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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 16 November

 

विषय – सूची

 सामान्य अध्ययन-I

1. बिरसा मुंडा

2. ‘जन्म-मृत्यु सांख्यिकी रिपोर्ट’, 2018

 

सामान्य अध्ययन-II

1. मुख्यमंत्री: नियुक्ति, शक्तियां, कार्य और पद

2. समय पर जांच पूरी न होने पर अभियुक्त को जमानत का अधिकार

3. सरकार द्वारा ₹ 1.19 लाख करोड़ के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा

4. अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006

5. सबसे बड़े मुक्त व्यापार ब्लॉक ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (RCEP) की शुरुआत

6. UAE द्वारा ‘गोल्डन’ वीजा हेतु पात्रता मानदंड में विस्तार

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. प्यूर्टो रिको (Puerto Rico)

2. ट्रिस्टन दा कुन्हा

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: स्वतंत्रता संग्राम- इसके विभिन्न चरण और देश के विभिन्न भागों से इसमें अपना योगदान देने वाले महत्त्वपूर्ण व्यक्ति/उनका योगदान।

बिरसा मुंडा


(Birsa Munda)

संदर्भ:

15 नवंबर को आदिवासी नेता बिरसा मुंडा (Birsa Munda) की जयंती के रूप में मनाया जाता है।

राष्ट्रीय आंदोलन में उनके महत्वपूर्ण योगदान को स्वीकार करते हुए वर्ष 2000 में उनके जन्मदिवस पर झारखंड राज्य का गठन किया गया था।

बिरसा मुंडा के बारे में:

बिसरा मुंडा एक लोक नायक और मुंडा जनजाति का एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे।

  • उन्होंने 19 वीं शताब्दी में ब्रिटिश उपनिवेश के अधीन बिहार और झारखंड क्षेत्र में धार्मिक, सामाजिक, तथा राजनीतिक आंदोलन (Millenarian Movement) का नेतृत्व किया।
  • इन्हें धरती आबा‘ (Dharti Abba) या ‘जगत पिता’ के रूप में भी जाना जाता है।

बिरसाइत (Birsait)

उलगुलान के नेतृत्वकर्ता जननायक बिरसा मुंडा को झारखंड सहित छत्तीसगढ़ के लोग भगवान की तरह पूजते हैं। बिसरा मुंडा, आदिवासी समाज में सुधार करना चाहते थे और इसलिए उन्होंने लोगों से जादू टोने में विश्वास न करने और इसके बजाय प्रार्थना करने पर जोर दिया तथा शराब से दूर रहने, ईश्वर में विश्वास रखने और सही आचरण का पालन करने का आग्रह किया। इसी आधार पर उन्होंने बिरसा- धर्म की शुरुआत की और इस धर्म के अनुयायियों को बिरसाइत कहा जाता है।

AID

उपलब्धियां:

बिसरा मुंडा ने उलगुलान (Ulgulan)  आंदोलन का आरंभ किया, इसे ‘महान विद्रोह’ (The Great Tumult) भी कहा जाता है।

आदिवासियों के शोषण और भेदभाव के खिलाफ उनका संघर्ष ब्रिटिश सरकार पर बहुत भारी पड़ा, और इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (Chotanagpur Tenancy Act) पारित किया गया, जिसके द्वारा आदिवासी लोगों से गैर-आदिवासियों के लिए भूमि के हस्तांतरण को प्रतिबंधित कर दिया गया।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. बिरसा मुंडा का जन्म कहाँ हुआ था?
  2. उलगुलान क्या है?
  3. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 का अवलोकन

मेंस लिंक:

बिरसा मुंडा और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके महत्वपूर्ण योगदान पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: सामाजिक सशक्तीकरण, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद और धर्मनिरपेक्षता।

‘जन्म-मृत्यु सांख्यिकी रिपोर्ट’, 2018


संदर्भ:

हाल ही में, भारत के महापंजीयक (Registrar-General of India) द्वारा ‘नागरिक पंजीकरण प्रणाली पर आधारित भारत की ‘जन्म-मृत्यु सांख्यिकी रिपोर्ट’, 2018 (2018 report on “Vital statistics of India based on the Civil Registration System”) जारी की गयी। इस रिपोर्ट में देश के विभिन्न राज्यों के लिंगानुपात पर प्रकाश डाला गया है।

जन्म के समय लिंगानुपात (Sex ratio), प्रति एक हज़ार पुरुषों पर पैदा होने वाली महिलाओं की संख्या होती है।

प्रमुख निष्कर्ष:

  • सर्वश्रेष्ठ लिंगानुपात वाला राज्य: अरुणाचल प्रदेश (1084)
  • सबसे ख़राब लिंगानुपात वाला राज्य: मणिपुर (757)
  • सर्वश्रेष्ठ लिंगानुपात वाला राज्यों में अरुणाचल प्रदेश के बाद नागालैंड (965) मिजोरम (964), केरल (963) और कर्नाटक (957) का स्थान है।
  • दिल्ली में लिंगानुपात 929, हरियाणा में 914 और जम्मू और कश्मीर में 952 दर्ज किया गया है।
  • वर्ष 2018 में पंजीकृत जन्मों की संख्या 2. 33 करोड़ हो गई है, पिछले वर्ष 2.21 करोड़ जन्मों का पंजीकरण किया गया था।
  • जन्म पंजीकरण का स्तर वर्ष 2009 में 81.3% से बढ़कर वर्ष 2018 में 89.3% हो गया है।

GAP

इस संबंध में सरकार द्वारा किये गए प्रयास

सरकार द्वारा कई योजनाएं लागू की गयी है। इनमें शामिल है:

  1. बेटी बचाओ, बेटी पढाओ
  2. सुकन्या समृद्धि योजना (SSY)
  3. बालिका सुरक्षा योजना।
  4. प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY)
  5. राष्ट्रीय महिला कोष (RMK)

महिला सशक्तिकरण हेतु योजनाओं और कानूनों को लागू करते समय आने वाली चुनौतियां

  • योजनाओं और कानूनों के निरीक्षण और निगरानी करने के लिए पर्याप्त संसाधनॉन का अभाव।
  • अपर्याप्त योग्य कर्मचारी।
  • विभिन्न स्तरों पर सलाहकार समितियों का खराब प्रदर्शन।
  • कानूनों और प्रक्रियाओं की अपर्याप्त समझ।
  • जागरूकता का अभाव।
  • इन योजनाओं के कार्यान्वयन में सहयोग करने के लिए सीमित बुनियादी ढाँचा

आगे की राह

  • भ्रूण हत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले कानूनों को सख्ती से लागू करना;
  • संतान के रूप में पुत्र-विहीन माता-पिता के लिए हितकारी योजनाएं उपलब्ध कराना;
  • लड़कियों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा;
  • महिलाओं को नौकरी में आरक्षण दिया जाना चाहिए;
  • संबंधित कानूनों के कार्यान्वयन हेतु आधारभूत संरचना और प्रशिक्षण को सुनिश्चित करना चाहिए;
  • शिक्षा प्रणाली में महिला सशक्तिकरण, तथा दहेज एवं कन्या भ्रूण हत्या, जैसी बुराइयों के बारे में जागरूकता प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • महिलाओं को बचपन से ही सशक्त और सामाजिक बनाया जाना चाहिए ताकि वे खुद को पुरुषों के बराबर समझ सकें।
  • इस मुद्दे को हल करने के लिए सरकार को समाज की मानसिकता को बदलने पर ध्यान देना चाहिए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. लिंगानुपात को किस प्रकार परिभाषित किया जाता है?
  2. ‘नागरिक पंजीकरण प्रणाली पर आधारित भारत की ‘जन्म-मृत्यु सांख्यिकी रिपोर्ट’ किसके द्वारा जारी की गई है?
  3. रिपोर्ट के नवीनतम संस्करण में प्रमुख निष्कर्ष।

मेंस लिंक:

भारत में लिंगानुपात की प्रवृत्ति और देश के सामाजिक-आर्थिक विकास पर इसके प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

मुख्यमंत्री: नियुक्ति, शक्तियां, कार्य और पद


संदर्भ:

जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष नीतीश कुमार को बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) विधायक दल का नेता चुना गया है। वह अब लगातार चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे।

नियुक्ति:

राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार- राज्यपाल की सहायता और सलाह प्रदान करने हेतु मुख्यमंत्री सहित एक मंत्रिपरिषद होगी।

मुख्यमंत्री के रूप में किसे नियुक्त किया जा सकता है?

राज्य विधान सभा के लिए आम चुनाव के बाद,  सदन में बहुमत हासिल करने वाले दल अथवा गठबंधन के द्वारा अपने नेता का चुनाव किया जाता है और राज्यपाल को इसके बारे में सूचित किया जाता है।

  • राज्यपाल, बहुमत प्राप्त दल अथवा गठबंधन द्वारा चुने गए व्यक्ति को औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त करता है तथा उससे मंत्रिपरिषद का गठन करने के लिए कहता है।
  • राज्य विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त होने की स्थिति में, राज्यपाल, सामान्यतः, सदन में सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने के लिए कहते हैं।

कार्यकाल

सैद्धांतिक रूप से, मुख्यमंत्री, राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। हालांकि, व्यवहारिक रूप से, राज्य विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता बने रहने तक मुख्यमंत्री अपने पद पर बना रहता है।

  • सदन में बहुमत का समर्थन खो देने की स्थिति में राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री को बर्खास्त किया जा सकता है।
  • राज्य विधान सभा भी अविश्वास प्रस्ताव पारित करके मुख्यमंत्री को पद से हटा सकती है।

मुख्यमंत्री की शक्तियां एवं कार्य

  • राज्यपाल को सहायता और सलाह देना।
  • मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद के प्रमुख होता है।
  • वह सदन के नेता होता है।
  • वह राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों के बारे में राज्यपाल को सूचित करता है।
  • उसके द्वारा सदन में सभी नीतियों की घोषणा की जाती है।
  • वह राज्यपाल को विधान सभा भंग करने की सिफारिश करता है।
  • वह राज्यपाल को समय-समय पर राज्य विधान सभा के सत्रों को बुलाने तथा समाप्त करने के संबंध में सलाह देता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मुख्यमंत्री के रूप में किसे नियुक्त किया जा सकता है?
  2. मुख्यमंत्री की नियुक्ति में राज्यपाल की भूमिका
  3. मंत्रिपरिषद
  4. शक्तियां
  5. कार्य
  6. कार्यकाल

मेंस लिंक:

राज्य के मुख्यमंत्री की भूमिका और कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

समय पर जांच पूरी न होने पर अभियुक्त को जमानत का अधिकार


(Accused can get bail if probe is not over in time)

संदर्भ:

हाल में एक फैसले के दौरान सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के अनुसार, यदि जांच एजेंसी द्वारा एक निर्धारित समय सीमा के भीतर जांच पूरी नहीं किए जाने पर किसी अभियुक्त को, उसके खिलाफ किसी भी दर्जे का मामला होने के बाबजूद, “डिफ़ॉल्ट” अथवा “अनिवार्य” जमानत प्रदान की जानी चाहिए।

इस संबंध में प्रावधान:

  • यदि जांच एजेंसी समय पर जांच पूरी करने में विफल रहती है तो अभियुक्त के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167(2) के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत का “अलोप्य अधिकार (Indefeasible Right)” प्राप्त होता है।
  • धारा 167 के तहत, किसी अभियुक्त को मृत्यु, आजीवन कारावास या 10 साल से अधिक की सजा वाले अपराध के लिए अधिकतम 90 दिनों तक हिरासत में रखा जा सकता है। किसी अन्य अपराध से संबंधित जांच के मामले में अभियुक्त को अधिकतम 60 दिनों की हिरासत में रखा जा सकता है।
  • इसके अलावा, मजिस्ट्रेटों के लिए अभियुक्तों को, विशेष रूप से गरीब तबके के लोगों को, अनिवार्य रूप से, डिफ़ॉल्ट जमानत के लिए आवेदन करने संबंधी उनके वैधानिक अधिकार के बारे में सूचित करना होगा।

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जेलों में विचारणाधीन (Undertrials) मामलों की संख्या में वृद्धि के कारण

  • अत्यधिक बोझ से दबी हुई न्यायपालिका, न्याय में देरी का एक बड़ा कारण है।
  • पुलिस और जेल अधिकारी अक्सर अपनी भूमिकाओं को पूरा करने में विफल रहते हैं, जिस कारण मामलों की सुनवाई में देरी होती है।
  • अधिकांश विचारणाधीन मामले वंचित सामाजिक समूहों से होते हैं – कई सर्वेक्षणों से ज्ञात हुआ है कि 50-55% अभियोगाधीन मामले अल्पसंख्यक समुदायों और दलित वर्गों से संबंधित होते हैं।
  • संसाधनों की कमी के कारण वह अपने लिए वकीलों की तलाश नहीं कर पाते हैं, तथा पुलिस और जेल अधिकारियों का रवैया उनके प्रति शत्रुतापूर्ण होता है, और ये शायद ही उनकी कभी मदद करते हो- हालांकि 1980 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत, कैदियों को जीवन और स्वतंत्रता के उनके मूल अधिकार के रूप में निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167
  2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 और 22
  3. अनुच्छेद 21 का अवलोकन

मेंस लिंक:

बड़ी संख्या में गरीब, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के लोग संपत्ति-आधारित जमानत प्रणाली और लचर कानूनी सहायता तंत्र के कारण जेलों में बंद हैं। इन विचारणाधीन मामलों का न्याय हेतु त्वरित निपटान किस प्रकार सुनिश्चित किया जा सकता है? टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

सरकार द्वारा ₹ 1.19 लाख करोड़ के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा


संदर्भ:

हाल ही में सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था में राहत और प्रोत्साहन उपायों हेतु 1.19 लाख करोड़ रुपए के नए पैकेज की घोषणा की गयी है। इसे ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान 3.0 का नाम दिया गया है।

पैकेज के प्रमुख घटक:

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इन उपायों का महत्व:

पिछले सात महीनों में इस तरह के उपाय सरकार की राजकोषीय अपरिवर्तनवाद (Fiscal Conservatism) की विचारधारा को सुदृढ़ कर रहे है- इसके विचारधारा के तहत विकास का दर्शन, प्रत्यक्षतः बड़े पैमाने पर नकदी हस्तांतरण के बजाय, घरेलू मांग को बढ़ावा देने, कंपनियों को रोजगार उत्पन्न करने और उत्पादन बढ़ाने हेतु प्रोत्साहन देने और साथ ही कठिन विपत्तियों में फंसे व्यक्तियों तथा फर्मों  के लिए लाभ प्रदान करने पर केंद्रित होता है।

इन उपायों की आवश्यकता:

हाल ही में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के व्यक्तव्य के अनुसार- वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली छमाही के दौरान देश ‘तकनीकी मंदी’ (Technical Recession) में प्रवेश कर गया है।

हालांकि, आरबीआई ने अर्थव्यवस्था में यथोचित वृद्धि की वापसी होने संबंधी भविष्यवाणी भी की है। यहां तक ​​कि रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर सर्विस ने भी भारत के संदर्भ में अपने जीडीपी अनुमानों को सकारात्मक दिशा में संशोधित किया है।

‘तकनीकी मंदी’ क्या होती है?

‘तकनीकी मंदी’ (Technical Recession), पिछले दो तिमाहियों के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगातार होने वाली गिरावट को दर्शाती है। ‘तकनीकी मंदी’ अर्थव्यवस्था में संकुचन का संकेतक होती है, क्योंकि, GDP किसी देश में, एक विशिष्ट अवधि के दौरान उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों को मापक होता है, अर्थात, ये अर्थव्यवस्था में कुल व्यय को मापता है।

क्या भारत में ‘तकनीकी मंदी’ अप्रत्याशित थी?

  • महामारी की समस्या के मद्देनजर मार्च के महीने में तालाबंदी की घोषणा होते ही अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के मंदी में चले जाने की आशंका व्यक्त की थी।
  • वास्तव में, अधिकांश अनुमानों के अनुसार, अर्थव्यवस्था में कम से कम एक और तिमाही, अक्टूबर से दिसंबर, तक संकुचन होने की संभावना है।

मंदी-काल की अवधि

  • आमतौर पर, मंदी कुछ तिमाहियों तक जारी रहती है। यदि, यदि किसी अर्थव्यवस्था में मंदी की अवधि (Recessionary Phase) एक वर्ष या उससे अधिक तक जारी रहती है तो, इसे अर्थव्यवस्था में महामंदी (Depressions) कहा जाता है।
  • यद्यपि, किसी भी अर्थव्यवस्था में महामंदी (Depressions) की स्थिति काफी दुर्लभ होती है और कम ही देखी जाती है। महामंदी की स्थिति, आखिरी बार अमेरिका में 1930 के दशक में देखी गई थी।
  • वर्तमान परिदृश्य में, किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से बचने के लिए, कोविड-19 के प्रसरण पर नियंत्रण करना, एक निर्णायक कारक है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मंदी से निपटने हेतु सरकार द्वारा घोषित उपाय और योजनायें
  2. ‘तकनीकी मंदी’ क्या होती है?
  3. मंदी और महामंदी के मध्य अंतर

मेंस लिंक:

‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ क्या है? कोविड महामारी की तरह संकट के समय में आत्मनिर्भरता और आत्म-दक्षता के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006


(The Scheduled Tribes and Other Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006)

संदर्भ:

हाल ही में, कर्नाटक के मैसूर जिले के 1,000 से अधिक आदिवासियों द्वारा ‘अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006’ (The Scheduled Tribes and Other Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006) के तहत वन भूमि पर उनके दावों की मान्यता प्रदान करने हेतु समीक्षा याचिका दायर की गयी थी, जिसे स्थानीय अधिकारियों द्वारा खारिज कर दिया गया।

आदिवासियों की याचिकाएं रद्द करने का कारण

आदिवासी, वन के अंदर अपने निवास संबंधी दावों को साबित करने हेतु प्रमाण प्रस्तुत करने में विफल रहे थे।

विशेषज्ञों ने इस तरह के निर्णयों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है- कि देश में जहां साक्ष्य और दस्तावेजों के रिकॉर्ड को संभाल कर रखना, आधुनिक समय की एक नवीन व्यवस्था है, ऐसे में आदिवासियों से 1972 में उनके बेदखल होने से पहले के, वन के अंदर निवास संबंधी दावों को साबित करने हेतु प्रमाण प्रस्तुत करना हास्यास्पद है और यह प्राकृतिक न्याय की अवधारणा का उल्लंघन है।

संबंधित प्रकरण

उच्चतम न्यायालय द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights ActsFRA) की वैधता पर सवाल उठाते हुए एक आदेश जारी किया गया था, जिसके अनुपालन हेतु कर्नाटक सरकार द्वारा जारी निर्देशों के तहत आदिवासियों द्वारा किये गए दावों की समीक्षा की गयी थी।

  • वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूरे भारत में लगभग दस लाख वनवासियों को वनों से बेदखल करने का आदेश दिया गया था। इन लोगों के दावे वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत खारिज कर दिए गए थे।
  • बाद में, अदालत ने अपने पूर्व आदेश पर रोक लगा दी और सभी राज्य सरकारों के लिए समीक्षा याचिका दायर करने और एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।

इस प्रकरण में क्या किया जा सकता था?

इन मामलों में अधिकारियों के लिए पहले वनवासियों के अधिकारों को मान्यता प्रदान करनी चाहिए थी, तत्पश्चात, इनके दावों को खारिज करने के बजाय पुनर्वास के माध्यम से वैकल्पिक समाधान प्रदान किया जा सकता था।

वन अधिकार अधिनियम (FRA) के बारे में:

अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वन क्षेत्र के निवासियों को (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम 2006 , जिसे वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights ActsFRA) भी कहा जाता है, वर्ष 2006 में पारित किया गया था। यह अधिनियम पारंपरिक वन वासी समुदायों के अधिकारों को कानूनी मान्यता प्रदान करता है।

अधिनियम के तहत अधिकार:

  • स्वामित्व अधिकार – वनवासियों अथवा आदिवासियों द्वारा 13 दिसंबर 2005 तक कृषि की जाने वाली भूमि पर, जो कि 4 हेक्टेयर से अधिक नहीं होनी चाहिए, उक्त तारीख तक वास्तव में कृषि करने वाले संबंधित परिवार को स्वामित्व अधिकार प्रदान किए जाएंगे। अर्थात, कोई अन्य नयी भूमि प्रदान नहीं की जाएगी।
  • अधिकारों का उपयोग- वनवासियों अथवा आदिवासियों के लिए, लघु वन उपज (स्वामित्व सहित), चारागाह क्षेत्र, तथा पशुचारक मार्ग संबंधी अधिकार उपलब्ध होंगे।
  • राहत और विकास अधिकार – वनवासियों अथवा आदिवासियों के लिए अवैध निकासी या बलपूर्वक विस्थापन के मामले में पुनर्वास का अधिकार तथा वन संरक्षण हेतु प्रतिबंधों के अधीन बुनियादी सुविधाओं का अधिकार प्राप्त होगा।
  • वन प्रबंधन अधिकार – जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा करने संबधी अधिकार होंगे।

पात्रता मापदंड:

वन अधिकार अधिनियम (FRA) की धारा 2(c) के अनुसार, वनवासी अनुसूचित जनजाति (Forest Dwelling Scheduled Tribe FDST) के रूप में अर्हता प्राप्त करने और FRA के तहत अधिकारों की मान्यता हेतु पात्र होने के लिए, आवेदक द्वारा निम्नलिखित तीन शर्तों को पूरा किया जाना आवश्यक है।

व्यक्ति अथवा समुदाय:

  1. अधिकार का दावा किये जाने वाले क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति का सदस्य होना चाहिए;
  2. 13-12-2005 से पहले मूल रूप से वन अथवा वन भूमि का निवासी होना चाहिए;
  3. आजीविका हेतु वास्तविक रूप से वन अथवा वन भूमि पर निर्भर होना चाहिए।

तथा, अन्य पारंपरिक वनवासियों (Other Traditional Forest Dweller OTFD) के रूप में अर्हता प्राप्त करने और FRA के तहत अधिकारों की मान्यता हेतु पात्र होने के लिए,  निम्नलिखित दो शर्तों को पूरा करना आवश्यक है:

व्यक्ति अथवा समुदाय:

  1. जो 13 दिसम्बर, 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढि़यों (75 वर्ष) तक मूल रूप से वन या वन भूमि में निवास करता हो।
  2. आजीविका हेतु वास्तविक रूप से वन अथवा वन भूमि पर निर्भर हो।

महत्वपूर्ण वन्यजीव वास स्थल:

महत्वपूर्ण वन्यजीव वास स्थलों (Critical Wildlife Habitats) को वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार- ‘राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के कुछ क्षेत्रों को महत्वपूर्ण वन्यजीव वास स्थल के रूप में घोषित किया जाता है। इन क्षेत्रों को वन्यजीव संरक्षण के उद्देश्य से अक्षत (inviolate) रखने हेतु, मामलों के अनुसार तथा वैज्ञानिक और विशिष्ट मानदंडों के आधार पर विशेष रूप से और स्पष्टतया निर्धारित किया जाता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पांचवी अनुसूची के तहत क्षेत्रों को सम्मिलित करने अथवा बहिष्कृत करने की शक्ति
  2. अनुसूचित क्षेत्र क्या होते हैं?
  3. वन अधिकार अधिनियम- प्रमुख प्रावधान
  4. इस अधिनियम के तहत अधिकार
  5. पात्रता मानदंड
  6. इन अधिकारों को मान्यता देने में ग्राम सभा की भूमिका
  7. महत्वपूर्ण वन्यजीव वास स्थल क्या होते हैं?

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

सबसे बड़े मुक्त व्यापार ब्लॉक ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (RCEP) की शुरुआत


संदर्भ:

हाल ही में, 37वें आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान सदस्य देशों के मध्य ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (Regional Comprehensive Economic PartnershipRCEP) की शुरुआत का समारोह आयोजित किया गया था।

‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (RCEP) के बारे में:

  • RCEP मेगा ट्रेड ब्लॉक में चीन के नेतृत्व में 15 देश (10 आसियान राष्ट्र और ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड) शामिल हैं।
  • यह समूह, संभावित रूप से कम से कम 30% वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व करेगा और यह विश्व का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता होगा।
  • यह मेगा व्यापार ब्लॉक, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में फैले सदस्य देशों के मध्य व्यापार वाणिज्य को बढ़ावा देगा।

RCEP के लक्ष्य और उद्देश्य:

  • उभरती अर्थव्यवस्थाओं को विश्व के शेष भागों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सहायता करने हेतु टैरिफ कम करना, तथा सेवा क्षेत्र में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना।
  • कंपनियों के लिए समय और लागत की बचत करने हेतु ब्लॉक के सदस्य देशों में भिन्न-भिन्न औपचारिकताओं को पूरा किये बिना किसी उत्पाद के निर्यात करने की सुविधा प्रदान करना।
  • इस समझौते में बौद्धिक संपदा संबंधी पहलुओं को शामिल किया गया है, किंतु इसमें पर्यावरण संरक्षण और श्रम अधिकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है।

RCEP का महत्व

‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (RCEP), मुख्य रूप से इस अर्थ में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए नए व्यापार नियमों को निर्धारित करता है – और इसके लिए चीन का समर्थन प्राप्त है लेकिन इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल नहीं है।

पर्यवेक्षकों का कहना है, कि RCEP एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की व्यापक भूराजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को सशक्त करेगा।

RCEP में भारत की अनुपस्थिति

भारत पिछले साल ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (RCEP) से चीन द्वारा उत्पादित सस्ते सामान के देश में प्रवेश करने संबंधी चिंताओं के कारण अलग हो गया था। हालांकि, भारत बाद में इस समझौते में शामिल हो सकता है।

  • भारत ने बाजार पहुंच से संबंधित मुद्दों के बारे में आवाज उठाई, तथा घरेलू उत्पादकों द्वारा देश में सस्ते चीनी सामानों की अत्याधिक आपूर्ति होने संबंधी आशंका को जायज ठहराते हुए समझौते से अलग हो गया।
  • क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले तीन कमजोर उद्योगों के रूप में कपड़ा, डेयरी और कृषि उद्योगों को चिह्नित किया गया था।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. RCEP – संरचना और उद्देश्य
  2. आसियान देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते
  3. आसियान देशों की भौगोलिक अवस्थिति
  4. RCEP के लक्ष्य और उद्देश्य

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

UAE द्वारा ‘गोल्डन’ वीजा हेतु पात्रता मानदंड में विस्तार


संदर्भ:

हाल ही में, संयुक्त अरब अमीरात (United Arab EmiratesUAE) द्वारा पेशेवरों, विशिष्ट डिग्री धारकों और अन्य लोगों के लिए अपनी ‘गोल्डन’ वीजा प्रणाली का विस्तार किया जाएगा।

पृष्ठभूमि:

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा वर्ष 2018 में  पहली बार दीर्घकालिक वीजा योजना की घोषणा की गयी थी, इसके पश्चात, यूएई द्वारा वर्ष 2019 में कुछ विदेशी निवेशकों, उद्यमियों, मुख्य कार्यकारी अधिकारियों, वैज्ञानिकों और उत्कृष्ट छात्रों को पांच  और दस वर्षीय नवीकरणीय वीजा देने की शुरुआत की गयी थी।

गोल्डन कार्ड’ स्थायी निवास योजना के बारे में:

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा विश्व के समृद्ध व्यक्तियों और असाधारण प्रतिभाओं को लुभाने के लिए ‘गोल्डन कार्ड’ स्थायी निवास योजना (Golden Card’ Permanent Residency Scheme) आरंभ की गयी है।

गोल्डन कार्ड’ वीजा की श्रेणियां:

  1. सामान्य निवेशकों को 10 वर्ष का स्थायी निवास वीजा प्रदान किया जाएगा।
  2. रियल एस्टेट निवेशक, 5 वर्षीय वीजा प्राप्त कर सकते हैं।
  3. एंटरप्रेन्योर्स और प्रतिभावान पेशेवर जैसे डॉक्टर, रिसर्चर्स और इनोवेटर्स को 10 वर्षीय वीजा मिल सकता है।
  4. ‘उत्कृष्ट छात्रों’ को भी 5 साल के स्थायी निवास वीजा की अनुमति दी जाएगी।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


प्यूर्टो रिको (Puerto Rico)

संदर्भ:

दस वर्षों में तीसरी बार, संयुक्त राज्य अमेरिका के प्यूर्टो रिको क्षेत्र में राज्य का दर्जा दिए जाने के पक्ष में मतदान किया गया है।

प्रमुख बिंदु:

  • प्यूर्टो रिको कैरिबियन सागर में स्थित एक स्पेनिश भाषी द्वीप है।
  • 1493 में क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा 1493 में खोज किये जाने के बाद से, प्यूर्टो रिको 4 शताब्दियों तक स्पेनिश साम्राज्य का एक हिस्सा था, वर्ष 1898 में संयुक्त राज्य द्वारा इसका राज्यहरण कर लिया गया था।
  • वर्ष 1917 में, प्यूर्टो रिको के निवासियों को अमेरिकी नागरिकता प्रदान की गई थी, लेकिन इस द्वीप को कभी भी पूर्ण राज्य नहीं बनाया गया था, और गुआम, उत्तरी मैरियाना द्वीप समूह, अमेरिकी समोआ और यूएस वर्जिन द्वीप समूह सहित एक “अमेरिकी क्षेत्र” बना हुआ है।

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ट्रिस्टन दा कुन्हा (Tristan da Cunha)

  • ट्रिस्टन दा कुन्हा अटलांटिक महासागर में एक द्वीप है जिसमें लगभग 300 निवासी हैं।
  • यह दक्षिण अटलांटिक में लंदन से 6,000 मील की दूरी पर द्वीपों की एक छोटी श्रृंखला है और द्वीपों के आसपास के पानी को दुनिया में सबसे अमीर माना जाता है।
  • यह ब्रिटेन का पारसमुद्रीय क्षेत्र है।
  • इसे हाल ही में अटलांटिक महासागर में 687,000 वर्ग किलोमीटर का सबसे बड़ा पूरी तरह से संरक्षित समुद्री भंडार घोषित किया गया था।

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