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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 30 October

 

विषय – सूची:

 सामान्य अध्ययन-I

1. भारतीय नौसेना में महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन

 

सामान्य अध्ययन-II

1. अनुच्छेद 356 का अधिरोपण

2. केंद्रीय सतर्कता आयोग

3. वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति गंभीर: पूर्व सांसद

 

सामान्य अध्ययन-III

1. जूट निर्मित सामग्री में पैकिंग की अनिवार्यता

2. बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना

3. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन हेतु आयोग के गठन के लिए अध्यादेश

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. ग्रीन दिल्ली

2. कर्नाटक सरकार के कर्मचारियों को फिल्मों, धारावाहिकों में अभिनय करने से मनाही

3. कोर सेक्टर इंडस्ट्रीज

4. क्रेडिट डिफ़ॉल्ट स्वैप

5. चर्चित स्थल: चिली

6. राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC)

7. ऑपरेशन ‘मेरी सहेली’

8. पेटेंट (संशोधन) नियम, 2020

9. तटीय नौवहन विधेयक– 2020 का मसौदा

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

भारतीय नौसेना में महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन


(Permanent Commission for Women in Indian Navy)

संदर्भ:

उच्चतम न्यायालय द्वारा 17 मार्च को भारतीय नौसेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का आदेश दिया गया था, जिसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार को 31 दिसंबर तक का समय दिया गया है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा 17 मार्च को दिया गया निर्णय

न्यायालय द्वारा नौसेना में सेवारत शॉर्ट सर्विस कमीशन (Short Service Commission SSC) महिला अधिकारियों को अपने पुरुष समकक्षों के साथ एक समान स्थायी कमीशन (Permanent CommissionPC) प्राप्त करने के अधिकार को बरकरार रखा गया था।

उच्चतम न्यायालय ने निर्णय 17 महिला एसएससी अधिकारियों द्वारा दायर एक मामले पर सुनवाई करते हुए दिया था। इन महिला अधिकारियों को शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी के रूप में 14 साल की सेवा पूरी करने के बावजूद स्थायी कमीशन (PC) दिए जाने से वंचित कर दिया गया था।

उच्चतम न्यायालय द्वारा की गयी टिप्पणियाँ

  • महिला अधिकारियों ने सेवा के दौरान हर क्षेत्र में अपने पुरुष समकक्षों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य किया है।
  • इसलिए, सरकार द्वारा गढ़े गए ‘101 बहाने’, जिसमें मातृत्व और शारीरिक सीमाओं को शामिल किया गया हैं, एक रूढ़िवादी मानसिकता दर्शाते हैं।
  • महिला नौसेना अधिकारियों को शारीरिक, मातृत्व और शारीरिक विशेषताओं जैसे विशिष्ट आधारों पर संविधान के तहत समान अवसर और गरिमा के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।

निर्णय के निहितार्थ:

  • महिला नौसेना अधिकारी अब स्थायी कमीशन हेतु आवेदन करने की पात्र होंगी।
  • कार्यकारी, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल, शिक्षा, कानून और लॉजिस्टिक्स सहित कम से कम सात विंगों में सभी सेवारत महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारी स्थायी कमीशन के लिए आवेदन कर सकती हैं।
  • स्थायी कमीशन, (i) स्थिर कैडर में रिक्तियों की उपलब्धता; (ii) उम्मीदवार की उपयुक्तता; और (iii) नौसेना स्टाफ के प्रमुख द्वारा सिफारिश के आधार पर प्रदान की जायेगी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. शॉर्ट सर्विस कमीशन बनाम परमानेंट कमीशन- अंतर और लाभ
  2. सेना, नेवी और एयरफोर्स में महिलाओं के लिए परमानेंट कमीशन की स्थिति
  3. महिला विशेष प्रवेश योजना
  4. युद्धक तथा गैर-युद्धक भूमिकाएं

मेंस लिंक:

नौसेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन क्यों दिया जाना चाहिए। इसके क्या लाभ होंगे? चर्चा कीजिए

https://epaper.thehindu.com/Home/MShareArticle?OrgId=GIS7TM5MP.1&imageview=0.

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

अनुच्छेद 356 का अधिरोपण


(Imposition of Article 356)

संदर्भ:

हाल ही में, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ द्वारा राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति के संदर्भ में सरकार के ऊपर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

राज्यपाल द्वारा की गयी इस आलोचना से राज्य में अनुच्छेद 356 लगाने संबंधी अटकलें लगाईं जा रही हैं। ज्ञात हो कि, पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं।

राज्यपाल द्वारा बतायी गयी मुख्य चुनौतियां:

  1. राज्य में हो रहीं राजनीतिक हत्याएं, लक्षित हत्याएं और हिंसा, चिंता का प्रमुख कारण हैं।
  2. राज्य में पुलिस और प्रशासन, प्रमुख सेवाओं में नियुक्त IAS और IPS सहित बड़े अधिकारियों का राजनीतिकरण हुआ है। जो कि राज्य में लोकतंत्र के लिए बड़ी चुनौती है।
  3. इनमें से कुछ अधिकारी अपनी भूमिकाओं का पूर्णतयः त्याग कर पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे हैं।

भारतीय संदर्भ में राष्ट्रपति शासन

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 के अनुसार-

राष्ट्रपति, यदि इस तथ्य से संतुष्ट होते हैं कि, किसी राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है, कि राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार शासन नहीं चला पा रही है, तो अनुच्छेद 356 के तहत भारत के राष्ट्रपति, राज्य सरकार को निलंबित कर सकते हैं और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकते है।

इसे राज्य आपातकाल (State Emergency) अथवा संवैधानिक आपातकाल (Constitutional Emergency) भी कहा जाता है।

राष्ट्रपति शासन का निहितार्थ

  • अनुच्छेद 356 लागू होने पर राज्य में कोई मंत्रिपरिषद नहीं होगी।
  • राज्य का प्रशासन सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में आ जाएगा और भारत के राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करते हुए राज्यपाल, राज्य के प्रशासन को जारी रखेंगे।

राष्ट्रपति शासन का संसदीय अनुमोदन और अवधि

  • राष्ट्रपति शासन लागू करने की घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तिथि से दो महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना आवश्यक होता है।
  • राष्ट्रपति शासन का अनुमोदन सदन में साधारण बहुमत, अर्थात सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत, से किया जाता है ।
  • किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन छह माह के लिए वैध होता है, लेकिन इसे प्रति छह महीने में संसद की मंजूरी के साथ अधिकतम तीन साल के लिए बढ़ाया जा सकता है।

राज्यपाल की रिपोर्ट:

अनुच्छेद 356 के तहत,  राष्ट्रपति को राज्यपाल से रिपोर्ट प्राप्त करने अथवा इस तथ्य से संतुष्ट होने पर कि,  राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है, कि राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार शासन नहीं चला पा रही है, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है।

राष्ट्रपति शासन का निरसन

  • राज्य में जारी राष्ट्रपति शासन की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय रद्द की जा सकती है।
  • इसके लिए किसी प्रकार के संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राष्ट्रपति शासन लागू करना
  2. संबंधित प्रावधान
  3. राज्यपाल की रिपोर्ट
  4. संसदीय अनुमोदन और अवधि
  5. निरसन
  6. राष्ट्रपति शासन के तहत राज्य विधायिका की स्थिति

मेंस लिंक:

राष्ट्रपति शासन क्या होता है? यह विवादास्पद क्यों है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC)


(Central Vigilance Commission)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) द्वारा 1 नवंबर से, अखिल भारतीय और केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों की नियुक्ति, मनोनयन, पदोन्नति और अन्य संबंधित मुद्दों के लिए बोर्ड स्तर पर सभी सतर्कता अनापत्ति मंजूरी प्रस्तावों (Vigilance Clearance Proposals) को ई-मेल के माध्यम से प्राप्त करने का निर्णय लिया है। तथा दस्तावेजों की कोई हार्ड कॉपी स्वीकार नहीं की जाएगी।

केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के बारे में:

केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission- CVC) का गठन वर्ष 1964 में सरकार द्वारा के. संथानम की अध्यक्षता वाली भ्रष्टाचार निरोधक समिति की सिफारिशों के आधार पर एक शीर्षस्‍थ सतर्कता संस्‍थान के रूप में किया गया था।

  • केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 के तहत केंद्रीय सतर्कता आयोग को वर्ष 2003 में सांविधिक दर्जा प्रदान किया गया।
  • CVC भारत के राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करता है।
  • केंद्रीय सतर्कता आयोग, किसी भी मंत्रालय / विभाग के अधीन नही है। यह एक स्वतंत्र निकाय है जो केवल संसद के प्रति उत्तरदायी है।

संरचना:

केंद्रीय सतर्कता आयोग में केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (Central Vigilance Commissioner) सहित दो अन्य सतर्कता आयुक्त होते हैं।

नियुक्ति

केंद्रीय सतर्कता आयुक्त तथा अन्य सतर्कता आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक समिति की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति की अध्यक्षता प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है और इसमें गृह मंत्री तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।

कार्यकाल

इनका कार्यकाल पदभार ग्रहण करने की तिथि से चार वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होता है।

पद-मुक्ति

केंद्रीय सतर्कता आयुक्त या किसी भी सतर्कता आयुक्त को केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा पद से हटाया जा सकता है।

राष्ट्रपति, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त अथवा अन्य आयुक्तों को उनके दुराचरण व अक्षमता के आधार पर हटा सकते हैं, इस स्थिति में राष्टपति द्वारा इस विषय को उच्चत्तम न्यायालय के पास भेजा जाता है। यदि जांच के उपरान्त उच्चत्तम न्यायालय इन आरोपों को सही पाता है तो उसकी सलाह पर राष्ट्रपति इन्हें पद से हटा सकता है

प्रीलिम्स लिंक:

  1. केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के बारे में
  2. नियुक्ति
  3. पद-मुक्ति
  4. शक्तियाँ और कार्य
  5. रिपोर्ट

मेंस लिंक:

केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की भूमिका और कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति गंभीर: पूर्व सांसद


(LAC situation critical: former MP)

संदर्भ:

लद्दाख के पूर्व भाजपा सांसद थुपस्तान छवांग (Thupstan Chhewang) के अनुसार-

  1. हाल ही में, चीनी सैनिकों ने भारतीय क्षेत्र में फिर से अतिक्रमण किया है और पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी तट पर फिंगर 2 और 3 पर कब्जा कर लिया है।
  2. भारतीय सैनिक टेंट में रह रहे हैं और यह शून्य से नीचे तापमान वाली परिस्थितियों में उनके लिए उपयुक्त नहीं है।

इस स्थान पर विवाद का कारण

वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual ControlLAC) – सामान्यतः यह रेखा पैंगोंग त्सो की चौड़ाई को छोड़कर स्थल से होकर गुजरती है तथा वर्ष 1962 से भारतीय और चीनी सैनिकों को विभाजित करती है। पैंगोंग त्सो क्षेत्र में यह रेखा पानी से होकर गुजरती है।

  • दोनों पक्षों ने अपने क्षेत्रों को चिह्नित करते हुए अपने- अपने क्षेत्रों को घोषित किया हुआ है।
  • भारत का पैंगोंग त्सो क्षेत्र में 45 किमी की दूरी तक नियंत्रण है, तथा झील के शेष भाग को चीन के द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

 पैंगोंग त्सो झील को कई खंडो में विभाजित किया गया है, जिन्हें फिंगर्स (fingers) कहा जाता है। इस क्षेत्र में भारत और चीन के बीच LAC को लेकर मतभेद है, तथा यहाँ पर 8 फिंगर्स विवादित है।

  • भारत का दावा है कि LAC फिंगर 8 से होकर गुजरती है, और यही पर चीन की अंतिम सेना चौकी है।
  • भारत इस क्षेत्र में, फिंगर 8 तक, इस क्षेत्र की संरचना के कारण पैदल ही गश्त करता है। लेकिन भारतीय सेना का नियंत्रण फिंगर 4 तक ही है।
  • दूसरी ओर, चीन का कहना है कि LAC फिंगर 2 से होकर गुजरती है। चीनी सेना हल्के वाहनों से फिंगर 4 तक तथा कई बार फिंगर 2 तक गश्त करती रहती है।

पैंगोंग त्सो क्षेत्र में चीनी अतिक्रमण का कारण

  • पैंगोंग त्सो झील रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चुशूल घाटी (Chushul Valley) के नजदीक है। वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान चीन ने चुशूल घाटी ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था।
  • चुशूल घाटी तक का रास्ता पैंगोंग त्सो झील से होकर जाता है, यह एक मुख्य मार्ग है जिसका चीन, भारतीय-अधिकृत क्षेत्र पर कब्जे के लिये उपयोग कर सकता है।
  • चीन यह भी नहीं चाहता है कि भारत LAC के पास कहीं भी अपने बुनियादी ढांचे को बढ़ावा दे। चीन को डर है कि इससे अक्साई चिन और ल्हासा-काशगर (Lhasa-Kashgar) राजमार्ग पर उसके अधिकार के लिए संकट हो सकता है।
  • इस राजमार्ग के लिए कोई खतरा, लद्दाख और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में चीनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के लिए बाधा पहुचा सकता है।

पैंगोंग त्सो के बारे में

  • लद्दाखी भाषा में पैंगोंग का अर्थ है समीपता और तिब्बती भाषा में त्सो का अर्थ झील होता है।
  • पैंगोंग त्सो लद्दाख में 14,000 फुट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित एक लंबी संकरी, गहरी, स्थलरुद्ध झील है, इसकी लंबाई लगभग 135 किमी है।
  • इसका निर्माण टेथीज भू-सन्नति से हुआ है।
  • यह एक खारे पानी की झील है।
  • काराकोरम पर्वत श्रेणी, जिसमे K2 विश्व दूसरी सबसे ऊंची चोटी सहित 6,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली अनेक पहाड़ियां है तथा यह ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन और भारत से होती हुई पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे पर समाप्त होती है।
  • इसके दक्षिणी तट पर भी स्पंगुर झील (Spangur Lake) की ओर ढलान युक्त ऊंचे विखंडित पर्वत हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. LoC क्या है और इसकी स्थापना, भौगोलिक सीमा और महत्व
  2. LAC क्या है?
  3. नाथू ला कहाँ है?
  4. पैंगोंग त्सो कहाँ है?
  5. अक्साई चिन का प्रशासन कौन करता है?
  6. नाकु ला कहाँ है?
  7. पैंगोंग त्सो झील क्षेत्र में में नियंत्रण

मेंस लिंक:

भारत और चीन के लिए पैंगोंग त्सो के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।

जूट निर्मित सामग्री में पैकिंग की अनिवार्यता


(Mandatory Packaging in Jute Materials)

संदर्भ:

हाल ही में, मंत्रिमंडल द्वारा जूट निर्मित सामग्री में पैकिंग की अनिवार्यता संबंधी नियमों के विस्‍तार को मंजूरी प्रदान की गयी है।

अब, शत-प्रतिशत खाद्यान्‍नों और 20 प्रतिशत चीनी को अनिवार्य रूप से विविध प्रकार के जूट बोरों में पैक किया जाएगा।

लाभ

जूट क्षेत्र पर लगभग 3.7 लाख श्रमिक और कई लाख किसान परिवारों की आजीविका निर्भर है।

  • यह निर्णय जूट उद्योग के विविधीकरण को प्रोत्साहन एवं गति प्रदान करेगा।
  • इससे देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर खासकर पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, आंध्र प्रदेश, मेघालय और त्रिपुरा के किसानों तथा श्रमिकों को लाभ मिलेगा।

पृष्ठभूमि

जूट पैकेजिंग सामग्री (पैकिंग सामग्री में अनिवार्य उपयोग) अधिनियम, 1987 के तहत, सरकार को कच्चे जूट के उत्पादन व जूट पैकेजिंग सामग्री तथा इसके उत्पादन में लगे व्यक्तियों के हित में कुछ निश्चित वस्तुओं की आपूर्ति और वितरण के लिए जूट पैकेजिंग सामग्री के अनिवार्य उपयोग पर विचार करने और उपयुक्त प्रावधान करने की आवश्यकता है।

‘जूट’ के बारे में:

  • इसे गोल्डन फाइबर’ के रूप में भी जाना जाता है। जूट, कपड़ा उद्योग में विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए सबसे लंबे और सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले प्राकृतिक रेशों में से एक है।
  • यह 60% से 90% आर्द्रता वाले उष्णकटिबंधीय तराई क्षेत्रों में उत्पादित होता है। जूट एक वर्षा-आधारित फसल है जिसमें उर्वरक या कीटनाशकों की बहुत कम आवश्यकता होती है।
  • भारत, विश्व में कच्चे जूट और जूट के सामान का सबसे बड़ा उत्पादक है।
  • भारत में जूट की खेती मुख्य रूप से देश के पूर्वी क्षेत्र तक ही सीमित है।
  • भारत में पहली जूट मिल की स्थापना वर्ष 1855 में जॉर्ज अक्लेंड द्वारा हुगली नदी पर कलकत्ता के पास रिशरा (बंगाल – अब पश्चिम बंगाल में) में की गई थी।
  • वर्ष 1959 में, पहली बिजली चालित जूट बुनाई फैक्ट्री की स्थापना की गई थी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘जूट’ के बारे में
  2. यह भारत में कहाँ उगाया जाता है?
  3. जूट उत्पादन हेतु जलवायु स्थिति
  4. भारत में शीर्ष जूट उत्पादक राज्य
  5. भारत का जूट निर्यात और आयात
  6. जूट पैकिंग की अनिवार्यता

मेंस लिंक:

कुछ वस्तुओं की आपूर्ति और वितरण में जूट पैकेजिंग सामग्री के अनिवार्य उपयोग की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न- सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली- कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन, संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिये ई-प्रौद्योगिकी।

बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (DRIP)


(Dam Rehabilitation and Improvement Project)

संदर्भ:

हाल ही में, मंत्रिमंडल द्वारा बाहरी वित्तीय सहायता प्राप्त बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना– चरण-II और III को मंजूरी दी गयी है।

प्रमुख बिंदु:

  • इस परियोजना के लिए विश्व बैंक (World Bank WB) और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (Asian Infrastructure Investment Bank AIIB) द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।
  • परियोजना लागू करने की अवधि 10 वर्ष है और इसमें दो चरण शामिल हैं। प्रत्येक चरण छह वर्षों का होगा तथा इसमें अप्रैल, 2021 से मार्च, 2031 तक, दो वर्षों की पुनरावृति (overlapping) अवधि शामिल है।

DRIP चरण-II और चरण III में निम्नलिखित उद्देश्यों की परिकल्पना की गयी है:

  1. चयनित मौजूदा बांधों और संबंधित परिसंपत्तियों की सुरक्षा और प्रदर्शन में स्थायी रूप से सुधार करना,
  2. भाग लेने वाले राज्यों के साथ-साथ केंद्रीय स्तर पर बांध सुरक्षा से सम्बंधित संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करनाऔर
  3. कुछ चयनित बांधों में वैकल्पिक साधनों का पता लगाना, ताकि बांध के स्थायी संचालन और रख-रखाव के लिए अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति हो सके।

परियोजना की आवश्यकता:

भारत में बड़े बांधों की संख्या 5334 है, और यह विश्व में चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद तीसरे स्थान पर है। वर्तमान में लगभग 411 बांध निर्माणाधीन हैं। इसके अलावा, कई हजार छोटे बांध भी हैं।

  • भारतीय बांध और जलाशय हमारे देश की आर्थिक और कृषि विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इनमे सालाना लगभग 300 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का भंडारण किया जाता है।
  • ये बांध, परिसंपत्ति प्रबंधन और सुरक्षा की दृष्टि से एक बड़ी जिम्मेदारी प्रस्तुत करते हैं।
  • किसी बांध की विफलता के भयावह परिणाम हो सकते हैं, जिसमे मानव जीवन, संपत्ति और पारिस्थितिकी को अकल्पनीय नुकसान पहुँच सकता है।

बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (DRIP)  के बारे में:

इस परियोजना को वर्ष 2012 में विश्व बैंक की सहायता से केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission- CWC) द्वारा शुरू किया गया था।

उद्देश्य:

  1. चयनित मौजूदा बांधों और संबंधित साजो-समान की सुरक्षा और परिचालन के प्रदर्शन में स्थायी तरीके से सुधार करना, और
  2. भाग लेने वाले राज्यों / कार्यान्वयन एजेंसियों के बांध सुरक्षा संस्थागत सेटअप को मजबूत करना।

परियोजना का चरण 1:

DRIP कार्यक्रम के पहले चरण में 7 राज्यों में 223 बांधों को शामिल किया गया था।

प्रीलिम्स के लिए तथ्य:

  • DHARMA (Dam Health and Rehabilitation Monitoring), अर्थात ‘बांध स्वास्थ्य और पुनर्वास निगरानी’, बांधों की देखभाल के लिए एक प्रणाली है। वर्तमान में, 18 राज्यों द्वारा इसका उपयोग किया जा रहा है।
  • बांधों की देखभाल से संबंधित एक भूकंपीय खतरा विश्लेषण सूचना प्रणाली (seismic hazard analysis information system-SHAISYS) भी विकसित की गई है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. DHARMA के बारे में।
  2. SHAISYS क्या है?
  3. बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (DRIP) के बारे में
  4. DRIP के तीसरे चरण का कार्यान्वयन और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सहायता

मेंस लिंक:

बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन हेतु आयोग के गठन के लिए अध्यादेश


(Ordinance for setting up commission to manage NCR air quality)

संदर्भ:

हाल ही में, राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन हेतु आयोग की स्थापना के लिए एक अध्यादेश पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।

‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन हेतु आयोग अध्यादेश’, 2020  (‘Commission for Air Quality Management in National Capital Region and Adjoining Areas Ordinance’) को केंद्र द्वारा प्रस्तुत किया गया था।

प्रस्तावित आयोग

संरचना:

आयोग की अध्यक्षता भारत सरकार के सचिव अथवा राज्य सरकार के मुख्य सचिव के रैंक के अधिकारी द्वारा की जाएगी। यह एक स्थायी निकाय होगा और इसमें 20 से अधिक सदस्य होंगे।

इस आयोग में सदस्य के रूप में:

  1. पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय सचिव का एक प्रतिनिधि, पाँच सचिव स्तरीय अधिकारी जो पदेन सदस्य होंगे।
  2. दो संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी जो पूर्णकालिक सदस्य होंगे।
  3. CPCB, इसरो, वायु प्रदूषण विशेषज्ञों के प्रतिनिधि और गैर-सरकारी संगठनों के तीन प्रतिनिधि।
  4. सहयोगी सदस्यों के रूप में, कृषि, पेट्रोलियम, विद्युत्, सड़क परिवहन और राजमार्ग, आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय और वाणिज्य और उद्योग सहित कई अन्य मंत्रालयों के प्रतिनिधि सम्मिलित होंगे।

प्रमुख बिंदु:

  • यह आयोग एक ‘वैधानिक प्राधिकरण’ होगा।
  • यह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे निकायों का अधिक्रमण (Supersede) करेगा।
  • इस आयोग को वायु प्रदूषण से संबंधित मुद्दों पर इन राज्य सरकारों को निर्देश जारी करने की शक्तियां प्राप्त होंगी।

अधिकार-क्षेत्र:

इस आयोग का वायु प्रदूषण से संबंधित मामलों में हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के क्षेत्रों सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) पर विशेष अधिकार क्षेत्र होगा, तथा यह संबंधित राज्य सरकारों तथा CPCB और ISRO के साथ कार्य करेगा।

आयोग की दंडात्मक शक्तियाँ

आयोग के निर्देशों का उल्लंघन किये जाने पर, जैसे कि किसी प्रतिबंधित क्षेत्र में एक औद्योगिक इकाई की स्थापना करने पर, 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना और 5 साल तक के कारावास की सजा होगी।

पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण हेतु EPCA और उसकी खामियां

पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम एवं नियंत्रण) प्राधिकरण (Environment Pollution (prevention & Control) Authority-EPCA) एक वैधानिक निकाय नहीं था, लेकिन उच्चतम न्यायालय से वैधता प्राप्त थी।

  • EPCA, एक कानून के रूप में किसी विधिक प्रारूप द्वारा समर्थित नहीं था।
  • इसके पास अन्य राज्यों की सरकारों को निर्देश और दिशानिर्देश जारी करने तथा जुर्माना लगाने का अधिकार प्राप्त था।
  • EPCA में किसी राज्य के प्रतिनिधि सम्मिलित नहीं थे और इसमें सिर्फ दो स्थायी सदस्य थे।

सरकार के इस कदम की आलोचनाएँ और संबंधित चिंताएँ:

  1. कानूनों और संस्थानों की बहुलता एक ओर अधिक भ्रम पैदा करेगी तथा दूसरी ओर टकराव की स्थितियां उत्पन्न करेगी। उदाहरण के लिए, हमारे पास पहले से ही EPCA, NGT, CPCB और SPCB है, किंतु किसी को भी स्पष्ट नहीं है कि क्या करना है।
  2. भारत में कानून की कमी से संबंधित कोई समस्या नहीं है, चाहे वह धान की पराली जलाने, सब्सिडी प्रदान करने या प्रदूषण करने वाले को दंडित करने से संबंधित हो। समस्या इस तथ्य में निहित है कि जब इन कानूनों को लागू करने की बात आती है, तो राजनीतिक इच्छाशक्ति गायब हो जाती है।

आगे की राह

यदि सरकार इस मुद्दे को हल करना चाहती है, तो निम्नलिखित बिन्दुओं पर गौर करना चाहिए:

  • विभिन्न कानूनों और संस्थानों की की प्रभावकारिता और उपयोगिता को परखने हेतु इनकी गहन समीक्षा के जानी चाहिए।
  • सभी संबंधित हितधारकों, विशेष रूप से दिल्ली के बाहर के लोगों, किसानों के समूह और लघु उद्योगों से जुड़े लोगों और बड़े पैमाने पर जनता के साथ विस्तृत परामर्श किया जाना चाहिए।
  • एक विधेयक का मसौदा तैयार किया जाये और इसे सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए जनता के समक्ष रखा जाना चाहिए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. EPCA के बारे में
  2. NGT के बारे में
  3. CPCB के बारे में
  4. ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन हेतु आयोग अध्यादेश’, 2020 का अवलोकन

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


ग्रीन दिल्ली

  • यह हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा शुरू किया गया एक मोबाइल ऐप है।
  • यह प्रदूषण के खिलाफ सरकार की लड़ाई में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने और समय पर कार्रवाई करने में सहायता करेगी।
  • यह ऐप नागरिकों को शिकायत दर्ज करने, प्रदूषण स्रोतों और प्रदूषण विरोधी मानदंडों के उल्लंघन की रिपोर्ट करने में सक्षम बनाती है।
  • नागरिक प्रदूषण के स्थानीय कारणों, जैसे कि कचरा जलाना, औद्योगिक प्रदूषण आदि की फोटो, वीडियो और ऑडियो ले सकते हैं और ऐप पर अपलोड कर सकते हैं।

कर्नाटक सरकार के कर्मचारियों को फिल्मों, धारावाहिकों में अभिनय करने से मनाही

कर्नाटक राज्य सिविल सेवा (आचरण) नियम, 2020 के मसौदे के अनुसार-

  • राज्य सरकार के कर्मचारियों को फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय करने, किताबें के प्रकाशन और राज्य और केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ आलोचना करने पर प्रतिबंध लगाया जाएगा।
  • राज्य सरकार के कर्मचारी सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय नहीं कर सकते हैं।
  • सरकारी कर्मचारियों को रेडियो और टेलीविजन चैनलों में मीडिया कार्यक्रमों को प्रायोजित करने से रोका जाएगा।
  • कर्मचारियों को बिना अनुमति के विदेशी दौरों पर जाने को प्रतिबंधित किया गया है।

कोर सेक्टर इंडस्ट्रीज

आठ कोर क्षेत्रों के उद्योगों में कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, उर्वरक, इस्पात, सीमेंट और बिजली शामिल हैं।

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) में शामिल वस्तुओं के कुल भारांक का लगभग 40% आठ कोर इंडस्ट्रीज़ में सम्मिलित है।

भारांक के घटते क्रम में आठ कोर इंडस्ट्रीज: रिफाइनरी उत्पाद> बिजली> स्टील> कोयला> कच्चा तेल> प्राकृतिक गैस> सीमेंट> उर्वरक।

चर्चा का कारण

मार्च के बाद से कोर सेक्टर में गिरावट दर्ज की जा रही है।

क्रेडिट डिफ़ॉल्ट स्वैप

(Credit default swap)

  • यह एक ऋण से व्युत्पन्न लेनदेन का एक उदाहरण है जहां ऋण सुरक्षा खरीदी और बेची जाती है।
  • क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप (CDS) में, एक पक्ष ‘क्रेडिट इवेंट प्रोटेक्शन’ प्राप्त करने के बदले में किसी अन्य पार्टी को समय-समय पर निर्धारित भुगतान करने के लिए सहमत होता है।
  • विशिष्ट क्रेडिट इवेंट्स में दिवालियापन, भुगतान करने में विफलता, पुनर्गठन और पुनर्वित्त / अधिस्थगन सम्मिलित होते हैं।

चर्चा का कारण

भारतीय रिज़र्व बैंक शीघ्र ही नए क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप (CDS) मानदंड जारी करेगा।

चर्चित स्थल: चिली

हाल ही में आयोजित किये गए एक जनमत संग्रह में, चिली के लोगों ने देश के लगभग चार दशक पुराने संविधान को फिर से लिखने के पक्ष में भारी मतदान किया है

चिली के लोगों ने नए संविधान निर्माण हेतु 155 सदस्यों की एक विधानसभा का चुनाव करने के लिए भी मतदान किया।

नए दस्तावेज़ को अंतिम रूप देने के लिए गठित निकाय में कोई सक्रिय कानूनविद् शामिल नहीं होगा और इसे पूरा करने के लिए नौ माह का समय निश्चित किया गया है, जिसमे एक बार तीन महीने का विस्तार किया जा सकता है।

सुधारों की आवश्यकता:

मौजूदा संविधान को तानाशाह और सैन्य नेता पिनोशे (Pinochet) के शासन के दौरान बिना किसी लोकप्रिय इनपुट के तैयार किया गया था। तथा इसे 1980 में आयोजित एक फर्जी जनमत संग्रह में पारित किया गया था।

राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC)

राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC) को कृषि उत्पादों के वैज्ञानिक विधि से संग्रहण और खाद्य सुरक्षा लेखा परीक्षण जैसे जांच कार्यों को क्रियान्वित करने के लिए राष्ट्रिय प्रमाणन बोर्ड (NABCB) और भारतीय गुणवत्ता परिषद से मान्यता मिल गई है।

यह मान्यता तीन वर्ष की अवधि के लिए वैध है।

निहितार्थ: एनपीसी को एनएबीसीबी द्वारा हाल ही में मिली मान्यता से अब एनपीसी को FSSAI के खाद्य सुरक्षा और मानक (खाद्य सुरक्षा लेखा परीक्षण) नियामक 2018 के अंतर्गत खाद्य भंडारगृहों समेत खानपान के व्यवसाय से जुड़े संस्थानों और डब्ल्यूडीआरए नियम, 2017 के अंतर्गत भंडारगृहों का स्वतंत्र रूप से लेखा परीक्षण का अधिकार मिल जाएगा।

NPC के बारे में:

  • यह 1958 में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा स्थापित, यह एक स्वायत्त, बहुपक्षीय, गैर-लाभकारी संगठन है।
  • NPC टोक्यो स्थित एशियाई उत्पादकता संगठन (एपीओ) का एक घटक है, जो एक अंतर सरकारी निकाय है, जिसमें से भारत सरकार एक संस्थापक सदस्य है।

ऑपरेशन ‘मेरी सहेली’

  • भारतीय रेलवे ने ट्रेनों से यात्रा करने वाले महिला यात्रियों को स्टेशन से गंतव्य स्टेशन तक की पूरी यात्रा के लिए सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से “मेरी सहेली” पहल की शुरुआत शुरू की है।
  • RPF की टीम सीट संख्या और महिला यात्रियों की संपर्क जानकारी जैसी जानकारी एकत्र करेगी और यात्रा के दौरान संपर्क में रहेगी। एकत्रित जानकारी को गंतव्य और अनुसूचित ठहराव स्टेशनों पर स्टेशनों तक पहुंचाया जाएगा।

पेटेंट (संशोधन) नियम, 2020 (संक्षिप्त अवलोकन)

पेटेंट (संशोधन)नियम, 2020 में फॉर्म 27 जमा करने और प्राथमिक दस्तावेजों (जो अंग्रेजी भाषा में नहीं है) के सत्यापित अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत करने से संबंधित आवश्यकताओं को और अधिक सरल बनाया गया है।

  • पेटेंट प्राप्त व्यक्ति को एक या एक से अधिक संबंधित पेटेंट के सन्दर्भ में एकल फॉर्म -27 दाखिल करने की रियायत मिलेगी।
  • पेटेंट प्राप्त व्यक्ति को एक या एक से अधिक संबंधित पेटेंट के सन्दर्भ में एकल फॉर्म-27 दाखिल करने की रियायत मिलेगी, इससे अनुपालन का बोझ कम होगा और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।

तटीय नौवहन विधेयक– 2020 का मसौदा

जहाजरानी मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है।

प्रमुख विशेषताएं:

  • तटीय नौवहन और तटीय जल सीमा की परिभाषा का विस्तार किया गया है।
  • यह तटीय व्यापार के लिए भारतीय ध्वजवाहक जहाजों के लिए व्यापारिक लाइसेंस की आवश्यकता को दूर करने का प्रस्ताव है।
  • विधेयक तटीय जहाज़ों के नौवहन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए भारतीय जहाज़ों को प्रोत्साहित करते हुए एक प्रतिस्पर्धी माहौल बनाने और परिवहन लागत को कम करने का प्रयास करता है।
  • इस विधेयक में अंतर्देशीय जलमार्ग के साथ तटीय समुद्री परिवहन के एकीकरण का भी प्रस्ताव है।
  • विधेयक में राष्ट्रीय तटीय और अंतर्देशीय नौवहन सामरिक योजना के लिए भी एक प्रावधान है।

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