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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 22 July

विषय – सूची

सामान्य अध्ययन-II

1. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019

2. एड्स, तपेदिक और मलेरिया से लड़ने हेतु वैश्विक कोष (GFATM)

3. सर्कस में जानवरों का सर्वेक्षण

4. दिल्ली का सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. मेटा मटेरियल (Metamaterials) क्या होते हैं?

2. डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति आयु में वृद्धि

3. मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम हेतु दक्षिण अफ्रीका के लिए DDT की आपूर्ति

4. दक्षिण पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में मत्स्यन पोतों तथा व्यापारिक पोतों के परिचालन मार्गो का विभाजन

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019

(Consumer Protection Act)

संदर्भ:

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019, 20 जुलाई 2020 से लागू हो गया है, यह नया अधिनियम पुराने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 को प्रतिस्थापित करेगा।

इस अधिनियम को राष्ट्रपति ने अगस्त 2019 मे अपनी स्वीकृति प्रदान की थी।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं:

उपभोक्ता की परिभाषा:

  1. उपभोक्ता वह व्यक्ति है जो अपने उपयोग हेतु कोई वस्तु खरीदता है या सेवा प्राप्त करता है।
  • इसमें वह व्यक्ति सम्मिलित नहीं किये गए है जो दोबारा बेचने के लिए किसी वस्तु को हासिल करता है अथवा व्यावसायिक उद्देश्य के लिए किसी वस्तु या सेवा का क्रय करता है।
  • इसके अंतर्गत, इलेक्ट्रॉनिक तरीके, टेलीशॉपिंग, मल्टी लेवल मार्केटिंग या प्रत्यक्ष खरीद के माध्यम से किया जाने वाले सभी तरह के ऑफलाइन या ऑनलाइन लेनदेन सम्मिलित किये गए है।
  1. उपभोक्ताओं के अधिकार:

अधिनियम में उपभोक्ताओं के छह अधिकारों को स्पष्ट किया गया है जिनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं:

  • सुरक्षा का अधिकार (Right to Safety)।
  • सूचना प्राप्त करने का अधिकार (Right to be Informed)।
  • चुनने/निर्णय करने का अधिकार (Right to Choose)।
  • अपनी बात सुनाने का अधिकार (Right to be heard)।
  • शिकायत निवारण का अधिकार (Right to seek Redressal)।
  • उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार(Right to Consumer Education)।
  1. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA):

केंद्र सरकार उपभोक्ताओं के अधिकारों को बढ़ावा देने, उनका संरक्षण करने और उन्हें लागू करने के लिए केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी (Central Consumer Protection Authority– CCPA) का गठन करेगी।

  • यह प्राधिकरण उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन, अनुचित व्यापार और भ्रामक विज्ञापनों से संबंधित मामलों को विनियमन करेगी।
  • महानिदेशक की अध्यक्षता में CCPA की एक अन्वेषण शाखा (Investigation Wing) होगी, जो ऐसे उल्लंघनों की जांच या अन्वेषण कर सकती है।
  1. भ्रामक विज्ञापनों के लिए जुर्माना:

CCPA झूठे या भ्रामक विज्ञापन के लिए उत्पादक अथवा प्रचारकर्ता पर 10 लाख रुपए तक का जुर्माना लगा सकती है।

  • दोबारा अपराध की स्थिति में यह जुर्माना 50 लाख रुपए तक बढ़ सकता है।
  • उत्पादक को दो वर्ष तक की कैद की सजा भी हो सकती है जो हर बार अपराध करने पर पांच वर्ष तक बढ़ सकती है।
  1. उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (CDRC):

जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों (Consumer Disputes Redressal Commissions– CDRCs) का गठन किया जाएगा। उपभोक्ता निम्नलिखित के संबंध में आयोग में शिकायत दर्ज करा सकता है:

  • अनुचित और प्रतिबंधित तरीके का व्यापार,
  • दोषपूर्ण वस्तु या सेवाएं,
  • अधिक कीमत वसूलना या गलत तरीके से कीमत वसूलना, और
  • ऐसी वस्तुओं या सेवाओं को बिक्री के लिए पेश करना, जो जीवन और सुरक्षा के लिए जोखिमपरक हो सकती हैं।
  1. अपील:

अनुचित कॉन्ट्रैक्ट के खिलाफ शिकायत केवल राज्य और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (CDRC) में फाइल की जा सकती हैं।

  • जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के आदेश के खिलाफ राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (SCDRC) में सुनवाई की जाएगी। SCDRC के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) में सुनवाई की जाएगी।
  • अंतिम अपील का अधिकार उच्चत्तम न्यायालय को होगा।
  1. उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का क्षेत्राधिकार:
  • जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (DCDRC) उन शिकायतों के मामलों को सुनेगा, जिनमें वस्तुओं और सेवाओं की कीमत एक करोड़ रुपए से अधिक न हो।
  • राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (SCDRC) उन शिकायतों के मामले में सुनवाई करेगा, जिनमें वस्तुओं और सेवाओं की कीमत एक करोड़ रुपए से अधिक हो, लेकिन 10 करोड़ रुपए से अधिक न हो।
  • राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) 10 करोड़ रुपए से अधिक की कीमत की वस्तुओं और सेवाओं के संबंधित शिकायतों की सुनवाई करेगा।
  1. मध्यस्थता:

नए अधिनियम में मध्यस्थता का एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र प्रदान किया गया है। जहां भी शुरुआती निपटान की गुंजाइश मौजूद हो और सभी पक्ष सहमत हों, वहां मध्यस्थता के लिए उपभोक्ता आयोग द्वारा एक शिकायत उल्लिखित की जाएगी।

  • यह अधिनियम उपभोक्ता आयोगों द्वारा मध्यस्थता के संदर्भ के लिए प्रदान करता है जहां शुरुआती समझौता होने की गुंजाइश है और पक्ष इसके लिए सहमत हैं।
  • उपभोक्ता आयोगों के तत्वावधान में स्थापित किए जाने वाले मध्यस्थता प्रकोष्ठों में मध्यस्थता आयोजित की जाएगी।
  • मध्यस्थता के माध्यम से होने वाले निपटान के खिलाफ कोई अपील नहीं होगी।
  1. ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 का प्रभाव:

ई-कॉमर्स पोर्टलों को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत नियमों के तहत एक सुदृढ़ उपभोक्ता निवारण तंत्र स्थापित करना होगा।

  • ई-कॉमर्स पोर्टलों को ‘उत्पत्ति देश’ (Country of Origin) का भी उल्लेख करना होगा जो उपभोक्ता के लिए ई-प्लेटफॉर्म पर खरीददारी करने से पहले उचित निर्णय लेने के लिए सक्षम बनायेगा।
  • ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों को भी अड़तालीस घंटों के भीतर किसी भी उपभोक्ता शिकायत की प्राप्ति को स्वीकार करना होगा और इस अधिनियम के तहत शिकायत प्राप्ति की तिथि से एक महीने के भीतर शिकायत का निवारण करना होगा।
  1. उत्पाद की जिम्मेदारी (Product Liability):

उत्पाद निर्माता अथवा उत्पाद सेवा प्रदाता या उत्पाद विक्रेता को दोषपूर्ण उत्पाद या सेवाओं में कमी के कारण होने वाली क्षति अथवा क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

act1986_act2019

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राष्ट्रीय, राज्य तथा जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग मंच तथा उनकी संरचना।
  2. उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों का क्षेत्राधिकार, तथा अपील।
  3. न्यायालय शुल्क की आवश्यकता।

मेंस लिंक:

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत उपभोक्ता विवाद निवारण तंत्र पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

एड्स, तपेदिक और मलेरिया से लड़ने हेतु वैश्विक कोष (GFATM)

(Global Fund to Fight AIDS, Tuberculosis and Malaria- GFATM)

संदर्भ:

कोरोनावायरस महामारी के दौरान, यौनकर्मी, ट्रांसजेंडर, समलैंगिक एवं उभयलैंगिक, एचआईवी / एड्स से पीड़ित व्यक्तियों ने आजीविका श्रोतों से वंचित होने तथा COVID-19 आपातकालीन राहत कार्यो में सरकार तथा बहुपक्षीय एजेंसियों द्वारा अनदेखी किये जाने के विरुद्ध ‘एड्स, तपेदिक और मलेरिया से लड़ने हेतु वैश्विक कोष’ (Global Fund to Fight AIDS, Tuberculosis and Malaria- GFATM) में याचिका दायर की है।

याचिकाकर्ताओं ने GFATM  से, आपातकालीन स्थिति में जीवित रहने हेतु आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए COVID-19 राहत कोष से सहायता प्रदान करने हेतु सरकार के लिए दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह किया है।

GFTAM के बारे में:

GFTAM को आमतौर पर ग्लोबल फंड’ के रूप में जाना जाता है। इसका उद्देश्य, संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता करने हेतु ‘एचआईवी / एड्स, तपेदिक और मलेरिया’ महामारी को समाप्त करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों को आकृष्ट करना, उपयोग करना तथा निवेश करना है।

  1. वर्ष 2002 में स्थापित, ग्लोबल फंड सरकारों, नागरिक समाज, निजी क्षेत्र तथा बीमारियों से प्रभावित लोगों के मध्य एक साझेदारी है
  2. GFTAM का सचिवालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में है।
  3. वर्ष 2001 में हुए अपने शिखर सम्मेलन में G8 समूह ने औपचारिक रूप से ग्लोबल फंड के निर्माण की आवश्यकता का समर्थन का समर्थन किया था।

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GFTAM का प्रशासन

  • ग्लोबल फंड का गठन, जनवरी 2002 में, स्विस कानून के तहत एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी संस्था के रूप में किया गया था, और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इसके प्रबंधन का दायित्व सौंपा गया था।
  • जनवरी 2009 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रशासनिक सेवाओं को समाप्त कर दिया गया, इसके पश्चात से ‘ग्लोबल फंड’ प्रशासनिक रूप से स्वायत्त संगठन के रूप में कार्य कर रहा है।

 GFTAM की भूमिका:

‘ग्लोबल फंड’ एक कार्यान्वयन एजेंसी से अधिक एक वित्तपोषण तंत्र है।

  • इसके कार्यक्रमों को सदस्य देशों के स्वास्थ्य मंत्रालयों द्वारा कार्यान्वित किया जाता है, तथा ग्लोबल फंड सचिवालय इन कार्यक्रमों की निगरानी करता है।
  • ग्लोबल फंड आवश्यकताओं के अनुसार, सरकार के प्रतिनिधियों, गैर सरकारी संगठनों, निजी क्षेत्र, सदस्य देशों के हितधारकों, बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों आदि को मिलाकर बनायी गई समन्वय समितियों, तथा देश-स्तरीय समितियों द्वारा कार्यान्वयन की देखरेख करता है।

अनुदान संचयन (Fundraising):

ग्लोबल फंड का गठन वर्ष 2002 में किया गया था। इस कोष में, सार्वजनिक क्षेत्र का योगदान लगभग 95 प्रतिशत है; शेष 5 प्रतिशत का योगदान निजी क्षेत्र अथवा ‘प्रोडक्ट रेड’ जैसी वित्तीय पहलों के माध्यम से किया जाता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. GFATM की स्थापना कब की गई थी?
  2. GFATM में धन कैसे जुटाया जाता है?
  3. इसका सचिवालय कहाँ है?
  4. भारत का योगदान।

मेंस लिंक:

GFATM पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

सर्कस में जानवरों का सर्वेक्षण

(Survey On Animals In Circuses)

संदर्भ:

हाल ही में, दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पशु कल्याण बोर्ड (Animal Welfare Board– AWB) को सर्कस में रखे गये जानवरों की संख्या का पता लगाने के लिये तत्काल एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया गया है। कोविड-19 महामारी के कारण प्रदर्शन करने में असमर्थ होने पर उन्हें नजदीक के प्राणि उद्यानों में भेजे जाने पर भी विचार करने करने के लिए कहा गया है।

न्यायालय ने अन्य संबंधित हितधारकों को भी नोटिस जारी किया है तथा उन्हें दो सप्ताह की अवधि में उत्तर देने का निर्देश दिया है।

चर्चा का विषय

अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किया। याचिका में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के दौरान सर्कस के दिवालिया हो जाने के कारण वहां जानवर जोखिम में हैं।

यह याचिका ‘फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल्स प्रोटेक्शन’ (Federation of Indian Animals Protection– FIAPO) द्वारा दायर की गई थी। यह फेडरेशन जीव अधिकारों पर एक दशक से अधिक समय से काम कर रहे 100 से अधिक संगठनों का एक समूह है।

  • याचिका में पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 21 और 27 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। ये धाराएं सर्कस से जुड़े कार्यों के लिये जानवरों के प्रदर्शन तथा उनके प्रशिक्षण से संबद्ध हैं।
  • इसके अतिरिक्त याचिकाकर्ताओं ने, सर्कस में ‘कलाकार जानवरों’ के रूप में जानवरों के पंजीकरण की अनुमति देने तक पशु प्रदर्शन नियम (Performing Animal Rules) 1973, तथा पशु प्रदर्शन (पंजीकरण) नियम, 2001को भारत के संविधान तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के विरुद्ध घोषित किये जाने की मांग की है।

 वर्तमान चुनौतियाँ:

  • सर्कसों में अक्सर करतब दिखाने वाले जानवरों के साथ-साथ हाथी, हिप्पोस (Hippos) जैसे वन्य जीवों तथा विदेशज पक्षियों (Exotic Birds) जंगली जानवरों का उपयोग करते हैं।
  • इन जानवरों को अक्सर फिटनेस प्रमाणित करने के लिए आवश्यक कागजी कार्रवाई के बिना उपयोग किया जाता है।
  • जांच से पता चलता है कि जानवरों को हर दिन कई घंटों तक जंजीर से बांध कर रखा जाता है, इनसे बिना किसी आराम के कई शो कराये जाते हैं, धातु व लकड़ी की छड़ियों, चाबुक, पुराने और बर्बर औजारों का प्रयोग करके इन्हें प्रशिक्षित किया जाता है।
  • ये पशु संरक्षण कानूनों, पशु अधिकार एवं कल्याण का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।

 समय की मांग:

COVID-19 महामारी के कारण, पूरे देश में सर्कस भी काफी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं, कई मालिकों ने सर्कसों को उनके हाल पर छोड़ दिया है, जिससे इन सर्कसों के जानवरों की स्थिति बहुत ख़राब हो चुकी है।

  • स्थिति को देखते हुए, सक्षम अधिकारियों के लिए, सर्कसों से इन जानवरों को मुक्त कराने, स्वास्थ्यलाभ कराने तथा इसने पुनर्वास हेतु उपयुक्त योजना तैयार करनी चाहिए।
  • सर्कसों में जानवरों के पुनर्वास को प्रतिबंधित करने की भी तत्काल आवश्यकता है।
  • अंतरिम राहत के रूप में, भारत में संचालित सभी सर्कसों से सभी जानवरों को अधिकारियों द्वारा हिरासत में लेना चाहिए तथा उनके स्थानांतरण और कल्याण हेतु उचित व्यवस्था की जानी चाहिए।

इंस्टा फैक्ट्स:

  1. भारतीय पशु कल्याण बोर्ड का गठन, वर्ष 1962 में पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 4 के तहत किया गया था। यह एक वैधानिक सलाहकार निकाय है, तथा यह भारत सरकार को पशु कल्याण विधानों पर परामर्श प्रदान करता है।
  2. भारतीय पशु कल्याण बोर्ड का आरम्भ प्रसिद्ध मानवतावादी श्रीमति रुक्मिणी देवी अरुंडेल के नेतृत्व में किया गया था।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारतीय पशु कल्याण बोर्ड कब स्थापित किया गया था?
  2. इसे किन प्रावधानों के अंन्तर्गत स्थापित किया गया था?
  3. श्रीमती रुक्मिणी देवी अरुंडेल किससे संबंधित हैं?
  4. पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 21 और 27 किससे संबंधित हैं?
  5. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के प्रमुख कौन हैं?

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

दिल्ली का सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण

(Delhi’s serological survey)

संदर्भ:

हाल ही में, ‘स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय’ द्वारा 27 जून से 10 जुलाई के बीच दिल्ली में किए गए सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण के परिणाम घोषित किए गए हैं।

  • इसके तहत, प्रयोगशाला मानकों के अनुसार 21,387 नमूने एकत्र किए गए और फिर उनका परीक्षण किया गया। इन परीक्षणों से आम नागरिकों में एंटीबॉडी की उपस्थिति की पहचान करने में मदद मिली।
  • यह अध्ययन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की दिल्ली सरकार के सहयोग से राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (National Center for Disease ControlNCDC) द्वारा एक अत्यंत शुद्ध बहु-स्तरीय नमूना अध्ययन डिजाइन के बाद किया गया है।

सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण क्या है?

सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण में, व्यक्तियों में वायरस का प्रतिरोध करने वाली विशिष्ट एंटीबाडीज की मौजूदगी का पता लगाकर आबादी में बीमारी की व्यापकता का आकलन किया जाता है।

  • सर्वेक्षण में IgG एलिसा टेस्ट (Enzyme-Linked Immunosorbent AssayELISA) का उपयोग किया गया, IgG एलिसा टेस्ट से SARS-CoV-2 संक्रमण के संपर्क में आने वाली आबादी के अनुपात का अनुमान लगाया जाता है।
  • IgG एलिसा टेस्ट, विशुद्ध रूप से तीव्र संक्रमण का पता लगाने के लिए उपयोगी नहीं होता है, परन्तु, यह अतीत में हुए संक्रमण के चरणों के बारे में संकेत प्रदान करता है।
  • इस परीक्षण को ICMR द्वारा इसकी उच्च संवेदनशीलता और विशिष्टता के लिए अनुमोदित किया गया है।

सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण के लाभ:

चूंकि, पूरी आबादी में सभी का परीक्षण कर पाना संभव नहीं है, अतः समुदाय में फ़ैली हुई बीमारी का अनुमान लगाने हेतु सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण का उपयोग उपकरण के रूप में किया जाता है।

 सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्ष:

  • सर्वेक्षण में सम्मिलित 22.86% व्यक्तियों में IgG एंटीबॉडी विकसित हो चुका है, इसका अर्थ है, ये व्यक्ति नोवेल कोरोनोवायरस के संपर्क में आ चुके थे।
  • इसके लिए बीमारी का पता लगते ही लॉकडाउन लागू करना, रोकथाम के लिए प्रभावी उपाय करना और संक्रमित लोगों के संपर्क में आने वाले लोगों का पता लगाने सहित कई निगरानी उपायों जैसे सरकार द्वारा उठाए गए सक्रिय प्रयासों को श्रेय दिया जा सकता है।

आगे की राह

सरकार ने कहा है कि परिणाम बताते हैं कि जनसंख्या का एक अहम हिस्सा अभी भी संक्रमण की संभावना के लिहाज से आसान लक्ष्य है।

इसलिए रोकथाम के उपायों को उसी कड़ाई के साथ जारी रखने की आवश्यकता है। एक-दूसरे से सुरक्षित दूरी बनाए रखना, फेस मास्क/कवर का उपयोग, हाथों की साफ-सफाई, खांसी करने के संबंध में शिष्टाचार का पालन और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचना आदि जैसे गैर-चिकित्सकीय उपायों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. एंटीबॉडी के प्रकार।
  2. सीरोलॉजिकल सर्वे क्या है?
  3. एलिसा परीक्षण किससे संबंधित है?
  4. राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के बारे में?
  5. क्या एलिसा परीक्षण तीव्र संक्रमण का पता लगा सकता है?

मेंस लिंक:

दिल्ली के सीरोलॉजिकल सर्वेक्षण के परिणामों के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


मेटा मटेरियल (Metamaterials) क्या होते हैं?

ये अद्वितीय आंतरिक सूक्ष्म-संरचना युक्त कृत्रिम रूप से निर्मित पदार्थ होते हैं।

  • मेटा मटेरियल की आंतरिक सूक्ष्म-संरचना इन्हें विशिष्ट गुण प्रदान करती है, जो प्राकृतिक रूप से नहीं पाए जाते हैं।
  • मेटा मटेरियल का निर्माण करने वाली कृत्रिम ईकाइयों को असामान्य गुणों के प्रदर्शन के लिए आकार, प्रकार, तथा अंतर-परमाण्विक अभिक्रियाओं में व्यवस्थित किया जा सकता है।

metamaterials

डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति आयु में वृद्धि

ओडिशा राज्य में श्रम तथा राज्य कर्मचारी बीमा विभाग के अंतर्गत आने वाले एलोपैथिक चिकित्सा अधिकारियों तथा ओडिशा मेडिकल एंड हेल्थ सर्विसेज (OHMS) कैडर के डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष की जा रही है।

 मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम हेतु दक्षिण अफ्रीका के लिए DDT की आपूर्ति

रसायन और उर्वरक मंत्रालय के सार्वजनिक उपक्रम एचआईएल इंडिया लिमिटेड [HIL (India) Limited] ने मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम के लिए दक्षिण अफ्रीका को 20.60 मिट्रिक टन DDT 75% डब्‍ल्‍यूपी की आपूर्ति की है।

  • एचआईएल (इंडिया) दुनिया में डीडीटी बनाने वाली एकमात्र कंपनी है।
  • भारत सरकार के मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को डीडीटी की आपूर्ति के लिए 1954 में कंपनी का गठन किया गया था।

दक्षिण पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में मत्स्यन पोतों तथा व्यापारिक पोतों के परिचालन मार्गो का विभाजन

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा नौपरिवहन सुरक्षा और दक्षता को ध्‍यान में रखते हुए देश के दक्षिण पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में व्‍यापारी जहाजों और मछली पकड़ने के लिए इस्‍तेमाल किए जाने वाले जहाजों के संचालन मार्गों को अलग कर दिया है।

आवश्यकता: भारत के दक्षिण-पश्चिम तट के आसपास अरब सागर का जल क्षेत्र एक व्यस्त समुद्री मार्ग है, जहाँ से बड़ी संख्या में व्यापारी जहाज गुजरते हैं।

इसके साथ ही यहां से बड़ी संख्या में मछली पकड़ने के जहाज भी गुजरते हैं जिससे कभी-कभी इनके बीच दुर्घटनाएं हो जाती हैं और इसकी वजह से संपत्ति और पर्यावरण दोनों का नुकसान होता है। कई बार लोगों की जान भी चली जाती है।


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