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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 7 July

विषय – सूची:

सामान्य अध्ययन-II

1. कानपुर एनकाउंटर केस तथा पुलिसिंग संबंधी विषय

2. खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) द्वारा टिड्डी चेतावनी

3. डोकलाम से सबक: यथास्थिति की पूर्ण वापसी तक सैन्य-तीव्रता में कोई कमी नहीं

 

सामान्य अध्ययन-III

1. अनिवार्य लाइसेंसिंग

2. रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी क्या है?

3. बेहतर सेवा प्रदान करने हेतु NHAI द्वारा सड़कों की रैंकिंग

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. साप्ताहिक संस्कृत पत्रिका’ वार्तावली

2. संस्कृत सप्ताहिकी

3. हरियाणा में स्थानीय लोगों के लिए निजी क्षेत्र में 75% नौकरियों को आरक्षित करने के लिए अध्यादेश मसौदा

4. वर्ष 2018 में भारत से चौथी सबसे अधिक अफीम जब्ती: वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट

5. ज़ारदोज़ी कला

6. चर्चित स्थल- नतांज़ (Natanz)

7. राष्ट्रीय एटलस और विषयगत मानचित्रण संगठन (NATMO)

 


 सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य- सरकार के मंत्रालय एवं विभाग, प्रभावक समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।

कानपुर एनकाउंटर केस तथा पुलिसिंग संबंधी विषय

हाल ही में, उत्तर प्रदेश के कानपुर में कुख्यात अपराधी विकास दुबे तथा उसके गिरोह के द्वारा आठ पुलिसकर्मियों की गोली मार कर हत्या कर दी गयी। इस घटना में कानपुर के एक पुलिस स्टेशन के सभी कार्मिको पर अपराधी को जानकारी लीक करने का संदेह है।

यह घटना, एक दुष्प्रवृत्त समाज की हिंसक निशानी तथा भारत के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य में शासन की चिंताजनक स्थिति को दर्शाती है।

यह घटना क्या उजागर करती है?

  • गैंगस्टर विकास दुबे, देश के कई हिस्सों में राजनीति, अपराध और पुलिस के बीच सांठगांठ का प्रतीक है।
  • इस घटना से संबधित हालात तथा प्रशासन की प्रतिक्रिया उसी रुग्णता की ओर इशारा करती है जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए घातक हो सकती है- अर्थात, कानून के शासन का पतन।
  • आपराधिक गिरोह, राजनीति और पुलिस बलों द्वारा परिरक्षित हैं, जो जाति, सांप्रदायिक और राजनीति-निहित स्वार्थों के वशीभूत है।

पुलिसिंग में वर्तमान संकट के कारण

  • पुलिस, किसी राज्य का प्रतिरोधी बल होती है, तथा जिसका सामान्य नागरिकों के साथ सीधा संपर्क होता है। अतः राज्य में शासन की समग्र गुणवत्ता पर पुलिसिंग-गुणवत्ता का भारी प्रभाव पड़ता है।
  • मामूली प्रशिक्षण, एक विरक्त तथा अमनावीयकृत काम का माहौल, भ्रष्टाचार तथा संसाधनों की कमी पुलिसिंग-संकट में वृद्धि करती है।
  • सत्ता में बैठे राजनेता अक्सर पुलिस का उसी तरह इस्तेमाल करते हैं जैसे राजनेता सत्ता के बाहर गुंडों का इस्तेमाल करते हैं। आश्चर्य की बात नहीं है, कभी ऐसा होता है कि, अपराधी गिरोहों को पकड़ते समय पुलिस भी उन्ही की तरह व्यवहार करती है।
  • सामूहिक सजा, राजनीतिक विरोध का अपराधीकरण तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन जैसे आपत्तिजनक बलपूर्वक तरीके, पुलिसिंग उपकरण के रूप में नियमित रूप से प्रयोग किये जाने लगे हैं।

समय की मांग- स्मार्ट पुलिसिंग:

स्मार्टपुलिस बल: सख्त और संवेदनशील, आधुनिक और गतिशील, सतर्क और जवाबदेह, विश्वसनीय और उत्तरदायी, टेक्नो-सेवी और प्रशिक्षित।

SMARTका पूर्ण रूप है ‘Strict and Sensitive, Modern and Mobile, Alert and Accountable, Reliable and Responsive; Techno-savvy and Trained.

वर्तमान में आपराधिक न्याय प्रणाली तथा जमीनी स्तर के पुलिस संस्थानों को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है;

  • मौजूदा तथा उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए पुलिस को तैयार करना और
  • पुलिस की खोजी क्षमताओं तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करना।

वर्तमान के पुलिसिंग मुद्दों से संबंधित कारणों तथा उनकी जटिल परस्पर-निर्भरताओं को ध्यान में रखते हुए, यह स्पष्ट है कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए व्यापक, अधिक सहयोगपूर्ण तथा अभिनव दृष्टिकोणों को अपनाने की आवश्यकता है।

प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ में उच्चत्तम न्यायालय के निर्देश:

  1. प्रत्येक राज्य में एक ‘राज्य सुरक्षा आयोग’ (State Security Commission) का गठन किया जाए, जिसका कार्य पुलिस के कामकाज के लिए नीतियां बनाना, पुलिस प्रदर्शन का मूल्यांकन करना, तथा राज्य सरकारों द्वारा पुलिस पर अनुचित दबाव से मुक्ति को सुनिश्चित करना होगा।
  2. प्रत्येक राज्य में एक ‘पुलिस स्थापना बोर्ड’ (Police Establishment Board) का गठन किया जाए जो उप पुलिस-अधीक्षक के पद से नीचे के अधिकारियों के लिए पोस्टिंग, स्थानांतरण और पदोन्नति का फैसला करेगा, तथा उपरोक्त विषयों पर उच्च रैंक के अधिकारियों के लिए राज्य सरकार को सिफारिशें प्रदान करेगा।
  3. राज्य तथा जिला स्तर पर ‘पुलिस शिकायत प्राधिकारियों’ (Police Complaints Authorities) का गठन किया जाये, जो पुलिस कर्मियों द्वारा गंभीर कदाचार और सत्ता के दुरुपयोग संबंधी आरोपों की जांच करेगा।
  4. राज्य बलों में DGP तथा अन्य प्रमुख पुलिस अधिकारियों के लिए कम से कम दो साल का न्यूनतम कार्यकाल प्रदान किया जाए।
  5. सेवा-अवधि, अच्छे रिकॉर्ड और अनुभव के आधार पर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा पदोन्नति के लिए सूचीबद्ध किये गए तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से राज्य पुलिस के DGP की नियुक्ति सुनिश्चित की जाये।
  6. जांच करने वाली पुलिस तथा कानून और व्यवस्था संबंधी पुलिस को अलग किया जाए ताकि त्वरित जांच, बेहतर विशेषज्ञता और बेहतर तालमेल सुनिश्चित हो सके।
  7. केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के प्रमुख के रूप में नियुक्ति के लिए उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करने के लिए एक राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग (National Security Commission) का गठन किया जाए।

इसके अलावा, विभिन्न विशेषज्ञ निकायों ने पिछले कुछ दशकों में पुलिस संगठन तथा उनकी कार्यप्रणाली संबंधित विषयों का परीक्षण किया है। इसका कालक्रम निम्नानुसार है:

  1. राष्ट्रीय पुलिस आयोग, 1977-81
  2. रुबिरो समिति (Rubeiro Committee), 1998
  3. पद्मनाभ समिति, 2000
  4. मलीमथ समिति (Malimath committee), 2002-03
  5. पुलिस अधिनियम मसौदा समिति, 2005
  6. दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग (Second ARC), 2007
  7. पुलिस अधिनियम मसौदा समिति- II, 2015

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राष्ट्रीय पुलिस आयोग की स्थापना कब की गई थी?
  2. रिबेरो समिति किससे संबंधित है?
  3. मलीमथ समिति द्वारा की गई प्रमुख सिफारिशें।
  4. भारतीय संविधान की 7 वीं अनुसूची के अंतर्गत पुलिस।
  5. प्रकाश सिंह मामले का संबंध?

मेंस लिंक:

पुलिस सुधार पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

  

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) द्वारा टिड्डी चेतावनी

हाल ही में, खाद्य एवं कृषि संगठन (Food and Agriculture OrganizationFAO) द्वारा भारत को अगले चार हफ्तों तक टिड्डियों के हमले के खिलाफ हाई अलर्ट पर रहने की चेतावनी दी है। भारत, पिछले 26 सालों में इस बार सबसे खराब टिड्डी हमलों का सामना कर रहा है।

  • बरसात के मौसम में प्रजनित होने वाले टिड्डियों के झुण्ड, जो भारत-पाकिस्तान सीमा पर चले गए थे तथा वहां से पूर्व में उत्तरी राज्यों की ओर कूच कर गए थे, मानसून की शुरुआत के साथ राजस्थान की ओर वापस लौट सकते है।
  • वर्तमान टिड्डियों के हमले (2019-2020) को लहर (upsurge) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

टिड्डी आपदा, लहर तथा प्रकोप के मध्य अंतर:

  1. टिड्डी प्रकोप (Outbreak): जब मरुस्थलीय क्षेत्रों में अच्छी बारिश होती है तथा हरी वनस्पतियाँ विकसित होती हैं, तो मरुस्थलीय टिड्डीयों की संख्या में तीव्र वृद्धि हो सकती है, तथा यदि इसे नियंत्रित न किया जाए तो एक या दो महीने के भीतर ये इकठ्ठा होना शुरू कर देते है, तथा इसके बाद पहले ये पंखविहीन टिड्डों के रूप एकत्र होते है, फिर कुछ दिनों बाद ये पूर्ण व्यस्क टिड्डों के झुंडों का निर्माण करते है। इसे ही टिड्डी प्रकोप (OUTBREAK) कहा जाता है, और यह सामान्यतः किसी देश के किसी भाग के लगभग 5,000 वर्ग किमी (50 किमी से 100 किमी) क्षेत्र में एक साथ होता है।
  2. टिड्डी लहर (Upsurge): यदि किसी एक टिड्डी प्रकोप अथवा समसामयिक प्रकोप को नियंत्रित नहीं किया जाता है तथा यदि आसन्न क्षेत्रों में व्यापक या असामान्य रूप से भारी बारिश होती है, तो टिड्डी प्रजनन के कई क्रमिक सीजन हो सकते हैं, जिसे आगे चलकर पंखविहीन टिड्डों के रूप एकत्र होते है, फिर कुछ दिनों बाद पूर्ण व्यस्क टिड्डी झुंड के निर्माण करते हैं। इसे ही टिड्डी लहर (Upsurge) कहा जाता है तथा यह आम तौर पर पूरे क्षेत्र को प्रभावित करता है।
  3. टिड्डी आपदा (Plague): यदि किसी टिड्डी लहर को नियंत्रित नहीं किया जाता है और पारिस्थितिक स्थिति प्रजनन के लिए अनुकूल रहती हैं, तो टिड्डियों की आबादी संख्या और आकार में भारी मात्रा में वृद्धि जारी रहती है। इससे विशाल आकर में टिड्डी झुंडो का निर्माण होता है, इसे टिड्डी आपदा कहा जाता है। जब दो या दो से अधिक क्षेत्र एक साथ प्रभावित होते हैं तो एक बड़ी टिड्डी आपदा निर्मित हो जाती है।

टिड्डी प्रकोप (Outbreak) एक सामान्य घटना होती है, तथा इनमे से केवल कुछ ही टिड्डी लहर में परिवर्तित हो पाती हैं। इसी तरह, केवल कुछ टिड्डी लहर ही टिड्डी आपदा में बदलती हैं। आखिरी सबसे बड़ी टिड्डी आपदा वर्ष 1987-89 के दौरान निर्मित हुई थी तथा आखिरी सबसे बड़ी टिड्डी लहर वर्ष 2003-05 में देखी गयी थी।

मरुस्थलीय टिड्डियांक्या हैं?

रेगिस्तानी टिड्डे (Desert locusts), वैज्ञानिक नाम- शिस्टोसेरका ग्रीजिया (Schistocerca gregaria), जो तृण-भोजी टिड्डा (grasshoppers) के वंश से संबंधित होते हैं, तथा  सामान्य रूप से अर्ध-शुष्क या रेगिस्तानी क्षेत्रों में रहते हैं और प्रजनन करते हैं। इन्हें अंडे देने के लिए, उन्हें नंगी जमीन की आवश्यकता होती है, जोकि घनी वनस्पति वाले क्षेत्रों में बहुत कम पाई जाती है।

ये झुण्ड का निर्माण किस प्रकार करते हैं?

एकल रूप में, अथवा छोटे पृथक समूहों में, टिड्डियां बहुत खतरनाक नहीं होती हैं। लेकिन जब वे संख्या में अधिक हो जाते है, तो इनके व्यवहार में परिवर्तन हो जाता हैं। तथा, ये ‘एकल-अवस्था’ से ‘सामूहिक अवस्था’ में पहुंचकर झुण्ड (Swarms) बनाने लगते हैं। किसी एक झुंड में, एक वर्ग किमी क्षेत्रफल में 40 से 80 मिलियन वयस्क टिड्डियाँ हो सकती हैं, तथा ये एक दिन में 150 किमी तक की यात्रा कर सकती हैं।

 प्रीलिम्स लिंक:

  1. रेगिस्तानी टिड्डे क्या हैं?
  2. वे झुण्ड किस प्रकार बनाते हैं?
  3. समूहन चरण क्या है?
  4. प्लेग, उथल-पुथल और प्रकोप के बीच अंतर।
  5. आखिरी टिड्डी आपदा कब देखी गयी थी?

 मेंस लिंक:

भारत को आगामी टिड्डी लहर का सामना करने के लिए किस प्रकार तैयार होना चाहिए, चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

डोकलाम से सबक: यथास्थिति की पूर्ण वापसी तक सैन्य-तीव्रता में कोई कमी नहीं

(Lesson from Doklam: No de-escalation until full return of status quo)

हाल ही में, लद्दाख क्षेत्र में भारत और चीन द्वारा आंशिक रूप से पीछे हटने के संकेत मिले हैं। दोनों पक्षों ने 15 जून को गलवान घाटी में हुई मुठभेड़ स्थल से अपने सैनिकों को वापस बुला लिया  है।

हालांकि, विशेषज्ञों ने वर्ष 2017 में हुए डोकलाम स्टैंड-ऑफ के परिणाम की ओर इशारा करते हुए, कहा है; सरकार को लद्दाख में ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (Line of Actual ControlLAC) पर, स्टैंड-ऑफ से पहले की ‘स्थिति’ की बहाली हेतु समझौता किये बिना ‘सैन्य-तीव्रता’ में कमी करने पर  सहमत नहीं होना चाहिए।

ऐसा क्यों?

ऐसा इसलिए है क्योंकि डोकलाम स्टैंड-ऑफ से हमें सबक मिला है, कि LAC पर तनाव को समाप्त घोषित करने के लिए सेना का पीछे हटना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आवश्यक है, हम पहले उन बिदुओं को निर्धारित करें, जहाँ तक सेना वापस लौट सकती है तथा पूर्व-स्थिति की बहाली के बिना कोई सहमति नहीं होनी चाहिए।

डोकलाम-विवाद किस प्रकार समाप्त हुआ?

डोकलाम गतिरोध की घटना वर्ष 2017 में हुई थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, चीन द्वारा, भारत-भूटान-चीन त्रि-पक्षीय संधि-क्षेत्र (Tri-junction area) के निकट भूटान की सीमा का अतिक्रमण करते हुए सड़क बनाने का प्रयास किया गया था। भारत द्वारा आपत्ति किये जाने पर भारत-चीन के मध्य गतिरोध उत्पन्न हो गया। बाद में, दोनों पक्षों की सेनाएँ पीछे हट गयीं तथा भारत-चीन के मध्य तात्कालिक शत्रुता समाप्त हो गयी। परन्तु, इससे चीनी सेना द्वारा डोकलाम पठार के ठीक दूसरी ओर निर्माण कार्य नहीं रुका।

इस प्रकार, इसका निष्कर्ष यह है, कि यदि सेना केवल पीछे हटने तथा ‘सैन्य-तीव्रता में कमी करने’ सहमत होती है, तो इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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डोकलाम-विवाद क्या था?

  • भारत का भूटान के साथ सीमा-सुरक्षा संबंधी समझौता है। डोकलाम में चीन से भारत का आमना-सामना भूटान से संबंधित क्षेत्र में हुआ था।
  • चीनी, डोकलाम नामक स्थान पर कब्ज़ा करना चाहते थे, तथा इनका उद्देश्य भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक आना था। सिलीगुड़ी कॉरिडोर को मुर्गे की गर्दन (chicken’s neck) के रूप में भी जाना जाता है, यह देश के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है।
  • यह व्यावहारिक रूप से ‘आँख से आँख’ मिलाने वाला गतिरोध था, जोकि ब्रिक्स (BRICS) आयोजन के मद्देनजर समाप्त हुआ था। चीन BRICS की मेजबानी कर रहा था, तथा भारत ने डोकलाम से पीछे नहीं हटने पर दृढ़ता दिखाई थी तथा भारत द्वारा BRICS बैठक का बाहिष्कार किये जाने की संभावना थी। राजनयिक हस्तक्षेप से इस गतिरोध की समाप्ति हुई थी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. डोकलाम कहां है?
  2. चुम्बी घाटी कहाँ है?
  3. गलवान नदी के बारे में।
  4. सिलीगुड़ी कॉरिडोर।
  5. LAC बनाम LOC।
  6. डोकलाम के पड़ोसी भारतीय राज्य।

मेंस लिंक:

सरकार को लद्दाख में ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (LAC) पर, स्टैंड-ऑफ से पहले की ‘स्थिति’ की बहाली हेतु समझौता किये बिना ‘सैन्य-तीव्रता’ में कमी करने पर सहमत क्यों नहीं होना चाहिए, चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


 सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

अनिवार्य लाइसेंसिंग

(Compulsory license)

अनिवार्य लाइसेंस, किसी आवेदक कर्ता को पेटेंटकर्ता की सहमति के बिना, किसी पेटेंट उत्पाद का निर्माण करने, प्रयोग करने अथवा बेचने हेतु, अथवा पेटेंट प्रक्रिया के प्रयोग करने हेतु सरकार द्वारा जारी अधिकार-पत्र पत्र होता है।

  • भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970 के अध्याय XVI तथा ‘बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं’ (Trade Related Aspects of Intellectual Property Rights-TRIPS) समझौते के अंतर्गत अनिवार्य लाइसेंसिंग पर विचार किया जाता है।
  • किसी उत्पाद के पेटेंट प्राप्त करने की तिथि से 3 वर्ष पश्चात किसी भी समय अनिवार्य लाइसेंस के लिए आवेदन किया जा सकता है।

अनिवार्य लाइसेंस हेतु आवेदन के लिए आवश्यक शर्ते:

  • पेटेंट किया गया उत्पाद, जनता की आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ हो;
  • पेटेंटेड उत्पाद, जनता के लिए उचित मूल्य पर उपलब्ध नहीं है।
  • पेटेंटेड उत्पाद का उपयोग भारत में नहीं किया जा रहा हो।

इसके अतिरिक्त, भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970 की धारा 92 के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, राष्ट्रीय आपातकाल’ या अत्यंत आवश्यकता’ अथवा ‘गैर-व्यावसायिक सार्वजनिक उपयोग’ के मामलों में पेटेंट नियंत्रक स्वतः ही अनिवार्य लाइसेंस जारी कर सकता है।

पहला लाइसेंस कब जारी किया गया था?

भारत में पहला अनिवार्य लाइसेंस, 9 मार्च, 2012 को पेटेंट कार्यालय द्वारा हैदराबाद स्थित नैटको फार्मा (Natco Pharma) को लिवर तथा किडनी कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाले एक एंटी-कैंसर एजेंट, बाएर’ नेक्सावार (Bayer’s Nexavar) के जेनेरिक संस्करण के उत्पादन हेतु प्रदान किया गया था।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अनिवार्य लाइसेंसिंग:

अनिवार्य लाइसेंसिंग प्रणाली वैश्विक स्तर पर काफी विवादास्पद विषय है। कई विकासशील देश दवाओं की अनुपलब्धता तथा अत्यधिक महंगी होने के कारण अनिवार्य लाइसेंसिंग को विशेष महत्व दे रहे हैं, तथा ये देश ज्यादा से ज्यादा अनिवार्य लाइसेंस प्रदान कर रहे हैं। अमेरिका तथा यूरोप के विकसित देशों द्वारा इस दृष्टिकोण का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इनके अनुसार यह प्रवृत्ति दवा कंपनियों के लिए नए आविष्कार करने में कठिनाई पैदा करेगी।

अनिवार्य लाइसेंसिंग संबंधी चर्चा का कारण

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) / CPI (M) ने भारत सरकार से रेमेडिसिवर (Remdesivir) दवाई के किफायती जेनेरिक संस्करण के निर्माण हेतु अनिवार्य लाइसेंस जारी करने के लिए कहा है।

CPI (M) का कहना है कि, सरकार को पेटेंट अधिनियम के अनुच्छेद 92 को लागू करना चाहिए, यह अनुच्छेद सरकार को अनिवार्य लाइसेंस जारी करने की अनुमति देता है। इससे भारतीय निर्माता इस महंगी और आवश्यक दवा के किफायती जेनेरिक संस्करण का उत्पादन कर सकेंगे।

आवश्यकता

गिलियड साइंसेज (Gilead Sciences’) की एंटी-वायरल दवा ‘रेमेडिसविर’ ने COVID-19 रोगियों के उपचार में प्रभावी साबित हुई है।

  • मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका द्वारा महामारी से लड़ने में सक्षम सभी दवाओं की जमाखोरी कर रहा है, तथा, अमेरिका ने गिलियड साइंसेज से अगले तीन महीनों के लिए ‘रेमेड्सविर’ का पूरा स्टॉक खरीद लिया है।
  • इस प्रकार, ‘रेमेड्सविर’ दवाई आगामी कुछ समय के लिए शेष विश्व के लिए उपलब्ध नहीं होगी।

इसके अलावा, रेमेडिसविर के एक पूरे कोर्स की उत्पादन लागत, विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका में $ 10 अथवा 750 रु. से कम है तथा भारत में इसकी उत्पादन लागत लगभग 100 होगी। गिलियड अपने पेटेंट एकाधिकार के आधार पर, पूरे विश्व से सैकड़ों गुना अधिक कीमत वसूल रहा है।

वर्तमान परिदृश्य:

COVID-19 के उपचारों तक पहुँच की अनिश्चितता को देखते हुए, कई देश, पेटेंट धारकों द्वारा इन दवाओं को सुलभ बनाने से इंकार करने पर, इन उत्पादों के लिए अनिवार्य लाइसेंस जारी करने हेतु विधायी आधार तैयार कर रहे हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पेटेंट क्या है?
  2. अनिवार्य लाइसेंस क्या है? किस प्रावधान के तहत इसे जारी किया जाता है?
  3. अनिवार्य लाइसेंस के लिए कौन आवेदन कर सकता है?
  4. अनिवार्य लाइसेंस के लिए अनिवार्य शर्तें।
  5. रेमेडिसविर किसके लिए प्रयोग किया जाता है?
  6. जेनेरिक दवाएं क्या हैं? TRIPS समझौता क्या है?

मेंस लिंक:

अनिवार्य लाइसेंसिंग से आप क्या समझते हैं? संबंधित प्रावधानों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी क्या है?

(What is Raman Spectroscopy?)

रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी एक गैर-विनाशकारी रासायनिक विश्लेषण तकनीक है, यह पदार्थ की रासायनिक संरचना, अवस्था तथा बहुरूपता, क्रिस्टलीयता और आणविक प्रतिक्रियाओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करती है। यह पदार्थ के रासायनिक आबंधो (Chemical Bonds) के साथ प्रकाश की पारस्परिक क्रिया पर आधारित है।

रमन प्रकीर्णन:

यह एक प्रकाश प्रकीर्णन तकनीक है, जिसमें किसी माध्यम के अणुओं द्वारा उच्च तीव्रता वाले लेजर प्रकाश स्रोत से पड़ने वाले प्रकाश का प्रकीर्णन किया जाता है।

  • अधिकाँश प्रकीर्णित प्रकाश की तरंगदैर्ध्य (अथवा रंग) लेजर प्रकाश स्रोत की तरंगदैर्ध्य के समान होती है तथा कोई उपयोगी जानकारी प्रदान नहीं करती है – इसे रेले प्रकीर्णन (Rayleigh Scatter) कहा जाता है।
  • हालांकि प्रकाश की छोटी मात्रा (सामान्यतः 0000001%) का प्रकीर्णन भिन्न तरंग दैर्ध्य (रंग) का होता है, जो कि पदार्थ की रासायनिक संरचना पर निर्भर करता है – इसे ही रमन प्रकीर्णन कहा जाता है।

चर्चा का कारण

हाल ही में, शोधकर्ताओं द्वारा ‘लार’ के नमूनों (saliva samples) में मौजूद RNA वायरस का पता लगाने के लिए रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का प्रयोग किया गया है।

परीक्षणों से पता चला है, कि मनुष्य की लार (saliva) में बड़ी संख्या में नॉवेल कोरोनावायरस पाया जाता है।

परीक्षण-विधि

शोधकर्ताओं ने अध्ययन करने के लिए, लार के नमूनों में गैर-संक्रामक RNA वायरस को मिलाया तथा रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी के माध्यम से इसका विश्लेषण किया। इसके पश्चात्, रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी के प्रारम्भिक डेटा का विश्लेषण किया गया तथा संक्रमण पॉजिटिव तथा निगेटिव दोनों नमूनों के साथ इसकी तुलना की गयी।

प्रत्येक नमूने से प्राप्त सभी 1,400 वर्णक्रमों (spectra) के सांख्यिकीय विश्लेषण से पता चला है, कि 65 रमन वर्णक्रमीय विशेषताओं (Raman spectral features) का एक सेट, पॉजिटिव संक्रमण की पहचान करने हेतु पर्याप्त है।

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महत्व:

  • लार में उपस्थित RNA विषाणु का पता लगाने के लिए यह संकल्पनात्मक मॉडल, वायरल महामारी, जैसे कि वर्तमान में जारी COVID-19 महामारी, के प्रबंधन में रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी के क्षेत्र-अनुप्रयोग (field application) का आधार बन सकता है।
  • हालांकि, COVID 19 महामारी के संदर्भ में, इसका उपयोग मात्र स्क्रीनिंग के लिए किया जा सकता है। क्योंकि, इसमें पता लगाये गए RNA वायरस, सामान्य सर्दी-जुखाम अथवा एचआईवी जैसे किसी बीमारी के भी हो सकते है। इस परीक्षण में विशिष्ट रूप से COVID-19 वायरस की पहचान नहीं की जाती है।
  • परन्तु, इसका मुख्य लाभ यह है कि, इस परीक्षण में डेटा एकत्रीकरण तथा विश्लेषण की पूरी प्रक्रिया मात्र एक मिनट के भीतर की जा सकती है। इसके अलावा, इसमें किसी सहायक अभिकर्मक की भी आवश्यकता नहीं होती है, अतः लागत में भी काफी कमी आती है।
  • पोर्टेबल रमन स्पेक्ट्रोफोटोमीटर को हवाईअड्डे के प्रवेश द्वार अथवा किसी भी प्रवेश द्वार पर स्थापित किया जा सकता है, जहाँ इससे कुछ ही मिनटों में यात्रियों की शीघ्रता से जाँच की जा सकती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सीवी रमन और उनके प्रमुख योगदान ।
  2. रमन प्रभाव क्या है?
  3. रेले प्रकीर्णन और रमन प्रकीर्णन के मध्य अंतर।
  4. रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी क्या है?
  5. आरएनए और डीएनए के मध्य अंतर।

मेंस लिंक:

रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

बेहतर सेवा प्रदान करने हेतु NHAI द्वारा सड़कों की रैंकिंग

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (National Highways Authority of IndiaNHAI) ने देश भर में राजमार्गों की दक्षता का आकलन करने तथा उनकी रैंकिंग करने का निर्णय लिया है।

इसका उद्देश्य सड़कों को बेहतरीन बनाने तथा यात्रियों को उच्च स्तर की सेवा प्रदान करने हेतु आवश्यक सुधार करना है।

इसे किस प्रकार किया जायेगा?

आकलन के मानदंड विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं या तौर-तरीकों और अध्ययनों पर आधारित हैं, जिसका उद्देश्‍य भारतीय संदर्भ में राजमार्गों की दक्षता के मानकों को तय करना है।

आकलन के लिए मानदंडों को मुख्यत: तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है:

  1. राजमार्ग की दक्षता (45%),
  2. राजमार्ग पर सुरक्षा (35%)
  3. उपयोगकर्ता को मिलने वाली सेवाएं (20%)

 अन्य मानदंड:

आकलन करते समय इसके अतिरिक्त, कई और महत्वपूर्ण मानदंडों पर भी विचार किया जाएगा जिनमें परिचालन की गति, कई दिशाओं से वाहनों की पहुंच पर नियंत्रण, टोल प्लाजा पर लगने वाला समय, सड़क संकेतक, सड़क चिन्‍ह, दुर्घटना की दर, किसी घटना से निपटने में लगने वाला समय, क्रैश बैरियर, रोशनी, उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणाली (Advanced Traffic Management System- ATMS) की उपलब्धता, संरचनाओं की कार्यक्षमता, श्रेणीबद्ध पृथक चौराहों की व्‍यवस्‍था, स्वच्छता, वृक्षारोपण, सड़क के किनारे मिलने वाली सुविधाएं और ग्राहक संतुष्टि पर भी विचार किया जाएगा।

महत्व:

  • प्रत्येक मानदंड या पैमाने पर प्रत्येक कॉरिडोर द्वारा हासिल किए जाने वाला स्कोर दरअसल परिचालन के उच्च मानकों, बेहतर सुरक्षा एवं उपयोगकर्ताओं को अच्‍छे अनुभव कराने के लिए आवश्‍यक जानकारियां सुलभ कराएगा।
  • इससे NHAI की अन्य परियोजनाओं के लिए भी डिजाइन, मानकों, प्रथाओं, दिशा-निर्देशों और अनुबंध समझौतों में खामियों को पहचानने एवं उन्‍हें भरने में भी मदद मिलेगी।

इसके अंतर्गत, BOT, HAM और HAM परियोजनाओं के लिए अलग रैंकिंग भी की जाएगी:

  1. 1. निर्माण संचालन और हस्तांतरण (Build-Operate-Transfer) वार्षिकी मॉडल:

BOT मॉडल के अंतर्गत ‘निजी-सार्वजनिक भागीदारी’ (Public Private Partnership) प्रणाली को अपनाया जाता है।

इसके अंतर्गत, कोई डेवलपर एक राजमार्ग का निर्माण करता है, तथा एक निर्दिष्ट अवधि तक इसका परिचालन करता है और उसके पश्चात इसे सरकार को वापस सौप देता है।

सरकार, डेवलपर को भुगतान का आरंभ, परियोजना के वाणिज्यिक परिचालन की शुरूआत के बाद करती है।

  1. इंजीनियरिंग, अधिप्राप्ति और निर्माण (Engineering, Procurement and Construction (EPC) मॉडल:

इस मॉडल के तहत, परियोजना की पूरी लागत सरकार द्वारा वहन की जाती है।

सरकार निजी खिलाड़ियों से इंजीनियरिंग के ज्ञान के लिए निविदा आमंत्रित करती है। कच्चे माल की खरीद और निर्माण लागत सरकार द्वारा पूरी की जाती है।

  1. हाइब्रिड वार्षिकी मॉडल (Hybrid Annuity ModelHAM):

भारत में, HAM मॉडल, BOT और EPC  मॉडल का मिश्रित रूप है।

डिजाइन के अनुसार, सरकार वार्षिक भुगतान (annuity) के माध्यम से पहले पांच वर्षों में परियोजना लागत का 40% वहन करेगी। शेष भुगतान, परिसंपत्ति निर्माण तथा डेवलपर के प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा।

इसमें, शेष 60% लागत राशि को डेवलपर के लिए इक्विटी या ऋण के रूप में जुटाना पड़ता है। तथा, डेवलपर के लिए टोल वसूलने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।

राजस्व संग्रह की जिम्मेदारी NHAI की होगी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. NHAI के बारे में।
  2. NHAI के प्रमुख कार्य।
  3. NHAI बनाम BRO
  4. आंकलन के लिए मानदंड।
  5. BOT, EPC और HAM के मध्य अंतर।

स्रोत: पीआईबी

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 साप्ताहिक संस्कृत पत्रिकावार्तावली

4 जुलाई 2020 को, डीडी न्यूज़ पर संस्कृत समाचार पत्रिका ‘वार्तावली’ ने निरंतर प्रसारण के 5 साल पूरे कर लिए हैं।

संस्कृत सप्ताहिकी

ऑल इंडिया रेडियो (AIR) FM न्यूज़ चैनल ने 20 मिनट की अवधि के अपने पहले समाचार कार्यक्रम को संस्कृत भाषा में शुरू किया है। इसने समाचार कार्यक्रम को ‘संस्कृत सप्ताहिकी’ नाम दिया गया है।

हरियाणा में स्थानीय लोगों के लिए निजी क्षेत्र में 75% नौकरियों को आरक्षित करने के लिए अध्यादेश मसौदा

  • अध्यादेश के अनुसार, राज्य में हरियाणा के स्थानीय लोगों के लिए प्रति माह 50,000 रुपये से कम वेतन की 75 प्रतिशत नौकरियां आरक्षित होंगी।
  • इस विधान के तहत, 10 से अधिक कर्मचारियों वाले रोजगार प्रदाताओं को कवर किया जाएगा।
  • इस नियम की अधिसूचना की तिथि के बाद ये नियम भर्ती पर लागू होंगे।
  • इस योजना के तहत लाभ प्राप्त करने के लिए उम्मीदवार के पास अधिवास प्रमाण पत्र होना अनिवार्य होगा।
  • निजी कंपनियों द्वारा उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिलने पर राज्य सरकार को सूचित करना होगा। राज्य सरकार उनके लिए अन्य राज्यों से कर्मचारी भर्ती करने हेतु परमिट जारी करेगी।

वर्ष 2018 में भारत से चौथी सबसे अधिक अफीम जब्ती: वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट

‘संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ और अपराध कार्यलय’ (United Nations Office on Drugs and Crime – UNODC) की वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  • वर्ष 2018 में ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बाद, अफीम की जब्ती में भारत का चौथा स्थान रहा है।
  • ईरान में सर्वाधिक 644 टन अफीम जब्त की गई, इसके बाद अफगानिस्तान में 27 टन और पाकिस्तान में 19 टन अफीम मिली।
  • हेरोइन जब्ती (3 टन) के मामले में, भारत विश्व में 12 वें स्थान पर है।
  • अफीम की खेती के तहत वैश्विक क्षेत्र 2019 में लगातार दूसरी बार गिरावट आई। वर्ष 2018 में यह 17% थी तथा वर्ष 2019 में इसमें 30% की कमी हुई है।
  • विश्व में अफीम तस्करी का मुख्य प्रवाह तीन प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों से होता है: अफगानिस्तान, म्यांमार-लाओस और मैक्सिको-कोलंबिया-ग्वाटेमाला।

ज़ारदोज़ी कला

(Zardozi Art)

ज़री का काम या ज़ारदोज़ी, एक ऐसी कला है जो कशीदाकारी और डिजाइनरों के बीच काफी लोकप्रिय है, तथा यह भोपाल के पुराने शहर की संकरी गलियों में जीवित है।

  • भारत में 17 वीं शताब्दी में मुगल आक्रमणकारियों द्वारा ज़ारदोज़ी की शुरुआत की गई थी। यह कला भारत में फारस से आयी थी।
  • इसका शाब्दिक अर्थ, ‘ज़ार अर्थात स्वर्ण और दोज़ीअर्थात कढ़ाई है। इस प्रकार, ज़ारदोज़ी, एक फारसी शब्द का अर्थ है “सोने के धागे के साथ कशीदाकारी।”
  • शुरुआती दौर में ज़ारदोज़ी कढ़ाई में शुद्ध चाँदी के तारों और सोने की पत्तियों का प्रयोग किया जाता था। परन्तु वर्तमान में ज़ारदोज़ी कारीगर सोने अथवा चाँदी की पॉलिश किये हुए तांबे के तार एवं रेशम के धागे का उपयोग करते हैं।
  • वर्ष 2013 में भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री (GIR) ने लखनऊ ज़ारदोज़ी के लिए भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्रदान किया था।

gir

चर्चित स्थल- नतांज़ (Natanz)

हाल ही में, ईरान के एक यूरेनियम समृद्ध करने के लिये कार्य करने वाली भूमिगत अंडरग्राउंड न्यूक्लियर फैसिलिटी नतांज़ (Natanz) में आग लग गई।

  • ईरान के केंद्रीय इस्फ़हान प्रांत में स्थित, नतांज़ देश की मुख्य यूरेनियम संवर्धन सुविधा केंद है। इसे ईरान के पहले पायलट ईंधन संवर्धन संयंत्र के रूप में जाना जाता है।
  • यह ईरान के 2015 के परमाणु समझौते के बाद अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) द्वारा निगरानी की गई साइटों में से एक है।

राष्ट्रीय एटलस और विषयगत मानचित्रण संगठन (NATMO)

(National Atlas and Thematic Mapping Organisation)

संदर्भ: हाल ही में NATMO ने अपने COVID-19 डैशबोर्ड के 4 वें अद्यतन संस्करण को प्रकाशित किया है।

NATMO के बारे में:

  • 1956 में राष्ट्रीय एटलस संगठन के रूप में स्थापित।
  • प्रोफेसर एस पी चटर्जी, भारतीय भूगोल के प्रमुख इस संस्थान के संस्थापक-निदेशक थे।
  • यह भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है।
  • इसका मुख्यालय कोलकाता में है।

महत्वपूर्ण कार्य:

  1. भारत के राष्ट्रीय एटलस का संकलन।
  2. क्षेत्रीय भाषाओं में राष्ट्रीय एटलस के मानचित्र तैयार करना।
  3. पर्यावरण और संबंधित पहलुओं पर अनुसंधान अध्ययन और सामाजिक और आर्थिक विकास पर उनके प्रभाव के आधार पर विषयगत मानचित्र तैयार करना।

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