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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 23 June

विषय-सूची

सामान्य अध्ययन-I

1. सूर्य ग्रहण

2. मिजोरम में भूकंप का कारण

 

सामान्य अध्ययन-II

1. भारत-चीन सीमा विवाद: पैंगोंग त्सो का महत्व

2. चीन के साथ विवादित द्वीपों का जापान द्वारा नाम परिवर्तन

3. संयुक्त राष्ट्र शस्त्र व्यापार संधि में चीन का प्रवेश

 

सामान्य अध्ययन-III

1. गर्म एक्सट्रीम हीलियम तारों में फ्लोरीन की खोज

2. लोन वुल्फ खतरा

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. मैकॉउ (Macaws)

2. पोखरण की प्राचीन बर्तनों की कला

3. कुंभकार सशक्तिकरण कार्यक्रम

 


 सामान्य अध्ययन-I


 

विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ।

सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse)

संदर्भ: एक दुर्लभ खगोलीय घटना के रुप में 21 जून, 2020 को वलयाकार सूर्य ग्रहण, जिसे लोकप्रिय रूप से रिंग ऑफ फायर भी कहा जाता है, की घटना घटित हुयी। यह इस वर्ष का पहला सूर्य ग्रहण है। 21 जून को ग्रीष्म संक्रांति तथा उत्तरी गोलार्ध में सबसे लंबा दिन भी होता है।

सूर्य ग्रहण क्या है?

यह पृथ्वी पर घटित होने वाली एक प्राकृतिक घटना है। सूर्यग्रहण की स्थिति में चंद्रमा की कक्षीय अवस्थिति, पृथ्वी और सूर्य के मध्य होती है। सूर्यग्रहण, अमावस्या के दिन घटित होता है, इस दिन सूर्य और चंद्रमा एक दूसरे के साथ युति (conjunction) अवस्था में होते हैं।

सभी सूर्यग्रहणों में, सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी पूरी तरह से संरेखित नहीं होते हैं, ऐसे में केवल आंशिक ग्रहण होता है। जब तीन खगोलीय पिंड एक सीधी रेखा में होते हैं, तो पूर्ण सूर्य ग्रहण का अवलोकन होता है।

फिर, हर महीने सूर्यग्रहण क्यों नहीं होता?

यदि चंद्रमा पृथ्वी के थोड़ा करीब होता तथा एक ही वृत्तीय कक्षा में पृथ्वी के परिक्रमा कर रहा होता, तब प्रत्येक माह सूर्यग्रहण की घटना देखी जा सकती है। परन्तु, चंद्रमा अण्डाकार कक्षा में तथा पृथ्वी की कक्षीय स्थिति में कुछ झुकी हुई स्थिति में गति करता है, अतः हम प्रति वर्ष केवल 5 ग्रहण देख सकते हैं।

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सूर्य ग्रहण के प्रकार:

पूर्ण सूर्यग्रहण (Total Solar Eclipse)

जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच आता है, तो पृथ्वी की सतह पर छाया पड़ती है। चंद्रमा द्वारा सूर्य को थोड़े समय के लिए पूरी तरह से ढक लिया जाता है। जो स्थान चंद्रमा की पूर्ण छाया (Umbra) से ढक जाते हैं, वहां पूर्ण सूर्यग्रहण का अवलोकन होता है।

पूर्ण सूर्यग्रहण की स्थिति में हीरक वलय (Diamong Ring) की आकृति देखने को मिलती है। पूर्ण सूर्यग्रहण की स्थिति में जब सूर्य का प्रकाश चंद्रमा पर स्थित घाटियों से होकर गुजरता है, तो हीरक वलय दिखाई पड़ता है, इस घटना को सर्वप्रथम ब्रिटिश खगोलविद फ्रांसिस बेली (Francis Baily) ने देखा था, इसीलिये इसे ‘बेलीज़ बीड्स’ (Bailey’s Beads) भी कहा जाता है।

वलयाकार सूर्य ग्रहण (Annular Solar Eclipse)

वलयाकार सूर्यग्रहण की स्थिति में चंद्रमा सामान्य की तुलना में पृथ्वी से अधिक दूर होता है। इस अवस्था में चंद्रमा का आकार छोटा प्रतीत होता है तथा वह पूरी तरह सूर्य को ढक नहीं पाता है। इस घटना के दौरान चंद्रमा के चारो ओर सूर्य का प्रकाश किसी रिंग अथवा अंगूठी के सदृश प्रतीत होता है। इस प्रकार के ग्रहण को ‘वलयाकार सूर्यग्रहण’ कहा जाता है।

आंशिक सूर्यग्रहण (Partial Solar Eclipse)

जब चंद्रमा की स्थिति, सूर्य और पृथ्वी के बीच में इस प्रकार की होती है, कि चंद्रमा, सूर्य का केवल कुछ भाग ही ढक पाता है। चंद्रमा की छाया से पूरी तरह से न ढकने वाले (Penumbral) क्षेत्रों में आंशिक ग्रहण दिखाई देता है। सभी सूर्यग्रहणों में, सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी पूरी तरह से संरेखित नहीं होते हैं, ऐसे में केवल आंशिक ग्रहण का अवलोकन होता है।

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प्रीलिम्स लिंक

  1. सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण में अंतर
  2. सौर ग्रहण के प्रकार।
  3. प्रतिछाया (Umbra) तथा उपच्छाया (Penumbra)
  4. पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की कक्षा
  5. हर महीने सूर्यग्रहण क्यों नहीं होता है
  6. सक्रांति

मेंस लिंक:

वलयाकार सूर्यग्रहण पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिन्दू

 

विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ।

मिजोरम में भूकंप का कारण

संदर्भ: 21 जून को मिजोरम, मेघालय, मणिपुर और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में मध्यम तीव्रता के भूकंप के झटके महसूस किये गए। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 5.1 मापी गयी।

मिजोरम और त्रिपुरा अधिक संवेदनशील क्यों हैं?

भारत के भूकंपीय खतरा मानचित्र के अनुसार, मिजोरम और त्रिपुरा दोनों राज्य पूरी तरह से जोन V में अवस्थिति हैं।

इसके अलावा, मिजोरम, हिमालय की पूर्वी श्रृंखला के दक्षिणी छोर पर स्थित है। इसकी वलित संरचना, विस्तृत अभिनितयों (Synclines) तथा संकरी अपनितियों (Anticlines) से बनी समभिनतीय (Synclinorium) है।

अतः, इस क्षेत्र में आने वाले भूकंप प्रायः उथले होते हैं, हालांकि कभी-कभार मध्यवर्ती गहराई के कुछ भूकंप भी आते हैं। इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर, म्यांमार के चिन डिवीजन में, अधिक गहराई के भूकंप आते हैं।

त्रिपुरा में आने वाले भूकंपों का केंद्र सामान्यतः कम गहराई पर होता है।

इस क्षेत्र में आने वाले भूकंप प्रायः दाउकी दर्रे से उत्पन्न होते है। भारत और बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा का अनुसरण करने वाला दाउकी दर्रा (Dauki Fault) मुख्यतः मेघालय में स्थित है, तथा इसका कुछ भाग त्रिपुरा के उत्तरी हिस्सों से होकर गुजरता है।

इस क्षेत्र में भूकंप का दूसरा बड़ा खतरा बांग्लादेश का मधुपुर दर्रा (Madhupur Fault) है।

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भारत में भूकंपीय ज़ोन की सूची

भूकंपीय इतिहास के आधार पर, भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा देश को चार भूकंपीय क्षेत्रों अर्थात् ज़ोन-II, ज़ोन-III, ज़ोन-IV और ज़ोन-V में वर्गीकृत किया गया है।

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भारत में भूकंपीय ज़ोन के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र

ज़ोन-V: पूर्वोत्तर भारत, जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात के कच्छ के कुछ हिस्से, उत्तर बिहार और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कुछ हिस्से शामिल हैं।

ज़ोन- IV: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के शेष भाग, केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से, गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्से, तथा पश्चिमी तट के पास महाराष्ट्र के छोटे हिस्से शामिल हैं।

ज़ोन-III: केरल, गोवा, लक्षद्वीप द्वीप समूह, उत्तर प्रदेश, गुजरात और पश्चिम बंगाल के शेष भाग, पंजाब के कुछ हिस्से, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड के कुछ हिस्से, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक शामिल हैं।

ज़ोन-II: देश के शेष हिस्से शामिल हैं।

 प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारत का भूकंपीय खतरा मानचित्र कौन जारी करता है?
  2. भूकंपीय तरंगें- प्रकार, प्रसार और प्रभाव
  3. अभिनित (Synclines) तथा अपनिति (Anticline) क्या होती हैं?
  4. वलित पर्वत

मेंस लिंक:

भारत का उत्तर पूर्व क्षेत्र भूकंपों के प्रति अधिक संवेदनशील क्यों है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 


 सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

भारत-चीन सीमा विवाद: पैंगोंग त्सो का महत्व

 (India-China border dispute: Importance of Pangong Tso)

चर्चा का कारण

सैन्य स्तर पर वार्ता के दौरान पैंगोंग त्सो क्षेत्र में चीनी सेना की वृद्धि।

पैंगोंग त्सो क्षेत्र में विवाद का कारण

वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control- LAC) – रेखा, भारत और चीन मध्य वर्तमान सीमा रेखा है, पैंगोंग त्सो झील के मध्य से होकर गुजरती है, परन्तु भारत और चीन इसकी सटीक स्थिति के विषय में सहमत नहीं हैं।

दोनों देशों ने इस क्षेत्र में अपने-अपने हिस्से को चिह्नित कर लिया है। पैंगोंग त्सो झील का 45 किमी. लंबा पश्चिमी भाग भारतीय नियंत्रण में है तथा शेष भाग पर चीन का नियंत्रण है।

मुठभेड़ का वर्तमान स्थल काराकोरम रेंज के पूर्वी भाग में स्थित पहाड़ियां है, इन्हें स्थानीय भाषा में इन्हें स्थानीय भाषा में छांग छेनमो कहा जाता है।  इन पहाड़ियों के उभरे हुए हिस्‍से को ही भारतीय सेना फिंगर्सकहती है।

भारत का दावा है कि LAC की सीमा फिंगर 8 तक है, लेकिन भारतीय सेना का नियंत्रण फिंगर 4 तक ही है।

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पैंगोंग त्सो क्षेत्र में नियंत्रण

इस क्षेत्र में भारत और चीन के बीच LAC को लेकर मतभेद है, तथा यहाँ पर 8 फिंगर्स विवादित है।

  • भारत का दावा है कि LAC फिंगर 8 से होकर गुजरती है, और यही पर चीन की अंतिम सेना चौकी है।
  • भारत इस क्षेत्र में, फिंगर 8 तक, इस क्षेत्र की संरचना के कारण पैदल ही गश्त करता है। लेकिन भारतीय सेना का नियंत्रण फिंगर 4 तक ही है।
  • दूसरी ओर, चीन का कहना है कि LAC फिंगर 2 से होकर गुजरती है। चीनी सेना हल्के वाहनों से फिंगर 4 तक तथा कई बार फिंगर 2 तक गश्त करती रहती है।

वर्तमान स्थिति

भारत द्वारा 255 किमी लंबे दौलत बेग ओल्डी- दार्बुक-श्योक मार्ग का निर्माण, चीन के आक्रमक होने का कारण प्रतीत होता है। यह मार्ग काराकोरम दर्रे के बेस में स्थित अंतिम सैन्य चौकी को सड़क मार्ग से जोड़ता है। दौलत बेग ओल्डी दुनिया का सबसे ऊंचा हवाई क्षेत्र है। यह सड़क, पूरी होने पर लेह से दौलत बेग ओल्डी तक की यात्रा में लगने वाले समय को दो दिन से घटाकर छह घंटे कर देगी।

चीन का यह आक्रमक कदम इस क्षेत्र पर अधिक नियंत्रण हासिल करने के लिए उसकी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। इस रणनीति के तहत, भारत के पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध के दौरान, चीन ने वर्ष 1999 में LAC के भारतीय ओर 5 किमी तक सड़क का निर्माण किया था।

पैंगोंग त्सो क्षेत्र में चीनी अतिक्रमण का कारण

  • पैंगोंग त्सो झील रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चुशूल घाटी (Chushul Valley) के नजदीक है। वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान चीन ने चुशूल घाटी ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था।
  • चुशूल घाटी तक का रास्ता पैंगोंग त्सो झील से होकर जाता है, यह एक मुख्य मार्ग है जिसका चीन, भारतीय-अधिकृत क्षेत्र पर कब्जे के लिये उपयोग कर सकता है।
  • चीन यह भी नहीं चाहता है कि भारत LAC के पास कहीं भी अपने बुनियादी ढांचे को बढ़ावा दे। चीन को डर है कि इससे अक्साई चिन और ल्हासा-काशगर (Lhasa-Kashgar) राजमार्ग पर उसके अधिकार के लिए संकट हो सकता है।
  • इस राजमार्ग के लिए कोई खतरा, लद्दाख और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में चीनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के लिए बाधा पहुचा सकता है।

पैंगोंग त्सो के बारे में

लद्दाखी भाषा में पैंगोंग का अर्थ है समीपता और तिब्बती भाषा में त्सो का अर्थ झील होता है।

पैंगोंग त्सो लद्दाख में 14,000 फुट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित एक लंबी संकरी, गहरी, लैंडलॉक झील है, इसकी लंबाई लगभग 135 किमी है।

इसका निर्माण टेथीज भू-सन्नति से हुआ है।

यह एक खारे पानी की झील है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. LoC क्या है और इसकी स्थापना, भौगोलिक सीमा और महत्व
  2. LAC क्या है?
  3. नाथू ला कहाँ है?
  4. पैंगोंग त्सो कहाँ है?
  5. अक्साई चिन का प्रशासन कौन करता है?
  6. नाकु ला कहाँ है?
  7. पैंगोंग त्सो झील क्षेत्र में में नियंत्रण

मेंस लिंक:

भारत और चीन के लिए पैंगोंग त्सो के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

चीन के साथ विवादित द्वीपों का जापान द्वारा नाम परिवर्तन

सन्दर्भ: दक्षिणी जापान में इशिगाकी शहर (Ishigaki city) की एक स्थानीय परिषद, द्वारा एक क्षेत्र का नाम बदलने की घोषणा की गयी है। इस क्षेत्र में चीन और ताइवान के साथ विवादित द्वीप भी सम्मिलित हैं। चीन ने इस निर्णय को अवैध तथा भड़काने वाला बताया है।

क्या परिवर्तन क्या गया?

जापान ने, टोक्यो द्वारा नियंत्रित सेनकाकू द्वीप के पास स्थित एक द्वीप ‘टोनोशीरो’ (Tonoshiro) का नाम परिवर्तित कर टोनोशीरो सेनकाकू (Tonoshiro Senkaku) कर दिया गया है। इस द्वीप को ताइवान और चीन में दियोयस (Diaoyus) के नाम से जाना जाता है।

विवाद का विषय

यह निर्जन द्वीप टोक्यो और बीजिंग के बीच एक पनप रहे विवाद के केंद्र में हैं। चीन, डियाओयू द्वीप अपनी सीमा में स्थित मानता है।

इसके अलावा, ताइवान का कहना है कि डियाओयू द्वीपीय क्षेत्र उसके क्षेत्र का हिस्सा है तथा वह जापान के इस कदम का विरोध करता है।

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सेनकाकू द्वीप समूह के बारे में

सेनकाकू द्वीप (Senkaku Islands) जापान, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और चीन गणराज्य (ताइवान) के मध्य पूर्वी चीन सागर में स्थित हैं। इस द्वीपसमूह में 800 वर्ग मीटर से लेकर 4.32 वर्ग किमी क्षेत्रफल के पांच निर्जन द्वीप तथा तीन बंजर चट्टानें हैं।

सेनकाकू द्वीपसमूह पर जापानी क्षेत्रीय संप्रभुता का आधार

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात वर्ष 1951 में हुई सैन फ्रांसिस्को शांति संधि के अंतर्गत वैधानिक रूप से जापान के अधिकार क्षेत्र को पारिभाषित किया गया था। इस संधि के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत जापान द्वारा छोड़े गए क्षेत्रों में सेनकाकू द्वीप समूह सम्मिलित नहीं था।

संधि के अनुच्छेद 3 के तहत, सेनकाकू द्वीप समूह को संयुक्त राज्य के प्रशासन के अधीन नानसेई शोटो द्वीप (Nansei Shoto Islands) के हिस्से के रूप में रखा गया था। वर्ष 1972 में जापान और अमेरिका के मध्य हुए समझौते के द्वारा सेनकाकू द्वीप समूह के प्रशासनिक नियंत्रण का अधिकार जापान को दे दिया गया था।

चीन का दावा

चीन का कहना है कि यह द्वीप प्राचीन काल से ही, ताइवान प्रांत द्वारा प्रशासित मत्स्यन क्षेत्र के रूप में उसके देश का हिस्सा रहे हैं।

चीन-जापान युद्ध के पश्चात, वर्ष 1895 में हुई शिमोनोसेकी की संधि (Treaty of Shimonoseki) के तहत ताइवान को जापान के लिए सौंप दिया गया था।

सैन फ्रांसिस्को की संधि द्वारा जापान से ताइवान को मुक्त करा दिया गया था। चीन का कहना है, ताइवान के वापस किये जाने के साथ इन द्वीपों को भी वापस कर दिया जाना चाहिए था।

अब आगे

सेनकाकू / डियाओयू विवाद, पूर्वी चीन सागर, दक्षिण चीन सागर तथा भारतीय क्षेत्र में चीन के अपने क्षेत्रीय दावों को लेकर अड़ियल रवैये पर प्रकाश डालता है।

चीन के अन्य सीमा विवाद

चीन के दक्षिण चीन सागर और इसके संलग्न क्षेत्रों में ताइवान, ब्रुनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के साथ द्वीप और समुद्री सीमा विवाद जारी हैं।

इन विवादों में दक्षिण चीन सागर में स्थित स्प्राटली द्वीप समूह (वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई, ताइवान), पेरासेल द्वीप समूह (वियतनाम), स्कारबोरो शोअल (फिलीपींस), और टोंकिन (वियतनाम) सम्मिलित हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. दक्षिण चीन सागर विवाद- इसमें शामिल क्षेत्र, देशों के दावे।
  2. सेनकाकू द्वीप कहाँ हैं?
  3. 1951 की सैन फ्रांसिस्को शांति संधि क्या है?
  4. चीन- ताइवान संबंध।

मेंस लिंक:

चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीति को विश्व के देशों द्वारा किस रूप में देखा जा रहा है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

संयुक्त राष्ट्र शस्त्र व्यापार संधि में चीन का प्रवेश 

संदर्भ: चीन की शीर्ष विधायी संस्था नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने पारंपरिक हथियारों की बिक्री को विनियमित करने हेतु वैश्विक संधि में सम्मिलित होने का निर्णय लिया है। चीन द्वारा यह फैसला उस समय लिया गया है, जब महामारी से निपटने तथा हांगकांग की स्वायत्तता के विषय पर देश की वैश्विक रूप से आलोचना हो रही है।

चीन ने यह निर्णय, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा पिछले साल संयुक्त राज्य अमेरिका को समझौते से अलग करने की योजना की घोषणा के बाद लिया है। पारंपरिक हथियारों की बिक्री को विनियमित करने हेतु वैश्विक संधि वर्ष 2014 से लागू हुई थी।

शस्त्र व्यापार संधि का उद्देश्य

इसका उद्देश्य पारंपरिक हथियारों के प्रतिवर्ष 70 बिलियन डॉलर के व्यापार संबंधी वैश्विक चिंताओं को कम करना है।

इस संधि में हथियारों की अंतरराष्ट्रीय बिक्री को खरीदारों के मानवाधिकार संबधी रिकॉर्ड से जोड़ने की आश्यकता पर जोर दिया गया है। इसके अतंर्गत सदस्य देशों द्वारा पारंपरिक हथियार बिक्री हेतु अधिनियम बनाना आवश्यक है।

  • इसके अंतर्गत, संभावित हथियारों के सौदों का मूल्यांकन करना आवश्यक है, ताकि यह निर्धारित हो सके, कि संभावित खरीददार हथियारों का प्रयोग नरसंहार, मानवता के खिलाफ अपराध या युद्ध अपराधों के लिए नहीं करेगा।
  • यह संधि पारंपरिक सैन्य हथियारों को आतंकवादियों या संगठित आपराधिक समूहों के हाथों में जाने से रोकने का प्रावधान करती है।
  • इस संधि के अंतर्गत, संयुक्त राष्ट्र के शस्त्र प्रतिबंधों के उल्लंघन करने वाले सौदों पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है।

शस्त्र व्यापार संधि के अंतर्गत पारंपरिक हथियार सौदों का विनियमन  

संयुक्त राष्ट्र शस्त्र व्यापार संधि के अंतर्गत पारंपरिक हथियारों में टैंक तथा अन्य बख्तरबंद लड़ाकू वाहन, तोपखाने, लड़ाकू हेलीकॉप्टर, नौसेना के युद्धपोत, मिसाइल एवं मिसाइल लांचर, तथा अन्य छोटे हथियार सम्मिलित हैं।

इस संधि में गोला बारूद, हथियार भागों और हथियारों के पुर्जों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार हेतु नियमन के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों का निर्धारण किया गया है।

यह संधि किसी भी देश में हथियारों की घरेलू बिक्री या उपयोग को विनियमित नहीं करती है, तथा संधि सदस्य देशों को अपनी सुरक्षा हेतु हथियारों के व्यापार की वैधता को मान्यता प्रदान करती है।

 प्रीलिम्स लिंक:

  • इस संधि के अंतर्गत किन शस्त्रों को सम्मिलित किया गया है?
  • यह कब लागू हुई?
  • कितने हस्ताक्षरकर्ता?
  • क्या भारत संधि में शामिल है?
  • कौन से देश संधि से अलग हो गए हैं?

स्रोत: द हिंदू

 


 सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: अंतरिक्ष संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

गर्म एक्सट्रीम हीलियम तारों में फ्लोरीन की खोज

(Detection of fluorine in hot Extreme Helium Stars)

संदर्भ: विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (Indian Institute of AstrophysicsIIA) के अध्ययन द्वारा गर्म एक्सट्रीम हीलियम स्टार्स के वायुमंडल में एकल आयन फ्लोरीन की उपस्थिति का पहली बार पता चला है।

इस खोज से स्पष्ट होता है कि इन पिंडों की मुख्य संरचना में कार्बन-ऑक्सीजन (CO) तथा  हीलियम (He) सफेद बौना (White Dwarf) का मिश्रण होता है।

इस खोज का महत्व

हाइड्रोजन रहित पिंडो की उत्पत्ति और विकास एक रहस्य है।

उनकी रासायनिक विशिष्टताएँ तारकीय विकास (stellar evolution) विकास के स्थापित सिद्धांत को चुनौती देती हैं,क्योंकि इनकी रासायनिक संरचना कम द्रव्यमान वाले विकसित तारों के साथ मेल नहीं खाती है।

‘एक्सट्रीम हीलियम तारा’ क्या होता है?

एक एक्सट्रीम हीलियम तारा (EHe) एक कम द्रव्यमान वाला सुपरजायंट (supergiant) होता है जिसमे हाइड्रोजन मौजूद नहीं होता है। हाइड्रोजन ब्रह्मांड का सबसे आम रासायनिक तत्व है।

हमारी आकाशगंगा में अब तक ऐसे 21 तारों का पता लगाया गया है।

सफेद बौना (White Dwarf) तारे क्या होते है?

  1. सूर्य के समान तारों के परमाणु ईंधन समाप्त हो जाने पर सफेद बौना तारे का निर्माण होता है।
  2. माना जाता है के जिन तारों में इतना द्रव्यमान नहीं होता के वे आगे चलकर अपना इंधन ख़त्म हो जाने पर न्यूट्रॉन तारा बन सकें, वे सारे सफ़ेद बौने बन जाते हैं।
  3. सफेद बौने तारों में उपस्थित हाइड्रोजन नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया में पूरी तरह से खत्म हो जाता है।
  4. तारों में संलयन की प्रक्रिया ऊष्मा और बाहर की तरफ दबाव उत्पन्न करती है, इस दबाव को तारों के द्रव्यमान से उत्पन्न गुरुत्व बल संतुलित करता है।
  5. तारे के बाह्य कवच के हाइड्रोजन के हीलियम में परिवर्तित होने से ऊर्जा विकिरण की तीव्रता घट जाती है एवं इसका रंग बदलकर लाल हो जाता है। जिसका तापमान 100,000 केल्विन से अधिक होता है।
  6. सफ़ेद बौना तारा, आकार में सूर्य का लगभग आधा होता है, फिर भी पृथ्वी से बड़ा होता है।

स्रोत: pib

 

विषय: आंतरिक सुरक्षा।

लोन वुल्फ खतरा

(The lone wolf threat)

अर्थ: ‘लोन वुल्फ’ शब्द का उपयोग अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियों और मीडिया द्वारा किसी निर्देश व्यवस्था से अलग आतंकी घटना को अंजाम देने वाले व्यक्तियों के लिए किया जाता है।

लोन वुल्फ या अकेला- आतंकवादी वह होते है जो किसी भी आतंकी समूह की सहायता अथवा निर्देशों के बगैर अकेले हिंसक कृत्य करते है। ये किसी समूह की चरम विचारधारा तथा मान्यताओं से प्रभावित या प्रेरित हो सकते हैं तथा ऐसे समूह के समर्थन में आतंकी कार्य कर सकते हैं।

चर्चा का कारण

हाल ही में, लंदन के पश्चिम में स्थित रीडिंग कस्बे के एक पार्क में चाकू से हमला किया गया, जिसमे तीन लोगों की मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए।

यह घटना, ब्रिटेन में ‘लोन वुल्फ’ के खतरे की चेतावनी है। नवंबर 2019 से, देश में इस तरह की तीन बड़ी घटनायें हो चुकी है।

इस प्रकार के हमलों को रोकने में कठिनाई

आतंकवादी संगठन इस रणनीति का प्रयोग उन देशों में हिंसा फैलाने के लिए करते हैं जहां सुरक्षा व्यवस्था के कारण बड़े हमले करना असंभव होता है।

सुरक्षा एजेंसियों तथा खुफिया एजेंसियों द्वारा समन्वित आतंकी हमलों में, अपराधियों का पता लगाने की संभावना काफी अधिक होती है। लेकिन, लोन वुल्फ हमलों में, चरमपंथी व्यक्ति अपने विश्वास तथा मान्यताओं को हिंसक कार्यों में तब्दील कर देते हैं, और इसलिए उनका पता लगाना तथा उन्हें रोकना कठिन होता है।

समय की मांग

सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को कट्टरता के प्रति एक बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही सोशल मीडिया अथवा अन्य ऑनलाइन प्लेटफार्म के माध्यम से कट्टरता (radicalization) को मिल रहे कट्टरपंथ की रोकथाम के लिए समुचित तंत्र का निर्माण किया जाये। सरकार द्वारा विभिन्न समुदायों के नेताओं के साथ मिलकर गैर-कट्टरता (deradicalisation) संबंधी कार्यकम चलाये जाने की आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 मैकॉउ (Macaws)

संदर्भ: हाल ही में ‘राजस्व खुफिया निदेशालय’ (Directorate of Revenue Intelligence-DRI) द्वारा एक वन्यजीव तस्करी समूह का खुलासा किया गया है। ये तस्कर बांग्लादेश से विदेशी तोतों (Exotic Macaws) की विभिन्न प्रजातियों को अवैध तरीके से कोलकाता ला रहे थे।

जब्त किये गए इन पक्षियों में हाइसिन्थ मैकॉउ  (Hacinth Macaw), पेस्केट पैरट (Pesquet’s Parrot), सीवियर मैकॉउ (Severe Macaw) और हैनस मैकॉउ (Hahn’s Macaw) जैसे दुर्लभ प्रजाति के पक्षी सम्मिलित हैं।

सभी पक्षियों को सीमा शुल्क अधिनियम और वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के तहत जब्त कर लिया गया।

इन कानूनों के तहत किये गए अपराध के लिए सात साल तक के कारावास की सजा का प्रावधान है।

संरक्षण स्थिति

अवैध रूप से आयातित यह पक्षी ‘वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन’ (The Convention of International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora-CITES) के प्रावधानों तथा ‘विदेश व्यापार नीति’ के तहत संरक्षित हैं।

हाइसिन्थ मैकॉउ (Hacinth Macaw) को CITES की परिशिष्ट I के तहत सूचीबद्ध किया गया है।

CITES के तहत संरक्षण प्राप्त प्रजातियों का वैश्विक और घरेलू व्यापार प्रतिबंधित है।

पोखरण की प्राचीन बर्तनों की कला

सन्दर्भ: खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) ने राजस्थान के पोखरण में अपना “कुम्हार सशक्तिकरण योजना” शुरू की है। इसका उद्देश्य कुम्हारों को मजबूती प्रदान करना, स्व-रोजगार उत्पन्न करना और मृतप्राय हो रही मिट्टी के बर्तनों की कला को पुनर्जीवित करना है।

इसके तहत, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग ने पोखरण में 80 कुम्हारों के परिवार को 80 इलेक्ट्रिक पॉटर चाकों का वितरण किया, जिनके पास टेराकोटा उत्पादों की समृद्ध विरासत मौजूद है।

प्रमुख तथ्य

  • पोखरण एक आकांक्षात्मक जिलों में से एक है जिसे नीति अयोग द्वारा चिह्नित किया गया है।
  • पोखरण में भारत के पहले भूमिगत परमाणु हथियार, बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए परीक्षण स्थल के रूप में कार्य किया गया।

कुंभकार सशक्तिकरण कार्यक्रम

यह देश के दूरस्थ स्थानों में अवस्थित कुम्हार समुदाय के सशक्तिकरण के लिए खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) की एक पहल है।

यह कार्यक्रम यूपी, एमपी, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, असम, गुजरात, तमिलनाडु, ओडिशा, तेलंगाना और बिहार सहित कई राज्यों में लागू किया गया है।

इस कार्यक्रम कुम्हारों को निम्नलिखित सहायता प्रदान की जाती है।

  1. उन्नत मिट्टी के बर्तनों उत्पादों के लिए प्रशिक्षण
  2. नई तकनीक पॉटरी उपकरण जैसे इलेक्ट्रिक चाक
  3. बाजार संपर्क तथा KVIC प्रदर्शनियों के माध्यम से दृश्यता

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