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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 21 November

 

विषय – सूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के प्रतीक चिह्नों पर निर्णय

2. राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन

3. चापरे वायरस

4. विश्व भर में फैले तिब्बतियों द्वारा ‘निर्वासित- संसद’ का चुनाव

 

सामान्य अध्ययन-III

1. निजी क्षेत्रक बैंक सुधार

2. कर्नाटक सरकार द्वारा ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ का अवर्गीकरण

3. इनर लाइन परमिट (ILP)

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. तुंगभद्रा पुष्करालु

2. अंतर संसदीय संघ

3. बुकर पुरस्कार 2020

4. ऑस्ट्रेलिया द्वारा अस्थायी तौर पर इसरो उपग्रह ट्रैकिंग सुविधाओं का प्रबंधन

5. भारत में ‘कट्टरता की स्थिति’ पर अध्ययन

6. विश्व मत्स्यन दिवस

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के प्रतीक चिह्नों पर निर्णय


संदर्भ:

हाल ही में, केरल उच्च न्यायालय द्वारा केरल कांग्रेस (एम) पी जे जोसेफ गुट, जो कि राज्य में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का एक भाग है, द्वारा दायर की गयी एक याचिका को खारिज कर दिया गया। याचिका में निर्वाचन आयोग द्वारा जोस के मणि गुट को आधिकारिक केरल कांग्रेस (एम) के तौर पर मान्यता देने और उसे पार्टी का चुनाव चिन्ह (दो पत्तियां) आवंटित करने संबंधी निर्णय को चुनौती दी गयी थी।

न्यायाधीश ने कहा है कि, अदालत, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के द्वारा प्रदत्त अधिकार के तहत आयोग के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।

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राजनीतिक दलों को प्रतीक चिन्हों का आवंटन

निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देशों के अनुसार- किसी राजनीतिक दल को चुनाव चिह्न का आवंटन करने हेतु निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है:

  • नामांकन पत्र दाखिल करने के समय राजनीतिक दल / उम्मीदवार को निर्वाचन आयोग की प्रतीक चिह्नों की सूची में से तीन प्रतीक चिह्न प्रदान किये जाते हैं।
  • उनमें से, राजनीतिक दल / उम्मीदवार को ‘पहले आओ-पहले पाओ’ आधार पर एक चुनाव चिह्न आवंटित किया जाता है।
  • किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के विभाजित होने पर, पार्टी को आवंटित प्रतीक/चुनाव चिह्न पर निर्वाचन आयोग द्वारा निर्णय लिया जाता है।

निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ:

चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करने और प्रतीक चिह्न आवंटित करने का अधिकार दिया गया है।

  • आदेश के अनुच्छेद 15 के तहत, निर्वाचन आयोग, प्रतिद्वंद्वी समूहों अथवा किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के गुटों द्वारा पार्टी के नाम तथा प्रतीक चिह्न संबंधी दावों के मामलों पर निर्णय ले सकता है।
  • निर्वाचन आयोग, राजनीतिक दलों के किसी विवाद अथवा विलय पर निर्णय लेने हेतु एकमात्र प्राधिकरण भी है। सर्वोच्च न्यायालय ने सादिक अली तथा अन्य बनाम भारत निर्वाचन आयोग (ECI) मामले (1971) में इसकी वैधता को बरकरार रखा।

चुनाव चिह्नों के प्रकार

चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) (संशोधन) आदेश, 2017 के अनुसार, राजनीतिक दलों के प्रतीक चिह्न निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं:

  1. आरक्षित (Reserved): देश भर में आठ राष्ट्रीय दलों और 64 राज्य दलों को ‘आरक्षित’ प्रतीक चिह्न प्रदान किये गए हैं।
  2. स्वतंत्र (Free): निर्वाचन आयोग के पास लगभग 200 ‘स्वतंत्र’ प्रतीक चिह्नों का एक कोष है, जिन्हें चुनावों से पहले अचानक नजर आने वाले हजारों गैर-मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दलों को आवंटित किया जाता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करने हेतु प्रक्रिया।
  2. राज्य दल और राष्ट्रीय दल क्या हैं?
  3. मान्यता प्राप्त दलों को प्राप्त लाभ।
  4. पार्टी प्रतीक चिह्न किसे कहते हैं? प्रकार क्या हैं?
  5. राजनीतिक दलों के विलय से जुड़े मुद्दों पर निर्णय कौन करता है?

मेंस लिंक:

राजनीतिक दलों को प्रतीक चिन्हों का आवंटन किस प्रकार किया जाता हैं? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन


(National Digital Health Mission)

संदर्भ:

केंद्र सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन’ को राष्ट्रीय स्तर पर आरंभ करने की तैयारी की जा रही है।

नवीन डिजिटल स्वास्थ्य कार्यक्रम का उद्देश्य सभी नागरिकों को सस्ती चिकित्सा स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

‘राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन’ की शुरुआत

स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को अपने संबोधन में, प्रधानमंत्री द्वारा ‘राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन’ की घोषणा की गयी थी।

इस योजना को प्रायोगिक पर चंडीगढ़, लद्दाख, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव, पुडुचेरी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप, केंद्र शासित प्रदेशों में शुरू गया था।

प्रमुख विशेषताऐं:

  1. यह एक डिजिटल स्वास्थ्य पारितंत्र है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक भारतीय नागरिक को एक यूनिक स्‍वास्‍थ्‍य पहचान पत्र दिया जायेगा जिसमे व्यक्ति के सभी डॉक्टरों के साथ-साथ नैदानिक परीक्षण और निर्धारित दवाओं का अंकीकृत स्वास्थ्य रिकॉर्ड (Digitised Health Records) सम्मिलित होगा।
  2. यह नई योजना आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत शुरू की जायेगी।
  3. इस योजना के छह प्रमुख घटक हैं – स्‍वास्‍थ्‍य पहचान पत्र (HealthID), डिजीडॉक्टर (DigiDoctor), स्वास्थ्य सुविधा रजिस्ट्री, व्यक्तिगत स्वास्थ्य रिकॉर्ड, ई-फार्मेसी और टेलीमेडिसिन।
  4. देश में इस मिशन के डिजाइन, निर्माण, तथा कार्यान्वयन का दायित्व राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (National Health Authority) को सौंपा गया है।
  5. मिशन के मुख्य घटकों, हेल्थ आईडी, डिजीडॉक्टर और स्वास्थ्य सुविधा रजिस्ट्री को भारत सरकार के स्वामित्व में रखा जाएगा तथा इनके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी भी भारत सरकार की होगी।
  6. निजी साझेदारों को बाजार के लिए अपने उत्पादों का निर्माण करने व समन्वय करने के लिए समान अवसर दिया जाएगा। हालांकि, मुख्य गतिविधियों तथा सत्यापन प्रक्रिया का अधिकार केवल सरकार के पास रहेगा।
  7. राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के तहत, प्रत्येक भारतीय को एक हेल्थ आईडी कार्ड दिया जाएगा जो हेल्थ अकाउंट के रूप में कार्य करेगा जिसमें व्यक्ति की पिछली चिकित्सा स्थितियों, उपचार और निदान के बारे में भी जानकारी सम्मिलित होंगी।
  8. परामर्श हेतु अस्पताल जाने पर, नागरिक अपने डॉक्टरों और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं के लिए इस डेटा के अवलोकन की अनुमति दे सकेंगे।

मिशन की आवश्यकता

इस मिशन का उद्देश्य नागरिकों के लिए सही डॉक्टरों को खोजने, मुलाकात के समय, परामर्श शुल्क का भुगतान करने, चिकत्सीय नुख्सों के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाने से मुक्ति दिलाना है। इसके साथ ही यह लोगों के लिए सर्वोत्तम संभव स्वास्थ्य सुविधायें प्राप्त करने के लिए एक सुविज्ञ निर्णय लेने में सक्षम बनायेगा।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन का अवलोकन
  2. मिशन के घटक
  3. प्रस्तावित राष्ट्रीय स्वास्थ्य पहचान पत्र
  4. स्वास्थ्य पहचान पत्र कौन जारी कर सकता है?
  5. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 की प्रमुख बिंदु।

मेंस लिंक:

राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

चापरे वायरस


(Chapre Virus)

संदर्भ:

हाल ही में, वैज्ञानिकों द्वारा एक और घातक वायरस की खोज की गयी है, जिसे बोलीविया में चापरे वायरस (Chapre Virus)  के रूप में जाना जाता है।

‘चापरे वायरस’ के बारे में:

यह, इबोला वायरस रोग (Ebola virus diseaseEVD) फ़ैलाने के लिए जिम्मेदार एरेनावायरस (Arenavirus) परिवार का वायरस है, जिसके कारण चापरे रक्तस्रावी बुखार (Chapare hemorrhagic fever CHHF) फैलता है।

इस वायरस सबसे पहले बोलीविया के ‘चापरे’ (Chapare) प्रांत में देखा गया था, इसीलिए इसे ‘चापरे वायरस’ नाम दिया गया है।

लक्षण:

इसका संक्रमण होने पर इबोला जैसा रक्तस्रावी बुखार (Hemorrhagic Fevers) और साथ में पेट दर्द, उल्टी, मसूड़ों से खून निकलने, त्वचा पर छाले आने और आंखों के अंदर दर्द, आदि लक्षण दिखाई देते हैं। वायरल रक्तस्रावी बुखार एक गंभीर और जानलेवा बीमारी होती है जिससे शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते है और यह रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है।

प्रसरण:

चापरे वायरस जैसे एरेनावायरस, आमतौर पर चूहों द्वारा फैलते है। यह वायरस, संक्रमित कृंतक जीवों के सीधे संपर्क, इनके मल या मूत्र के संपर्क में आने से, अथवा संक्रमित व्यक्ति के संपर्क से प्रसरित होता है।

चापरे रक्तस्रावी बुखार (CHHF) का उपचार

  • चूंकि अभी इस बीमारी का इलाज करने के लिए कोई विशिष्ट दवाएं उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए रोगियों को आमतौर पर इन्ट्रावेनस तरल पदार्थ (Intravenous Fluids) जैसे सहायक उपचार व देखभाल प्रदान की जाती है।
  • इसके उपचार में, रोगी के लिए, हाइड्रैशन (Hydration) को नियमित रखना, तरल पदार्थो को दिया जाना, बेहोश करने की प्रक्रिया, दर्द-निवारक, रक्त-आधान (Transfusions) आदि उपाय शामिल किये जाते हैं।

चापरे वायरस द्वारा उत्पन्न संकट

वैज्ञानिकों के अनुसार, कोरोनावायरस की तुलना में चापरे वायरस की पहचान करना अधिक कठिन है, क्योंकि यह श्वसन मार्ग से नहीं फैलता है। चापरे वायरस केवल तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आने से फैलता है।

  • इस बीमारी से, संक्रमित लोगों के निकट संपर्क में आने वाले परिवार के सदस्यों तथा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के संक्रमित होने के सर्वाधिक जोखिम रहता है।
  • इसके लिए आमतौर पर सबसे अधिक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में फैलने वाली बीमारी माना जाता है। यह विशेष रूप से दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में, जहां प्रायः छोटे कान वाले पिग्मी राइस चूहे पाए जाते हैं, इस बीमारी के फैलने का सबसे बड़ा खतरा है।

प्रीलिम्स और मेन्स लिंक:

  1. चापरे वायरस, प्रसार, उपचार और खतरे।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

विश्व भर में फैले तिब्बतियों द्वारा ‘निर्वासित- संसद’ का चुनाव


संदर्भ:

लगभग 1.3 लाख से अधिक तिब्बती निर्वासन (Exile) में रह रहे हैं तथा भारत और विश्व के एनी हिस्सों में बसे हुए हैं। इनके द्वारा मई 2021 में अपनी अगली ‘निर्वासित-संसद’ (Parliament-in-Exile) का चुनाव किया जाएगा।

तिब्बती निर्वासित-संसद (Tibetan Parliament-in-Exile: TPiE) का मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के धर्मशाला में स्थित है।

विदेशों में तिब्बती:

पूरे भारत में तिब्बती लोगों की संख्या 1 लाख से अधिक हैं, जबकि शेष तिब्बती संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, कोस्टा रिका, फ्रांस, मैक्सिको, मंगोलिया, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, स्विट्जरलैंड और विभिन्न अन्य देशों में बसे हुए हैं।

तिब्बती निर्वासित-संसद (TPiE) की संरचना:

तिब्बती निर्वासित-संसद के प्रमुख ‘स्पीकर’ और ‘डिप्टी स्पीकर’ होते हैं।

16वीं TPiE में 45 सदस्य हैं: जिनमे से:

  1. तिब्बती के प्रत्येक पारंपरिक प्रांत, यू-त्सांग (U-Tsang), धोतो (Dhotoe) और धोमे (Dhomey) के दस प्रतिनिधि;
  2. पूर्व-बौद्ध बॉन धर्म और तिब्बती बौद्ध धर्म के चार संप्रदायों में से प्रत्येक के दो प्रतिनिधि;
  3. उत्तरी अमेरिका और यूरोप, प्रत्येक में से, तिब्बती समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले दो प्रतिनिधि;
  4. आस्ट्रेलिया और एशिया से (भारत, नेपाल और भूटान को छोड़कर) एक प्रतिनिधि, सम्मिलित है।

तिब्बती संविधान

तिब्बती लोगों का केंद्रीय प्रशासन, तिब्बती सरकार के संविधान के आधार पर कार्य करता है जिसे निर्वासित तिब्बतियों का चार्टर  (The Charter of the Tibetans in Exile) कहा जाता है।

  • वर्ष 1991 में, दलाई लामा द्वारा गठित संविधान पुनर्निर्माण समिति द्वारा निर्वासित तिब्बतियों के लिए चार्टर तैयार किया गया था।
  • 28 जून, 1991 को इस संविधान के लिए दलाई लामा द्वारा मंजूरी दी गई।

वोट देने का अधिकार

केवल भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर रहने वाले तिब्बती अपने वर्तमान भौगोलिक स्थान के आधार पर अपने सांसदों का चुनाव करेंगे। वे सांसदों के अलावा, अपनी पसंद का एक अध्यक्ष भी चुन सकते हैं।

चुनाव प्रक्रिया:

तिब्बती निर्वासित-संसद के लिए मतदान दो दौरों में किया जाएगा।

  • प्रारंभिक दौर में, कोई आधिकारिक उम्मीदवार नहीं होगा, अर्थात मतदाता अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को चुन सकता है, जो संभावित उम्मीदवारों में से एक होगा और मतदाताओं के बीच प्रचार करेगा।
  • पहले दौर में 60 प्रतिशत मत हासिल करने वाले शीर्ष दो उम्मीदवारों को 11 अप्रैल को होने वाले दूसरे दौर के चुनावों के लिए आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया जाएगा।

‘कशाग’ (Kashag) क्या होता है?

कशाग (मंत्रिमंडल) केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का सर्वोच्च कार्यकारी कार्यालय होता है और इसमें सात सदस्य होते हैं।

इसका नेतृत्व सिक्योंग (Sikyong) अर्थात राजनीतिक नेता, द्वारा किया जाता है। सिक्योंग को सीधे निर्वासित तिब्बती आबादी द्वारा चुना जाता है।

  • बाद में, सिक्योंग द्वारा सात कलोन (Kalons) अर्थात मंत्रियों को नामित किया जाता है और इसके लिए संसद की मंजूरी प्राप्त की जाती है।
  • कशाग का कार्यकाल पाँच वर्षों का होता है।

तिब्बती निर्वासित-संसद (TPiE) के लिए विश्व के देशों द्वारा आधिकारिक मान्यता

तिब्बती निर्वासित-संसद (TPiE) के लिए भारत सहित विश्व के किसी भी देश देश द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है।

  • हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों सहित कई अन्य देश विभिन्न मंचों के माध्यम से सीधे सिक्योंग और अन्य तिब्बती नेताओं के साथ संवाद किया जाता है।
  • TPiE का दावा है कि लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया से तिब्बती मामलों का प्रबंधन करने और विश्व भर में तिब्बती मुद्दों को उठाने में मदद मिलती है।
  • वर्तमान सिक्योंग, लोबसांग सांगे, मई 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने वाले अतिथियों में सम्मिलित थे और संभवतः पहले तिब्बती प्रमुख थे।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

निजी क्षेत्रक बैंक सुधार


(Private sector banks reforms)

संदर्भ:

भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा भारतीय निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए वर्तमान स्वामित्व दिशानिर्देशों और कॉर्पोरेट संरचना की समीक्षा करने के लिए एक आंतरिक कार्य समूह (Internal Working GroupIWG) का गठन किया गया था।

इसकी अध्यक्षता आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड के निदेशक डॉ. प्रसन्न कुमार मोहंती द्वारा की गयी थी।

आंतरिक कार्य समूह हेतु संदर्भ शर्तें (Terms Of Reference):

  1. बैंकिंग लाइसेंस के लिए आवेदन करने के लिए व्यक्तियों / संस्थाओं के लिए पात्रता मानदंड की समीक्षा;
  2. बैंकों के लिए अधिमान्य कॉर्पोरेट संरचना की जांच और इस संबंध में मानदंडों का सामंजस्य;
  3. प्रवर्तकों और अन्य शेयरधारकों द्वारा बैंकों में दीर्घावधि शेयरधारिता के मानदंडों की समीक्षा करना।

आंतरिक कार्य समूह (IWG) द्वारा हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की गयी हैं।

मुख्य सिफारिशें:

  1. लंबी अवधि (15 वर्ष) में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी पर निर्धारित सीमा को वर्तमान स्तर से बढ़ाकर 26 प्रतिशत किया जा सकता है।
  2. बड़े कॉरपोरेट / औद्योगिक घरानों को बैंककारी विनियमन अधिनियम (Banking Regulation Act), 1949 में आवश्यक संशोधन के बाद ही, (बैंकों और अन्य वित्तीय और गैर-वित्तीय समूह संस्थाओं के बीच जुड़े हुए उधार और जोखिम को रोकने के लिए) बैंकों के प्रवर्तकों के रूप में अनुमति दी जा सकती है।
  3. समेकित पर्यवेक्षण सहित बड़े समूहों के लिए पर्यवेक्षी तंत्र को मजबूत करना।
  4. अच्छी तरह से चल रही बड़ी गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियाँ (NBFCs), जिनकी परिसंपत्ति का आकार ₹50,000 करोड़ या उससे अधिक है, जिनमें कॉरपोरेट घराने के स्वामित्व वाले भी शामिल हैं, को बैंकों में रूपांतरण के लिए विचार किया जा सकता है बशर्ते परिचालन के 10 वर्ष पूर्ण हुए हो तथा निर्धारित मानदंडों का अनुपालन और इस संबंध में निर्दिष्ट अतिरिक्त शर्तों का अनुपालन किया जा रहा हो।
  5. गैर-प्रवर्तक शेयरधारिता के संबंध में, सभी प्रकार के शेयरधारकों के लिए बैंक की प्रदत्त वोटिंग इक्विटी शेयर पूंजी का 15 प्रतिशत का एक समान सीमा निर्धारित की जा सकती है।
  6. भुगतान बैंकों, जो एक लघु वित्त बैंक (Small Finance BankSFB) में परिवर्तित होने का इरादा रखते हैं, के लिए , भुगतान बैंक के रूप में 3 वर्षों के अनुभव का ट्रैक रिकॉर्ड पर्याप्त माना जा सकता है।
  7. लघु वित्त बैंक और भुगतान बैंक ‘सार्वभौमिक बैंकों के लिए निर्धारित मौजूदा प्रविष्टि पूंजीगत अपेक्षाओं के बराबर निवल संपत्ति तक पहुँचने की तारीख से 6 वर्ष’ के भीतर या ‘परिचालन शुरू होने की तारीख से 10 वर्ष’, जो भी पहले हो सूचीबद्ध हो सकते हैं।
  8. नए बैंकों को लाइसेंस देने के लिए न्यूनतम प्रारंभिक पूंजीगत अपेक्षाओं को सार्वभौमिक बैंकों के लिए ₹500 करोड़ से ₹1000 करोड़ और छोटे वित्त बैंकों के लिए ₹200 करोड़ से ₹300 करोड़ तक बढ़ाया जाना चाहिए।
  9. परिचालनेतर वित्तीय धारक कंपनी (Non-operative financial holding companyNOFHC) को सार्वभौमिक बैंकों के लिए जारी किए जाने वाले सभी नए लाइसेंसों के लिए अधिमान्य संरचना के रूप में बने रहना चाहिए।
  10. वर्तमान में NOFHC संरचना के अंतर्गत आने वाले बैंकों को ऐसी संरचना से बाहर निकलने की अनुमति दी जा सकती है यदि उनके पास अन्य समूह संस्थाएं नहीं हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भुगतान बैंक क्या हैं?
  2. NBFC क्या हैं?
  3. SFB क्या हैं?
  4. IWG द्वारा की गई प्रमुख सिफारिशें।

मेंस लिंक:

आंतरिक कार्य समूह (IWG) द्वारा की गयी सिफारिशों के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

कर्नाटक सरकार द्वारा ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ का अवर्गीकरण


संदर्भ:

कर्नाटक सरकार द्वारा राज्य में 9.94 लाख हेक्टेयर ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ (Deemed Forests) के रूप में वर्गीकृत वनों के 6.64 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को अवर्गीकृत करने और इसे राजस्व अधिकारियों को सौंपने की योजना बनाई जा रही है। राज्य के कुल वन क्षेत्र में लगभग 67% ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ है।

पृष्ठभूमि:

कर्नाटक में ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ (Deemed Forests) एक विवादास्पद मुद्दा है। यहाँ अक्सर सभी राजनीतिक दलों के नेता, बड़ी मात्रा में कृषि और गैर-वन भूमि को ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ के रूप में ‘अवैज्ञानिक’ रूप से वर्गीकृत किए जाने संबंधी आरोप लगाते रहते हैं।

‘डीम्ड फॉरेस्ट’ क्या होते है?

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश (टी एन गोडवर्मन थिरुमलापाद (1996) मामले में) के बाद कर्नाटक सरकार द्वारा एक विशेषज्ञ समिति गठित की गयी थी। समिति द्वारा वनों की विशेषता रखने वाली समस्त भूमि को ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ के रूप में निर्धारित किया गया, चाहे इस भूमि पर मालिकाना हक़ किसी का भी हो।

‘डीम्ड फॉरेस्ट’ के रूप में निम्न प्रकार की भूमियों को सम्मिलित किया गया है:

  • राजस्व विभाग के अधीन तथा वन विभाग को नहीं सौंपे गए घने वन क्षेत्र।
  • वे घने वन क्षेत्र, जिन्हें वन विभाग को सौंपने की सिफारिश की गई है।
  • अनुदान के रूप में दी गयी परंतु अकृषित घने वनों वाली भूमि।
  • वन विभाग द्वारा किया गया घने वन वृक्षारोपण क्षेत्र।

‘वनों’ की परिभाषा

टी एन गोडवर्मन थिरुमलापाद (1996) मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा वन संरक्षण अधिनियम के तहत ‘वनों’ की एक व्यापक परिभाषा को स्वीकार की गई।

अदालत ने कहा है, कि, वन(Forest) शब्द को शब्दकोश में दिए गए अर्थ के अनुसार समझा जाना चाहिए।

  • इसके तहत, वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त, आरक्षित (Reserved), संरक्षित (Protected) अथवा वन संरक्षण अधिनियम की धारा 2 (1) के प्रयोजन हेतु निर्दिष्ट, सभी प्रकार के वन सम्मिलित होते है।
  • इसके अतिरिक्त, सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज सभी क्षेत्र ‘वन’ की परिभाषा के अंतर्गत आते है, चाहे इन पर स्वामित्व किसी का भी हो।

कर्नाटक सरकार की इस घोषणा के पश्चात आगे की कार्यवाही

  • टी एन गोडवर्मन थिरुमलापाद (1996) मामले के बाद से, भारत में वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत वन क्षेत्रों के संरक्षण की निगरानी उच्चतम न्यायालय द्वारा लगातार की जा रही है।
  • कर्नाटक राज्य सरकार के लिए वनों के रूप में वर्गीकृत भूमि के परिवर्तन को लागू करने हेतु उच्चतम न्यायालय से मंजूरी लेनी होगी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. वनों की परिभाषा
  2. ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ क्या होते हैं?
  3. इन्हें किस प्रकार वर्गीकृत किया जाता है?

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: आंतरिक सुरक्षा के लिये चुनौती उत्पन्न करने वाले शासन विरोधी तत्त्वों की भूमिका।

इनर लाइन परमिट (ILP)


(Inner Line Permit)

संदर्भ:

मेघालय-स्थित सात संगठनों द्वारा राज्य में प्रवेश करने हेतु ब्रिटिश-कालीन इनर-लाइन परमिट (Inner Line Permit ILP) को लागू करने और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (Citizenship (Amendment) Act) को रद्द करने के लिए अपने आंदोलन को फिर से तीव्र किया गया है।

इनर लाइन परमिट (ILP) क्या है?

इनर लाइन परमिट, गैर-मूल निवासियों के लिए ILP प्रणाली के अंतर्गत संरक्षित राज्य में प्रवेश करने अथवा ठहरने हेतु आवश्यक दस्तावेज होता है।

वर्तमान में, पूर्वोत्तर के चार राज्यों, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड में ILP प्रणाली  लागू है।

  • इनर लाइन परमिट के द्वारा, किसी गैर-मूल निवासी के लिए, राज्य में ठहरने की अवधि तथा भ्रमण करने के क्षेत्र को निर्धारित किया जाता है।
  • ILP को संबंधित राज्य सरकार द्वारा जारी किया जाता है और इसे ऑनलाइन या व्यक्तिगत रूप से आवेदन करके प्राप्त किया जा सकता है।

इसे कब लागू किया गया था?

इनर लाइन परमिट, बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन एक्ट 1873 का एक विस्तार है।

  • अंग्रेजों द्वारा कुछ निर्दिष्ट क्षेत्रों में प्रवेश को प्रतिबंधित करने वाले नियमों को बनाया गया था।
  • ये नियम, ब्रिटिश शासन के हितों की सुरक्षा हेतु कुछ राज्यों में ‘ब्रिटिश प्रजा’ अर्थात भारतीयों को इन क्षेत्रों में व्यापार करने से रोकने हेतु बनाए गए थे।
  • वर्ष 1950 में, ‘ब्रिटिश प्रजा’ शब्द को ‘भारत के नागरिकों’ के साथ बदल दिया गया।
  • वर्तमान में, सभी गैर-मूल निवासियों के लिए इन क्षेत्रों में प्रवेश करने के लिए परमिट की आवश्यकता होती है। यह नियम, इन राज्यों के स्थानीय आदिवासी समुदायों को शोषण से बचाने के लिए आज भी जारी हैं।

विदेशियों के संदर्भ में

इनर लाइन परमिट, केवल घरेलू पर्यटकों के लिए मान्य होता है। विदेशी पर्यटकों के लिए:

  • मणिपुर: कोई परमिट की आवश्यकता नहीं है। लेकिन, खुद को रजिस्टर करना होगा।
  • मिजोरम: कोई परमिट की आवश्यकता नहीं है। लेकिन, पंजीकरण करने की आवश्यकता है।
  • नागालैंड: कोई परमिट की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, उनके लिए पंजीकरण करने की आवश्यकता है।
  • अरुणाचल प्रदेश: पर्यटकों को भारत सरकार के गृह मंत्रालय से एक संरक्षित क्षेत्र परमिट (Protected Area Permit- PAP) या प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट (Restricted Area Permit- RAP) की आवश्यकता होती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. यात्रा करने हेतु इनर लाइन परमिट की अनिवार्यता वाले राज्य
  2. उत्तर-पूर्वी राज्यों से जुड़े मानचित्र आधारित प्रश्नों पर ध्यान दें
  3. पूर्वोत्तर राज्य और उनके अंतर्राष्ट्रीय पड़ोसी

मेंस लिंक:

भारत के पूर्वोत्तर  राज्यों में इनर लाइन परमिट (ILP) प्रणाली को लागू करने संबंधी मुद्दे और इस प्रणाली द्वारा भारत सरकार के समक्ष पेश की गयी दुविधा का विश्लेषण कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


तुंगभद्रा पुष्करालु

(Tungabhadra Pushkaralu)

तुंगभद्रा पुष्करालु, तुंगभद्रा नदी के सम्मान में आयोजित किया जाने वाला 12 दिवसीय त्योहार है।

  • इसे बृहस्पति के मकर राशी में प्रवेश करने पर मनाया जाता है।
  • तुंगभद्रा पुष्करालु प्रत्येक 12 वर्षो में एक बार आयोजित किया जाता है। और ऐसा मन जाता है, कि इस अवसर पर पवित्र नदी में स्नान करने से पाप-मुक्ति हो जाती है।
  • पुष्करालु या पुष्करम देश भर में प्रवाहित होने वाली 12 प्रमुख नदियों की पूजा के लिए समर्पित एक धार्मिक त्योहार है।

अंतर संसदीय संघ

(Inter-Parliamentary Union-IPU)

अंतर संसदीय संघ (IPU) राष्ट्रीय संसदों का वैश्विक संगठन है।

  • उत्पत्ति: वर्ष 1889 में सांसदों के एक छोटे समूह के रूप में स्थापना की गयी थी। इसका उद्देश्य संसदीय कूटनीति और बातचीत के माध्यम से शांति को बढ़ावा देना था।
  • संरचना: इसमें विश्व के विभिन्न देशों की 179 संसदें, 13  सहयोगी सदस्य, और समूह के उद्देश्य के प्रति अभिरुचि रखने वाले दुनिया भर के सांसद सम्मिलित है।
  • IPU का नारा है: “लोकतंत्र के लिए, सभी के लिए।” (For democracy. For everyone)
  • मुख्यालय: जिनेवा, स्विट्जरलैंड में हैं।

चर्चा का कारण

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक, गिरीश चंद्र मुर्मू को तीन साल के कार्यकाल के लिए अंतर संसदीय संघ (IPU), जिनेवा का बाहरी लेखा परीक्षक चुना गया है।

बुकर पुरस्कार 2020

स्कॉटिश लेखक डगलस स्टुअर्ट को उनके पहले और प्रसिद्ध उपन्यास शग्गी बैन (Shuggie Bain) के लिए वर्ष 2020 के बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। शग्गी बैन’ की कहानी इनके गृहनगर ग्लासगो की पृष्ठभूमि पर आधारित है।

  • बुकर पुरस्कार अंग्रेजी भाषा का अग्रणी साहित्यिक पुरस्कार है।
  • यह पुरस्कार, अंग्रेजी भाषा की अथवा अंग्रेजी में अनुवादित तथा यूनाइटेड किंगडम या आयरलैंड में प्रकाशित किसी एक पुस्तक के लिए प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है।

ऑस्ट्रेलिया द्वारा अस्थायी तौर पर इसरो उपग्रह ट्रैकिंग सुविधाओं का प्रबंधन

भारत और ऑस्ट्रेलिया की अंतरिक्ष एजेंसियां ​​ऑस्ट्रेलिया में अस्थायी रूप से भारतीय ट्रैकिंग सुविधाओं को उपयुक्त स्थानों पर स्थापित करने हेतु मिलकर काम कर रही हैं।

  • इन ट्रैकिंग सुविधाओं में, पृथ्वी निगरानी और डेटा एनालिटिक्स, रोबोटिक्स, और अंतरिक्ष जीवन विज्ञान आदि सम्मिलित हैं।
  • इससे भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम को सहायता मिलगी।
  • भारत-ऑस्ट्रेलिया अंतरिक्ष सहयोग के लिए वर्ष 2012 में दोनों देशों के मध्य औपचारिक समझौता ज्ञापन हस्ताक्षरित किया गया था।

भारत में ‘कट्टरता की स्थिति’ पर अध्ययन

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पहली बार, “भारत में कट्टरता की स्थिति” पर एक शोध अध्ययन को मंजूरी दी है।

  • यह अध्ययन कानूनी रूप से “कट्टरता” (Radicalisation) को परिभाषित करने और गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) में संशोधन का सुझाव देगा।
  • यह अध्ययन धर्म-तटस्थ होगा और तथ्यों और इसके तहत दर्ज किए गए मामलों की जाँच की जाएगी।
  • आवश्यकता: कट्टरता को अभी तक कानूनी रूप से परिभाषित किया जाना बाकी है, इससे पुलिस का दुरुपयोग होता है, इसके अलावा यह UAPA के लिए आवश्यक संशोधन हेतु सुझावों की भी आवश्यकता है।

विश्व मत्स्यन दिवस

(World Fisheries Day)

संपूर्ण विश्व में सभी मछुआरों, मछली पालकों और संबंधित हितधारकों के साथ एकजुटता को प्रदर्शित करने के लिये प्रत्येक वर्ष 21 नवंबर को विश्व मत्स्य दिवस मनाया जाता है।

इसकी शुरुआत वर्ष 1997 में, नई दिल्ली में आयोजित ‘वर्ल्ड फोरम ऑफ फिश हार्वेस्टर्स एंड फिश वर्कर्स’ (World Forum of Fish Harvesters and Fish Workers) की बैठक में की गयी थी। इस बैठक में 18 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था और एक ‘विश्व मत्स्य मंच’ (World Fisheries Forum-WFF) का गठन किया गया था।


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