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INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 17 June

विषय-सूची

सामान्य अध्ययन-II

1. संविधान की 10वीं अनुसूची

2. आरक्षण मूल अधिकार नहीं है: उच्चत्तम न्यायालय

3. धुले कोयले की आपूर्ति

4. अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी तथा ईरान का परमाणु-कार्यक्रम

 

सामान्य अध्ययन-III

1. पदार्थ की पांचवीं अवस्था

2. विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस 2020

 

 प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. स्किज़ोथोरैक्स सिकुसीरुमेन्सिस

 


 सामान्य अध्ययन-II


   

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

संविधान की 10वीं अनुसूची

चर्चा का कारण

उच्चत्तम न्यायालय ने गोवा विधानसभा अध्यक्ष से पिछले वर्ष जुलाई में सत्तारूढ़ भाजपा में सम्मिलित होने वाले 10 विधायकों के विरुद्ध निर्हरता (Disqualification) कार्यवाही पर फैसला करने हेतु विपक्षी कांग्रेस पार्टी द्वारा दायर की याचिका पर प्रतिक्रिया देने को कहा है।

पृष्ठभूमि

पिछले वर्ष जुलाई में 10 विधायकों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो तिहाई हिस्सा होने का दावा करते हुये भाजपा के विधायक दल में विलय का निर्णय किया था और तद्नुसार अध्यक्ष को इसकी जानकारी दी थी।

इसी जानकारी के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गोवा विधानसभा में विधायी दल के कथित विलय का संज्ञान लेते हुये इन विधायकों को भाजपा के सदस्यों के साथ सीट आवंटित कर दी थी।

याचिका के अनुसार इन दस में से नौ विधायकों ने 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा था और वे चुनाव जीते थे।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इन विधायकों को ‘संविधान के अनुच्छेद 191 (2) तथा दसवीं अनुसूची (दल-बदल) के पैरा 2 के तहत सदन की सदस्यता से अयोग्य किया जाना चाहिए।

दलबदल विरोधी कानून क्या है?

संविधान में, 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा एक नयी अनुसूची (दसवीं अनुसूची) जोड़ी गई थी।

  • इसमें सदन के सदस्यों द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में सम्मिलित होने पर ‘दल-बदल’ के आधार पर निरर्हता (Disqualification) के बारे में प्रावधान किया गया है।
  • इसमें उस प्रक्रिया को निर्धारित किया गया है, जिसके द्वारा विधायकों तथा सांसदों को सदन के किसी अन्य सदस्य की याचिका के आधार पर सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा ‘दल-बदल’ के आधार पर अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
  • दल-बदल कानून लागू करने के सभी अधिकार सदन के अध्यक्ष या सभापति को दिए गए हैं एवं उनका निर्णय अंतिम होता है

यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों पर समान रूप से लागू होता है।

निरर्हता (Disqualification)

यदि किसी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का सदस्य:

  1. स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता त्याग देता है, अथवा
  2. यदि वह सदन में अपने राजनीतिक दल के निर्देशों के विपरीत मत देता है अथवा मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा अपने राजनीतिक दल से उसने पंद्रह दिनों के भीतर क्षमादान न पाया हो।
  3. यदि चुनाव के बाद कोई निर्दलीय उम्मीदवार किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।
  4. यदि विधायिका का सदस्य बनने के छह महीने बाद कोई नामित सदस्य (Nominated Member) किसी पार्टी में शामिल होता है।

कानून के तहत अपवाद

सदन के सदस्य कुछ परिस्थितियों में निरर्हता के जोखिम के बिना अपनी पार्टी बदल सकते सकते हैं।

  • इस विधान में किसी दल के द्वारा किसी अन्य दल में विलय करने करने की अनुमति दी गयी है बशर्ते कि उसके कम से कम दो-तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों।
  • ऐसे परिदृश्य में, अन्य दल में विलय का निर्णय लेने वाले सदस्यों तथा मूल दल में रहने वाले सदस्यों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है।

पीठासीन अधिकारी के निर्णय की न्यायिक समीक्षा

इस विधान के प्रारम्भ में कहा गया है कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं होगा। वर्ष 1992 में उच्चत्तम न्यायालय ने इस प्रावधान को खारिज कर दिया तथा इस सन्दर्भ में पीठासीन अधिकारी के निर्णय के विरूद्ध उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय में अपील की अनुमति प्रदान की। हालाँकि, यह तय किया गया कि पीठासीन अधिकारी के आदेश के बिना कोई भी न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा।

दल-बदल विरोधी कानून के लाभ

  1. दल परिवर्तन पर लगाम लगाकर सरकार को स्थिरता प्रदान करता है।
  2. यह सुनिश्चित करता है कि उम्मीदवार संबधित दल तथा दल के लिए मतदान करने वाले नागरिकों के प्रति निष्ठावान बने रहें।
  3. दलगत अनुशासन को बढ़ावा देता है।
  4. दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों को आकर्षित किए बिना राजनीतिक दलों के विलय की सुविधा देता है।
  5. राजनीतिक स्तर पर भ्रष्टाचार को कम करने की संभावना होती है।
  6. यह किसी पार्टी को दोषी सदस्यों के लिए दण्डात्मक कार्यवाही का अधिकार प्रदान करता है।

दल-बदल विरोधी कानून पर समितियां

चुनावी सुधारों पर दिनेश गोस्वामी समिति:

दिनेश गोस्वामी समिति ने कहा कि निरर्हता उन मामलों तक सीमित होनी चाहिए जहाँ:

  • कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है,
  • कोई सदस्य मतदान से परहेज करता है, अथवा विश्वास प्रस्ताव या अविश्वास प्रस्ताव में पार्टी व्हिप के विपरीत वोट करता है। राजनीतिक दल तभी व्हिप केवल तभी जारी कर सकते है जब सरकार खतरे में हो।

 विधि आयोग (170 वीं रिपोर्ट)

  • इसके अनुसार- ऐसे प्रावधान, जो विभाजन और विलय को निरर्हता (Disqualification) से छूट प्रदान करते हैं, समाप्त किये जाने चाहिए।
  • चुनाव पूर्व चुनावी मोर्चो (गोलबंदी) को दलबदल विरोधी कानून के तहत राजनीतिक दलों के रूप में माना जाना चाहिए।
  • इसके अलावा राजनीतिक दलों को व्हिप जारी करने को केवल उन मामलों में सीमित करना चाहिए जब सरकार खतरे में हो।

चुनाव आयोग

राष्ट्रपति / राज्यपाल द्वारा, दसवीं अनुसूची के अंतर्गत, किये जाने वाले निर्णयों में चुनाव आयोग की सलाह बाध्यकारी सलाह होनी चाहिए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. दल-बदल कानून संबधित विभिन्न समितियों और आयोगों के नाम
  2. समिति तथा आयोग में अंतर
  3. पीठासीन अधिकारी तथा न्यायिक समीक्षा का निर्णय
  4. राजनीतिक दलों के विलय तथा विभाजन में अंतर
  5. क्या पीठासीन अधिकारी पर दलबदल विरोधी कानून लागू होता है?
  6. संबंधित मामलों में उच्चत्तम न्यायालय के निर्णय

मेंस लिंक:

दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों का परीक्षण कीजिए। क्या यह कानून अपने उद्देश्यों को पूरा करने में विफल रहा है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

आरक्षण मूल अधिकार नहीं है: उच्चत्तम न्यायालय

संदर्भ: आरक्षण पर सुप्रीम कार्ट ने एक बड़ी टिप्‍पणी की है। शीर्ष न्‍यायालय ने कहा है कि किसी एक समुदाय को सीटों का आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है।

पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेजों में ओबीसी के लिए 50 फ़ीसद सीटें आरक्षित किए जाने की माँग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

तमिलनाडु के लगभग सभी राजनीतिक दलों ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका दायर की थी। याचिका में माँग की गयी थी कि राज्य के मेडिकल कॉलेजों में ओबीसी आरक्षण को 50 फ़ीसद कर दिया जाए।

याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार पर, चिकित्सा और दंत विज्ञान पाठ्यक्रमों में अखिल भारतीय कोटा के अंतर्गत सीटों के लिए पिछड़े वर्गों तथा अति पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित 50% कोटा लागू नहीं करने तथा “तमिलनाडु के लोगों के लिए उचित शिक्षा के अधिकार” का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था।

उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई महत्वपूर्ण टिप्पणियां

आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। इसलिए, इस मामले में अनुच्छेद 32 लागू नहीं किया जा सकता।

अतः आरक्षण लाभ नहीं दिया जाना किसी भी संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं के तर्क

राज्‍य में ऐसे आरक्षण के लागू न होने से इसके निवासियों के मौलिक अधिकारों का उल्‍लंघन होता है।

स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक, आरक्षण प्रदान करने हेतु निम्नलिखित में से किसी भी कानून का पालन नहीं कर रहे हैं:

  1. तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और सरकारी सेवाओं में नियुक्ति) क़ानून, 1993 के अनुसार अखिल भारतीय कोटा के तहत स्नातक पाठ्यक्रमों में तथा तमिलनाडु में स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रम में ओबीसी उम्मीदवारों के लिए 50% आरक्षण प्रदान करना।
  2. अन्य राज्यों के लिए स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रम तथा अखिल भारतीय कोटा में ओबीसी उम्मीदवारों के लिए 27% आरक्षण।

प्रोन्नति में आरक्षण पर कोर्ट का निर्णय

फरवरी 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि प्रोन्नति में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है और राज्य को इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

अतिरिक्त जानकारी

आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्रावधान

  1. अनुच्छेद 15(4) तथा 16(4) में कहा गया है कि संविधान में उल्लिखित ‘समानता’ संबधी प्रावधान सरकार को पिछड़े वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जाति (Scheduled Castes- SCs) तथा अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes- STs) के पक्ष में शिक्षण संस्थानों अथवा नौकरियों में प्रवेश हेतु विशेष प्रावधान करने से नहीं रोकते हैं।
  2. अनुच्छेद 16(4A) के अनुसार, राज्य सरकारें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पक्ष में पदोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिये कोई भी प्रावधान कर सकती हैं यदि राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
  3. 1992 के इंद्रा साहनी मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि, संयुक्त आरक्षण कोटा के लिए ऊपरी सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  4. 2019 में, 103 वें संविधान संशोधन अधिनियम दवारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (Economically Weaker Sections- EWS) को सरकारी नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

रिट अधिकार क्षेत्र (Writ jurisdiction)

संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय तथा अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय, मूल अधिकारों की रक्षा करने तथा इनके प्रवर्तन हेतु, बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश रिट (Mandamus), प्रतिषेध रिट (Prohibition), उत्प्रेषण लेख (Certaiorari), अधिकार पृच्छा (Quo Warranto), रिट जारी कर सकते हैं।

अनुच्छेद 32 के तहत संसद, इन रिट्स (writs) को जारी करने के लिए किसी अन्य न्यायालय को भी प्राधिकृत कर सकती है। हालांकि, अभी तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

उच्चतम न्यायालय केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है जबकि उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए तथा साधारण कानूनी अधिकार के लिए भी रिट जारी कर सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. NEET क्या है?
  2. अनुच्छेद 32, 226, 14, 15 और 16 का अवलोकन
  3. रिट (writ) क्या हैं?
  4. SC तथा HC की रिट जारी करने की शक्तियों में अंतर।
  5. इंद्र साहनी केस का निर्णय
  6. अनुच्छेद 32 को कब निलंबित किया जा सकता है?
  7. रिट (writ) को जारी करने के लिए किसी अन्य न्यायालय को कौन प्राधिकृत कर सकता है।

मेंस लिंक:

आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के सन्दर्भ में चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

धुले कोयले की आपूर्ति

(Supplying washed coal)

सन्दर्भ:  सरकार ने हाल ही में तापीय विद्युत् केंद्रों प्लांटों को आपूर्ति किए जाने वाले कोयले की अनिवार्य धुलाई को समाप्त करने हेतु ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम’ (Environment Protection Act) में संशोधन किया है।

इस अधिसूचना ने सरकार के ‘जलवायु-परिवर्तन प्रतिबद्धताओं के तहत खदान से 500 किमी से अधिक दूरी पर स्थित सभी तापीय इकाइयों को आपूर्ति किये जाने वाली कोयले की धुलाई की अनिवार्यता’ संबंधी वर्ष 2016 के आदेश को रद्द कर दिया।

चर्चा का कारण

कुछ विशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम का विरोध किया है। इनका कहना है कि, कोयला-आधारित विद्युत् केंद्रों पर प्रदूषण भार में अब तक जो भी कमी हुई है, इस अधिसूचना से वह समाप्त हो जायेगी।

हालांकि, सरकार ने अपने कदम का बचाव करते हुए विरोध करने वालों पूछा है कि, “जब खदान से 500 किमी के भीतर कोयला गंदा नहीं होता है तब यह 500 किमी के बाद किस प्रकार गंदा हो सकता है?”

कोयले की अनिवार्य धुलाई हेतु तर्क

जनवरी 2014 के बाद से, पर्यावरण मंत्रालय, बिना धुले कोयले की आपूर्ति-दूरी को कार्मिक रूप से कम करने की दिशा में कार्य कर रहा है। इसका उद्देश्य, तापीय संयत्रों को धुले हुए कोयले की आपूर्ति, तथा उत्सर्जित राख की सीमा को 34 प्रतिशत तक करना है, चाहे वे खदान से किसी भी दूरी पर स्थित हो।

  • यह नीति जलवायु परिवर्तन समझौतों में सरकार के निर्णयों के अनुरूप है- कोयला उपभोग में कमी नहीं की जायेगी, अपितु, उत्सर्जन नियंत्रण पर फोकस किया जायेगा।
  • धुले हुए कोयले के प्रयोग से शुष्क ईंधन की दक्षता तथा गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
  • सैधांतिक रूप में, कोयला धोने जैसी प्रक्रिया को सभी के लिए अच्छा माना जाता है। इसे तापीय शक्ति संयत्रों को परिचालन में समस्याएं नहीं होती हैं।
  • धुले कोयले का दहन, उत्सर्जन तथा स्थानीय वायु प्रदूषण के दृष्टिकोण से बेहतर होता है, और इससे उत्सर्जित राख तथा गैर-दहनशील सामग्री के अनावश्यक परिवहन में कमी आती है।

नयी अधिसूचना के तर्क

  • विद्युत् मंत्रालय ने यह मानता है कि धुले हुए कोयले के दहन से प्रदूषण-उत्सर्जन को कम करने में मदद नहीं मिलती है।
  • वाशरी (washery) निकला अवशिष्ट कोयला बाजार में पहुच जाता है तथा इसका उद्योगों द्वारा उपयोग किया जाता है जिससे प्रदूषण में बढ़ोत्तरी होती है।
  • इसका कहना है कि कोयले की धुलाई अपने उद्देश्यों को पूरा करने में असमर्थ है। इससे “प्रदूषण को मात्र कोयला खदानों के आसपास ही सीमित किया जा सकता है।
  • कोयला धोने की प्रक्रिया भारीभरकम तथा महंगी होती है।

आगे की राह

विद्युत् मंत्रालय ने विद्युत् उत्पादन करने वाली इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकियों के प्रयोग करने पर बल दिया है।

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशा-निर्देशों के तहत, 50 गीगावाट की तापीय विद्युत क्षमता के संयत्रों को उत्सर्जन नियंत्रण प्रणाली स्थापित करना अनिवार्य है।
  • धुले हुए कोयले के स्थान पर कच्चे कोयले का उपयोग करना भी लाभप्रद होगा।
  • बिजली संयंत्रों में सुपरक्रिटिकल प्रौद्योगिकी के उपयोग से, उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी तथा बिना धुले कोयले का दक्षतापूर्वक उपयोग किया जा सकता है।
  • धुले कोयले का उपयोग विद्युत् उत्पादन को महंगा बनाता है।

coal

स्रोत: द हिन्दू

 

विषय: महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाए ​​और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी तथा ईरान का परमाणु-कार्यक्रम

सन्दर्भ: अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (International Atomic Energy Agency- IAEA) ने अघोषित परमाणु सामग्री की जांच करने में ईरान द्वारा सहयोग करने में विफल रहने पर “गंभीर चिंता” व्यक्त की है।

IAEA द्वारा की गयी टिप्पणीयाँ

  1. ईरान ने एजेंसी के निरीक्षकों को दो साइटों के निरीक्षण की अनुमति नहीं दी, जिनको एजेंसी देखना चाहती थी।
  2. ईरान ने, 2000 के दशक के आरम्भ में संभावित अघोषित परमाणु सामग्री के उपयोग के बारे में सवालों के जवाब नहीं दिए। तथा उस सामग्री का क्या हुआ? इस सवाल का जबाब देने में ईरान विफल रहा।
  3. ईरान के परमाणु-ईंधन भंडार में, 2015 के समझौते के अंतर्गत निर्धारित स्तर से काफी अधिक मात्रा में वृद्धि हुई है।
  4. ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने हेतु परमाणु समझौते के अनुपालन को घटा दिया है।

आगे क्या?

यदि ईरान IAEA के सवालों का जवाब देने में विफल रहता है, तो यह विषय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nation Security Council- UNSC) को भेजा जा सकता है। UNSC ने पूर्व में ईरान पर प्रतिबंध लगाए थे।

सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य रूस और चीन ने सार्वजनिक रूप से ईरान के पिछले परमाणु-कार्यकर्मों के महत्व को नकार दिया है।

निरीक्षण की आवश्यकता

ईरान द्वारा परमाणु हथियार मशीन अथवा परमाणु हथियार परीक्षण हेतु न्यूट्रॉन चालक (Neutron Initiator) के निर्माण पर काम किये जाने के संकेत मिले है

ईरान के समृद्ध यूरेनियम भंडार में लगभग 50% तक की वृद्धि हुई है तथा यह 1,572 किलोग्राम तक हो चुका है। वर्ष 2015 के परमाणु समझौते में ईरान के लिए समृद्ध यूरेनियम भंडार की सीमा 202.8 किलोग्राम निर्धारित की गयी थी।

1,000 किलोग्राम निम्न-समृद्ध यूरेनियम (low-enriched uranium) को पुनः समृद्ध करने पर ईरान पास परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त सामग्री हो जायेगी। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस प्रक्रिया में तीन महीने से कम समय लग सकता है।

क्या संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) को बहाल किया जा सकता है?

वर्ष 2015 के संयुक्त व्यापक कार्य योजना (Joint Comprehensive Plan of Action JCPOA) परमाणु समझौते को सामान्यतः बहाल नहीं किया जा सकता है।

JCPOA परमाणु समझौते को ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए तैयार किया गया था। इस डील के तहत ईरान को समृद्ध यूरेनियम को विदेशों में बेचना पड़ता है, व इसका उपयोग परमाणु हथियारों के लिए नहीं कर सकता है। ईरान ने इस सौदे के तहत अपनी परमाणु गतिविधियों को सीमित करने के लिए सहमती प्रकट की थी।

ईरान ने समझौते के पहले दिन से ही JCPOA प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन किया है। पिछले कुछ वर्षो के दौरान ईरान ने समझौते के यूरेनियम संवर्धन प्रतिबंधो का उल्लंघन करते हुए परमाणु बम निमार्ण क्षमता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है।

JCPOA को इसके सनसेट उपबंधो (sunset clauses) सहित पुनः लागू करने से, ईरान पर यूरेनियम संवर्धन संबंधी लगभग सभी प्रतिबंधों को उठाने की शुरुआत हो जायेगी। इससे बहुत कम समय में ही ईरान परमाणु क्षमता संपन्न देश बन सकता है।

ईरान परमाणु समझौता क्या था?

ईरान परमाणु समझौता, 2015 में ईरान तथा विश्व के छह देशों– अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी के बीच सम्पन्न हुआ था। इस समझौते में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाने पर सहमति व्यक्त की।

संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) के तहत तेहरान ने मध्यम संवर्धित यूरेनियम के अपने भंडारण को पूर्ण रूप से समाप्त करने, निम्न-संवर्द्धित यूरेनियम के भण्डारण को 98% तक कम करने तथा आगामी 13 वर्षों में अपने गैस सेंट्रीफ्यूजों की संख्या को दो-तिहाई तक कम करने पर सहमति व्यक्त की।

इस समझौते के माध्यम से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगाये गए प्रतिबंधों की निगरानी के लिए कठोर तंत्रों की स्थापना की गई थी।

अमेरिका इस समझौते से क्यों अलग हो गया?

ट्रम्प तथा इस समझौते के विरोधियों का कहना है कि ‘ईरान परमाणु समझौता’ दोषपूर्ण है क्योंकि इससे ईरान को अरबों डॉलर की पहुंच प्राप्त होती है, लेकिन यह हमास और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को ईरान द्वारा समर्थन देने पर प्रतिबंध नहीं लगाता है। इन संगठनो को अमेरिका द्वारा आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है।

अमेरिका का यह भी कहना है कि, यह समझौता ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों पर अंकुश नहीं लगाता है तथा यह मात्र 2030 तक लागू होगा।

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के बारे में

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की स्थापना, वर्ष 1957 में संयुक्त राष्ट्र संघ भीतर ‘वैश्विक शांति के लिए परमाणु संगठन’ के रूप की गयी थी। यह एक स्वायत अंतरराष्ट्रीय संगठन है।

इसका उद्देश्य विश्व में परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना है। यह परमाणु ऊर्जा के सैन्य उपयोग को किसी भी प्रकार रोकने में प्रयासरत रहती है।

IAEA, संयुक्त राष्ट्र महासभा तथा सुरक्षा परिषद दोनों को रिपोर्ट करती है।

इसका मुख्यालय वियना, ऑस्ट्रिया में स्थित है।

प्रमुख कार्य

  1. IAEA, अपने सदस्य देशों तथा विभिन्न भागीदारों के साथ मिलकर परमाणु प्रौद्योगिकियों के सुरक्षित, सुदृढ़ और शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता है।
  2. इसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना तथा परमाणु हथियारों सहित किसी भी सैन्य उद्देश्य के लिए इसके उपयोग को रोकना है।

बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स

  • 22 सदस्य राज्यों (प्रत्येक द्वारा निर्धारित भौगोलिक विविधता का प्रतिनिधित्व) – सामान्य सम्मेलन द्वारा निर्वाचन (प्रत्येक वर्ष 11 सदस्य) – 2 वर्ष का कार्यकाल
  • कम से कम 10 सदस्य देश – निवर्तमान बोर्ड द्वारा नामित
  • IAEA गतिविधियों और बजट पर जनरल कॉन्फ्रेंस की सिफारिशें
  • IAEA मानकों को प्रकाशित करने के लिए जिम्मेदार
  • IAEA की अधिकांश नीतियों के निर्माण हेतु जिम्मेदार
  • जनरल कॉन्फ्रेंस अनुमोदन के अधीन महानिदेशक की नियुक्त

कार्यक्रम

  1. कैंसर थेरेपी के लिए कार्रवाई का कार्यक्रम (Program of Action for Cancer Therapy- PACT)
  2. मानव स्वास्थ्य कार्यक्रम
  3. जल उपलब्धता संवर्धन परियोजना
  4. अभिनव परमाणु रिएक्टरों और ईंधन चक्र पर अंतर्राष्ट्रीय परियोजना, 2000

प्रीलिम्स लिंक:

  1. JCPOA क्या है? हस्ताक्षरकर्ता
  2. ईरान और उसके पड़ोसी।
  3. IAEA क्या है? संयुक्त राष्ट्र के साथ संबंध
  4. IAEA के सदस्य
  5. IAEA के कार्यक्रम।
  6. बोर्ड ऑफ गवर्नर- रचना, मतदान और कार्य
  7. यूरेनियम संवर्धन क्या है?

मेंस लिंक:

संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA)  पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू

 


 सामान्य अध्ययन-III


  

विषय: विज्ञान और प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग तथा रोजमर्रा के जीवन पर प्रभाव

पदार्थ की पांचवीं अवस्था

(Fifth State of Matter)

चर्चा का कारण

पृथ्वी पर नासा के वैज्ञानिक अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station- ISS) पर अंतरिक्ष यात्रियों के साथ मिलकर ‘बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट’ (Bose-Einstein condensateBEC) – पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बाहर पदार्थ की पांचवीं अवस्था (fifth state of matter) – को जानने के लिए साथ में काम कर रहे हैं।

इस पदार्थ को ब्रह्मांड के सबसे ठंडे स्थानों में से एक ‘शीत परमाण्विक प्रयोगशाला’ (the Cold Atom Laboratory) में निर्मित किया गया है। यह प्रयोगशाला अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर स्थित है।

 पदार्थ, परमाणु और अणु क्या होते है?

‘पदार्थ’ से ब्रह्मांड का निर्माण होता है – प्रत्येक वस्तु जो स्थान घेरती है तथा जिसका द्रव्यमान होता है, ‘पदार्थ’ होती है। हालांकि इसमें द्रव्यमान रहितकण जैसे- फोटॉन, अन्य ऊर्जा घटनाएं (energy phenomenon) तथा तरंगें जैसे- प्रकाश या ध्वनि शामिल नहीं हैं।

सभी पदार्थ ‘परमाणुओं’ से निर्मित होते हैं, तथा परमाणु प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉनों से बने होते हैं।

कई परमाणु मिलकर ‘अणु’ का निर्माण करते हैं, जो सभी प्रकार के पदार्थों के लिए बिल्डिंग ब्लॉक होते हैं।

परमाणु तथा अणु दोनों, स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) के एक रूप रासायनिक ऊर्जा के माध्यम से परस्पर जुड़े होते है।

पदार्थ की पांचवीं अवस्था

पदार्थ की चार प्राकृतिक अवस्थाएँ होती हैं: ठोस, तरल पदार्थ, गैसें और प्लाज्मा।

पदार्थ की पांचवीं अवस्था मानव निर्मित ‘बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट’ (Bose-Einstein condensate- BEC) है।

बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट (BEC)

पदार्थ की पांचवी अवस्था को ‘बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट’ (BEC) नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि इसके अस्तित्व के बारे में लगभग एक सदी पहले अल्बर्ट आइंस्टीन और भारतीय गणितज्ञ सत्येंद्र नाथ बोस द्वारा बताया गया था।

पदार्थ की यह अवस्था तब बनती है, जब किसी तत्व के परमाणुओं को परम शून्य (जीरो डिग्री केल्विन या माइनस 273.15 डिग्री सेल्सियस) तक ठंडा किया जाता है।

इसके चलते उस तत्व के सारे परमाणु मिलकर एक हो जाते हैं यानी सुपर एटम बनता है। इसे ही पदार्थ की पांचवी अवस्था कहते है।

किसी भी पदार्थ में उसके परमाणु अलग-अलग गति करते हैं, लेकिन पदार्थ की पांचवी अवस्था में एक ही बड़ा परमाणु होता है और इसमें तरंगे उठती हैं।

यह पहली बार कब निर्मित किया गया था?

वर्ष 1995 में वैज्ञानिकों द्वारा सर्वप्रथम BEC को निर्मित किया गया था। लेजर और चुम्बक के संयोजन से, वैज्ञानिकों ने रुबिडियम (Rubidium) का एक प्रतिरूप परम शून्य तक ठंडा किया।

इस बेहद कम तापमान पर, आणविक गति मंद होकर रुकने के बहुत करीब आ जाती है।

इस अवस्था में एक परमाणु से दूसरे में स्थानांतरित होने वाली गतिज ऊर्जा लगभग नहीं के बराबर होती है, तथा परमाणु परस्पर गुथने लगते हैं। इस स्थिति में हजारों अलग-अलग परमाणु नहीं होते हैं, बस एक “सुपर परमाणु” होता है।

BEC के अध्ययन का कारण

BEC का उपयोग मैक्रोस्कोपिक स्तर पर क्वांटम यांत्रिकी के अध्ययन करने हेतु किया जाता है। प्रकाश के BEC से होकर गुजरने पर इसकी गति धीमी प्रतीत होती है। यह वैज्ञानिकों को ‘कण / तरंग विरोधाभास’ (particle/wave paradox) का अध्ययन करने को प्रेरित करती है।

BEC में सुपरफ्लूड (Superfluid) के कई गुण होते हैं तथा यह एक तरल-द्रव्य होता है जिसमे घर्षण नहीं होता है।

BEC का उपयोग ब्लैक होल की संभावित स्थितियों को प्रयोगशाला में बनाने (Simulate) के लिए भी किया जाता है।

अंतरिक्ष में BEC को निर्मित करना आसान क्यों है?

1995 के बाद से पृथ्वी पर कई प्रकार के प्रयोगों द्वारा BEC को निर्मित करने का प्रयास किया गया, परन्तु, ये प्रयोग पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाधित होते रहे।

BEC को निर्मित करने हेतु अंतरिक्ष में लगभग शून्य गुरुत्वाकर्षण की अवस्था में इन सारे पार्टिकल्स को बेहद छोटे ‘ट्रैप’ में रखा गया जहां इन सबकी वेव एक-दूसरे में मिल गई और ये एक वेव मैटर की तरह फंक्शन करने लगे। इसे क्वांटम डीजनरेसी (Quantum degenracy) कहते हैं।

अन्तरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी की कारण ISS के वैज्ञानिक परमाणुओं को एक साथ लाने में कामयाब हुए क्योंकि वहां गुरुत्व बल काम नहीं कर रहा था। पृथ्वी के वातावरण में BEC की अवस्था कुछ ही मिलीसेकेंड्स में ही खत्म हो जाती है, ISS में यह एक सेंकेंड से ज्यादा देर तक बनी रही।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. पदार्थ क्या होते है?
  2. पदार्थ की विभिन्न अवस्थाएं?
  3. बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट (BEC)?
  4. सर्वप्रथम BEC को कब बनाया गया था?
  5. BEC के लिए आवश्यक शर्तें?
  6. पूर्ण शून्य तापमान क्या है?
  7. पृथ्वी पर अंतरिक्ष में BEC बनाना आसान क्यों है?
  8. शीत परमाणु प्रयोगशाला क्या है?
  9. 2001 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार।

मेंस लिंक:

बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट (BEC) वैज्ञानिकों को डार्क मैटर के का अध्ययन में किस प्रकार मदद करता है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: TOI

 

विषय: संरक्षण संबंधी विषय।

विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस 2020: 17 जून

वर्ष 2020 की थीम: भोजन, चारा एवं रेशों के लिए उपभोग और भूमि के बीच अंतर्संबंध (Food.Feed.Fibre.- the links between consumption and land)।

17 जून क्यों?

संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में 1994 में मरुस्थलीकरण रोकथाम का प्रस्ताव रखा गया जिसका अनुमोदन दिसम्बर 1996 में किया गया। 14 अक्टूबर 1994 को भारत ने मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (United Nations Convention to Combat Desertification- UNCCD) पर हस्ताक्षर किए।

जिसके पश्चात् वर्ष 1995 से मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए 17 जून को प्रतिवर्ष यह दिवस मनाया जाने लगा।

मरुस्थलीकरण क्या है?

मरुस्थलीकरण जमीन के अनुपजाऊ हो जाने की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें जलवायु परिवर्तन तथा मानवीय गतिवधियों समेत अन्य कई कारणों से शुष्क, अर्द्ध-शुष्क और निर्जल अर्ध-नम इलाकों की जमीन रेगिस्तान में बदल जाती है। इससे जमीन की उत्पादन क्षमता में कमी और ह्रास होता है।

मरुस्थलीकरण एक तरह से भूमि क्षरण का वह प्रकार है, जब शुष्क भूमि क्षेत्र निरंतर बंजर होता है और नम भूमि भी कम हो जाती है। साथ ही साथ, वन्यजीव और वनस्पति भी खत्म होती जाती है। इसकी कई वजह होती है, इसमें जलवायु परिवर्तन और इंसानी गतिविधियां प्रमुख हैं।

शुष्क भूमि पारिस्थितिकी, जो विश्व के एक-तिहाई क्षेत्र में विस्तृत है, अति-शोषण तथा अनुपयुक्त भूमि उपयोग के लिए बेहद संवेदनशील होती है। गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता, वनों की कटाई, अतिवृष्टि तथा खराब सिंचाई प्रथाएं, यह सभी भूमि की उत्पादकता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) के बारे में:

UNCCD की स्थापना वर्ष 1994 में की गयी थी।

मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र संधि (UNCCD) क़ानूनी रूप से बाध्यकारी एकमात्र अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो पर्यावरण और विकास को स्थायी भूमि प्रबंधन से जोड़ता है।

  • रियो पृथ्वी सम्मेलन के पश्चात् इस अभिसमय के लिये वार्ताएं शुरू हुईं।
  • UNCCD की स्थापना रियो पृथ्वी सम्मेलन के एजेंडा 21 के अंतर्गत की गयी थी।
  • अभिसमय को सार्वजनिक करने में हेतु, वर्ष 2006 को “अंतर्राष्ट्रीय रेगिस्तान और मरुस्थलीकरण वर्ष” घोषित किया गया था।
  • UNCCD विशेष रूप से शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों को संबोधित करता है, जिसे शुष्क भूमि के रूप में जाना जाता है।
  • उद्देश्य: अभिसमय का प्रमुख उद्देश्य है-सभी स्तरों पर प्रभावशाली कार्यवाहियों (अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझेदारी व्यवस्थाओं द्वारा) के माध्यम से सूखे और मरुस्थलीकरण की गंभीर समस्याओं से जूझ रहे देशों में इन समस्याओं के प्रभाव को कम करना।
  • भारत में ‘पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ इस अभिसमय के कार्यान्वयन हेतु नोडल मंत्रालय है।

भारत के लिए चिंता

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) द्वारा जारी “स्टेट ऑफ एनवायरमेंट इन फिगर्स 2019” की रिपोर्ट के मुताबिक 2003-05 से 2011-13 के बीच भारत में मरुस्थलीकरण 18.7 हेक्टेयर तक बढ़ चुका है।

वहीं सूखा प्रभावित 78 में से 21 जिले ऐसे हैं, जिनका 50 फीसदी से अधिक क्षेत्र मरुस्थलीकरण में बदल चुका है।

देश की 80 प्रतिशत से अधिक निम्न भूमि सिर्फ नौ राज्यों में है: राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तेलंगाना।

मरुस्थलीकरण या भूमि क्षरण के उच्चतम क्षेत्र वाले शीर्ष तीन जिले:

  • जैसलमेर, राजस्थान (2011-13 के दौरान 92.96 प्रतिशत और 2003-05 के दौरान 98.13 प्रतिशत),
  • लाहौल और स्पीति, हिमाचल प्रदेश (2011-13 में 80.54 प्रतिशत) और (2003-05 के दौरान 80.57 प्रतिशत)
  • कारगिल, जम्मू और कश्मीर (2011-13 के दौरान 78.23 प्रतिशत और 2003-05 के दौरान 78.22 प्रतिशत)।

भारत में मरुस्थलीकरण के मुख्य कारण हैं:

  1. पानी का क्षरण (10.98 प्रतिशत)
  2. पवन द्वारा कटाव (5.55 प्रतिशत)
  3. मानव निर्मित / बस्तियाँ (0.69 प्रतिशत)
  4. वनस्पति का क्षय (8.91 प्रतिशत)
  5. लवणता (1.12 प्रतिशत)
  6. अन्य (2.07 प्रतिशत)

मेंस लिंक:

भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण में अंतर?  पारिस्थितिकी पर मरुस्थलीकरण के प्रभाव पर चर्चा करें।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


  स्किज़ोथोरैक्स सिकुसीरुमेन्सिस

(Schizothorax sikusirumensis)

यह अरुणाचल प्रदेश में हाल ही में खोजी गई मछली की एक नई प्रजाति है।

  • मछली की यह प्रजाति जीनस स्किज़ोथोरैक्स से संबंधित है।
  • इस मछली की प्रजाति का नाम उन नदियों के नाम से पड़ा है जहां यह पाई गई थी। यह मछली पूर्वी सियांग जिले के गकांग क्षेत्र के पास सिकू और सिरुम नदी में पायी गई थी।

Schizothorax


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