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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 01 September

विषय – सूची:

 सामान्य अध्ययन-I

1. रेनाति चोल कालीन दुर्लभ शिलालेख की खोज

2. हम्पी

 

सामान्य अध्ययन-II

1. समीक्षा याचिका

 

सामान्य अध्ययन-III

1. मुक्त बाज़ार परिचालन क्या हैं?

2. कोयला गैसीकरण एवं द्रवीकरण

3. विश्व का सबसे बड़ा सौर वृक्ष

4. लद्दाख के पैंगोंग त्सो के दक्षिण किनारे महत्व

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. बाल्टिक देश

 


सामान्य अध्ययन-I


   

विषय: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

रेनाति चोल कालीन दुर्लभ शिलालेख की खोज


(Rare Renati Chola era inscription unearthed)

संदर्भ:

हाल ही में, आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले के एक दूरदराज के गांव एक दुर्लभ शिलालेख की खोज हुई है।

प्रमुख बिंदु:

  • यह एक डोलोमाइट शिलापट्ट तथा शेल पर उत्कीर्ण है।
  • इस शिलालेख को पुरातन तेलुगु लिपि में लिखा गया है।
  • इस शिलालेख का समयकाल 8 वीं शताब्दी ईस्वी निर्धारित किया गया है, इस समय इस क्षेत्र में रेनाडू के चोल महाराजा का शासन था।

शिलालेख पर उत्कीर्ण विषय

इसमें, यह पिडुकुला गाँव के एक मंदिर में सेवा करने वाले ब्राह्मण सिद्यामायु (Sidyamayu) को उपहार में दी गई छह मार्तुस (Marttus माप की एक इकाई) भूमि के रिकॉर्ड का विवरण दिया गया है।

  • शिलालेख की अंतिम पंक्तियाँ उस समय काल में ‘नैतिकता’ को दी जाने वाली प्राथमिकता का संकेत करती हैं।
  • इसमें कहा गया है कि ‘जो लोग इस शिलालेख को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख्नेगे, उन्हें ‘अश्वमेध यज्ञ’ करने के सामान पुण्य की प्राप्ति होगी तथा जो इसे नष्ट करेंगे उन्हें वाराणसी में हत्या का कारण बनने के बराबर पाप के भागी होंगे।

रेनाति चोल कौन थे?

  • रेनाडु (Renadu) के तेलुगु चोल (जिन्हें रेनाति चोल भी कहा जाता है) रेनाडू क्षेत्र पर शासन करते थे, वर्तमान में यह क्षेत्र कुडप्पा जिले के अंतर्गत आता है।
  • प्रारंभ में ये स्वतंत्र शासक थे, किंतु बाद में इन्हें पूर्वी चालुक्यों की अधीनता स्वीकार करनी पडी।
  • उन्हें सातवीं और आठवीं शताब्दी से संबंधित शिलालेखों में तेलुगु भाषा उपयोग करने का अद्वितीय गौरव प्राप्त है।
  • इस वंश का प्रथम शासक नंदिवर्मन (500 ईस्वी) था, जिसे करिकेल वंश तथा कश्यप गोत्र का बताया जाता है।
  • इनका राज्य पूरे कुडप्पा जिले तथा आसपास के अनंतपुर, कुर्नूल और चित्तूर जिले के क्षेत्रों में था।

चोल कालीन स्थानीय प्रशासन:

  • चोल प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता जिलों, कस्बों और गांवों के स्तर पर स्थानीय प्रशासन था।
  • उत्तिरमेरूर शिलालेख से चोल प्रशासन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी का पाता चलता है।
  • चोल प्रशासनिक प्रणाली की सबसे अद्वितीय विशेषता ‘ग्राम स्वायत्तता’ थी।
  • चोलों की महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाइयों में से एक ‘नाडु’ (Nadu) था। नाडु में प्रतिनिधि सभाएँ होती थीं। नाडुओं के प्रमुखों को नत्तार (Nattars) कहा जाता था।
  • नाडु परिषद को नट्टावई (Nattavai) कहा जाता था।

वारियम (Variyams)

  • चोल कालीन शासन व्यवस्था में वारियमएक प्रकार की कार्यकारिणी समिति थी।
  • ग्राम सभाएं, वारियम की सहायता से ग्राम प्रशासन का संचालन करती थी।
  • समाज के पुरुष सदस्य इन वरियाम के सदस्य होते थे।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. रेनाति चोलों का राज्य क्षेत्र
  2. रेनाति चोलों के महत्वपूर्ण शासक
  3. चालुक्यों के बारे में
  4. उत्तिरमेरूर शिलालेख किससे संबंधित हैं?
  5. रेनाति चोलों के अधीन स्थानीय प्रशासन।

मेंस लिंक:

रेनाति चोल कौन थे? उनके शासन के दौरान स्थानीय प्रशासन पर एक टिप्पणी लिखिए।

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स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

हम्पी (Hampi)


संदर्भ:

हाल ही में, पर्यटन मंत्रालय द्वारा ‘देखो अपना देश’ वेबिनार श्रृंखला के अंतर्गत “हम्पी-अतीत से प्रेरित; भविष्य की ओर अग्रसर” नामक एक वेबिनार का आयोजन किया गया।

‘देखो अपना देश’ वेबिनार श्रृंखला ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ कार्यक्रम के तहत भारत की समृद्ध विविधता को प्रदर्शित करने की एक पहल है।

हम्पी के बारे में:

हम्पी, विजयनगर साम्राज्य के अंतिम महान हिंदू साम्राज्य की अंतिम राजधानी थी। विजयनगर साम्राज्य का उत्थान 1336 ईस्वी में, कंपिली साम्राज्य के पतन के बाद हुआ। यह दक्षिण भारत के प्रसिद्ध हिंदू साम्राज्यों में से एक के रूप में विकसित हुआ, जिसने 200 वर्षों तक शासन किया।

  • यह तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य का एक हिस्सा थी।
  • हम्पी को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल दर्जा प्राप्त है।
  • इसका नाम पंपा से लिया गया है जो कि तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है जिसके किनारे यह शहर बसा हुआ है।
  • यह स्थल, बहु-धार्मिक और बहु-जातीय हुआ करती थे; इसमें हिंदू और जैन संरचनाएं एक-दूसरे के बगल में निर्मित थे।

वास्तुकला:

इसे यूनेस्को द्वारा दक्षिण भारत में अंतिम महान हिंदू राज्य के 1,600 से अधिक जीवित बचे अवशेषों में से ‘सादगीपूर्ण, भव्य स्थल’ (Austere, Grandiose Site) के रूप में वर्णित किया गया है।

  • यहां की इमारतों में मुख्य रूप से, दक्षिण भारतीय हिंदू कला और वास्तुकला से लेकर एहोल-पत्तदकल शैलियों को भी शामिल किया गया था, लेकिन हम्पी निर्माणकर्ताओं ने लोटस महल, सार्वजनिक स्नान और हाथी अस्तबल में इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के तत्वों को भी शामिल किया था।
  • 15 वीं शताब्दी का विरुपाक्ष मंदिर शहर के सबसे पुराने स्मारकों में से एक है।
  • विरुपाक्ष मंदिर के दक्षिण मे, हेमकुंटा पहाड़ी के प्रारंभिक खंडहर, जैन मंदिर और भगवान विष्णु का एक रूप नरसिम्हा की अखंड मूर्ति है।
  • 16 वीं शताब्दी में निर्मित विट्टल मंदिर, अब एक विश्व धरोहर स्मारक है। मंदिर के स्तंभ इतने संतुलित हैं कि उनमें संगीत की गुणवत्ता का बोध होता है।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. हम्पी पर शासन करने वाले विभिन्न राजवंश
  2. एक भारत श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम के बारे में
  3. तुंगभद्रा नदी बेसिन
  4. विजयनगर साम्राज्य के दौरान मंदिरों की वास्तुकला
  5. भारत में महत्वपूर्ण विश्व विरासत स्थल

मेंस लिंक:

हम्पी की वास्तुकला के महत्व पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: पीआईबी

 


सामान्य अध्ययन-II


  

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

समीक्षा याचिका (Review Petition)


संदर्भ:

हाल ही में, उच्चत्तम न्यायालय द्वारा वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण पर अवमानना ​​मामले में 1 रुपए का जुर्माना लगाया है। जुर्माना नहीं देने पर उन्हें तीन महीने की कैद होगी तथा तीन साल के लिए वकालत प्रैक्टिस करने से वंचित किया जाएगा।

पृष्ठभूमि:

न्यायालय ने प्रशांत भूषण मांगने से इंकार करने तथा कई बहसों के पश्चात, 25 अगस्त अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

आगे क्या?

प्रशांत भूषण जुर्माना देने के लिए तैयार हो गए है, किंतु उन्होंने अपनी ‘दोषसिद्धि’ के विरुद्ध एक समीक्षा याचिका दायर करने की बात कही है।

समीक्षा / पुनर्विचार याचिका (Review Petition) क्या है?

संविधान के अनुसार, उच्चत्तम न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय देश का क़ानून बन जाता है। यह निर्णय अंतिम होता है तथा यह भविष्य में सुनवाई हेतु आए मामलों पर निर्णय देने के लिए तथ्य प्रदान करता है।

  • हालाँकि अनुच्छेद 137 के तहत उच्चत्तम न्यायालय को अपने किसी भी निर्णय या आदेश की समीक्षा करने की शक्ति प्राप्त है। उच्चत्तम न्यायालय के अंतिम प्राधिकरण संबधी स्थिति में यह विचलन किसी विशिष्ट तथा संकीर्ण आधार होने पर ही किया जाता है।
  • इसलिए, जब किसी निर्णय की समीक्षा की जाती है, तो नियम यह होता है, कि उस मामले में नए साक्ष्यों को अनुमति नहीं दी जाती है, परन्तु न्याय देने में हुई गंभीर त्रुटियों को ठीक किया जाता है।

समीक्षा याचिका कब स्वीकार की जा सकती है?

वर्ष 1975  में एक मामले में तत्कालीन न्यायमूर्ति कृष्ण/कृष्णा अय्यर ने निर्णय देते हुए कहा था कि किसी समीक्षा याचिका को तभी स्वीकार किया जा सकता है जब न्यायालय द्वारा दिये गए किसी निर्णय में भयावह चूक या अस्पष्टता जैसी स्थिति उत्पन्न हुई हो।

  • समीक्षा, किसी भी प्रकार से एक अपील नहीं होती है।
  • अर्थात, न्यायालय अपने पूर्व के निर्णय में निहित ‘स्पष्टता का अभाव’ तथा ‘महत्त्वहीन आशय’ की गौण त्रुटियों की समीक्षा कर उसमें सुधार कर सकता है।

समीक्षा याचिका किस प्राकर दायर की जाती है?

नागरिक प्रक्रिया संहिता और उच्चतम न्यायालय के नियमों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो फैसले से असंतुष्ट है, समीक्षा याचिका दायर कर सकता है। इरका अर्थ है, कि समीक्षा याचिका दायर करने के लिए व्यक्ति का उक्त मामले में पक्षकार होना अनिवार्य नहीं होता है।

समीक्षा याचिका, निर्णय या आदेश की तारीख के 30 दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिये।

कुछ परिस्थितियों में, न्यायालय समीक्षा याचिका दायर करने की देरी को माफ़ कर सकती है यदि याचिकाकर्ता देरी के उचित कारणों को अदालत के सम्मुख प्रदर्शित करे।

  1. समीक्षा याचिका निर्णय की तारीख के 30 दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिये।
  2. कुछ परिस्थितियों में, याचिकाकर्ता द्वारा देरी के उचित कारणों को न्यायालय के समक्ष पेश करने पर, न्यायालय समीक्षा याचिका दायर करने की देरी को माफ़ कर सकती है।

समीक्षा याचिका हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया:

  1. न्यायालय के नियमों के अनुसार, ‘समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई वकीलों की मौखिक दलीलों के बिना की जाएगी’। सुनवाई न्यायधीशों द्वारा उनके चैम्बरों में की जा सकती है।
  2. समीक्षा याचिकाओं की सुनवाई, व्यवहारिक रूप से न्यायाधीशों के संयोजन से अथवा उन न्यायधीशों द्वारा भी की जा सकती है जिन्होंने उन पर निर्णय दिया था।
  3. यदि कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्त या अनुपस्थित होता है तो वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए प्रतिस्थापन किया जा सकता है।
  4. अपवाद के रूप में, न्यायालय मौखिक सुनवाई की अनुमति भी प्रदान करता है। वर्ष 2014 के एक मामले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि “मृत्युदंड” के सभी मामलों संबधी समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा खुली अदालत में की जाएगी।

समीक्षा याचिका के असफल होने के बाद विकल्प:

  • रूपा हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा मामले (2002) में, उच्चत्तम न्यायालय ने एक क्यूरेटिव पिटीशन की अवधारणा विकसित की, जिसे पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद सुना जा सकता है।
  • क्यूरेटिव पिटीशन / उपचारात्मक याचिका पर सुनवाई तभी होती है जब याचिकाकर्त्ता यह प्रमाणित कर सके कि उसके मामले में न्यायालय के फैसले से न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है साथ ही अदालत द्वारा निर्णय/आदेश जारी करते समय उसे नहीं सुना गया है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. समीक्षा याचिका तथा क्यूरेटिव याचिका में अंतर
  2. समीक्षा याचिका प्रक्रिया
  3. कौन दाखिल कर सकता है?
  4. समीक्षा याचिका दायर करने की समय-अवधि
  5. IPC की धारा 497 क्या है?
  6. अनुच्छेद 137 क्या है?

मेंस लिंक:

समीक्षा याचिका क्या है? समीक्षा याचिका हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया क्या है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन-III


  

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

मुक्त बाज़ार परिचालन क्या हैं?


संदर्भ:

हाल ही में, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा अग्रिम करों के कारण उत्पन्न होने वाले तरलता दबावों तथा बढ़ते बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) को संतुलित करने के लिए निम्नलिखित उपायों की घोषणा की गयी है:

  1. ऑपरेशन ट्विस्ट’ के तहत ₹20,000 करोड़ की सकल राशि के दो वित्तीय अंश (Tranches)
  2. सितंबर में 1 लाख करोड़ रुपये की समग्र राशि का आवधिक रेपो परिचालन।
  3. तथाकथित हेल्ड टू मच्योरिटी’ (Held To MaturityHTM) श्रेणी के लिए अधिक जगह बनाई गयी है, जिसे बैंक 1 सितंबर 2020 से अपने सरकारी-प्रतिभूति अधिग्रहणों को रखने के लिए उपयोग कर सकते हैं।

ऑपरेशन ट्विस्ट’ क्या है?

ऑपरेशन ट्विस्ट (Operation Twist) के अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक की मुक्त बाज़ार परिचालन (Open Market Operations-OMO) के माध्यम से एकसाथ अल्पकालिक प्रतिभूतियों की बिक्री तथा दीर्घकालिक प्रतिभूतियों की खरीद की जाती है। इस तंत्र के तहत, अल्पकालिक प्रतिभूतियों को दीर्घकालिक प्रतिभूतियों में परिवर्तित किया जाता है।

आरबीआई द्वारा ‘ऑपरेशन ट्विस्ट’ का प्रबंधन

  • इस ऑपरेशन में दीर्घकालिक ब्याज दरों को कम करने तथा अल्पकालिक दरों को कम करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों को एक साथ खरीदना तथा बेचना सम्मिलित होता है।
  • इसमें बांड मूल्यों तथा बांड यील्ड के मध्य एक विपरीत संबंध होता है। जैसे ही केंद्रीय बैंक दीर्घकालिक प्रतिभूतियों (बॉन्ड) को खरीदता है, उनकी मांग बढ़ती है तथा इससे उनकी कीमतों में वृद्धि हो जाती है।
  • हालांकि, बांड कीमतों में वृद्धि होने के साथ ही बांड यील्ड नीचे आ जाता है। यील्ड वह रिटर्न होता है जो एक निवेशक अपने (बांड) होल्डिंग / निवेश पर प्राप्त करता है।
  • किसी अर्थव्यवस्था में ब्याज दर यील्ड से निर्धारित होती है। इस प्रकार, दीर्घकालिक ब्याज दर कम होने का मतलब है कि लोग कम ब्याज दरों पर दीर्घकालिक ऋणों (जैसे मकान, कार या वित्तपोषण परियोजनाएं) का लाभ उठा सकते हैं।
  • इससे दीर्घकालिक बचत से अपेक्षित आय में गिरावट होती है जिससे शेष राशि, बचत की अपेक्षा व्यय की ओर प्रवृत्त हो जाती है। इसलिए, सस्ते खुदरा ऋण उपभोग खर्च को प्रोत्साहित करने में मदद कर सकते है, जो कि अर्थव्यवस्था में जीडीपी का सबसे बड़ा घटक होता है।

लाभ:

  • दीर्घकालिक ऋणों के लिए उच्च जोखिम उठाने वाले निश्चित आय वाले निवेशकों को दीर्घावधि बॉन्ड यील्ड कम होने से लाभ होगा।
  • ‘ऑपरेशन ट्विस्ट’ से उपभोक्ताओं / उधारकर्ताओं को भी लाभ होगा क्योंकि खुदरा ऋण अब सस्ता हो जाएगा।
  • सस्ते खुदरा ऋण का अर्थ है, अर्थव्यवस्था में खपत और व्यय में वृद्धि, जो विकास दर में वृद्धि करने में सहायक होगा।

मुक्त बाज़ार परिचालन (Open Market Operations-OMO) क्या हैं?

मुक्त बाज़ार परिचालन (OMO) धन की कुल मात्रा को विनियमित या नियंत्रित करने के लिये आरबीआई की मात्रात्मक मौद्रिक नीति उपकरणों में से एक है, जिसे अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने हेतु उपयोग में लाया जाता है।

  • जब आरबीआई को लगता है कि बाजार में तरलता की मात्रा में अधिक वृद्धि हो रही है, तो वह प्रतिभूतियों की बिक्री करता है, जिससे बाजार में रुपये की तरलता कम हो जाती है।
  • इसी प्रकार, जब बाजार में तरलता कम हो जाती है, तो आरबीआई बाजार से प्रतिभूतियां खरीद कर तरलता में को संतुलित कर सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सरकारी प्रतिभूतियों के प्रकार?
  2. T- बिल क्या होते हैं?
  3. किन प्रतिभूतियों को रियायती मूल्य पर बेचा जाता है?
  4. मौद्रिक तथा राजकोषीय नीतियों के मध्य अंतर
  5. ऑपरेशन ट्विस्ट क्या है?

मेंस लिंक:

भारतीय रिज़र्व बैंक  द्वारा संचालित ऑपरेशन ट्विस्ट के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

कोयला गैसीकरण एवं द्रवीकरण


(Coal Gasification and Liquefaction)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय कोयला और खान मंत्री द्वारा ‘कोयला गैसीकरण और द्रवीकरण’ पर आयोजित एक वेबिनार को संबोधित किया गया। जिसमे कोयला मंत्री ने कहा है कि;

  1. भारत ने 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसमें 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया जायेगा।
  2. ईंधन के स्वच्छ स्रोतों के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए, सरकार ने गैसीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले कोयले की राजस्व हिस्सेदारी में 20 प्रतिशत की रियायत प्रदान की है।
  3. इससे सिंथेटिक प्राकृतिक गैस, ऊर्जा ईंधन, उर्वरकों के लिए यूरिया और अन्य रसायनों के उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।

कोयला गैसीकरण क्या है?

  • कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) कोयले को संश्लेषित गैस (Synthesis Gas), जिसे सिनगैस (syngas) भी कहा जाता है, में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। इसमें कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), हाइड्रोजन (H2), कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), प्राकृतिक गैस (CH4), और जल वाष्प (H2O) के मिश्रण से सिनगैस का निर्माण लिया जाता है।
  • गैसीकरण के दौरान, कोयले को उच्च दबाव पर गर्म करते हुए ऑक्सीजन तथा भाप के साथ मिश्रित किया जाता है। इस अभिक्रिया के दौरान, ऑक्सीजन और जल के अणु कोयले का ऑक्सीकरण करते हैं और सिनगैस का निर्माण करते हैं।

गैसीकरण के लाभ:

  1. गैस का परिवहन, कोयले के परिवहन की तुलना में बहुत सस्ता होता है।
  2. स्थानीय प्रदूषण समस्याओं का समाधान करने में सहायक होता है।
  3. पारंपरिक कोयला दहन की तुलना में अधिक दक्ष होती है क्योंकि इसमें गैसों का प्रभावी ढंग से दो बार उपयोग किया जा सकता है: कोयला गैसें पहले अशुद्धियों को साफ करती है और विद्युत् उत्पादन हेतु टरबाइन में इनका उपयोग किया जाता है। गैस टरबाइन से उत्सर्जित होने वाली ऊष्मा का उपयोग ‘भाप टरबाइन-जनरेटर’ में भाप उत्पन्न करने के लिए किया जा सकता है।

चिंताएँ और चुनौतियाँ:

  • कोयला गैसीकरण ऊर्जा उत्पादन के अधिक जल-गहन रूपों में से एक है।
  • कोयला गैसीकरण से जल संदूषण, भूमि-धसान तथा अपशिष्ट जल के सुरक्षित निपटान आदि के बारे मे चिंताएं उत्पन्न होती हैं।

कोयला द्रवीकरण क्या है?

कोयला द्रवीकरण (coal liquefaction) को  कोल टू लिक्विड (Coal to LiquidCTL) तकनीक भी कहा जाता है। यह डीजल और गैसोलीन का उत्पादन करने की वैकल्पिक पद्धति है, जो कच्चे तेल की कीमतों की बढ़ती हुई कीमतों को देखते हुए काफी सस्ती है।

  • इस प्रक्रिया में कोयले का गैसीकरण शामिल होता है, जिससे सिंथेटिक गैस (CO+H2 का मिश्रण) का निर्माण होता है। सिंथेटिक गैस को उच्च दबाव तथा उच्च तापमान पर कोबाल्ट / लौह-आधारित उत्प्रेरक की उपस्थिति में तरलीकृत करके ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
  • हालांकि, द्रवीकृत कोयला, पेट्रोलियम ईधन की तुलना में CO2 का दो गुना अधिक उत्सर्जन करता है। यह बड़ी मात्रा में SO2 का भी उत्सर्जन करता है।

द्रवीकरण के लाभ:

CTL संयंत्रों से होने वाले CO2 उत्सर्जन को पारंपरिक कोयला आधारित विदुत संयंत्रो की तुलना में आसानी से और कम लागत में अभिग्रहण (Capture) किया जा सकता है। इस अभिग्रहीत CO2 को भूमिगत भंडारण कुण्डो में संग्रहीत किया जा सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कोयला गैसीकरण क्या है?
  2. यह किस प्रकार किया जाता है?
  3. इसके उपोत्पाद (Byproducts)
  4. गैसीकरण के लाभ?
  5. भूमिगत कोयला गैसीकरण क्या है?
  6. कोयला द्रवीकरण क्या है?
  7. द्रवीकरण के लाभ

मेंस लिंक:

कोयला गैसीकरण एवं द्रवीकरण पर एक टिप्पणी लिखिए, तथा इसके महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

विश्व का सबसे बड़ा सौर वृक्ष


(World’s Largest Solar Tree)

संदर्भ:

हाल ही में CSIR-CMERI ने विश्व का सबसे बड़ा सौर वृक्ष विकसित किया है, जिसे सीएसआईआर-सीएमईआरआई की आवासीय कॉलोनी, दुर्गापुर में स्थापित किया गया है।

प्रमुख बिंदु:

  • इस स्थापित सौर वृक्ष की क्षमता 11.5 kWp से अधिक है।
  • इसमें स्वच्छ और हरित ऊर्जा की 12,000-14,000 इकाइयों को उत्पन्न करने की वार्षिक क्षमता है।
  • इस सौर वृक्ष को इस तरह से निर्मित किया गया है कि इसके प्रत्येक पैनल के द्वारा सूर्य के अधिकतम प्रकाश को प्राप्त करने तथा इसके नीचे के क्षेत्र में न्यूनतम छाया क्षेत्र को सुनिश्चित किया जा सके।

सौर वृक्षों का महत्व तथा क्षमता:

  • इन सौर वृक्षों को अस्थिर-मूल्य जीवाश्म ईंधन के प्रतिस्थापन के रूप में कृषि के साथ जोड़ा जा सकता है।
  • प्रत्येक सौर वृक्ष में जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा उत्पादन के दौरान वायुमंडल के लिए पैदा होने वाली ग्रीनहाउस गैसों की तुलना में 10-12 टन CO2 उत्सर्जन को बचाने की क्षमता है।
  • इसके अलावा, अतिरिक्त उत्पन्न ऊर्जा को ऊर्जा ग्रिड में सुरक्षित रखा जा सकता है।
  • यह कृषि मॉडल एक सुसंगत आर्थिक प्रतिफल प्रदान कर सकता है और किसानों को कृषि संबंधी गतिविधियों में अनिश्चितताओं के प्रभावों का सामना करने में सहायता कर सकता है, इस प्रकार खेती को एक आर्थिक और ऊर्जा वहनीय लाभप्रद गतिविधि बना सकता है।
  • इस सौर वृक्ष में आईओटी (IOT) आधारित सुविधाऐं अर्थात् कृषि क्षेत्रों में चौबीस घंटे सीसीटीवी निगरानी, ​​वास्तविक समय पर आर्द्रता की स्थिति, हवा की गति, वर्षा की भविष्यवाणी और मिट्टी के विश्लेषण सेंसर का उपयोग करने की क्षमता है।
  • सीएसआईआर-सीएमईआरआई द्वारा विकसित सौर ऊर्जा संचालित ई-सुविधा कियोस्क को व्यापक कृषि डेटाबेस प्राप्त करने के साथ-साथ एकीकृत ऑनलाइन बाजार तक तत्काल और वास्तविक समय पर पहुंच के लिए eNAM अर्थात राष्ट्रीय कृषि बाजार के साथ सौर वृक्षों से जोड़ा जा सकता है।

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स्रोत: पीआईबी

 

विषय: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ एवं उनका प्रबंधन- संगठित अपराध और आतंकवाद के बीच संबंध।

लद्दाख के पैंगोंग त्सो के दक्षिण किनारे महत्व


(What is the importance of Ladakh’s Pangong Tso’s south bank?)

संर्दभ:

भारत और चीन के बीच कई स्थानों पर सीमाएँ अनिश्चित हैं, तथा पैंगोंग त्सो (Pangong Tso) सहित कई क्षेत्रों में दोनों देशों के मध्य वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की अवधारणा में भिन्नता है।

हाल ही में, भारतीय सैनिकों द्वारा पैंगोंग त्सो के दक्षिणी तट के समीप चीनी सैनिकों के कुछ पहाडियों पर कब्जा करने के प्रयास को विफल कर दिया गया ।

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इस स्थान पर विवाद का कारण

वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual ControlLAC) – सामान्यतः यह रेखा पैंगोंग त्सो की चौड़ाई को छोड़कर स्थल से होकर गुजरती है तथा वर्ष 1962 से भारतीय और चीनी सैनिकों को विभाजित करती है। पैंगोंग त्सो क्षेत्र में यह रेखा पानी से होकर गुजरती है।

  • दोनों पक्षों ने अपने क्षेत्रों को चिह्नित करते हुए अपने- अपने क्षेत्रों को घोषित किया हुआ है।
  • भारत का पैंगोंग त्सो क्षेत्र में 45 किमी की दूरी तक नियंत्रण है, तथा झील के शेष भाग को चीन के द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

पैंगोंग त्सो झील को फिंगर्स के रूप में विभाजित किया गया है। इस क्षेत्र में भारत और चीन के बीच LAC को लेकर मतभेद है, तथा यहाँ पर 8 फिंगर्स विवादित है।

  • भारत का दावा है कि LAC फिंगर 8 से होकर गुजरती है, और यही पर चीन की अंतिम सेना चौकी है।
  • भारत इस क्षेत्र में, फिंगर 8 तक, इस क्षेत्र की संरचना के कारण पैदल ही गश्त करता है। लेकिन भारतीय सेना का नियंत्रण फिंगर 4 तक ही है।
  • दूसरी ओर, चीन का कहना है कि LAC फिंगर 2 से होकर गुजरती है। चीनी सेना हल्के वाहनों से फिंगर 4 तक तथा कई बार फिंगर 2 तक गश्त करती रहती है।

पैंगोंग त्सो क्षेत्र में चीनी अतिक्रमण का कारण

  • पैंगोंग त्सो झील रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चुशूल घाटी (Chushul Valley) के नजदीक है। वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान चीन ने चुशूल घाटी ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था।
  • चुशूल घाटी तक का रास्ता पैंगोंग त्सो झील से होकर जाता है, यह एक मुख्य मार्ग है जिसका चीन, भारतीय-अधिकृत क्षेत्र पर कब्जे के लिये उपयोग कर सकता है।
  • चीन यह भी नहीं चाहता है कि भारत LAC के पास कहीं भी अपने बुनियादी ढांचे को बढ़ावा दे। चीन को डर है कि इससे अक्साई चिन और ल्हासा-काशगर (Lhasa-Kashgar) राजमार्ग पर उसके अधिकार के लिए संकट हो सकता है।
  • इस राजमार्ग के लिए कोई खतरा, लद्दाख और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में चीनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के लिए बाधा पहुचा सकता है।

पैंगोंग त्सो के बारे में

  • लद्दाखी भाषा में पैंगोंग का अर्थ है समीपता और तिब्बती भाषा में त्सो का अर्थ झील होता है।
  • पैंगोंग त्सो लद्दाख में 14,000 फुट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित एक लंबी संकरी, गहरी, स्थलरुद्ध झील है, इसकी लंबाई लगभग 135 किमी है।
  • इसका निर्माण टेथीज भू-सन्नति से हुआ है।
  • यह एक खारे पानी की झील है।
  • काराकोरम पर्वत श्रेणी, जिसमे K2 विश्व दूसरी सबसे ऊंची चोटी सहित 6,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली अनेक पहाड़ियां है तथा यह ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन और भारत से होती हुई पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे पर समाप्त होती है।
  • इसके दक्षिणी तट पर भी स्पंगुर झील (Spangur Lake) की ओर ढलान युक्त ऊंचे विखंडित पर्वत हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. LoC क्या है और इसकी स्थापना, भौगोलिक सीमा और महत्व
  2. LAC क्या है?
  3. नाथू ला कहाँ है?
  4. पैंगोंग त्सो कहाँ है?
  5. अक्साई चिन का प्रशासन कौन करता है?
  6. नाकु ला कहाँ है?
  7. पैंगोंग त्सो झील क्षेत्र में में नियंत्रण

मेंस लिंक:

भारत और चीन के लिए पैंगोंग त्सो के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


बाल्टिक देश

  • यह एक भू-राजनीतिक शब्द है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर उत्तरी यूरोप में बाल्टिक सागर के पूर्वी तट पर तीन संप्रभु राज्यों के समूह, एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया के लिए किया जाता है।
  • तीनों देशों के बीच सहयोग के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र, विदेशी और सुरक्षा नीति, रक्षा, ऊर्जा और परिवहन हैं।
  • तीनों देश यूरोपीय संघ, नाटो, यूरोज़ोन और OECD के सदस्य हैं।
  • इन तीनों देशों को विश्व बैंक द्वारा उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के रूप में वर्गीकृत किया गया है तथा इनमे मानव विकास सूचकांक उच्च स्तर पर है।

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