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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 21 September

 

विषय – सूची:

 सामान्य अध्ययन-I

1. काकतीय राजवंश

 

सामान्य अध्ययन-II

1. राज्यसभा उप-सभापति के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव

2. विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2020

3. “सार्वभौमिक पात्रता” शर्ते

4. विश्‍व निर्वाचन निकाय संघ (A-WEB)

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. चेंदमंगलम साड़ी

2. अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

काकतीय राजवंश


(Kakatiya Dynasty)

चर्चा का कारण

आंध्र प्रदेश के धारानिकोटा (Dharanikota) में काकतीय राजवंश के शासक ‘गणपति देव’ (Ganapati Deva) द्वारा निर्मित ‘काकती देवी’ (Kakatii Devi) मंदिर को स्थानीय देवी बालूसुलाम्मा (Balusulamma) के मंदिर में परिवर्तित कर दिया गया है।

प्रमुख बिंदु:

  • 13वीं शताब्दी के इस मंदिर पीठासीन देवी ‘काकती देवी’ (Kakati Devi) थी जो काकतीय शासकों की कुलदेवी थी।
  • गणपति देव पहले राजा थे, जिन्होंने आंध्र के तटीय क्षेत्र तथा अपने राज्य की सीमा के बाहर काकती देवी की पूजा की शुरुआत की थी।
  • मंदिर का स्थापत्य महत्व: मंदिर की छत पर कमल के फूलों की आकृतियों से सजावट की गयी है किंतु मंदिर के शीर्ष पर कोई शिखर नहीं है। वास्तुकला की ये विशेषताएं, हनमकोण्डा एवं वारंगल किले में पायी जाने वाली समकालीन मंदिरों के समान है।

काकतीय राजवंश के बारे में मुख्य तथ्य:

काकतीय राजवंश का उत्कर्ष 12वीं -14वीं शताब्दी के दौरान हुआ था।

  • ये पहले कल्याण के पश्चिमी चालुक्यों के सामंत थे और इनका शासन वारंगल के पास एक छोटे से क्षेत्र पर थे।
  • इस राजवंश ने गणपति देव और रुद्रमादेवी जैसे प्रतापी शासक हुए।
  • प्रतापरुद्र प्रथम (Prataparudra I), जिसे काकतीय रुद्रदेव के नाम से भी जाना जाता है, काकतीय शासक प्रोल द्वितीय का पुत्र था। इसके शासनकाल के दौरान काकतीयों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। इसने 1195 ई. तक राज्य पर शासन किया।
  • प्रतापरुद्र प्रथम के शासनकाल के दौरान शिलालेखों में तेलुगु भाषा का प्रयोग शुरू हुआ।
  • काकतीयों ने अपनी पहली राजधानी हनमकोण्डा (Hanamakonda) बनायी, बाद में इन्होने अपनी राजधानी ओरुगलु / वारंगल में स्थांतरित कर ली।
  • काकतीय राजवंश के शासक के रूप में रुद्रमादेवी के शासनकाल के दौरान महान इतालवी यात्री मार्को पोलो ने काकतीय साम्राज्य का भ्रमण किया और उनकी प्रशासनिक शैली की प्रशंसा करते हुए विस्तृत रूप से वर्णन किया।

कला और वास्तुकला

  • 12वीं शताब्दी में रूद्रमादेवी के पिता द्वारा प्रतिष्ठित काकतीय तोरणं (Kakatiya Thoranam) का निर्माण करवाया गया था। इस अलंकृत तोरण के बारे में कहा जाता है कि सांची स्तूप के प्रवेश द्वार के समान हैं तथा यह तेलंगाना का प्रतीक चिंह भी है।
  • वारंगल में दर्शनीय पाखल झील (Pakhal lake) का निर्माण गणपति देव द्वारा किया गया था।
  • वारंगल में 1000 स्तंभ मंदिर का निर्माण काकतीय शासनकाल के दौरान करवाया गया था और यह काकतीय वास्तुकला का एक उत्तम उदाहरण है।
  • कोहेनूर हीरा, जो अब ब्रिटिश क्राउन में जड़े हुए रत्नों में से एक है, का खनन काकतीय राजवंश द्वारा कराया गया था, और वे इसके पहली स्वामी थे।

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काकतीय शासनकाल में समाज

  • काकतीय शासनकाल के दौरान, जाति व्यवस्था कठोर नहीं थी और वास्तव में, सामाजिक रूप से इसे बहुत महत्व नहीं दिया गया था। कोई भी व्यक्ति किसी भी पेशे को अपना सकता था और लोग जन्म से ही एक ही व्यवसाय अपनाने के लिए बाध्य नहीं थे।
  • 1323 ई. में वारंगल पर दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान ग़यासुद्दीन तुगलक द्वारा विजय प्राप्त करने के पश्चात काकतीय शासन वर्ष समाप्त हो गया।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. काकतीय साम्राज्य की स्थापना किसने की?
  2. पाखल झील किसके द्वारा बनवाई गई थी?
  3. काकतीय तोरणम किसके द्वारा निर्मित किया गया था?
  4. काकतीय शासन किस प्रकार समाप्त हुआ?
  5. काकतीय शासन के दौरान जाति व्यवस्था कैसी थी?

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

राज्यसभा उप-सभापति के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव


(No-confidence motion against RS Deputy Chairman)

संदर्भ:

हाल ही में, राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू द्वारा उप-सभापति हरिवंश नरायण सिंह के खिलाफ विपक्ष द्वारा पेश किये गए अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया, और कहा कि यह ‘नियमों के तहत स्वीकार्य नहीं है”।

संसद में राज्य सभा उपसभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का पहला मामला है और इस बात पर सहमति हुई है कि मामले के निपटारे तक श्री सिंह को सदन सत्र की अध्यक्षता नहीं करनी चाहिए।

विवाद का विषय

  • विपक्षी दलों द्वारा उप सभापति पर यथोचित मतदान के लिए सभी मांगों को दरकिनार करते हुए कृषि क्षेत्र के विधेयकों को जल्दबाजी में पारित करने की कोशिश में संसदीय प्रक्रियाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है।
  • विपक्षी दलों का यह भी कहना है, कि उपसभापति ने पॉइंट्स ऑफ़ आर्डर (points of order) को उठाने की अनुमति नहीं दी और विभिन्न राजनीतिक दलों से राज्य सभा के सदस्यों की बड़ी संख्या को कृषि विधेयकों के खिलाफ भी बोलने की अनुमति तक नहीं दी।

उप-सभापति

उपराष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन करने के दौरान, अथवा सभापति के पद के रिक्त होने पर उसके कृत्यों के निर्वहन करने हेतु राज्यसभा द्वारा एक उप-सभापति का निर्वाचन किया जाता है।

उप सभापति, उनकी शक्तियों और कार्यों के बारे में अधिक जानने हेतु 9 सितम्बर का समसामयिकी देखें।

पदत्याग

सदन के सभी तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा उप-सभापति को पद से हटाया जा सकता है। किंतु, इस प्रस्ताव को पारित करने से पूर्व उसे 14 दिन पहले सूचना देना अनिवार्य होता है।

इसके अतिरिक्त वह सदन के सदस्य न रहने पर तथा सभापति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित त्यागपत्र द्वारा पद मुक्त हो सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राज्य सभा के उपसभापति के पद हेतु पात्रता
  2. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 89 किससे संबंधित है?
  3. उपसभापति का पद रिक्त होने की स्थितियां
  4. शक्तियाँ और कार्य
  5. उपाध्यक्षों के पैनल के बारे में
  6. प्वाइंट ऑफ ऑर्डर क्या है?

मेंस लिंक:

राज्यसभा के उपसभापति के निर्वाचन प्रक्रिया पर चर्चा कीजिए

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2020


(Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill)

संदर्भ:

विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2020 को हाल ही में लोकसभा में पेश किया गया है। इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (Foreign Contribution (Regulation) Amendment BillFCRA) में महत्वपूर्ण बदलाव करना है।

विधेयक में प्रस्तावित संशोधन-

  • इसमें ‘लोक सेवकों’ के लिए किसी भी विदेशी धन को स्वीकार करने को निषिद्ध किया गया है।
  • इसमें, गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रशासन-संबंधी लागतों के लिए विदेशी निधियों के उपयोग को मौजूदा 50 प्रतिशत से कम करके 20 प्रतिशत करने का प्रस्ताव किया गया है।
  • इस विधेयक में ‘विदेशी अंशदान का किसी प्रकार से किसी भी संघठन / व्यक्ति के लिए हस्तांतरण को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव किया गया है’।
  • विधेयक में, विदेशी अनुदान प्राप्त करने हेतु पात्र सभी दानदाताओं, निदेशकों और गैर-सरकारी संगठनों अथवा अन्य संगठनों के प्रमुख पदाधिकारियों के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य पहचान दस्तावेज बनाने का प्रस्ताव किया गया है।

विवादास्पद प्रावधान:

  • FCRA द्वारा अनुमोदित संस्थाओं के लिए ‘अनप्रयुक्त विदेशी अनुदान राशि को प्रयोग करने अथवा शेष विदेशी अनुदान को प्राप्त करने से रोकने के लिए’ केंद्र सरकार को अविलंबित जांच करने की अनुमति दिए जाने संबंधी प्रावधान।
  • प्रशासनिक प्रयोजनों के लिए विदेशी निधियों के उपयोग को सीमित करने संबंधी प्रावधान। यह प्रावधान अनुसंधान और पक्षसमर्थन संगठनों के प्रशासनिक कार्यों संबंधी लागतों को प्रभावित करेगा।

प्रमुख आलोचनाएँ:

  • यह विधेयक सरकारी प्रभाव को बढ़ाएगा और भारत में विदेशी वित्त-पोषित नागरिक समाज कार्य को प्रतिबंधित करेगा।
  • इसे “सरकार के खिलाफ बोलने वालों को निशाना बनाने” के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • यह नागरिक समाज संगठनों के लिए कार्य-सुगमता को सीमित करेगा।

संशोधन की आवश्यकता

  • पिछले कुछ वर्षों के दौरान, कई संगठनो द्वारा अनुदान राशियों को ‘गलत तरीके से उपयोग करने अथवा गलत तरीके से अनुदान प्राप्त करने के कारण’ सरकार द्वारा 19,000 ऐसे संगठनों के पंजीकरण को रद्द किया गया है। इस प्रकार की गतिविधियों को रोकने हेतु ‘अधिनियम’ को सशक्त किए जाने की आवश्यकता है।
  • विदेशी अनुदान के वार्षिक प्रवाह में वर्ष 2010 और 2019 के मध्य लगभग दोगुना वृद्धि हुई है, लेकिन कई विदेशी अनुदान प्राप्तकर्ताओं द्वारा निर्धारित उद्देश्य के लिए इस राशि का उपयोग नहीं किया गया है।
  • ऐसे दर्जनों गैर-सरकारी संगठनों के खिलाफ भी आपराधिक जाँच शुरू की जानी है, जो विदेशी अनुदान को गलत तरीके से उपयोग करते है अथवा गलत तरीके से अनुदान प्राप्त करते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. FCRA कब लागू किया गया था?
  2. इस क़ानून का कार्यान्वयन किसके द्वारा किया जाता है?
  3. अधिनियम के अनुसार विदेशी अनुदान की परिभाषा।
  4. अधिनियम के अनुसार विदेशी योगदान कौन स्वीकार नहीं कर सकता है।
  5. अनुदान प्राप्त करने हेतु पंजीकरण के लिए पात्रता मानदंड क्या है?

मेंस लिंक:

हाल के दिनों में FCRA विवादास्पद क्यों रहा है, चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

सार्वभौमिक पात्रता’ शर्तें


(What is “universal eligibility” condition?)

संदर्भ:

हाल ही में, विश्व बैंक द्वारा भारत के कोविड महामारी को रोकने के लिए $ 1 बिलियन का ऋण को “सार्वभौमिक पात्रता” (Universal Eligibility) की शर्तों के साथ दिया गया है।

सार्वभौमिकता पात्रता’ शर्तें क्या है?

इसका तात्पर्य है, कि राष्ट्रीय परियोजना को लागू करते समय खरीद पर सार्वजनिक अधिग्रहण आदेश, सूक्ष्म, मध्यम एवं लघु उद्यमों, स्टार्ट-अप्स के के लिए दिए जाने वाले कुछ विशेष लाभों सहित कोई भी प्राथमिकता अभिगम्यता बाजार नीतियां लागू नहीं की जाएंगी।

विश्व बैंक द्वारा निर्धारित अन्य शर्तें:

विश्व बैंक को परियोजना से संबंधित सभी खातों, अभिलेखों और अन्य फाइलों की खरीद दस्तावेजों की समीक्षा, निरीक्षण / ऑडिट करने का अधिकार होगा। वित्त-पोषण किये जाने के लिए इन शर्तों का अनुपालन अनिवार्य कर दिया गया है।

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पृष्ठभूमि:

  • विश्व बैंक द्वारा “भारत के COVID-19 विशेष सुरक्षा प्रतिक्रिया कार्यक्रम” में तेजी लाने हेतु 1 बिलियन अमरीकी डालर की सहायता को मंजूरी दी गयी है।
  • 1 बिलियन अमरीकी डालर की सहायता में, लगभग 550 मिलियन अमरीकी डालर का अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ (International Development AssociationIDA) और 220 मिलियन अमरीकी डालर का अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (International Bank of Reconstruction and DevelopmentIBRD) द्वारा योगदान किया जाएगा। ऋण की अंतिम परिपक्वता राशि 5 वर्ष है। इसमें पांच साल की छूट अवधि भी शामिल है।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. विश्व बैंक समूह के तहत संस्थाएँ।
  2. IDA और IBRD के बीच अंतर
  3. IDA द्वारा ऋण के प्रकार
  4. इन संस्थानों का मुख्यालय
  5. सार्वभौमिक पात्रता शर्त क्या है?

मेंस लिंक:

अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं किस प्रकार भारत को कोविड 19 महामारी से निपटने में मदद कर रही हैं? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

विश्‍व निर्वाचन निकाय संघ (A-WEB)


(Association of World Election Bodies)

संदर्भ:

भारत निर्वाचन आयोग ने विश्‍व निर्वाचन निकाय संघ (Association of World Election Bodies: A-WEB) के अध्यक्ष के रूप में एक वर्ष पूरा कर लिया है।

विश्‍व निर्वाचन निकाय संघ (A-WEB) के बारे में:

  • यह विश्व भर में चुनाव प्रबंधन निकायों (Election Management BodiesEMBs) का सबसे बड़ा संघ है।
  • इसकी स्थापना 14 अक्टूबर, 2013 को सांग-डो, दक्षिण कोरिया में की गयी थी।
  • इसका स्थायी सचिवालय सियोल में अवस्थित है।
  • इसका उद्देश्य दुनिया भर में स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी और भागीदारी चुनाव कराने में दक्षता और प्रभावशीलता को बढ़ावा देना है।

संरचना:

विश्‍व निर्वाचन निकाय संघ में 115 EMB सदस्य और 16 क्षेत्रीय संघों / संगठनों के रूप में एसोसिएट सदस्य सम्मिलित हैं।

स्रोत: पीआईबी

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


चेंदमंगलम साड़ी

(Chendamangalam saree)

चर्चा का कारण

केरल में बुनकरों के लिए काम करने वाले ‘केयर 4 चेंदमंगलम’ (Care 4 ChendamangalamC4C) द्वारा  बेंगलुरू में अनुदान संचय समारोह (fund-raiser) प्रदर्शनी के लिए भौगोलिक संकेतक (GI-tag) प्राप्त चेंदमंगलम साड़ी का प्रदर्शन किया गया है।

प्रमुख तथ्य:

  • चेंदमंगलम, केरल के एर्नाकुलम के पास एक छोटा सा शहर है, यह तीन नदियों के संगम पर स्थित है।
  • यह शहर प्राचीन बंदरगाह मुज़िरिस (Muziris) का हिस्सा था तथा यह कर्नाटक के बुनकरों ‘देवांग चेट्टियारों’ (Devanga Chettiars) द्वारा महीन सूत कटाई के लिये जाना जाता है।
  • GI-tag प्राप्त ये चेंदमंगलम साड़ी अपनी पुलियिलाकारा बॉर्डर (Puliyilakara Border) से पहचानी जा सकती है जो पतली काली रेखाएँ हैं और ये साड़ी के किनारों के साथ डिज़ाइन की जाती है।

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस

(International Day of Peace)

विश्व भर में प्रत्येक वर्ष 21 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस दिवस को 24 घंटे के लिए अहिंसा और संघर्ष विराम का पालन करते हुए शांति के आदर्शों को मज़बूत बनाने हेतु एक दिवस के रूप में घोषित किया है।

2020 थीम: ‘शेपिंग पीस टूगेदर’ (Shaping Peace Together)।

पृष्ठभूमि:

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा, वर्ष 1981 में अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस मनाने की घोषणा की गई थी। दो दशक बाद, वर्ष 2001 में, महासभा ने सर्वसम्मति से अहिंसा और संघर्ष विराम की अवधि के रूप में 21 सितंबर को घोषित करने के लिए मतदान किया गया।


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