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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 17 November

 

विषय – सूची

 सामान्य अध्ययन-II

1. कोविड महामारी के बढ़ते मामलों के मद्देनजर संसद के शीतकालीन सत्र की संभावना कम

2. मुख्यमंत्री जगन मामले पर  न्यायाधीश द्वारा सुनवाई से इंकार

3. विदेश मंत्री द्वारा व्यापार समझौते व वैश्वीकरण की आलोचना

4. संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षा अभियान

5. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा चुनावों में हार स्वीकार करने से इंकार

 

सामान्य अध्ययन-III

1. केरल फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क परियोजना (KFONP)

2. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का एरियल स्पेस मिशन

3. डोनाल्ड ट्रम्प के पश्चात अमेरिका एवं जलवायु समझौते

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. राजस्थान में ‘शांति प्रतिमा’ का अनावरण

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

कोविड महामारी के बढ़ते मामलों के मद्देनजर संसद के शीतकालीन सत्र की संभावना कम


संदर्भ:

संसद का शीतकालीन सत्र आमतौर पर नवंबर के अंतिम सप्ताह या दिसंबर के पहले सप्ताह में शुरू होता है, किंतु दिल्ली में कोविड-19 मामलों की संख्या में वृद्धि के कारण शीतकालीन सत्र आयोजित किये जाने की संभावना नहीं है।

पृष्ठभूमि:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 85 के अनुसार,- राष्ट्रपति, जैसे उचित समझे, उस समय और स्थान पर संसद‌ के सत्र को आहूत कर सकता है। इस प्रकार, सरकार की सिफारिश पर संसद सत्र आयोजित किया जा सकता है, तथा सरकार द्वारा सत्र की तिथि व अवधि तय की सकती है।

इस प्रकार की घटना के पूर्व उदाहरण

संसदीय अभिलेखों के अनुसार, अतीत में तीन अवसरों पर, वर्ष 1975, 1979 और 1984 के दौरान संसद के शीतकालीन सत्र का आयोजन नहीं किया गया था।

इस संदर्भ में संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद 85 के अनुसार, संसद के एक सत्र की अंतिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के लिए नियत तारीख के बीच छह मास से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए।

  • चूंकि, सितंबर माह में संसद का मानसून सत्र आयोजित किया गया था, अतः सरकार के लिए शीतकालीन सत्र आयोजित करने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है।
  • इसके अलावा, संविधान में यह स्पष्ट नहीं किया गया है, कि, संसद सत्र कब और कितने दिन आयोजित किए जाने चाहिए।

संसदीय सत्र का महत्व

  • विधि-निर्माण अर्थात क़ानून बनाने का कार्य संसदीय सत्र के दौरान किया जाता है।
  • इसके अलावा, सरकार के कामकाज की गहन जांच और राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श केवल तभी हो सकता है जब संसद के दोनों सदन सत्र जारी होते हैं।
  • संसदीय कार्य-पद्धति का पूर्वानुमान, एक अच्छी तरह से काम कर रहे लोकतंत्र के लिए आवश्यक होता है।

संसदीय सत्र के पूरे वर्ष भर जारी रखने के लाभ

इसके मुख्य रूप से तीन लाभ हैं।

  1. इससे पूरे वर्ष भर विधायी और नीतिगत कार्य हेतु विस्तृत योजना बनाना संभव होता है।
  2. इससे अध्यादेशों को लागू करने की आवश्यकता नहीं होती है।
  3. इससे पूरे वर्ष भर संसद द्वारा सरकारी कामकाज की जवाबदेही तय की जा सकती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. संसद के सत्र को आहूत करने की शक्ति किसे प्राप्त है?
  2. अनुच्छेद 85
  3. संसद के सत्र
  4. संसद एक वर्ष में कितने दिनों के लिए एकत्र होती है?
  5. संसद के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता कौन करता है?

मेंस लिंक:

संसदीय सत्र क्यों महत्वपूर्ण होते है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

मुख्यमंत्री जगन मामले पर न्यायाधीश द्वारा सुनवाई से इंकार


संदर्भ:

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने आंध्र प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी के खिलाफ कार्यवाही करने संबंधी रिट याचिका पर सुनवाई करने से स्वयं को अलग कर लिया है। याचिका में जगन रेड्डी पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश एन वी रमन्ना और उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के खिलाफ ‘मिथ्या, संदिग्ध और राजनीतिक आरोप’ लगाने के लिए कार्यवाही की मांग की गयी थी।

न्यायाधीश द्वारा सुनवाई से इंकार का कारण

न्यायमूर्ति यू.यू. ललित, मुख्यमंत्री जगन मामले पर सुनवाई से अलग हो गए हैं क्योंकि, वह इससे पूर्व, इस मामले से जुड़े पक्षकारों का एक वकील के रूप प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

सुनवाई से इंकार’ करना क्या है?

किसी पीठासीन न्यायायिक अधिकारी अथवा प्रशासनिक अधिकारी द्वारा हितों के टकराव के कारण किसी न्यायिक सुनवाई अथवा आधिकारिक कार्रवाई में भागीदारी से इंकार करने को न्यायिक निरर्हता (Judicial disqualification), ‘सुनवाई से इंकार’ करना अथवा ‘रिक्युजल’ (Recusal) कहा जाता है।

‘सुनवाई से इंकार’ करने हेतु सामान्य आधार:

किसी न्यायाधीश अथवा अन्य निर्णयकर्ता को किसी मामले की सुनवाई से अलग करने हेतु विभिन्न आधारों पर प्रस्ताव पेश किया जाता है।

आमतौर पर, ये प्रस्ताव इस प्रकार के दावों पर आधारित होतें हैं जिनमे कहा जाता है कि, न्यायाधीश किसी एक पक्षकार के प्रति सद्भाव रखता है, अथवा अन्य पक्षकार के प्रति द्वेषपूर्ण है, या किसी तर्कशील निष्पक्ष पर्यवेक्षक को लगता है, कि न्यायाधीश किसी के प्रति पक्षपाती हो सकता है।

इन प्रस्तावों में सुनवाई हेतु नियुक्त न्यायाधीश को निम्नलिखित अन्य आधारों पर भी चुनौती दी जाती है:

  1. न्यायाधीश का मामले में व्यक्तिगत हित है अथवा वह मामले में व्यक्तिगत हित रखने वाले किसी व्यक्ति से संबंध रखता है।
  2. न्यायाधीश की पृष्ठभूमि अथवा अनुभव, जैसे कि न्यायाधीश के वकील के रूप में किये गए पूर्व कार्य।
  3. मामले से संबंधित तथ्यों अथवा पक्षकारों से व्यक्तिगत तौर पर परिचय।
  4. वकीलों या गैर-वकीलों के साथ एक पक्षीय संवाद।
  5. न्यायाधीशों के अधिनिर्णय, टिप्पणियां अथवा आचरण।

इस संदर्भ में क़ानून

न्यायाधीशों द्वारा ‘सुनवाई से इंकार’ करने संबंधी कोई निश्चित नियम नहीं हैं।

  • जस्टिस जे चेलमेश्वर ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015) मामले में अपनी राय दी थी कि ’जहां भी किसी न्यायाधीश के आर्थिक हित प्रतीत होते है, वहां पक्षपात संबंधी किसी ‘वास्तविक खतरे’ अथवा ‘तर्कपूर्ण संदेह’ की जांच की आवश्यकता नहीं है।
  • इसके अलावा, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा पद की शपथ लेने के समय, न्याय करने हेतु ‘बिना किसी डर या पक्षपात, लगाव या वैमनस्य के’ अपने कर्तव्यों को निभाने का वादा किया जाता है ।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. न्यायिक निरर्हता के लिए आधार।
  2. सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को शपथ कौन दिलाता है?
  3. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 127 और 128 किससे संबंधित हैं?

मेंस लिंक:

‘सुनवाई से इंकार’ (Recusal), सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के लिए नैतिकता की एक चयनात्मक आवश्यकता बन गया है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।

विदेश मंत्री द्वारा व्यापार समझौतेवैश्वीकरण की आलोचना


संदर्भ:

‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (Regional Comprehensive Economic Partnership- RCEP) की शुरुआत के अगले दिन ही विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वैश्वीकरण और व्यापार समझौते की आलोचना की है।

इनके अनुसार-

  • व्यापार समझौते और वैश्वीकरण, ‘मुक्त बाजार के नाम पर’ अन्य देशों को अन्यायपूर्ण व्यापार और विनिर्माण लाभ पहुंचाते हैं।
  • अतीत में किए गए व्यापार समझौतों के प्रभाव से कुछ क्षेत्रों में वि-औद्योगीकरण हो रहा है।
  • भविष्य में किए जाने वाले व्यापार समझौतों के परिणामस्वरूप हम वैश्विक प्रतिबद्धताओं से बंध जाएंगे, जिनमे से कई हमारे हित में नहीं है।

निहितार्थ:

विदेश मंत्री द्वारा हाल ही में की गयी टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि भारत, ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (RCEP) समूह के राष्ट्रों द्वारा समझौते में पुनः सम्मिलित होने के प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रहा है।

भारत के लिए RCEP से अलग होने के आर्थिक निहितार्थ

  • ऐसी चिंताएं व्यक्त की जा रहीं हैं, कि ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (RCEP) से अलग होने संबंधी भारत के निर्णय से RCEP समूह के सदस्य देशों साथ द्विपक्षीय व्यापार संबंध प्रभावित होंगे, कयोंकि, इन राष्ट्रों का झुकाव समूह के सदस्य देशों के मध्य आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में हो सकता है।
  • भारत का निर्णय, इसे RCEP देशों की विस्तृत बाजार का लाभ उठाने से वंचित कर सकता है- इस समझौते का आकार बहुत बड़ा है, इसमें सम्मिलित देशों की आबादी 2 बिलियन से अधिक है।
  • भारत को इस समझौते में पुनः शामिल करने हेतु जापान जैसे देशों द्वारा प्रयास किये गए थे, इसे देखते हुए, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया-भारत-जापान नेटवर्क पर प्रभाव पड़ने की आशंका है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. RCEP क्या है?
  2. आसियान राष्ट्र
  3. ‘ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप’ क्या है?

मेंस लिंक:

व्यापार समझौते और वैश्वीकरण, ‘मुक्त बाजार के नाम पर’ अन्य देशों को अन्यायपूर्ण व्यापार और विनिर्माण लाभ पहुंचाते हैं। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा अभियान (UNPK)


(United Nations Peace Keeping (UNPK) missions)

संदर्भ:

चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा अभियानों (United Nations Peace Keeping  missionsUNPK missions) में सैन्य योगदान में वृद्धि की जा रही है। इसे देखते हुए भारत और अमेरिका द्वारा अफ्रीकी देशों के लिए जारी पहल की तर्ज पर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से शांति रक्षा मिशनों के लिए सैन्य कर्मियों को प्रशिक्षण प्रदान करने पर विचार कर रहे हैं।

भारत और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना

  • भारत, संयुक्त राष्ट्र में सैन्य शक्ति का योगदान करने वाले शीर्ष देशों में लगातार बना हुआ है, और इस मामले में वैश्विक स्तर पर पांचवे स्थान पर है। भारत के 5,424 सैन्य कर्मियों द्वारा आठ देशों में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सेवाएँ दी जा रही है।
  • भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र नियमित बजट में 0.83% और शांति सेना बजट में 0.16% का योगदान किया जाता है।
  • भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के कुल 71 अभियानों में से 51 अभियानों में भाग लिया है, और इनमे 2 लाख से अधिक कर्मियों का योगदान दिया है।
  • भारत के शांति सैनिक, लेबनान, गोलन हाइट्स, कांगो और दक्षिण सूडान में तैनात किये गए है, इसके अलावा भारतीय सैन्य कर्मियों को अन्य अभियानों में स्टाफ अधिकारियों के रूप में तैनात किया गया है।
  • भारत द्वारा दक्षिण सूडान और कांगो में क्रमशः दो तथा एक क्षेत्रीय अस्पताल भी स्थापित किये गए है।
  • वर्ष 2018 से, भारत ने लेबनान मिशन में कजाकिस्तान की एक सैन्य टुकड़ी को सहयोजित किया है।

अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना

  • अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सैन्य कर्मियों का कोई योगदान नहीं किया जाता है, किंतु यह संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के बजट में 27% का योगदान करता है।
  • वर्ष 2016 में, भारत और अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र और क्षेत्रीय शांति अभियानों में भाग लेने हेतु अफ्रीकी सैन्य बलों और पुलिस कर्मियों के लिए संयुक्त रूप से एक वार्षिक पहल ‘अफ्रीकी साझेदारों के लिए संयुक्त राष्ट्र शांति सेना कोर्स’ (UN Peacekeeping Course for African Partners) की शुरुआत की गयी है।
  • इसके साथ ही अमेरिका द्वारा, वियतनाम और अन्य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के लिए एक समान पहल शुरू करने हेतु विचार किया जा रहा है।

चीन और संयुक्त राष्ट्र शांति सेना:

  • वर्तमान में चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न अभियानों में 2,500 से अधिक सैनिक कार्यरत हैं और इसने 8,000 अतिरिक्त सैनिकों को संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भेजने की प्रतिबद्ध व्यक्त की है।
  • इन सैनिकों की तैनाती के बाद चीन संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा अभियानों (UNPK) में सर्वाधिक सैन्य शक्ति का योगदान करने वाला देश बन जायेगा।
  • चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र नियमित बजट में 12% और शांति सेना बजट में 15% का योगदान किया जा रहा है।

शांति अभियान क्या होते है?

  • संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान, डिपार्टमेंट ऑफ़ पीस ऑपरेशन तथा डिपार्टमेंट ऑफ़ ऑपरेशनल सपोर्ट का एक संयुक्त प्रयास है।
  • प्रत्येक शांति रक्षा अभियान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा मंजूरी प्रदान की जाती है।
  • संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों के लिए वित्तीय आपूर्ति को संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों द्वारा सामूहिक रूप से वहन किया जाता है।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार, प्रत्येक सदस्य राष्ट्र शांति अभियानों के लिए निर्धारित राशि का भुगतान करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।

संरचना:

  • संयुक्त राष्ट्र के शांति रक्षकों में सैनिक, पुलिस अधिकारी और नागरिक कर्मी सम्मिलित हो सकते हैं।
  • सदस्य देशों द्वारा स्वैच्छिक आधार पर शांति सैनिको का योगदान दिया जाता है।
  • शांति अभियानों के नागरिक कर्मचारी, अंतर्राष्ट्रीय सिविल सेवक होते हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सचिवालय द्वारा भर्ती और तैनात किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान तीन बुनियादी सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होते है:

  1. पक्षकारों की सहमति
  2. निष्पक्षता
  3. अधिदेश की सुरक्षा और आत्मरक्षा के अलावा बल प्रयोग नहीं किया जाएगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. शांति अभियानों का वित्त पोषण किसके द्वारा किया जाता है?
  2. UNSC की भूमिका
  3. शांतिरक्षकों की संरचना?
  4. शांति सैनिकों को ब्लू हेल्मेट क्यों कहा जाता है?
  5. संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के मार्गदर्शक सिद्धांत
  6. वर्तमान में जारी शांति अभियान

मेंस लिंक:

संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान और उसके महत्व पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारतीय संवैधानिक योजना की अन्य देशों के साथ तुलना।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा चुनावों में हार स्वीकार करने से इंकार


संदर्भ:

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, 3 नवंबर को हुए राष्ट्रपति चुनाव में अपने डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंद्वी जो बिडेन से हार स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

ट्रम्प और उनके समर्थकों द्वारा कई स्विंग स्टेट्स (Swing States) में मतदाता धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए इसे कानूनी रूप से चुनौती दी गयी है।

डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा व्हाइट हाउस छोड़ने से इंकार करने की स्थिति में क्या होगा?

ट्रम्प द्वारा कानूनी दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने पेंसिल्वेनिया, मिशिगन और एरिज़ोना में मुकदमे दायर किए हैं और अदालतों से राज्य अधिकारियों को वोट प्रमाणित करने से रोकने के लिए कहा है। किंतु, कानूनी विवादों का निपटारा हो जाने और उनकी पराजय साबित हो जाने पर, उन्हें व्हाइट हाउस में रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

इसके बाद भी, यदि राष्ट्रपति, पद छोड़ने से इनकार करते हैं, तो सीक्रेट सर्विस और एफबीआई द्वारा कार्यवाही की जाएगी। व्हाइट हाउस का नियंत्रण एफबीआई और सीक्रेट सर्विस द्वारा किया जाता है।

क्या किसी राष्ट्रपति द्वारा पहले कभी व्हाइट हाउस छोड़ने से इनकार किया गया है?

नहीं। अमेरिकी इतिहास में कभी भी राष्ट्रपति ने व्हाइट हाउस छोड़ने, या शांतिपूर्वक सत्ता हस्तांतरण करने से इनकार नहीं किया है। ट्रम्प से पहले 44 अमेरिकी राष्ट्रपतियों में से, 35 राष्ट्रपतियों द्वारा उनके दो कार्यकालों की सीमा समाप्त होने पर अथवा चुनाव में हार जाने पर या दोबारा चुनाव नहीं लड़ने के उनके फैसले से, अपने उत्तराधिकारी को स्वेच्छा से सत्ता सौंप दी गयी।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

केरल फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क परियोजना (KFONP)


(Kerala Fibre Optic Network Project)

संदर्भ:

केरल सरकार का लक्ष्य केरल फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क परियोजना (KFONP) के माध्यम से दिसंबर तक गरीब परिवारों, सार्वजनिक कार्यालयों के लिए मुफ्त इंटरनेट प्रदान करना है।

परियोजना के बारे में:

  • केरल फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क परियोजना का लक्ष्य, केरल सरकार द्वारा ‘इंटरनेट एक्सेस’ को नागरिक अधिकारबनाने संबंधी उद्देश्य को पूरा करना है।
  • इसके तहत 20 लाख से अधिक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले (BPL) परिवारों के लिए मुफ्त उच्च गति सहित इंटरनेट सुविधा प्रदान की जाएगी।
  • यह परियोजना केरल राज्य बिजली बोर्ड (Kerala State Electricity Board) और केरल राज्य सूचना प्रौद्योगिकी इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (Kerala State Information Technology Infrastructure Limited- KSITIL) की एक सहयोगात्मक पहल है। इंटरनेट सेवा प्रदाता और केबल टेलीविजन ऑपरेटर भी अपनी सेवाएँ प्रदान करने के लिये इस परियोजना में शामिल हो सकते हैं।
  • राज्य सरकार के अनुसार- लगभग 30,000 से अधिक सरकारी कार्यालयों और स्कूलों को इस परियोजना के तहत हाई-स्पीड नेटवर्क के माध्यम से जोड़ा जाएगा।

KFONP का महत्व:

यह परियोजना आरंभ होने पर, राज्य के लिए एक और मील का पत्थर साबित होगी। केरल राज्य पहले से ही मानव विकास संकेतकों में शीर्ष पर है, तथा कई संकेतकों में, विशेषकर स्वास्थ्य संकेतकों में विश्व के विकसित देशों से समानता करता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. KFON परियोजना के बारे में
  2. भारत नेट के बारे में

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का एरियल स्पेस मिशन


(Ariel Space Mission adopted by the European Space Agency)

संदर्भ:

हाल ही में, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (European Space AgencyESA) द्वारा औपचारिक रूप से एरियल (Ariel) मिशन को अपनाया गया है।

एरियल क्या है?

एरियल (एटमॉस्फेरिक रिमोट-सेंसिंग इन्फ्रारेड एक्सोप्लेनेट लार्ज-सर्वे) अर्थात Ariel (Atmospheric Remote-sensing Infrared Exoplanet Large-survey) को वर्ष 2029 में लॉन्च किया जाएगा।

  • यह चार साल की अवधि के दौरान एक हजार से अधिक एक्सोप्लैनेट का व्यापक स्तर पर सर्वेक्षण करेगा।
  • इसके तहत, यह एक्सोप्लैनेट की प्रकृति, उसकी संरचना और विकास का अध्ययन करेगा।

एरियल मिशन का महत्व

एरियल, सैकड़ों एक्सोप्लेनेट्स की रासायनिक संघटन और तापीय संरचनाओं के मापन हेतु समर्पित अपनी तरह का पहला मिशन है।

यह यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के कॉस्मिक विजन प्लान के प्रमुख सवालों में से एक का जवाब खोजने में मदद करेगा, कि ‘किसी ग्रह के निर्माण और जीवन के उद्भव के लिए कौन सी परिस्थितियां उत्तरदायी होती है?।

एक्सोप्लैनेट की खोज

नासा के अनुसार, अब तक  केवल कुछ एक्सोप्लेनेट्स को टेलिस्कोप के माध्यम से खोजा गया है, जबकि अन्य एक्सोप्लेनेट्स का अप्रत्यक्ष तरीकों का उपयोग करके पता लगाया गया है।

​​इसमें शामिल है:

  • किसी तारे के सामने से किसी ग्रह के गुजरने पर तारे के प्रकाश की तीव्रता में कमी आती है, इस घटना पर नजर रख कर एक्सोप्लेनेट की खोज की जाती है। नासा के केपलर स्पेस टेलीस्कोप द्वारा हजारों ग्रहों को पहिचानने हेतु इस विधि का उपयोग किया जाता है।
  • ग्रेविटेशनल लेंसिंग (Gravitational lensing) और ‘वोबलिंग विधि’ (Wobbling Method): यह विधि इस विचार पर आधारित है कि परिक्रमा करने वाला ग्रह के कारण मूल तारा अपने केंद्र से हटकर परिभ्रमण करता है।

एक्सोप्लैनेट के अध्ययन का कारण

एक्सोप्लेनेट्स की खोज इस संभावना से प्रेरित है कि पृथ्वी से अन्यत्र भी जीवन मौजूद हो सकता है और भले ही इसका कोई प्रमाण न मिले, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि इस सवाल की खोज से यह अवश्य पता चलेगा कि, मानव जाति कहां से आयी थी था और हम कहां जा रहे है।

प्रमुख बिंदु:

  • अब तक 4,000 से अधिक एक्सोप्लैनेट के अस्तित्व की पुष्टि की जा चुकी है, जबकि हजारों अन्य ऐसे संभावित एक्सोप्लैनेट हैं जिन्हें एक्सोप्लैनेट घोषित करने हेतु और अधिक अवलोकन तथा परीक्षण किये जाने की आवश्यकता है।
  • प्रॉक्सिमा सेंटॉरी बी (Proxima Centauri b) पृथ्वी का सबसे निकटतम एक्सोप्लैनेट है तथा चार प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। यह अपने तारे के ‘निवास योग्य क्षेत्र’ में स्थित है, अर्थात इसकी सतह पर तरल रूप में जल की उपस्थिति हो सकती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. एरियल मिशन की प्रमुख विशेषताएं तथा महत्व
  2. एक्सोप्लेनेट क्या होते हैं?
  3. वास योग्य क्षेत्र क्या होते है? इसकी पहचान कैसे की जाती है?
  4. प्रॉक्सिमा सेंटॉरी के बारे में बी।
  5. ग्रेविटेशनल लेंसिंग और ‘वोबलिंग विधि’ का अवलोकन
  6. नासा के केपलर स्पेस टेलीस्कोप के बारे में

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

डोनाल्ड ट्रम्प के पश्चात अमेरिका एवं जलवायु समझौते


संदर्भ:

राष्ट्रपति-निर्वाचित जो बिडेन (Joe Biden) ने सार्वजनिक रूप से कहा है, उनके पद ग्रहण करते ही संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा पेरिस समझौते में फिर शामिल होने की कोशिश करेगा।

पेरिस समझौता

वर्ष 2015 में किये गए पेरिस समझौते में पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस के अंदर सीमित रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इस लक्ष्य को संभवतः अमेरिका की सक्रिय भागीदारी के बिना पूरा नहीं किया जा सकता है।

चीन, विश्व में ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है, इसके पश्चात अमेरिका का स्थान है।

पेरिस समझौते में अमेरिकी भूमिका

पेरिस समझौते के लक्ष्यों का अर्थ था कि अमेरिका को अगले एक दशक में अपने उत्सर्जन में कम से कम 1.5 बिलियन टन की कमी करनी होगी, और उसके बाद और अधिक कटौती किए जाने की उम्मीद की गयी थी।

  • लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका के पास जलवायु निधियों को जुटाने की, विशेष रूप से निजी निगमों से, विशेष क्षमता है, जो कि 2 ° C  के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अति आवश्यक है।
  • निम्न-कार्बन वाली अर्थव्यवस्था में परिवर्तन करने हेतु प्रति वर्ष सैकड़ों अरबों डॉलर की आवश्यकता है।
  • इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण समन्वयक के रूप में अमेरिका की अनुपस्थिति, एक बहुत बड़ा झटका है।

जलवायु संबंधित मुद्दों पर ट्रम्प प्रशासन के निर्णयों का प्रभाव

  • अपने चुनावी अभियान के दौरान, ट्रम्प ने जलवायु परिवर्तन को एक ‘धोखा’ (Hoax) बताया था, और मात्र एक साल पहले लागू किये गए एतिहासिक पेरिस समझौते से अलग होने का वादा किया था। ट्रम्प ने अपने राष्ट्रपति पद पर नियुक्त होने के छह महीने के भीतर ही अपने वादे को पूरा किया।
  • कोयले और स्वच्छ ऊर्जा पर राष्ट्रपति ट्रम्प के कई अन्य फैसलों से भी जलवायु उद्देश्यों के लिए गहरी क्षति पहुँची है।
  • घरेलू नौकरियों को बढ़ावा देने और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने हेतु प्रत्यक्ष रूप से जीवाश्म-ईंधन उद्योग को बढ़ावा दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप उत्सर्जन में वृद्धि हुई।
  • ट्रम्प प्रशासन के द्वारा वर्ष 2015 के एक आदेश को परिवर्तित कर दिया गया, जिसमे अमेरिकी संघीय सरकारी एजेंसियों को आगामी दस वर्षों में अपने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को वर्ष 2008 के स्तर की तुलना में 40% तक कम करने के लिए कहा गया था।

आगे की राह

जो बिडेन के राष्ट्रपति पद संभालने के साथ, अमेरिका द्वारा जलवायु परिवर्तन पर नीतिगत उलटफेर के एक और दौर से गुजरने की संभावना है, तथा पेरिस समझौते में अमेरिका की वापसी लगभग तय है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


राजस्थान में शांति प्रतिमा’ का अनावरण

पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा राजस्थान में ‘शांति प्रतिमा’ (Statue of Peace) का अनावरण किया गया।

  • जैनाचार्य श्री विजय वल्‍लभ सुरिश्‍वर जी महाराज की 151वीं जयंती के उपलक्ष्‍य में शांति प्रतिमा का निर्माण किया गया है।
  • अष्टधातु से निर्मित 151 इंच ऊंची यह प्रतिमा आठ धातुओं से निर्मित है जिसमें तांबा मुख्‍य धातु है।
  • यह प्रतिमा राजस्‍थान के पाली में जेतपुरा में विजय वल्‍लभ साधना केन्‍द्र में स्‍थापित की गई है।

जैनाचार्य श्री विजय वल्लभ सूरिश्वर जी महाराज के बारे में:

  • जैनाचार्य श्री विजय वल्‍लभ सुरिश्‍वर जी महाराज ( 1870-1954), ने निस्वार्थ भाव से और समर्पित रूप से भगवान महावीर के संदेश को फैलाने में अपना जीवन व्यतीत किया।
  • उन्होंने जनता के कल्याण, शिक्षा के प्रसार और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के लिए भी अथक परिश्रम किया।
  • उन्होंने प्रेरक साहित्य (कविता, निबंध, भक्ति भजन और स्तवन) का लेखन किया और स्वतंत्रता आंदोलन और स्वदेशी के समर्थन में सक्रिय सहयोग दिया।

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