Print Friendly, PDF & Email

INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 18 November

 

विषय – सूची

 सामान्य अध्ययन-I

1. ब्रू शरणार्थियों द्वारा अवस्थापन समझौते के तत्काल कार्यान्वयन की मांग

2. हरिकेन आयोटा

 

सामान्य अध्ययन-II

1. अनुच्छेद 32 और बीते वर्षो में उच्चतम न्यायालय द्वारा इसकी व्याख्या

2. ऑनलाइन शिक्षा की समस्यायों पर एक अध्ययन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. भारतीय रिजर्व बैंक की ऋण पुनर्गठन योजना

2. उच्चत्तम न्यायालय द्वारा केंद्र से फर्जी खबरों पर नियंत्रण व्यवस्था संबंधी पूछतांछ

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. अनुच्छेद 363-A

2. क्विक रिएक्शन सरफेस टू एयर मिसाइल (QRSAM)

3. लीलावती पुरुस्कार 2020 का शुभारंभ

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: सामाजिक सशक्तीकरण, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद और धर्मनिरपेक्षता।

ब्रू शरणार्थियों द्वारा अवस्थापन समझौते के तत्काल कार्यान्वयन की मांग


(Bru refugees demand immediate implementation of settlement pact)

संदर्भ:

जनवरी 2020 में केंद्र सरकार द्वारा ब्रू शरणार्थियों की समस्या के स्थायी समाधान के लिए एक ऐतिहासिक चतुष्पक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। मिजोरम ब्रू शरणार्थियों (Mizoram Bru Refugees) के नेताओं द्वारा समझौते के प्रावधानों के अनुसार त्रिपुरा में अपने स्थायी पुनर्वास की शुरूआत किए जाने की मांग की जा रही है।

इसमें देरी का कारण

सरकार द्वारा ब्रू शरणार्थियों को बसाने के लिए उत्तरी त्रिपुरा में कंचनपुर प्रखंड सहित 12 स्थानों का चयन किया गया था। वर्ष 1997 से ब्रू शरणार्थी कंचनपुर प्रखंड में छह अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं। फिर भी, संयुक्त आंदोलन (Joint Movement) नामक एक स्थानीय मंच द्वारा शरणार्थियों को बसाने के फैसले का विरोध किया जा रहा है।

ब्रू- रेयांग शरणार्थी समझौते के बारे में:

23 वर्ष पुराने ब्रू- रेयांग शरणार्थी संकट को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार, त्रिपुरा सरकार, मिज़ोरम सरकार और ब्रू प्रतिनिधियों के मध्य जनवरी 2020 में एक समझौता किया गया था, जिसके तहत त्रिपुरा में शरणार्थी के रूप में रह रहे ब्रू-जनजातीय समुदायों को त्रिपुरा में ही बसाने की बात की गई थी।

समझौते की प्रमुख विशेषताएं:

  1. इस समझौते के तहत, केंद्र सरकार द्वारा 600 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की गयी।
  2. समझौते के अनुसार ब्रू जनजातियों को त्रिपुरा में बसने के लिए जमीन प्रदान की जाएगी।
  3. सरकारी सहायता राशि के रूप में प्रत्येक परिवार के लिए 4 लाख रु. की राशि उनके बैंक खातों में जमा की जायेगी, इस राशि को वे दो साल बाद निकाल सकेंगे।
  4. प्रत्येक विस्थापित परिवार को 40 × 30 वर्ग फुट के आवासीय भूखंड प्रदान किये जाएंगे।
  5. इसके अलावा, प्रत्येक परिवार को दो वर्ष तक प्रति माह 5,000 रु. की नकद राशि प्रदान की जायेगी।
  6. इस समझौते में प्रत्येक विस्थापित परिवार को दो साल के लिए मुफ्त राशन तथा अपना घर बनाने के लिए 5 लाख रु. की सहायता राशि दी जायेगी।

 समझौते की आवश्यकता:

मिजोरम में वर्ष 1997 से जातीय हिंसा जारी है, इससे बचने के लिए 30,000 से अधिक ब्रू-जनजातीय के सदस्यों ने त्रिपुरा में शरण ली हुई है।

ब्रू-रेयांग शरणार्थी समझौता, त्रिपुरा में हजारों ब्रू-रेयांग लोगों के पुनर्वास हेतु एक स्थायी समाधान प्रदान करेगा। इसके कार्यान्वयन के पश्चात ब्रू-रेयांग समुदाय सरकार की सभी सामाजिक-कल्याण योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे।

ब्रू जनजाति

ब्रू अथवा रेयांग (Bru or Reang) जनजातीय समुदाय है, जो पूर्वोत्तर भारत के मूल निवासी हैं तथा मुख्यतः त्रिपुरा, मिज़ोरम और असम में विस्तृत हैं।

  • त्रिपुरा में, इन्हें ‘विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह’ (Particularly Vulnerable Tribal Groups- PVTG) का दर्जा दिया गया है।
  • मिजोरम में, मिज़ो समुदायों के लोग ब्रू जनजाति के लोगों को बाहरी अथवा विदेशी मानते हैं, तथा इन्हें जातीय हिंसा का शिकार बनाते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ब्रू कौन हैं?
  2. ब्रू समुदायों का संकट क्या है?
  3. इन्हें कहाँ बसाया जा रहा है?
  4. शांति समझौते की प्रमुख विशेषताएं क्या है?
  5. शांति समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता
  6. PVTG के बारे में

मेंस लिंक:

सफलतापूर्वक प्रत्यावर्तन और दीर्घकालिक समाधान के लिए मिजो और ब्रू समुदायों के बीच सुलह आवश्यक है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ आदि।

हरिकेन आयोटा


(Hurricane Iota)

संदर्भ:

हाल ही में, हरिकेन आयोटा (Hurricane Iota) के कारण मध्य अमेरिका के निकारागुआ में भारी भूस्खलन हुआ है और यह पांचवी श्रेणी (Category Five) का तूफ़ान बन चुका है।

हरिकेन आने की अवधि

अटलांटिक क्षेत्र में हरिकेन (Hurricanes) आने का मौसम जून से नवंबर तक जारी रहता है और यह अटलांटिक महासागर, कैरेबियन सागर और मैक्सिको की खाड़ी क्षेत्रों में आते है, जबकि पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में हरिकेन आने का मौसम 15 मई से 30 नवंबर तक रहता है।

  • हरिकेन को सैफिर-सिंपसन विंड स्केल (Saffir-Simpson Hurricane Wind Scale) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। इसमें हवा की गति के आधार पर 1 से 5 तक की रेटिंग दी जाती है।
  • तीसरी श्रेणी अथवा उससे अधिक तीव्रता वाले हरिकेन को ‘प्रमुख हरिकेन अथवा विनाशकारी हरिकेन’ कहा जाता है क्योंकि इनकी वजह से जान-माल की अपार क्षति होती है।

हरिकेन की उत्पत्ति किस प्रकार होती है?

उष्णकटिबंधीय चक्रवात अथवा हरिकेन, उष्ण व आद्र वायु को ईंधन के रूप इस्तेमाल करते है, और इसलिए अधिकांशतः भूमध्य रेखा के निकट उष्ण सागरीय जल के ऊपर निर्मित होते हैं।

  • नासा के अनुसार- जब उष्ण व आद्रतायुक्त हवा समुद्र की सतह से ऊपर की ओर उठती है, तो इसके नीचे की ओर निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है।
  • आसपास की हवा इस निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर तेजी से बढ़ती है, और अंततः गर्म और आद्र होकर ऊपर उठ जाती है।
  • जब गर्म हवा ऊपर उठ कर ठंडी होती है, तो इसमें उपस्थित आद्रता बादलों का निर्माण करती है। बादलों और हवाओं की यह प्रणाली तेजी से विकसित होकर चक्कर काटने लगती है, और इसे सागरीय ऊष्मा और उसकी सतह से वाष्पित होने वाला जल इस प्रक्रिया में ईधन का कार्य करता है।
  • जैसे ही इस प्रकार निर्मित चक्रवात प्रणाली तीव्रता से घूमती है, इसके केंद्र में एक आंख (Eye) बन जाती है।
  • भूमध्य रेखा के उत्तर की ओर बनने वाले चक्रवात वामावर्त दिशा (counterclockwise) में घूमते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के दक्षिण में बनने वाले चक्रवात, पृथ्वी के घूर्णन के कारण दक्षिणावर्त दिशा (clockwise) में घूमते हैं।

हरिकेन और उष्णकटिबंधीय चक्रवात में क्या अंतर होता है?

इनमें कोई फर्क नही होता है। इनकी उत्पत्ति-स्थल के आधार पर हरिकेन को टाइफून अथवा चक्रवात कहा जा सकता है।

  • नासा के अनुसार, इस प्रकार के सभी तूफानों को वैज्ञानिक शब्दावली में उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones) कहा जाता है।
  • अटलांटिक महासागर या पूर्वी प्रशांत महासागर के ऊपर बनने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को हरिकेन कहा जाता है और उत्तर-पश्चिमी प्रशांत महासागर में निर्मित चक्रवातो को टाइफून कहा जाता है।
  • बंगाल की खाड़ी या अरब सागर में निर्मित चक्रवातों को ‘चक्रवात’ (Cyclones) कहा जाता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. हरिकेन की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार कारक
  2. विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में चक्रवात / हरिकेन का नामकरण
  3. भारत के पूर्वी तट में अधिक चक्रवात आने का कारण
  4. कोरिओलिस बल क्या होता है?
  5. ‘संघनन की गुप्त ऊष्मा’ क्या होती है?

मेंस लिंक:

उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार कारकों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

अनुच्छेद 32 और बीते वर्षो में उच्चतम न्यायालय द्वारा इसकी व्याख्या


संदर्भ:

हाल ही में, भारत के मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कहा है कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करने को हतोत्साहित करने की कोशिश कर रहे हैं।

अनुच्छेद 32 क्या है?

संविधान का अनुच्छेद 32  संवैधानिक उपचारों के अधिकार’ से संबंधित है, तथा संविधान के भाग तीन में प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन हेतु उपयुक्त प्रक्रिया द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में समावेदन करने का अधिकार प्रदान करता है।

इसमें कहा गया है, कि संविधान के भाग तीन द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी को प्रवर्तित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय को ऐसे निदेश अथवा आदेश या रिट, जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) और उत्प्रेषण (Certiorari) रिट शामिल हैं, जो भी समुचित हो, जारी करने की शक्ति होगी।

प्रमुख बिंदु:

  • इस संविधान द्वारा अन्यथा प्रावधान किए जाने के सिवाय, इस अनुच्छेद द्वारा प्रत्याभूत अधिकारों को निलंबित नहीं किया जाएगा।
  • केवल इन मौलिक अधिकारों के उल्लंघन किए जाने पर कोई व्यक्ति अनुच्छेद 32 के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

क्या मूल अधिकारों के उल्लंघन संबंधी मामलों में उच्च न्यायालय से संपर्क किया जा सकता है?

सिविल या आपराधिक मामलों में, किसी पीड़ित व्यक्ति के लिए उपलब्ध सबसे पहला उपाय ट्रायल कोर्ट होते हैं, उसके बाद उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय में अपील की जाती है।

  • मूल अधिकारों के उल्लंघन संबंधी मामलों में पीड़ित व्यक्ति अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय अथवा अनुच्छेद 32 के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है।
  • अनुच्छेद 226, हालाँकि, अनुच्छेद 32 की भांति मूल अधिकारों से संबंधित नहीं है।

अनुच्छेद 32 पर उच्चतम न्यायालय द्वारा की गयी हाल ही में की गयी टिप्पणियां

रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गयी टिप्पणी में कहा गया, कि अनुच्छेद 32 मूल अधिकारों के प्रवर्तन हेतु ‘प्रत्याभूत’ उपाय प्रदान करता है।

  • यह अनुच्छेद, इस अदालत को मूल अधिकारों के रक्षक और प्रत्याभूति प्रदाता के रूप में अधिकार प्रदान करता है, और यह अदालत, सौंपे गए उत्तरदायित्वों सहित, मूल अधिकारों के उल्लंघन किये जाने के विरुद्ध सुरक्षा की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने से लगातार इंकार नहीं कर सकता है।
  • अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट जबलपुर बनाम एस एस शुक्ला (1976) मामले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि आपातकाल के दौरान, नागरिकों को अनुच्छेद 32 के तहत अदालत में अपील करने का अधिकार रद्द हो जाता है।

संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह अंततः उच्चतम न्यायालय और इसके न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर करता है कि, जिस मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय में भी की जा सकती है, उस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप किया जाये अथवा नहीं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. रिट के प्रकार
  2. सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के रिट संबंधी क्षेत्राधिकार
  3. अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के बारे में
  4. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार

मेंस लिंक:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

ऑनलाइन शिक्षा की समस्यायों पर एक अध्ययन


संदर्भ:

हाल ही में, अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा ई-लर्निंग की प्रभावकारिता और इस तक पहुंच पर एक अध्ययन किया गया था।

  • इस अध्ययन के दौरान ऑनलाइन शिक्षा के संबंध में बच्चों और शिक्षकों के अनुभव की जांच की गयी।
  • ‘ऑनलाइन शिक्षा के मिथक’ (Myths of Online Education) शीर्षक से यह अध्ययन पाँच राज्यों के 26 जिलों में किया गया तथा इसमें 1,522 स्कूलों को कवर किया गया था।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले 60% से अधिक उत्तरदाताओं (Respondents) को ऑनलाइन शिक्षा उपलब्ध नहीं हुई थी।
  • ऑनलाइन कक्षाओं के लिए स्मार्टफोन की गैर-उपलब्धता और अपर्याप्त संख्या, और ऑनलाइन पढाई के लिए ऐप्स का उपयोग करने में कठिनाई, छात्रों के ऑनलाइन कक्षाओं में नहीं पहुंचने के सबसे महत्वपूर्ण कारण थे।

अध्ययन रिपोर्ट में व्यक्त की गयी चिंताएं

  • विकलांग बच्चों के ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेना सबसे कठिन था।
  • विकलांग बच्चों के साथ काम करने वाले 90% शिक्षकों ने अपने छात्रों को ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेने में असमर्थ पाया।
  • सर्वेक्षण में शामिल लगभग 70% माता-पिता की राय थी कि ऑनलाइन कक्षाएं प्रभावी नहीं थीं और इनके द्वारा उनके बच्चे की पढाई में कोई मदद नहीं मिली।
  • सर्वेक्षण में शामिल 80% से अधिक शिक्षकों के अनुसार, वे ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान छात्रों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखने में असमर्थ थे, जबकि 90% शिक्षकों ने महसूस किया कि बच्चों की पढाई का कोई सार्थक मुल्यांकन संभव नहीं था।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

भारतीय रिजर्व बैंक की ऋण पुनर्गठन योजना


(RBI’s debt restructuring scheme)

संदर्भ:

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के अनुसार, इसके द्वारा रेटिंग की जाने वाली 99% प्रतिशत कंपनियों द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की एकमुश्त ऋण-पुनर्गठन (One-Time Debt Restructuring OTDR) का विकल्प चुनने की संभावना नहीं है।

  • यह निष्कर्ष 3,523 गैर-सूक्ष्म लघु और मध्यम उद्यम (MSME) कंपनियों के प्रारंभिक विश्लेषण पर आधारित है।
  • के वी कामथ समिति (KV Kamath committee) द्वारा प्रस्तावित मापदंडों के आधार पर रेटिंग की गयी दो-तिहाई संस्थाएं पुनर्गठन के लिए पात्र हैं, इसके बावजूद भी यह स्थिति है।

क्रिसिल के अनुसार, कारोबारी धारणा में सुधार और इसमें क्रमिक बहाली से इस सुविधा का लाभ उठाने की जरूरत कम हो गयी है।

पृष्ठभूमि:

इस वर्ष अगस्त में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा कोविड-19 महामारी से प्रभावित ऋणों के पुनर्गठन पर के वी कामथ (KV Kamath) की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था।

इस समिति को कॉर्पोरेट ऋणों के एकमुश्त पुनर्गठन के लिए मापदंडों की सिफारिश करने का कार्य सौंपा गया था।

समिति द्वारा की गई सिफारिशें:

  • ऋणकर्ताओं पर कोविड-19 महामारी प्रभाव की गंभीरता के आधार पर तनावग्रस्त खातों के पुनर्गठन के लिए क्रमिक उपागम– समिति द्वारा की गयी अनुशंसाओं के अनुसार बैंक तनावग्रस्त खातों को मंद (Mild), नियंत्रित (Moderate) और संजीदा (Severe) श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकते हैं।
  • कठिनाईयों का सामना करने वाले क्षेत्रों की हालत का आकलन करने हेतु पांच वित्तीय मानदंड– समायोजित भौतिक निवल संपत्ति के लिए कुल बाहरी देयताएं, ब्याज तथा कर एवं मूल्यह्रास और परिशोधन (Ebitda) से पूर्व आय पर कुल ऋण, ऋण सेवा कवरेज अनुपात (DSCR), वर्तमान अनुपात और औसत ऋण सेवा कवरेज अनुपात (ADSCR)।
  • समिति के द्वारा ऋणों के पुनर्गठन हेतु वाहन, विमानन, निर्माण, आतिथ्य, विद्युत्, रियल एस्टेट और पर्यटन सहित 26 क्षेत्र चिह्नित किए गए है।

इन अनुशंसाओं की प्रयोज्यता:

  • समिति को 1500 करोड़ से अधिक के ऋणों के पुनर्गठन की जांच करने का कार्य सौंपा गया था।
  • इस फ्रेमवर्क के तहत प्रावधान केवल कोविड महामारी से प्रभावित होने वाले ऋणकर्ताओं के लिए लागू होंगे।
  • इसके तहत, केवल मानक के रूप में वर्गीकृत, और 1 मार्च, 2020 तक 30 दिनों से कम के बकाया वाले ऋणकर्ताओं को शामिल किया गया है।

इन उपायों की आवश्यकता तथा ऋण समस्या की गंभीरता

भारत में कोविड-19 महामारी के बाद कॉरपोरेट सेक्टर का 15.52 लाख करोड़ रुपये का ऋण तनावग्रस्त हो चुका है, तथा 22.20 लाख करोड़ रुपये का ऋण महामारी से पहले ही तनावग्रस्त था।

  • अर्थात, प्रभावी रूप से कुल 37.72 लाख रुपये का ऋण (उद्योगों के लिए बैंकिंग क्षेत्र के ऋण का 72%) तनावग्रस्त है।
  • यह कुल गैर-खाद्य बैंक ऋण (non-food bank credit) का लगभग 37% है।
  • इसके अलावा, खुदरा व्यापार, थोक व्यापार, परिवहन और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में कंपनियों को तनाव का सामना करना पड़ रहा है।
  • कोविड से पहले तनावग्रस्त ऋणों वाले क्षेत्रों में NBFCs, विद्युत, इस्पात, रियल एस्टेट और विनिर्माण शामिल हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. NBFC क्या हैं?
  2. भुगतान बैंक और वाणिज्यिक बैंक के बीच अंतर।
  3. केवी कामथ समिति किससे संबंधित है?
  4. केवी कामथ समिति की प्रमुख सिफारिशें।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

उच्चत्तम न्यायालय द्वारा केंद्र से फर्जी खबरों पर नियंत्रण व्यवस्था संबंधी पूछतांछ


संदर्भ:

हाल ही में, उच्चत्तम न्यायालय द्वारा केंद्र से फर्जी खबरों और कट्टरता को फैलने से रोकने के लिए ‘सरकारी तंत्र’ का विवरण देने और ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होने पर, इसका निर्माण करने को कहा गया है।

संबंधित प्रकरण

अदालत ने कहा कि वह तबलिगी जमात मामले में सूचना एवं प्रसारण सचिव अमित खरे द्वारा दायर किये गए नवीनतम सरकारी हलफनामे में दी गयी जानकारी से ‘निराश’ हुआ है।

  • यह मामला, लॉकडाउन के दौरान राष्ट्रीय राजधानी में तब्लीगी जमात के आयोजन पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ वर्गों द्वारा सांप्रदायिक रंग दिए जाने के खिलाफ दायर की गयी याचिका पर आधारित है।
  • जमात की याचिकाओं में तब्लीगी घटना को सांप्रदायिक रूप देने वाले मीडिया वर्गों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए अदालत से मंत्रालय को निर्देश देने की मांग की गयी है।

फर्जी ख़बरें क्या होती है?

फर्जी ख़बरें (Fake news) वे खबरें, कहानियां या धोखे होते हैं जो पाठकों को जानबूझकर भ्रमित करने अथवा धोखा देने के लिए तैयार की जाती हैं।

  • आमतौर पर, ये फर्जी कहानियां लोगों के विचारों को प्रभावित करने, राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने, अथवा भ्रम पैदा करने के लिए तैयार की जाती हैं, और प्रायः ये ऑनलाइन प्रकाशकों के लिए एक लाभदायक व्यवसाय भी हो सकती है।
  • फर्जी ख़बरों के तीन मूल तत्व होते हैं: अविश्वास, गलत सूचना और हेराफेरी।

फर्जी ख़बरों में वृद्धि के कारण:

  1. इंटरनेट और सोशल मीडिया का व्यापक उपयोग
  2. प्रामाणिकता का अभाव
  3. सोशल मीडिया के लिए सहिंता का अभाव
  4. फ़ेक न्यूज़ के स्तरीकृत संगठन: ये फर्जी ख़बरों को लक्षित आबादी के लिए संगठित रूप से और चतुरता से फैलाते है।

सरकार द्वारा किए गए हालिया प्रयास:

हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत एक थिंक-टैंक ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BPRD)  द्वारा फर्जी ख़बरों और वीडियो की पहचान करने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों की सहायता हेतु दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।

अन्य उपायों की आवश्यकता

  • सरकार को इस सूचना युद्ध की वास्तविकताओं के बारे में आबादी के सभी वर्गों को जागरूक करने के लिए पहल करनी चाहिए और इससे लड़ने के लिए आम सहमति विकसित करनी चाहिए।
  • फर्जी समाचार प्रदाताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
  • सोशल और अन्य मीडिया में प्रसारित किए जा रहे डेटा को सत्यापित करने के लिए सरकार के पास एक स्वतंत्र एजेंसी होनी चाहिए। एजेंसी को वास्तविक तथ्यों और आंकड़ों को प्रस्तुत करने का काम सौंपा जाना चाहिए।
  • सोशल मीडिया वेबसाइटों को इस प्रकार की गतिविधियों के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए ताकि फर्जी खबरों के प्रसार पर बेहतर नियंत्रण रखना उनकी जिम्मेदारी बन जाए।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक, मशीन लर्निंग और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग, को फर्जी ख़बरों की समस्या से निपटने के लिए तैनात किया जा सकता है।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


अनुच्छेद 363-A

संविधान में अनुच्छेद 363-A को संविधान (छब्बीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 के माध्यम से सम्मिलित किया गया था। इस संशोधन को प्रिवी पर्स उन्मूलन के लिए जाना जाता है।

चर्चा का कारण

हैदराबाद के आखिरी निजाम नवाब मीर उस्मान अली खान के एक पोते नवाब नजफ अली खान ने हैदराबाद पुलिस के पास एक शिकायत दर्ज कराई है जिसमें निजाम के कुछ अन्य वारिसों पर एफआईआर दर्ज करने की मांग करते हुए आरोप लगाया गया है कि उन्होंने ब्रिटेन के बैंक में जमा निजाम का 35 मिलियन पौंड की राशि पर दावा करने के लिए झूठे दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है।

उन्होंने कहा है, कि यह कदम संविधान के अनुच्छेद 363-A का उल्लंघन करता है।

क्विक रिएक्शन सरफेस टू एयर मिसाइल (QRSAM)

  • क्विक रिएक्शन सरफेस टू एयर मिसाइल (Quick Reaction Surface-to-Air Missile: QRSAM) एक कनस्तर-आधारित प्रणाली है, जिसका अर्थ है कि यह विशेष रूप से डिज़ाइन किये गए डिब्बों के रूप में संग्रहीत एवं संचालित होती है।
  • यह एक छोटी दूरी की सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल (SAM) प्रणाली है। इसे DRDO द्वारा मुख्य रूप से दुश्मन के हवाई हमलों से सेना के बख्तरबंद कतार को सुरक्षा कवच प्रदान करने हेतु डिज़ाइन एवं विकसित किया गया है।
  • इस संपूर्ण शस्त्र प्रणाली को वायु सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम एक मोबाइल एवं गतिशील प्लेटफॉर्म पर स्थापित किया गया है।
  • इसे सेना में शामिल करने के लिये डिज़ाइन किया गया है और इसकी रेंज 25 से 30 किमी. है।

लीलावती पुरुस्कार 2020 का शुभारंभ

लीलावती पुरस्कार तकनीकी शिक्षा नियामक, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) की एक पहल है, और इसका उद्देश्य AICTE द्वारा अनुमोदित संस्थानों द्वारा महिलाओं के साथ ‘समानता और निष्पक्षता’ के व्यवहार के प्रयासों को मान्यता देना है।

  • लीलावती पुरस्कार की थीम ‘महिला सशक्तिकरण’ है। इसका उद्देश्य “पारंपरिक भारतीय मूल्यों” का उपयोग करके स्वच्छता, स्वच्छता, स्वास्थ्य और पोषण जैसे मुद्दों के बारे में जागरूकता पैदा करना है।
  • लीलावती पुरुस्कार का उद्देश्य महिलाओं के बीच “साक्षरता, रोजगार, प्रौद्योगिकी, ऋण, विपणन, नवाचार, कौशल विकास, प्राकृतिक संसाधन और अधिकार” जैसे मुद्दों के बारे में जागरूकता पैदा करना है।
  • लीलावती पुरस्कार 2020 के लिए आवेदन संस्थान या टीम के स्तर पर प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिसमें छात्र या संकाय या एआईसीटीई द्वारा अनुमोदित संस्थान दोनों शामिल हैं।

  • Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates
  • Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos