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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 3 November

 

विषय – सूची

 सामान्य अध्ययन-II

1. न्यायालय की अवमानना

2. सांसदों पर मुकद्दमा चलाने हेतु विशेष अदालतों के गठन पर सवाल

3. राज्यों द्वारा केंद्र सरकार निर्मित कानूनों को लागू करने से इनकार करने की शक्ति

4. ‘प्रत्यर्पण’ क्या होता है?

 

सामान्य अध्ययन-III

1. यमुना में अमोनिया के स्तर में वृद्धि

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. ओडिशा में नशीले पदार्थों की खेती का पता लगाने के लिए उपग्रह का उपयोग

2. केरल लोक सेवा आयोग में सामान्य श्रेणी के गरीबों के लिए 10% कोटा

3. त्रावणकोर कछुआ

4. मिशन सागर- II

5. महारानी जिन्द कौर

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

न्यायालय की अवमानना


(Contempt of Court)

संदर्भ:

हाल ही में, भारत के महान्यायवादी (Attorney general) द्वारा आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन रेड्डी के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मामला शुरू करने के लिए सहमति देने से इंकार कर दिया गया है।

संबंधित प्रकरण

पिछले महीने, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन रेड्डी द्वारा आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की शिकायत करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) एस.ए. बोबडे को एक पत्र लिखा गया था। पत्र में, मुख्यमंत्री ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय पर उनकी लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने तथा उसे गिराने के प्रयासों में सहायता करने का आरोप लगाया था।

इसके पश्चात, एक वकील ने महान्यायवादी को पत्र लिखकर मुख्यमंत्री जगन रेड्डी और उनके सलाहकार के खिलाफ न्यायालय की अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने के लिए उनकी सहमति माँगी थी।

अवमानना क्या होती है?

भारतीय विधिक संदर्भ में अदालत की अवमानना संबंधी क़ानून सबसे विवादास्पद तत्वों में से एक है।

यद्यपि, अवमानना ​​कानून की मूल अवधारणा, अदालत के आदेशों का सम्मान नहीं करने वालों अथवा अवहेलना करने वालों को दंडित करना है, परन्तु, भारतीय संदर्भ में, अदालत की गरिमा को ठेस पहुचाने वाले व्यक्तव्यों तथा न्यायिक प्रशासन में बाधा पहुचाने पर भी दण्डित करने हेतु अवमानना क़ानून ​​का उपयोग किया जाता है।

न्यायालय की अवमानना के प्रकार

भारत में अदालत की अवमानना दो प्रकार की होती है:

  1. सिविल अवमानना: न्यायालय के किसी भी फैसले, आदेश, दिशा-निर्देश, रिट या अदालत की अन्य प्रक्रियाओं के जानबूझ कर किये गए उल्लंघन को सिविल अवमानना के अंतर्गत रखा जाता है।
  2. आपराधिक अवमानना: आपराधिक अवमानना ​​को किसी भी विषय (मौखिक या लिखित शब्दों से, संकेतों, दृश्य प्रतिबिंबो, अथवा किसी अन्य प्रकार से) के प्रकाशन द्वारा अदालत की निंदा करने अथवा न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने अथवा बाधा डालने के प्रयास को सम्मिलित किया जाता है।

संबंधित प्रावधान:

  1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 में क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय को न्यायालय की अवमानना ​​के लिए दोषी व्यक्तियों को दंडित करने की शक्ति प्रदान की गयी है।
  2. 1971 की अवमानना अधिनियम की धारा 10 में उच्च न्यायालय द्वारा अपने अधीनस्थ न्यायालयों को अवमानना करने पर दंडित करने संबंधी शक्तियों को परिभाषित किया गया है।
  3. संविधान में लोक व्यवस्था तथा मानहानि जैसे संदर्भो सहित अदालत की अवमानना के रूप में, अनुच्छेद 19 के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध को भी सम्मिलित किया गया है।

कृपया ध्यान दें:

उच्चत्तम न्यायालय के लिए आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने हेतु महान्यायवादी की सहमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। वह, संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी कर अवमानना कार्यवाही शुरू कर सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अवमानना के संदर्भ में उच्चत्तम न्यायालय तथा उच्च न्यायलय की शक्तियां
  2. इस संबंध में संवैधानिक प्रावधान
  3. न्यायलय की अवमानना (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा किये गए परिवर्तन
  4. सिविल बनाम आपराधिक अवमानना
  5. अनुच्छेद 19 के तहत अधिकार
  6. 1971 की अवमानना अधिनियम की धारा 10 किससे संबंधित है?

मेंस लिंक:

भारत में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवमानना मामलों को किस प्रकार हल किया जाता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

सांसदों पर मुकद्दमा चलाने हेतु विशेष अदालतों के गठन पर सवाल


संदर्भ:

हाल ही में, मद्रास उच्च न्यायालय के तीन-न्यायाधीशों की समिति द्वारा सांसदों और विधायकों द्वारा किये गए विभिन्न अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन करने की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है।

पृथक अदालतों का गठन क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

  • अदालतें ‘अपराध-केंद्रित’ होनी चाहिए न कि ‘अपराधी-केंद्रित’।
  • विशेष अदालतों का गठन केवल विधि द्वारा किया जा सकता है। इन्हें कार्यकारी या न्यायिक आदेश द्वारा स्थापित नहीं किया जा सकता है।

उच्च न्यायालय की इन टिप्पणियों का महत्व

  • रिपोर्ट का समय: उच्च न्यायालय की समिति की यह रिपोर्ट, वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक आदेश के विपरीत है। उच्चत्तम न्यायालय ने अपने आदेश में केंद्र सरकार को विशिष्ट रूप से आपराधिक राजनेताओं पर मुकद्दमा चलाने हेतु देश भर में 12 विशेष अदालतें स्थापित करने के लिए अधिकृत किया था।
  • यह रिपोर्ट ऐसे समय में आयी है, जब शीर्ष न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की एक पीठ इस प्रक्रिया को शीघ्रता से निपटाने के तरीकों पर विचार रही है, क्योंकि कुछ मामलों में सुनवाई वर्षों से और कुछ में दशकों से अटकी हुई है।

विशेष अदालतों की आवश्यकता

  • पूरे देश में विधायकों के खिलाफ 4000 से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें से 2,556 मामले मौजूदा संसद सदस्यों और विधायकों के खिलाफ हैं।
  • इन संसद सदस्यों और विधायकों के खिलाफ भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, मानहानि और धोखाधड़ी आदि से संबंधित मामले लंबित हैं।
  • इनमे से अधिकाँश मामले IPC की धारा 188 के तहत लोक सेवकों द्वारा जारी किये गए आदेशों के उल्लंघन संबंधी हैं।
  • काफी मामले सुनवाई के पहले चरण में ही लंबित हैं, और यहाँ तक कि अदालतों द्वारा जारी किये गए कई ‘गैर-जमानती वारंट्स’ (NBW) पर अमल तक नहीं किया गया है।
  • इसके अलावा, बिहार के 89% विधानसभा क्षेत्रों में तीन या इससे अधिक उम्मीदवारों द्वारा वर्तमान में जारी चुनावों के लिए अपने हलफनामों में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले घोषित किए गए हैं।

आगे की राह

  1. राजनीतिक दलों को दागी उम्मीदवारों को टिकट देने से मना कर देना चाहिए।
  2. जघन्य प्रकृति के मामलों में नामजद उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने हेतु जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन किया जाना चाहिए।
  3. दागी विधायकों से संबंधित मामलों को फास्ट-ट्रैक अदालतों के माध्यम से तेजी से निपटाना चाहिए।
  4. चुनाव प्रचार अभियान के वित्तपोषण में अधिक पारदर्शिता लायी जाए।
  5. भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को राजनीतिक दलों के वित्तीय खातों के लेखा परीक्षण की शक्ति प्रदान की जानी चाहिए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8
  2. उच्चत्तम न्यायालय के दिशानिर्देश
  3. भारत निर्वाचन आयोग (ECI) – संरचना और कार्य
  4. उम्मीदवारों के निर्वाचन से संबंधित मामलों पर निर्वाचन आयोग की शक्तियां

मेंस लिंक:

राजनीति के अपराधीकरण से जुड़ी चिंताओं, और इस संदर्भ में उच्चत्तम न्यायालय द्वारा उठाये गए कदमो के बारे में चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

राज्यों द्वारा केंद्र सरकार निर्मित कानूनों को लागू करने से इनकार करने की शक्ति


संदर्भ:

हाल ही में, राजस्थान विधानसभा द्वारा केंद्र सरकार के कृषि संबंधित कानूनों को निष्प्रभावी करने हेतु तीन विधेयकों को पारित किया गया है।

केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ राज्य विधानसभा में पारित तीन कृषि संशोधन विधेयक:

  1. कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण)(राजस्थान संशोधन) विधेयक 2020
  2. कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा कर पर करार (राजस्थान संशोधन) विधेयक 2020
  3. आवश्यक वस्तु (विशेष उपबंध और राजस्थान संशोधन) विधेयक 2020

विवाद का कारण

केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानून, राज्यों के संबंधित विषयों पर कानून बनाने के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन हैं।

  • केंद्र सरकार के तीनों कृषि अधिनियमों का मुख्य विषय कृषि और बाजार हैं। संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार ‘कृषि और बाजार’ वास्तव में राज्य के विषय हैं।
  • हालाँकि, केंद्र सरकार ने खाद्य पदार्थों पर क़ानून बनाने के अपने अधिकार को गलत तरीके से कृषि संबधित विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार मानते हुए तीनों कृषि अधिनियमों को पारित कर दिया है। खाद्य पदार्थ संविधान में समवर्ती सूची का विषय है।
  • खाद्य पदार्थ और कृषि उत्पाद अलग-अलग श्रेणियों में आते हैं क्योंकि कई कृषि उत्पाद अपने मूल स्वरूप में खाद्य पदार्थ नहीं होते हैं, तथा कई खाद्य पदार्थ अपने मूल स्वरूप में कृषि उत्पाद नहीं होते हैं।

इस संदर्भ में संवैधानिक प्रावधान

संविधान के तहत ‘कृषि’ राज्य सूची का विषय है।

परंतु, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 के तहत, केंद्र और राज्य, दोनों को, कृषि सहित किसी भी उद्योग से संबंधित उत्पादों के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करने की शक्तियां प्रदान की गयी हैं।

  • आमतौर पर, जब कोई राज्य, समवर्ती सूची के किसी विषय पर बने केंद्रीय कानून में संशोधन करना चाहता है, तो उसे केंद्र से स्वीकृति लेने की आवश्यकता होती है।
  • जब केंद्र तथा राज्य द्वारा एक ही विषय पर क़ानून बनाया जाता है, तो संसद द्वारा पारित कानून प्रभावी होता है।

संविधान में इस प्रकार के प्रावधान का कारण

इस व्यवस्था की परिकल्पना का कारण है, कि संसद द्वारा बनाये गए अधिकांश कानून पूरे भारत में लागू होते हैं और राज्य द्वारा विवेकहीनता से केंद्रीय कानूनों में संशोधन करने से देश के विभिन्न भागों में क़ानून के लागू होने में असंगतता हो सकती है। व्यापार और वाणिज्य के संदर्भ में, इस प्रकार के मामले विशेष रूप से गंभीर समस्याएं पैदा कर सकते है।

राज्यों के पास उपलब्ध अन्य विकल्प

इन कानूनों की वैधता को लेकर राज्य, केंद्र के खिलाफ उच्चत्तम न्यायालय में मामले को ले जा सकते हैं।

  • संविधान का अनुच्छेद 131 में सर्वोच्च न्यायालय को राज्यों और केंद्र के बीच होने वाले विवादों का निपटान करने संबंधी अनन्य अधिकार क्षेत्र प्रदान किया गया है।
  • संविधान का अनुच्छेद 254 (2) में राज्य सरकारों को समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र द्वारा बनाए गए कानूनों को निष्प्रभावी करने हेतु अधिनियम पारित करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
  • अनुच्छेद 254 (2) के तहत राज्य द्वारा पारित कानून को लागू होने के लिए भारत के राष्ट्रपति की सहमति आवश्यक होती है।

राज्य कृषि बाजारों की परिभाषा में संशोधन

राज्य द्वारा एक क़ानून पारित करके राज्य कृषि बाजारों को केंद्रीय कानून में निर्दिष्ट व्यापार क्षेत्र के रूप में पुनः परिभाषित किया जाना चाहिए (कृषि बाजार वह जगह होती है जहां किसान अपनी उपज बेचते हैं)।

एक बार, जब राज्य के बाजार की अवधारणा केंद्र सरकार की व्यापार क्षेत्र की अवधारणा के सामान हो जाएगी, तो फिर इसके बाद राज्य सरकारें इसमें आसानी से विनिर्देशों और अतिरिक्त उपायों को जोड़ सकती हैं।

इसके पश्चात, राज्य अपने कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को सभी राज्य कृषि बाजारों पर लागू करने संबंधी प्रावधान को शामिल कर सकता है।

  • चूंकि राज्य की बाजार अवधारणा, केंद्र की व्यापार क्षेत्र अवधारणा के समतुल्य है, अतः राज्य क़ानून का उपबंध स्वतः ही केंद्रीय क़ानून में उल्लिखित व्यापार क्षेत्र पर भी लागू हो जाएगा।
  • जबकि, केंद्रीय कानूनों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का कोई उल्लेख नहीं है, राज्य द्वारा पारित प्रावधान से विसंगति का सवाल ही नहीं उठता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण कौन करता है?
  2. अनुच्छेद 131 और अनुच्छेद 254 (2) के बारे में
  3. भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची का अवलोकन
  4. राज्य के कानून द्वारा केंद्र के कानून का उल्लंघन करने पर क्या होता है?

मेंस लिंक:

केंद्र द्वारा हाल ही में पारित तीनों कृषि कानून, राज्यों के संबंधित विषयों पर कानून बनाने के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन हैं। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

‘प्रत्यर्पण’ क्या होता है?


(What is Extradition?)

संदर्भ:

हल ही में, उच्चतम न्यायालय ने भगोड़े व्यवसायी विजय माल्या के वकील की उसे मामले से बरी करने संबंधी याचिका को खारिज कर दिया और केंद्र सरकार से छह हफ्ते के अंदर विजय माल्या को यूनाइटेड किंगडम से भारत को प्रत्यर्पित किए जाने संबंधी प्रगति पर स्टेटस रिपोर्ट दायर करने को कहा है।

पृष्ठभूमि

भारत, मनी लॉन्ड्रिंग और धोखाधड़ी के आरोपों की मामले में सुनवाई करने हेतु विजय माल्या के प्रत्यर्पण के लिए यूनाइटेड किंगडम पर दबाव बना रहा है। मई माह में, विजय माल्या, ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट में भारत को प्रत्यर्पण किये जाने के विरुद्ध दायर अपील में हार गया था।

हालाँकि, ब्रिटिश सरकार से प्राप्त संकेतों के अनुसार, माल्या को जल्दी ही प्रत्यर्पित किए जाने की संभावना नहीं है। ब्रिटिश सरकार का कहना है, कि उसके प्रत्यर्पण से पहले एक कानूनी मुद्दा हल किया जाना बाकी है।

‘प्रत्यर्पण’ क्या होता है?

भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गयी परिभाषा के अनुसार-  ‘प्रत्यर्पण, एक देश द्वारा दूसरे देश में किये गए किसी अपराध में अभियुक्त अथवा दोषी ठहराए गए व्यक्तियो को संबंधित देश के लिए सौपना है, वशर्ते वह अपराध उस देश की अदालत द्वारा न्यायोचित हो।

प्रत्यर्पण कार्यवाही की प्रक्रिया

किसी अभियुक्त के लिए प्रत्यर्पण संबंधी कार्यवाही को जांच अथवा सुनवाई के दौरान तथा सजायाफ्ता अपराधियों के मामले में शुरू किया जा सकता है।

  • मामले में जांच के दौरान अभियुक्त के प्रत्यर्पण के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अत्याधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।
  • कानून प्रवर्तन एजेंसियों के पास विदेशी अदालत में अभियुक्त के खिलाफ आरोपों को साबित करने वाले प्रथम दृष्टया अकाट्य सबूत होना आवश्यक हैं।

भारत में प्रत्यर्पण के लिए विधायी आधार

भारतीय प्रत्यर्पण अधिनियम (Extradition Act),1962, भारत में प्रत्यर्पण हेतु विधायी आधार प्रदान करता है। इस अधिनियम में भारत से विदेशी राज्यों में आपराधिक भगोड़ों के प्रत्यर्पण से संबंधित कानूनों को समेकित किया गया है। वर्ष 1993 में भारतीय प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 को अधिनियम 66 द्वारा संशोधित किया गया था।

भारत में प्रत्यर्पण का नोडल प्राधिकरण

कॉन्सुलर, पासपोर्ट और वीज़ा (CPV) प्रभाग, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, प्रत्यर्पण अधिनियम का प्रवर्तन करने के लिए केंद्रीय / नोडल प्राधिकरण है। यह निवर्तमान प्रत्यर्पण अनुरोधों को संसाधित करता है।

प्रत्यर्पण के लिए प्रतिबंध

किसी अभियुक्त को निम्नलिखित मामलों में अनुरोध करने वाले राष्‍ट्र को प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता है:

  1. कोई संधि नहीं होने पर (No treaty) – संधि के अभाव में, देश, एलियंस/नागरिकों के प्रत्यर्पण के लिए बाध्य नहीं होते हैं।
  2. संधि में शामिल अपराध नहीं होने पर (No treaty crime) – आम तौर पर, प्रत्यर्पण संधि में चिह्नित अपराधों तक ही सीमित होते है, तथा यह संधि में भागीदार देशों के परस्पर संबंधो के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।
  3. सैन्य और राजनीतिक अपराध – विशुद्ध रूप से सैन्य और राजनीतिक अपराधों के संबंध में प्रत्यर्पण से इंकार किया जा सकता है। आतंकवादी अपराधों और हिंसक अपराधों को प्रत्यर्पण संधियों के प्रयोजनों हेतु राजनीतिक अपराधों की परिभाषा से बाहर रखा गया है।
  4. दोहरी आपराधिकता का अभियुक्त होने पर (Want of Dual Criminality) – जब कोई अभियुक्त किसी अपराध के भारत और अन्य देश, दोनों में वांछित होता है।
  5. प्रक्रियात्मक विचार (Procedural considerations) – प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने पर प्रत्यर्पण से इंकार किया जा सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क्या भारत अपने नागरिकों का प्रत्यर्पण करता है?
  2. यदि कोई भगोड़ा अपराधी भारत में पाया जाता है तो गिरफ्तारी का वारंट प्राप्त करने की क्या प्रक्रिया है?
  3. क्या प्रत्यर्पित किए जाने के फैसले के खिलाफ कथित अपराधी की अपील की जा सकती है?
  4. प्रत्यर्पण के लिए प्रतिबंध क्या हैं??
  5. क्या भारत को अनंतिम गिरफ्तारी अनुरोध करने के लिए किसी विदेशी देश के साथ संधि की आवश्यकता है?
  6. भारत की ओर से प्रत्यर्पण अनुरोध कौन कर सकता है?

मेंस लिंक:

प्रत्यर्पण क्या होता है? भारत में प्रत्यर्पण के लिए विधायी आधार पर चर्चा कीजिए।

https://mea.gov.in/extradition-faq-hi.htm

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

यमुना में अमोनिया के स्तर में वृद्धि


(Spike in ammonia levels in Yamuna)

संदर्भ:

हरियाणा से होकर दिल्ली में बहने वाली यमुना नदी में अमोनिया का स्तर 3 पार्ट पर मिलियन (3 PPM) तक पहुँच गया है, जो कि अधिकतम स्वीकार्य सीमा 0.5 PPM से लगभग छह गुना अधिक है।

अमोनिया की पानी में स्वीकार्य सीमा

भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards– BIS) के अनुसार, पीने के पानी में अमोनिया की अधिकतम स्वीकार्य सीमा 0.5 पार्ट पर मिलियन (Parts Per Million-PPM) है।

अमोनिया के बारे में प्रमुख तथ्य

अमोनिया एक रंगहीन गैस है और इसका उपयोग उर्वरक, प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर, रंजक और अन्य उत्पादों के उत्पादन में औद्योगिक रसायन के रूप में किया जाता है।

  • यह हाइड्रोजन तथा नाइट्रोजन से मिलकर बनती है। द्रव अवस्था में इसे अमोनियम हाइड्रॉक्साइड कहा जाता है।
  • यह तीक्ष्ण गंध-युक्त एक अकार्बनिक यौगिक है।
  • अमोनिया, प्राकृतिक रूप से वातावरण में जैविक अपशिष्ट पदार्थ के विघटन से निर्मित होती है।
  • यह हवा की तुलना में काफी हल्की होती है।

संदूषण (Contamination):

  • यह औद्योगिक अपशिष्टों अथवा सीवेज संदूषण के माध्यम से मृदा अथवा सतही जल स्रोतों में पहुँच जाती है।
  • जल में अमोनिया की मात्रा 1 PPM से अधिक होने पर, जल मछलियों के लिए विषाक्त हो जाता है।
  • मनुष्यों द्वारा 1 PPM या उससे अधिक के अमोनिया युक्त जल का लंबे समय तक सेवन करने से उसके आंतरिक अंगों को नुकसान हो सकता है।

यमुना में अमोनिया के बढ़ते स्तर का कारण

यमुना नदी में अमोनिया की अधिक मात्रा के लिए, हरियाणा के पानीपत और सोनीपत जिलों में डाई यूनिट (Dye Units), डिस्टिलरी से निकले अपशिष्ट व संदूषित पदार्थों तथा नदी के इस भाग में बिना सीवर वाली कालोनियों द्वारा अशोधित गंदे पानी का प्रवाह को मुख्य कारण माना जाता है।

समय की मांग

  • यमुना नदी में हानिकारक अपशिष्टों को डालने अथवा प्रवाहित करने के खिलाफ दिशानिर्देशों का सख्ती से कार्यान्वयन किया जाना आवश्यक है
  • अशोधित गंदे पानी के यमुना में प्रवाह पर रोक सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • सतत न्यूनतम प्रवाह, जिसे पारिस्थितिक प्रवाह भी कहा जाता है, को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पानी की इस न्यूनतम मात्रा को नदी के पूरे विस्तार में जलीय तथा ज्वारनदमुखीय परितंत्रो एवं मानव-आजीविका के वहन हेतु सदैव प्रवाहित होना चाहिए।

चुनौतियां:

  1. दिल्ली, पानी संबंधित 70 प्रतिशत आवश्यकताओं के लिए हरियाणा पर निर्भर है।
  2. हरियाणा में बड़ी संख्या में लोग कृषि-कार्यों में सलंग्न हैं तथा इस कारण हरियाणा के पास पानी की अपनी समस्या है।
  3. दोनों राज्यों के मध्य यमुना में सदैव 10 क्यूमेक्स (क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड) प्रवाह बनाए रखने के पीछे अक्सर विवाद रहता है।
  4. पिछले एक दशक में दोनों राज्य, जल-बटवारे के लिए कई बार अदालतों में निर्णय के लिए अपील कर चुके है।
  5. नदी में न्यूनतम पारिस्थितिक प्रवाह की कमी होने से अन्य प्रदूषकों का संचय होता है। यमुना के अशोधित पानी को उत्तरी पूर्वी दिल्ली में शोधित किया जाता है, इस क्षेत्र से काफी मात्रा में अनुपचारित सीवेज तथा घरों से निकाला गंदा पानी, गंदे नाले तथा गैर-कानूनी कारखानों से संदूषित पदार्थ युमना में प्रवाहित होते है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. यमुना नदी कितने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से होकर बहती है?
  2. यमुना की सहायक नदियाँ
  3. अमोनिया का उत्पादन किस प्रकार किया जाता है?
  4. अमोनिया के अनुप्रयोग
  5. पीने के पानी में अमोनिया की अधिकतम स्वीकार्य सीमा?

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


ओडिशा में नशीले पदार्थों की खेती का पता लगाने के लिए उपग्रह का उपयोग

  • ओडिशा अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (Odisha Space Application CentreOSAC) द्वारा सुदूर संवेदन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीकों का उपयोग करते हुए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अवैध गांजा (भांग की एक किस्म) की खेती का पता लगाने में सहयोग करने का प्रस्ताव दिया गया है।
  • जमीनी स्तर के अधिकारियों के लिए मोबाइल-आधारित एप्लीकेशन विकसित करने के अतिरिक्त, OSAC ने नागरिक द्वारा अवैध गांजा की खेती के बारे में रिपोर्ट करने हेतु एक प्रणाली बनाने का प्रस्ताव दिया है। इस प्रणाली के माध्यम से लोग गैर-कानूनी गांजा की खेती की तस्वीरें और वीडियो ले सकते हैं और रिपोर्ट कर सकते हैं।

आवश्यकता: ओडिशा, भारत के अग्रणी भांग उत्पादक राज्यों में से एक है। हालांकि कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने गैर-कानूनी नशीले पदार्थों की खेती पर नियंत्रण करने हेतु छापेमारी तेज कर दी है, लेकिन वास्तविक समय के आधार पर खेती का पता लगाना मुश्किल है।

केरल लोक सेवा आयोग में सामान्य श्रेणी के गरीबों के लिए 10% कोटा

  • केरल लोक सेवा आयोग (PSC) में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए सरकारी नौकरियों में 10% आरक्षण कोटा लागू किया जाएगा। हाल ही में राज्य मंत्रिमंडल द्वारा इस संदर्भ में मंजूरी दी गयी है।
  • केरल सरकार का यह निर्णय, संविधान के 103 वें संशोधन के आधार पर 10% आरक्षण प्रदान करने संबंधी केंद्र के निर्णय के अनुरूप है।

त्रावणकोर कछुआ

(Travancore Tortoise)

यह बड़े आकार का एक जंगली कछुआ होता है, जिसकी लम्बाई 330 मिलीमीटर तक होती है।

संरक्षण स्थिति:

  • IUCN लाल सूची – सुभेद्य (Vulnerable);
  • भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम: अनुसूची IV

वितरण: पश्चिमी घाट, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों में पाया जाता है।

मिशन सागर- II

मिशन सागर-II के एक अंग के रूप में, भारतीय नौसेना जहाज ऐरावत सूडान, दक्षिण सूडान, जिबूती और इरिट्रिया को खाद्यान्न सहायता पहुंचाएगा।

  • मिशन सागर-II, मई-जून 2020 में संपन्न किए गए प्रथम ‘मिशन सागर’ का अनुसरण करता है।
  • प्रथम ‘मिशन सागर’ के तहत भारत ने मालदीव, मॉरीशस, सेशेल्स, मेडागास्कर और कोमोरोस को खाद्य सहायता और दवाइयां प्रदान की थी।

महारानी जिन्द कौर

वह महाराजा रणजीत सिंह की सबसे छोटी पत्नी थीं।

  • महारानी जिन्द कौर, सिख साम्राज्य के अंतिम शासक महाराजा दलीप सिंह की मां थीं। दलीप सिंह का पालन-पोषण अंग्रेजों द्वारा किया गया था।
  • उसने पंजाब में अंग्रेजों के विरुद्ध एक जोशीले विद्रोह का नेतृत्व किया, लेकिन अंततः उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए विवश होना पड़ा।

चर्चा का कारण

हाल में लंदन के बोंह्मस इस्लामिक और इंडियन आर्ट (Bonhams Islamic and Indian Art) द्वारा आयोजित एक ‘सेल’ में उनके कुछ आभूषणों की नीलामी की गयी थी।


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