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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 9 July

विषय-सूची

सामान्य अध्ययन-II

1. विदेशी ई-कॉमर्स फर्मों पर समकारी लेवी

2. आपराधिक कानून सुधार

3. श्रीलंका में भारतीय मछुआरे तथा संबंधित मुद्दे

4. ओपन स्काई समझौता

 

सामान्य अध्ययन-III

1. कृषि अवसंरचना कोष

2. विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA)

3. तारों में लिथियम उत्पादन

 


 सामान्य अध्ययन-II


  

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

विदेशी ई-कॉमर्स फर्मों पर समकारी लेवी

(Equalisation levy on foreign e-com firms)

सरकार ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि, वह अनिवासी ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा समकारी लेवी (Equalisation Levy) के भुगतान हेतु समय सीमा बढ़ाने पर विचार नहीं कर रही है।

समकारी लेवी (Equalisation Levy) क्या है?

वर्ष 2016 से किसी भी अनिवासी सेवा प्रदाता के लिए ऑनलाइन विज्ञापनों हेतु प्रति वर्ष 1 लाख रुपये से अधिक के भुगतान पर 6% समकारी लेवी लागू है।

  • वित्त अधिनियम, 2020 में संशोधन के पश्चात समकारी लेवी के दायरे का विस्तार किया गया है, अब इसे वस्तुओं की ऑनलाइन बिक्री तथा ऑनलाइन सेवा प्रदान करने वाली अनिवासी ई-कॉमर्स कंपनियों तक विस्तारित किया गया है। इन कंपनियों पर 2% की दर से लेवी वसूल की जायेगी तथा यह 1 अप्रैल, 2020 से प्रभावी है।
  • यह टैक्स अमेजन.कॉम जैसी वेबसाइटों पर ई-कॉमर्स लेनदेन पर लागू होगा।

समकारी लेवी की क्या आवश्यकता

इस लेवी का उद्देश्य उन विदेशी कंपनियों को कर-दायरे में लाना है, जो भारत में व्यापार करती है और इनके देश में महत्वपूर्ण संख्या में ग्राहक है, परंतु ये कंपनियां देश की कराधान-व्यवस्था से बचने के लिए, इन देशी ग्राहकों के लिए भारत से बाहर स्थित अपनी ईकाइयों से बिलिंग करती हैं।

दंड:

  • इस कानून के अंतर्गत, भुगतान में देरी होने पर 1% प्रति माह ब्याज देना होगा।
  • गैर-भुगतान की स्थिति में ब्याज के साथ-साथ समकारी लेवी की राशि के बराबर जुर्माना हो सकता है।

अभी क्या विवाद है?

कर-विशेषज्ञों के अनुसार, इन कंपनियों के लिए PAN प्राप्त करने कई व्यवहारिक कठिनाइयाँ है, तथा कई कंपनियां, इस क़ानून में भ्रम की स्थिति होने तथा स्पष्टता की कमी होने के कारण समकारी लेवी का भुगतान नहीं कर रही हैं।

यह माना जाता है कि PAN  तथा किसी भारतीय बैंक खाते की आवश्यकता अनिवासियों द्वारा विप्रेषण करने में होने वाली प्रशासनिक देरी का कारण बन सकती है।

लेवी से संबंधित कई मुद्दे हैं जिनमे स्पष्टता की कमी है, इनमे मुख्य रूप से कवरेज का मामला है, जिसके अंतर्गत गैर-ई-कॉमर्स कंपनियों को भी कवर किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, इस बात पर स्पष्टता की कमी है, कि विशेष रूप से उन मामलों में कर-राशि को कैसे तय किया जाए, जिनमे अनिवासी ई-कॉमर्स ऑपरेटर अधिक मात्रा में लेनदेन करते हैं, परन्तु उनकी कुल आय, लेनेदेन की तुलना में काफी कम होती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. समकारी लेवी- इसे कब शुरू किया गया था, तथा हाल ही में किये गए परिवर्तन?
  2. इसके अंतर्गत किसे कवर किया गया है?
  3. क्या यह प्रत्यक्ष कर है?
  4. CBDT- गठन।

मेंस लिंक:

समकारी लेवी की आवश्यकता और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

आपराधिक कानून सुधार

(Criminal law reforms)

हाल ही में, हाल ही में भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा आपराधिक कानून में सुधार हेतु एक राष्ट्रीय स्तर की समिति का गठन किया है। सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, पूर्व नौकरशाहों तथा अन्य लोगों के एक समूह ने इस समिति के लिए पत्र लिखा है, जिसमे समिति में विविधता की कमी पर सवाल उठाने के साथ-साथ इसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की मांग की है।

पृष्ठभूमि:

इस समिति के गठन की घोषणा संसद में गृह मंत्री अमित शाह द्वारा दिसंबर 2019 में की गयी थी।

  • यह समिति, मॉब लिंचिंग (Mob Lynching) जैसे मामलों से निपटने के लिए भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code- IPC) और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure) में आवश्यक संशोधन किये जाने पर विचार करेगी।
  • समिति का गठन 4 मई, 2020 को गृह मंत्रालय की अधिसूचना के माध्यम से किया गया था। इसके अध्यक्ष रणबीर सिंह (कुलपति, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली) हैं।

चर्चा का कारण

समिति के सदस्यों में ‘सामाजिक पहचान के साथ ही उनकी पृष्ठभूमि और अनुभव दोनों के संदर्भ में विविधता का अभाव है’।

इस प्रकार के महत्वपूर्ण सुधारों के लिए गठित की गयी अन्य पिछली समितियों के विपरीत, इस समिति में कोई भी पूर्णकालिक सदस्य नहीं है।

क्या किये जाने की आवश्यकता है?

समिति में अधिक विशेषज्ञता तथा विविधता को सम्मिलित किया जाना चाहिए। आपराधिक न्यायिक क्षेत्र में महारत रखने वाले बाहरी विशेषज्ञों तथा अन्य सलाहकारों सहित उप-समितियों का गठन किया जाये, जिससे समिति की वर्तमान संरचना में विविधता और अनुभव की कमी को पूरा किया जा सकता है।

  • समिति में ‘विशिष्ट महिलाएं, दलित, आदिवासी और विभिन्न धार्मिक अल्पसंख्यक, LGBT, आपराधिक क़ानून में माहिर दिवायंग-जनों तथा भारत के विभिन्न हिस्सों से जमीनी कार्यकर्ताओं को सम्मिलित किया जाना चाहिए’।

समिति को इसके गठन संबंधी गृह मंत्रालय की अधिसूचना को सार्वजनिक करना चाहिए। इसे अपनी वेबसाइट पर विचारणीय विषयों (Terms of Reference) को भी अपलोड करना चाहिए। समिति को स्पष्ट करना चाहिए कि वह MHA से स्वतंत्र रूप से काम कर रही है या नहीं।

समिति को आपराधिक न्याय प्रणाली में सार्थक और पारदर्शी तरीके से विविध हितधारकों से संलग्न होना चाहिए।

आपराधिक कानूनों से संबंधित प्रमुख तथ्य:

  • भारत में प्रचलित आपराधिक कानून कई स्रोतों में लिया गया है – भारतीय दंड संहिता, 1860, नागरिक अधिकार अधिनियम, 1955, दहेज निषेध अधिनियम, 1961 तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989।
  • Lord Thomas Babington Macaulay is said to be the chief architect of codifications of criminal laws in India.
  • आपराधिक कानून और आपराधिक प्रक्रिया संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में सम्मिलित हैं।
  • लॉर्ड थॉमस बबिंगटन मैकाले (Lord Thomas Babington Macaulay) को भारत में आपराधिक कानूनों के संहिताकरण का मुख्य वास्तुकार कहा जाता है।

सुधारों की आवश्यकता:

  • औपनिवेशिक युग के कानून।
  • प्रभावहीनता।
  • अनिर्णीत मामलों की भार संख्या।
  • वृहद अभियोगाधीन मामले।

 आपराधिक कानूनों से संबंधित पिछली समितियाँ:

  • माधव मेनन समिति: इसने 2007 में CJSI में सुधारों पर विभिन्न सिफारिशों का सुझाव देते हुए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
  • मलिमथ कमेटी की रिपोर्ट: इसने अपनी रिपोर्ट 2003 में आपराधिक न्याय प्रणाली (CJSI) पर प्रस्तुत की।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. मलिमथ कमेटी किससे संबंधित है?
  2. संविधान की 7 वीं अनुसूची के तहत आपराधिक कानून।
  3. भारत में आपराधिक कानूनों को किसने संहिताबद्ध किया?
  4. विवादास्पद IPC कानून।
  5. रणबीर सिंह समिति किससे संबंधित है?

मेंस लिंक:

भारत में आपराधिक न्याय सुधार पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

श्रीलंका में भारतीय मछुआरे तथा संबंधित मुद्दे

(Indian trawlers in Sri Lanka and issues associated)

श्रीलंका के जाफना प्रायद्वीप के उत्तरी तट पर स्थित प्वाइंट पेड्रो (Point Pedro) के मछुआरों ने नॉर्दर्न मत्स्यन अधिकारियों से समुद्र में अपने मछली पकड़ने वाले जालों के नष्ट हो जाने की शिकायत की है। इनका कहना है, इनके जाल श्रीलंका की जलीय सीमा में भारतीय मछुआरों के मछली पकड़ने वाले जहाजों (trawlers) ने नष्ट किये है।

विवाद का विषय

बहुधा, भारत-लंका मत्स्य संघर्ष, दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के मध्य एक तनाव कारण बन जाता है, इस संदर्भ में दोनों देशों के मध्य कई उच्चस्तरीय वार्ताए हुई है, इसके अतिरिक्त दोनों ओर के मछुआरों के नेताओं के मध्य हुई वार्ताएं भी निरर्थक साबित हुई हैं।

  • श्रीलंकाई मछुआरों का कहना है कि, भारतीय ट्रॉलर इनके मत्स्य उत्पादन तथा समुद्री जीवों के आवास में बाधा डालते हैं, तथा इनके क्षेत्र से मछलियों और झींगा सहित अन्य समुद्री जीवों का दोहन करते हैं।
  • इसके अलावा, वर्तमान में इनका जीविकोपार्जन कोरोनोवायरस महामारी के कारण निर्यात में कमी की बजह से बुरी तरह प्रभावित है, तथा भारतीय ट्रॉलर इसे और कठिन बना रहे हैं।

स्थिति से निपटने हेतु श्रीलंका सरकार द्वारा उठाये गए कदम

पिछले कुछ वर्षों में, श्रीलंका ने समुद्र की निचली सतह से मछली पकड़ने (Bottom-Trawling) पर कठोर प्रतिबंध लागू किये है इसके साथ ही विदेशी जहाजों द्वारा समुद्री सीमा में अतिक्रमण करने पर भारी जुर्माना लागू किया है।

  • श्रीलंकाई नौसेना ने वर्ष 2017 तथा 2018 में क्रमशः 450 तथा 156 से अधिक भारतीय मछुआरों को अवैध शिकार के आरोप में गिरफ्तार किया है।
  • वर्ष 2019 में कुल 210 भारतीय मछुआरों को गिरफ्तार किया गया, तथा वर्ष 2020 में अब तक 34 भारतीय मछुआरे गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

बॉटम ट्रालिंग (Bottom-Trawling) क्या होती है?

बॉटम ट्रालिंग, एक विनाशकारी मछली पकड़ने की पद्धति होती है, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह प्रभावित होता है। इस पद्धति में, बड़े आकार के मत्स्यन पोत (Trawlers) जालों में वजन बांधकर समुद्र की तली में फेंक देते है, जिससे सभी प्रकार के समुद्री जीव जाल में फंस जाते है, इन जालों को ट्रोलर से खींचा जाता है। इस पद्धति से क्षेत्र में मत्स्यन संसाधनों का अभाव हो जाता है। इसको प्रतिबंधित करना संवाहनीय मत्स्यन के लिए लाभदायक होता है।

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 भारत-श्रीलंका समुद्री सीमा समझौते:

दोनों देशों ने वर्ष 1974 तथा वर्ष 1976 के मध्य परस्पर अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सीमा निर्धारित करने हेतु चार समुद्री सीमा समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनका उद्देश्य समुद्री कानूनों के प्रवर्तन करना तथा समुद्री संसाधनों का उचित प्रबंधन करना था।

  1. दोनों देशों के मध्य पहला समझौता एडम ब्रिज तथा पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) के मध्य समुद्री सीमा निर्धारित करने के संबंध में था। इसे 8 जुलाई 1974 को लागू किया गया।
  2. दूसरा समझौता 10 मई 1976 को लागू हुआ था, इसके द्वारा मन्नार की खाड़ी और बंगाल की खाड़ी में समुद्री सीमाओं को परिभाषित किया गया।
  3. भारत, श्रीलंका और मालदीव ने जुलाई 1976 में मन्नार की खाड़ी में त्रिकोणीय संधि-स्थल के निर्धारण के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  4. नवंबर 1976 में, भारत और श्रीलंका ने मन्नार की खाड़ी में समुद्री सीमा का विस्तार करने के लिए एक और समझौते पर हस्ताक्षर किए।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. तथा पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) ।
  2. एडम ब्रिज।
  3. मन्नार की खाड़ी- महत्व और जैव विविधता।
  4. हिंद महासागर क्षेत्र में अवस्थित देश।
  5. प्वाइंट पेड्रो कहां है?

मेंस लिंक:

बॉटम ट्रालिंग (Bottom-Trawling) क्या है? यह महासागरों की जैव विविधता को कैसे प्रभावित करता है?

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।

ओपन स्काई समझौता

(UAE keen on open-sky policy with India)

हाल ही में, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भारत के साथ ओपन स्काई समझौता (Open-Sky Agreement) करने की इच्छा जताई है।

UAE ने भारत से ओपन-स्काई नीति को पांचवी और छठी हवाई फ्रीडम से अलग होकर देखने के लिए कहा है।

  • पांचवी और छठी हवाई फ्रीडम (fifth and sixth freedoms of air) भारत और UAE की एयरलाइनों के मध्य खटास का कारण है।

ओपन स्काई नीति (Open Sky policy) क्या है?

इस समझौते से दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी तथा यात्री के संचरण को बढ़ावा मिलेगा, तथा इन मार्गों पर हवाई किराए में कमी भी होगी।

  • राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति, 2016, के तहत सरकार SAARCदेशों के साथ-साथ नई दिल्ली से 5,000 किलोमीटर की अधिक दूरी वाले देशों के साथ पारस्परिक आधार (Reciprocal Basis) पर ‘ओपन स्काई’ हवाई सेवा समझौते कर सकती है।
  • इसका तात्पर्य है कि इससे कम दूरी पर स्थित देशों के साथ वायु-यातायात हेतु द्विपक्षीय समझौता किया जायेगा तथा दोनों देशो के मध्य उड़ानों की संख्या को पारस्परिक रूप से तय किया जायेगा।

भारत, इसके पूर्व ग्रीस, जमैका, गुयाना, चेक गणराज्य, फिनलैंड, स्पेन और श्रीलंका के साथ ओपन-स्काई समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है।

हवाई फ्रीडमस् (Freedoms of air)

अंतर्राष्ट्रीय वायु यातायात विभिन्न हवाई फ्रीडम से संचालित होता है।

किसी देश द्वारा विदेशी एयरलाइनों को देश में उड़ान भरने के लिए दी गयी अनुमति ‘फ्रीडम ऑफ़ एयर’ (हवाई फ्रीडम) पर निर्भर करती है। अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन समझौता (Convention on International Civil Aviation),1944 के अनुसार नौ हवाई फ्रीडम निर्धारित की गयी हैं।

 महत्वपूर्ण हवाई फ्रीडमस्:

  1. पहली हवाई फ्रीडम (First freedom of air): किसी वायुयान को अपने गृह राज्य से उड़ान भरने की अनुमति देती है।
  2. दूसरी हवाई फ्रीडम (Second freedom of air): वायुयान को किसी दूसरे देश में उतरने की अनुमति देती है।
  3. तीसरी और चौथी हवाई फ्रीडम (Third and fourth freedoms of air): किसी वायुयान को दूसरे देश में उतरने के पश्चात् वापस अपने देश के लिए उड़ान भरने तथा अपने देश में उतरने की अनुमति देती है।
  4. पांचवी और छठी हवाई फ्रीडमस् (The fifth and sixth freedoms): इसके अंतर्गत एयरलाइंस को किसी देश से यात्री लेने तथा अपने (एयरलाइंस के) मूल देश के अलावा किसी तीसरे देश के लिए ले जाने की अनुमति होती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ओपन स्काई पॉलिसी क्या है?
  2. SAARC राष्ट्र
  3. राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति, 2016 का अवलोकन
  4. अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन समझौता,1944
  5. हवाई फ्रीडमस्

मेंस लिंक:

ओपन-स्काई नीति क्या है? इसके महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


 सामान्य अध्ययन-III


  

विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।

कृषि अवसंरचना कोष का आरम्भ

(Agriculture Infrastructure Fund launched)

यह एक नई देशव्यापी केंद्रीय क्षेत्र योजना है।

  • यह योजना ब्याज अनुदान और वित्तीय सहायता के माध्यम से, फसल के बाद बुनियादी ढांचा प्रबंधन और सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों के लिए व्यवहार्य परियोजनाओं में निवेश के लिए मध्यम-लंबी अवधि के ऋण वित्तपोषण की सुविधा प्रदान करेगी।
  • इस योजना की समय-सीमा वित्तीय वर्ष 2020 से लेकर वित्तीय वर्ष 2029 (10 वर्ष) के लिए होगी।

पात्रता:

इस योजना के अंतर्गत, बैंकों और वित्तीय संस्थानों के द्वारा एक लाख करोड़ रुपये ऋण के रूप में प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PAC), विपणन सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), स्वयं सहायता समूहों (SHGs), किसानों, संयुक्त देयता समूहों (Joint Liability Groups- JLG), बहुउद्देशीय सहकारी समितियों, कृषि उद्यमियों, स्टार्टअपों, आदि को उपलब्ध कराये जायेंगे।

ब्याज में छूट:

इस वित्तपोषण सुविधा के अंतर्गत, सभी प्रकार के ऋणों में प्रति वर्ष 2 करोड़ रुपये की सीमा तक ब्याज में 3% की छूट प्रदान की जाएगी। यह छूट अधिकतम 7 वर्षों के लिए उपलब्ध होगी।

क्रेडिट गारंटी:

  • 2 करोड़ रुपये तक के ऋण के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज (CGTMSE) योजना के अंतर्गत इस वित्तपोषण सुविधा के माध्यम से पात्र उधारकर्ताओं के लिए क्रेडिट गारंटी कवरेज भी उपलब्ध होगा।
  • इस कवरेज के लिए सरकार द्वारा शुल्क का भुगतान किया जाएगा।
  • FPOs के मामले में, कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग (DACFW) के FPO संवर्धन योजना के अंतर्गत बनाई गई इस सुविधा से क्रेडिट गारंटी का लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

कृषि अवसंरचना कोष का प्रबंधन:

  • कृषि अवसंरचना कोष का प्रबंधन और निगरानी ऑनलाइन प्रबन्धन सूचना प्रणाली (MIS) प्लेटफॉर्म के माध्यम से की जाएगी।
  • सही समय पर मॉनिटरिंग और प्रभावी फीडबैक की प्राप्ति को सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर मॉनिटरिंग कमिटियों का गठन किया जाएगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. FPOs क्या हैं?
  2. कोआपरेटिवस (Cooperatives) क्या हैं? संवैधानिक प्रावधान।
  3. CGTMSE के बारे में।
  4. केंद्रीय क्षेत्रक तथा केंद्र प्रायोजित योजनाएं।

स्रोत: पीईबी

  

विषय: उदारीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, औद्योगिक नीति में परिवर्तन तथा औद्योगिक विकास पर इनका प्रभाव।

विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA)

(Foreign Contribution Regulation Act)

संदर्भ:

गृह मंत्रालय (MHA) ने राजीव गांधी फाउंडेशन, राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट और इंदिरा मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा, धन शोधन निवारण अधिनियम (Prevention of Money Laundering Act-PMLA), आयकर अधिनियम (Income Tax Act), विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act- FCRA) आदि के विभिन्न कानूनी प्रावधानों के उल्लंघनों की जांच करने हेतु एक अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन किया है।

चर्चा का विषय

गृह मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, राजीव गांधी फाउंडेशन (RGF) और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट(RGCT) दोनों ही संस्थाएं, FCRA के अंतर्गत पंजीकृत हैं, तथा इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट FCRA के अंतर्गत पंजीकृत नहीं है। किसी भी गैर-सरकारी संगठन तथा अन्य संगठन के लिए विदेशी अनुदान प्राप्त करने हेतु FCRA के अंतर्गत पंजीकृत होना आवश्यक हैं।

उपरोक्त तीनो गैर-सरकारी संगठन विदेशी अनुदान प्राप्त करते रहे हैं।

इस लेख से क्या सीखना है?

राजनीतिक बयान महत्वपूर्ण नहीं हैं। लेकिन, FCRA के प्रमुख प्रावधानों तथा भारत में किस प्रकार गैर-सरकारी संगठन (NGOs) को पंजीकृत तथा प्रशासित किया जाता है, और NGOs द्वारा अनुदान प्राप्त करने हेतु आवश्यक शर्तों के बारे में जानना महत्वपूर्ण है।

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 2010:

भारत में स्वयंसेवी संगठनों के लिए विदेशी अनुदान को FCRA अधिनियम के तहत विनियमित किया जाता है तथा इसे गृह मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया जाता है।

अधिनियम के तहत, इन संगठनों को प्रत्येक पांच वर्ष में FCRA से पुनःपंजीकृत कराना आवश्यक होता है। अर्थात, FCRA, 2010 के तहत दिया गया प्रमाण-पत्र पाँच साल तक के लिये वैध होता है।

संशोधित FCRA नियमों के अनुसार, FCRA के तहत पंजीकृत अथवा अनुमति प्राप्त सभी गैर-सरकारी संगठनों को अब अपनी वेबसाइट अथवा FCRA वेबसाइट पर प्रति तीन महीने में प्राप्त होने वाले तथा उपयोग किए गए विदेशी अनुदान का विवरण अपलोड करना होगा। 

गैर-सरकारी संगठनों को अब हार्ड कॉपी संस्करण के साथ-साथ अपने वार्षिक रिटर्न ऑनलाइन दाखिल करना आवश्यक होगा। वार्षिक रिटर्न को NGO की वेबसाइट अथवा गृह मंत्रालय द्वारा निर्देशित  FCRA वेबसाइट पर त्रैमासिक रूप से रखा जायेगा।

विदेशी अनुदान प्राप्त करने हेतु पात्रता

निश्चित सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक, धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम रखने वाला कोई व्यक्ति अथवा संस्था FCRA के अंतर्गत पंजीकरण अथवा केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त करने के बाद विदेशी अनुदान को स्वीकार कर सकता है।

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विदेशी अनुदान ग्रहण करने हेतु कौन पात्र नहीं है?

  1. चुनावी उम्मीदवार
  2. किसी भी विधायिका (सांसद और विधायक) के सदस्य
  3. राजनीतिक दल या पदाधिकारी
  4. राजनीतिक प्रकृति का संगठन
  5. पंजीकृत समाचार पत्र के संवाददाता, स्तंभकार, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक।
  6. न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी, तथा सरकार के स्वामित्व वाले किसी भी निगम अथवा किसी अन्य निकाय के कर्मचारी।
  7. किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ऑडियो न्यूज, ऑडियो विजुअल न्यूज या करंट अफेयर्स प्रोग्राम के उत्पादन या प्रसारण में संलग्न एसोसिएशन अथवा कंपनी।
  8. केंद्र सरकार द्वारा विशेष रूप से निषिद्ध कोई अन्य व्यक्ति अथवा संगठन।

अनुदान प्राप्त करने हेतु पंजीकरण के लिए पात्रता मानदंड

  • संगठन को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत अथवा भारतीय ट्रस्ट अधिनियम 1882 या कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत पंजीकृत होना चाहिए।
  • संस्था, कम से कम 3 साल से कार्यरत हो।
  • संस्था द्वारा समाज की भलाई हेतु अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय गतिविधियाँ के गयी हों।
  • संस्था द्वारा समाजसेवी गतिविधियों पर पिछले तीन वर्षों में कम से कम दस लाख रु. की राशि खर्च की गयी हो।

 सार्वजनिक हितक्या होते है?

FCRA, भारत के कार्यरत गैर सरकारी संगठनों के लिए देश से बाहर के स्रोतों से प्राप्त धन-राशि की को नियंत्रित करता है।

यह “राष्ट्रीय हितों के लिए हानिकारक किसी भी गतिविधि हेतु” विदेशी अनुदान की प्राप्ति पर प्रतिबंध लगाता है।

  • यह अधिनियम निर्दिष्ट करता है कि गैर-सरकारी संगठनों को विदेशों से धन प्राप्त करने के लिए सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है।
  • यदि सरकार को यह प्रतीत होता है, कि NGO को प्राप्त होने वाले अनुदान से ‘सार्वजनिक हितों’ अथवा ‘राज्य के आर्थिक हितों’ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, तो सरकार अनुमति देने से इंकार कर सकती है।

यह शर्त साफ़ तौर से अतिव्यापी है। अधिनियम में ‘सार्वजनिक हित’ की परिभाषा के बारे में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए है।

 विदेशी अनुदान की परिभाषा:

विदेशी अनुदान (Foreign Contribution) के अंतर्गत किसी विदेशी श्रोत से निजी उपयोग हेतु उपहार तथा प्रतिभूतियों के अतिरिक्त प्राप्त होने वाली धनराशि तथा सामग्री को सम्मिलित किया जाता है।

जबकि विदेशी आतिथ्य (Foreign Hospitality), विदेश यात्रा, बोर्डिंग, लॉजिंग, परिवहन या चिकित्सा उपचार लागत प्रदान करने हेतु किसी विदेशी स्रोत से प्राप्त प्रस्ताव को संदर्भित करता है।

पृष्ठभूमि:

वर्ष 2019 में, 1,800 से अधिक गैर-सरकारी संगठनों का विदेशी अनुदान प्राप्त करने पर लाइसेंस निरस्त किया गया है।

आगे की राह:

गैर-सरकारी संगठनों द्वारा नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने हेतु एक राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (National Accreditation Council), जिसमें शिक्षाविदों, कार्यकर्ता, सेवानिवृत्त नौकरशाह सम्मिलित हों, का गठन किया जाना चाहिए।

अवैध और बेहिसाब धन की निगरानी और विनियमन के संदर्भ में गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए।

गैर सरकारी संगठनों और स्वयंसेवी संगठनों की वित्तीय गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक नियामक तंत्र का तत्काल गठन किया जाना चाहिए।

वर्तमान में नागरिक अपने दैनिक-जीवन को प्रभावित करने वाली प्रक्रियाओं में एक सक्रिय भूमिका निभाने हेतु उत्सुक हैं तथा लोकतंत्र में उनकी भागीदारी, केवल मतदान की रस्म से अधिक होना काफी महत्वपूर्ण होगा।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

तारों में लिथियम उत्पादन

(Production of lithium in stars)

हाल ही में भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा तारों में लिथियम उत्पादन संबंधी एक चालीस वर्षो से अनसुलझी पहेली का समाधान प्रदान किया गया है।

तारों में लिथियम उत्पादन संबंधी पहेली

आज के सर्वश्रेष्ठ मॉडलों पर आधारित वर्तमान समझ के अनुसार, सूर्य जैसे तारों में लिथियम उनके जीवनकाल में ही नष्ट हो जाता है।

तथ्य के रूप में, सूर्य और पृथ्वी में सभी तत्वों की संरचना समान है। लेकिन, सूर्य में लिथियम की मात्रा पृथ्वी की तुलना में 100 गुनी कम है, हालांकि दोनों का निर्माण एक साथ हुआ था।

हालांकि, विरोधाभास के रूप में, कुछ तारे लिथियम-समृद्ध पाए गए है।

इस प्रकार एक पहेली उत्पन्न हुई – यदि तारे लिथियम का उत्पादन नहीं करते हैं, तो कुछ तारे लिथियम समृद्ध कैसे हो सकते हैं?

अब तक, ग्रह परिग्रहण सिद्धांत (planet engulfment theory) मान्यता प्राप्त सिद्धांत था।

नवीनतम निष्कर्ष:

शोधकर्ताओं के अनुसार, जब तारे, अपनी रेड जायंट अवस्था से आगे विकसित होकर रेड क्लंप जाइंट (Red Clump Giants) के रूप में जाने जाते हैं। इस अवस्था में तारे लिथियम का निर्माण करते हैं जिसे हीलियम फ्लैश के रूप में जाना जाता है और यही तारों को लिथियम समृद्ध बनाता है।

  • यह अध्ययन तारों की उत्पत्ति से संबंधित बिग बैंग न्यूक्लियोसिंथेसिस (Big Bang Nucleosynthesis- BBN) मान्यता को भी चुनौती देता है।
  • कार्बन और ऑक्‍सीजन जैसे भारी परमाणु पर जबरदस्‍त ऊर्जा वाली कॉस्मिक किरण के प्रहार से लिथियम जैसे हल्‍के कणों के उत्‍पादन जैसी प्रतिक्रियाओं के अलावा आकाशगंगा में तारों को भी लिथियम के स्रोत के रूप में प्रस्‍तावित किया गया है।
  • लिथियम (Li)बिग बैंग न्यूक्लियोसिंथेसिस (बीबीएन) से उत्‍पन्‍न तीन मौलिक तत्‍वों में से एक है। अन्‍य दो तत्‍वों में हाइड्रोजन और हीलियम (He) हैं।
  • इनके मॉडल मौलिक लिथियम की प्रचुरता की भविष्‍यवाणी करते हैं।

बिग बैंग न्यूक्लियोसिंथेसिस (BBN) क्या है?

बिग बैंग न्यूक्लियोसिंथेसिस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड के कुल द्रव्यमान में लगभग 25% हीलियम, 0.01% ड्यूटेरियम तथा इससे भी कम लीथियम होता है।

अधिकांश ब्रह्माण्डवेत्ता विश्वास करते हैं कि बिग बैंग के तुरंत पश्चात् अर्थात् 10 सेकंड से लेकर 20 मिनट के अंतराल में परमाणुओं का संश्लेषण हुआ था। इस संश्लेषण को प्राइमॉर्डीअल न्यूक्लियोसिंथेसिस (Primordial nucleosynthesis) का नाम दिया गया है।

लिथियम की उत्पत्ति:

  • इसका निर्माण, ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय, लगभग 7 अरब साल पहले बिग बैंग के दौरान हुआ था।
  • समय के साथ, भौतिक ब्रह्मांड में लिथियम की मात्रा में चार गुनी वृद्धि हुई है, जिसे कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, लोहा, निकेल और अन्य तत्वों की तुलना में काफी कम कहा जा सकता है क्योंकि इन तत्वों की मात्रा में एक मिलियन गुनी वृद्धि हुई है।
  • तारों द्वारा बड़े पैमाने पर उत्क्षेपण और तारकीय विस्फोट भारी तत्वों की इस महत्वपूर्ण वृद्धि में प्राथमिक योगदानकर्ता हैं। हालांकि, लिथियम को एक अपवाद माना जाता है।
  • आज के सर्वश्रेष्ठ मॉडलों के अनुसार, तारों में लिथियम उनके जीवनकाल में ही नष्ट हो जाता है।

Lithium

प्रीलिम्स लिंक:

  1. लिथियम के बारे में।
  2. किसी तारे के विकास में विभिन्न चरण।
  3. बिग बैंग न्यूक्लियोसिंथेसिस (BBN) क्या है?
  4. हीलियम फ्लैश क्या है?

स्रोत: द हिंदू


Insights Current Affairs Analysis (ICAN) by IAS Topper

 


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