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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 28 August

विषय – सूची:

 सामान्य अध्ययन-II

1. क्षेत्रीय संपर्क योजना ‘उड़ान’

2. राज्यों में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजातियों का उपवर्गीकरण: उच्चत्तम न्यायालय

3. वोल्बाचिया बैक्टीरिया से डेंगू प्रसरण पर नियंत्रण

 

सामान्य अध्ययन-III

1. वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की कमी

2. बीटी बैंगन (Bt Brinjal)

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. विश्व उर्दू सम्मेलन

2. ग्रेट अंडमानी जनजाति

3. टोगो (Togo)

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

क्षेत्रीय संपर्क योजना ‘उड़ान’


(Regional Connectivity Scheme UDAN)

संदर्भ:

हाल ही में, नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा क्षेत्रीय संपर्क योजना (Regional Connectivity SchemeRCS)- उड़े देश का आम नागरिक (उड़ान- UDAN) के चौथे दौर के तहत 78 नए हवाई मार्गों को मंजूरी दे दी गई है।

उड़ान योजना के तहत अब तक 766 हवाई मार्गों को मंजूरी दी जा चुकी है।

‘उड़ान’ योजना के बारे में:

UDAN का पूरा नाम ‘उड़े देश का आम नागरिक’ (Ude Desh Ka Aam Nagrik) है। इसका उद्देश्य हवाई यात्रा को सस्ती और विस्तृत बनाना है।

  • नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा क्षेत्रीय हवाई संपर्क को प्रोत्साहित करने तथा हवाई यात्रा को आम जनता के लिए सस्ती बनाने हेतु क्षेत्रीय संपर्क योजना (RCS) की शुरुआत 10 अक्टूबर 2016 को की गयी थी।
  • इस योजना को केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से वित्त पोषित किया जाता है।
  • प्रारंभ में इस योजना को 10 वर्ष के लिए लागू किया गया है, जिसे बाद में आगे बढ़ाया जा सकता है।

व्यवहार्यता अंतराल निधि:

इस योजना में क्षेत्रीय हवाई अड्डों की वित्तीय व्यवहार्यता पर बिना दबाव दिए हुए, उड़ान लागत को कम करके तथा व्यवहार्यता अंतराल निधि (Viability Gap Funding– VGF) के रूप में वित्तीय सहायता के माध्यम से हवाई मार्गों को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाने पर जोर दिया जाता है। व्यवहार्यता अंतराल निधि (VGF),  परिचालन के पहले तीन वर्षों तक विशिष्ट मार्गों पर उड़ान ऑपरेटरों के लिए उपलब्ध होगी।

व्यवहार्यता अंतराल निधि (VGF), सरकार द्वारा उन आधारभूत ढाँचा परियोजनाओं के लिए दिया जाने वाला ऐसा अनुदान होता है, जो आर्थिक रूप से लाभकारी हों किंतु उनकी वित्तीय व्यवहार्यता कम हो।

उड़ान 4.0

उड़ान के चौथे दौर (UDAN 4.0) को दिसंबर 2019 में पूर्वोत्तर क्षेत्रों, पहाड़ी राज्यों और द्वीपों पर विशेष ध्यान देने के साथ शुरू किया गया था।

  • भारतीय हवाई अड्डा प्राधिकरण (AAI) द्वारा पहले ही विकसित किए गए हवाई अड्डों को इस योजना के तहत व्यवहार्यता अंतराल निधि (VGF) के लिए उच्च प्राथमिकता दी गई है।
  • उड़ान 4.0 के तहत, हेलीकॉप्टर और सी-प्लेन के संचालन को भी शामिल किया गया है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UDAN योजना कब शुरू की गई थी?
  2. योजना का कार्यान्वयन और वित्त पोषण
  3. राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति का अवलोकन
  4. इस योजना के तहत, हवाई किरायों के लिए सब्सिडी देने के लिए व्यवहार्यता अंतराल निधि (VGF) कौन प्रदान करता है?
  5. योजना के तहत राज्य सरकारों की भूमिका

मेंस लिंक:

UDAN योजना के प्रदर्शन पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

राज्यों में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजातियों का उपवर्गीकरण: उच्चत्तम न्यायालय


(States can have sub-groups among SCs/STs: Supreme Court)

संदर्भ:

हाल ही में, उच्चत्तम न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों वाली खंडपीठ ने कहा है कि राज्य ‘कमजोरों से कमजोर लोगों’ को तरजीह देने के लिए केंद्रीय सूची में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को उप-वर्गीकृत किया जा सकता है।

पृष्ठभूमि:

  • उच्चत्तम न्यायालय का यह निर्णय, पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग (सेवा में आरक्षण) अधिनियम, 2006 की धारा 4 (5) से संबंधित कानून के प्रश्न संवैधानिक पीठ द्वारा की गयी टिप्पणी पर आधारित है।
  • इस कानूनी प्रावधान के तहत राज्य में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 50% सीटों को बाल्मीकि और मज़हबी सिखों के लिए आवंटित किया गया है।

उप-वर्गीकरण की आवश्यकता- सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी

  • आरक्षण से आरक्षित जातियों के भीतर ही असमानताएँ उत्पन्न हो गयी हैं।
  • आरक्षित वर्ग के भीतर ही ‘जातीय संघर्ष’ व्याप्त है क्योंकि आरक्षण का लाभ केवल कुछ लोगों द्वारा उठाया जा रहा है।
  • यह स्पष्ट है कि जाति, व्यवसाय और गरीबी आपस में जुड़े हुए हैं।
  • राज्यों को विभिन्न वर्गों के मध्य गुणात्मक और मात्रात्मक अंतर को सुधारने हेतु उपयुक्त उपाय करने की शक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है।

संवैधानिक प्रावधान:

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 (1) के तहत, भारत के राष्ट्रपति, राज्यपाल के परामर्श के पश्चात्, जातियों, प्रजातियों, जनजातियों अथवा इनके कुछ समूहों को अनुसूचित जाति के रूप में निर्दिष्ट कर सकते हैं।
  • तदनुसार, राष्ट्रपति द्वारा अनुसूचित जातियों को अनुसूचित जातियों को ‘संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश- 1950’ तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सूची (संशोधन) आदेश- 1956 के द्वारा अधिसूचित किया गया है।
  • हालांकि, अनुच्छेद 341 (2) के तहत, भारत की संसद विधि बनाकर अनुसूचित जातियों की सूची में उपरोक्त समूहों को सम्मिलित कर सकती है अथवा निकाल सकती है।

उच्चत्तम न्यायालय का नवीनतम निर्णय और केंद्रीय सूची में ‘छेड़छाड़’

  • उच्चत्तम न्यायालय की बेंच के अनुसार यह निर्णय केंद्रीय सूची में ‘छेड़छाड़’ नहीं हैं। राष्ट्रपति / केंद्रीय सूची के भीतर उप-वर्गीकरण ‘छेड़छाड़’ के तुल्य नहीं है। इस सूची में किसी भी जाति को बाहर नहीं किया गया है।
  • राज्य केवल सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर व्यावहारिक रूप से सर्वाधिक कमजोर समूह को वरीयता देते हैं।
  • इसके अलावा, अधिक पिछड़ों के लिए आरक्षण के लाभ का सुनिश्चित वितरण करना ‘समानता के अधिकार’ का एक पहलू है।

निर्णय का महत्व

  • उच्चत्तम न्यायालय का यह निर्णय, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में क्रीमी लेयर अवधारणा का विस्तार करने के लिए बढ़ावा देता है।
  • इस निर्णय में कहा गया है कि नागरिकों को हमेशा के लिए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा हुआ नहीं माना जा सकता है; जिन लोगों द्वारा प्रगति की गयी है उन्हें क्रीमी लेयर की तरह बाहर रखा जाना चाहिए।
  • एक समान-वर्ग के निर्माण की आड़ में अन्य लोगों की कीमत पर शक्तिशाली लोगों को फलों की पूरी टोकरी नहीं दी जा सकती है।

निर्णय के निहितार्थ:

इस फैसले में उच्चत्तम न्यायालय की पीठ ने, ई वी चिन्नैया मामले में पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के 2004 के फैसले विपरीत दृष्टिकोण अपनाया है।

  • ई वी चिन्नैया मामले में, अदालत ने कहा था कि राज्यों द्वारा एकपक्षीय रूप से ‘अनुसूचित जातियों के भीतर उपवर्गीकरण’ करना राष्ट्रपति सूची के साथ छेड़छाड़ करने के समान होगा।
  • दो समान संख्या वाली संवैधानिक पीठों द्वारा एक विषय पर विपरीत निर्णय देने से, इस मामले को उच्चत्तम न्यायालय की सात न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ के पास भेजा गया है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ई वी चिन्नैया मामला किससे संबंधित है?
  2. अनुच्छेद 341 (1) के तहत राष्ट्रपति की शक्तियां।
  3. केंद्रीय सूची से किसी समूह को सम्मिलित या बहिष्कृत करने की शक्ति किसके पास है?
  4. सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न पीठें
  5. सुप्रीम कोर्ट के अपने फैसले की समीक्षा करने की शक्ति

मेंस लिंक:

आरक्षित वर्ग के भीतर ही ‘जातीय संघर्ष’ व्याप्त है क्योंकि आरक्षण का लाभ केवल कुछ लोगों द्वारा उठाया जा रहा है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

वोल्बाचिया बैक्टीरिया से डेंगू प्रसरण पर नियंत्रण


संदर्भ:

हाल के एक अध्ययन से पता चलता है कि ‘वोल्बाचिया पद्धति’ (Wolbachia method) के इस्तेमाल से मच्छर-जनित ‘डेंगू बुखार’ के आबादी में प्रसरण को काफी कम किया जा सकता है।

‘वोल्बाचिया पद्धति’ का परीक्षण कहाँ किया गया था?

  • इस पद्धति का परीक्षण ‘मोनाश विश्वविद्यालय’, ऑस्ट्रेलिया के ‘वर्ल्ड मॉस्किटो प्रोग्राम’ (World Mosquito Program WMP) तथा ‘यूनिवर्सिटीज गदजाह माडा’, इंडोनेशिया के वैज्ञानिको द्वारा इंडोनेशिया के योग्याकार्ता (Yogyakarta) शहर में किया गया था।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार, इस शोध के दौरान वल्बाचिया विधि का उपयोग करने से उपचारित आबादी डेंगू के मामलों में 77% की गिरावट देखी गई है।

क्रियाविधि:

इस पद्धति में डेंगू बुखार के लिए जिम्मेदार मच्छर प्रजाति ‘एडीज़ एजिप्टी’ (Aedes Aegypti) की आबादी को वोल्बाचिया बैक्टीरिया से संक्रमित करा दिया जाता है

  • जब वोल्बाचिया संक्रमित मच्छर अपनी प्रजाति के अन्य संक्रमित / गैर-संक्रमित मच्छरों के साथ प्रजनन करते हैं, तो बैक्टीरिया-युक्त मच्छरों के प्रतिशत में वृद्धि होती है।
  • यद्यपि, अभी यह पूरी तरह से समझा नहीं गया है कि वोल्बाचिया बैक्टीरिया डेंगू संचरण में किस प्रकार हस्तक्षेप करता है। इस संबंध में एक अनुमान यह है कि ये बैक्टीरिया डेंगू के वायरस को मच्छरों की कोशिकाओं में प्रतिकृति बनाने से रोकता है।

पृष्ठभूमि:

  • डेंगू एक विषाणुजनित बीमारी है तथा यह भारत सहित कई देशों में स्थानिक रोग है।
  • हालांकि, यह आमतौर पर सामान्य बीमारी के रूप में होता है किंतु तीव्र डेंगू संक्रमण घातक साबित हो सकता है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुमान से प्रतिवर्ष 100-400 मिलियन व्यक्ति डेंगू संक्रमण के शिकार होते है, और हाल के दशकों में इसकी वैश्विक घटनाओं में वृद्धि हो रही है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. डेंगू- कारण, लक्षण और प्रसार
  2. ‘वोल्बाचिया पद्धति’ किससे संबंधित है?
  3. हाल ही में इस पद्धति का परीक्षण कहाँ किया गया था?
  4. ‘वर्ल्ड मॉस्किटो प्रोग्राम’ (WMP) के बारे में

मेंस लिंक:

“वल्बाचिया पद्धति” पर एक नोट लिखें, जो हाल ही में खबरों में था।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

 वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की कमी


(GST shortfall)

संदर्भ:

केंद्र सरकार द्वारा वस्‍तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax- GST) राजस्व कमी को पूरा करने के लिए राज्यों के समक्ष दो विकल्प प्रस्तुत किए गए हैं।

  1. रिजर्व बैंक से विचार-विमर्श के बाद राज्यों को विशेष विकल्प के तौर पर 97,000 करोड़ रुपये, GSec (सरकारी प्रतिभूति) से जुड़ी दरों पर ऋण के रूप में ले सकते हैं।
  2. दूसरा विकल्‍प यह है कि राज्‍य स्‍पेशल विंडो के जरिये 2,35,000 करोड़ रुपये के पूरे जीएसटी क्षतिपूरक अंतर को पूरा करने के लिए उधारी ले सकते हैं। इसके लिए भी आरबीआई से व्यवस्था की जा सकती है तथा कुछ सुविधाएं भी दी जा सकती हैं।

इस राशि का भुगतान पांच साल बाद उपकर संग्रह से किया जा सकता है। इस उपकार को चालू वित्तीय वर्ष की अंतिम तारीख से आगामी एक वर्ष अथवा उससे अधिक समय के लिए डीमैरिट गुड्स (Demerit Goods) पर लगाया जा सकता है।

चर्चा का विषय:

जीएसटी मुआवजा अधिनियम, 2017 के अनुसार, जीएसटी कार्यान्वयन के पहले पांच वर्षों, अर्थात वर्ष 2022 तक राज्यों को राजस्व में होने वाले किसी भी नुकसान की भरपाई, पातक तथा विलासिता पूर्ण वस्तुओं (Sin and Luxury Goods) पर उपकार लगा कर की जाएगी।

हालांकि, आर्थिक मंदी के कारण जीएसटी और उपकर, दोनों के संग्रह में पिछले वर्ष की तुलना में गिरावट आयी है, जिसके परिणामस्वरूप पिछले वर्ष भुगतान किए गए मुआवजे तथा संग्रहीत उपकर के मध्य 40% का अंतर हो गया है।

COVID-19 के कारण अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान से राज्यों को इस वर्ष तीन लाख करोड़ के जीएसटी राजस्व अंतर का सामना करना पड़ सकता है। इसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अनपेक्षित ‘भगवान का कार्य’ (Act of God) कहा है।

क्षतिपूर्ति उपकर क्या है?

क्षतिपूर्ति उपकर (Compensation Cess) के विधि-विधान जीएसटी (राज्यों को मुआवजा) संशोधन विधेयक, 2017 द्वारा निर्दिष्ट किए गए थे।

  1. इस अधिनियम में माना गया है कि सभी करों को जीएसटी में समाहित करने के बाद से प्रत्येक राज्य के जीएसटी राजस्व में, वित्तीय वर्ष 2015-16 में एकत्र की गई राशि से, प्रति वर्ष 14% की दर से वृद्धि होगी।
  2. राज्य द्वारा किसी भी वर्ष में इस राशि से कम कर-संग्रह किये जाने पर होने वाली हानि की भरपाई की जाएगी। राज्यों को इस राशि का भुगतान प्रति दो महीने में अनंतिम खातों के आधार पर किया जाएगा, तथा प्रति वर्ष राज्य के खातों के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा ऑडिट किए जाने के पश्चात समायोजित किया जाएगा।
  3. यह योजना पाँच वर्षों, अर्थात् जून 2022 तक के लिए वैध है।

क्षतिपूर्ति उपकर निधि:

राज्यों को राजस्व हानि होने पर क्षतिपूर्ति प्रदान करने के एक क्षतिपूर्ति उपकर निधि (Compensation cess fund) का गठन किया गया है। कुछ वस्तुओं पर अतिरिक्त उपकर लगाया जाएगा और इस उपकर का उपयोग राज्यों को मुआवजे का भुगतान करने के लिए किया जाएगा।

  • इन वस्तुओं में पान मसाला, सिगरेट और तम्बाकू उत्पाद, वायवीय पानी, कैफीनयुक्त पेय पदार्थ, कोयला और कुछ यात्री मोटर वाहन सम्मिलित हैं।
  • जीएसटी अधिनियम में कहा गया है कि संग्रीह्त उपकर तथा जीएसटी परिषद द्वारा निर्धारित की गयी इस ​​तरह की अन्य राशि को क्षतिपूर्ति उपकर निधि में जमा की जायेगी।

चुनौतियां:

  • अधिकांश अर्थशास्त्रीयों द्वारा इस वर्ष नकारात्मक वास्तविक जीडीपी वृद्धि की संभावना व्यक्त की जा रही है, तथा नाममात्र जीडीपी, पिछले वर्ष के स्तर के करीब रहने की उम्मीद है।
  • चूंकि, अप्रत्यक्ष करों को कारोबार की नाममात्र कीमतों (Nominal Value) पर लगाया जाता है, इससे राज्यों को प्राप्त होने वाले सुनिश्चित कर-संग्रह से महत्वपूर्ण कमी हो सकती है।
  • मुख्य समस्या यह है कि जीएसटी अधिनियम 2017 राज्यों के लिए 14% कर वृद्धि दर की गारंटी प्रदान करता है, जोकि इस वर्ष संभव प्रतीत नहीं हो रही है। चूंकि इस महामारी तथा अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव का किसी को पूर्व अंदाजा नहीं था, इसलिए 14% का लक्ष्य शुरू से ही काफी महत्वाकांक्षी था।

तात्कालिक उपाय

  1. केंद्र सरकार, राज्यों को पांच साल तक राजस्व के नुकसान की भरपाई करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है।
  2. इस समस्या हेतु निम्नलिखित संभावित समाधान हो सकते हैं:
  3. संविधान में संशोधन करके गारंटी-अवधि को घटाकर तीन वर्ष (जून 2020 को समाप्त) किया जा सकता है। ऐसा करना मुश्किल होगा क्योंकि अधिकांश राज्य इस प्रस्ताव से सहमत नहीं होंगे।
  4. केंद्र सरकार, इस क्षतिपूर्ति निधि की भरपाई केंद्रीय राजस्व से कर सकती है। राज्य इस प्रस्ताव से सहमत होंगे। हालांकि, केन्द्रीय वित्त की स्थिति, केन्द्रीय कर-संग्रह में कमी तथा स्वास्थ्य व आर्थिक संकटों के कारण अतिरिक्त व्यय होने से ज्यादा ठीक नहीं है।
  5. केंद्र सरकार उपकर निधि के आधार पर ऋण ले सकती है। उपकर की अवधि को, ऋण तथा उस पर ब्याज के भुगतान पूरा होने तक पांच साल तक बढ़ाया जा सकता है।
  6. केंद्र सरकार राज्यों को इस बात के लिए राजी कर सकती है कि 14% विकास लक्ष्य आरंभ से ही अयथार्थवादी था। इस लक्ष्य को नाममात्र जीडीपी वृद्धि से जोड़ा जाना चाहिए था। यदि केंद्र जीएसटी परिषद के माध्यम से राज्यों के लिए कर-सीमा को पुनर्निर्धारित करने के लिए तैयार कर लेती है, तो वह जीएसटी अधिनियम 2017 में संशोधन करने हेतु संसद में एक विधेयक ला सकती है।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न- सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली- कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन, संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिये ई-प्रौद्योगिकी।

बीटी बैंगन (Bt Brinjal)

संदर्भ:

हाल ही में ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति’ (Genetic Engineering Appraisal Committee -GEAC) द्वारा आनुवांशिक रूप से संशोधित बैंगन (बीटी बैंगन) की एक नई किस्म, इवेंट 142 (Event 142) के लिए जैव सुरक्षा अनुसंधान-स्तर- II (biosafety research-level-II: BRL-II) क्षेत्र परीक्षणों के लिए अनुमति देने पर विशेषज्ञों ने आपत्ति जताई है।

चिंता का कारण

  • आनुवंशिक रूप से संशोधित बैंगन की इस नई किस्म को बिना किसी सार्वजनिक डेटा के चुपचाप मंजूरी दे दी गई थी। बीटी बैगन की इस किस्म को BRL-II के दूसरे सत्र तथा जैव सुरक्षा रिपोर्ट आने से पहले ही अनुमति मिल गयी है।
  • इससे फसल उगाने वाले तथा अन्य आवेदकों के लिए वाणिज्यिक खेती की अनुमति लेने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
  • इस किस्म के बैगन की जैव-सुरक्षा संबधी रिपोर्ट के संदर्भ में कोई पारदर्शिता नहीं बरती गयी है।

जीन संवर्द्धित फसलें क्या होती हैं?

  • जीन संवर्द्धित (Genetically Modified-GM) अथवा जीएम फसल उन फसलों को कहा जाता है जिनके जीन को वैज्ञानिक तरीके से रूपांतरित किया जाता है। जेनेटिक इजीनियरिंग के ज़रिये किसी भी जीव या पौधे के जीन को अन्य पौधों में डालकर एक नई फसल प्रजाति विकसित की जाती है।
  • जेनेटिक इंजीनियरिंग का उद्देश्य वांछित प्रभाव प्राप्त करने के लिए बीजों में एक एलियन जीन की शुरुआत करके आनुवांशिक अवरोध को समाप्त करना है। एलियन जीन, पौधे, जीव अथवा मृदा के सूक्ष्म जीवाणु से भी हो सकते है।

भारत में जीन संवर्द्धित फसलों की वैधानिक कानूनी स्थिति

  • भारत में, जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (Genetic Engineering Appraisal Committee -GEAC) जीएम फसलों की वाणिज्यिक खेती की अनुमति देने के लिए शीर्ष निकाय है।
  • GEAC क्षेत्र परीक्षण प्रयोगों सहित पर्यावरण में आनुवंशिक रूप से संवर्द्धित किये गए जीवों और उत्पादों को जारी करने संबंधी प्रस्तावों की मंज़ूरी के लिये भी उत्तरदायी है।
  • जुर्माना: अप्रमाणित GM संस्करण का उपयोग करने पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत 5 साल की जेल तथा 1 लाख रुपये का जुर्माना लग सकता है।

किसान जीएम फसलों को क्यों महत्व दे रहे हैं?

  • कम लागत: किसानों द्वारा बीटी कपास के उगाने पर तथा ग्लाइफोसेट का उपयोग करने पर खरपतवार-नाशक की लागत काफी कम हो जाती है।
  • बीटी बैंगन के संबंध में भी कीटनाशक-लागत कम हो जाने से उत्पादन लागत में कमी हो जाती है।

चिंताएं

पर्यावरणविदों का तर्क है कि जीएम फसलों के लंबे समय तक चलने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाना बाकी है तथा अभी इन्हें व्यावसायिक रूप से अनुमति नही दी जानी चाहिए। इनका मानना है, कि जीन संवर्धन से फसलों में किये गए परिवर्तन लंबे समय में मनुष्यों के लिए हानिकारक हो सकते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. GEAC- स्थापना, संरचना और कार्य
  2. क्या यह एक वैधानिक निकाय है?
  3. भारत में बीटी फसलों की अनुमति

मेंस लिंक:

COVID -19 के भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक परिणाम क्या हो सकते हैं? चर्चा कीजिए।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


विश्व उर्दू सम्मेलन

हाल ही में ‘राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद’ (National Council for Promotion of Urdu LanguageNCPUL) द्वारा नई दिल्ली में विश्व उर्दू सम्मेलन आयोजित किया गया था।

  • NCPUL, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (HRD) / शिक्षा मंत्रालय, माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग, भारत सरकार के तहत एक स्वायत्त निकाय है।
  • इसे वर्ष 1996 में उर्दू भाषा के प्रचार के लिए राष्ट्रीय नोडल एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया था।

ग्रेट अंडमानी जनजाति

(Great Andamanese Tribe)

  • यह विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह (a particularly vulnerable tribal group- PVTG) के अंतर्गत आते हैं।
  • ये अंडमान द्वीपसमूह में रहने वाले पांच PVTG में से एक हैं।
  • वे आपस में जेरू बोली में संवाद करते हैं तथा ग्रेट अंडमानी जनजाति की संख्या मात्र 51 है।
  • अंडमान में रहने वाले पांच PVTG ग्रेट अंडमानी, जारवा, ओंगे, शोम्पेंस और नॉर्थ सेंटीनल हैं।

चर्चा का कारण

हाल ही में ग्रेट अंडमानी जनजाति (Great Andamanese Tribe) के पांच सदस्य COVID-19 से संक्रमित पाए गए है।

टोगो (Togo)

  • टोगो, मानव अफ्रीकी ट्रिपेनोसोमियासिस (human African Trypanosomiasis) अथवा नींद की बीमारी को खत्म करने वाला अफ्रीका का पहला देश बन गया है।
  • यह मनुष्यों तथा अन्य पशुओं में होने वाली एक परजीवीजन्य बीमारी है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा 27 अगस्त, 2020 को टोगो को मानव अफ्रीकी ट्रिपेनोसोमियासिस मुक्त देश घोषित किया गया।

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