का भक्षण करने वाले सभी जीव (मोलस्क, मछली, आदि) भी विषाक्त हो जाते हैं। इन जीवों में डाइनोफ्लैगलेट्स का भक्षण करने से काफी मात्रा में विषाक्त पदार्थों के संचय हो जाता है।
  • इस तरह के समुद्री जीवों (मछलियों, आदि) को आहार के रूप में लेना हानिकारक है, क्योंकि इनमे मौजूद विषाक्त पदार्थों के विभिन्न अवांछित प्रभाव हो सकते है; कुछ के द्वारा फ़ूड पॉइज़निंग तथा आंत संबंधी समस्याएं हो सकती है, जबकि कुछ के न्यूरोटॉक्सिन होने के कारण याददाशत पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
  • कुछ प्रजातियाँ, जैसे कि सी-स्पार्कल (Noctiluca scintillans) विषाक्त नहीं होती हैं, लेकिन इनके भी अन्य अप्रिय प्रभाव हो सकते हैं।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. नीला ज्वार (Blue Tide) क्या होता है?
  2. ‘लाल ज्वार’ (Red Tides) क्या होता हैं?
  3. यूट्रोफिकेशन क्या है?
  4. जैव-संदीप्‍ति (Bioluminescence) क्या है?

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


सूचना प्रबंधन और विश्लेषण केंद्र (IMAC)

(Information Management and Analysis Centre)

संदर्भ:

भारतीय नौसेना का सूचना प्रबंधन और विश्लेषण केंद्र (Information Management and Analysis Centre- IMAC) शीघ्र ही राष्ट्रीय समुद्री डोमेन जागरूकता (National Maritime Domain Awareness- NMDA) केंद्र बन जाएगा, जिसमें सभी हितधारकों की भागीदारी होगी।

सूचना प्रबंधन और विश्लेषण केंद्र (IMAC) के बारे में:

  • यह समुद्री डेटा संलयन के लिए नोडल एजेंसी है।
  • इसे 26/11 में हुए मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद स्थापित किया गया था।
  • वर्ष 2012 में रक्षा अधिग्रहण परिषद द्वारा अनुमोदित किया गया।
  • वर्ष 2014 से कार्य करना आरंभ किया और यह गुरुग्राम में स्थित है।
  • यह नेशनल कमांड कंट्रोल कम्युनिकेशन एंड इंटेलिजेंस सिस्टम (NC3I) का नोडल केंद्र है।
  • इसे नौसेना के परिचालन केंद्रों और नौसेना तथा देश के समुद्र तट पर फैले कोस्ट गार्ड के निचले अधिकारियों में संपर्क स्थापित करने हेतु गठित किया गया था।

स्कॉटलैंड, मुफ्त सैनिटरी पैड व टैम्पोन प्रदान करने वाला पहला राष्ट्र

  • स्कॉटलैंड, मासिक धर्म गरीबी (Period Poverty) के खिलाफ एक कदम उठाने वाला विश्व का पहला राष्ट्र बन गया है। पीरियड पावर्टी (Period Poverty) का तात्पर्य उस स्थिति से है, जिसके तहत महिलाएं मासिक धर्म के दौरान होने वाले रक्तस्राव को प्रबंधित करने के लिए सैनिटरी पैड या टैम्पोन जैसे उत्पादों का प्रयोग करने में समर्थ नहीं होती है।
  • पीरियड प्रोडक्ट्स (फ्री प्रोविजन) स्कॉटलैंड बिल, के पारित होने के पश्चात टैम्पोन और सैनिटरी पैड्स, सामुदायिक केंद्रों, युवा क्लबों और फार्मेसियों जैसे सार्वजनिक स्थानों पर मुफ्त उपलब्ध होंगे।
  • इससे करदाताओं पर लगभग 24 मिलियन पाउंड (2,36,51,54,024 रुपये) वार्षिक का भार पड़ेगा।

SDG निवेशक मानचित्र

 

(SDG Investor Map)

  • इस कार्यक्रम को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और इन्वेस्ट इंडिया द्वारा शुरू किया गया है।
  • इस मैप में छह महत्वपूर्ण एसडीजी सक्षम क्षेत्रों 18 निवेश अवसर क्षेत्र (Investment Opportunities Areas- IOAs) चिह्नित किये गए है, जो भारत को सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ने में सहायता करेंगे।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की प्राथमिकताओं और निजी क्षेत्र के हितों के मध्य ओवरलैप करने वाले तथा रिक्त स्थानों का मानचित्रण करके, SDG इन्वेस्टर मैप, निजी क्षेत्र के निवेश और सार्वजनिक क्षेत्र के सहयोग करने वाले तरीकों को निर्माण करता है।

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