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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 5 November

 

विषय – सूची:

 सामान्य अध्ययन-I

1. वैवाहिक मामलों के लिए दिशानिर्देश

2. असम के मिया और उनकी चार-चपोरी संस्कृति

 

सामान्य अध्ययन-II

1. राजीव गांधी हत्या के दोषियों की याचिका पर राज्यपाल को निर्णय करने की शक्ति

2. टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट (TRP) मानदंडों की समीक्षा हेतु समिति का गठन

3. पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के बाहर

 

सामान्य अध्ययन-III

1. जैव-अपघटक तकनीक

2. स्मॉग एवं इसके हानिकारक प्रभाव

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. ‘आस-पास की चुनौतियों से निपटना’ कार्यक्रम

2. लुहरी जल विद्युत परियोजना

3. महत्वपूर्ण तितली प्रजातियां

4. लीशमैनिया डोनोवानी

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

वैवाहिक मामलों के लिए दिशानिर्देश


संदर्भ:

हाल ही उच्चत्तम न्यायालय द्वारा एक फैसले में वैवाहिक मामलों में गुजारा भत्ता के भुगतान पर दिशानिर्देश जारी किए गए है।

महाराष्ट्र के एक वैवाहिक मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत द्वारा यह फैसला सुनाया गया। इस मामले में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत पत्नी और बेटे के लिए गुजारा भत्ते का सवाल उठाया गया था।

उच्चत्तम न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुसार (संक्षिप्त अवलोकन):

  • परित्यक्त पत्नियां और बच्चे, अदालत में आवेदन करने की तारीख से, अपने पति से गुजारा भत्ता / भरण-पोषण के हकदार हैं।
  • इस निर्देश का उल्लंघन करने पर सिविल कारावास की सजा हो सकती है तथा परिसंपत्ति को पीड़ित के नाम किया जा सकता है।
  • पति द्वारा किसी आय-श्रोत नहीं होने की दलील, यदि वह अपाहिज नहीं है और पढ़ा-लिखा है, तो तथ्यतः उसे पत्नी की जिम्मेदारी उठाने के नैतिक कर्तव्य से मुक्त नहीं करेगी।
  • आवेदन करने वाली पत्नी और जबाबदेह पति, दोनों को, गुजरा-भत्ता संबंधी मामले में अपनी संपत्तियों और देनदारियों का खुलासा करना होगा। यदि किसी अन्य कानून के तहत इनके ऊपर पहले से कोई न्यायिक मामला लंबित है, तो उसे भी अदालत में घोषित करना होगा।
  • बच्चों के खर्च, उनकी शिक्षा, बुनियादी जरूरतों और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों को अदालतों द्वारा गुजारा भत्ता की गणना करते समय सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  • “महंगाई दर और जीवन यापन की उच्च लागत” जैसे अन्य कारकों पर विचार किया जाना चाहिए। पत्नी को वैवाहिक घर में उपयोग किये जाने वाले जीवन-मानकों के अनुकूल गुजारा भत्ता मिलना चाहिए।

आवश्यकता

पतियों द्वारा परित्यक्त महिलाएं कठोर हालात में छोड़ दी जाती है, अक्सर उनके पास खुद को और अपने बच्चों को पालने के लिए कोई साधन नहीं होते है और वे तंगहाली में जीवन-यापन करने को विवश होती हैं।

निहितार्थ:

महिलाओं द्वारा उनके विरक्त पतियों से गुजारे-भत्ते की मांग करने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पारिवारिक अदालतों, मजिस्ट्रेटों और निचली अदालतों इन एकसमान और व्यापक दिशा-निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए।

प्रीलिम्स लिंक और मेन्स लिंक:

उच्चत्तम न्यायालय द्वारा वैवाहिक मामलों में गुजारा भत्ता के भुगतान पर जारी दिशानिर्देशों और उनके महत्व का अवलोकन कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सामाजिक सशक्तीकरण, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद और धर्मनिरपेक्षता।

असम के मिया और उनकी चार-चपोरी संस्कृति


(The Miyas of Assam and their char-chapori culture)

संदर्भ:

हाल ही में, असम के ‘चार-चपोरी’ इलाके के निवासियों की संस्कृति और विरासत को प्रदर्शित करने हेतु एक ‘मिया संग्रहालय’ (Miya Museum) की स्थापना के प्रस्ताव से राज्य में विवाद उत्पन्न हो गया है।

कुछ असमवासियों की आपत्ति का कारण

‘मिया संग्रहालय’ को श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र, गुवाहाटी के परिसर में बनाने का प्रस्ताव किया गया है, यह कलाक्षेत्र, गुवाहाटी में एक सांस्कृतिक परिसर है, जिसका नाम नव-वैष्णव सुधारक श्रीमंत शंकरदेव के नाम पर रखा गया है।

  • आपत्ति करने वालों का कहना है, कि श्रीमंत शंकरदेव कालक्षेत्र जो असमिया संस्कृति का प्रतीक है और इसमें किसी अन्य संस्कृति को सम्मिलित नहीं किया जा सकता।
  • श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र की स्थापना असम समझौते (Assam Accord) के अनुच्छेद-6 के तहत किया गया था। अनुच्छेद-6 में, असमिया लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषायी पहचान और धरोहर का संरक्षण करने तथा उसे बढ़ावा देने के लिये उचित संवैधानिक, विधायी तथा प्रशासनिक उपाय करने का प्रावधान किया गया है।

‘मिया’ कौन हैं?

‘मिया’ समुदाय में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से असम में आए हुए मुस्लिम प्रवासियों के वंशज शामिल हैं। इन्हें अक्सर अपमानजनक तरीके से ‘मियां’ कहा जाता है।

  • इस समुदाय का असम में पलायन कई बार में हुआ है- इसकी शुरुआत 1826 में असम पर अंग्रेजों द्वारा कब्ज़ा किये जाने के पश्चात हुई, और 1947 में हुए विभाजन और 1971 में हुए बांग्लादेश मुक्ति युद्ध तक जारी रहा। इस कारण राज्य के इस क्षेत्र की जनसांख्यिकीय संरचना में परिवर्तन भी हुआ है।
  • बीते वर्षों में, इसने रूढ़िबद्ध तरीके से ‘मिया’ कहा जाने लगा और अक्सर ‘बंगलादेशी’ कहकर इनका उपहास किया जाता है।

‘चार-चापोरी’ क्या हैं?

‘चार’ (Char) एक तैरता हुआ द्वीप होता है, तथा ‘चपोरी’ (Chapori) बाढ़ प्रभावित नदी तट के निकटवर्ती निचले इलाके होते हैं।

  • बाढ़ और कटाव से ग्रसित इन इलाकों को निम्न विकास सूचकांकों द्वारा चिह्नित किया जाता है। और लगभग 80% चार-आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है।
  • UNDP असम मानव विकास की 2014 रिपोर्ट में चार-क्षेत्रों को ‘संचार-सुविधाओं के अभाव, प्राथमिक शिक्षा से आगे पर्याप्त स्कूली शिक्षा सुविधाओं की कमी, बाल विवाह, गरीबी और अशिक्षा’ से ग्रसित क्षेत्र के रूप में बताया गया है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मिया कौन हैं?
  2. चार-चापोरी क्या हैं?
  3. असम समझौते का अनुच्छेद-6

मेंस लिंक:

मिया कौन हैं? उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

राजीव गांधी हत्या के दोषियों की याचिका पर राज्यपाल को निर्णय करने की शक्ति


संदर्भ:

हाल ही में, उच्चत्तम न्यायालय ने कहा है, कि वर्ष 1991 में हुए राजीव गांधी हत्याकांड के पीछे ‘बड़ी साजिश’ की जांच कर रही बहु-विषयक निगरानी एजेंसी (Multi-Disciplinary Monitoring AgencyMDMA) द्वारा तमिलनाडु के राज्यपाल को ए.जी. पेरारिवलन जैसे दोषियों की क्षमा-याचना पर निर्णय लेने में बाधक पहुचाने की आवश्यकता नहीं है। ये दोषी दो दशक से अधिक समय से जेल की सजा भुगत रहे हैं।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत पेरारिवलन की क्षमा-याचिका पर निर्णय करने का अधिकार राज्यपाल को प्रदान किया गया है।

पृष्ठभूमि:

पेरारिवलन द्वारा 30 दिसंबर, 2015 को राज्यपाल के समक्ष क्षमा-याचना की अर्जी दी गयी थी। लगभग तीन साल बाद, सितंबर 2018 में,  सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल से क्षमा-याचना पर, जैसा वह उचित समझे, निर्णय देने को कहा था।

राज्यपाल की क्षमादान शक्तियां

संविधान के अनुच्छेद 161 में राज्यपाल को क्षमादान की शक्ति प्रदान की गई है।

  • इसके तहत, किसी राज्य के राज्यपाल को राज्य की कार्यपालिका शक्ति के अंतर्गत आने वाले विषयों के संदर्भ में, किसी विधि विरुद्ध अपराध के लिए दोष-सिद्ध ठहराये गये किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलम्बन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्रदान की गयी है।
  • राज्यपाल को मृत्यदंड को क्षमा करने का अधिकार नहीं है। (मृत्यदंड को क्षमा करने की शक्ति राष्ट्रपति के पास होती है)।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राज्यपाल और राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियों का विस्तृत अवलोकन
  2. संबंधित संवैधानिक प्रावधान
  3. क्षमादान संबंधित फैसलों के खिलाफ अपील
  4. क्या न्यायालय इन मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है?
  5. इन मामलों में मंत्रिमंडल की भूमिका

मेंस लिंक:

भारत में राष्ट्रपति और राज्यपाल को प्राप्त शक्तियों की विस्तृत तुलना कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्त्वपूर्ण पक्ष, ई-गवर्नेंस- अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएँ, सीमाएँ और संभावनाएँ; नागरिक चार्टर, पारदर्शिता एवं जवाबदेही और संस्थागत तथा अन्य उपाय।

टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट (TRP) मानदंडों की समीक्षा हेतु समिति का गठन


हाल ही में, सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा टेलीविजन रेटिंग एजेंसियों के लिए लागू दिशानिर्देशों की समीक्षा करने हेतु चार सदस्यीय समिति का गठन किया गया है।

इस समिति की अध्यक्षता प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शशि शेखर वेम्पती द्वारा की जाएगी।

पृष्ठभूमि:

सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा द्वारा यह कदम मुंबई पुलिस की TRP मामले की जांच के बाद उठाया गया है। मुंबई पुलिस की जांच के अनुसार, कुछ समाचार चैनलों द्वारा टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट के साथ छेड़छाड़ की गयी थी।

नए दिशानिर्देशों की आवश्यकता:

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) द्वारा हाल ही में की गयी सिफारिशों और तकनीकी प्रगति को ध्यान में रखते हुए और एक विश्वसनीय और पारदर्शी रेटिंग प्रणाली प्रक्रियाओं को अधिक सशक्त बनाने हेतु टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट (TRP) संबंधी नए दिशानिर्देशों की आवश्यकता महसूस की गई है।

टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट (TRP) क्या होते है?

  • टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट्स (Television Rating Points- TRP), विपणन और विज्ञापन एजेंसियों द्वारा किसी कार्यक्रम अथवा चैनल को देखने वालों की गणना करने हेतु उपयोग किये जाने वाले मापक होते हैं।
  • TRP यह दर्शाती है कि किस सामाजिक-आर्थिक श्रेणी से कितने लोगों द्वारा किसी विशेष अवधि के दौरान कितने समय तक किन चैनलों या प्रोग्राम को देखा जाता है।

TRP की गणना किस प्रकार की जाती है?

भारत में, TRP को ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल द्वारा बार-ओ-मीटर (Bar-O-Meters) का उपयोग करके रिकॉर्ड किया जाता है।

  • इन बार-ओ-मीटर्स को चयनित परिवारों के टीवी सेट में लगाया जाता है।
  • ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) द्वारा, अब तक, देश भर में 44,000 घरों में बार-ओ-मीटर्स लगाए गए हैं।

TRP का महत्व

  • दर्शकों की गणना-आंकड़ों के आधार पर, टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों को रेटिंग्स दी जाती है।
  • टेलीविज़न रेटिंग्स, दर्शकों के लिए बनाए गए कार्यक्रमों को प्रभावित करती हैं।
  • बेहतर रेटिंग किसी कार्यक्रम को बढ़ावा देती है, जबकि खराब रेटिंग किसी कार्यक्रम को हतोत्साहित करती है।
  • गलत रेटिंग दिए जाने से वास्तव में कम लोकप्रिय कार्यक्रमों का प्रसारण जारी रह सकता है, जबकि अच्छे कार्यक्रमों का प्रसारण रोआ जा सकता है।
  • इसके अतिरिक्त, ऐसा समझा जाता है कि, जिस टीवी चैनल अथवा कार्यक्रम की रेटिंग सबसे ज्यादा होगी, उसे सबसे ज्यादा लोग देखते होंगे।
  • इसलिये विज्ञापनदाता सर्वाधिक TRP वाले चैनलों/ कार्यक्रमो के लिए विज्ञापन देना पसंद करते हैं।

ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC)

ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (Broadcast Audience Research Council), विज्ञापनदाताओं, विज्ञापन एजेंसियों और प्रसारण कंपनियों के संयुक्त स्वामित्व वाला एक औद्योगिक निकाय है। जिसका प्रतिनिधित्व द इंडियन सोसाइटी ऑफ एडवरटाइज़र्स, इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन और एडवरटाइजिंग एजेंसीज़ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया द्वारा किया जाता है।

  • इसका गठन वर्ष 2010 में किया गया था।
  • सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा 10 जनवरी, 2014 को भारत में टेलीविजन रेटिंग एजेंसियों के लिए नीतिगत दिशानिर्देशों को अधिसूचित किया गया और इन दिशानिर्देशों के तहत जुलाई 2015 में BARC को पंजीकृत किया गया।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. TRP क्या है?
  2. TRP की गणना किस प्रकार की जाती है?
  3. BARC क्या है?

मेंस लिंक:

टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट (TRP)  से आप क्या समझते हैं? इसमें धांधली कैसे हो सकती है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।

पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के बाहर


संदर्भ:

हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका, औपचारिक रूप से, जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण करने संबंधी पेरिस समझौते से अलग हो गया है।

वर्तमान में वर्ष 2015 के पेरिस समझौते में 189 सदस्य हैं।

पेरिस समझौता

यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये एक ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, तथा यह वैश्विक ग्रीनहाउस उत्सर्जन को कम करने हेतु एक समान लक्ष्य निर्धारित करने के लिए लगभग 200 देशों को एक साथ लाता है।

  1. इस समझौते में कार्बन उत्सर्जन में कटौती के जरिये वैश्विक तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस के अंदर सीमित रखने और तापमान वृद्धि को और 1.5 डिग्री सेल्सियस रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
  2. इन उद्देश्यों को पूरा करने हेतु, प्रत्येक देश ने उनके ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को सीमित करने वाली लक्षित कार्य योजनाओं को लागू करने का संकल्प लिया है।
  3. इस समझौते में जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा अनुकूलन करने के प्रयास में, समृद्ध और विकसित देशों से, विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए कहा गया है।

कोई देश समझौते से किस प्रकार अलग हो सकता है?

  • पेरिस समझौते का अनुच्छेद 28 के तहत किसी सदस्य राष्ट्र के लिए पेरिस समझौते से अलग होने संबंधी प्रावधान किये गए हैं।
  • किसी सदस्य- राष्ट्र द्वारा पेरिस समझौते के लागू होने के न्यूनतम तीन साल बाद ही समझौते से अलग होने का नोटिस दिया जा सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पेरिस समझौता क्या है?
  2. किन देशों ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं?
  3. पेरिस समझौते के लक्ष्य
  4. पेरिस समझौते के तहत निर्धारित वित्त व्यवस्था।

मेंस लिंक:

पेरिस जलवायु समझौते के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

जैव-अपघटक तकनीक


(Bio-decomposer technique)

संदर्भ:

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अनुसार, फसल-अपशिष्ट / पराली को खाद में परिवर्तित करने वाली जैव-अपघटक तकनीक (Bio-decomposer technique) ने सफलता दिखाई है।

मुख्यमंत्री केजरीवाल का यह दावा एक खेत में दिल्ली सरकार द्वारा इस तकनीक के प्रयोग से प्राप्त प्रारंभिक परिणामों पर आधारित था। तकनीक में प्रयुक्त जैव-अपघटक घोल को पूसा (PUSA) इंस्टिट्यूट के निर्देशन में विकसित किया गया था।

निहितार्थ

  • दिल्ली सरकार, कम लागत और प्रभावकारी जैव-अपघटक तकनीक को प्रदूषण से निपटने के लिए एक विकल्प के रूप में उच्चतम न्यायालय में पेश करेगी।
  • इस तकनीक को पंजाब और हरियाणा में भी किसानों द्वारा उपयोग किया जा सकता है।

जैव-अपघटक का निर्माण

इस तकनीक में प्रयुक्त जैव-अपघटक घोल को पूसा डीकंपोजर (Pusa Decomposer) भी कहा जा रहा है।

  • पूसा डीकंपोजर सात कवकों का एक मिश्रण होता है जो पराली (Paddy Straw) में पाए जाने वाले सेल्युलोज, लिग्निन और पेक्टिन को गलाने वाले एंजाइम का उत्पादन करता है।
  • यह कवक 30-32 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले वातावरण विकसित होते है, और धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के समय यही तापमान होता है।

पूसा डीकंपोजर का खेतों में उपयोग किस प्रकार किया जाता है?

पूसा डीकंपोज़र कैप्सूल (Decomposer Capsules) का उपयोग करके एक ‘अपघटक घोल’ बनाया जाता है।

  • अपघटक घोल को 8-10 दिन किण्वित (fermenting) करने के पश्चात तैयार मिश्रण का फसल अपशिष्ट/पराली के शीघ्र जैव-अपघटन के लिए खेतों में छिड़काव किया जाता है।
  • किसान, चार पूसा डीकंपोज़र कैप्सूल, गुड़ और चने के आटे से 25 लीटर अपघटक घोल मिश्रण को तैयार कर सकते हैं, और यह 1 हेक्टेयर भूमि पर छिड़काव करने के लिए पर्याप्त होता है।
  • जैव अपघटन की प्रक्रिया को पूरा होने में लगभग 20 दिनों का समय लगता है। इसके बाद किसान पराली को जलाए बिना फिर से बुवाई कर सकते हैं।

पूसा डीकंपोजर के लाभ:

  • इस तकनीक के प्रयोग से मृदा की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार होता है क्योंकि पराली फसलों के लिए उर्वरक का काम करती है और भविष्य में कम खाद लगाने की आवश्यकता होती है।
  • यह फसल-अपशिष्ट / पराली को जलाने से रोकने हेतु एक प्रभावी, सस्ती और व्यावहारिक तकनीक है।
  • यह पर्यावरण के अनुकूल और पर्यावरण की दृष्टि से उपयोगी तकनीक भी है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पूसा डीकंपोजर किस प्रकार विकसित किए गया है?
  2. इनका किस लिए उपयोग किए जाता है?
  3. पराली जलाने पर उत्सर्जित प्रदूषक तत्व

मेंस लिंक:

पंजाब और हरियाणा के राज्यों में पराली जलने से दिल्ली की वायु गुणवत्ता किस प्रकार प्रभावित होती है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

स्मॉग एवं इसके हानिकारक प्रभाव


संदर्भ:

दिल्ली के वातावरण में उच्च प्रदूषण के धूम्र-कोहरे/ स्मॉग (Smog) की मात्रा में वृद्धि हुई है। इस वर्ष अक्टूबर माह में दिल्ली में वायु प्रदूषण की मात्रा पिछले वर्ष की तुलना में अधिक थी।

धूम्र-कोहरा / स्मॉग क्या होता है?

यह, कोहरे (Fog), घूल कणों और और वायु प्रदूषकों जैसे नाइट्रोजन ऑक्साइड, वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों आदि का एक हानिकारक मिश्रण होता है। स्मॉग, सौर-प्रकाश के साथ मिलकर धरातल के ऊपर ओजोन की घनी परत का निर्माण करता है।

वायुमंडल में ऊंचाई पर पायी जाने वाली ओजोन लाभकारी होती है, किंतु धरातल के निकट ओजोन की उपस्थिति स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालती है।

(नोट: ‘स्मॉग’ शब्द पहली बार प्रयोग जुलाई 1905 में डॉ. हेनरी अंतोइन दे वू (Dr Henry Antoine des Voeux) द्वारा अपने शोधपत्र ‘धुआं एवं कोहरा’ (Fog and Smoke) में किया गया था।)

स्मॉग का निर्माण

यह, ओजोन तथा सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और PM10 जैसे हानिकारक पदार्थों से बना होता है। ये पदार्थ मनुष्य के फेफड़ों के लिए अति-हानिकारक होते हैं।

स्मॉग निर्माण के स्रोत

  1. किसी क्षेत्र में बड़ी मात्रा में कोयला-दहन
  2. कटाई एवं दहन कृषि / फसल-अपशिष्ट का जलाना (दिल्ली में स्मॉग का एक प्रमुख स्रोत)
  3. स्मॉग का निर्माण करने वाले प्रदूषक के स्रोत, जैसे कि, ऑटोमोबाइल उत्सर्जन, विद्युत् संयंत्र, आतिशबाजी, पेंट, हेयरस्प्रे, चारकोल स्टार्टर द्रव और प्लास्टिक पॉपकॉर्न पैकेजिंग आदि।

स्मॉग निर्माण स्थानीय मौसम की भूमिका:

स्मॉग के निर्माण में तापमान, सौर-प्रकाश और शांत हवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक उष्ण दिन होने पर स्मॉग का निर्माण अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक तीव्रता से हो सकता है।

स्मॉग के प्रकार

अब तक दो भिन्न प्रकारों के स्मॉग की पहचान की गयी है: गंधकीय स्मॉग (Sulfurous Smog) और प्रकाश-रसायनिक स्मॉग (Photochemical Smog)।

  • गंधकीय स्मॉग को लंदन स्मॉग (London Smog) के नाम से भी जाना जाता है। यह वायु में सल्फर ऑक्साइड की उच्च सांद्रता के कारण निर्मित होता है।
  • प्रकाश-रसायनिक स्मॉग का निर्माण सौर-प्रकाश, नाइट्रोजन ऑक्साइड और वायुमंडल में उपस्थित किसी वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (Volatile Organic Compound- VOC) के परस्पर अभिक्रिया करने से होता है।

स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव:

  • धूम्र-कोहरे में लंबे समय तक सांस लेने से मनुष्य की श्वसन-नलिकाओं में सूजन आ सकती है।
  • स्मॉग के कारण फेफड़ों में सूजन आ सकती है, जिसके परिणामस्वरूप फेफड़ों से इंटरल्यूकिन -6 (Interleukin-6) का स्राव होता है, जो मनुष्य के हृदय और श्वसन नलिकाओं में रक्त के थक्के बनाने का कारण होता है, और इससे दिल का दौरा पड़ने या स्ट्रोक जैसी बीमारियां हो सकती है।
  • यह मनुष्य की नाक और गले की सुरक्षात्मक झिल्लियों को सुखा सकता है।
  • यह शरीर में संक्रमण-प्रतिरोधी क्षमता को हानि पंहुचा सकता है, इसलिए, बीमारी के प्रति आपकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
  • इससे पारा-बैगनी विकिरण की मात्रा काफी कम हो जाती है, जिससे विटामिन डी जैसे महत्वपूर्ण तत्वों का बनना का हो सकता है।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


‘आस-पास की चुनौतियों से निपटना’ कार्यक्रम

  • इस कार्यक्रम को केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया है।
  • यह छोटे बच्चों और उनके परिवारों के लिए शहरों को आकार देने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अड़ोस-पड़ोस की चुनौतियों से निपटने के लिए एक कार्यक्रम है ।
  • यह कार्यक्रम 100 स्मार्ट शहरों, 5 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों और राज्य / केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानियों में शुरू किया जाएगा।

लुहरी जल विद्युत परियोजना

  • मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (CCEA) ने हिमाचल प्रदेश सतलुज नदी पर स्थित 210 मेगावाट क्षमता वाली लुहरी जल विद्युत परियोजना के लिए 56 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव को मंजूरी दी है।
  • यह परियोजना हिमाचल प्रदेश के कुल्लू और शिमला जिलों में स्थित है।

महत्वपूर्ण तितली प्रजातियां

नोट: निम्नलिखित प्रजातियां और उनके वास-स्थल, आज के ‘द हिंदू’ समाचार पत्र में दिए गए एक लेख पर आधारित हैं। इन सभी प्रजातियों के नामों को रटना आवश्यक नहीं है। बस एक संक्षिप्त अवलोकन पर्याप्त है।

संदर्भ:

तितलियों का मौसम आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत के साथ शुरू होता है; और मानसून के जाने के बाद फरवरी तक जारी रहता है। इस साल,  देश भर में विशेष रूप से कई दुर्लभ तितली प्रजातियों को देखा गया है।

प्रमुख बिंदु:

  • वर्ष 2015-16 के दौरान केरल के नेय्यार वन्यजीव अभयारण्य में 100 वर्षों के बाद पांच धारियों वाली (Striated Five-ring) तितली की प्रजाति देखी गई।
  • तितलियों के बारे के खोजी व्यक्तियों द्वारा 130 साल बाद नीलगिरि प्लेन ऐस (Nilgiri Plain Ace) प्रजाति फिर से खोजा गया।
  • विशाखापत्तनम में पहली बार देखी गयी मार्बल मैप तितली (Marbled Map butterfly) को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची II के तहत संरक्षित किया गया है। यह ‘दुर्लभ’ प्रजाति सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, झारखंड, भूटान और म्यांमार के पहाड़ी जंगलों तक सीमित है।
  • मालाबार बैंडेड पीकॉक (Malabar Banded Peacock) प्रजाति दक्षिण भारत के लिए स्थानिक है।
  • हाल ही में, ब्रांडेड रॉयल (Branded Royal) प्रजाति 130 से अधिक वर्षों के अंतराल के बाद यह नीलगिरी क्षेत्र में पाई गयी।
  • ब्लू मॉर्मन (Blue Mormon), एक काले रंग की मखमली पंखों वाली तितली, पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली एक प्रजाति, पटना में देखी गयी।
  • छत्तीसगढ़ के संरक्षित वनों में एंजल बटरफ्लाई (Angle butterfly) तितली देखी गई है।
  • लीलिएक सिल्वरलाइन (Liliac Silverline), एक संरक्षित प्रजाति, जो बेंगलुरु में पायी जाती है, पहली बार राजस्थान के अरावली रेंज में देखी गई।

(https://epaper.thehindu.com/Home/MShareArticle?OrgId=GGA7UBB92.1&imageview=0.)

लीशमैनिया डोनोवानी

(Leishmania donovani)

लीशमैनिया डोनोवानी (कालाजार रोग परजीवी), के रोगजनन क्षमता एवं उसके अस्तित्व की रणनीति को समझने की दिशा में किए गए उनके महत्वपूर्ण शोध कार्य के लिए CSIR-CDRI लखनऊ के वैज्ञानिक को इस साल के प्रोफेसर ए.एन. भादुड़ी मेमोरियल लेक्चर अवार्ड के लिए चुना गया है।

  • लीशमैनिया डोनोवानी एक प्रोटोजोअन परजीवी है जो मैक्रोफेजकोशिकाओं को संक्रमित करता है और दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करने वाले एक घातक संक्रामक रोग,लीश्मेनीयासिस (कालाजार) का मुख्य कारक है।
  • यह प्लीहा, यकृत और अस्थि मज्जा सहित मोनोन्यूक्लियर फैगोसाइट सिस्टम को संक्रमित करता है।

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